।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि
माघ कृष्ण नवमी, वि.सं.२०७२, मंगलवार
अलौकिक प्रेम


(गत ब्लॉगसे आगेका)
भगवान्‌को विलक्षण आनन्द देनेवाला जो प्रेम है, वह गुणोंमें नहीं है, प्रत्युत निर्गुणमें है । कारण कि गुणातीत भगवान्‌ भी जिस प्रेमके लोभी हैं, वह प्रेम गुणमय कैसे हो सकता है ? जैसे भगवान्‌का शरीर दिव्य है, गुणमय नहीं है, ऐसे ही उन गोपियोंका शरीर भी दिव्य हो गया, गुणमय नहीं रहा । सगुण भगवान्‌ भी सत्त्व-रज-तम-गुणोंसे युक्त नहीं हैं, प्रत्युत ऐश्वर्य, माधुर्य, सौन्दर्य, औदार्य आदि दिव्य गुणोंसे युक्त हैं । इसलिये सगुण भगवान्‌की भक्तिको भी निर्गुण (सत्त्वादि गुणोंसे रहित) बताया गया है; जैसे‒‘मन्निकेतं तु निर्गुणम्’ (श्रीमद्भा ११ । २५ । २५) ‘मत्सेवायां तु निगुणा’ (श्रीमद्भा ११ । २५ । २७) आदि । भगवान्‌की भक्ति करनेसे मनुष्य गुणातीत हो जाता है ।[*]  तात्पर्य यह है कि भगवान्‌से सम्बन्ध होनेपर सत्त्व, रज और तमोगुण रहते ही नहीं । अतः रासलीलामें जो शरीर थे, वे हमारे शरीर-जैसे गुणोंवाले नहीं थे, प्रत्युत भगवान्‌के शरीर-जैसे तीनों गुणोंसे रहित अर्थात् दिव्यातिदिव्य थे । उस रासलीलामें जितनी भी गोपियाँ गयी थीं, वे सब-की-सब भगवान्‌की इच्छासे दिव्य भावमय शरीर धारण करके ही गयी थीं । इसीलिये उन गोपियोंके गुणमय शरीरोंको उनके पतियोंने अपने पास (घरमें ही) सोते हुए देखा‒‘मन्यमानाः स्वपार्श्वस्थान् स्वान् स्वान् दारान् व्रजौकसः’ (श्रीमद्भा १० । ३३ । ३८)

तात्पर्य यह निकला कि जिन गोपियोंको विरहजन्य तीव्र ताप नहीं हुआ, उनके गुणमय शरीर तो पतिके पास रहे, पर (जीवन्मुक्तकी तरह) उन शरीरोंके साथ सम्बन्ध नहीं रहा, केवल शरीरका भान रहा । परन्तु जिन गोपियोंको विरहजन्य तीव्र ताप हुआ, उनके गुणमय शरीर और उनका भान ही नहीं रहा, फिर उन शरीरोंके साथ सम्बन्ध होनेका प्रश्र ही पैदा नहीं होता; क्योंकि उनका अनादिकालका गुणसंग ही नहीं रहा, जो कि जन्म-मरणका मूल कारण है ।

नारायण !     नारायण !!     नारायण !!!

‒‘मेरे तो गिरधर गोपाल’ पुस्तकसे


[*] मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते ।
    स गुणान्समतीत्यैतान्ब्रह्मभूयाय  कल्पते ॥
                                               (गीता १४ । २६)

‘जो मनुष्य अव्यभिचारी भक्तियोगके द्वारा मेरा सेवन करता है, वह इन गुणोंका अतिक्रमण करके ब्रह्मप्राप्तिका पात्र हो जाता है ।’


