।। श्रीहरिः ।।

                    


आजकी शुभ तिथि–
  आश्विन शुक्ल द्वादशी, वि.सं.-२०७८,  रविवार
                             

विकार आपमें नहीं हैं


परमात्माकी प्राप्ति होनेसे पहले विकारोंकी निवृत्ति हो जाय‒यह कोई नियम नहीं है । परन्तु परमात्माकी प्राप्ति होनेके बाद विकार नष्ट हो जाते हैं । ‘रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते’ (गीता २/५९) ‘रसरूपी विकार परमात्माका साक्षात्कार होनेके बाद मिट जाते हैं ।’ इसमें एक मार्मिक और बहुत ही लाभकी बात है । आप उसको गहरे उतरकर समझें, इतनी प्रार्थना है ।

हमें अनुकूल व्यक्ति, पदार्थ, परिस्थिति आदि मिलें और प्रतिकूल व्यक्ति, पदार्थ, परिस्थिति आदि न मिलें‒यही संसार है । अनुकूलता-प्रतिकूलताका हमारेपर जो असर पड़ता है, उसका नाम ही विकार है । इन विकारोंसे हमें छूटना है; क्योंकि जबतक विकार होते रहेंगे, तबतक शान्ति नहीं मिलेगी ।

इस बातकी खोज करो कि विकार कहाँ होते हैं ? विकार मन और बुद्धिमें होते हैं, अन्तःकरणमें होते हैं । अतः विकार करणमें होते हैं कर्तामें नहीं होते‒यह खास समझनेकी बात है । आपको अनुकूलता मिली तो आप सुखी हो गये, प्रतिकूलता मिली तो आप दुःखी हो गये । सुखी और दुःखी होना‒ये दोनों अवस्थाएँ हुईं । इन दोनों अवस्थाओंमें आप दो हुए या एक ही रहे ? इस बातपर विचार करें । सुखकी अवस्थामें आप वे ही रहे और दुःखकी अवस्थामें भी आप वे ही रहे‒यह बात सच्ची हैं न ? वास्तवमें ये अवस्थाएँ भी मन-बुद्धिमें होती हैं, पर इनको आप अपनेमें मान लेते हो‒यह गलती होती है । आप सुख-दुःखकी अवस्थाओंमें अपनेको सुखी-दुःखी मान लेते हो । सुख-दुःखका असर अन्तःकरणपर पड़ जाता है तो आप सुखी-दुःखी हो जाते हो । विकारोंको आप अपनेमें मान लेते हो । वास्तवमें विकार आपमें हुए ही नहीं, विकार तो अन्तःकरणमें हुए ।

सुख और दुःख‒इन दोनोंको आप जानते हो । दोनोंको वही जान सकता है, जो दोनोंसे अलग हो । जो सुखमें भी रहता है और दुःखमें भी रहता है, वही सुख और दुःख‒इन दोनोंको जान सकता है । सुख अलग है और दुःख अलग है । इनसे अलग रहनेवाला इन दोनोंको जानता है । अगर वह इनके साथ मिला हुआ हो तो सुख और दुःख‒दोनोंको नहीं जानेगा, प्रत्युत एकको ही जानेगा, जिसके साथ वह रहा है ।

दूसरी बात, सुखी होते समय भी आप वे ही हो और दुःखी होते समय भी आप वे ही हो, तभी तो आपको दोनोंका अलग-अलग अनुभव होता है । सुख और दुःख‒दोनोंका अलग-अलग अनुभव करनेवाला सुख-दुःखसे अलग है । सुख-दुःखसे अलगका अनुभव कब होगा ? जब आप प्रकृतिमें स्थित न होकर ‘स्व’ में स्थित हो जाओगे‒‘समदुःखसुखः स्वस्थः’ (गीता १४/२४) । प्रकृति विकारी है । उसमें आप स्थित होंगे तो विकार होगा ही । परन्तु वह विकार आपमें (स्वयंमें) कभी नहीं होगा । अज्ञान-अवस्थामें भी आपमें विकार नहीं हुआ । आपके स्वरूपमें कभी विकार हुआ ही नहीं, हो सकता ही नहीं । यदि आपमें विकार होते तो वे कभी मिटते ही नहीं । विकार प्रकृतिमें होते हैं । प्रकृतिसे अपनेको अलग अनुभव करना ही तत्त्वज्ञानको, जीवन्मुक्तिको प्राप्त करना है ।

