।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि–
चैत्र कृष्ण पंचमी, वि.सं.-२०७४, मंगलवार
                             रंगपंचमी
मैं नहीं, मेरा नहीं 


(गत ब्लॉगसे आगेका)

भगवान्‌की तरफ चलनेवालोंकी तीन धारणाएँ होती हैं । पहली बात, सब कुछ भगवान्‌का ही है । सबके मालिक भगवान् हैं । सब भाई-बहन कृपा करके यह धारण कर लो कि सब कुछ केवल भगवान्‌का है, अन्य किसीका नहीं है । दूसरी बात, यह सब केवल भगवान् ही हैं । तीसरी बात इससे विलक्षण है, उसका वर्णन नहीं कर सकते ! इतना कह सकते है कि सिवाय परमात्माके कोई चीज कभी पैदा हुई ही नहीं, होगी ही नहीं, हो सकती ही नहीं । वह कैसे है, उसका वाणीसे वर्णन नहीं कर सकते । तीसरी बात होनेपर पूर्णता हो जाती है ।

जैसे भूखा अन्न चाहता हो, प्यासा जल चाहता हो, ऐसा तो मैं नहीं कह सकता, पर मेरी चाहना जरूर है कि इस बातको आप मान लें कि सब कुछ भगवान्‌का है । अगर आप भगवान्‌की प्राप्ति चाहते हो तो सबसे पहले यह बात धारण करनी चाहिये कि मेरी चीज कोई नहीं है ।मैंभी मेरा नहीं है, प्रत्युत भगवान्‌का है ! यह पहली बात है । इसीसे श्रीगणेश होना चाहिये । यह शरीर, मन, वाणी, इन्द्रियाँ, प्राण आदि सब भगवान्‌के ही हैंयह आरम्भमें ही होना चाहिये ।

मन-बुद्धि हमारे नहीं हैं, इन्द्रियाँ हमारी नहीं हैं, प्राण हमारे नहीं हैं, जीवन हमारा नहीं हैं, स्थूलशरीर हमारा नहीं है, सूक्ष्मशरीर हमारा नहीं है, कारणशरीर हमारा नहीं हैयह बात होते ही कामवृत्ति नष्ट हो जायगी अर्थात् रुपयोंमें और स्त्रीमें आकर्षण मिट जायगा ! ये दो ही साधकके लिये महान् बाधक हैं‒

                  माधोजी से मिलना कैसे होय ।
                  सबल बैरी बसै घट भीतर, कनक कामिनी दोय ॥

पहले ‘मेरा कुछ नहीं है’इस बातको पक्का करो । यह बात ठीक जँच जायगी तो ‘मेरेको कुछ नहीं चाहिये’यह बात बड़ी सुगम हो जायगी । ‘मेरेको कुछ नहीं चाहिये’यह होनेपर फिर ‘मैं कुछ नहीं’यह सुगमतासे हो जायगा । ‘मैं कुछ नहीं’यह बात होनेपर फिर ‘सब कुछ भगवान् ही हैं’यह बहुत सुगम हो जायगा ।

ये बातें मान लो तो मैं आपका ऋणी हूँ ! आपका दास हूँ ! आपका गुलाम हूँ ! आप कृपा करके इन बातोंको मान लो ।

आप दुःख तो नहीं चाहते, पर उसके कारणकी खोज नहीं करते । अगर दुःखके कारणका निवारण कर दिया जाय तो दुःख नहीं होगा । दुःखका कारण हैबेईमानी । जो अपनी चीज नहीं है, उसको अपनी मान लेते हैंयह बेईमानी है । इस बेईमानीसे दुःख होता है । जो चीज अपनी नहीं है, वह अपने पास ठहरेगी नहींयह नियम है । हमें तो सुननेमें और कहनेमें यह बात बहुत बढ़िया मालूम देती है कि जो चीज मिलती है और बिछुड़ जाती है, वह हमारी नहीं होती । प्रकृतिकी सम्पूर्ण चीजें मिलती हैं और बिछुड़ जाती हैं, पर परमात्मा मिले हुए ही रहते हैं, बिछुड़ते हैं ही नहीं । वे परमात्मा हमारे हैं । यह बात खास है ! मिलने और बिछुड़नेवाली चीजको आप बेशक अपनी मान लो, पर वह आपके पास नहीं रहेगी, नहीं रहेगी, नहीं रहेगी ! फिर उसका दुःख क्यों करो ?

