।। श्रीहरिः ।।



  आजकी शुभ तिथि–
       ज्येष्ठ कृष्ण नवमी, वि.सं.-२०७९, मंगलवार

गीतामें मूर्तिपूजा


हम किसी विद्वानका आदर करते हैं तो वास्तवमें हमारे द्वारा विद्याका ही आदर हुआ, हाड़-मांसके शरीरका नहीं । ऐसे ही जो मूर्तिमें भगवान्‌को मानता है, उसके द्वारा भगवान्‌का ही आदर हुआ, मूर्तिका नहीं । अतः जो मूर्तिमें भगवान्‌को नहीं मानता, उसके सामने भगवान्‌का प्रभाव प्रकट नहीं होता । परन्तु जो मूर्तिमें भगवान्‌को मानता है, उसके सामने भगवान्‌का प्रभाव प्रकट हो जाता है ।

प्रश्नहम मूर्तिपूजा क्यों करें ? मूर्तिपूजा करनेकी क्या आवश्यकता है ?

उत्तरअपना भगवद्भाव बढ़ानेके लिये, भगवद्भावको जाग्रत करनेके लिये, भगवान्‌को प्रसन्न करनेके लिये मूर्तिपूजा करनी चाहिये । हमारे अन्तःकरणमें सांसारिक पदार्थोंका जो महत्त्व अंकित है, उनमें हमारी जो ममता-आसक्ति है, उसको मिटानेके लिये ठाकुरजीका पूजन करना, पुष्पमाला चढ़ाना, अच्छे-अच्छे वस्त्र पहनाना, आरती उतारना, भोग लगाना आदि बहुत आवश्यक है । तात्पर्य है कि मूर्तिपूजा करनेसे हमें दो तरहसे लाभ होता हैभगवद्भाव जाग्रत होता है तथा बढ़ता है और सांसारिक वस्तुओंमें ममता-आसक्तिका त्याग होता है ।

मनुष्यके जीवनमें कम-से-कम एक जगह ऐसी होनी ही चाहिये, जिसके लिये मनुष्य अपना सब कुछ त्याग कर सके । वह जगह चाहे भगवान्‌ हों, चाहे सन्त-महात्मा हों, चाहे माता-पिता हों, चाहे आचार्य हों । कारण कि इससे मनुष्यकी भौतिक भावना कम होती है और धार्मिक तथा आध्यात्मिक भावना बढ़ती है ।

एक बार कुछ तीर्थयात्री काशीकी परिक्रमा कर रहे थे । वहाँका एक पण्डा उन यात्रियोंको मन्दिरोंका परिचय देता, शिवलिंगको प्रणाम करवाता और उसका पूजन करवाता । उन यात्रियोंमें कुछ आधुनिक विचारधाराके लड़के थे । उनको जगह-जगह प्रणाम आदि करना अच्छा नहीं लगा; अतः वे पण्डासे बोलेपण्डाजी ! जगह-जगह पत्थरोंमें माथा रगड़नेसे क्या लाभ ? वहाँ एक सन्त खड़े थे । वे उन लड़कोंसे बोलेभैया ! जैसे इस हाड़-मांसके शरीरमें तुम हो, ऐसे ही मूर्तिमें भगवान्‌ हैं । तुम्हारी आयु तो बहुत थोड़े वर्षोंकी है, पर ये शिवलिंग बहुत वर्षोंके हैं; अतः आयुकी दृष्टिसे शिवलिंग तुम्हारेसे बड़े हैं । शुद्धताकी दृष्टिसे देखा जाय तो हाड़-मांस अशुद्ध होते हैं और पत्थर शुद्ध होता है । मजबूतीकी दृष्टिसे देखा जाय तो हड्डीसे पत्थर मजबूत होता है । अगर परीक्षा करनी हो तो अपना सिर मूर्तिसे भिड़ाकर देख लो कि सिर फूटता है या मूर्ति ! तुम्हारेमें कई दुर्गुण-दुराचार हैं, पर मूर्तिमें कोई दुर्गुण-दुराचार नहीं है । तात्पर्य है कि मूर्ति सब दृष्टियोंसे श्रेष्ठ है । अतः मूर्ति पूजनीय है । तुमलोग अपने नामकी निंदासे अपनी निंदा और नामकी प्रशंसासे अपनी प्रशंसा मानते हो, शरीरके अनादरसे अपना अनादर और शरीरके आदरसे अपना आदर मानते हो, तो क्या मूर्तिमें भगवान्‌का पूजन, स्तुति-प्रार्थना आदि करनेसे उसको भगवान्‌ अपना पूजन, स्तुति-प्रार्थना नहीं मानेंगे ? अरे भाई ! लोग तुम्हारे जिस नाम-रूपका आदर करते हैं, वह तुम्हारा स्वरूप नहीं है, फिर भी तुम राजी होते हो । भगवान्‌का स्वरूप तो सर्वत्र व्यापक है; अतः इन मूर्तियोंमें भी भगवान्‌का स्वरूप है । हम इन मूर्तियोंमें भगवान्‌का पूजन करेंगे तो क्या भगवान्‌ प्रसन्न नहीं होंगे ? हम जितने अधिक भावसे भगवान्‌का पूजन करेंगे, भगवान्‌ उतने ही अधिक प्रसन्न होंगे ।