वास्तवमें आप प्रकृतिसे आप अलग हैं । इस बातको जाननेके लिये आप कृपा करें, थोड़ा ध्यान दें । आप आने-जानेवाले नहीं हैं । भगवान्‌ने कहा है‒

मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः ।

आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत ॥

(गीता २/१४)

‘हे कुन्तीनन्दन ! इन्द्रियोंके वे विषय हैं जो अनुकूलता और प्रतिकूलताके द्वारा सुख और दुःख देनेवाले हैं । वे आने-जानेवाले और अनित्य हैं । हे भरतवंशोद्भव अर्जुन ! उनको तुम सहन करो ।’

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।। श्रीहरिः ।।

                   


आजकी शुभ तिथि–
  आश्विन शुक्ल एकादशी, वि.सं.-२०७८,  शनिवार
                             

नामजप और सेवासे भगवत्प्राप्ति


मनुष्यको भगवान्‌ने मध्यलोकमें बनाया है, जिससे यह ऊँचें लोंकोंकी भी सेवा करे, नीचेके लोंकोंकी भी सेवा करे । इतना ही नहीं, यह भगवान्‌की भी सेवा करे ! भगवान्‌ भी मनुष्यसे आशा रखते हैं । कुटुम्बी भी आशा रखते हैं । इनकी सेवा करो और स्वयं नाम-जप करो । दूसरोंसे भी नाम-जप करनेके लिये कहो‒‘स्मरन्तः स्मारयन्तः’, ‘रामनामकी लूट है, लूट सके तो लूट !’ भगवान्‌का नाम मीठा लगे, प्यारा लगे । प्यारा न लगे तो भगवान्‌से कहो कि ‘हे नाथ ! मुझे आपका नाम प्यारा लगे, हे प्रभु ! मैं आपको भूलूँ नहीं ।’ मिनट-मिनटमें, आधे-आधे मिनटमें कहते रहो कि ‘हे नाथ ! आपको भूलूँ नहीं ।’

‘भूले नाहिं बने कृपानिधि भूले नाहिं बने’

‘विस्मार्यते कृतविदा कथामार्तबन्धो’

(श्रीमद्भा ४/९/८)

भगवान्‌की कृपाको जाननेवाला कोई भी पुरुष भगवान्‌को कैसे भूल सकता है ? भगवान्‌ने कितनी विचित्र कृपा की है ! सब अंग दिये हैं, मन दिया है, बुद्धि दी है, अच्छे घरमें जन्म दिया है । अच्छी जगह पले हो, अच्छे संस्कारमें आये हो, भगवान्‌को मानते हो, सत्संगमें जाते हो । कितना सुन्दर अवसर दिया है ! अब थोड़ा-सा और करो तो निहाल हो जाओ !

जिन जीवोंको भगवान्‌ने मनुष्यशरीर दिया है, उन जीवोंको भगवान्‌ने अपने पास आनेका निमन्त्रण दे दिया है ! जैसे ब्राह्मण, साधुको कोई निमन्त्रण देकर अपने घर ले जाय, आसन देकर बैठा दे, सामने पत्तल और जल रख दे, तो फिर यह सोचनेकी जरूरत नहीं है कि वह अन्न देगा कि नहीं देगा ? अगर अन्न नहीं देगा तो उसने निमन्त्रण क्यों दिया है ? जब सब सामग्री दी है तो अन्न भी देगा । ऐसे ही भगवान्‌ने मनुष्यशरीर दे दिया, अच्छी रुचि दे दी, अच्छा संग दे दिया, तो क्या अपनी प्राप्ति नहीं करायेंगे ? वे तो तैयार हैं कि आओ, खूब मौजसे भोजन करो और सदाके लिये तृप्त हो जाओ ! इसलिये भगवत्प्राप्तिकी चिन्ता न करके नाम-जप करो, संसारकी सेवा करो और आशा मत रखो । संसार आपसे सुखकी आशा रखता है । जो आपसे सुख चाहता है, उससे आप भी सुख चाहोगे तो दो ठगोंमें ठगाई कैसे होगी ? आपके मनमें है कि भाई-बन्धु, माँ-बापसे मैं ले लूँ और वे चाहते हैं कि आपसे ले लें । दोनों ठग हुए । दोनों ठगे जायँगे और मिलेगा कुछ नहीं । जैसे भूखेको अन्न देनेका और प्यासेको जल पिलानेका बड़ा माहात्मय है, ऐसे ही सेवा चाहनेवालोंकी सेवा करनेका बड़ा माहात्म्य है !

