।। श्रीहरिः ।।

                                                                     


आजकी शुभ तिथि–
  मार्गशीर्ष शुक्ल प्रतिपदा, वि.सं.-२०७८, रविवार
  पारमार्थिक उन्नति धनके आश्रित नहीं


आज मनुष्योंके मनमें धनका महत्त्व बैठा हुआ है । वह हरेक जगह समझता है कि धनसे ही कल्याण होता है । अरे भाई ! धन एक जड़ चीज है, इससे जड़ चीजें ही खरीदी जा सकती हैं, परमात्मा नहीं खरीदे जा सकते । अगर परमात्मा धनसे खरीदे जाते, तो हमारे-जैसोंकी क्या दशा होती ? बड़ी मुश्किल हो जाती ! पर ऐसी बात नहीं है ।

श्रोता‒धर्मका अनुष्ठान तो धनसे ही होता है ?

स्वामीजी‒बिलकुल गलत है । रत्तीभर भी सही नहीं, परन्तु धनके लोभीको यही दिखता है; क्योंकि धनमें बुद्धि बेच दिया, अपनी अक्लकी बिक्री कर दी । अब अक्लके बिना वे क्या समझें ? अक्ल होती तो समझते । शास्त्रमें आया है‒

धर्मार्थं यस्य वित्तेहा वरं तस्य निरीहता ।

प्रक्षालनाद्धि पंकस्य   दूरादस्पर्शनं वरम् ॥

अर्थात्‌ जो मनुष्य धर्मके लिये धनकी इच्छा करता हो, उसके लिये धनकी इच्छाका त्याग करना ही उत्तम है । कारण कि कीचड़ लगाकर धोनेकी अपेक्षा उसका स्पर्श न करना ही उत्तम है । राजा रन्तिदेवका पुण्य बहुत बड़ा माना जाता है । उनके सामने ब्रह्मा, विष्णु, महेश‒सब प्रकट हो गये । बात क्या थी ? गरीबोंको दुःखी देखकर उन्होंने अपना सर्वस्व दान कर दिया था । एक बार उनको और उनके परिवारको अड़तालीस दिनतक कुछ भी खाने-पीनेको नहीं मिला । उनचासवें दिन उनको थोड़ा घी, खीर, हलवा और जल मिला । वे अन्न-जल ग्रहण करना ही चाहते थे कि एक ब्राह्मण अतिथि आ गया । रन्तिदेवने उस ब्राह्मण देवताको भोजन करा दिया । ब्राह्मणके चले जानेके बाद रन्तिदेव बचा हुआ अन्न परिवारमें बाँटकर खाना ही चाहते थे कि एक शूद्र अतिथि आ गया । रन्तिदेवने बचा हुआ खाना, कुछ अन्न उसे दे दिया । इतनेमें ही कुत्तोंको साथ लेकर एक और मनुष्य वहाँ आया और बोला कि ये कुत्ते बहुत भूखे हैं, कुछ खानेको दीजिये । रन्तिदेवने बचा हुआ सारा अन्न कुत्तोंसहित उस अतिथिको दे दिया । अब केवल एक मनुष्यके पीने लायक जल बाकी बचा था । उसको आपसमें बाँटकर पीना ही चाहते थे कि एक चाण्डाल आ पहुँचा और बड़ी दीनतासे बोला कि महाराज, मैं बड़ा प्यासा हूँ, मुझे जल पीला दीजिये । रन्तिदेवने वह बचा हुआ जल भी उस चाण्डालको पिला दिया । उनकी परीक्षासे बड़े प्रसन्न होकर ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों उनके सामने प्रकट हो गये ! अगर भगवान्‌की प्राप्ति धनसे होती तो जल पिलानेमात्रसे वे कैसे प्रकट हो जाते ?

