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।। श्रीहरिः ।।

 


  आजकी शुभ तिथि–
वैशाख कृष्ण प्रतिपदा, वि.सं.-२०८०, शुक्रवार
तू-ही-तू



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(७)

सब कुछ भगवान्‌ ही हैं‒इसका अनुभव करनेके तीन चरण हैं, जो क्रमशः इस प्रकार हैं‒

१.   सब कुछ भगवान्‌का ही है ।

२.   सब कुछ भगवान्‌ ही हैं ।

३.  भगवान्‌के सिवाय कभी कुछ हुआ ही नहीं ।

देखने-सुननेमें जो कुछ आता है, वह सब मिलने और बिछुड़नेवाला है । जो मिला है, वह बिछुड़ जायगा‒इसमें किंचिन्मात्र भी सन्देह नहीं है । अनन्त ब्रह्माण्डोंमें तिल-जितनी कोई वस्तु भी हमारी नहीं है । जो कुछ देखने-सुननेमें आता है, वह सब अपरा प्रकृति है, जो भगवान्‌की है । भगवान्‌ने अपरा प्रकृतिको भी ‘मेरी प्रकृति’ कहा है‒‘अहङ्कार इतीयं मे भिन्‍ना प्रकृतिरष्‍टधा’ (गीता ७ । ४) और परा प्रकृतिको भी ‘मेरी प्रकृति’ कहा है‒‘प्रकृतिं विद्धि मे पराम्’ (गीता ७ । ५) । फिर हमारी क्या वस्तु हुई ? सब कुछ भगवान्‌का ही हुआ ! अतः जो कुछ दीखता है, वह हमारा नहीं है, प्रत्युत भगवान्‌का है‒यह दृढ़तासे स्वीकार कर लें तो हमारा साधन शुरू हो जायगा । जबतक हम मिले हुएको अपना मानते रहेंगे, तबतक साधन शुरू नहीं होगा । मिले हुएको अपना मानते रहनेसे न तो विवेक दृढ़ होता है और न विश्‍वास ही दृढ़ होता है । इसलिये सन्तोंने, भक्तोंने कभी संसारको अपना नहीं माना, प्रत्युत केवल भगवान्‌को ही अपना माना‒‘मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई’ । ‘मैं’ भी हमारा नहीं है, प्रत्युत भगवान्‌का ही है । शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, प्राण आदि सब भगवान्‌के ही हैं ।

मेरा कुछ नहीं है, सब कुछ भगवान्‌का ही है‒इस सत्यकी स्वीकृति होते ही ‘सब कुछ भगवान्‌ ही हैं’‒यह सत्य प्रकट हो जायगा । कारण कि यह जगत्‌ केवल जीवकी कल्पना है । जगत्‌ न तो महात्माकी दृष्‍टिमें है और न परमात्माकी दृष्‍टिमें हैं, प्रत्युत जीवात्माकी दृष्‍टिमें है । महात्माकी दृष्‍टिमें सब कुछ भगवान्‌ ही हैं‒‘वासुदेवः सर्वम्’ (गीता ७ । १९) । भगवान्‌की दृष्‍टिमें सत्‌-असत्‌ सब कुछ वे ही हैं‒‘सदसच्‍चाहमर्जुन’ (गीता ९ । १९) । परन्तु जीवने अपने राग-द्वेषके कारण जगत्‌को अपनी बुद्धिमें धारण कर रखा है‒‘ययेदं धार्यते जगत्‌’ (गीता ७ । ५) । वास्तवमें जगत्‌का नामोनिशान भी नहीं है । सम्पूर्ण देश, काल, वस्तु, व्यक्ति, अवस्था, घटना, परिस्थिति आदिमें केवल भगवान्‌-ही-भगवान्‌ परिपूर्ण हैं । अगर यह बात हमारी समझमें नहीं आती तो हमारी समझमें कमी है, तत्त्वमें कमी नहीं है । भले ही हमारी समझमें न आये, पर सच्‍ची बात सच्‍ची ही रहेगी, झूठी कैसे हो जायगी ? साधक कुछ भी करे, अन्तमें उसे सच्‍ची बातको स्वीकार करना ही पड़ेगा ।