बहनोंको चाहियेकी ससुरालमें रहें तो सबकी सेवा करें । अपने पिताके घरमें रहें तो सबकी सेवा करें । मनमें यह भाव रखें कि मैं दूसरे घर चली जाऊँगी तो वहाँ इनकी‒माता, पिता, चाचा, ताऊ, मामा, भाई, भौजाई आदिकी सेवा कहाँ मिलेगी ? माता-पितासे शरीर मिला है, उन्होंने मेरा पालन-पोषण किया है । इतने कुटुम्बियोंसे मैंने लिया-ही-लिया है तो वापस कब दूँगी ? इसलिये बहनोंको चाहिये कि लड़कपनसे सेवा शुरू कर दें । पीहरसे लेना-ही-लेना किया तो सेवा कब करोगी ? वे तो उम्रभर देंगे । ससुरालमें अधिकार मिल गया तो अब वहाँ भी सबकी सेवा करो, सबको सुख पहुँचाओ । फिर देखो, आपका गृहस्थ भी शान्तिदायक हो जायगा और भगवान्‌की प्राप्ति भी हो जायगी ।

केवल भाव बदल दो कि मैं तो सेवा करनेके लिये हूँ । रोजाना सुबह और शाम बड़ोंके चरणोंमें प्रणाम करो । काम-धन्धा खुद करो और सुख-आराम दूसरोंको दो । निन्दा, तिरस्कार, उलाहना, अपमान अगर मिलते हों तो खुद ले लो और मान-बड़ाई, आदर-सत्कार दूसरोंको दो । फिर आप देखो, कितना आनन्द होता है ! कौटुम्बिक स्‍नेह भी हो जायगा और भजन भी हो जायगा । भजनका लाभ भी दिखेगा । संसारकी आशा रखोगे तो लाभ नहीं दिखेगा । रुपये मिल जायँ, आराम मिल जाय तो आपको यह लाभ दीखता है । इसके लिये आप रात-दिन दौड़ते रहते हैं । वह तो जितना मिलना है, उतना ही मिलेगा । नहीं मिलना है तो नहीं मिलेगा । परन्तु भगवान्‌का भजन असली धन है, जो करनेसे ही मिलेगा । नहीं करोगे तो नहीं मिलेगा । अतः इस असली धनका संग्रह करो ।

नारायण !     नारायण !!     नारायण !!!

‒‘भगवान्‌से अपनापन’ पुस्तकसे

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।। श्रीहरिः ।।

                  


आजकी शुभ तिथि–
   आश्विन शुक्ल दशमी, वि.सं.-२०७८,  शुक्रवार
                             

नामजप और सेवासे भगवत्प्राप्ति


तेरे भावैं  जो  करौ,  भलौ  बुरौ  संसार ।

‘नारायण’ तू बैठिके, अपनौ भुवन बुहार ॥

‒इस तरह अनन्यभावसे नाम-जपमें लग जाओ । गृहस्थमें रहते हुए सेवा करो । बहनों-माताओंको चाहिये कि वे आपसमें सेवा करें । चाहे देवरानी हो या जेठाणी, सास हो या ननद, चाहे बहू ही हो, उसकी सेवा करो । जैसे कोई पुजारी सेवा करनेके लिये बाजारसे भगवान्‌की मूर्ति लाता है तो वह यह नहीं सोचता कि इस मूर्तिसे घरका काम-धन्धा करायेंगे । ऐसे ही बेटाका विवाह किया है तो एक मूर्ति आयी है, अब उसकी सेवा करनी है । साधुओंको तो मूर्ति कहते ही हैं; जैसे पूछते हैं‒कितनी मूर्ति है ? मतलब यह है कि इन मूर्तियोंकी सेवा करनी है, सेवाके सिवाय ये कुछ कामकी नहीं ! कोई जन्म गया तो ठाकुरजीके यहाँसे आया है, उसकी सेवा करो । सेवा करनेके लिये ही आपका सम्बन्ध है ।

