।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि
वैशाख शुक्ल एकादशीवि.सं.२०७४, शनिवार
मोहिनी एकादशी-व्रत (सबका)
संसारमें रहनेकी विद्या



(गत ब्लॉगसे आगेका)

मनुष्यको चाहिये कि जहाँ-कहीं रहे अपनी आवश्यकता पैदा कर दे । भाई हो या बहिन हो, साधु हो या गृहस्थ हो, कोई क्यों न हो । अपनी आवश्यकताको जरूर पैदा कर दे, तो वह संसारमें बड़े सुखसे रहेगा । आवश्यकता कैसे पैदा करें ? एक तो हर समय अच्छे-से-अच्छे काममें लगे रहो । यह समय बड़ा कीमती है । इस समयके सामान कोई चीज कीमती नहीं है । आप समय देकर विद्वान बन सकते हैं, परिवारवाले हो सकते हैं । ध्यान दें, समय लगानेसे सब चीजें मिल सकती हैं, परन्तु सब चीजें देनेपर भी समय नहीं मिलता । कोई कहे कि उम्रभरमें जो भी प्राप्त किया एक मिनट समयके लिए सब कुछ देता हूँ, पर उसके बदलेमें एक मिनटका समय भी नहीं मिल सकता । समय देनेसे सब कुछ मिल सकता है; परन्तु सब देनेपर भी समय नहीं मिलता है । समयको कितना कीमती कहें ? भागवतमें आया है–

तुलयाम लवेनापि    न स्वर्गं नापुनर्भवम् ।
भगवत्संगिसंगस्य मर्त्यानां किमुताशिषः ॥
                                                 (१/१८/१३)

भगवान्‌के प्रेमी पुरुषोंका लवमात्रका संग अच्छा है, उससे न तो मुक्तिकी तुलना कर सकते  हैं और न ही स्वर्गकी । गोस्वामीजीने कहा है–

तात स्वर्ग अपबर्ग सुख   धरिअ  तुला एक अंग ।
तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग ॥
                                                        (मानस ५/४)

संतके लवमात्रका संग मिलनेके समान स्वर्ग और मुक्तिकी भी तुलना नहीं हो सकती । समय इतना कीमती है । समय मिले तो इसे बेकार मत जाने दो । इस समयको उत्तम-से-उत्तम, ऊँचे-से-ऊँचे काममें लगाओ । धनकी लोग बड़े आदरके साथ रक्षा करते हैं, तिजोरीमें बन्द कर देते हैं । धन तो तिजोरीमें बन्द हो सकता है, पर समय तिजोरीमें बन्द नहीं हो सकता । समय तो हरदम सावधान होनेसे ही सार्थक होगा । नहीं तो निरर्थक बीत जायगा । जिन लोगोंनें समयका आदर किया है, वे बड़े श्रेष्ठ पुरुष बन गये । वे अच्छे महात्मा बन गये । उन लोगोंने क्या किया है ? जीवनका समय भगवत्-चरणोंमें लगाया है । संसारके भोगोंसे विमुख होकर परमात्म-तत्त्व जाननेके लिये समय लगाया है । वे संत और महात्मा बन गये । समयके बराबर कोई कीमती चीज नहीं है संसारमें । लवमात्रका सत्संग हो जाय, साधु-महात्माका संग हो जाय । भगवान्‌का संग हो जाय, प्रेम हो जाय, भगवान्‌में आकर्षित हो जाय; वह समय सबसे ऊँचा है ।


अतः इस समयको उत्तम-से-उत्तम काममें खर्च करो । स्वाध्याय करो, जप करो, कीर्तन करो, सेवा करो । अच्छी पुस्तकोंका पठन-पाठन करो । विषय-भोगोंमें, ताश, हँसी-दिल्लगी, नाच-सिनेमा, बीडी-सिगरेट आदिमें समय बरबाद मत करो । बीडी-सिगरेट पीते हैं, चिलम पीते हैं । आप जरा विचार करो, आपके पास जो समय है, उसमें भी आग लगाते हो, धुआँ करते हो । धुआँ हो गया धुआँ ! आपका जो समय है उसमें भी आग लगती है । पाँच-सात मिनट आपने बीड़ी-सिगरेट पी तो उस समयमें भी धुआँ लग गया । पैसे गये, समय गया, स्वतन्त्रता गयी–राम ! राम ! राम ! अरे ! फायदा क्या हुआ ? किसी तरहका फायदा नहीं । जो नहीं पीते हैं, उन्हें आपने गन्दगी दे दी । उनकी नाकमें भी धुआँ चढ़ गया ।

