।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि–
मार्गशीर्ष कृष्ण द्वादशी, वि.सं.–२०७५, मंगलवार
दुःखका कारण-संकल्प



ऐसा हो गया तो वाह-वाह, ऐसा नहीं हुआ तो वाह-वाह ! जीवन्मुक्त हो जाओगे ! ‘सोऽमृततत्वाय कल्पते’ (गीता २/१५)‒परमात्मप्राप्तिकी सामर्थ्य आ जायगी । महान्‌ शान्ति, महान्‌ आनन्द अपने-आप आयेगा । अपने उद्योगसे किया हुआ ठहरता नहीं और अपने-आप आया हुआ जाता नहीं । लोगोंकी दृष्टिमें हम महात्मा, जीवन्मुक्त बन जायँगे और अपनी दृष्टिमें महान्‌ शान्तिको प्राप्त हो जायँगे । लोक और परलोक दोनों सुधर जायँगे । इतनी-सी बात है कि अपना कोई संकल्प न रखें । यही वास्तवमें त्याग है । संसारकी वस्तुओंका त्याग असली त्याग नहीं है । अगर संसारकी वस्तुओंका त्याग ही त्याग हो तो मरनेवाले सब त्यागी ही होते हैं ! शरीरको नहीं पूछते, धनको नहीं पूछते, कुटुम्बको नहीं पूछते ! न तार है, न चिठ्ठी है, न समाचार है ! पीछे आकर पूछते ही नहीं कि कौन कैसा है ? पूरा त्याग कर दिया तो मुक्ति हो जानी चाहिये ? परन्तु वस्तुओंके छूटनेसे मुक्ति नहीं होती, मनका संकल्प छोड़नेसे मुक्ति हो जाती है ।

स्फुरणा तो आती-जाती रहती है । जैसे, वायु आयी और चली गयी, ठण्डी आयी और चली गयी, गरमी आयी और चली गयी, वर्षा आयी और चली गयी, आँधी आयी और चली गयी, ऐसे ही स्फुरणा आयी और चली गयी । उसको पकड़ो मत तो वह अपने-आप मिट जायगी । परन्तु उसको पकड़ लोगे तो वह संकल्प हो जायगा और संकल्पसे कामना पैदा हो जायगी । स्फुरणासे कामना पैदा नहीं होती । चलते-चलते रास्तेमें वृक्ष दीख गया, पत्थर दीख गया तो दीख गया, पर जहाँ मनमें आया कि यह पत्थर तो बहुत बढ़िया है, वहाँ मन चिपक जायगा । वह संकल्पका रूप धारण कर लेगा । आप छोड़ना चाहो तो वह छूट जायगा, इसमें परवशता नहीं है ।

संकल्पके दो भाग हैं, एक तो आवश्यक संकल्प है और एक अनावश्यक संकल्प है । जैसे, शरीर-निर्वाहके लिये अन्न, जल, वस्त्रकी आवश्यकता मनमें पैदा होती है तो यह आवश्यक संकल्प है; और बैठे-बैठे यों ही मनमें विचार किया कि यह होना चाहिये, यह नहीं होना चाहिये तो यह अनावश्यक संकल्प है । आवश्यकता तो पूरी होगी, पर अनावश्यकता कभी पूरी नहीं होगी । आप संकल्प करो तो आवश्यकता पूरी हो जायगी और संकल्प न करो तो आवश्यकता पूरी हो जायगी । संकल्प करनेपर आवश्यकता पूरी होगी तो अभिमान आ जायगा । परन्तु बिना संकल्प किये आवश्यकता पूरी होगी तो अभिमान नहीं आयेगा ।

शुभ काम करनेका संकल्प हो जाय तो उसको जल्दी शुरू कर देना चाहिये‒‘शुभस्य शीघ्रम्’ । फिर करेंगे‒यह नहीं होना चाहिये । समयका पता नहीं है । काल सबको खा जाता है । अच्छा विचार हो तो काल खा जायगा और बुरा विचार हो तो काल खा जायगा । यदि मनमें बुरा विचार आ जाय तो ‘थोड़ा ठहरो, थोड़ा ठहरो’ ऐसा होनेसे फिर वह नहीं रहेगा और अच्छा विचार आ जाय तो ‘फिर करेंगे, फिर करेंगे’ ऐसा होनेसे फिर वह नहीं रहेगा, काल उसको खा जायगा । शुभ अथवा अशुभ काममें देरी करनेसे वैसा भभका नहीं रहता, कमजोर होकर मिट जाता है ।

श्रोता‒स्वाभाविक शान्ति कैसे बनी रहे ?

