।। श्रीहरिः ।।

                                                                                                                                                                          




           आजकी शुभ तिथि–
फाल्गुन कृष्ण दशमी वि.सं.२०७७, सोमवा

कल्याणका सुगम साधन-कर्मयोग


मनुष्यमें कर्म करनेकी एक स्वाभाविक रुचि रहती है । कारण कि वह कुछ-न-कुछ पाना चाहता है । अतः कुछ-न-कुछ पानेके उद्देश्यसे वह जन्मसे मृत्युपर्यन्त आसक्तिपूर्वक कर्मोंमें लगा रहता है । कुछ पानेकी आशाके कारण कर्मोंमें उसकी आसक्ति इतनी अधिक रहती है कि जब वृद्धावस्थामें उसकी इन्द्रियाँ कर्म करनेमें असमर्थ हो जाती हैं, तब भी वह कर्मोंसे असंग नहीं हो पाता । इस प्रकार आसक्तिपूर्वक कर्म करते-करते ही वह कालके मुखमें चला जाता है । ऐसी परिस्थितिमें हठपूर्वक कर्मोंका त्याग करनेकी अपेक्षा कोई ऐसा उपाय ही सफल हो सकता है, जिसके अन्तर्गत शास्त्रविहित कर्म करते हुए ही कर्मासक्ति मिट जाय और मनुष्यको कल्याणकी प्राप्ति हो जाय । इस दृष्टिसे मनुष्यके लिये कर्मयोगका अनुष्ठान ही एक सफल एवं सुगम उपाय है । कर्मयोग ऐसे है, जैसे भोजनमें ही औषध मिला दी जाय !! श्रीमद्भागवतमें भगवान्‌के वचन हैं‒

योगास्त्रयो मया प्रोक्ता     नृणां श्रेयो  विधित्सया ।

ज्ञानं कर्म च भक्तिश्च   नोपायोऽन्योऽस्ति कुत्रचित् ॥

निर्विण्णानां  ज्ञानयोगो       न्यासिनामिह  कर्मसु ।

तेष्वनिर्विण्णचित्तानां      कर्मयोगस्तु कामिनाम् ॥

यदृच्छया  मत्कथादौ    जातश्रद्धस्तु  यः  पुमान् ।

न निर्विण्णो नातिसक्तो भक्तियोगोऽस्य सिद्धिदः ॥

(११/२०/६‒८)

अर्थात् अपना कल्याण चाहनेवाले मनुष्योंके लिये मैंने तीन योग (मार्ग) बतलाये हैं‒ज्ञानयोग, कर्मयोग और भक्तियोग । इन तीनोंके अतिरिक्त अन्य कोई कल्याणका मार्ग नहीं है । जो अत्यन्त वैराग्यवान् हैं, वे ज्ञानयोगके अधिकारी हैं, जो संसारमें आसक्त हैं, वे कर्मयोगके अधिकारी हैं और जो न अत्यन्त विरक्त हैं और न आसक्त हैं, वे भक्तियोगके अधिकारी हैं ।

उपर्युक्त भगवद्वचनोंके अनुसार संसारमें कर्मयोगके अधिकारीयोंकी संख्या ही अधिकतम सिद्ध होती है । यहाँ शंका होती है कि संसारमें आसक्त मनुष्य कर्मयोगके मार्गपर (परमात्माकी तरफ) कैसे चल पायेंगे ? इसका समाधान भगवान्‌ने ‘नृणां श्रेयो विधित्सया’ पदोंमें कर दिया है । तात्पर्य है कि सांसारिक भोग और उनके संग्रहमें रुचि रहते हुए भी जो मनुष्य उन (भोगों)-से अपनी रुचिको हटाकर अपना कल्याण करना चाहता है, वह कर्मयोगका पालन करके सुगमतापूर्वक अपना कल्याण कर सकता है । अपना कल्याण करनेका विचार जितना दृढ़ होगा, उतना ही शीघ्र उसका कल्याण होगा ।