‘वासुदेवः सर्वम्’ का अनुभव होनेके बाद फिर ‘सर्वम्’ भी नहीं रहता, प्रत्युत केवल ‘वासुदेवः’ रह जाता है । इसीको श्रीमद्भागवतमें ‘आत्यन्तिक प्रलय’ कहा गया है (१२ । ४ । २३‒३४) और इसीको गोस्वामी तुलसीदासजी महाराजने ‘परम विश्राम’ कहा है‒‘पायो परम बिश्रामु’ (मानस, उत्तर १३० । ३) । जैसे, जबतक गेहूँकी खेती रहती है, तबतक पत्ती-डंठल दीखते हैं । अन्तमें पत्ती-डंठल नहीं रहते, केवल गेहूँ रह जाता है । तात्पर्य यह हुआ कि केवल वासुदेव-ही-वासुदेव विद्यमान है । अन्य कुछ है ही नहीं, कभी हुआ ही नहीं, कभी होगा ही नहीं, कभी हो सकता ही नहीं । इससे सिद्ध हुआ कि एक परमात्माके सिवाय कोई चीज कभी पैदा हुई ही नहीं ! इस स्थितिका वर्णन नहीं हो सकता; क्योंकि वर्णन करनेवाला कोई (व्यक्ति) रहता ही नहीं !

भगवान्‌ कहते हैं‒

सर्वं ब्रह्मात्मकं तस्य विद्ययाऽऽत्ममनीषया ।

परिपश्यन्‍नुपरमेत्    सर्वतो    मुक्तसंशयः ॥

(श्रीमद्भा ११ । २९ । १८)

‘जब सबमें परमात्मबुद्धि की जाती है, तब सब कुछ परमात्मा ही हैं‒ऐसा दीखने लगता है । फिर इस परमात्मदृष्‍टिसे भी उपराम होनेपर सम्पूर्ण संशय स्वतः निवृत्त हो जाते हैं ।’

‘उपरमेत्’ पदका तात्पर्य है कि साधक ‘सब कुछ भगवान्‌ ही हैं’‒इस वृत्तिसे भी उपराम हो जाता है, इस वृत्तिको भी छोड़ देता है; क्योंकि उसकी दृष्‍टिमें ‘सब कुछ’ रहता ही नहीं । इसलिये वृत्ति छूटनेपर एक भगवान्‌ ही रह जाते हैं । तात्पर्य है कि भक्त सर्वत्र परिपूर्ण भगवान्‌के शरणागत होकर अपने-आपको भी भगवान्‌में ही लीन कर देता है । फिर शरणागत नहीं रहता, केवल शरण्य रह जाते हैं । ‘मैं’ नहीं रहता, केवल भगवान्‌ रह जाते हैं । यही असली शरणागति है । ऐसी शरणागतिके बाद फिर परमप्रेमकी प्राप्‍ति होती है‒‘मद्भक्तिं लभते पराम्’ (गीता १८ । ५४) । भगवान्‌ अपनी इच्छासे प्रेमलीलाके लिये एकसे दो हो जाते हैं‒

द्वैतं   मोहाय   बोधात्प्राग्जाते    बोधे    मनीषया ।

भक्त्यर्थं कल्पितं (स्वीकृतं) द्वैतमद्वैतादपि सुन्दरम् ॥

(बोधसार, भक्ति ४२)

‘तत्त्वबोधसे पहलेका द्वैत तो मोहमें डालता है, पर बोध हो जानेपर भक्तिके लिये स्वीकृत द्वैत अद्वैतसे भी अधिक सुन्दर होता है ।’

भगवान्‌की इच्छासे होनेवाला यह प्रेम प्रतिक्षण वर्धमान होता है । इसलिये कभी भक्त और भगवान्‌ एक हो जाते हैं और कभी दो हो जाते हैं । प्रेममें यह मिलना और अलग होना (मिलन और विरह) भगवान्‌की इच्छासे ही होता है, भक्तकी इच्छासे नहीं । इस प्रेमकी माँग मुक्त महापुरुषोंमें भी देखी जाती है । कारण कि योग और बोधकी प्राप्‍ति होनेपर तो सूक्ष्म अहम्‌ रहता है[*], पर प्रेमकी प्राप्‍ति होनेपर इस सूक्ष्म अहम्‌‌का भी सर्वथा अभाव हो जाता है । तभी कहा है‒

