।। श्रीहरिः ।।

     


आजकी शुभ तिथि–
  माघ कृष्ण प्रतिपदा, वि.सं.-२०७८, मंगलवार
               गीताका तात्पर्य


व्यवहार करते हुए तत्त्वज्ञान हो जाय, भगवद्भक्ति हो जाय, योगका अनुष्ठान हो जाय, लययोग, राजयोग, मन्त्रयोग आदि योगोंकी प्राप्ति हो जाय‒ऐसी विलक्षण विद्या गीताने बतायी है ! वह विलक्षण विद्या क्या है‒इसको बतानेकी चेष्टा की जाती है । हम जो-जो व्यवहार करते हैं, उसमें अपने स्वार्थ और अभिमानका आग्रह छोड़कर सबके हितकी दृष्टिसे कार्य करें, हितकी दृष्टिसे कार्य करनेका तात्पर्य है कि वर्तमानमें भी हित हो और भविष्यमें भी हित हो, हमारा भी हित हो और दूसरे सबका भी हित हो‒ऐसी दृष्टि रखकर कार्य करे । ऐसा करनेसे बड़ी सुगमतासे परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति हो जायगी । एकान्तमें रहकर वर्षोंतक साधना करनेपर ऋषि-मुनियोंको जिस तत्त्वकी प्राप्ति होती थी, उसी तत्त्वकी प्राप्ति गीताके अनुसार व्यवहार करते हुए हो जायगी । सिद्धि-असिद्धिमें सम रहकर कर्म करना ही गीताके अनुसार व्यवहार करना है । गीता कहती है‒

सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ ।

ततो युद्धाय युजय्स्व  नैवं पापमवाप्स्यसि ॥

(२/३८)

‘जय-पराजय, लाभ-हानि और सुख-दुःखको समान करके फिर युद्धमें लग जा । इस प्रकार युद्ध करनेसे तू पापको प्राप्त नहीं होगा ।’

योगस्थः कुरु  कर्माणि  सङ्गं  त्यक्ता  धनञ्जय ।

सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ॥

(२/४८)

‘हे धनञ्जय ! तू आसक्तिका त्याग करके सिद्धि-असिद्धिमें सम होकर योगमें स्थित हुआ कर्मोंको कर; क्योंकि समत्व ही योग कहा जाता है ।’

संसारका स्वरूप है‒क्रिया और पदार्थ । परमात्म-तत्त्वकी प्राप्तिके लिये क्रिया और पदार्थसे सम्बन्ध-विच्छेद करना आवश्यक है । इसके लिये गीताने कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग‒तीनों ही योगोंकी दृष्टिसे क्रिया और पदार्थोंसे सम्बन्ध-विच्छेद करनेकी युक्ति बतायी है; जैसे‒कर्मयोगी क्रिया और पदार्थमें आसक्तिका त्याग करके उनको दूसरोंके हितमें लगाता है[*]; ज्ञानयोगी क्रिया और पदार्थसे असंग होता है[†] और भक्तियोगी क्रिया और पदार्थ भगवान्‌के अर्पण करता है[‡] । सम्पूर्ण क्रियाओं और पदार्थोंको भगवान्‌के अर्पण करनेसे मनुष्य सुगमतापूर्वक संसार-बन्धनसे मुक्त होकर भगवान्‌को प्राप्त हो जाता है । भगवान्‌के अर्पण करनेसे क्रियाएँ और वस्तुएँ नहीं रहेगी‒यह बात नहीं है, प्रत्युत वे महान्‌ पवित्र हो जायँगी । जैसे भक्तलोग भगवान्‌को भोग लगाते हैं तो भोग लगायी हुई वस्तु वैसी-की-वैसी ही मिलती है, कम नहीं होती, पर वह वस्तु महान्‌ पवित्र हो जाती है । इसी तरह संसारमें भी हम जिस वस्तुको अपनी न मानकर दूसरोंकी सेवाके लिये मानते हैं, वह वस्तु महान्‌ पवित्र हो जाती है और जिस वस्तुको हम केवल अपने लिये ही मानते हैं, वह वस्तु महान्‌ अपवित्र हो जाती है ।


[*] यदा हि नेन्द्रियार्थेषु     न कर्मस्वनुषज्जते ।

  सर्वसङ्कल्पसंन्यासी     योगारूढस्तदोच्यते ॥

‘जिस समय न इन्द्रियोंके भोगोंमें तथा न कर्मोंमें ही आसक्त होता है, उस समय वह सम्पूर्ण संकल्पोंका त्यागी मनुष्य योगारूढ़ कहा जाता है ।