स्वामीजी‒अपना संकल्प छोड़ दो तो अशान्ति रहेगी ही नहीं । अपना कोई संकल्प मत रखो तो शान्तिके सिवाय क्या रहेगा ? केवल शान्ति, शुद्ध शान्ति रहेगी । अपना संकल्प ही अपनेको दुःख देता है, और कोई दुःख देनेवाला नहीं है । विपरीत-से-विपरीत परिस्थिति आ जाय, बीमारी आ जाय, धन चला जाय, बेटा मर जाय आदि जो होनेवाला है, वह होगा और होकर मिट जायगा । या तो वह मिट जायगा या शरीर मिट जायगा । यह रहेगा नहीं, पक्की बात है । उत्पन्न होनेवाली मात्र वस्तु नष्ट होनेवाली है । इसलिये किसी संकल्पको पकड़े ही नहीं तो शान्तिकी प्राप्ति हो जायगी ।


नारायण !     नारायण !!     नारायण !!!

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।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि–
मार्गशीर्ष कृष्ण एकादशी, वि.सं.–२०७५, सोमवार
उत्पन्ना एकादशी-व्रत (सबका)
दुःखका कारण-संकल्प



चाहे संसारके संकल्पमें अपना संकल्प मिला दो, चाहे प्रभुके संकल्पमें अपना संकल्प मिला दो, चाहे प्रारब्धमें अपना संकल्प मिला दो । जैसा होना है, वैसा हो जायगा; कूदाकूदी क्यों करो ! अपने सब संकल्प छोड़ दो तो जीवन महान्‌ पवित्र हो जायगा । जो अपने-आप होता है, उसमें अपवित्रता नहीं आती, वह ठीक ही होता है । संसारके संकल्पसे होगा तो ठीक होगा, भगवान्‌के संकल्पसे होगा तो ठीक होगा, प्रारब्धसे होगा तो ठीक होगा । बेठीक होगा ही नहीं । बेठीक तो हम कर लेते हैं । अपना संकल्प कर लेते हैं तो बेठीक हो जाता है ।

एक स्फुरणा होती है और एक संकल्प होता है । कोई बात याद आती है‒यह ‘स्फुरणा’ है और ऐसा होना चाहिये, ऐसा नहीं होना चाहिये‒यह ‘संकल्प’ है । संसारकी स्फुरणा होती रहती है और मिटती रहती है । आप जिस स्फुरणाको पकड़ लेते हो, वह संकल्प हो जाता है । संकल्पमें मनुष्य बँध जाता है‒‘फले सक्तो निबध्यते’ (गीता ५/१२) । संकल्पसे कामना पैदा हो जाती है‒ ‘संकल्पप्रभवान्कामान्’ (गीता ६/२४), जो सम्पूर्ण पापों और दुःखोंकी जड़ है । जो सब संकल्पोंका त्याग कर देता है, वह योगारूढ़ हो जाता है । कितनी सीधी-सरल बात है ! इसमें बेठीक होगा ही नहीं ।

आप कितना ही ठीक समझो या बेठीक समझो; जो होना है, वह होगा ही । जो अनुकूल या प्रतिकूल होनेवाला है, वह तो होगा ही । सर्दी आनी है तो आयेगी ही, गर्मी आनी है तो आयेगी ही । आप सुख-दुःखी हो जाओ तो आपकी मरजी ! वह आपके सुख-दुःखके अधीन नहीं है । इस तरह अपने-अपने प्रारब्धका फल आयेगा ही । आप सुखी हो जाओ तो आयेगा, दुःखी हो जाओ तो आयेगा । एकदम सच्ची बात है ! जो नहीं होना है, वह नहीं होगा । जो होना है, वह हो जायगा । जो होगा, वह हम अपने-आप देख लेंगे । वह कोई छिपा थोड़े ही रहेगा ! अतः चतुर वही है, जो अपना कोई संकल्प नहीं रखता । सीधी-सादी बात है, अपना संकल्प न रखे तो निहाल हो जाय आदमी ! क्यों संकल्प रखे और क्यों दुःख पाये !

