(गत ब्लॉगसे आगेका)
उपर्युक्त चक्रका जो अनुवर्तन नहीं करता, इसके अनुसार नहीं चलता, उसके लिये भगवान्ने तीन विशेषण दिये हैं‒‘अधायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति ।’ ‘अघायु’कहनेका तात्पर्य यह है कि उसकी आयु, उसका जीवन निरा पापमय है । गोस्वामी श्रीतुलसीदासजीने भी कहा है‒‘जीवत जड़ नर परम अभागी’‒वे परम अभागे हैं । ‘जीवत सव सम चौदह प्रानी’‒वे जीते ही मुर्देके समान हैं जो भगवान्की दिशामें नहीं चलते । उनकी आयु अघरूप है । कहा है‒
पर निंदा पर द्रोह रत पर धन पर अपबाद ।
ते नर पाँवर पापमय देह धरे मनुजाद ॥
(मानस ७ । ३१)
ऐसे लोग नररूपमें राक्षस हैं । मनुष्यको खा जाय वह राक्षस । उनके लिये दूसरा विशेषण दिया है‒‘इन्द्रियाराम’ ।केवल इन्द्रियोंको सुख पहुँचाना‒भोग भोगना, सुस्वादु भोजन खाना, सुन्दर दृश्य देखना, कोमल वस्तुओंका स्पर्श करना, आलस्यसे सोना‒यही है‒इन्द्रियारामता । तीसरी बात कहते हैं‒‘मोघं पार्थ स जीवति’ वह संसारमें व्यर्थ ही जीता है । यह हुई सभ्यताकी भाषा । तात्पर्य है कि वह मर जाय तो अच्छा । उसका न जीना ही अच्छा है ।श्रीगोस्वामीजीने कह दिया‒‘कुंभकरन सम सोवत नीके’ यह तो सोया रहे तभी अच्छा । अभिप्राय यह कि ऐसे लोग पृथ्वीपर भाररूप ही हैं । पृथ्वीने कहा‒‘मुझे भार वनस्पतिका नहीं है, पहाड़ोंका नहीं है, मुझपर भार तो उसका है, जो भगवद्धक्तिसे हीन है, उसका मुझपर सदा भार है ।’‒‘भगवद्भक्तिहीनो यस्तस्य भारः सदा मम ।’ उपर्युक्त सृष्टिचक्रका जो अनुवर्तन नहीं करता, भगवान् कहते हैं‒उसका जीवन भाररूप है । सृष्टिचक्रका अनुवर्तन क्या है‒यह ऊपर बता ही दिया गया । निष्कामभावसे या भगवान्की पूजाके भावसे अपने कर्तव्यका तत्परतासे पालन करना ही सृष्टिचक्रका अनुवर्तन है । जिसका, जहाँ जो कर्तव्य-कर्म है,वह उस कर्मको करे । साथमें कर्तृत्वाभिमान न हो, ममता न हो, आसक्ति न हो, कामना न हो, पक्षपात न हो, विषमता न हो‒ये सब विषरूप हैं । सिंगीमोरा, संखिया, कुचिला,भिलावा आदि जो जहर हैं, उन्हें भी वैद्यलोग शुद्ध करके औषधरूपमें प्रयोग करते हैं, तब उनसे रोग दूर होते हैं । उनका जहर यदि बना रहे तो उससे मनुष्य मर जाता है । आसक्ति, कामना, पक्षपात, विषमता, अभिमान, स्वार्थ आदि सब कर्मोंमें जहररूप हैं । इस जहरके भागको निकाल देनेसे हमारे कर्म महान् अमृतमय होकर जन्म-मरणको मिटा देनेवाले बन जायेंगे । कैसी बढ़िया बात है ! गीता हमें यही सिखाती है !
नारायण ! नारायण !! नारायण !!!