प्रेम भगति जल बिनु रघुराई ।

अभिअंतर मल कबहुँ न जाई ॥

(मानस, उत्तर ४९ । ३)

उपसंहार

यह जगत्‌ भगवान्‌का आदि अवतार है‒‘आद्योऽवतारः पुरुषः परस्य’ (श्रीमद्भा २ । ६ । ४१) । एक परमात्मा ही अनेकरूप बन जाते हैं और फिर अनेकरूपका त्याग करके एकरूप हो जाते हैं । अनेकरूपसे होनेपर भी वे एक ही रहते हैं । वे एक रहें या अनेक हो जायँ, यह उनकी मरजी है, उनकी लीला है । एक सोनेके सैकड़ों गहने बन जायँ और फिर गहने पुनः सोना हो जायँ अथवा एक खाँड़के सैकड़ों खिलौने बन जायँ और फिर खिलौने पुनः खाँड़ हो जायँ, फर्क क्या पड़ा ? ऐसे ही भगवान्‌ कुछ भी बन जायँ, फर्क क्या पड़ा ? तत्त्व एक ही है और एक ही रहेगा । उस एक तत्त्वके सिवाय कभी कुछ हुआ नहीं, है नहीं, होगा नहीं, हो सकता ही नहीं । एकमात्र भगवान्‌ ही थे, भगवान्‌ ही हैं और भगवान्‌ ही रहेंगे । वे एक ही भगवान्‌ प्रेमी और प्रेमास्पदका रूप धारण करके प्रेमकी लीला करते हैं । उस प्रतिक्षण वर्धमान परमप्रेमकी प्राप्‍तिमें ही मानवजीवनकी पूर्णता है ।

नारायण !   नारायण !   नारायण !   नारायण !

 

हे  जग  के  करतार   तेरी   कहा   अस्तुति  कीजै ।

तू  ही  एक  अनेक  भयो  है, अपनी  इच्छा  धार ॥

तू  ही  सिरजै  तू  ही  पालै,   तू   ही  करै  सँहार ।

जित  देखूँ   तित  तू-ही-तू  है,   तेरा  रूप  अपार ॥

तू ही राम,  नारायण  तू  ही, तू  ही  कृष्ण  मुरार ।

साधौं  की  रक्षाके  कारण,   युग  युग  ले  औतार ॥

तू ही आदि अरु मध्य तुही  है, अन्त तेरा उजियार ।

दानव  देव  तुही  सूँ  प्रकटे,  तीन  लोक  विस्तार ॥

जल थलमें व्यापक है  तू  ही,  घट-घट बोलनहार ।

तो बिन  और कौन  है  ऐसो,  जासों  करों पुकार ॥

तू ही चतुर शिरोमणि है प्रभु, तू ही पतित उधार ।

चरणदास शुकदेव  तुही  है,  जीवन  प्राण अधार ॥



[*] यह सूक्ष्म अहम्‌ जन्म-मरण देनेवाला तो नहीं होता, पर मतभेद पैदा करनेवाला होता है । इस सूक्ष्म अहम्‌‌के कारण ही आचार्योंमें तथा उनके दर्शनोंमें मतभेद रहता है ।



।। श्रीहरिः ।।



  आजकी शुभ तिथि–
चैत्र पूर्णिमा, वि.सं.-२०८०, गुरुवार
तू-ही-तू



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(५)

शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धिसे जो भी सात्त्विक, राजस और तामस भाव, क्रिया, पदार्थ आदि ग्रहण किये जाते हैं, वे सब भगवान्‌ ही हैं । मनकी स्फुरणामात्र भगवान्‌ ही हैं । संसारमें अच्छा-बुरा, शुद्ध-अशुद्ध, शत्रु-मित्र, दुष्‍ट-सज्जन, पापात्मा-पुण्यात्मा आदि जो कुछ भी देखने, सुनने, कहने, सोचने, समझने आदिमें आता है, वह सब-का-सब केवल भगवान्‌ ही हैं । शरीर-शरीरी, क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ, अपरा-परा, क्षर-अक्षर आदि सब केवल भगवान्‌ ही हैं । जब सब कुछ भगवान् ही हैं तो फिर उसमें ‘मैं’ कहाँसे आये ? ‘मैं’ है ही नहीं, केवल तू-ही-तू है‒