मेला महोत्सवोंमें सेवा-समितिवाले जाते हैं । कोई बीमार हो जाय तो वे उसको कैम्पमें लाते हैं, दवाई देते हैं, उसकी सेवा करते हैं और यदि वह मर जाय तो जला देते हैं । अब रोये कौन ? ऐसे ही आप सबके साथ केवल सेवाका सम्बन्ध रखो तो आपका रोना बन्द हो जाय, चिन्ता बन्द हो जाय, शोक बन्द हो जाय । सबको सुख-आराम दो, सबका मान-आदर करो और परिश्रम खुद करो । आपका गृहस्थ सुखदायी हो जायगा । अगर सुख देने-ही-देनेकी इच्छा रहे तो सुख हो जायगा और लेने-ही-लेनेकी इच्छा रहे सुख कम हो जायगा । आज रुपये कम क्यों हो गये ? संख्या तो घटी नहीं, फिर कम कैसे हो गये ? जिसके पास रुपये आये, उसीने दबा लिये, इसलिये रुपये कम हो गये । कुछ वर्षों पहले रेजगारी (खुले पैसे) बहुत कम हो गयी थी । कारण कि एक-एक आदमीके पास बीस, पचास, सौ-सौ रुपयोंकी रेजगारी इकठ्ठी की हुई होनेसे बाजारमें कहाँसे मिले ? जिसके हाथ जितनी लगी, इकठ्ठी कर ली । ऐसे ही अभी जो सुख मिलता नहीं है, उसका कारण यह है कि सभी सुख लेनेमें लगे हुए हैं, खाऊँ-खाऊँ कर रहे हैं । अगर सब एक-दूसरेको सुख देने लग जायँ तो सुख बहुत हो जायगा ।

घरमें रहते हुए घरके सब प्राणियोंकी सेवा करो । छोटे, बड़े, समान अवस्थावाले‒सबको सुख-आराम कैसे पहुँचे ? उनका आदर कैसे हो ? यह भाव हरदम बना रहे । कई माताएँ सेवा करके फिर कहती है कि मैं इतनी सेवा करती हूँ, मेरा सुख तो गया धूलमें ! सुख धूलमें गया तो बहुत अच्छी बात है, खेती हो जायगी ! धूलमें बीज मिल जाय तो खेती हो जाती है । आप सेवा करते हैं, पर कोई आपका गुण नहीं गाता, आशीष नहीं देता तो यह बहुत ही बढ़िया चीज है । आपकी सेवा जमा हो जायगी । दूसरे वाह-वाह करेंगे तो आपकी सेवा खत्म (खर्च) हो जायगी । कुछ पानेकी इच्छासे सेवा करोगे तो सेवाकी बिक्री हो जायगी ।

गृहस्थाश्रम उद्धार करनेके लिये है, फँसनेके लिये नहीं । सेवा करना उद्धारके लिये हैं और सेवा लेना फँसनेके लिये है । आप चाहते हो कि सब घरवाले मेरे अनुकूल बन जायँ तो यह पतनका, फँसनेका बढ़िया रास्ता है । जलमें जाकर दोनों हाथोंसे जल लोगे तो एकदम भीतर चले जाओगे, डूब जाओगे । परन्तु दोनों हाथोंसे, लातोंसे जलको धक्का दोगे तो तैरकर पार हो जाओगे । ऐसे ही इस संसार-समुद्रमें लेनेकी इच्छा करोगे तो डूब जाओगे और देनेकी इच्छा करोगे तो पार हो जाओगे । हम सब यहाँ लेनेके लिये नहीं आये हैं, सेवा करनेके लिये आये हैं । इसलिये गृहस्थाश्रममें रहते हुए सबकी सेवा करो, सबका हित करो । प्राणिमात्रके हितमें जिनकी प्रीति हो जाती है, वे भगवान्‌को प्राप्त हो जाते हैं‒‘ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः ॥’ (गीता १२/४) । नहीं तो बैठकर संसारके झुनझुनेसे खेलो ! उससे क्या मिलेगा ? माँका प्यार, माँका दूध तो तब मिलेगा, जब आप झुनझुनेको, सीटी, पी-पीको फेंक दोगे, माँके बिना रह नहीं सकोगे ।

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।। श्रीहरिः ।।

                 


आजकी शुभ तिथि–
   आश्विन शुक्ल नवमी, वि.सं.-२०७८, गुरुवार
                             

नामजप और सेवासे भगवत्प्राप्ति


का  बरषा सब  कृषी  सुखानें ।

समय चुकें पुनि का पछितानें ॥

(मानस, बाल २६१/३)