कर्मयोगका तात्पर्य है‒कर्म करते हुए परमात्माको प्राप्त करना । कर्मयोगमें दो शब्द हैं‒कर्म और योग । शास्त्रविहित कर्तव्य कर्मोंको ‘कर्म’ कहते हैं । कर्म संसार (फलप्राप्ति)-के लिये भी किये जाते हैं और संसारसे ऊँचा उठकर परमात्माको प्राप्त करनेके लिए भी किये जाते हैं । ‘योग’ की व्याख्या भगवान्‌ने दो प्रकारसे की है‒(१) समताको योग कहते हैं‒‘समत्वं योग उच्यते’ (गीता २/४८) और (२) दुःख-संयोगके वियोगको योग कहते हैं‒‘तं विद्याद् दुःखसंयोगवियोगं योगसञ्ज्ञितम्’ (गीता ६/२३) । परमात्मा ‘सम’ है‒‘निर्दोषं हि समं ब्रह्म’ (गीता ५/१९), अतः समतासे परमात्मामें स्थिति होती है, जिसे ‘योग’ कहते हैं । संसारसे सम्बन्ध ही दुःख-संयोग है । अतः संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर ‘योग’ (समता या परमात्मा)-की प्राप्ति हो जाती है । कर्मयोगमें योगका ही महत्त्व है, ‘कर्म’ का नहीं । इसीलिये भगवान्‌ कहते हैं कि कर्मोंमें योग ही कुशलता है ‘योगः कर्मसु कौशलम्’ (गीता २/५०)

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।। श्रीहरिः ।।

                                                                                                                                                                         




           आजकी शुभ तिथि–
फाल्गुन कृष्ण नवमी वि.सं.२०७७, रविवा

निरन्तर भगवत्स्मृति कैसे हो ?


प्रश्न‒निरन्तर भगवत्स्मरणके लिये नाम-जपकी आवश्यकता है क्या ?

उत्तर-कलियुगमें नाम सर्वोपरि साधन है । नाम-जपसे सब काम स्वतः ही ठीक बन जाते हैं । ‘नामु राम को कलपतरु कलि कल्यान निवासु’ (मानस १/२६) । रामजीका नाम-रूपी कल्पतरु कलियुगमें बहुत कल्याण करता है । कल्पतरुसे जो चाहे सो ले लो । निरन्तर नाम-जप करनेसे इसमें रस आने लगता है । मिठाई खानेवाला ही उसके रसको जानता है । ऐसे ही नामको लेनेवाला ही नामके रसको जान सकता है ।

नाम-जपसे अत्यधिक लाभ होता है । नाम-जपसे विषय-वासना दूर होती है; पाप नष्ट होते हैं, विकार दूर होते हैं; शान्ति मिलती है और भक्ति बढ़ती है । नाम-जपसे असम्भव भी सम्भव हो सकता है । जब मनमें चिन्ता आवे तो आधा घण्टा, एक घण्टा नाम जपो, चिन्ता मिट जायगी । नाम-जप करनेवाले सज्जन नाममय हो जाते हैं ।

नाम-जप तो असली धन है जो साथ जाता है । इसलिये कहा है‒‘धनवन्ता सोई जानिये जाके राम नाम धन होय’ । नामकी कीमत कोई आँक नहीं सकता । यह अमूल्य रत्न है । ‘पायो री मैंने राम रतन धन पायो’ ।  नामको सगुण और निर्गुणसे भी बड़ा बताया है ।

कहौं कहाँ लगि   नाम बड़ाई ।

रामु न सकहिं नाम गुन गाई ॥

(मानस १/२५/४)

‘नामके गुण तो स्वयं भगवान्‌ भी गाना चाहें तो नहीं गा सकते ।’ नामकी महिमा अपार है, असीम है और अनन्त है ।

प्रश्न‒नाम-जपकी खास विधि क्या है ?