जो कोई आस्तिक पुरुष होता है, वह भले ही मूर्तिपूजासे पहरेज रखे, पर उसके द्वारा मूर्तिपूजा होती ही है । कैसे? वह वेद आदि ग्रन्थोंको मानता है, उनके अनुसार चलता है तो यह मूर्तिपूजा ही है; क्योंकि वेद भी तो (लिखी हुई पुस्तक होनेसे) मूर्ति ही है । वेद आदिका आदर करना मूर्तिपूजा ही है । ऐसे ही मनुष्य गुरुका, माता-पिताका, अतिथिका आदर-सत्कार करता है, अन्न-जल-वस्त्र आदिसे उनकी सेवा करता है तो यह सब मूर्तिपूजा ही है । कारण कि गुरु, माता-पिता आदिके शरीर तो जड़ हैं, पर शरीरका आदर करनेसे उनका भी आदर होता है, जिससे वे प्रसन्न होते हैं । तात्पर्य है कि मनुष्य कहीं भी, जिस-किसीका, जिस-किसी रूपसे आदर-सत्कार करता है, वह सब मूर्तिपूजा ही है । अगर मनुष्य भावसे मूर्तिमें भगवान्‌का पूजन करता है तो वह भगवान्‌का ही पूजन होता है ।


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।। श्रीहरिः ।।


  आजकी शुभ तिथि–
       ज्येष्ठ कृष्ण अष्टमी, वि.सं.-२०७९, सोमवार

गीतामें मूर्तिपूजा


एक वस्तुगुण होता है और एक भावगुण होता है । ये दोनों गुण अलग-अलग हैं । जैसे, पत्नी, माता और बहनइन तीनोंका शरीर एक ही है अर्थात् जैसा पत्नीका शरीर है, वैसा ही माता और बहनका शरीर है; अतः तीनोंमें ‘वस्तुगुण’ एक ही हुआ । परन्तु पत्नीसे मिलनेपर और भाव रहता है, मातासे मिलनेपर और भाव रहता है तथा बहनसे मिलनेपर और भाव रहता है; अतः वस्तु एक होनेपर भी ‘भावगुण’ अलग-अलग हुआ । संसारमें भिन्न-भिन्न स्वभावके व्यक्ति, वस्तु आदि हैं; अतः उनमें वस्तुगुण तो अलग-अलग है, पर सबमें भगवान्‌ परिपूर्ण हैंयह भावगुण एक ही है । ऐसे ही जिसकी मूर्तिपर श्रद्धा है, उसमें ‘मूर्ति पत्थर, पीतल, चाँदी आदिकी है’ऐसा वस्तुगुण रहता है । तात्पर्य है कि अगर मूर्तिमें पूजकका भाव भगवान्‌का है तो उसके लिये वह साक्षात् भगवान्‌ ही है । अगर पूजकका भाव पत्थर, पीतल, चाँदी आदिकी मूर्तिका है तो उसके लिये वह साक्षात् पत्थर आदिकी मूर्ति ही है; क्योंकि भावमें ही भगवान्‌ हैं