धर्मका अनुष्ठान, पारमार्थिक उन्नति धनपर बिलकुल भी अवलंबित नहीं है । जो इनको धनके आश्रित मानते हैं, वे धनके गुलाम हैं, कौड़ीके गुलाम हैं । पर वे इस बातको समझ ही नहीं सकते ! छोटे बालकके सामने एक सोनेकी मुहर रखी जाय और एक बताशा रखा जाय तो बताशा ले लेगा, मुहर नहीं लेगा । आप समझेंगे कि वह भोला है, पर अपनी दृष्टिसे वह भोला नहीं है, प्रत्युत समझदार है । बताशा तो मीठा होता है, और खानेके काम आता है, पर मुहरका वह क्या करे ? ऐसे ही ये लोग धन-रूपी मीठा बताशा तो ले लेते हैं, पर भगवान्‌का भजन, धर्मका अनुष्ठान, परमात्माकी प्राप्ति‒इन कीमती रत्नोंको फालतू समझ लेते हैं । वे समझते हैं कि इतना बड़ा पाण्डाल बनाना, बिछौना बिछाना, लाउडस्पीकर लगाना आदि सब काम धनसे ही होते हैं । यह बिलकुल मूर्खताकी बात है; इसमें रत्तीभर भी सच्चाई नहीं है; किन्तु धनका लोभी इस बातको समझ ही नहीं सकता । मेरेमें ताकत नहीं है कि मैं यह बात आपको समझा दूँ, और आप सब इकट्ठे होकर भी मेरेको यह नहीं समझा सकते कि पारमार्थिक उन्नति धनके अधीन है ।

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।। श्रीहरिः ।।

                                                                    


आजकी शुभ तिथि–
  मार्गशीर्ष अमावस्या, वि.सं.-२०७८, शनिवार
  पारमार्थिक उन्नति धनके आश्रित नहीं


श्रोतागुरुकी सेवा कैसे की जाय ?

स्वामीजीगुरु किसको कहते हैं ? गुरु-गीतामें आया है‒

गुकारश्चान्धकारो हि रुकारस्तेज उच्यते ।

अज्ञानग्रासकं  ब्रह्म    गुरुरेव  न  संशयः ॥

तात्पर्य है कि जो अन्तःकरणके अन्धकारको दूर कर दे, उसका नाम ‘गुरु’ है । बाहरका अन्धकार तो सूर्य दूर कर देता है, पर भीतरका अन्धकार गुरु दूर करता है । गुरुका संग करके, उनकी आज्ञाका पालन करके अपने भीतरका अन्धकार दूर कर ले‒यही गुरुकी वास्तविक सेवा है और इसीसे गुरु प्रसन्न होते हैं । हम शरीरसे उनको सुख दें तो वह भी अच्छा है; परन्तु वह गुरु-सेवा नहीं है, प्रत्युत एक शरीरकी सेवा है ।

गुरु शरीर नहीं होता । शास्त्रोंमें आया है कि गुरुमें मनुष्य-बुद्धि करना और मनुष्यमें गुरु-बुद्धि करना पाप है, अन्याय है । कारण कि गुरु अमर होता है, जब कि मनुष्य मरनेवाला होता है । अगर गुरु भी मरनेवाला होता तो वह शिष्यको अमर कैसे बनाता ? गुरुकी असली सेवा है‒अमरताकी प्राप्ति कर लेना । जैसे, परीक्षा लेनेवाला आता है और विद्यार्थी उसके सवालोंका ठीक जवाब देता है, तो उससे विद्या पढ़ानेवाले गुरुजी प्रसन्न हो जाते हैं । ऐसे ही जब शिष्य परमात्मतत्त्वको प्राप्त कर लेता है, तब उससे पारमार्थिक मार्ग दिखानेवाले गुरुजी प्रसन्न हो जाते हैं ।  गुरुका प्रसन्न होना ही उनकी सेवा है । आप रोटीसे, कपड़ेसे, मकानसे, सवारीसे जिस किसी तरह भी गुरुको सुख पहुँचाते हैं‒यह भी ठीक है; परन्तु ये चीजें शरीरतक ही पहुँचती हैं, गुरुतक नहीं ।

