।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि–
    माघ शुक्ल दशमी, वि.सं.२०७६ मंगलवार
       शीघ्र भगवत्प्राप्ति कैसे हो ?


साधकोंके सम्मुख दो बातें विशेषरूपसे आती हैं‒एक संसारकी और दूसरी परमात्माकी । संसार नाशवान् है और परमात्मा अविनाशी हैं । संसारके सम्बन्धसे दुःख-ही-दुःख होता है और परमात्माके सम्बन्धसे आनन्द-ही-आनन्द होता है, दुःखका लेश भी नहीं होता । संसारका आश्रय कभी टिकता ही नहीं और परमात्माका आश्रय कभी मिटता नहीं है । इन बातोंको हम सन्त-महापुरुषोंसे सुनते हैं, वेद, पुराणादि शास्त्रोंमें पढ़ते हैं और स्वयं मानते भी हैं, परन्तु ऐसा मानते हुए भी हमारा दुःख दूर क्यों नहीं हो रहा है ? हमें परम आनन्दकी प्राप्ति क्यों नहीं हो रही है ? हमें भगवान्‌ क्यों नहीं मिल रहे हैं ?

अभी जैसे ‘हरिः शरणम्, हरिः शरणम्’ कीर्तन हुआ तो भगवान्‌के चरणोंकी शरण लेना बहुत ही बढ़िया बात है, क्योंकि संसारका आश्रय टिकेगा नहीं, भगवान्‌का आश्रय ही टिकेगा । ये बातें सुनते हैं, समझते हैं, मानते हैं, फिर भी वह गुत्थी कहाँ उलझी हुई है जो सुलझती नहीं है । इस समस्यापर हमें गंभीरतापूर्वक विचार करना है ।

इस विषयमें अनेक बातें कही जा सकती हैं, परन्तु एक बातपर हमें विशेष ध्यान देना है । वह यह है कि बातें सुनने, पढ़नेसे केवल बौद्धिक या बातूनी ज्ञान होता है । परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिमें अपनी उत्कट अभिलाषा ही काम आती है, बौद्धिक या बातूनी ज्ञान कुछ काम नहीं आता । जिस दिन हमें संसारका सम्बन्ध सुहायेगा नहीं और हम परमात्माके बिना रह सकेंगे नहीं, उसी दिन हमें परमात्माकी प्राप्ति हो जायगी ।

संसार असत्य है‒ऐसा मानते हुए भी यदि हम सांसारिक सुख-भोगोंको भोगते रहेंगे तो उससे हमें कोई लाभ नहीं होगा । परमात्मा सत्य हैं, उनका नाम सत्य हैं‒ऐसा कहनेमात्रसे कोई विशेष लाभ नहीं होगा । उलझन ज्यों-की-त्यों ही बनी रहेगी । इस उलझनको तभी मिटाया जा सकता है, जब हमारी वर्तमान समस्या यही बन जाय कि संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद कैसे हो ? परमात्माकी प्राप्ति कैसे हो ?

यह ठीक है कि हम परमात्माकी प्राप्ति चाहते हैं, तत्त्वज्ञान चाहते हैं, मुक्ति चाहते हैं; भगवान्‌के दर्शन चाहते हैं, भगवत्प्रेम चाहते हैं; परन्तु हमारी इस चाहकी सिद्धिमें एक बहुत बड़ी बाधा हमारी यह मान्यता है कि ‘भविष्यमें काफी समयके बाद‒भगवत्प्रेम होगा; समय लगेगा; तब कहीं भगवान्‌ दर्शन देंगे; समय पाकर ही तत्त्वज्ञान होगा, परमात्माकी प्राप्तिमें तो समय लगेगा’ इत्यादि । यह जो भविष्यकी आशा है कि फिर होगा, वही परमात्मप्राप्तिमें सबसे बड़ी बाधा है ! सांसारिक पदार्थोंकी प्राप्तिके लिये तो भविष्यकी आशा करना उचित है; क्योंकि सांसारिक पदार्थ सदा सब जगह विद्यमान नहीं है, परन्तु सच्चिदानन्दघन परमात्मा तो सम्पूर्ण देश, काल, वस्तु और व्यक्तिमें विद्यमान हैं, उनकी प्राप्तिमें भविष्यका क्या काम ? इस तथ्यकी ओर प्रायः साधकोंका ध्यान ही नहीं जाता । वे यही मान बैठते हैं कि ‘इतना साधन करेंगे; इतना नाम जप करेंगे; ऐसी-ऐसी वृत्तियाँ बनेंगी; इतना अन्तःकरण शुद्ध होगा, इतना वैराग्य होगा; भगवान्‌में इतना प्रेम होगा; ऐसी अवस्था होगी, ऐसी योग्यता होगी‒तभी कहीं परमात्माकी प्राप्ति होगी ! इस प्रकारकी अनेक आडें (रुकावटें) साधकोंने स्वयं ही लगा रखी हैं यही महान् बाधा है ।