               (शेष आगेके ब्लॉगमें)
—‘जीवनोपयोगी प्रवचन’ पुस्तकसे     

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।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि
वैशाख शुक्ल दशमीवि.सं.२०७४, शुक्रवार
एकादशी-व्रत कल है
संसारमें रहनेकी विद्या



(गत ब्लॉगसे आगेका)

ये माताएँ चाहें तो संसारका कल्याण कर सकती हैं, क्योंकि हम जितने भाई-बहिन हैं, ये सबसे पहले माँकी गोदमें आते हैं । माँकी गोदमें खेलते हैं । माँका दूध पीते हैं । माँके स्वभावका असर पड़ता है । महिलाएँ जैसी प्रकृति-(स्वाभाव-) की होंगी, वैसे ही बालक-बालिकाएँ होंगे, बच्चे वैसे ही नागरिक बनेंगे बड़े होकर, वैसा ही वह देश बनेगा । माँ छोटी अवस्थामें जो शिक्षा देती है, वह बहुत काम करती है; क्योंकि बचपनमें पड़े हुए संस्कार बहुत काम करते हैं । अतः माताएँ चाहें तो देशका बड़ा सुधार कर सकती हैं । मातओंमें मातृत्व-शक्ति होती है, ये उसका उपयोग करें । भगवान्‌ने इन्हें शक्ति दी है । ये छोटी-छोटी बालिकाएँ हैं, ये भी अपने भाई-बहिनका जैसा पालन करती हैं, बड़े लड़के अपने भाई-बहिनका वैसा पालन नहीं करते । आप छोटे भाई-बहिनको बड़े भाईकी गोदमें देकर देख लो, बहिनें बड़े प्यारसे पालन करती हैं । बहिनें अपनी चीजें भी छोटे भाई-बहिनोंको खिला देंगी । भाई अपनी आप खा जायगा और उनकी भी खा जायगा । बालिकाओंके हृदयमें यह भाव नहीं आता  कि यह चीज तो मेरी है, मैं क्यों दूँ ? तो यह भाव क्यों नहीं आता ? उसको पालन-पोषण करनेकी शक्ति भगवान्‌ने दी है, यह शक्ति माँ बननेके लिए दी है । यह जो शक्ति इन्हें दी है, यदि ये इस शक्तिका  सदुपयोग करें तो बहुत सुगमतासे निर्मम हो सकती हैं ।

         इसका कारण यह है कि सबका पालन-पोषण करना, सबकी रक्षा करना और सबको सुख देना–इनसे ममता दूर हो जाती है । सेवा करनेसे अभिमान दूर होता है । यह बड़े ऊँचे दर्जेकी बात कही गयी है । अगर यह व्यवहारमें आ जाय तो काम बन जाय । काम-धन्धा ठीक करें, चीजोंको उदारतासे बरतें, औरोंको देवें । दो-का विशेष आदर होता है; एक तो जो उपकार करते हैं और दूसरे, जो बड़े-बूढ़े पूजनीय होते हैं । बड़े-बूढ़े हैं, उनका आदर करें, आज्ञा मानें । जो दीन हैं, रोगी हैं, अभावग्रस्त हैं, उनकी सेवा करें । दीन-दुखियोंमें भगवान् रहते हैं । यदि उनकी सेवा की जाय तो आपकी सेवा स्वीकार करनेके लिए भगवान्‌ तैयार हैं । दीन-दुखियोंसे घृणा मत करो, द्वेष मत करो, इर्षा मत करो; अपनेमें अभिमान मत लाओ कि हम बड़े हैं । वास्तवमें आपमें जो बड़प्पन है, यह बड़प्पन उन छोटे आदमियोंका दिया हुआ है ।