सन्त-महात्मा हमारेसे तभी प्रसन्न होते हैं, जब हमारा जीवन महान्‌ पवित्र, निर्मल हो जाये और हमारा कल्याण हो जाय । जैसे हृष्ट-पुष्ट बालकको देखकर माँ प्रसन्न हो जाती है, ऐसे ही आपमें ज्ञान बढ़ा हुआ देखकर सन्त-महात्मा प्रसन्न हो जाते हैं । आप भले ही उन्हें रोटीका टुकड़ा भी मत दो, उनकी कुछ भी सेवा मत करो; परन्तु उनकी बातोंको धारण करके वैसे ही बन जाओ तो वे बड़े प्रसन्न हो जायँगे; क्योंकि यही उनकी असली सेवा है ।

जड़ चीजोंसे गुरु-तत्त्वकी सेवा नहीं होती । छोटे बच्चेको रेशमकी चमकीली टोपी पहना दी जाय तो वह बहुत राजी हो जाता है । जब वह पिताजीकी गोदमें बैठता है, तब वह उस टोपीको पिताजीके सिरपर रख देता है और समझता है कि मैंने पिताजीको बहुत बढ़िया चीज दे दी । परन्तु वह टोपी पिताजीके लिये ठीक है क्या ? पिताजी वह टोपी पहने हुए चलेंगे क्या ? ऐसे ही जो लोग सन्तोंको भेंट चढ़ाते हैं, कपड़ा देते हैं, बढ़िया-बढ़िया भोजन कराते हैं, वे मानो उनको रेशमी चमकदार टोपी पहनाते हैं ! यह उनका बचपना ही है । यह सन्तोंकी असली सेवा नहीं है । सन्तोंकी असली सेवा है‒अपना कल्याण करना । हम अपना कल्याण कर लें तो वे प्रसन्न हो जायँगे, उनका प्रयत्न सफल हो जायगा, उनका कहना-सुनना सफल हो जायगा ।

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।। श्रीहरिः ।।

                                                                   


आजकी शुभ तिथि–
मार्गशीर्ष कृष्ण चतुर्दशी, वि.सं.-२०७८, शुक्रवार
                  धन-संग्रहसे हानि


मैं यह नहीं कहता कि आप रुपये छोड़ दो, फेंक दो या नष्ट कर दो । पर उन रुपयोंके रहते खुद तंगी भोगते हो, आवश्यक चीज भी नहीं लेते; जहाँ जरूरी है, वहाँ खर्च भी नहीं करते तो फिर रुपये क्या काम आये ? होश आना चाहिये कि भगवान्‌ने दिये हैं तो उन रुपयोंको अच्छे-से-अच्छे काममें खर्च करें । जीते-जी अपने और दूसरोंके काममें लगायें । केवल कंजूसी करके हम संख्या ही बढ़ाते चले जायँगे तो क्या होगा ? अच्छा-से-अच्छा मौका आनेपर भी खयाल रहेगा कि कोई दूसरा खर्च कर दे तो अच्छा है; अपना खर्च न हो तो अच्छा है । सज्जनो ! आप मेरी बातकी तरफ ध्यान दें । जिसे कोई दान-पुण्यका काम हुआ, उस समय भी यह भाव रहे कि कोई दूसरा खर्च कर दे तो अच्छा है, अपनी आफत टले तो फिर उन रुपयोंका क्या करोगे ? जैसे व्यापारी आदमी देखता है कि इतने सस्तेमें अधिक-से-अधिक ले लें; क्योंकि बाजारका भाव तो महँगा होनेवाला है और अमुक-अमुक जगह तेजी आ ही गयी है, पर यहाँ सस्ता है, तो ब्याजमें भी रुपया लेकर अधिक-से-अधिक ले लें तो अच्छा है । इस प्रकार जैसे लेनेका लोभ लगता है, वैसे खर्च करनेका लोभ नहीं लगता, जो कि हमारे साथ चलेगा । जितना आप खर्च कर दोगे, शुभ काममें लगा दोगे, उतना आपके साथ चलेगा । अतः यह लोभ लगना चाहिये कि अच्छे-से-अच्छे काममें मैं खर्च करूँ । एक-एकको ऐसा कहना चाहिये कि यहाँ तो मैं खर्च करूँगा । बारी नहीं आये; क्योंकि ऐसा मौका मिलना बड़ा मुश्किल होता है ।