‒‘जीवनोपयोगी कल्याण-मार्ग’ पुस्तकसे
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।। श्रीहरिः ।।
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इसलिये भगवान् कहते हैं‒
ॐतत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः ।
ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा ॥
(१७ । २३)
सबका मूल है परमात्मा, परमात्मासे प्रकट हुए वेद । वेदोंने बतायी क्रियाकी विधि । क्रियासे कर्म किया ब्राह्मणोंने अर्थात् प्रजाने । उन कर्मोंसे हुआ यज्ञ, उस यज्ञसे हुई वर्षा । वर्षासे हुआ अन्न; अन्नसे हुए प्राणी और उन्हीं प्राणियोंमेंसे मनुष्योंने यज्ञ किया । यज्ञ पशु-पक्षी तो करनेसे रहे । ये वृक्ष,घास और पहाड़‒यज्ञ थोड़े ही कर सकते हैं ? मनुष्य ही कर सकते हैं । इस प्रकार यह सृष्टिचक्र चल पड़ा । वह परमात्मा सर्वगत ब्रह्म नित्य यज्ञमें प्रतिष्ठित है । परमात्माकी सर्वगतताके विषयमें भगवान् कहते हैं‒
मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना ।
(गीता ९ । ४)
‘अव्यक्तरूपसे मैं सर्वत्र व्यास हूँ ।’
इसपर शंका होती है कि भगवान् जब सर्वगत हैं, तब उन्हें केवल यज्ञमें नित्य प्रतिष्ठित क्यों कहा ? क्या वे अन्यत्र नित्य प्रतिष्ठित नहीं हैं ? वे तो सभी जगह नित्य हैं । फिर यज्ञमें क्या विशेषता है ? इसका उत्तर यह है कि यज्ञमें परमात्मा प्राप्त होते हैं । जमीनमें सर्वत्र जल है, पर वह मिलता है कुएँमें, सब जगह नहीं मिलता । पाइपमें सब जगह जल भरा रहता है, पर वह मिलता है वहीं; जहाँ कल लगी होती है । सब जगह जल है नहीं, ऐसी बात हम थोड़े ही कह सकते हैं । पर सर्वत्र वह मिलता नहीं । इसीलिये सर्वगत ब्रह्मको यज्ञमें नित्य प्रतिष्ठित कहा गया है । यज्ञ कौन-सा ? कर्तव्य-कर्ममात्र, जो निष्कामभावसे किया जाय, वही ‘यज्ञ’ है ।
अब देखिये, यज्ञकी परिभाषा ध्यानमें आ गयी और उस यज्ञमें परमात्मा मिलते हैं‒यह बात भी समझमें आ गयी । उस यज्ञके विषयमें भगवान् कहते हैं‒
यज्ञशिष्टाशिन सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्विषैः ।
(गीता ३ । १३)
यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम् ।
(गीता ४ । ३१)
तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यक्षात्वा मोशसेऽशुभात् ।
(गीता ४ । १६)
इसलिये कोई परमात्माकी प्राप्ति करना चाहे तो वह यज्ञ करे । जो यज्ञ नहीं करता, उसके विषयमें भगवान् कहते हैं‒
एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः ।
अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति ॥
(गीता ३ । १६)
(शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒‘जीवनोपयोगी कल्याण-मार्ग’ पुस्तकसे
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।। श्रीहरिः ।।
(गत ब्लॉगसे आगेका)
तीसरे अध्यायके १०-११-१२ श्लोकमें भगवान् कहते हैं ‒
सहयज्ञा प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः ।
अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक् ॥
देवान् भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः ।
परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ ॥
इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः ।
तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः ॥
इस यज्ञसे वृद्धिको प्राप्त हो । यज्ञके द्वारा पूजित देवता तुम्हारी उन्नति करेंगे । अपने-अपने कर्तव्यद्वारा सृष्टिमात्रको सुख दो । इससे विश्वब्रह्माण्डका, प्राणिमात्रका हित होगा । स्वार्थ, ममता, आसक्ति छोड़कर कामना एवं कर्तृत्व-अभिमानका त्याग करके कर्तव्य-कर्म करनेसे सृष्टिमात्रको शान्ति मिलती है, सृष्टिमात्रका उद्धार होता है,कल्याण होता है, हित होता है । कितना बड़ा उपकार होता है केवल कामना छोड़नेसे । जो-जो कर्तव्य-कर्म करते हो, उसे किये जाओ; अकर्तव्य तो करो नहीं और कर्तव्य-कर्ममें कामना-आसक्ति न करो तो सारे संसारका हित होगा, सबका कल्याण होगा‒‘श्रेयः परमवाप्स्यथ ।’ जो दूसरोंको उनका हिस्सा न देकर अकेला खाता है वह चोर है‒‘स्तेन एव सः ।’
श्रीभगवान् कहते हैं‒
यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्विषैः ।
भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात् ॥
‘यज्ञशेष खानेवाले सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाते हैं और जो अपने लिये पकाते-कमाते हैं वे पापी पापका ही भक्षण करते हैं‒निरा पाप खाते हैं ।’ मनुष्यमें स्वार्थबुद्धि जितनी अधिक होगी, उतना ही बड़ा पापी वह होगा । एक बात और है । यज्ञ जो किया जाता है, उसमें होम मुख्य है‒आहुति देना मुख्य है ।
अग्नौ प्रास्ताहुतिः सम्यगादित्यमुपतिष्ठते ।
आदित्याज्जायते वृष्टिर्वृष्टेरन्नं ततः प्रजाः ॥
‘अग्निमें दी हुई आहुति सूर्यनारायणकी किरणोंको पुष्टि पहुँचाती है और वे किरणें पुष्ट होकर जल खींचती हैं तथा वह जल मेघ बनकर बरसता है । उस वर्षासे जगत्की तृप्ति होती है ।’ इससे भी यही बात प्रकट होती है । शुभ कर्म करनेसे देवताओंकी संतुष्टि होती है । आप यदि अपने माता-पिताकी आज्ञाको मानकर शुभ कर्म करेंगे तो इससे माता-पिता प्रसन्न होंगे ही । उनकी प्रसन्नता क्या सामान्य अर्थ रखती है ? वह बड़ी मूल्यवान् निधि है । इसी प्रकार यदि आप अपने शास्त्रोंकी मर्यादाका पालन करेंगे तो इससे क्या ऋषि-मुनि-देवता आपसे प्रसन्न नहीं होंगे ? यही है यज्ञके द्वारा उनका पूजन । उनका पूजन किस प्रकार होगा‒यह भी भगवान् बतलाते हैं‒
अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः ।
यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः ॥
प्राणी जितने भी पैदा होते हैं, वे अन्नसे होते हैं । अन्न होता है पर्जन्यसे‒वर्षासे और वर्षा यज्ञसे होती है । यज्ञ किससे होता है ? ‘यज्ञः कर्मसमुद्भवः ।’ यज्ञ कर्मसे निष्पन्न होता है । कर्म होता है वेदसे । वेद प्रकट होते हैं अक्षर परमात्मासे ।
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।। श्रीहरिः ।।