[†] तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः ।

   गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते ॥

‘हे महाबाहो ! गुण-विभाग और कर्म-विभागको तत्त्वसे जाननेवाला महापुरुष ‘सम्पूर्ण गुण ही गुणोंमें बरत रहे हैं’‒ऐसा मानकर उनमें आसक्त नहीं होता ।’

[‡] पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति ।

   तदहं     भक्त्युपहृतमश्नामि     प्रयतात्मनः ॥

   यत्करोषि  यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि  यत् ।

   यत्तपस्यसि  कौन्तेय    तत्कुरुष्व   मदर्पणम् ॥

‘जो भक्त पत्र, पुष्प, फल, जल आदि (यथासाध्य प्राप्त वस्तु)-को भक्तिपूर्वक मेरे अर्पण करता है, उस मेरेमें तल्लीन हुए अन्तःकरणवाले भक्तके द्वारा भक्तिपूर्वक दिये हुए उपहार (भेंट)-को मैं खा लेता हूँ ।’

‘हे कुन्तीपुत्र ! तू जो कुछ करता है, जो कुछ खाता है, जो कुछ यज्ञ करता हा और जो कुछ तप करता है, वह सब मेरे अर्पण कर दे ।’

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।। श्रीहरिः ।।

    


आजकी शुभ तिथि–
        पौष पूर्णिमा, वि.सं.-२०७८, सोमवार
               गीताका तात्पर्य


ईश्वरके विषयमें कई कहते हैं कि यह सगुण है, कई कहते हैं कि यह निर्गुण है, कई कहते हैं कि यह साकार है, कई कहते हैं कि यह निराकार है । कई कहते हैं कि यह द्विभुज है, कई कहते हैं कि यह चतुर्भुज है, कई कहते हैं कि यह सहस्रभुज है, कई कहते हैं कि यह विराट्‌रूप है । कई कहते हैं कि यह व्यक्त है, कई कहते हैं कि यह अव्यक्त है, कई कहते हैं कि यह अवतार लेता है, कई कहते हैं कि यह अवतार नहीं लेता; आदि-आदि । इसी तरह जगत्‌के विषयमें कई कहते हैं कि यह अनादि और अनन्त है, कई कहते हैं कि यह अनादि और सान्त है, कई कहते हैं कि यह अनादि और परिवर्तनशील अर्थात्‌ प्रवाहरूपसे रहनेवाला है आदि-आदि । गीताने इन सब वाद-विवादोंमें न पड़कर सीधी बात बतायी है कि तुम्हारे सामने दीखता है, यह ‘जगत्’ है । हरेक मनुष्यको ‘मैं हूँ’‒ऐसा अनुभव होता है, यह ‘जीव’ है । जो जड़-चेतन, अपरा-परा सबका स्वामी है, वह ‘ईश्वर’ है[*] । गीताकी इस बातमें सभी दार्शनिक एकमत हैं । इसमें भी एक विलक्षण बात है कि यदि कोई ईश्वरको न माने तो भी गीताके अनुसार चलनेसे उसका कल्याण हो जायगा[†] !

गीताने व्यवहारमें परमार्थकी विलक्षण कला बतायी है, जिससे प्रत्येक मनुष्य प्रत्येक परिस्थितिमें रहते हुए, निषिद्धरहित सब तरहका व्यवहार करते हुए भी अपना कल्याण कर सके[‡] । दूसरे ग्रन्थ तो प्रायः यह कहते हैं कि अगर अपना कल्याण चाहते हो तो सब कुछ त्यागकर साधु हो जाओ; क्योंकि व्यवहार और परमार्थ‒दोनों एक साथ नहीं होंगे । परन्तु गीता कहती है कि आप जहाँ हैं, जिस मतको मानते हैं, जिस सिद्धान्तको मानते हैं, जिस धर्म, सम्प्रदाय आदिको मानते हैं, उसीको मानते हुए गीताके अनुसार चलो तो कल्याण हो जायगा । तात्पर्य है कि कोई भी मनुष्य चाहे हिन्दू हो, चाहे मुसलमान हो, चाहे ईसाई हो, चाहे यहूदी हो, चाहे पारसी हो, वह किसी भी मतका अनुसरण करनेवाला हो, किसी भी सिद्धान्तको माननेवाला हो, यदि उसका उद्देश्य अपना कल्याण करनेका है तो उसको भी गीतामें अपने कल्याणकी पूरी सामग्री मिल जायगी ।