गीताप्रेसके संस्थापक और संचालक श्रीजयदयालजी गोयन्दकाने एक बार यह बात कही कि रुपये कमाना हम कठिन नहीं समझते, रुपयोंको अच्छे काममें लगाना कठिन समझते हैं । दूसरे भाई-बन्धु आड़ लगा देते हैं, भीतरका लोभ भी आड़ लगा देता है कि इतना खर्च करनेकी क्या जरूरत है ? इतनेसे ही काम चल जायगा । यह सोचते ही नहीं कि क्या करेंगे पैसोंका ? छोड़कर मरेंगे तो दस-बीस हजार कम छोड़कर मरेंगे, यही तो होगा और क्या होगा ? यह तो है नहीं कि सब खर्च हो जायँगे, कंगले हो जायँगे । जो धन यहीं रह जायगा या आ करके चला जायगा, उससे कोई पुण्य नहीं होगा, उससे अन्तःकरण निर्मल नहीं होगा । परन्तु अच्छे-से-अच्छे काममें धन खर्च कर देंगे तो चित्त प्रसन्न होगा, पुण्य होगा, सन्तोष होगा कि इतने पैसे तो अच्छे काममें लग गये ! अब जो बाकी रहे, वे अच्छे काममें कैसे लगें ? इसका विचार करना है ।

एक मार्मिक बात है कि वास्तवमें वस्तुकी महिमा नहीं है । महिमा है, उसके उपयोगकी । कितनी ही वस्तुएँ पासमें हों, यदि उनका उपयोग नहीं किया तो वे किस कामकी ? जैसे मैंने पहले आपको बताया ही है कि एक आदमीने बक्सेमें सोना भर रखा है और हमने एक बक्सेमें पत्थर भर रखे हैं । दोनोंका भार बराबर है । खर्च करनेसे तो सोना बढ़िया है, पर खर्च न किया जाय तो सोने और पत्थरके भारमें क्या फर्क है ? काममें लेनेसे तो सोना बहुत कीमती है, पत्थर कीमती नहीं है । परन्तु काममें लें ही नहीं तो पासमें चाहे सोना हो, चाहे पत्थर हो, क्या फर्क है । हाँ, इतना फर्क जरूर है कि पासमें सोना पड़ा रहनेसे चिन्ता अधिक हो जायगी कि कोई चुरा न ले, किसीको पता न लग जाय ! मनमें चिन्ता और खलबली होनेके सिवाय और क्या फायदा होगा ? इस बातको आप गहरा उतरकर, शान्तिसे, निष्पक्ष होकर ठीक समझें ।

सज्जनो ! समय बड़ी तेजीसे जा रहा है, मौत नजदीक आ रही है, एक दिन सब पदार्थोंके साथ पड़ाकसे सम्बन्ध टूट जायगा । इसलिये बड़ी सावधानीसे समयको और पैसोंको अच्छे-से-अच्छे काममें लगाओ ।

नारायण !     नारायण !!     नारायण !!!

‒ ‘वास्तविक सुख’ पुस्तकसे

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।। श्रीहरिः ।।

                                                                  


आजकी शुभ तिथि–
मार्गशीर्ष कृष्ण त्रयोदशी, वि.सं.-२०७८, गुरुवार
                  धन-संग्रहसे हानि