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इसका उत्तर यही है कि यहाँ उस यज्ञकी बात नहीं है,जिसमें सबका अधिकार नहीं । यहाँ ‘यज्ञ’ का व्यापक अर्थ‒‘कर्तव्यकर्म’ लेना चाहिये । ‘यज्ञ’ का इसी अर्थमें प्रयोग समझना चाहिये । ‘स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य’ द्वारा भगवान्ने आगे चलकर यही बताया है कि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र‒सभी अपने-अपने कर्मद्वारा उनका पूजन करें । इसी कर्तव्य-कर्मरूप यज्ञके साथ प्रजाकी सृष्टि करके प्रजापतिने कहा‒इसके द्वारा तुम सबकी वृद्धि करो और यही तुम्हारी इष्ट कामनाकी पूर्ति करनेवाला हो‒
सहयज्ञा प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः ।
अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक् ॥
परंतु साथ ही भगवान् कहते हैं‒‘इष्टकामनाके साथ अपना सम्बन्ध मत जोड़ो । तुम यज्ञके द्वारा देवताओंका पूजन करो ।’ जैसे गीता अध्याय २ श्लोक ४५ में भगवान् अर्जुनको ‘निर्योगक्षेम आत्मवान्’ बननेको कहते हैं और ९वें अध्यायके २२वेंमें कहते हैं‒‘योगक्षेमं वहाम्यहम्’ ‘तुम्हारे योगक्षेमका वहन मैं करूँगा, तू उसकी चिन्ता छोड़ दे ।’ इसी प्रकार यहाँ भी वे कहते हैं‒‘देवताओंका तुम पूजन करो, पर देवताओंसे कुछ चाहो मत । देवता तुम्हारा काम करें, पर यह तुम उनसे चाहो मत ।’ चाहनेसे सम्बन्ध जुड़ जाता है । चाहयुक्त कर्म हो जाता है ‘तुच्छ’ । उदाहरणके लिये‒गीताका विवेचन किया हमने, भिक्षा दे दी आपने, दोनोंका काम हो गया । पर गीताका विवेचन किया हमने और उसके साथ यह स्वार्थका सम्बन्ध जोड़ लिया कि गीताकी बात सुनानेसे हमें रोटी मिल जायगी तो हमारा यह काम तुच्छ हो जायगा । किसी भी क्रियाके साथ स्वार्थका सम्बन्ध जोड़ लेनेसे वह क्रिया तुच्छ हो जाती है, निकृष्ट हो जाती है, बन्धनकारक हो जाती है । कोई पूछे‒‘परम श्रेय कैसे होगा ?’ उत्तर है‒‘अपने कर्तव्यका पालन करो, परंतु लोकहितके लिये । उससे अपने स्वार्थका सम्बन्ध मत जोड़ो ।’
क्या बतायें सज्जनो ! आप सब काम करते हैं । घरोंमें बहनें, माताएँ, भाई, बच्चे, छोटे-बड़े सब काम करते हैं; परंतु बड़ी भारी भूल होती है यह कि आसक्ति, कामना और स्वार्थके साथ हमलोग सम्बन्ध जोड़ लेते हैं; किंतु उससे लाभ कुछ नहीं होता । लौकिक लाभ भी नहीं होता; फिर अलौकिककी तो बात ही क्या । इच्छावालेको लोग अच्छा भी नहीं कहते । कहते हैं‒‘अमुक बड़ा स्वार्थी है, पेटू है, चट्टू है ।’ उसके चाहनेपर हम कौन-सा अधिक दे देंगे ? उलटा कम देंगे । स्वार्थका सम्बन्ध रखनेवालेको अधिक देना कोई नहीं चाहता । किसी साधु-ब्राह्मणको कुछ देंगे तो त्यागी देखकर ही देंगे या भोगी-रागी समझकर देंगे ? घरमें भी रागीसे, भोगीसे वस्तु छिपायी जाती है । जो रागी नहीं होगा, उसके सामने वस्तु बेरोक-टोक आयेगी । रागीको वस्तु मिलनेमें भी बाधा लगेगी और कल्याणमें तो महती बाधा लगेगी ही । इसके विपरीत अपना कर्तव्य समझकर सेवा करोगे तो सेवा तो मूल्यवती होगी और वस्तु अनायासमें मिलेगी । आराम मुफ्तमें मिलेगा । मान-सत्कार-बड़ाई मुफ्तमें मिलेगी । पर चाहोगे तो फँस जाओगे । यह बात गीता ग्रन्थि खोलकर बताती है । तुम जो काम करो, इस रीतिसे करो ।
