।। श्रीहरिः ।।



  आजकी शुभ तिथि–
    आश्विन शुक्ल चतुर्थी, वि.सं.-२०७९, गुरुवार

गीतामें त्यागका स्वरूप



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बाह्यव्यक्तिपदार्थानां न त्यागस्त्याग उच्यते ।

कामादीनां परित्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः ॥

त्यागके विषयमें प्रायः लोगोंकी ऐसी धारणा बनी हुई है कि जो घर-परिवार, स्त्री-पुत्र, माता-पिता आदिको छोड़कर साधु-संन्यासी हो जाते हैं, वे त्यागी हैं । परन्तु वास्तवमें यह त्याग नहीं है; क्योंकि जबतक अन्तःकरणमें सांसारिक वस्तु, व्यक्ति, पदार्थ आदिमें राग है, प्रियता है, उनका महत्त्व है, तबतक बाहरसे घर-परिवार, गृहस्थको छोड़नेपर भी त्याग नहीं होता । अगर बाहरसे घर-परिवार छोड़नेमात्रसे त्याग हो जाता तो फिर सब मरनेवालोंका कल्याण हो जाना चाहिये; क्योंकि वे अपने घर-परिवारको और खास अपने कहलानेवाले शरीरको भी छोड़ देते हैं ! परन्तु उनका कल्याण नहीं होता; क्योंकि उन्होंने सांसारिक राग, आसक्‍ति, ममता आदिका त्याग नहीं किया, प्रत्युत इनके रहते हुए उनको मरना पड़ा ।

जो चीज अपनी नहीं होती, उसका भी त्याग नहीं होता और जो अपना स्वरूप है, उसका भी त्याग नहीं होता; जैसे‒अग्‍नि अपनी दाहिका और प्रकाशिका शक्‍तिका त्याग नहीं कर सकती; क्योंकि दाहिका और प्रकाशिका शक्‍ति अग्‍निका स्वरूप है । फिर त्याग किसका होता है ? जो चीज अपनी नहीं है, उसको अपना मान लिया‒इस झूठी मान्यताका, बेईमानीका ही त्याग होता है । जिसके साथ अपना सम्बन्ध कभी था नहीं, अभी है नहीं, आगे होगा नहीं और कभी हो सकता भी नहीं तथा बिना त्याग किये ही जिसका प्रतिक्षण हमारेसे सम्बन्ध-विच्छेद हो रहा है, उसके साथ माने हुए सम्बन्धका त्याग करना ही वास्तविक त्याग है । तात्पर्य है कि वस्तु आदिका अभाव नहीं करना है, प्रत्युत उन वस्तुओंसे जो सम्बन्ध मान रखा है, उनमें जो आसक्‍ति, ममता कर रखी है, उसका त्याग करना है । यह त्याग ही वास्तविक त्याग है, जिससे तत्काल शान्ति मिलती है,‒‘त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्’ ( १२ । १२) ।

त्यागके विषयमें मुख्य बात है कि संसारमें केवल संसारके लिये ही रहना है, अपने लिये नहीं । सात्त्विक त्यागका स्वरूप बताते हुए भगवान्‌ कहते हैं कि केवल कर्तव्यमात्र करना है, पर उसमें आसक्‍ति, ममता, फलेच्छा न हो । आसक्‍ति आदि न होनेसे शरीर-संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है (१८ । ९) । कर्तव्यका पालन करनेमें कष्ट होता है, परिश्रम होता है, आराम नहीं मिलता‒ऐसा समझकर अर्थात् शारीरिक कष्टके भयसे कर्तव्यका त्याग किया जाय तो वह राजस त्याग होता है । राजस त्यागसे शान्ति नहीं मिलती (१८ । ८) । मोहके कारण, बिना विचार किये कर्तव्यका, क्रियाओंका, पदार्थोंका त्याग किया जाय तो वह तामस त्याग होता है (१८ । ७) । तामस त्याग मनुष्यको प्रमाद और आलस्यमें लगाता है, जिससे उसकी अधोगति होती है ।


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।। श्रीहरिः ।।



  आजकी शुभ तिथि–
    आश्विन शुक्ल तृतीया, वि.सं.-२०७९, बुधवार

गीतोक्त प्रवृत्ति और आरम्भ



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वर्णाश्रमाभ्यां नियतं हि कर्म कार्यं प्रवृत्तिः कथिता बुधैश्‍च ।