न काष्ठे विद्यते देवो  न शिलायां न मृत्सु चा ।

भावे ही विद्यते देवस्तस्माद् भावं समाचरेत् ॥

                            (गरुड़पुराण, उत्तर ३/१०)

देवता न तो काष्ठमें रहते हैंन पत्थरमें और न मिट्टीमें रहते हैं । भावमें ही देवताका निवास हैइसलिये भावको ही मुख्य मानना चाहिये ।’

एक वैरागी बाबा थे । उनके पास सोनेकी दो मूर्तियाँ थींएक गणेशजीकी और एक चूहेकी  । दोनों मूर्तियाँ तौलमें बराबर थीं । बाबाको रामेश्वर जाना था । अतः उन्होंने सुनारके पास जाकर कहा कि भैया ! इन मूर्तियोंके बदले कितने रुपये दोगे ? सुनारने दोनों मूर्तियोंको तौलकर दोनोंके पाँच-पाँच सौ रुपये बताये अर्थात् दोनोंकी बराबर कीमत बतायी । बाबा बोलेअरे ! तू देखता नहीं, एक मालिक है और एक उनकी सवारी है । जितना मूल्य मालिक (गणेशजी)-का, उतना ही मूल्य सवारी (चूहे)-कायह कैसे हो सकता है ? सुनार बोलाबाबा ! मैं तो गणेशजी और चूहेका मूल्य नहीं लगाता, मैं तो सोनेका मूल्य लगाता हूँ । तात्पर्य है कि बाबाकी दृष्टि गणेशजी और चूहेपर है और सुनारकी दृष्टि सोनपर है अर्थात् बाबाको भावगुण दीखता है और सुनारको वस्तुगुण दीखता है । ऐसे ही जो मूर्तियोंको तोड़ते हैं, उनको वस्तुगुण दीखता है अर्थात् उनको पत्थर, पीतल आदि ही दीखता है । अतः भगवान्‌ उनकी भावनाके अनुसार पत्थर आदिके रूपसे ही बने रहते हैं ।

वास्तवमें देखा जाय तो स्थावर-जंगम आदि सब कुछ भगवत्स्वरूप ही है । जिनमें भावगुण अर्थात् भगवान्‌की भावना है, उनको सब कुछ भगवत्स्वरूप ही दीखता है; परन्तु जिनमें वस्तुगुण अर्थात् संसारकी भावना है, उनको स्थावर-जंगम आदि सब कुछ अलग-अलग ही दीखता है । यही बात मूर्तिके विषयमें भी समझ लेनी चाहिये ।

लोग श्रद्धाभावसे मूर्तिकी पूजा करते हैं, स्तुति एवं प्रार्थना करते हैं; क्योंकि उनको तो मूर्तिमें विशेषता दीखती है । जो मूर्तिको तोड़ते हैं, उनको भी मूर्तिमें विशेषता दीखती है । अगर विशेषता नहीं दीखती तो वे मूर्तिको ही क्यों तोड़ते हैं ? दूसरे पत्थरोंको क्यों नहीं तोड़ते ? अतः वे भी मूर्तिमें विशेषता मानते हैं । केवल मूर्तिमें श्रद्धा-विश्वास रखनेवालोंके साथ द्वेष-भाव होनेसे, उनको दुःख देनेके लिये ही वे मूर्तिको तोड़ते हैं ।