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।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि–
    माघ शुक्ल नवमी, वि.सं.२०७६ सोमवार
          भगवान प्रेमके भूखे हैं


भगवान्‌का भक्तोंके प्रति एक वात्सल्य भाव रहता है । जैसे, चारेमें गोमूत्र या गोबरकी गन्ध भी आ जाय तो गाय वह चारा नहीं चरती । परन्तु अपने नवजात बछड़ेको जीभसे चाटकर साफ़ कर देती है । वास्तवमें वह बछड़ेको साफ करनेके लिये नहीं चाटती, इसमें उसे खुदको एक आनन्द आता है । उसके आनन्दकी पहचान यह है कि अगर आप बछड़ेको धोकर साफ़ कर दोगे तो गायका दूध कम होगा और अगर गाय बछड़ेको चाटकर साफ़ करे तो उसका दूध ज्यादा होगा । गायकी जीभ इतनी कड़ी होती है कि चाटते-चाटते बछड़ेकी चमड़ीसे खून आ जाता है, फिर भी गाय छोड़ती नहीं; क्योंकि उसको एक आनन्द आता है । वात्सल्य प्रेममें गाय सब कुछ भूल जाती है । वत्सनाम बछड़ेका है और बछड़ेसे होनेवाला प्रेम वात्सल्य प्रेमकहलाता है ।

भगवान्‌को भक्तका काम करनेमें आनन्द आता है, प्रसन्नता होती है । मनुष्य भगवान्‌की इच्छाकी पूर्ति कर सकता है, इतनी इसमें योग्यता है ! परन्तु यह दर-दर भटकता फिरता हैतुच्छ टुकड़ोंके लिये, पैसोंके लिये, भोगोंके लिये ! राम-राम-राम ! किधर चला गया तू ! भगवान्‌को आनन्द देनेवाला होकर अपने सुखके लिये भटकता है और लालायित होता है ! भगवान्‌ भक्तका काम करनेके लिये अपयश सह लेते हैं, तिरस्कार सह लेते हैं, अपमान सह लेते हैं ! भगवान्‌ने भक्तको बहुत ऊँचा दर्जा दिया है । भगवान्‌ कहते हैंअहं भक्तपराधीनो ह्यस्वतन्त्र इव द्विज । (भागवत ९/४/६३) मैं तो हूँ भगतन को दास, भगत मेरे मुकुटमणि । जिनकी स्फुरणामात्रसे अनन्त ब्रह्माण्डोंकी रचना हो जाती है, ऐसे परमात्मा भक्तके वशमें हो जाते हैं और उसके इशारेपर नाचनेके लिये तैयार हो जाते हैंताहि अहीरकी छोहरियाँ छछिया भरि छाछ पे नाच नचावें । नौ लाख गायें नंदजीके यहाँ दुही जाती थीं, पर गोपियोंपर भगवान्‌का इतना प्रेम था कि वे कहतीं‒‘लाला, तुम नाचो तो तुम्हें छाछ देंगीतो वे छाछके लिये नाचने लग जाते ! हृदयका प्रेम भगवान्‌को बहुत मीठा लगता है । भगवान्‌से कोई कामना नहीं, कोई इच्छा नहीं, केवल भगवान्‌ प्यारे लगें, मीठे लगेंयह भक्तोंका भाव होता है । यह जो प्रेम है, वह दोनोंका भाता है अर्थात्‌ भक्त भगवान्‌से आनन्दित होते हैं और भगवान्‌ भक्तसे । भगवान्‌ और भक्त आपसमें एक-दूसरेको देखकर आनन्दित होते रहते हैं । इतनी योग्यता रहते हुए भी मनुष्य दरिद्री हो रहा है, अभावग्रस्त हो रहा है, यह बड़े भारी आश्चर्यकी बात है ! होशमें नहीं आता कि मैं किस दर्जेका हूँ और क्या कर रहा हूँ ? तुच्छ चीजोंके पीछे पड़कर यह अपना कितना नुकसान कर रहा है ! झूठ, कपट, बेईमानी आदि करके महान नरकोंमें जानेकी तैयारी कर रहा है । जिसमें यह भगवान्‌की प्राप्ति कर सकता है, उस अमूल्य समयको बर्बाद कर रहा है । हद हो गयी ! अब तो चेत करो ? जो समय गया, सो तो गया, अब भी लग जाओ भगवान्‌में ! संसारके कामको अपना काम न समझकर भगवान्‌का समझ लो, इतनेसे ही भगवान्‌ प्रसन्न हो जायँगे ।

नारायण !     नारायण !!     नारायण !!!


‒‘वास्तविक सुखपुस्तकसे

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