[*] न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः ।

   न चैव न भविष्यामः    सर्वे वयमतः परम् ॥

(गीता २/१२)

किसी कालमें मैं नहीं था और तू नहीं था तथा ये राजालोग नहीं थे‒यह बात भी नहीं है और इसके बाद ये सभी (मैं, तू और राजालोग) नहीं रहेंगे‒यह बात भी नहीं है ।’

द्वाविमौ पुरुषौ लोके    क्षरश्चाक्षर एव च ।

क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ॥

उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः    परमात्मेत्युदाहृतः ।

यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः ॥

यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि    चोत्तमः ।

अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः ॥

(गीता १५/१६‒१८)

इस संसारमें क्षर (नाशवान्‌) और अक्षर (अविनाशी)‒ये दो प्रकारके पुरुष हैं । सम्पूर्ण प्राणियोंके शरीर नाशवान्‌ और कूटस्थ (जीवात्मा) अविनाशी कहा जाता है । उत्तम पुरुष तो अन्य ही है, जो परमात्मा नामसे कहा गया है । वही अविनाशी ईश्वर तीनों लोकोंमें प्रविष्ट होकर सबका भरण-पोषण करता है । मैं क्षरसे अतीत हूँ और अक्षरसे भी उत्तम हूँ, इसलिये लोकमें और वेदमें पुरुषोत्तम नामसे प्रसिद्द हूँ ।’

[†] देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः ।

   परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ ॥

(गीता ३/११)

अपने कर्तव्य-कर्मके द्वारा तुमलोग देवताओंको उन्नत करो और वे देवातालोग अपने कर्तव्यके द्वारा तुमलोगोंको उन्नत करें । इस प्रकार एक-दूसरेको उन्नत करते हुए तुमलोग परम कल्याणको प्राप्त हो जाओगे ।’

स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः ।

(गीता १८/४५)

‘अपने-अपने कर्तव्यमें तत्परतापूर्वक लगा हुआ मनुष्य सम्यक् सिद्धि (परमात्मा)-को प्राप्त कर लेता है ।’

[‡] सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्‌व्यपाश्रयः ।

   मत्प्रसादादवाप्नोति    शाश्वतं पदमव्ययम् ॥

(गीता १८/५६)

‘मेरा आश्रय लेनेवाला भक्त सदा सब विहित कर्म करते हुए भी मेरी कृपासे शाश्वत अविनाशी पदको प्राप्त हो जाता है ।’

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।। श्रीहरिः ।।

   


आजकी शुभ तिथि–
     पौष शुक्ल चतुर्दशी, वि.सं.-२०७८, रविवार
               गीताका तात्पर्य


श्रीमद्भागवद्गीता लौकिक होते हुए भी एक अलौकिक ग्रन्थ है । इसमें बहुत ही विलक्षण भाव भरे हुए हैं । आजतक गीतापर जितनी टीकाएँ हुई हैं, उतनी किसी भी ग्रन्थपर नहीं हुई है । बाइबिलके अनुवाद (भाषान्तर) तो बहुत हुए हैं, पर टीका एक भी नहीं हुई है । बाइबिलका प्रचार तो राज्य और धनके प्रभावसे हुआ है, पर गीताका प्रचार गीताके अपने प्रभावसे हुआ है । तात्पर्य है कि गीताका आशय खोजनेके लिये जितना प्रयत्न किया गया है, उतना दूसरे किसी भी ग्रन्थके लिये नहीं किया गया है, फिर भी इस ग्रन्थकी गहराईका अन्त नहीं आया है !

थोड़े शब्दोंमें कहे तो गीताका तात्पर्य है‒मनुष्य-मात्रका कल्याण करना । शास्त्रोंमें कल्याणके कई मार्ग बताये गये हैं । गीताकी टीकाओंको भी देखें तो उनमें अद्वैतवाद, द्वैतवाद, विशिष्ठाद्वैतवाद, द्वैताद्वैतवाद, शुद्धाद्वैतवाद, अचिन्त्यभेदाभेदवाद आदि अनेक मतोंको लेकर टीकाएँ की गयी हैं । इस प्रकार अनेक वाद, सिद्धान्त, मत-मतान्तर होते हुए भी गीताका किसीके साथ विरोध नहीं है । गीताने किसी भी मतका खण्डन नहीं किया है; परन्तु अपनी एक ऐसी विलक्षण बात कही है, जिसके सामने सब नतमस्तक हो जाते हैं । कारण कि गीता किसी एक वाद, मत आदिको लेकर नहीं कही गयी है, प्रत्युत जीवमात्रके कल्याणको लेकर कही गयी है ।