यह प्रत्यक्ष बात है कि हमारे शरीर जब जन्मे थे, तब छोटे-छोटे थे, आज इतने बड़े हो गये ! किसी एक वर्षमें ये शरीर इतने बड़े हुए हों, ऐसी बात नहीं है । ये प्रत्येक वर्षमें बदले हैं । जो प्रत्येक वर्षमें बदलते हैं, वे प्रत्येक महीनेमें बदलते हैं । ऐसा नहीं कि ग्यारह महीनोंमें तो नहीं बदले और बारहवें महीनेमें बदला गये हों । जो प्रत्येक महीनेमें बदलते हैं, वे प्रत्येक दिनमें बदलते हैं । ऐसा नहीं कि उन्तीस दिनोंमें तो वैसे ही रहे और तीसवें दिन बदल गये । जो प्रत्येक दिनमें बदलते हैं, वे प्रत्येक घंटेमें बदलते हैं । ध्यान दें, पहले घंटेमें जो शरीर हैं, वे दूसरे घंटेमें वैसे नहीं हैं । नहीं तो एक दिनमें कैसे बदलते ? जो घंटेभरमें बदलते हैं, वे उन्सठ मिनटमें न बदलकर साठवें मिनटमें बदल जायँ‒ऐसा नहीं होता । जो प्रत्येक मिनटमें बदलते हैं, वे प्रत्येक सेकण्डमें बदलते हैं । इससे क्या सिद्ध हुआ ? कि केवल बदलना-ही-बदलना है । बदलकर किधर जा रहे हैं ? मृत्युकी ओर जा रहे हैं; बिलकुल निःसन्देह बात है । जितने हम जी गये, उतने हम मर गये ! अब आगे कितनी आयु बाकी है, इसका तो पता नहीं है, पर जितने वर्ष बीत गये, उतने वर्ष हमारी आयुसे कम हो गये, मौत उतनी नजदीक आ गयी‒इसमें कोई सन्देह नहीं है । जीवन मृत्युकी तरफ जा रहा है । यह शरीर अभावकी तरफ जा रहा है । एक दिन इसका सर्वथा अभाव हो जायगा । आज जो ‘है’, एक दिन वह ‘नहीं’ हो जायगा । परन्तु चाहना यह रखते हैं कि भोग-पदार्थोंका संग्रह कर लें, रुपया इकठ्ठा कर लें, कितनी भूलकी बात है यह ।

जरा ध्यान दें । रुपया कमाना और उसे अच्छे काममें लगाना दोष नहीं है; पर उसको जमा करनेकी जो एक धुन है, वही दोष है । इसका अर्थ यह नहीं है कि रुपये इकठ्ठे नहीं होने देना है । आवश्यकता पड़नेपर भी खर्च न करें‒यह तात्पर्य भी नहीं है । बहन-बेटी है, ब्राह्मण है, कोई रोगी है, भूखा है, नंगा है, और अभावग्रस्त है, उसके लिये खर्च नहीं करना गलती है । संग्रह करके आखिर करोगे क्या ? आवश्यकता पड़नेपर जब अपने लिये भी खर्च नहीं करते और दूसरोंके लिये भी खर्च नहीं कर सकते तो वह संग्रह किस कामका ? यह शरीर तो रहेगा नहीं । जब शरीरका अभाव हो जायगा, तब वे रुपये क्या काम आयेंगे ? अगर रुपयोंको न्यायपूर्वक कमाते हैं और उनको आवश्यक काममें खर्च करते हैं, तब तो होश है, नहीं तो रुपयोंके लोभमें बेहोशी आ जाती है । रुपयोंका इतना मोह हो जाता है कि रोकड़में लाख रुपये हो जाय तो अब मनुष्य उन लाख रुपयोंको छोड़ना नहीं चाहता । कभी भूलसे हजार-दो हजार खर्च हो जायँ तो बड़ा दुःख लगता है कि मूलमेंसे खर्च कर दिया ! अगर लड़का खर्च कर देता है तो उसपर गुस्सा आता है कि ‘तुम कोई मनुष्य हो ? मूल खाओगे तो कितने दिन काम चलेगा ?’ रोटी-कपड़ेकी तंगी तो भोग लेंगे, पर मूलको खर्च नहीं करेंगे, जिससे वह ज्यों-का-त्यों सुरक्षित रहे । आपसे पूछा जाय कि मूलको क्या करोगे ? शरीर जा रहा है, मौत प्रतिक्षण नजदीक आ रही है, ये रुपये पड़े-पड़े क्या काम करेंगे ?