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।। श्रीहरिः ।।



आजकी शुभ तिथि
माघ कृष्ण अष्टमी, वि.सं.२०७२, सोमवार
अलौकिक प्रेम



(गत ब्लॉगसे आगेका)
भगवान्‌ श्रीकृष्णका एक नाम आता है‒‘चोरजारशिखामणि ।’ इसका अर्थ है कि भगवान्‌के समान चोर और जार दूसरा कोई है ही नहीं, हो सकता ही नहीं । दूसरे चोर और जार तो केवल अपना ही सुख चाहते हैं, पर भगवान्‌ केवल दूसरेके सुखके लिये चोर और जारकी लीला करते हैं । उनकी ये दोनों ही लीलाएँ दिव्य, विलक्षण, अलौकिक हैं‒‘जन्म कर्म च मे दिव्यम्’ (गीता ४ । ९)[1] संसारी चोर तो केवल वस्तुओंकी ही चोरी करते हैं, पर भगवान्‌ वस्तुओंके साथ-साथ उन वस्तुओंके राग, आसक्ति, प्रियता आदिको भी चुरा लेते हैं । भगवान्‌ने गोपियोंके मक्खनके साथ-साथ उनके रागरूप बन्धनको भी खा लिया था । वे जार बनते हैं तो सुखके भोक्ताके साथ-साथ सुखासक्ति, सुखबुद्धिका भी हरण कर लेते हैं, जिससे सम्बन्धजन्य आकर्षण (काम) न रहकर केवल भगवान्‌का आकर्षण (विशुद्ध प्रेम) रह जाता है, अन्यकी सत्ता न रहकर केवल भगवान्‌की सत्ता रह जाती है । तात्पर्य है कि भगवान्‌ अपने भक्तोंमें किसीको चोर और जार रहने ही नहीं देते, उनके चोर-जारपनेको ही हर लेते हैं । ‘कनक’ (धन) और ‘कामिनी’ (स्त्री)-की आसक्तिसे ही मनुष्य ‘चोर’ और ‘जार’ होता है । अतः कनक-कामिनीकी आसक्तिका सर्वथा अभाव करनेवाले होनेसे भगवान्‌ चोर और जारके भी शिखामणि हैं ।

यहाँ शंका हो सकती है कि जिन गोपियोंका गुणमय शरीर नहीं रहा, उनकी भगवान्‌के साथ रासलीला कैसे हुई ? इसका समाधान है कि वास्तवमें रासलीला गुणोंसे अतीत (निर्गुण) होनेपर ही होती है । गुणोंके रहते हुए भगवान्‌के साथ जो सम्बन्ध होता है, उसकी अपेक्षा गुणोंसे रहित होकर भगवान्‌के साथ होनेवाला सम्बन्ध अत्यन्त विलक्षण है । दास्य, सख्य, वात्सल्य, माधुर्य आदि भाव भी वास्तवमें गुणातीत (मुक्त) होनेपर ही होते हैं ।[2] एक श्लोक आता है‒

द्वैत   मोहाय    बोधात्प्राग्जाते    बोधे   मनीषया ।
भक्त्यर्थं कल्पितं (स्वीकृतं) द्वैतमद्वैतादपि सुन्दरम् ॥
                                             (बोधसार, भक्ति ४२)

‘तत्त्वबोधसे पहलेका द्वैत तो मोहमें डालता है, पर बोध हो जानेपर भक्तिके लिये स्वीकृत द्वैत अद्वैतसे भी अधिक सुन्दर होता है ।’

   (शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒‘मेरे तो गिरधर गोपाल’ पुस्तकसे


[1] यद्यपि देवता भी दिव्य कहलाते हैं, तथापि उनकी दिव्यता मनुष्योंकी अपेक्षासे कही जाती है । परन्तु भगवान्‌की दिव्यता निरपेक्ष होनेसे देवताओंसे भी विलक्षण है । इसलिये देवता भी भगवान्‌के दिव्यातिदिव्य रूपके दर्शनकी नित्य इच्छा रखते हैं‒‘देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकाङ्क्षिणः’ (गीता ११ । ५२)
[2] भक्तियोगकी यह विलक्षणता है कि उसमें साधक पहलेसे ही (गुणोंके रहते हुए भी) भगवान्‌में दास्य, सख्य, वात्सल्य आदि भाव कर सकता है ।

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