         इसलिए उन गरीबोंको देनेसे धनका सदुपयोग होता है । धन होते हुए भी धनवत्ताका सुख देनेवाले गरीब हैं । जिनके दर्शनमात्रसे आपको प्रसन्नता होती है, उनकी सेवा करना आपका कर्त्तव्य है । बड़े-बूढोंने आपका पालन किया है, रक्षा की है, विद्या दी है, बुद्धि दी है, सम्पत्ति दी है । उनकी सेवा करना भी आपका कर्त्तव्य है । अतः उनकी सेवा करो । उन्हें सुख पहुँचाओ, इससे हमारेपर जो पुराना ऋण है, वह उतर तो नहीं सकता, पर माफ हो जायगा । सेवासे अभिमान नहीं होगा और संसारमें रहनेकी विद्या आ जायगी । ऐसे प्रेम और सेवा होगी तो संसारके लोग चाहेंगे । जो सेवा करनेवाले हैं, उनको सब लोग चाहते हैं ।

               (शेष आगेके ब्लॉगमें)
—‘जीवनोपयोगी प्रवचन’ पुस्तकसे     

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।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि
वैशाख शुक्ल नवमीवि.सं.२०७४, गुरुवार
संसारमें रहनेकी विद्या



(गत ब्लॉगसे आगेका)

         माँने जितना कष्ट सहा है, बालक उतनी माँकी सेवा नहीं कर सकता । सब कुछ माँने दिया । कोई कहे कि मैं मेरे चमड़ेकी जूती बनाकर माँको पहना दूँ । कोई उनसे पूछे, यह चमड़ा भी बाजारसे लाये हो क्या ? यह तो माँका ही है । इसपर तू अधिकार क्या करता है ? माँसे मिला है । आज हम बड़ी-बड़ी बातें बनाते हैं । लोगोंमें विद्वान, सज्जन कहलाते हैं, यह शरीर मिला किससे है ? माँसे मिला है । माँसे पालन हुआ है ।

         आप कितने भी विद्वान हो जायँ । बचपनमें बैठना नहीं आता था, माँने बिठाकर मुखमें ग्रास दिया । भोजन करना सिखाया । यह दशा थी बहिनोंकी और भाइयोंकी भी । उस अवस्थामें माँने पालन किया और बड़े-बड़े कष्ट सहे । खेलमें इधर-उधर जाते, तोड़-फोड करते, वृक्षोंमें उलझते, बिच्छुको भी पकड़ने दौड़ते, आगमें हाथ डालना चाहते । माँने रक्षा की । टट्टी-पेशाब करते उसमें ही लकीरें खीचने लगते । अब ऐसा देखकर मन खराब होता है । उस समय होश नहीं था कुछ भी, यह सब माँने ज्ञान कराया । बड़ी विलक्षणतासे पालन किया ।

         कभ-कभी भाई लोग अभिमानमें आकार कह देते हैं कि क्या बड़ी बात है ! उनसे मैं कहता हूँ कि बच्चेको दो दिन गोदमें रखकर देखो । माँमें मातृत्व शक्ति है तब हमारा पालन हुआ । इसलिए जितनी अपनी सामर्थ्य हो माँ-बापकी सेवा करो । जो माँ-बापका आदर नहीं करते, उनका भगवान् भी आदर नहीं करते । कोई उनका विश्वास नहीं करते, क्योंकि जो माँ-बापका नहीं है, वह किसका होगा ? माँ-बापकी सेवा करनेसे भगवान् राजी होते हैं । आज्ञापालन करनेसे सिद्धि प्राप्त होती है । अर्थात् परमात्माकी प्राप्ति होती है । इस कारण भाई-बहिनोंको आज्ञापालन करना चाहिये । आज्ञापालनसे क्या होगा ? उनकी सेवा होगी और हम निरहंकार हो जायेंगे । चीज-वस्तुओंसे उनकी सेवा करनेसे निर्मम हो जायेंगे । जितनी-जितनी चीजोंको सेवामें लगा देंगे, उतना अपना अहंकार नष्ट हो जायगा । आराम-बुद्धि और अपनेमें बड़प्पनका अहंकार पतन करनेवाले हैं । संसारकी सेवा करते-करते अभिमानको सुगमतासे दूर कर सकते हो । ऐसे ही समान उम्रवालोंकी सेवा करो । छोटी अवस्थावाले हैं, उनकी भी सेवा करो । छोटोंका पालन-पोषण करना भी सेवा है । सदाचारकी शिक्षा देना भी सेवा है । वे उम्रभर सुख पाएंगे, इसलिए बालकोंको अच्छी शिक्षा दो । बेटा-बेटीको अच्छी शिक्षा दो, जिससे वे अच्छे बन जायँ ।