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।। श्रीहरिः ।।

                                                                 


आजकी शुभ तिथि–
मार्गशीर्ष कृष्ण द्वादशी, वि.सं.-२०७८, बुधवार
                धनके लोभमें निन्दा


दो-तीन दिन बाद वह साधु (बहुरुपिया) बोला कि ‘राजन्‌ ! अब तो हम जायँगे ।’ राजा बोला‒‘अच्छा महाराज, जैसी आपकी मर्जी ।’ राजाने उसके आगे खजाना खोल दिया और कहा कि इसमेंसे आपको जो सोना-चाँदी, माणेक-मोती, रुपये-पैसे चाहिये, खूब ले लीजिये । उस साधुने वहाँसे अच्छा-अच्छा माल ले लिया और ऊँटपर लाद दिया । जब वह रवाना होने लगा, तब राजाने कहा कि ‘महाराज, यह तो आपने अपनी तरफसे लिया है । एक चाँदीका बक्सा है, वह मैं अपनी तरफसे देता हूँ । राजाने एक चाँदीके बक्सेको रेशमी जरीदार कपड़ेमें लपेटकर उसको दे दिया और कहा कि ‘यह मेरी तरफसे आपको भेंट है ।’ उस साधुने वह बक्सा ले लिया और वहाँसे चल दिया ।

वह साधु (बहुरुपिया) अपने राजाके पास पहुँचा । राजाने पूछा कि ‘क्या-क्या लाये ?’ उसने सब बता दिया कि ‘लाखों-करोड़ोंका धन ले आया हूँ । राजाने समझा कि यह पड़ोसका राजा महान्‌ मूर्ख ही है; क्योंकि इसको साधुकी पहचान ही नहीं है कि कैसा साधु है ! यह तो बड़ा बेसमझ है ! वह बहुरुपिया बोला कि ‘एक बक्सा मुझे राजाने अपनी तरफसे दिया है कि यह मेरी तरफसे भेंट है ।’ राजाने कहा कि ‘ठीक है, बक्सा लाओ, उसको मैं देखूँगा ।’ उसने वह बक्सा राजाके पास रख दिया और उसकी चाबी दे दी । राजाने खोलकर देखा कि चाँदीका एक बक्सा है, उसके भीतर एक और चाँदीका बक्सा है, फिर उसके भीतर एक और चाँदीका छोटा बक्सा है । तीनों बक्सोंको खोलकर देखा तो भीतरके छोटे बक्सेमें एक फूटी कौड़ी पड़ी मिली । राजाने सोचा कि यह राजा मूर्ख नहीं है, बड़ा बुद्धिमान्‌ है । साधु-वेशमें इसकी निष्ठा आदरणीय है । राजाने बहुरुपियेसे पूछा कि ‘ तुमसे क्या बात हुई, सारी बात बताओ ।’ उसने कहा कि ‘एक दिन उस राजाने मेरेसे कहा कि महाराज, कुछ सुनाओ । मैंने कहा कि तुम तो बड़े भाग्यशाली हो । तुम्हारे पास राज्य है, धन-सम्पत्ति है, अनुकूल स्त्री-पुत्र आदि हैं, तुम्हारेपर भगवान्‌की बड़ी कृपा है ।’ यह सुनकर राजा सारी बात समझ गया । तीन बक्से होनेका मतलब था‒स्थूलशरीर, सूक्ष्मशरीर और कारणशरीर । इनके भीतर क्या है ! भीतर तो फूटी कौड़ी है, कुछ नहीं है । बाहरसे वेष-भूषा बड़ी अच्छी है, बाहरसे बड़े अच्छे लगते हैं, पर भीतर कुछ नहीं है । आपपर भगवान्‌की बड़ी कृपा है‒यह जो बात कही, यह फूटी कौड़ी है । यह कोई कृपा हुआ करती है ? कृपा तो यह होती है कि भगवान्‌का भजन करे, भगवान्‌में लग जाय ।