तू तू करता तू भया,   मुझमें  रही न हूँ ।

वारी फेरी बलि गई, जित देखूँ तित तू ॥

अब भगवान्‌की प्राप्‍तिमें देरी किस बातकी है ? भगवत्प्राप्‍ति तत्काल होनेवाली वस्तु है । मान लो कि हम एक नदीको देख रहे हैं । किसी जानकार व्यक्तिने हमारेसे कहा कि यह नदी गंगाजी हैं । यह सुनते ही हमारी भावना बदल गयी, दृष्‍टि बदल गयी । इसमें देरी क्या लगी ? परिश्रम (अभ्यास) क्या करना पड़ा ? किस क्रिया और पदार्थकी आवश्यकता पड़ी ? सब कुछ भगवान्‌ ही हैं‒इस वास्तविक बातको स्वीकार करनेके लिये न कोई ग्रन्थ पढ़ना है, न कोई ध्यान करना है, न कोई चिन्तन करना है, न श्रवण-मनन-निदिध्यासन करना है, न आँख मीचनी है, न कान मूँदने हैं, न नाक दबानी है, न जंगलमें जाना है, न गुफामें जाना है, न हिमालयमें जाना है ! अपनी सत्ताको भी अलग न रखकर भगवान्‌में मिला देना है । ‘मैं’ और ‘मेरा’ को छोड़कर ‘तू’ और ‘तेरा’ को स्वीकार करना है । फिर ‘तेरा’ भी न रहे, प्रत्युत तू-ही-तू रह जाय । ‘मैं’ की जगह भी केवल भगवान्‌ ही रह जायँ !

यह सिद्धान्त है कि जो वस्तु सब समयमें मौजूद होती है, उसकी प्राप्‍तिके लिये भविष्यकी अपेक्षा नहीं होती और जो वस्तु सब जगह मौजूद होती है, उसकी प्राप्‍ति किसी क्रिया तथा पदार्थसे नहीं होती । कहीं जानेसे जो परमात्मा मिलेंगे, वे ही परमात्मा जहाँ हम हैं, वहाँ पूरे-के-पूरे हैं । कहीं जानेकी, कुछ बदलनेकी जरूरत नहीं है । केवल मन बदलनेकी जरूरत है । उनकी प्राप्‍तिकी सच्‍ची चाहना होनी चाहिये । उनकी प्राप्‍ति केवल इच्छामात्रसे होती है । जो केवल परमात्माकी प्राप्‍ति चाहता है, उसको तत्काल प्राप्‍ति होती है । देरी उसको लगती है, जिसको इच्छाकी कमीके कारण देरी सह्य है ।

जो वस्तु दूर हो, उसकी प्राप्‍तिके लिये मार्ग होता है । जो वस्तु सर्वव्यापक हो, सब जगह परिपूर्ण हो, उसकी प्राप्‍तिके लिये मार्ग नहीं होता । उसकी प्राप्‍ति केवल चाहनासे होती है । चाहनामात्रसे केवल परमात्मा ही मिलते हैं, और कोई वस्तु नहीं मिलती । परमात्मा अद्वितीय हैं तो उनकी चाहना भी अद्वितीय होनी चाहिये । संसारकी प्राप्‍ति चाहनेमात्रसे नहीं होती । संसारकी प्राप्‍ति ‘करने’ से होती है, परमात्माकी प्राप्‍ति ‘न करने’ से होती है ।