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यह मनुष्य चाहे तो भगवान्का माँ-बाप बन जाय,भगवान्का दास बन जाय, भगवान्का भाई-बन्धु बन जाय,भगवान्की स्त्री बन जाय, भगवान्का बच्चा बन जाय,भगवान्का शिष्य बन जाय या गुरु बन जाय । अपने कुटुम्बसे ही तो आप राजी होते हैं । भगवान्का सम्पूर्ण यह मनुष्य बन सकता है । यह भगवान्का सब कुछ बन सकता है । भगवान् उसे वही बना लेंगे और वैसी-की-वैसी मर्यादा उसके साथ निभायेंगे । वे उसके सुपुत्र बन जायँगे । भाई भी बनेंगे तो असली । सुपुत्र-सत्पति-सन्माता सब कुछ बन जायेंगे भगवान् । शिष्य बने तो श्रेष्ठ चेला बनेंगे भगवान् । वसिष्ठजीके चेला श्रीराम थे ही । विश्वामित्रजीका चरण वे चाँपते ही थे । वे जहाँ जो भी बनते हैं, स्वाँग पूरा उतारते हैं । भगवान्का सब कुछ मनुष्य बन सकता है, इतना बड़ा अधिकार मनुष्यको भगवान्ने दिया है ।
अब उसके लिये कहते हैं‒‘यज्ञार्थात् कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः ।’ इसके पूर्व ८वें श्लोकमें कहा‒‘नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः ।’ ‘नियत कर्म कर और न करनेकी अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है ।’ ‘अकर्मणः ते शरीरयात्रापि न प्रसिद्धज्ञेत् ।’ ‘कुछ नहीं करेगा तो तेरा निर्वाह भी नहीं होगा, जीवन भी नहीं चलेगा । कर्म करनेसे ही जीवन-निर्वाह होगा ।’ साथ ही शास्त्रोंमें यह भी कहा है कि कर्मोंसे जन्तु बँधता है । ‘कर्मणा बध्यते जन्तुर्विद्यया च विमुव्यते ।’ यह ध्यान देनेकी बात है कि यहाँ ‘जन्तु’ शब्दका प्रयोग हुआ है । ‘जन्तु’ शब्दका स्वारस्य यह है कि जन्तु (जानवर) ही बन्धनमें आते हैं, मनुष्य नहीं । मनुष्य बँधता है सकाम कर्म करके, स्वार्थबुद्धिसे । ऐसे मनुष्यको जन्तु ही समझें । गीता भी कहती है‒‘अज्ञानेनावृत ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः ।’ जो स्वार्थबुद्धिसे प्रेरित होकर मोहमें फँसे हुए हैं, वे मनुष्य थोड़े ही हैं, वे तो जन्तु हैं‒भले ही उनकी आकृति मनुष्यकी-सी ही हो । ‘यद् यद्धि कुरुते जन्तुस्तत् तत् कामस्य चेष्टितम् ।’ जानवरकी सारी चेष्टाएँ कामयुक्त‒स्वार्थप्रेरित होती हैं । कामनासे ही कर्म बन्धनकारक होता है ।
इसलिये भगवान् कह हैं‒
यज्ञार्थात् कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः ।
जो कर्म परमात्माकी प्रसन्नताके लिये, लोकसंग्रहके लिये, सब लोगोंके उद्धारके लिये, आसक्ति, स्वार्थ और कामनाको त्यागकर किया जाता है, वह बाँधता नहीं है । यही है ‘यज्ञ’ ।
इसके अगले श्लोकमें भगवान् कहते हैं‒‘सहयज्ञा प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः ।’ सृष्टिके आदिमें प्रजापति ब्रह्माने यज्ञोंके साथ प्रजाओंको उत्पन्न किया । यहाँ ‘प्रजाः’शब्दके अन्तर्गत ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र-सभी आ जाते हैं । ‘प्रजाः’ शब्दके साथ ‘सहयज्ञाः’ विशेषणको देखकर यह शंका होती है कि यज्ञमें सबका अधिकार तो है नहीं, फिर भगवान्ने सारे प्रजाजनोंके साथ यह विशेषण क्यों लगाया ?
(शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒‘जीवनोपयोगी कल्याण-मार्ग’ पुस्तकसे
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