।। श्रीहरिः ।।



  आजकी शुभ तिथि–
   आषाढ़ शुक्ल तृतीया, वि.सं.-२०७९, शनिवार

कर्मयोग (भौतिक साधना)



समतापूर्वक कर्तव्यकर्मोंका आचरण करना ही कर्मयोग कहलाता है । कर्मयोगमें खास निष्कामभावकी मुख्यता है । निष्कामभाव न रहनेपर कर्म केवल कर्म’ होते हैंकर्मयोग नहीं होता । शास्त्रविहित कर्तव्यकर्म करनेपर भी यदि निष्कामभाव नहीं है तो उन्हें कर्म ही कहा जाता हैऐसी क्रियाओंसे मुक्ति सम्भव नहींक्योंकि मुक्तिमें भावकी ही प्रधानता है । निष्कामभाव सिद्ध होनेमें राग-द्वेष ही बाधक हैं‒‘तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ’ (गीता ३ । ३४)वे इसके मार्गमें लुटेरे हैं । अतः राग-द्वेषके वशमें नहीं होना चाहिये । तो फिर क्या करना चाहिये ?‒

श्रेयान् स्वधर्मो विगुणः परधर्मात् स्वनुष्ठितात् ।

स्वधर्मे   निधनं    श्रेयः    परधर्मो   भयावहः ॥

                                     (गीता ३ । ३५)

‒इस श्लोकमें बहुत विलक्षण बातें बतायी गयी हैं । इस एक श्लोकमें चार चरण हैं । भगवान्‌ने इस श्लोककी रचना कैसी सुन्दर की है ! थोड़े-से शब्दोंमें कितने गम्भीर भाव भर दिये हैं । कर्मोंके विषयमें कहा है‒

श्रेयान् स्वधर्मो विगुणः’

यहाँ श्रेयान्’ क्यों कहा इसलिये कि अर्जुनने दूसरे अध्यायमें गुरुजनोंको मारनेकी अपेक्षा भीख माँगना श्रेय’ कहा था‒‘श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके’ (२ । ५)किंतु यच्छेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे’ (२ । ७) में अपने लिये निश्चित श्रेय’ भी पूछा और तीसरे अध्यायमें भी पुनः निश्चित श्रेय’ ही पूछा‒‘तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम्’ (३ । २) यहाँ भी निश्चित’ कहा और दूसरे अध्यायके सातवें श्लोकमें भी निश्चितम्’ कहा है । भाव यह है कि मेरे लिये कल्याणकारक अचूक रामबाण उपाय होना चाहिये । वहाँ अर्जुनने प्रश्न करते हुए कहा‒‘ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन’ (३ । १)यहाँ ज्यायसी’ पद है । इस ज्यायसीका भगवान्‌ने कर्मज्यायो ह्यकर्मणः’ (३ । ८) में ज्यायः’ कहकर उत्तर दिया कि कर्म न करनेकी अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है । यहाँ भगवान्‌ने भीख माँगनेकी बात काट दी । तो फिर कर्म कौन-सा करे इसपर बतलाया कि जो स्वधर्म हैवही कर्तव्य हैउसीका आचरण करो ।अर्जुनके लिये स्वधर्म क्या है युद्ध करना । १८वें अध्यायके ४३वें श्लोकमें भगवान्‌ने क्षत्रियके जो स्वाभाविक कर्म बतलाये हैंक्षत्रिय होनेके नाते अर्जुनके लिये वे ही कर्तव्यकर्म हैं । वहाँ भी भगवान्‌ने श्रेयान् स्वधर्मो विगुणः’‒(१८ । ४७) कहा है । स्वधर्मका नाम स्वकर्म है । यहाँ स्वकर्म है‒युद्ध करना । स्वधर्मः’ के साथ विगुणः’ विशेषण क्यों दिया अर्जुनने तीसरे अध्यायके पहले श्लोकमें युद्धरूपी कर्मको घोर कर्म’ बतलाया है । इसीलिये भगवान्‌ने उसके उत्तरमें उसे विगुणः’ बतलाकर यह व्यक्त किया कि स्वधर्म विगुण होनेपर भी कर्तव्यकर्म होनेसे श्रेष्ठ है । अतः अर्जुनके लिये युद्ध करना ही कर्तव्य हैतथा दूसरे अध्यायके बत्तीसवें श्लोकमें भी भगवान्‌ने बतलाया कि धर्मयुद्धसे बढ़कर क्षत्रियके लिये दूसरा कोई कल्याणकारक श्रेष्ठ साधन है ही नहीं‒परधर्मात् स्वनुष्ठितात्’ 