मूलमें साधकके भीतर परमात्माकी लालसा होनी चाहिये । अगर भीतरसे संसार अच्छा लगता है, संसारकी लालसा है तो परमात्मप्राप्‍ति नहीं हो सकती । जैसे जिसके भीतर प्यास होती है, उसीको जल दीखता है, ऐसे ही जिसके भीतर संसारकी प्यास (लालसा) है, उसको संसार दीखता है और जिसके भीतर परमात्माकी प्यास है, उसको परमात्मा दीखते हैं । प्यास न हो तो वस्तु सामने रहते हुए भी नहीं दीखती । परमात्माकी प्यास हो तो जगत्‌ लुप्‍त हो जाता है और जगत्‌की प्यास हो तो परमात्मा लुप्‍त हो जाते हैं । जिसके भीतर जगत्‌की प्यास है, वह जगत्‌का निर्माण कर लेता है‒‘ययेदं धार्यते जगत्‌’ (गीता ७ । ५) और जिसके भीतर परमात्माकी प्यास है, वह परमात्माकी खोज कर लेता है‒‘ततः पदं तत्परिमार्गितव्यम्’ (गीता १५ । ४) । जगत्‌की प्यास होनेसे जगत्‌ न होते हुए भी मृगमरीचिकाकी तरह दीखने लग जाता है और परमात्माकी प्यास होनेसे परमात्मा न दीखनेपर भी दीखने लग जाता है । परमात्माकी प्यास जाग्रत्‌ होनेपर साधकको भूतकालका चिन्तन नहीं होता, भविष्यकी आशा नहीं रहती और वर्तमानमें उसको प्राप्‍त किये बिना चैन नहीं पड़ता ।

(६)

अपरा, परा और परमात्मा‒इन तीनोंमें अपरा और परा तो जाननेका विषय है, पर परमात्मा जाननेका विषय नहीं हैं, प्रत्युत माननेका विषय हैं । उनको माना ही जा सकता है, जाना नहीं जा सकता । रचना अपने रचयिताको कैसे जान सकती है ? कार्य अपने कारणको कैसे जान सकता है ? इसलिये गीतामें भगवान्‌ने कहा है‒

वेदाहं  समतीतानि    वर्तमानानि   चार्जुन ।

भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्‍चन ॥

(७ । २६)

‘हे अर्जुन ! जो प्राणी भूतकालमें हो चुके हैं तथा जो वर्तमानमें हैं और जो भविष्यमें होंगे, उन सब प्राणियोंको तो मैं जानता हूँ, पर मुझे कोई भी नहीं जानता ।’

न मे विदुः सुरगणाः   प्रभवं न महर्षयः ।

अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वशः ॥

(१० । २)

‘मेरे प्रकट होनेको न देवता जानते हैं और न महर्षि; क्योंकि मैं सब प्रकारसे देवताओं और महर्षियोंका आदि हूँ ।’

जैसे अपने माता-पिताको हम जान नहीं सकते, प्रत्युत मान ही सकते हैं; क्योंकि जन्म लेते समय हमने उनको देखा ही नहीं; देखना सम्भव ही नहीं । ऐसे ही परमात्माको भी हम जान नहीं सकते, प्रत्युत मान ही सकते हैं । माताकी अपेक्षा भी पिताको जानना सर्वथा असम्भव है; क्योंकि मातासे जन्म लेते समय तो हमारा शरीर बन चुका था, पर पितासे जन्म लेते समय हमारी (शरीरकी) सत्ता ही नहीं थी ! भगवान्‌ सम्पूर्ण संसारके पिता हैं‒‘अहं बीजप्रदः पिता’ (गीता १४ । ४), ‘पिताहमस्य जगतः’ (गीता ९ । १७), पितासि लोकस्य चराचरस्य’ (गीता ११ । ४३), ‘ममैवांशो जीवलोके’ (गीता १५ । ७) । इसलिये परमात्माको माना ही जा सकता है । उनको जानना सर्वथा असम्भव है । जैसे, माता-पिताको माने बिना हम रह सकते ही नहीं । अगर हम अपनी (शरीरकी) सत्ता मानते हैं तो माता-पिताकी सत्ता माननी ही पड़ेगी । ऐसे ही परमात्माको माने बिना हम रह सकते ही नहीं । अगर हम अपनी सत्ता (होनापन) मानते हैं तो परमात्माकी सत्ता माननी ही पड़ेगी । कारणके बिना कार्य कहाँसे आया ? परमात्माके बिना हम स्वयं कहाँसे आये ? जैसे ‘हम नहीं हैं’‒इस तरह अपने होनेपनका कोई निषेध या खण्डन नहीं कर सकता, ऐसे ही ‘परमात्मा नहीं हैं’‒इस तरह परमात्माके होनेपनका भी कोई निषेध या खण्डन नहीं कर सकता ।