तात्पर्य यह है कि सांसारिक चीजोंका होना कोई बड़ी बात नहीं है । शास्त्रमें मनुष्य-शरीरकी जो महिमा आयी है, वैसी धनकी महिमा नहीं आयी है, राज्यकी महिमा नहीं आयी है । स्वर्गका जो राजा है, उस इन्द्रकी महिमा भी नहीं आयी है । ‘तीन टूक कौपीन के, अरु भाजी बिन नौन । तुलसी रघुबर उर बसे, इन्द्र बापुरो कौन ॥’ भगवद्भजनके सामने इन्द्रकी भी कोई कीमत नहीं है । परन्तु धनको महत्त्व देकर डरते हैं कि यह कहीं खर्च न हो जाय‒यह कोई मनुष्यपना है ? पर कहें किसको ! कोई सुननेवाला नहीं है ।

सुना था कि लोग ये बातें सुनकर नाराज हो जाते हैं और कहते हैं कि यह धनकी निन्दा करता है । सज्जनो ! मैं धनकी निन्दा नहीं करता हूँ; किन्तु लोभकी निन्दा करता हूँ, तुम्हारी ऐसी बुद्धिकी निन्दा करता हूँ कि तुम्हारी बुद्धि कहाँ मारी गयी ! लाखों-करोड़ों रुपये रखो, राज्य-वैभव सब रखो, पर बुद्धि तो नहीं मारी जानी चाहिये ! कुछ तो होश होना चाहिये आदमीको ! कुछ तो अक्ल आनी चाहिये कि हम क्या कर रहे हैं ! ऐसा मनुष्य-शरीर मिला है, जो देवताओंको भी दुर्लभ है‒‘दुर्लभो मानुषो देहो देहिनां क्षणभंगुरः ।’ (भागवत ११/२/२९) । ‘बड़ें भाग मानुष तनु पावा । सुर दुर्लभ सब ग्रंथन्हि गावा ॥’ (मानस ७/४३/४) ऐसा मानव-शरीर मिला है, और कर क्या रहे हो ? इस मनुष्य-शरीरको पाकर तो भगवान् का भजन करना चाहिये‒‘अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम् ॥’ (गीता ९/३३) । भगवान्‌में लगना चाहिये, जिससे सदाके लिये कल्याण हो जाय ।

यह धन कितने दिन साथ देगा ? आप सोचो, अगर आज प्राण निकल जायँ तो धनका क्या होगा ? धनके लिये किया हुआ पाप तो साथ चलेगा, पर धन एक कौड़ी साथ नहीं चलेगा, पूरा-का-पूरा यहाँ रह जायगा ऐसे धनके लिये अपना भाव बिगाड़ लिया, पाप कर लिया, अन्याय कर लिया, झूठ-कपट कर लिया, भाई-बन्धुओंसे लड़ाई कर ली । इस प्रकार धनके लिये कितने-कितने अन्याय और अनर्थ कर लिये, उस धनसे पतनके सिवाय और क्या होगा ?

नारायण !     नारायण !!     नारायण !!!

‒ ‘वास्तविक सुख’ पुस्तकसे

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।। श्रीहरिः ।।

                                                                


आजकी शुभ तिथि–
मार्गशीर्ष कृष्ण एकादशी, वि.सं.-२०७८,मंगलवार
                धनके लोभमें निन्दा