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।। श्रीहरिः ।।



  आजकी शुभ तिथि–
   आषाढ़ शुक्ल द्वितीया, वि.सं.-२०७९, शुक्रवार

गीतामें आहारीका वर्णन



जो लोग ईर्ष्याभय और क्रोधसे युक्त हैं तथा लोभी हैंऔर रोग तथा दीनतासे पीड़ित और द्वेषयुक्त हैंवे जिस भोजनको करते हैंवह अच्छी तरह पचता नहीं अर्थात् उससे अजीर्ण हो जाता है । इसलिये मनुष्यको चाहिये कि वह भोजन करते समय मनको शान्त तथा प्रसन्न रखे । मनमें कामक्रोधलोभमोह आदि दोषोंकी वृत्तियोंको न आने दे । यदि कभी आ जायँ तो उस समय भोजन न करेक्योंकि वृत्तियोंका असर भोजनपर पड़ता है और उसीके अनुसार अन्तःकरण बनता है । ऐसा भी सुननेमें आया है कि फौजी लोग जब गायको दुहते हैंतब दुहनेसे पहले बछड़ा छोड़ते हैं और उस बछड़ेके पीछे कुत्ता छोड़ते हैं । अपने बछड़ेके पीछे कुत्तेको देखकर जब गाय गुस्सेमें आ जाती हैतब बछड़ेको लाकर बाँध देते हैं और फिर गायको दुहते हैं । वह दूध फौजियोंको पिलाते हैंजिससे वे लोग खूँखार बनते हैं । 

ऐसे ही दूधका भी असर प्राणियोंपर पड़ता है । एक बार किसीने परीक्षाके लिये कुछ घोड़ोंको भैंसका दूध और कुछ घोड़ोंको गायका दूध पिलाकर उन्हें तैयार किया । एक दिन सभी घोड़े कहीं जा रहे थे । रास्तेमें नदीका जल था । भैंसका दूध पीनेवाले घोड़े उस जलमें बैठ गये और गायका दूध पीनेवाले घोड़े उस जलको पार कर गये । इसी प्रकार बैल और भैंसेका परस्पर युद्ध कराया जाय तो भैंसा बैलको मार देगापरन्तु यदि दोनोंको गाड़ीमें जोता जाय तो भैंसा धूपमें जीभ निकाल देगाजबकि बैल धूपमें भी चलता रहेगा । कारण कि भैंसके दूधमें सात्त्विक बल नहीं होताजबकि गायके दूधमें सात्त्विक बल होता है ।

 जैसे प्राणियोंकी वृत्तियोंका पदार्थोंपर असर पड़ता हैऐसे ही प्राणियोंकी दृष्टिका भी असर पड़ता है । बुरे व्यक्तिकी अथवा भूखे कुत्तेकी दृष्टि भोजनपर पड़ जाती है तो वह भोजन अपवित्र हो जाता है । अब वह भोजन पवित्र कैसे हो भोजनपर उसकी दृष्टि पड़ जाय तो उसे देखकर मनमें प्रसन्न हो जाना चाहिये कि भगवान् पधारे हैं ! अतः उसको सबसे पहले थोड़ा अन्न देकर भोजन करा दे । उसके देनेके बाद बचे हुए शुद्ध अन्नको स्वयं ग्रहण करे तो दृष्टिदोष मिट जानेसे वह अन्न पवित्र हो जाता है । दूसरी बातलोग बछड़ेको पेटभर दूध न पिलाकर सारा दूध स्वयं दुह लेते हैं । वह दूध पवित्र नहीं होताक्योंकि उसमें बछड़ेका हक आ जाता है । बछड़ेको पेटभर दूध पिला दे और इसके बाद जो दूध निकलेवह चाहे पावभर ही क्यों न होबहुत पवित्र होता है ।