जो लोग शास्त्र-मर्यादाके अनुसार बने हुए मन्दिरको, उसमें प्राणप्रतिष्ठा करके रखी गयी मूर्तियोंको तोड़ते हैं, वे तो अपना स्वार्थ सिद्ध करने, हिन्दुओंकी मर्यादाओंको भंग करने, अपने अहंकार एवं नामको स्थायी करने, भग्नावशेष मूर्तियोंको देखकर पीढ़ियोंतक हिन्दुओंके हृदयमें जलन पैदा करनेके लिये द्वेषभावसे मूर्तियोंको तोड़ते हैं । ऐसे लोगोंकी बड़ी भयानक दुर्गति होती है, वे घोर नरकोंमें जाते हैं; क्योंकि उनकी नीयत ही दूसरोंको दुःख देने, दूसरोंका नाश करनेकी है । खराब नीयतका नतीजा भी खराब ही होता है । परन्तु जो लोग मन्दिरोंकी, मूर्तियोंकी रक्षा करनेके लिये अपनी पूरी शक्ति लगा देते हैं, अपने प्राणोंको लगा देते हैं, उनकी नीयत अच्छी होनेसे उनकी सद्‌गति ही होती है ।


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।। श्रीहरिः ।।



  आजकी शुभ तिथि–
       ज्येष्ठ कृष्ण सप्तमी, वि.सं.-२०७९, रविवार

गीतामें मूर्तिपूजा


जैसे घुटनोंके बलपर चलनेवाला छोटा बालक कोई वस्तु उठाकर अपने पिताजीको देता है तो उसके पिताजी बहुत प्रसन्न हो जाते हैं और हाथ ऊँचा करके कहते हैं कि बेटा ! तू इतना बड़ा हो जा अर्थात् मेरेसे भी बड़ा हो जा । क्या वह वस्तु अलभ्य थी ? क्या बालकके देनेसे पिताजीको कोई विशेष चीज मिल गयी ? नहीं । केवल बालकके देनेके भावसे ही पिताजी राजी हो गये । ऐसे ही भगवान्‌को किसी वस्तुकी कमी नहीं है और उनमें किसी वस्तुकी इच्छा भी नहीं है, फिर भी भक्तके देनेके भावसे वे प्रसन्न हो जाते हैं । परन्तु जो केवल लोगोंको दिखानेके लिये, लोगोंको ठगनेके लिये मन्दिरोंको सजाते हैं, ठाकुरजी (भगवान्‌के विग्रह)-का शृंगार करते हैं, उनको बढ़िया-बढ़िया पदार्थोंका भोग लगाते हैं तो उसको भगवान्‌ ग्रहण नहीं करते; क्योंकि वह भगवान्‌का पूजन नहीं है, प्रत्युत रुपयोंका, व्यक्तिगत स्वार्थका ही पूजन है ।

जो लोग किसी भी तरहसे ठाकुरजीको भोग लगानेवालेको, उनकी पूजा करनेवालेको पाखण्डी कहते हैं और खुद अभिमान करते हैं कि हम तो उनसे अच्छे हैं; क्योंकि हम पाखण्ड नहीं करते, ऐसे लोगोंका कल्याण नहीं होता । जो किसी भी तरहसे उत्तम कर्म करनेमें लगे हैं, उनका उतना अंश तो अच्छा है ही । परन्तु जो अभिमानपूर्वक अच्छे आचरणोंका त्याग करते हैं, उसका परिणाम तो बुरा ही होगा ।

प्रश्नदुष्टलोग मूर्तियोंको तोडते हैं तो भगवान्‌ उनको अपना प्रभाव, चमत्कार क्यों नहीं दिखाते ?

उत्तरजिनकी मूर्तिमें सद्भावना नहीं है, जिनका मूर्तिमें भगवत्पूजन करनेवालोंके साथ द्वेष है और द्वेषभावसे ही जो मूर्तिको तोड़ते हैं, उनके सामने भगवान्‌का प्रभाव, महत्त्व प्रकट होगा ही क्यों ? कारण कि भगवान्‌का महत्त्व तो श्रद्धाभावसे ही प्रकट होता है ।