                   अंतहुँ तोहि तजैंगे पामर तू न तजै अबही ते ॥
                   मन पछितैहै अवसर बीते ।
                                                   (विनयपत्रिका १९८ । ३)


   (शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒‘मैं नहींमेरा नहीं’ पुस्तकसे

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।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि–
चैत्र कृष्ण चतुर्थी, वि.सं.-२०७४, सोमवार
मैं नहीं, मेरा नहीं 


(गत ब्लॉगसे आगेका)

मैं कहूँ और लोग तत्परतासे भगवान्‌में लग जायँऐसी विद्या मेरेको आती नहीं ! अगर मेरेको ऐसी विद्या आये तो सबको भगवान्‌में लगा दूँ ! आपलोग अगर चाहो तो सब भगवान्‌में लग सकते हो, इसमें कोई सन्देह नहीं है । कारण कि भगवान् हमारे हैं । भगवान्‌पर हमारा अधिकार है । क्यों अधिकार है ? क्योंकि हम भगवान्‌के अंश हैं । जैसे अपनी माँको सब-के-सब माँ कह सकते हैं, ऐसे ही सब-के-सब जीव भगवान्‌को अपना परमपिता कह सकते हैं । एक ही माँग हो कि ‘हे नाथ ! मैं आपको भूलूँ नहीं’ । इसके सिवाय दूसरी माँग नहीं रहनी चाहिये । भगवान् यादमात्रसे प्रसन्न हो जाते हैं‘अच्युतः स्मृतिमात्रेण’ । भगवान्‌के सिवाय और कोई हमारा है ही नहीं, और कोई हमारा हुआ ही नहीं, और कोई हमारा होगा नहीं, और कोई हमारा हो सकता नहीं । प्रकृतिकी जितनी चीजें हैं, सब मिलती हैं और बिछुड़ जाती हैं । परन्तु भगवान् पहलेसे ही मिले हुए हैं और बिछुड़ते हैं ही नहीं ! कोई कितना ही दुष्ट हो, कितना ही पापी हो, कितना ही अन्यायी हो, कितना ही घातक हो, कितना ही क्रर हो, कितना ही नृशंस हो, भगवान् उसको छोड़ते नहीं । सदा उसके साथ रहते हैं । ऐसा और कौन है, बताओ ? थोड़ा अवगुण हो तो उसको सब छोड़ देते हैं, माँ-बाप छोड़ देते हैं, भाई छोड़ देते हैं, सम्बन्धी छोड़ देते हैं, कुटुम्बी छोड़ देते हैं, पड़ोसी छोड़ देते हैं, पर भगवान् नहीं छोड़ते ! अतः सबके साथ रहनेमें, शक्तिमें, महिमामें, कृपा करनेमें भगवान्‌के समान कोई नहीं है ! वे प्राणिमात्रके परम सुहद् हैं‘सुहृदं सर्वभूतानाम्’ (गीता ५ । २९) ऐसे प्रभुको भी याद नहीं रखते तो किसको याद रखोगे ? ऐसे भगवान्‌पर विश्वास नहीं करोगे तो किसपर विश्वास करोगे ? संसार विश्वास करनेलायक नहीं है । जो चीज मिलती है और बिछुड़ जाती है, उसपर विश्वास कैसे हो ? इसलिये भगवान्‌को अपना मान लो । जैसे, मीराबाईने कहा‘मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई’ । किसी--किसीको अपना मानना ही पड़ेगा, यह बित्कृल सच्ची बात है । जब किसी--किसीको अपना मानना ही पड़ेगा तो जो सबसे श्रेष्ठ है, कभी हमसे अलग नहीं होगा, उसको ही अपना मानो । आजतक हमारे कितने जन्म हुए, कैसे-कैसे शरीर मिले, पर कोई शरीर ठहरा नहीं, कोई सम्बन्ध ठहरा नहीं, पर भगवान्‌का सम्बन्ध कभी टूटा नहीं !

श्रोतागीतामे आया है कि जीवने जगत्‌को धारण कर रखा हैययेदं धार्यते जगत्‌’ (गीता ), तो यह धारण करना क्या है और यह धारण करना कैसे मिटे ?


स्वामीजीयह जगत्‌ केवल जीवकी कल्पना है । परमात्माकी दृष्टिमें जगत्‌ नहीं है और परमात्माको प्राप्त हुए महापुरुषोंकी दृष्टिमें भी जगत्‌ नहीं है । महापुरुषोंकी दृष्टिमें सब कुछ परमात्मा ही है‘वासुदेवः सर्वम्’ (गीता ७ । १९) स्वप्नमें भी जगत्का नामोनिशान नहीं है ! जगत्‌ है ही नहीं, हुआ ही नहीं, होगा ही नहीं, हो सकता ही नहीं ! यह एकदम पक्की, सच्ची बात है । केवल जीवने ही जगत्को धारण कर रखा है । भगवान् कहते हैं‘मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय’ (गीता ७ । ७) अर्थात् मेरे सिवाय किंचिन्मात्र भी कुछ नहीं है, केवल मैं-ही-मैं हूँ । केवल जीवने संसारकी कल्पना कर रखी है । संसार केवल राग-द्वेषके कारण है ।