               (शेष आगेके ब्लॉगमें)
—‘जीवनोपयोगी प्रवचन’ पुस्तकसे     

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।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि
वैशाख शुक्ल अष्टमी, वि.सं.२०७४, बुधवार
संसारमें रहनेकी विद्या



वास्तवमें अभिमान और ममताका त्याग कठिन है । परंतु एक बात आपको बतायी जाती है, भाई-बहन अपने-अपने घरोंमें उसका अनुष्ठान करें, उसके अनुसार अपना जीवन बनायें, तो बहुत सुगमतासे अभिमान और ममताका त्याग हो सकता है । घरोंमें प्रायः दो बातोंको लेकर लड़ाई होती है । काम-धन्धा तो तुम करो और चीज-वस्तु मैं लूँ । आराम, आदर, सत्कार−सब कुछ  मेरेको मिले । काम-धन्धा और खर्च तुम करो । इन बातोंको लेकर खटपट चलती है । अगर इनको उलट दिया जाय अर्थात् काम-धन्धा मैं करूँ, आराम आप करो । आदर-सत्कार, मान-प्रशंसा−ये लेनेकी नहीं देनेकी हैं, तो दूसरोंका आदर करें, मान दें, आराम दें, सत्कार करें, उनकी आज्ञा पालन करें, उनको सुख पहुँचायें, ऐसे आपसमें किया जाय तो प्रेम बढ़ता है ।

         मनुष्यका स्वभाव है कि वह अपने मनकी बात पूरी करना चाहता है और अपने मनकी होनेसे राजी होता है । धनकी, मानकी, बड़ाईकी, जीनेकी कामना होती है । परंतु इन कामनाओंमें मूल कामना यह है कि मेरे मनकी बात हो जाय । यह बात बढ़िया नहीं है । अपने मनकी बातका आग्रह छोड़कर औरोंके मनकी बात करता चला जाय तो निहाल हो जाय । केवल दो बातोंका ख्याल करना है कि उनकी बात न्याययुक्त हो और अपनी सामर्थ्यमें हो । इसका एक सरल उपाय है । यह निश्चय कर लें कि हमें संसारसे लेना नहीं है−संसारकी सेवा करनी है । क्यों करनी है ? क्योंकि पहले लिया है इसलिये अब देना है । संसारको देना है, संसारसे लेना नहीं है ।

         एक मार्मिक बात बतायें, आप ध्यान देकर सुनें । मानव-शरीर परमात्माकी प्राप्तिके लिए मिला है । संसारमें रहनेकी एक रीति है । उस रीतिको हम धारण करें तो परमात्माकी प्राप्ति बहुत सुगमतासे हो जाय । हरेक काम करनेकी एक विद्या होती है, यदि उसके अनुसार काम करते हैं तो वह काम पूरा हो जाता है । संसारमें रहनेकी भी एक विद्या है तो उस विद्याको भी जानना चाहिये । उस विद्याको काममें लें तो बड़ी सुगमतासे संसारमें रहेंगे और संसारको पार कर जायेंगे । वह विद्या क्या है ? जिसने जिसके साथ जो सम्बन्ध मान रखा है, उसके अनुसार बड़ी तत्परतासे अपने कर्तव्यका पालन करे और उससे अपनी कोई भी इच्छा न रखे, कामना न रखे, वासना न रखे । अपने लेना नहीं है, देना है । यह शरीर है, संसारसे सुख लेनेके लिए नहीं मिला है ।

एहि तन कर फल बिषय न भाई ।

         शरीरका फल तो सेवा करना है । माताके लिए पुत्र बनो तो सपूत बनो । माँकी सेवा करनी है । माताके पास जो रुपये हैं, गहने-कपड़े हैं, तो यही कहो कि माँ, जो तुम्हारे पास है उसे हमारी बहिनको दे दो । छोटे भाई या बड़े भाईको दे दो । मेरे ऊपर तो आप एक ही कृपा करो कि सेवा मेरेसे ले लो । माँ-बापकी सेवासे आदमी उऋण नहीं हो सकता । उनका जितना भी ऋण हमारे ऊपर है, उसे हम चुका नहीं सकते । ऋणको अदा नहीं कर सकते । कोई उपाय नहीं है । तो क्या है ? सेवा करके उनकी प्रसन्नता ले लो । प्रसन्नता लेनेसे वह ऋण माफ हो जाता है ।

               (शेष आगेके ब्लॉगमें)
—‘जीवनोपयोगी प्रवचन’ पुस्तकसे        

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