मूर्तिपूजा करनेवालोंमें ‘मूर्तिमें भगवान्‌ हैं’इस भावकी कमी होनेके कारण ही दुष्टलोगोंके द्वारा मूर्ति तोड़े जानेपर भगवान्‌ अपना प्रभाव प्रकट नहीं करते । परन्तु जिन भक्तोंका ‘मूर्तिमें भगवान्‌ हैं’ऐसा दृढ श्रद्धा-विश्वास है, वहाँ भगवान्‌ अपना प्रभाव प्रकट कर देते हैं । जैसे, गुजरातमें सूरतके पास एक शिवजीका मन्दिर है । उसमें स्थित शिवलिंगमें छेद-ही-छेद हैं । इसका कारण यह था कि जब मुसलमान उस शिवलिंगको तोड़नेके लिये आये, तब उस शिवलिंगसे असंख्य बड़े-बड़े भौरें प्रकट हो गये और उन्होंने मुसलमानोंको भगा दिया ।

जो परीक्षामें पास होना चाहता हैं, वे ही परीक्षकको आदर देते हैं, परीक्षकके अधीन होते हैं; क्योंकि परीक्षक जिसको पास कर देता है, वह पास हो जाता है और जिसको फेल कर देते है, वह फेल हो जाता है । परन्तु भगवान्‌को किसीकी परीक्षामें पास होनेकी जरूरत ही नहीं है; क्योंकि परीक्षामें पास होनेसे भगवान्‌का महत्त्व बढ़ नहीं जाता और परीक्षामें फेल होनेसे भगवान्‌का महत्त्व घट नहीं जाता । जैसे, रावण भगवान्‌ रामकी परीक्षा लेनेके लिये मारीचको मायामय सुवर्णमृग बनाकर भेजता है तो भगवान्‌ सुवर्णमृगके पीछे दौड़ते हैं अर्थात् रावणकी परीक्षामें फेल हो जाते हैं; क्योंकि भगवान्‌को पास होकर दुष्ट रावणसे कौन-सा सर्टिफिकेट लेना था ! ऐसे ही दुष्टलोग भगवान्‌की परीक्षा लेनेके लिये मन्दिरोंको तोड़ते हैं तो भगवान्‌ उनकी परीक्षामें फेल हो जाते हैं, उनके सामने अपना प्रभाव प्रकट नहीं करते; क्योंकि वे दुष्टभावसे ही भगवान्‌के सामने आते हैं ।


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।। श्रीहरिः ।।



  आजकी शुभ तिथि–
    ज्येष्ठ कृष्ण षष्ठी, वि.सं.-२०७९, शनिवार

गीतामें मूर्तिपूजा


एक मन्दिरके पुजारी थे । उनके इष्ट भगवान्‌ बालगोपाल थे । वे रोज छोटे-छोटे लड्डू बनाया करते और रातके समय जब बालगोपालको शयन कराते, तब उनके सिरहाने वे लड्डू रख दिया करते; क्योंकि बालकको रातमें भूख लग जाया करती है । एक दिन वे लड्डू रखना भूल गये तो रातमें बालगोपालने पुजारीको स्वप्नमें कहा कि मेरेको भूख लग रही है ! ऐसे ही एक और घटना है । एक साधु थे । वे प्रतिवर्ष दीपावलीके बाद (ठण्डीके दिनोंमें) भगवान्‌को काजू, बादाम, पिस्ता, अखरोट, आदिका भोग लगाया करते थे । एक वर्ष सुखा मेवा बहुत महँगा हो गया तो उन्होंने मूँगफलीका भोग लगाना शुरू कर दिया । एक दिन रातमें भगवान्‌ने स्वप्नमें कहा कि क्या तू मूँगफली ही खिलायेगा ? उस दिनके बाद उन्होंने पुनः भगवान्‌को काजू आदिका भोग लगाना शुरू कर दिया । पहले उनके मनमें कुछ वहम था कि पता नहीं, भगवान्‌ भोगको ग्रहण करते हैं या नहीं ? जब भगवान्‌ने स्वप्नमें ऐसा कहा, तब उनका वहम मिट गया । तात्पर्य है कि कोई भगवान्‌को भोग लगाता है तो उनको भूख लग जाती है और वे उसको ग्रहण कर लेते हैं ।