अपने अनुकूलमें राजी होना और प्रतिकूलमें नाराज होना‒ये दोनों ही व्यथा हैं । भगवान्‌ कहते हैं कि ‘इन्द्रियोंके जो विषय हैं, वे अनुकूलता और प्रतिकूलताके द्वारा सुख-दुःख देनेवाले हैं । वे आने-जानेवाले और अनित्य हैं । उनको तुम सह लो । सुख-दुःखमें सम रहनेवाले जिस धीर मनुष्यको वे व्यथा नहीं पहुँचाते, हलचल पैदा नहीं करते, वह मुक्तिका पात्र हो जाता है, उसका कल्याण हो जाता है (गीता २/१४-१५) । गुणोंका जो संग है, वृत्तियोंके साथ जो आसक्ति है, बस, यही ऊँच-नीच योनियोंमें जन्म लेनेका कारण है‒‘कारणं गुणसंगोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु’ (गीता १३/२१)


संकल्प मिट जाता है । कभी पूरा होकर मिट जाता है, कभी न पूरा होकर मिट जाता है । पूरा होना है तो पूरा होकर मिट जायगा, पूरा नहीं होना है तो ऐसे ही मिट जायगा । यह तो मिटनेवाली चीज है‒‘आगमापायि-नोऽनित्याः’ । इसको तो सह लो, बस‒‘तांस्तितिक्षस्व’ (गीता २/१४)

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।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि–
मार्गशीर्ष कृष्ण दशमी, वि.सं.–२०७५, रविवार
एकादशी-व्रत कल है
दुःखका कारण-संकल्प



मनुष्यको दुःख देनेवाला खुदका संकल्प है । ऐसा होना चाहिये और ऐसा नहीं होना चाहिये‒यह जो मनकी धारणा है, इसीसे दुःख होता है । अगर वह संकल्प छोड़ दे तो एकदम योग (समता) की प्राप्ति हो जायगी‒ ‘सर्वसंकल्पसन्न्यासी योगारूढस्तदोच्यते’ (गीता ६/४) । अपना ही संकल्प करके आप दुःख पा रहा है मुफ्तमें ! संकल्पोंका कायदा यह है कि जो संकल्प पूरे होनेवाले हैं, वे तो पूरे होंगे ही और जो नहीं पूरे होनेवाले हैं, वे पूरे नहीं होंगे, चाहे आप संकल्प करें अथवा न करें । सब संकल्प किसीके भी पूरे नहीं हुए, और ऐसा कोई आदमी नहीं है, जिसका कोई संकल्प पूरा नहीं हुआ । तात्पर्य है कि कुछ संकल्प पूरे होते हैं और कुछ संकल्प पूरे नहीं होते‒यह सबके लिये एक सामान्य विधान है । जैसा हम चाहें, वैसा ही होगा‒यह बात है नहीं । जो होना है, वही होगा ।

होइहि सोइ जो राम रचि राखा ।
को  करि  तर्क    बढ़ावै   साखा ॥
                                      (मानस १/५२/४)