आचार्यगण अपने-अपने मतको ‘सिद्धान्त’ नामसे कहते हैं । मत सर्वोपरि नहीं होता । हरेक व्यक्ति अपना-अपना मत प्रकट करता है । परन्तु सिद्धान्त सर्वोपरि होता है, जो सबको मानना पड़ा है । इसलिये गुरु-शिष्यमें भी मतभेद तो हो सकता है, पर सिद्धान्तभेद नहीं हो सकता । परन्तु गीतामें भगवान्‌ने अपने सिद्धान्तको ‘सिद्धान्त’ नामसे न कहकर ‘मत’ नामसे कहा है; जैसे‒

मयि सर्वाणि कर्माणि सन्न्यस्याध्यात्मचेतसा ।

निराशीर्निर्ममो भूत्वा   युध्यस्व विगतज्वरः ॥

ये  मे  मतमिदं    नित्यमनुतिष्ठन्ति  मानवाः ।

श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो  मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः ॥

(३/३०-३१)

‘तू विवेकवती बुद्धिके द्वारा सम्पूर्ण कर्तव्य-कर्मोंको मेरे अर्पण करके कामना, ममता और सन्तापरहित होकर युद्धरूप कर्तव्य-कर्मको कर । जो मनुष्य दोषदृष्टिसे रहित होकर श्रद्धापूर्वक मेरे इस मतका सदा अनुसरण करते हैं, वे भी सम्पूर्ण कर्मोंके बन्धनसे मुक्त हो जाते हैं ।’

भगवान्‌का मत ही वास्तविक और सर्वोपरि सिद्धान्त है, जिसके अन्तर्गत सभी मत-मतान्तर आ जाते हैं । परन्तु भगवान्‌ अभिमान न करके बड़ी सरलतासे, नम्रतासे अपने सिद्धान्तको ‘मत’ नामसे कहते हैं । तात्पर्य है कि भगवान्‌ने अपने अथवा दूसरे किसीके भी मतका आग्रह नहीं रखा है, प्रत्युत निष्पक्ष होकर अपनी बात सामने रखी है ।

ईश्वरको माननेवाले जितने भी दार्शनिक सिद्धान्त हैं, उनमें प्रायः तीन चीजोंका वर्णन आता है‒परमात्मा, जीवात्मा और जगत् । इन तीनोंके विषयमें कई मतभेद हैं । जैसे‒जीवके विषयमें कई कहते हैं कि यह अणु-परमाणु है, कई कहते हैं कि यह मध्यम-परिमाण है और कई कहते हैं कि यह महत्-परिमाण है । जीवको ‘अणु-परमाणु’ माननेवाले कहते हैं कि एक केशको चीरकर उसके दस हजार भाग किये जायँ तो एक भागके बराबर जीवका परिमाण है[*] । जीवको ‘मध्यम-परिमाण’ माननेवाले कहते हैं कि चीटींमें चीटीं-जितना ही जीव है, मनुष्यमें मनुष्य-जितना ही जीव है, हाथीमें हाथी-जितना ही जीव है । जीवको महत्-परिमाण’ माननेवाले कहते हैं कि जीव एक शरीरमें सीमित नहीं है, प्रत्युत यह बहुत महान्‌ है ।



[*] वालाग्रशतभागस्य    शतधा   कल्पितस्य  च ।

   भागो जीवः स विज्ञेयः स चानन्त्याय कल्पते ॥

(श्वेताश्वतर ५/९)

‘बालकी नोकके सौवें भागके पुनः सौ भागोंमें कल्पना किये जानेपर जो एक भाग होता है, उसीके बराबर जीवका स्वरूप समझना चाहिये और वह असीम भाववाला होनेमें समर्थ हैं ।’


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।। श्रीहरिः ।।

  


आजकी शुभ तिथि–
     पौष शुक्ल त्रयोदशी, वि.सं.-२०७८, शनिवार
              भक्तशिरोमणि 
      श्रीहनुमान्‌जीकी दास्य-रति