एक साधु थे । उनकी खुराक बहुत थी । एक बार उनके शरीरमें रोग हो गया । किसीने उनसे कहा कि महाराज ! आप गायका दूध पिया करें, पर दूध वही पीयें, जो बछड़ेके पीनेपर बच जाय । उन्होंने ऐसा ही करना शुरू कर दिया । जब बछड़ा पेट भरकर अपनी माँका दूध पी लेता, तब वे गायका दूध निकालते । गायका पाव-डेढ़ पाव दूध निकलता, पर उतना ही दूध पीनेसे उनकी तृप्ति हो जाती । कुछ ही दिनोंमें उनका रोग मिट गया और वे स्वस्थ हो गये । जब न्याययुक्त वस्तुमें भी इतनी शक्ति है कि थोड़ी मात्रामें लेनेपर भी तृप्ति हो जाय, तो फिर जो वस्तु भावपूर्वक दी जाय, उसका तो कहना ही क्या है !

यह तो सबका ही अनुभव है कि कोई भावसे, प्रेमसे भोजन कराता है तो उस भोजनमें विचित्र स्वाद होता है और उस भोजनसे वृत्तियाँ भी बहुत अच्छी रहती है । केवल मनुष्यपर ही नहीं, पशुओंपर भी भावका असर पड़ता है । जिस बछड़ेकी माँ मर जाती है, उसको लोग दूसरी गायका दूध पिलाते हैं । इससे वह बछड़ा जी तो जाता है, पर पुष्ट नहीं होता । वही बछड़ा अगर अपनी माँका दूध पीता तो माँ उसको प्यारसे चाटती, दूध पिलाती, जिससे वह थोड़े ही दूधसे पुष्ट हो जाता । जब मनुष्य और पशुओंपर भी भावका असर पड़ता है, तो फिर अन्तर्यामी भगवान्‌पर भावका असर पड़ जाय, इसका तो कहना ही क्या है ! विदुरानीके भावके कारण ही भगवान्‌ने उसके हाथसे केलेके छिलके खाये । गोपियोंके भावके कारण ही भगवान्‌ने उनके हाथसे छीनकर दही, मक्खन खाया । भगवान्‌ ब्रह्माजीसे कहते हैं

नैवेद्यं  पुरतो  न्यस्तं  चक्षुषा  गृह्यते  मया ।

रसं च दासजिह्वायामश्नामि कमालोद्भव ॥

‘हे कमलोद्भव ! मेरे सामने रखे हुए भोगोंको मैं नेत्रोंसे ग्रहण करता हूँ; परन्तु उस भोगका रस मैं भक्तकी जिह्वाके द्वारा ही लेता हूँ ।’

ऐसी बात सन्तोंसे सुनी है कि भावसे लगे हुए भोगको भगवान्‌ कभी देख लेते हैं, कभी स्पर्श कर लेते हैं । और कभी कुछ ग्रहण भी कर लेते हैं ।


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।। श्रीहरिः ।।



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    ज्येष्ठ कृष्ण पंचमी, वि.सं.-२०७९, शुक्रवार

गीतामें मूर्तिपूजा


भगवान्‌ सब जगह परिपूर्ण हैंऐसा प्रायः सभी आस्तिक मानते हैं; परन्तु वास्तवमें ऐसा मानना उन्हींका है, जिन्होंने मूर्ति, वेद, सूर्य, पीपल, तुलसी, गाय आदिमें भगवान्‌को मानकर उनका पूजन शुरू कर दिया है । कारण कि जो मूर्ति, वेद, सूर्य आदिमें भगवान्‌को मानते हैं, वे स्वतः सब जगह, सब प्राणियोंमें भगवान्‌को मानने लग जायँगे । जो केवल मूर्ति आदिमें ही भगवान्‌को मानते हैं, उनको ‘प्राकृत (आरम्भिक) भक्त’ कहा गया है[*] क्योंकि उन्होंने एक जगह भगवान्‌का पूजन शुरू कर दिया; अतः वे भगवान्‌के सम्मुख हो गये । परन्तु जो केवल ‘भगवान्‌ सब जगह हैं’ऐसा कहते हैं, पर उनका कहीं भी आदरभाव, पूज्यभाव, श्रेष्ठ भाव नहीं है, उनको भक्त नहीं कहा गया है; क्योंकि वे ‘भगवान्‌ सब जगह हैं’ऐसा केवल कहते हैं, मानते नहीं; अतः वे भगवान्‌के सम्मुख नहीं हुए ।