सब कुछ भगवान्‌ ही हैं‒यह मान ही सकते हैं, जान नहीं सकते; क्योंकि यह समझके अन्तर्गत नहीं आता, प्रत्युत समझ (बुद्धि) इसके अन्तर्गत आती है ।



।। श्रीहरिः ।।



  आजकी शुभ तिथि–
चैत्र शुक्ल चतुर्दशी, वि.सं.-२०८०, बुधवार
तू-ही-तू





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भगवान्‌ सत्ययुगमें सत्ययुगकी लीला करते हैं, कलियुगमें कलियुगकी लीला करते हैं । कोई पाप, अन्याय करता हुआ दीखे तो समझना चाहिये कि भगवान्‌ कलियुगकी लीला कर रहे हैं । वे कोई भी रूप धारण करके कैसी ही लीला करें, हमारी दृष्‍टि उनको छोड़कर कहीं जानी ही नहीं चाहिये । भगवान्‌ कहते हैं‒

यो मां पश्यति सर्वत्र  सर्वं च मयि पश्यति ।

तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ॥

(गीता ६ । ३०)

‘जो सबमें मुझे देखता है और मुझमें सबको देखता है, उसके लिये मैं अदृश्य नहीं होता और वह मेरे लिये अदृश्य नहीं होता ।’

जैसे सब जगह बर्फ-ही-बर्फ पड़ी हो तो बर्फ कैसे छिपेगी ? बर्फके पीछे बर्फ रखनेपर भी बर्फ ही दीखेगी ! ऐसे ही जब सब रूपोंमें भगवान्‌ ही हों तो भगवान्‌ कैसे छिपेंगे ? कहाँ छिपेंगे ? किसके पीछे छिपेंगे ? तात्पर्य है कि एक परमात्मा-ही-परमात्मा परिपूर्ण हैं । उस परमात्मामें न मैं है, न तू है, न यह है, न वह है । न भूत है, न भविष्य है, न वर्तमान है । न सर्ग-महासर्ग है, न प्रलय-महाप्रलय है । न देवता है, न मनुष्य है, न राक्षस है । न पशु है, न पक्षी है । न प्रेत है, न पिशाच है । न जड़ है, न चेतन है । न स्थावर है, न जंगम है । एक परमात्माके सिवाय कुछ भी नहीं है । वे एक ही अनेक रूपोंमें बने हुए हैं । वे एक ही अनन्त रूपोंमें भासित हो रहे हैं ।

(४)

सब कुछ भगवान्‌ ही हैं‒यह बात हमें दीखे चाहे न दीखे, हमारे जाननेमें आये चाहे न आये, हमारे अनुभवमें आये चाहे न आये, पर हम दृढ़तासे इस बातको स्वीकार कर लें कि वास्तवमें बात यही सच्‍ची है । कमी है तो हमारे माननेमें कमी है, वास्तविकतामें कमी नहीं है । सब कुछ भगवान्‌ ही हैं‒ऐसा अनुभव करनेके लिये क्रिया और पदार्थकी आवश्यकता नहीं है, प्रत्युत केवल भावकी आवश्यकता है । हमें केवल अपनी भावना बदलनी है । जब साधककी अन्तर्वृत्ति हो, तब एक भगवान्‌के सिवाय कुछ नहीं है और जब साधककी बाह्यवृति हो, तब जो कुछ दीखे, वह भगवान्‌की ही लीला है !

भगवान्‌की अपरा प्रकृतिके सम्मुख होनेसे ही हमारी भगवान्‌से विमुखता हो गयी है । अगर हम अपरासे विमुख हो जायँ और जिसकी अपरा प्रकृति है, उसके (भगवान्‌के) सम्मुख हो जायँ तो वास्तविकताका अनुभव हो जायगा‒‘मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते’ (गीता ७ । १४) ।

भगवान्‌ कहते हैं‒

ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्‍च ये ।

मत्त एवेति तान्विद्धि   न  त्वहं  तेषु  ते मयि ॥

(गीता ७ । १२)