हनुमान्‌जीकी वियोग-रति भी विचित्र ही है । लौकिक अथवा पारमार्थिक जगत्‌में कोई भी व्यक्ति अपने इष्टका वियोग नहीं चाहता । परन्तु भगवान्‌का कार्य करनेके लिये तथा उनका निरन्तर स्मरण करनेके लिये, उनका गुणानुवाद (लीला-कथा) सुननेके लिये हनुमान्‌जी भगवान्‌से वियोग-रतिका वरदान माँगते हैं‒

यावद् रामकथा वीर  चरिष्यति महीतले ।

तावच्छरीरे वत्स्यन्तु प्राणा मम न संशयः ॥

(वाल्मीकि उत्तर४०/१७)

‘वीर श्रीराम ! इस पृथ्वीपर जबतक रामकथा प्रचलित रहे, तबतक निःसन्देह मेरे प्राण इस शरीरमें ही बसे रहें ।’

कोई प्रेमास्पद भी अपने प्रेमीसे वियोग नहीं चाहता । परन्तु भगवान्‌ श्रीराम जब परमधाम पधारने लगे, तब वे भक्तोंकी सहायता, रक्षाके लिये हनुमान्‌जीको इस पृथ्वीपर ही रहनेकी आज्ञा देते हैं । यह भी एक विशेष बात है ! भगवान्‌ कहते हैं‒

जीविते कृतबुद्धिस्त्वं मा प्रतिज्ञां वृथा कृथाः ।

मत्कथाः प्रचरिष्यन्ति  यावल्लोके  हरीश्वर ॥

तावद्  रमस्व  सुप्रीतो  मद्वाक्यमनुपालयन् ।

एवमुक्तस्तु   हनुमान्‌  राघवेण   महात्मना ॥

वाक्यं   विज्ञापयामास  परं   हर्षमवाप  च ।

(वाल्मीकिउत्तर १०८/३३‒३५)

‘हरीश्वर ! तुमने दीर्घकालतक जीवित रहनेका निश्चय किया है । अपनी इस प्रतिज्ञाको व्यर्थ न करो । जबतक संसारमें मेरी कथाओंका प्रचार रहे, तबतक तुम भी मेरी आज्ञाका पालन करते हुए प्रसन्नतापूर्वक विचरते रहो । महात्मा श्रीरघुनाथजीके ऐसा कहनेपर हनुमान्‌जीको बड़ा हर्ष हुआ और वे इस प्रकार बोले‒’

यावत्‌ तव कथा  लोके  विचरिष्यति  पावनी ॥

तावत् स्थास्यामि मेदिन्यां तवाज्ञामनुपालयन् ।

(वाल्मीकि उत्तर १०८/३५-३६)

इसीलिये हनुमान्‌जीके लिये आया है‒‘राम चरित सुनिबे को रसिया ।’