कर्मणि भोगाय नवानि चैव कार्याणि चारम्भ उदीरितो वै ॥

भगवान्‌ने रजोगुणकी वृद्धिके लक्षण बताते हुएप्रवृत्ति’ औरआरम्भ’इन दोनोंका एक साथ प्रयोग किया है‒लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा’ (१४ । १२) । यद्यपि स्थूलदृष्टिसे प्रवृत्ति और कर्मोंका आरम्भ‒ये दोनों एक समान ही दीखते हैं, तथापि इन दोनोंमें बड़ा भारी अन्तर है । अपने-अपने वर्ण, आश्रम, देश, वेश आदिमें रहते हुए प्राप्त परिस्थितिके अनुसार जो कर्तव्य सामने आ जाय, उसको सुचारुरूपसे सांगोपांग कर देनाप्रवृत्ति’ है; और भोग तथा संग्रहको बढ़ानेके उद्देश्यसे नये-नये कर्म प्रारम्भ करनाआरम्भ’ है । अतः प्रवृत्तिको तो निष्कामभावसे निर्लिप्‍ततापूर्वक करना चाहिये, उसका त्याग नहीं करना चाहिये; क्योंकि निष्कामभावपूर्वक प्रवृत्ति करना योगारूढ़ होनेमें कारण है (६ । ३); परन्तु आरम्भका तो त्याग ही कर देना चाहिये; क्योंकि वह भोग और संग्रहकी आसक्‍ति बढ़ाकर पतन करनेवाला है ।

गीता परिस्थितिका परिवर्तन करनेके लिये नहीं कहती, प्रत्युत उसका परिमार्जन करनेके लिये कहती है, जिससे मनुष्य किसी परिस्थितिमें फँसे भी नहीं और वह जिस परिस्थितिमें स्थित है, वही परिस्थिति उसके कल्याणका साधन बन जाय । उसको अपने कल्याणके लिये नये कर्मोंका आरम्भ न करना पड़े और वर्ण, आश्रम, देश, काल, परिस्थिति आदिका परिवर्तन न करना पड़े । कारण कि परमात्मा सब वर्ण, आश्रम, देश, काल, परिस्थिति, घटना आदिमें पूर्णरूपसे व्याप्त हैं ।

प्रवृत्ति (अपने कर्तव्यका पालन) तो सभी वर्ण-आश्रमोंमें होती है और होनी भी चाहिये; क्योंकि अपने-अपने कर्तव्यका पालन किये बिना सृष्टि-चक्रकी मर्यादा चलेगी ही नहीं और अपने कर्तव्यका त्याग करनेसे उद्धार नहीं होगा । अतः जो मनुष्य जिस-किसी वर्ण, आश्रम, परिस्थिति आदिमें स्थित है, उसको निष्कामभावपूर्वक अपने कर्तव्यका पालन जरूर करना चाहिये ।

प्रवृत्ति (अपने कर्तव्यका पालन) तो गुणातीत मनुष्यके द्वारा भी होती है (१४ । २२), पर उसके द्वारा भोग और संग्रहके उद्देश्यसे कर्मोंका आरम्भ नहीं होता । कहीं-कहीं गुणातीत मनुष्यके द्वारा भी नये-नये कर्मोंका आरम्भ देखनेमें आता है; परन्तु उन कर्मोंके आरम्भमें उसके किंचिन्मात्र भी राग-द्वेष नहीं होते । भोग और संग्रहके उद्देश्यसे नये-नये कर्मोंका आरम्भ करनेवाले मनुष्यहमें तो परमात्मप्राप्‍ति ही करनी है’ऐसा एक निश्चय कर ही नहीं सकते (२ । ४४) ।

तात्पर्य है कि अपने वर्ण-आश्रमके अनुसार निष्कामभावपूर्वक की गयी प्रवृत्ति बाधक नहीं है, प्रत्युत मुक्तिमें हेतु है । ऐसे ही अपने स्वार्थ, अभिमान, कामना, आसक्‍तिका त्याग करके केवल प्राणिमात्रके हितके लिये किये गये नये-नये कर्मोंका आरम्भ भी बाधक नहीं है । परन्तु इन आरम्भोंमें साधकको यह विशेष सावधानी रखनी चाहिये कि कर्मोंका आरम्भ करते हुए कहीं हृदयमें पदार्थों और क्रियाओंका महत्त्व अंकित न हो जाय । अगर हृदयमें पदार्थों और क्रियाओंका महत्त्व अंकित हो जायगा तो उन कर्मोंमें साधककी निर्लिप्‍तता नहीं रहेगी अर्थात् वह साधक अपने पास रुपये-पैसे भी न रखता हो, पदार्थोंका संग्रह भी न करता हो तो भी उसके हृदयमें धन, पदार्थ और क्रियाओंका महत्त्व अंकित हो ही जायगा; तथा कार्य करते हुए और न करते हुए भी उन कार्योंका चिन्तन हो ही जायगा ।