   (शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒‘मैं नहींमेरा नहीं’ पुस्तकसे

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।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि–
चैत्र कृष्ण तृतीया, वि.सं.-२०७४, रविवार
मैं नहीं, मेरा नहीं 


(गत ब्लॉगसे आगेका)

मन अपना नहीं हैयह मान लो तो मन बहुत सुगमतासे वशमें हो जायगा । जबतक मनको अपना समझोगे, तबतक मन चंचल रहेगा । लोग बड़ी शिकायत करते हैं कि मन नहीं लगता ! मन लगे कैसे ? आपने मनको समझा नहीं ! मन ऐसा है कि आप जहाँ जाते हो, मन वहीं चला जाता है । जहाँ आप नहीं जाते, वहाँ मन नहीं जाता । मन खराब नहीं है । मन तो एक इन्द्रिय है, सूक्ष्म अन्तःकरण है । करण कर्ताके अधीन होता है । रेल वहीं जाती है, जहाँ पटरी हो । जहाँ पटरी नहीं है, वहाँ रेल नहीं जाती । ऐसे ही मन वहीं जाता है, जहाँ आपने सम्बन्ध जोड़ा है । अतः मन खराब नहीं है, प्रत्युत आप खुद खराब हो !

जैसे पृथ्वी, जल, तेज आदि अपने नहीं हैं, ऐसे ही मन, बुद्धि, अहंकार भी अपने नहीं हैं । ये सब परमात्माके हैं । जो परमात्माके हैं, उनको आपने अपना मान लिया ! राजकीय वस्तुको कोई व्यक्ति अपनी मान ले तो दण्ड मिलता है ! इन वस्तुओंको भक्त भगवान्‌को दे देता है, ज्ञानी प्रकृतिको दे देता है और योगी संसारको दे देता है । अपना माननेसे मन अशुद्ध हो जाता है ।

पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, मन, बुद्धि तथा अहंकार-इनकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है । इनका विवेचन हमलोगोंकी दृष्टिसे किया जाता है । वास्तवमें एक परमात्माके सिवाय कुछ नहीं है‘वासुदेवः सर्वम्’ (गीता ७ । १९)

श्रोतामालासे नामजप करना अच्छा है या रामनाम लिखना अच्छा है ?

स्वामीजीदोनोंमें रामनाम लिखना अच्छा है; क्योंकि उसमें नेत्र भी लग जाते हैं, हाथ भी लग जाते हैं, मन भी लग जाता है । उपासना वह अच्छी है, जिसमें गद्गद भाव हो जाय, मन भगवान्‌में तल्लीन हो जाय । चाहे जप करो, चाहे कीर्तन करो, चाहे पाठ करो, जिसमें मन भगवान्‌में ज्यादा लगे, जो प्रेमपूर्वक किया जाय, वह बढ़िया हो जायगा ।

श्रोताआपने रोजाना साढ़े तीन लाख जप करनेकी बात कही थी, वह कैसे सम्भव है ? समझमें नहीं रहा है !
स्वामीजीआपसे जितना हो सके, कर लो । खास बात यह याद रखो कि समय खाली न जाय ।

श्रोतानामजपके समय व्यर्थ चिन्तन होता है, उसके लिये क्या करें ?

स्वामीजीबार-बार ‘हे नाथ ! हे नाथ !’ पुकारो । एक मालामें तीन-चार बार प्रार्थना करो कि ‘हे नाथ ! हे कृपासिन्धो ! व्यर्थ चिन्तनसे बचाओ !’ । मन्त्रोंसे भी प्रार्थनामें विशेष शक्ति है । आर्त होकर भगवान्‌को पुकारो कि ‘हे नाथ ! मैं अपनी शक्तिसे मिटा नहीं सका ! आप कृपा करो’ । भगवान्‌की कृपासे जो काम होता है, वह अपने पुरुषार्थसे नहीं होता । भगवान्‌की कृपासे बहुत सरलतासे काम हो जाता है । बड़े-बड़े असम्भव काम भी भगवान्‌की कृपासे सम्भव हो जाते हैं । भगवान्‌की कृपाका भरोसा रखकर नामजप करो, सब ठीक हो जायगा ।

भगवान् अपने हैं । भगवान्‌के सिवाय कोई अपना नहीं है । भगवान्‌के एक-एक रोममें करोड़ों ब्रह्माण्ड हैं‘रोम रोम प्रति लाने कोटि कोटि ब्रह्मडं’ (मानस, बाल २०१) करोड़ों ब्रह्माण्डोंमें तिल-जितनी, एक धागे-जितनी चीज भी हमारी नहीं है । पर जिनके रोम-रोममें करोड़ों ब्रह्माण्ड हैं, वे भगवान् पूरे-के-पूरे हमारे हैं !


   (शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒‘मैं नहींमेरा नहीं’ पुस्तकसे

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