उत्तर‒भगवान्‌के स्वरूपका ध्यान करते हुए, अर्थको समझते हुए, भगवान्‌के होकर नामक जप करें । नाम-जप गुप्तरूपसे और निष्काम भावसे करें । नाम-जप निरन्तर करते रहें । नामको भूल न जायें, इसके लिये एक उपाय है‒मन-ही-मन भगवान्‌को प्रणाम करके उनसे प्रार्थना करें कि हे नाथ ! मैं आपको भूलूँ नहीं, हे प्रभो ! आपको मैं भूलूँ नहीं । ऐसा थोड़ी-थोड़ी देरमें कहते रहें ।

एक बात और है, उसपर ध्यान दें । जब कभी आपको भगवान्‌ अचानक याद आ जायँ या भगवान्‌का नाम अचानक याद आ जाय तो उस समय समझो कि भगवान्‌ मेरेको याद करते हैं । ऐसा समझकर प्रसन्न हो जाओ कि मैं निहाल हो गया; मेरेको भगवान्‌ने याद कर लिया । अब और काम पीछे करेंगे; उस समय नाम-जप व कीर्तनमें लग जाओ । ऐसा करनेसे भक्ति बहुत ज्यादा बढ़ती है ।

मालासे जप करना लाभदायक है । भगवान्‌को याद करनेके लिये माला एक शस्त्र है । माला फेरनी चाहिये । जितना नियम है उतना जप मालासे पूरा हो जाता है । उसमें कमी न आ जाय इसलिये मालाकी आवश्यकता है । बिना मालाके अगर निरन्तर जप होता है तो मालाकी कोई जरूरत नहीं है ।

नारायण !     नारायण !!     नारायण !!!

‒ ‘जीवनोपयोगी प्रवचन’ पुस्तकसे

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।। श्रीहरिः ।।

                                                                                                                                                                        




           आजकी शुभ तिथि–
फाल्गुन कृष्ण अष्टमी वि.सं.२०७७, शनिवा

निरन्तर भगवत्स्मृति कैसे हो ?


मेरे तो एकमात्र भगवान्‌ ही हैं; क्योंकि भगवान्‌ पहले भी मेरे थे, अब भी मेरे हैं और आगे भी रहेंगे । सांसारिक पदार्थ पहले भी मेरे नहीं थे, आगे रहेंगे नहीं और वर्तमानमें भी इनसे निरन्तर ही वियोग हो रहा है । संसारके साथ कभी संयोग है ही नहीं और भगवान्‌के साथ कभी वियोग है ही नहीं ।

भगवत्प्राप्तिकी इच्छा कभी भी मिटती नहीं । मनुष्य चाहे इस बातको माने या न माने; किन्तु उसके हृदयमें यह कामना अवश्य रहती है कि मैं सदाके लिये पूर्ण सुखी हो जाऊँ । सभी बन्धनोंसे मुक्त हो जाऊँ, मेरे पास कभी दुःख न आये । यही भगवत्प्राप्तिकी इच्छा है । यह इच्छा अवश्यमेव पूरी होती है, क्योंकि यह वास्तविक एवं सच्‍ची इच्छा है ।

संसारकी इच्छा बिलकुल नकली है । यह इच्छा बनती और मिटती रहती है, किन्तु कभी पूरी नहीं होती । लोगोंने मिथ्या धारणा कर रखी है कि संसारकी इच्छा मिटती नहीं, परन्तु वास्तविक बात यह है कि यह इच्छा टिकती नहीं, बदलती रहती है । बचपनमें कोई और इच्छा थी, जवानीमें कोई और हो जाती है एवं वृद्धावस्थामें तो इच्छाका रूप ही बदल जाता है । संसार स्वयं परिवर्तनशील है । अतः संसारकी इच्छा भी परिवर्तनशील ही है । शरीर भी परिवर्तनशील ही है । अतः संसारकी इच्छा शरीरकी ही इच्छा है, व्यक्तिकी स्वयंकी इच्छा नहीं है । स्वयं (जीव) अपरिवर्तनशील है, परमात्मा भी अपरिवर्तनशील है । इसलिये परमात्मप्राप्तिकी इच्छा ही स्वयंकी इच्छा है । सांसारिक पदार्थ शरीरको ही प्राप्त हो सकते हैं, स्वयंको नहीं । स्वयंको तो परमात्मा ही प्राप्त हो सकते हैं; क्योंकि संसार, सांसारिक पदार्थ एवं शरीरकी जातीय एकता है । इसी प्रकार परमात्मा एवं स्वयं (जीव)-की जातीय एकता है, सम्बन्ध सजातीयका ही होता है, विजातीयका नहीं । संसारके अंशको संसारकी इच्छा है एवं परमात्माके अंशको परमात्माकी इच्छा है ।