भगवान्‌ने कर्मयोगी, ज्ञानयोगी और भक्तियोगी‒तीनों ही साधकोंके लिये प्रवृत्ति (कर्म)-से निर्लिप्त रहनेकी बात कही है । कर्मयोगी साधकमें फलासक्ति न होनेसे वह कर्म करता हुआ भी लिप्त नहीं होता‒कुर्वन्नपि न लिप्यते’ (५ । ७) । ज्ञानयोगी साधकसम्पूर्ण कर्म प्रकृतिके द्वारा ही हो रहे हैं’ऐसा देखता है और स्वयंको अकर्ता अनुभव करता है (१३ । २९) । इसलिये वह कर्म करता हुआ भी लिप्त नहीं होता । भक्तियोगी साधक सम्पूर्ण कर्मोंको भगवान्‌के अर्पण कर देता है; अतः वह कर्म करता हुआ भी कर्मोंसे लिप्त नहीं होता ।

भगवान्‌ने कर्मयोगमें कर्मोंके आरम्भमें कामनाओं और संकल्पोंका त्याग तो बताया है, पर कर्मोंके आरम्भका त्याग नहीं बताया; क्योंकि कर्मयोगमें निष्कामभावसे कर्म करना आवश्यक है । कर्मोंको किये बिना कर्मयोगकी सिद्धि ही नहीं हो सकती (६ । ३) । परन्तु ज्ञानयोग और भक्तियोगमें भगवान्‌ने सम्पूर्ण कर्मोंके आरम्भका त्याग बताया है; जैसे‒जो सम्पूर्ण कर्मोंके आरम्भका त्यागी है, वह गुणातीत कहा जाता है (१४ । २५); और जो सम्पूर्ण कर्मोंके आरम्भका त्यागी है, वह भक्त मुझे प्रिय है (१२ । १६) । कारण कि ज्ञानयोगी और भक्तियोगीकी सांसारिक कर्मोंसे उपरति रहती है ।

नारायण ! नारायण ! नारायण ! नारायण !


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।। श्रीहरिः ।।



  आजकी शुभ तिथि–
   आश्विन शुक्ल द्वितीया, वि.सं.-२०७९, मंगलवार

गीतामें लोकसंग्रह



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महापुरुषके द्वारा जो भी क्रियाएँ होती हैं, वे सब आदर्शरूपसे होती हैं । कहीं-कहीं उनकी क्रियाएँ अनुयायी-रूपसे भी दीखती हैं । जिस तरह आस्तिक लोग शास्त्रविहित कर्मोंमें एवं उन कर्मोंके फलोंमें दृढ़ श्रद्धा-विश्वास रखते हुए सकामभावसे तत्परतापूर्वक कर्म करते हैं, उसी तरह ज्ञानी महापुरुष भी तत्परतासे कर्म करता है (३ । २५) ।

कर्मयोगी साधकमें कर्म करनेका जो स्वभाव होता है, वही स्वभाव सिद्धावस्थामें भी रहता है । अतः कर्मयोगसे सिद्ध महापुरुषमें स्वाभाविक ही कर्म करनेकी प्रवृत्ति दीखती है । परन्तु ज्ञानयोगसे सिद्ध महापुरुषमें वैसी प्रवृत्ति नहीं दीखती । कारण कि ज्ञानयोगी पहलेसे ही अपनेको असंग अनुभव करता है । अतः सिद्धावस्थामें उसकी कर्मों और पदार्थोंसे स्वाभाविक ही उपरति रहती है, जो ज्ञानमार्गके साधकोंके लिये आदर्श होती है; और उस महापुरुषकी पदार्थ आदिसे जो तटस्थता है, वह दुनियामात्रके लिये हितकारी होती है ।

प्रश्न‒सिद्ध महापुरुषमें अहंभाव नहीं रहता, फिर उसके द्वारा लोकसंग्रह, क्रियाएँ कैसे होती हैं ?