इसलिये अपना संकल्प रखना दुःखको, पराधीनताको निमन्त्रण देना है । अपना कुछ भी संकल्प न रखें तो होनेवाला संकल्प पूरा हो जायगा । जैसा तुम चाहो वैसा ही हो जाय‒यह हाथकी बात नहीं है । अतः संकल्प करके क्यों अपनी इज्जत खोते हो ? कुछ आना-जाना नहीं है ! अगर मनुष्य संकल्पोंका त्याग कर दे तो योगारूढ़ हो जाय, तत्त्वकी प्राप्ति हो जाय; जो कुछ बड़ा-से-बड़ा काम है, वह हो जाय; यह मनुष्य जन्म सफल हो जाय, कुछ भी करना, जानना और पाना बाकी नहीं रहे ! अतः अपना संकल्प कुछ नहीं रखो । वह संकल्प चाहे भगवान्‌के संकल्पपर छोड़ दो, चाहे संसारके संकल्पपर छोड़ दो, चाहे प्रारब्ध (होनहार) पर छोड़ दो और चाहे प्रकृतिपर छोड़ दो[1] जो अच्छा लगे, उसीपर छोड़ दो तो दुःख मिट जायगा । भगवान्‌पर छोड़ दो तो जैसा भगवान्‌ करेंगे, वैसा हो जायगा । संसारपर छोड़ दो तो संसार (माता-पिता, भाई-बन्धु, कुटुम्ब-परिवार आदि) की जैसी मर्जी होगी, वैसे हो जायगा । अपने प्रारब्धपर छोड़ दो तो प्रारब्धके अनुसार जैसा होना है, वैसा हो जायगा । अपना कोई संकल्प नहीं करना है । अपना संकल्प रखकर बन्धनके सिवाय और कुछ कर नहीं सकते । होगा वही जो भगवान्‌ करेंगे, जो प्रारब्धमें है अथवा जो संसारमें होनेवाला है ।

भगवान्‌ने कहा है‒‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन’ (गीता २/४७) ‘कर्तव्य-कर्म करनेमें ही तेरा अधिकार है, फलोंमें कभी नहीं ।’ ऐसा करेंगे और ऐसा नहीं करेंगे, शास्त्रसे विरुद्ध काम नहीं करेंगे‒इसमें तो स्वतन्त्रता है, पर दुःखदायी और सुखदायी परिस्थिति तो आयेगी ही; आप चाहो तो आयेगी, न चाहो तो आयेगी । करनेमें सावधान रहना है । शास्त्रकी, सन्त-महात्माओंकी आज्ञाके अनुसार काम करना है । इसमें कोई भूल होगी तो वह मिट जायगी । कभी भूलसे कोई विपरीत कार्य हो भी जायगा तो वह ठहरेगा नहीं, टिकेगा नहीं, मिट जायगा । खास बात इतनी करनी है कि अपना संकल्प नहीं रखना है । अपना कोई संकल्प न रहे तो आदमी सुखी हो जाय । ‘यूँ भी वाह-वा है और वूँ भी वाह-वा है’ ऐसा हो जाय तो भी ठीक, वैसा हो जाय तो भी ठीक !

रज्जब रोष न कीजिये,  कोई कहे क्यों ही ।
हँसकर उत्तर दीजिये, हाँ बाबाजी यों ही ॥



[1] अपना संकल्प भगवान्‌पर छोड़ दो तो भक्ति मिलेगी, संसारपर छोड़ दो निश्चिन्तता आयेगी और प्रकृतिपर छोड़ दो तो स्वतन्त्रता आयेगी ।

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।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि–
मार्गशीर्ष कृष्ण नवमी, वि.सं.–२०७५, शनिवार
दुःख-नाशका उपा



श्रोता‒यह छूटता क्यों नहीं ?

स्वामीजी‒आप छोड़ते क्यों नहीं ? आप कहते हो कि छूटता नहीं, मैं कहता हूँ कि छोड़ते नहीं  है ! आप पकड़ना छोड़ दो तो कैसे दे देगा दुःख ? दे नहीं सकता । परन्तु दुःख देनेका भाव रखनेवाला दोषी, पापी जरूर बनेगा, इसमें सन्देह नहीं है । अब एक बहुत बड़ी भूल बताता हूँ । हम जिससे दुःख मिटे, उस उपायको न करके परिस्थिति बदलनेका उद्योग करते हैं, जो सर्वथा निष्फल है । निर्धन है तो धनवान्‌ हो जाय, रोगी है तो निरोग हो जाय, अपमानित है तो सम्मानित हो जाय, निन्दनीय है तो प्रशंसनीय हो जाय‒यह परिस्थिति बदलनेका उद्योग है, जो बिलकुल निरर्थक होगा; क्योंकि यह वृथाभिमान है‒‘अहं करोमिति वृथाभिमानः’ । आप परिस्थिति बदल सकोगे नहीं । इसलिये एक मार्मिक बात बताता हूँ कि परिस्थिति न बदल करके जो परिस्थिति मिली है, उसका सदुपयोग करो । बुखार आ गया, घाटा लग गया, अपमान हो गया, निन्दा हो गयी तो अब इसका सदुपयोग कैसे करें ? कोई काँटा निकले तो हमें पीड़ा तो होती है, पर काँटा निकलनेसे बड़ा भारी लाभ होता है । इसी तरह अपमान होता है, घाटा लगता है तो इससे हमारे पाप नष्ट होते हैं‒यह बात तो बहुत जगह मिलेगी, पर इसमें एक मार्मिक बात है कि प्रतिकूल परिस्थिति कल्याणकी साधन-सामग्री है । भोगनेसे पाप तो अपने-आप नष्ट हो जाते हैं । बिना चाहे, रोते-रोते भोगोगे तो भी पाप नष्ट हो जायँगे । परन्तु उसका सदुपयोग करो तो कल्याण हो जायगा । सुखदायी परिस्थितिका सदुपयोग है‒सेवा करना, दूसरेको सुख पहुँचाना । दुःखदायी परिस्थितिका सदुपयोग है‒सुखकी आशा न रखना । सुखदायी परिस्थितिमें सुखका भोग करना गलती है और दुःखदायी परिस्थितिमें सुखकी आशा करनी गलती है । गलती मिटाना सत्संगका काम है । सत्संगसे यह गलती मिट जायगी ।