‘जितने भी सात्त्विक भाव हैं और जितने भी राजस तथा तामस भाव हैं, वे सब मुझमें ही रहते हैं‒ऐसा समझो । परन्तु मैं उनमें और वे मुझमें नहीं हैं ।

‘न त्वहं तेषु ते मयि’ कहनेका तात्पर्य है कि तुम गुणोंमें उलझो मत । भगवान्‌ तो सबमें ही हैं । वे गुणोंमें भी हैं । पर गुणोंमें उलझनेसे हम उनसे दूर हो जाते हैं । यदि हम भगवान्‌को सत्ता और महत्ता न देकर गुणोंको सत्ता और महत्ता देंगे तो हम जन्म-मरणमें चले जायँगे‒‘कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु’ (गीता १३ । २१) जैसे, गेहूँके खेतमें गेहूँ ही मुख्य होता है, पत्ती-डंठल नहीं । गेहूँके पौधेमें जड़ तामस है, डंठल राजस है, सिट्टा सात्त्विक है और गेहूँ (दाना) गुणातीत है । किसानका उद्देश्य केवल गेहूँको प्राप्‍त करनेका ही होता है । गेहूँको प्राप्‍त करनेके लिये ही वह सारी मेहनत करता है, खेतीमें जल-खाद आदि डालता है । गेहूँ प्राप्‍त होनेके बाद उसका पत्ती-डंठलसे कोई मतलब नहीं रहता; क्योंकि उसकी दृष्‍टिमें पत्ती-डंठलका कोई महत्त्व नहीं है । इसी तरह साधकका उद्देश्य भी केवल भगवान्‌का ही होता है, सात्त्विक-राजस-तामस तीनों गुणोंका नहीं । जैसे गेहूँसे पैदा होनेपर भी पत्ती-डंठलसे किसानका कोई प्रयोजन नहीं होता, ऐसे ही भगवान्‌से उत्पन्‍न होनेपर भी सात्त्विक-राजस-तामस भावोंसे साधकका कोई प्रयोजन नहीं होता ।

जैसे बालक मिट्टीका खिलौना चाहता है तो पिताजी रुपये खर्च करके भी उसके लिये मिट्टीका खिलौना लाकर देते हैं । ऐसे ही हम संसारको चाहते हैं तो भगवान्‌ संसाररूपमें हमारे सामने आ जाते हैं । हम शरीर बनते हैं तो भगवान्‌ विश्‍व बन जाते हैं । शरीर बननेके बाद फिर विश्‍वसे भिन्‍न कुछ भी जाननेमें नहीं आता‒यह नियम है ।

सब कुछ भगवान्‌ हैं‒इसका चिन्तन नहीं करना है, प्रत्युत इसको स्वयंसे स्वीकार करना है । स्वीकार करते ही हमारी दृष्‍टि बदल जायगी । दृष्‍टिमें ही सृष्‍टि है । हमारी दृष्‍टि बदलेगी तो सारी सृष्‍टि बदल जायगी ! इसलिये अपनी दृष्‍टि ऐसी बनाओ कि सब रूपोंमें भगवान्‌ ही दीखने लग जायँ । यही सच्‍ची आस्तिकता है ।

भक्तराज ध्रुव कहते हैं‒

भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो  बुद्धिरेव च ।

भूतादिरादिप्रकृतिर्यस्य रूपं नतोऽस्मि तम् ॥

(विष्णुपुराण १ । १२ । ५१)

‘पृथ्वी, जल, अग्‍नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि, अहंकार और मूल प्रकृति‒ये सब जिनके रूप हैं, उन भगवान्‌को मैं नमस्कार करता हूँ ।’

अगर हमारे भीतर राग-द्वेष होते हैं तो हमने ‘सब कुछ भगवान्‌ हैं’‒यह बुद्धिसे सीखा है, स्वयंसे स्वीकार नहीं किया है । बुद्धिसे सीखनेपर कल्याण नहीं होता, प्रत्युत स्वयंसे स्वीकार करनेपर कल्याण होता है । जब सब कुछ भगवान्‌ ही हैं तो फिर राग-द्वेष कौन करे और किससे करे ?

निज प्रभुमय देखहिं जगत केहि सन करहिं बिरोध ॥

(मानस, उत्तर ११२ ख)