अभी समय है सभी तरहसे मन हटा लो । सब सम्बन्ध टूटनेवाले हैं । कोई भी सम्बन्ध रहनेवाला नहीं है । अगर आप छोड़ दोगे तो निहाल हो जाओगे । छूटनेवालेको ही छोड़ना है, इसमें नयी बात क्या करनी है ? छूटनेवालेसे मनसे दूर हो जाओ । दूर होनेका मतलब है‒उसकी सेवा करो, पर उससे चाहना मत करो । इससे घरवाले भी नाराज नहीं होंगे; क्योंकि वे सेवा ही चाहते हैं । उनसे सेवा लो मत, तो वे और ज्यादा राजी होंगे ।

केवल सेवा-ही-सेवा करें तो दुनिया राजी हो जाय, आप निहाल हो जायँ और भगवान्‌ मिल जायँ । दुनियासे चाहना रखोगे तो वह नाराज हो जायगी । वह आपको देगी भी, तो दुःख पाकर देगी कि क्या करें, आफत आ गयी ! परन्तु चाह नहीं रखोगे तो दुनिया गरज करके देगी । जो वास्तवमें भीतरसे चाहरहित हैं, उन सन्तोंकी सेवा करती है दुनिया । सेवा करनेवाले कहते हैं कि महाराजने मेरी चीज स्वीकार कर ली, आज तो हम निहाल हो गये । लेनेवालेके हृदयमें गरज नहीं होगी तो देनेवाला देकर निहाल हो जायगा । परन्तु यदि आपके हृदयमें गरज होगी तो दूसरेको देनेपर भी वह राजी नहीं होगा । वह उलटे सोचेगा कि यह ठग है, देता है तो पता नहीं भीतर क्या कूड़ा-करकट भरा पड़ा है ! इसलिये हृदयमें संसारके प्रति उदार भाव रखो ।

संसारसे मिली हुई चीज बिलकुल संसारकी है । शरीर माँ-बापसे मिला है, विद्या गुरुजनोंसे मिली है । हमने संसारसे लिया-ही-लिया है । अब तो कृपा करके देना शुरू करो । देना सीखो तो सही ! देनेसे घाटा नहीं पड़ेगा । केवल भाव उदारताका बन जाय । जैसे शिकारी देखता है कि मेरी बन्दूकके सामने शिकार आ जाय, ऐसे ही आप देखते हैं कि कोई मेरे सामने आ जाय, मेरे कब्जेमें आ जाय तो किसी तरहसे उससे ले लूँ ! दशा तो ऐसी है और कहते हैं कि लाभ नहीं हुआ । लाभ क्या होगा, उलटे पतन होगा ! खर्चा जितना आज करते हो, उतना ही करो, ज्यादा खर्चा मत करो, पर भाव बिलकुल बदल दो कि हमें लेना ही नहीं है, देना-ही-देना है । हमें तो सेवा करनी है । सुगमतासे जितना खर्च कर सको, उतना खर्च करना है, पर ‘हमें किसीसे कुछ नहीं लेना है’, यह भाव बना लो । फिर देखो, जीवन सुधरता है कि नहीं, जीवन निर्मल बन जायगा । लोग़ राजी हो जायँगे । भगवान्‌ राजी हो जायँगे । आप प्रसन्न हो जाओगे, मस्त हो जाओगे ।

सेवा करनेवाला कभी दुःखी नहीं होता । लेनेवाला सदा दुःखी होता है । उससे मिले तो भी वह राजी नहीं होगा कि थोड़ा मिला है ! ज्यादा मिले तो उसको अभिमान आ जायगा । दुःख और आसुरी-सम्पत्ति उसके पास रहेगी; क्योंकि जड़ पदार्थ लेनेकी इच्छा है । इसलिये कहा है‒‘देनेको टुकड़ा भला, लेनेको हरि नाम ।’ एक साधुको मैंने देखा । एकान्तमें बैठकर नाम-जप कर रहे थे और आँखोंसे टप-टप आँसू बह रहे थे । मकानमे छोटी खिड़की थी, वह भी बन्द कर दी थी, जिससे न तो उनपर दूसरेकी दृष्टि पड़े और न उनकी दृष्टि दूसरेपर पड़े । रातमें उनको नींद नहीं आती थी । इस तरह लगनपूर्वक कोई नाम-जप करे तो उसको लाभ क्यों नहीं होगा ? आप करके देखो । भूख तो पेटमें हैं, पर हलवा पीठपर बाँध दिया और कहते हैं कि तृप्ति नहीं हुई ! उसको खाकर देखो कि तृप्ति होती है या नहीं ।

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।। श्रीहरिः ।।

                