मेरे मनमें इस बातको लेकर बड़ी प्रसन्नता होती है कि मनुष्यको ऐसा मौका मिला है, जिसमें वह अपना कल्याण करके सुख-दुःख दोनोंसे ऊँचा उठ सकता है । अतः तुच्छ भोगोंमें फँसकर अपना समय बर्बाद नहीं करना चाहिये । आज दिनतक किसीको मनचाहा भोग नहीं मिला, किसीकी मनचाही बात नहीं हुई । एक व्याख्यानदाताने कहा था कि मनचाही तो रामजीके बापकी भी नहीं हुई, आप कैसे कर लोगे ?

श्रोता‒कोई दुःख देता है तो बदला लेनेकी मनमें आती है; अतः क्या करना चाहिये ?

स्वामीजी‒बदला लेनेकी भावना हमारी गलती है, भूल है । वह तो हमारे कर्मोका फल भुगताकर हमें पवित्र कर रहा है । अतः यदि बदला चुकाना हो तो सबसे पहले उसकी सेवा करो । जो दुःख देनेकी चेष्टा करता है, वह (पापोंका फल भुगताकर) आपको शुद्ध कर रहा है, आपका उपकार कर रहा है । उसका बदला लेना हो तो अपने तनसे, मनसे, वचनसे, धनसे, विद्यासे, बुद्धिसे योग्यतासे, पदसे, अधिकारसे उसकी सेवा करो, उसे सुखी बनाओ ।

श्रोता‒महाराजजी ! परिस्थितिका सदुपयोग करना तो ठीक है, लेकिन अगर प्रतिकूल परिस्थिति आ जाय, घाटा लग जाय तो उसका प्रतिकार तो करना ही पड़ता है !

स्वामीजी‒उसके लिये मैं मना करता ही नहीं ! उसका प्रतिकार करो, धन कमाओ, धनका सदुपयोग करो, कोई विपरीत परिस्थिति न आये‒इसकी सावधानी रखो । परन्तु आप दुःखदायी परिस्थितिको दूर कर दोगे‒यह हाथकी बात नहीं है । उद्योग करनेके लिये, कर्तव्य-कर्मका पालन करनेके लिये मैं मना करता ही नहीं । परन्तु आप सुखदायी परिस्थिति बना लोगे‒यह आपके हाथकी बात नहीं है । भगवान्‌ने कहा है‒‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन’ (गीता २/४७) ‘कर्तव्य-कर्म करनेमें ही तेरा अधिकार है, फलमें कभी नहीं’ । अतः फल आपके अधिकारकी बात नहीं है, पर कर्तव्य-कर्म खूब डटकरके, अच्छी तरहसे करना चाहिये । उसमें कभी नहीं चूकना चाहिये । परन्तु किसीको दुःख देना, किसीको नीचा दिखाना‒ऐसी जो धारणा है, यह महान्‌ गलत है । इससे भयंकर दुःख पाना पड़ेगा, बच नहीं सकोगे कभी !

नारायण !     नारायण !!     नारायण !!!

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