मूर्तिमें भगवान्‌का पूजन श्रद्धाका विषय है, तर्कका विषय नहीं । जिनमें श्रद्धा है, उनके सामने भगवान्‌का महत्त्व प्रकट हो जाते है । उनके द्वारा की गयी पूजाको भगवान्‌ ग्रहण करते हैं । उनके हाथसे भगवान्‌ प्रसाद ग्रहण करते हैं । जैसे करमाबाईसे भगवान्‌ने खिचड़ी खायी, धन्ना भक्तसे भगवान्‌ने टिक्कड़ खाये, मीराबाईसे भगवान्‌ने दूध पिया आदि-आदि । तात्पर्य है कि श्रद्धा-भक्तिसे भगवान्‌ मूर्तिमें प्रकट हो जाते हैं ।

प्रश्नभक्तलोग भगवान्‌को भोग लगाते हैं तो भगवान्‌ उसको ग्रहण करते हैंइसका क्या पता ?

उत्तरभगवान्‌के दरबारमें वस्तुकी प्रधानता नहीं है, प्रत्युत भावकी प्रधानता है । भावके कारण ही भगवान्‌ भक्तके द्वारा अर्पित वस्तुओं और क्रियाओंको ग्रहण कर लेते हैं । भक्तका भाव भगवान्‌को भोजन करानेका होता है तो भगवान्‌को भूख लग जाती है और वे प्रकट होकर भोजन कर लेते हैं । भक्तके भावके कारण भगवान्‌ जिस वस्तुको ग्रहण करते हैं, वह वस्तु नाशवान नहीं रहती, प्रत्युत दिव्य, चिन्मय हो जाती है । अगर वैसा भाव न हो, भावमें कमी हो, तो भी भगवान्‌ भक्तके द्वारा भोजन अर्पण करनेमात्रसे सन्तुष्ट हो जाते हैं । भगवान्‌के सन्तुष्ट होनेमें वस्तु और क्रियाकी प्रधानता नहीं है, प्रत्युत भावकी ही प्रधानता है । सन्तोंने कहा है

भाव भगतकी राबड़ी,   मीठी लागे ‘वीर’ ।

बिना भाव ‘कालू’ कहे, कड़वी लागे खीर ॥

हमें एक सज्जन मिले थे । उनकी एक सन्तपर बड़ी श्रद्धा थी और वे उनकी सेवा किया करते थे । वे कहते थे कि जब महाराजको प्यास लगती तो मेरे मनमें आती कि महाराजको प्यास लगी है; अतः मैं जल ले जाता और वे पी लेते । ऐसे ही जो शुद्ध पतिव्रता है, उसको पतिकी भूख-प्यासका पता लग जाता है तथा पतिकी रुचि भोजनके किस पदार्थमें हैइसका भी पता लग जाता है । भोजन सामने आनेपर पति भी कह देता है कि आज मेरे मनमें इसी भोजनकी रुचि थी । इसी तरह जिसके मनमें भगवान्‌को भोग लगानेका भाव होता है, उसको भगवान्‌की रुचिका, भूख-प्यासका पता लग जाता है ।



[*] अचार्यामेव   हरये    पूजां   यः   श्रद्धयेहते ।

   न तद्भक्तेषु चान्येषु  स भक्तः प्राकृतः स्मृतः ॥

(श्रीमद्भागवत ११/२/४७)


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