भीतरकी जो भावना होती है, उसका बड़ा भारी माहात्म्य होता है । एक आदमी बाहरकी क्रिया करता है, शरीरसे सेवा करता है, इसकी अपेक्षा भी भीतरका जो भाव है, उसकी अधिक महिमा है । बड़े दुःखकी बात है कि मनुष्योंने अपने भीतर धनको बहुत ज्यादा महत्त्व दे रखा है । वास्तवमें यह इतना महत्त्व देनेके लायक वस्तु नहीं है । शरीर इसकी अपेक्षा बहुत महत्त्वपूर्ण है । इस शरीरसे परिश्रम करके जो सेवा की जा सकती है, वह रुपयोंसे नहीं की जा सकती । रुपये लगा देनेका वह माहात्मय नहीं है । परन्तु आज रुपयोंका बहुत लोभ है । शरीरसे परिश्रम कर लेंगे, भूखे रह जायँगे, कहीं जाना हो तो पैदल चले जायँगे, पर पैसा खर्च नहीं करेंगे ! पैसेकी कीमत बहुत ज्यादा कर दी ! पैसोंको शरीरसे भी अधिक महत्त्व दे दिया ! शरीरसे परिश्रम करके पैसा पैदा किये जा सकते हैं, पर पैसोंसे शरीर नहीं लिया जा सकता । लाख, दस लाख, पचास लाख रुपये दे दिए जायँ, तो भी उसके बदलेमें मनुष्य-शरीर नहीं मिल सकता । मृत्युके समय अरबों-खरबों रुपये भी दे दिए जायँ तो भी मृत्युसे बच नहीं सकते । दुनियामात्रका धन दे दिया जाय, तो भी एक घड़ीभर जीना नहीं मिल सकता‒ऐसा कीमती मानव-शरीरका समय है ! वह समय यों ही बर्बाद कर देते हैं‒इसके समान कोई नुकसान नहीं है । बीड़ी-सिगरेट पीनेमें, खेल-तमाशा देखनेमें, ताश-चौपड़ खेलनेमें, बात-चीत करनेमें, गपशप लड़ानेमें, दूसरोंकी चर्चा करनेमें, निन्दा-स्तुति करनेमें, अधिक नींद लेनेमें समय खर्च कर देते हैं, यह बड़ा भारी नुकसान करते हैं । यह कोई मामूली नुकसान नहीं है । दस-बीस हजार रुपये खर्च किये जायँ, तो इसमें कोई नुकसान नहीं है । इनको छोड़कर ही मरना है । लाखों-करोड़ों हो जायँ तो भी छोड़कर मरना होगा । किसीको कुछ दे दिया, कहीं अच्छे काममें खर्च कर दिये, तो क्या बड़ी बात हुई ? यह तो छूटनेवाली वस्तु ही है ।

किसीके पास धन बहुत है तो यह कोई विशेष भगवत्कृपाकी बात नहीं है । ये धन आदि वस्तुएँ तो पापीको भी मिल जाती हैं‒‘सुत दारा अरु लक्ष्मी पापी के भी होय ।’ इनके मिलनेमें कोई विलक्षण बात नहीं है । एक राजा थे । उस राजाकी साधु-सेवामें बड़ी निष्ठा थी । यह निष्ठा किसी-किसीमें ही होती है । वह राजा साधु-सन्तोंको देखकर बहुत राजी होता । साधु-वेशमें कोई आ जाय, कैसा भी आ जाय, उसका बड़ा आदर करता, बहुत सेवा करता । कहीं सुन लेता कि अमुक तरफसे सन्त आ रहे हैं तो पैदल जाता और उनको ले आता, महलोंमें रखता और खूब सेवा करता । साधु जो माँगे, वही दे देता । उसकी ऐसी प्रसिद्धि हो गयी । पड़ोस-देशमें एक दूसरा राजा था, उसने यह बात सुन रखी थी । उसके मनमें ऐसा विचार आया कि यह राजा बड़ा मूर्ख है, इसको साधु बनकर कोई भी ठग ले । उसने एक बहुरुपियेको बुलाकर कहा कि तुम उस राजाके यहाँ साधु बनकर जाओ । वह तुम्हारे साथ जो-जो बर्ताव करे, वह आकर मेरेसे कहना । बहुरुपिया भी बहुत चतुर था । वह साधु बनकर वहाँ गया । वहाँके राजाने जब यह सुना कि अमुक रास्तेसे एक साधु आ रहा है, तो वह उसके सामने आया, अपने हाथोंसे उसकी खूब सेवा की ।

एक दिन राजाने उस साधुसे कहा कि ‘महाराज, कुछ सुनाओ ।’ साधुने कहा कि ‘राजन्‌ ! आप तो बड़े भाग्यशाली हो कि आपको इतना बड़ा राज्य मिला है, धन मिला है । आपके पास इतनी बड़ी फौज है । आपकी स्त्री, पुत्र, नौकर आदि सभी आपके अनुकूल हैं । इसलिये भगवान्‌की आपपर बड़ी कृपा है !’ इस प्रकार उस साधुने कई बातें कहीं । राजाने चुप करके सुन लीं ।

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