(गत ब्लॉगसे आगेका)
नचिकेताने यमराजसे आत्मविषयक प्रश्न किया तो यमराजने उसको कई
भोगोंका लालच दिया कि तुम सैंकड़ों वर्षोंकी आयुवाले पुत्र-पौत्रोंको माँग लो, भूमण्डलका
राज्य माँग लो, इच्छित मृत्युका माँग लो, मनुष्यलोक तथा स्वर्गलोकके सम्पूर्ण भोगोंको
माँग लो, जो चाहे सो माँग लो, पर आत्मविषयक प्रश्न मत करो । परन्तु नचिकेताने दृढ़तासे कहा
कि ये सब वस्तुएँ आपक पास ही रहें, मुझे तो आपसे आत्मविषयक प्रश्नका उत्तर ही चाहिये
। इसके सिवाय दूसरी काई भी वस्तु मुझे नहीं चाहिये‒‘नान्यं
नस्मान्नचिकेता वृणीते’ (कठोपनिषद् १ । १ । २९) । इस प्रकार उत्कट
अभिलाषा होनेसे ही परमात्मतत्त्व मिलता है ।
परमात्मतत्त्व इतना सस्ता है कि उत्कट इच्छामात्रसे
मिल जाता है, पर संसारकी वस्तु इच्छामात्रसे नहीं मिलती । कारण कि सांसारिक वस्तुएँ जन्य (पैदा होनेवाली) हैं;
जब निर्मित होंगी, तब मिलेंगी, पर परमात्मा जन्य नहीं हैं । इच्छा भी करें,
उद्योग भी करें और प्रारब्ध भी साथ हो, तब सांसारिक वस्तु मिलती
है । परन्तु परमात्माकी प्राप्तिमें न उद्योगकी जरूरत है,
न प्रारब्धकी जरूरत है,
केवल उत्कट इच्छामात्रकी जरूरत है । कारण कि परमात्मतत्त्व प्रकृतिसे
अतीत है, फिर वह प्राकृत क्रिया और पदार्थसे कैसे मिल जायगा
? उत्कट अभिलाषा स्वयंमें होती
है अर्थात् यह स्वयंकी भूख है और यह भूख जाग्रत् होती है असत्को महत्त्व न देनेसे
।
संसारकी इच्छा न करनेपर वस्तुओंकी कमी नहीं होगी,
जीनेकी कमी नहीं होगी,
धनकी कमी नहीं होगी,
प्रत्युत जो हमें मिलनेवाला है,
वह अवश्य मिलेगा‒‘यदस्मदीयं न हि तत्परेषाम्’ (गरुडपुराण, आचार॰ ११३ । ३२) ‘जो हमारा है, वह दूसरोंका नहीं हो सकता ।’
हमारे भाग्यकी चीज दूसरेको कैसे मिल जायगी
? हमें आनेवाला बुखार दूसरेको
कैसे आ जायगा ? संसारकी वस्तु
यदि मिलनेवाली है तो बिना इच्छाके भी मिलेगी और नहीं मिलनेवाली है तो कितनी ही इच्छा
करें, नहीं मिलेगी । परन्तु परमात्मतत्त्वकी उत्कट अभिलाषा होगी तो वह अवश्यमेव मिलेगा
।
प्रश्न‒अगर
परमात्मतत्त्वका बोध हो जाय तो फिर क्या करना चाहिये ?
स्वामीजी‒परमात्मतत्त्वका बोध होनपर कुछ करना,
जानना और पाना बाकी रहता ही नहीं ! अतः बोध होनपर क्या करे‒यह प्रश्न ही पैदा नहीं होता । फिर
भी यह कहा जा सकता है कि बोध होनेपर चुप रहना चाहिये । इस विषयमें एक कहानी है ।
(शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒‘सन्त समागम’ पुस्तकसे
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