भोजन करनेवाले और करानेवालेके भावका भी भोजनपर असर पड़ता हैजैसे‒(१) भोजन करनेवालेकी अपेक्षा भोजन करानेवालेकी जितनी अधिक प्रसन्नता होगी,वह भोजन उतने ही उत्तम दर्जेका माना जायगा । (२) भोजन करानेवाला तो बड़ी प्रसन्नतासे भोजन कराता हैपरन्तु भोजन करनेवाला ‘मुफ्तमें भोजन मिल गयाअपने इतने पैसे बच गयेइससे मेरेमें बल आ जायगा’ आदि स्वार्थका भाव रख लेता है तो वह भोजन मध्यम दर्जेका हो जाता है और (३) भोजन करानेवालेका यह भाव है कि ‘यह घरपर आ गया तो खर्चा करना पड़ेगाभोजन बनाना पड़ेगाभोजन कराना ही पड़ेगा’ आदि और भोजन करनेवालेमें भी स्वार्थभाव है तो वह भोजन निकृष्ट दर्जेका हो जायगा ।

इस विषयमें गीताने सिद्धान्तरूपसे कह दिया है‒‘सर्वभूतहिते रताः’ (५ । २५१२ । ४) । तात्पर्य यह है कि जिसका सम्पूर्ण प्राणियोंमें हितका भाव जितना अधिक होगाउसके पदार्थक्रियाएँ आदि उतनी ही पवित्र हो जायँगी ।

नारायण !     नारायण !!     नारायण !!!

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।। श्रीहरिः ।।



  आजकी शुभ तिथि–
   आषाढ़ शुक्ल प्रतिपदा, वि.सं.-२०७९, गुरुवार

गीतामें आहारीका वर्णन




भोजनके लिये आवश्यक विचार

 

उपनिषदोंमें आता है कि जैसा अन्न होता हैवैसा ही मन बनता हैअन्नमय हि सोम्य मनः । (छान्दोग्य ६ । ५ । ४) अर्थात् अन्नका असर मनपर पड़ता है । अन्नके सूक्ष्म सारभागसे मन (अन्तःकरण) बनता हैदूसरे नम्बरके भागसे वीर्यतीसरे नम्बरके भागसे मल बनता है जो कि बाहर निकल जाता है । अतः मनको शुद्ध बनानेके लिये भोजन शुद्धपवित्र होना चाहिये । भोजनकी शुद्धिसे मन (अन्तःकरण-) की शुद्धि होती हैआहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धिः(छान्दोग्य २ । २६ । २)  जहाँ भोजन करते हैंवहाँका स्थानवायुमण्डलदृश्य तथा जिसपर बैठकर भोजन करते हैंवह आसन भी शुद्धपवित्र होना चाहिये । कारण कि भोजन करते समय प्राण जब अन्न ग्रहण करते हैंतब वे शरीरके सभी रोमकूपोंसे आसपासके परमाणुओंको भी खींचतेग्रहण करते हैं । अतः वहाँका स्थानवायुमण्डल आदि जैसे होंगेप्राण वैसे ही परमाणु खींचेंगे और उन्हींके अनुसार मन बनेगा । भोजन बनानेवालेके भावविचार भी शुद्ध सात्त्विक हों ।

भोजनके पहले दोनों हाथदोनों पैर और मुखये पाँचों शुद्धपवित्र जलसे धो ले । फिर पूर्व या उत्तरकी ओर मुख करके शुद्ध आसनपर बैठकर भोजनकी सब चीजोंकोपत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्या प्रयच्छति । तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः ॥ (गीता ९ । २६)यह श्लोक पढ़कर भगवान्के अर्पण कर दे । अर्पणके बाद दायें हाथमें जल लेकर ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम् । ब्रह्मैव तेन गन्तव्य ब्रह्मकर्मसमाधिना ॥ (गीता ४ । २४)यह श्लोक पढ़कर आचमन करे और भोजनका पहला ग्रास भगवान्का नाम लेकर ही मुखमें डाले । प्रत्येक ग्रासको चबाते समय हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे ।  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे ॥इस मन्त्रको मनसे दो बार पढ़ते हुए या अपने इष्टका नाम लेते हुए ग्रासको चबाये और निगले । इस मन्त्रमें कुल सोलह नाम हैं और दो बार मन्त्र पढ़नेसे बत्तीस नाम हो जाते हैं । हमारे मुखमें भी बत्तीस ही दाँत हैं । अतः (मन्त्रके प्रत्येक नामके साथ बत्तीस बार चबानेसे वह भोजन सुपाच्य और आरोग्यदायक होता है एवं थोड़े अन्नसे ही तृप्ति हो जाती है तथा उसका रस भी अच्छा बनता है और इसके साथ ही भोजन भी भजन बन जाता है ।

भोजन करते समय ग्रास-ग्रासमें भगवन्नाम-जप करते रहनेसे अन्नदोष भी दूर हो जाता है ।

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