आजकी शुभ तिथि–
   आश्विन शुक्ल अष्टमी, वि.सं.-२०७८, बुधवार
                             

नामजप और सेवासे भगवत्प्राप्ति


भगवान्‌ राजी कैसे हों ? भगवान्‌से भी कुछ नहीं लेना है, प्रत्युत देना है । जैसे बच्चा माँसे दूर चला जाय तो माँको बहुत याद आती है । माताओंकी ऐसी बातें मैंने सुनी हैं । दीपावली, अक्षय तृतीया आदि त्यौहार आते हैं तो माताएँ कहती हैं कि क्या बनायें ? लड़का तो घरपर है नहीं, अच्छी चीज बनाकर किसको खिलायें ? लड़का घरपर होता तो माताएँ बढ़िया-बढ़िया चीजें बनाती हैं और लड़केको खिलाकर खुश होती हैं । ऐसे ही भगवान्‌के लड़के हमलोग चले गये विदेशमें ! अब भगवान्‌ कहते हैं कि क्या करूँ ? क्या दूँ ? लड़का तो घरपर ही नहीं है ! वह तो धन-सम्पत्तिकी तरफ लगा हुआ है, खेल-कूदमें लगा हुआ है !

सनमुख होई जीव मोहि जबहीं ।

जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं ॥

(मानस, सुन्दर४४/२)

परन्तु आज सम्मुख हो रहे हैं रुपयों-पैसोंके, वस्तुओंके, कुटुम्बके, आरामके, मान-आदरके, स्वाद-शौकीनीके !

जो संसारसे आशा रखता है और भगवान्‌का भजन भी करता है, वह भजन नहीं करनेवालेकी अपेक्षा तो अच्छा है । किसी तरहसे भगवान्‌में मन लग जाय तो बड़ा अच्छा है‒‘तस्मात् केनाप्युपायेन मनः कृष्णे निवेशयेत्’ (श्रीमद्भागवत ७/१/३१) । परन्तु यदि आप नाम-जपका माहात्म्य तत्काल देखना चाहते हैं तो वह भी देखनेमें आयेगा, जब आप सच्चे हृदयसे भगवान्‌में लग जायँगे । जिन लोगोंने भजन किया है, उन लोगोंमें विलक्षणता आयी है । हमने ऐसे कई देखे हैं कि नाम-जपसे पहले उनकी क्या अवस्था थी और नाम-जपमें लगनेके बाद उनकी क्या अवस्था हो गयी ! परन्तु वे लगनसे जपते थे ।

जब मैं पढ़ता था, उन दिनोंकी बात है । रात्रिके दस बजेतक पाठ वगैरह होता था । एक दिन रात्रिके दस बजेके बाद मैं बाहर गया । जंगलमें एक सरोवर था, उसके किनारेपर एक साधु बैठे थे, जो हमारे परिचित थे । वे राम-राम कह रहे थे और रो रहे थे । बात क्या है ? भगवद्‌भजनके बिना बहुत-से दिन खाली चले गये, अब क्या करूँ ? वह गया हुआ समय सार्थक कैसे बने ? ऐसे विचारसे उनके आँसू टपक रहे थे । जो समय हाथसे चला गया, वह पीछे नहीं आयेगा । आज साक्षात् भगवान्‌ मिल जायँ तो भी गये हुए समयकी पूर्ति नहीं होगी ! अगर समय खाली न जाता तो भगवान्‌ पहले ही मिल जाते, इतने दिन हम भगवान्‌के वियोगमें न रहते !

एक भी स्वास  खाली  खोय न  खलक  बिच,

कीचड़  कलंक  अंक  धोय  ले  तो  धोय  ले ।

उर  अँधियारो  पाप  पुंज  सु  भरोयो   देख,

ज्ञान की चिरागां चित्त  जोय ले तो जोय ले ।

मिनखा  जनम  फिर  ऐसो  न  मिलेगो  मूढ़,

परम  प्रभू  से  प्यारो  होय  ले  तो  होय  ले ।

यह  छिनभंगु  देह  तामे   जन्म  सुधारबो  है,

बिजली के झपाके मोती पोय ले तो पोय ले ॥

जब बिजलीका प्रकाश होता है, उस समय मोती पिरो ले, नहीं तो फिर अँधेरा हो जायगा । ऐसे ही इस मनुष्य-शरीरके रहते-रहते भजन कर ले, भगवान्‌को प्राप्त कर ले । यह मौका फिर नहीं मिलेगा !

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