एक बार भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न‒तीनों भाइयोंने माता सीताजीसे मिलकर विचार किया कि हनुमान्‌जी हमें रामजीकी सेवा करनेका मौका ही नहीं देते, पूरी सेवा अकेले ही किया करते हैं । अतः अब रामजीकी सेवाका पूरा काम हम ही करेंगे, हनुमान्‌जीके लिये कोई काम नहीं छोड़ेंगे । ऐसा विचार करके उन्होंने सेवाका पूरा काम आपसमें बाँट लिया । जब हनुमान्‌जी सेवाके लिये सामने आये, तब उनको रोक दिया और कहा कि आजसे प्रभुकी सेवा बाँट दी गयी है, आपके लिये कोई सेवा नहीं है । हनुमान्‌जीने देखा कि भगवान्‌के जम्हाई (जँभाई) आनेपर चुटकी बजानेकी सेवा किसीने भी नहीं ली है । अतः उन्होंने यही सेवा अपने हाथमें ले ली । यह सेवा किसीके खयालमें ही नहीं आयी थी ! हनुमान्‌जीमें प्रभुकी सेवा करनेकी लगन थी । जिसमें लगन होती है, उसको कोई-न-कोई सेवा मिल ही जाती है । अब हनुमान्‌जी दिनभर रामजीके सामने ही बैठे रहे और उनके मुखकी तरफ देखते रहे; क्योंकि रामजीको किस समय जम्हाई आ जाय, इसका क्या पता ? जब रात हुई, तब भी हनुमान्‌जी उसी तरह बैठे रहे । भरतादि सभी भाइयोंने हनुमान्‌जीसे कहा कि रातमें आप यहाँ नहीं बैठ सकते, अब आप चले जायँ । हनुमान्‌जी बोले कैसे चला जाऊँ ? रातको न जाने कब रामजीको जम्हाई आ जाय ! जब बहुत आग्रह किया, तब हनुमान्‌जी वहाँसे चले गये और छतपर जाकर बैठ गये । वहाँ बैठकर उन्होंने लगातार चुटकी बजाना शुरू कर दिया; क्योंकि रामजीको न जाने कब जम्हाई आ जाय ! यहाँ रामजीको ऐसी जम्हाई आयी कि उनका मुख खुला ही रह गया, बन्द हुआ ही नहीं ! यह देखकर सीताजी बड़ी व्याकुल हो गयीं कि न जाने रामजीको क्या हो गया है ! भरतादि सभी भाई आ गये । वैद्योंको बुलाया गया तो वे भी कुछ कर नहीं सके । वशिष्ठजी आये तो उनको आश्चर्य हुआ कि ऐसी चिन्ताजनक स्थितिमें हनुमान्‌जी दिखायी नहीं दे रहे हैं ! और सब तो यहाँ हैं, पर हनुमान्‌जी कहाँ है ? खोज करनेपर हनुमान्‌जी छतपर चुटकी बजाते हुए मिले । उनको बुलाया गया और वे रामजीके पास आये तो चुटकी बजाना बन्द करते ही रामजीका मुख स्वाभाविक स्थितिमें आ आया ! अब सबकी समझमें आया कि यह सब लीला हनुमान्‌जीकी चुटकी बजानेके कारण ही थी ! भगवान्‌ने यह लीला इसलिये की थी कि जैसे भूखेको अन्न देना ही चाहिये, ऐसे ही सेवाके लिये आतुर हनुमान्‌जीको सेवाका अवसर देना ही चाहिये, बन्द नहीं करना चाहिये । फिर भरतादि भाइयोंने ऐसा आग्रह नहीं रखा । तात्पर्य है कि संयोग-रति और वियोग-रति‒दोनोंमें ही हनुमान्‌जी भगवान्‌की सेवा करनेमें तत्पर रहते हैं ।

इस प्रकार हनुमान्‌जीका दास्य, सख्य, वात्सल्य तथा माधुर्य-भाव बहुत विलक्षण है ! इस कारण हनुमान्‌जीकी ऐसी विलक्षण महिमा है कि संसारमें भगवान्‌से भी अधिक उनका पूजन होता है । जहाँ भगवान्‌ श्रीरामके मन्दिर हैं, वहाँ तो उनके साथ हनुमान्‌जी विराजमान हैं ही, जहाँ भगवान्‌ श्रीरामके मन्दिर नहीं हैं, वहाँ भी हनुमान्‌जीके स्वतन्त्र मन्दिर हैं ! उनके मन्दिर प्रत्येक गाँव और शहरमें, जगह-जगह मिलते हैं । केवल भारतमें ही नहीं, प्रत्युत विदेशोंमें भी हनुमान्‌जीके अनेक मन्दिर हैं । इस प्रकार वे रामजीके साथ भी पूजित होते हैं और स्वतन्त्र रूपसे भी पूजित होते हैं । इसलिये कहा गया है‒

मोरे मन  प्रभु  अस  बिस्वासा ।

राम ते अधिक राम कर दासा ॥

(मानस ७/१२०/८)

भगवान्‌ शंकर कहते हैं‒

हनुमान्‌  सम  नहिं   बड़भागी ।

नहीं कोउ राम चरन अनुरागी ॥

गिरजा  जासु   प्रीति  सेवकाई ।

बार बार प्रभु  निज  मुख गाई ॥

(मानस ७/५०/४-५)

स्वयं भगवान्‌ श्रीराम हनुमान्‌जीसे कहते हैं‒

मदङ्गे  जीर्णतां  यातु   यत्   त्वयोपकृतं  कपे ।

नरः प्रत्युपकाराणामापत्स्वायाति पात्रताम् ॥

(वाल्मीकि उत्तर ४०/२४)

‘कपिश्रेष्ठ ! मैं तो यही चाहता हूँ कि तुमने जो-जो उपकार किये हैं, वे सब मेरे शरीरमें ही पच जायँ ! उनका बदला चुकानेका मुझे कभी अवसर न मिले; क्योंकि उपकारका बदला पानेका अवसर मनुष्यको आपत्तिकालमें ही मिलता है (मैं नहीं चाहता कि तुम कभी संकटमें पड़ो और मैं तुम्हारे उपकारका बदला चुकाऊँ) ।’

नारायण !     नारायण !!     नारायण !!!

‒ ‘कल्याण-पथ’ पुस्तकसे

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