उत्तर‒उस महापुरुषके शरीरद्वारा क्रिया होनेमें दो कारण हैं‒एक उनका प्रारब्ध और दूसरा प्राणियोंका भाव । जिस प्रारब्धके प्रवाहसे उसको शरीर मिला है, उसी प्रारब्धसे उसके द्वारा सभी क्रियाएँ होती हैं; और उसके सामने जो प्राणी आते हैं, उन प्राणियोंके भावोंके अनुसार ही उसके द्वारा क्रियाएँ होती हैं । अगर उसके पास प्रेमभाव रखनेवाला, श्रद्धालु मनुष्य आता है तो उसके साथ उस महापुरुषका बर्ताव भी प्रेमयुक्त होता है; और अगर उदासीन अथवा वैरभाव रखनेवाला मनुष्य आता है तो उस महापुरुषका बर्ताव भी उदासीनकी तरह होता है (वैरभाव महापुरुषमें होता ही नहीं) ।

संसारमें ज्ञानयोग, भक्तियोग, कर्मयोग आदि जिस योग-साधनकी जिस समय आवश्यकता होती है, उस समय सन्त-महापुरुषोंके द्वारा उसी योग-साधनका प्रचार होता है । जैसे, जिस समय संसारके लिये ज्ञानयोगकी आवश्यकता थी, उस समय श्रीशंकराचार्यजीके द्वारा विशेषतासे ज्ञानयोगका प्रचार हुआ; और जिस समय संसारके लिये भक्तियोगकी आवश्यकता थी, उस समय श्रीरामानुजाचार्यजीके द्वारा विशेषतासे भक्तियोगका प्रचार हुआ । जैसे भगवान्‌के द्वारा होनेवाली सभी क्रियाएँ प्राणिमात्रके हितके लिये ही होती हैं, ऐसे ही महापुरुषके द्वारा होनेवाली सभी क्रियाएँ प्राणिमात्रके हितके लिये स्वतः होती हैं । उसके आचरण एवं वचन (उपदेश)‒दोनों ही प्राणिमात्रके हितके लिये होते हैं, पर उसके भीतर हित करनेका अभिमान नहीं होता । जैसे सूर्य भगवान्‌से दुनियामात्रको प्रकाश एवं कर्म करनेकी प्रेरणा मिलती है, ऐसे ही उस महापुरुषके आचरणों तथा वचनोंसे दुनियामात्रको प्रकाश (ज्ञान) एवं कर्तव्य-कर्म करनेकी प्रेरणा मिलती है, चाहे उसका शरीर रहे अथवा न रहे । जब भगवान्‌ श्रीराम और श्रीकृष्णके अवतार हुए, तब उनको साक्षात् भगवान्‌ माननेवाले मनुष्य बहुत कम थे, पर आज उनको भगवान्‌ माननेवाले मनुष्योंकी संख्या ज्यादा है । कलियुगके कारण मनुष्योंके आचरणोंमें तो शिथिलता आयी है, पर उनको भगवान्‌ माननेका भाव बढ़ा है । ऐसे ही महापुरुषोंका शरीर न रहनेके बाद उनके सिद्धान्तोंका, उनके वचनोंका विशेष प्रचार होता है ।

जबतक मनुष्यमें अहंभाव रहता है, तबतक उसकी सम्पूर्ण क्रियाएँ दुनियाके लिये हितकारी नहीं होती । अहंभाव मिटनेपर उसकी सम्पूर्ण क्रियाएं दुनियाके लिये हितकारी, आदर्श हो जाती हैं । हाँ, सकामभावसे कर्म करनेवाले मनुष्योंके कर्म भी दूसरोंके लिये आदर्श होते हैं, पर वे कर्म कल्याण करनेवाले नहीं होते । सकामभावसे कर्म करनेवाले मनुष्योंमें उतनी ही शुद्धि आती है, जितनेसे वे भोगोंको भोग सकें । उनमें वह शुद्धि नहीं आती, जिससे कल्याण हो जाय ।

जिन गाँवोंमें, प्रान्तोंमें सन्त-महापुरुष हुए हैं अथवा गये हैं, वे गाँव आज भी शुद्ध हैं अर्थात् आज भी वहाँके लोगोंमें आस्तिकता, अच्छे विचार, अच्छे आचरण आदि देखनेको मिलते हैं । परन्तु जिन गाँवोंमें न तो कोई सन्त हुआ है और न कोई सन्त गया ही है, उन गाँवोंके लोग भूत-प्रेतोंकी तरह ही होते हैं ।

नारायण ! नारायण ! नारायण ! नारायण !


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