संसारका काम, घर-परिवारका काम भी; शरीर, मन, इन्द्रियाँ आदिका ही काम है, हमारा काम नहीं है । हमारा काम तो भगवान्‌का भजन करना एवं भगवान्‌ और उनके तत्त्वको प्राप्त करनेका ही है । हमें एकमात्र भगवान्‌की ही आवश्यकता है एवं भगवत्प्राप्तिकी इच्छा ही हमारी वास्तविक इच्छा है । संसारका काम तो पराया काम है ।

उपर्युक्त विवेचनसे यह सिद्ध हुआ कि जीवका परमात्माके साथ ही स्वतःसिद्ध नित्य सम्बन्ध है । परन्तु अज्ञानवश संसारको एवं संसारके कामको अपना मान लेनेके कारण ही जीव कार्य करते समय भगवान्‌को भूल जाता है । जीव यदि दृढ़तापूर्वक भगवान्‌के साथ अपने नित्य, सत्य, शाश्वत सम्बन्धको स्वीकार कर केवल उन्हें अपना मान लें एवं भगवत्प्राप्तिके अतिरिक्त किसी भी कार्यको अपना कार्य न माने तो वह भगवान्‌को कभी भूल ही नहीं सकता । संसारकी इच्छा करने एवं संसारके साथ सम्बन्ध माननेके कारण ही भगवत्प्राप्तिमें भूल होती है । अतः अपने वास्तविक सम्बन्ध एवं कार्यको पहिचानना चाहिये ।

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।। श्रीहरिः ।।

                                                                                                                                                                       




           आजकी शुभ तिथि–
फाल्गुन कृष्ण सप्तमी वि.सं.२०७७, शुक्रवा

निरन्तर भगवत्स्मृति कैसे हो ?


श्रीमद्भगवद्गीतामें भगवान्‌ने कहा है‒

तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च ।

(८/७)

इसलिये सब समय तू निरन्तर मेरा ही स्मरण कर और युद्ध (कर्तव्य-कर्म) भी कर । भगवान्‌का स्मरण सब समय हो सकता है, किन्तु युद्ध सब समय नहीं हो सकता, अर्जुनके सम्मुख युद्धरूपी कर्त्तव्य ही था । अन्य लोगोंके सामने अपने-अपने घरोंके काम हैं । युद्धकी तरह घरोंके काम-धन्धे भी सभी समय नहीं हो सकते । इस प्रकार भगवान्‌का स्मरण करते हुए काम करना, काम करते हुए भगवान्‌का स्मरण करना एवं भगवान्‌का ही काम करना । इन तीन विकल्पोंमें भगवत्स्मरण ही प्रमुख है, कार्य गौण है । दूसरे विकल्पमें कार्य ही प्रमुख है और भगवत्स्मरण गौण है और तीसरे विकल्पमें भगवान्‌के प्रति अनन्यभाव है ।

प्रायः लोग काम करते हुए भगवान्‌को भूल जाते हैं । इसमें स्वयंकी असावधानी तो खास कारण है ही, परन्तु साथमें एक भारी भूल भी है । यह एक सिद्धान्त है कि जिसके प्रति ममता होती है, उसका स्वतः ही स्मरण होता है । लोग काम-धन्धोंको अपना मानते हैं, उनके प्रति ममता रखते हैं, अतः काम-धन्धे ही याद आते हैं, भगवान्‌ नहीं । भगवान्‌ याद आते भी हैं, तो कुछ समयके बाद उन्हें फिर भूल जाते हैं । अतः यह दृढ़ निश्चय कर लेना चाहिये कि हमें घरका काम करना ही नहीं है । काम तो भगवान्‌का ही करना है । ‘अंजन कहा आँख जेहिं फूटे’ जिस अंजनसे आँख फूट जाय, वह अंजन कैसा ? उससे हमें क्या मतलब ? घरका काम करते हुए भगवान्‌को भूल जाय तो ऐसे कामसे क्या लेना ? अतः साधकको यह मान लेना चाहिये कि घर हमारा नहीं, काम हमारा नहीं और हम भी हमारे नहीं । घर भी भगवान्‌का, काम भी भगवान्‌का और हम भी भगवान्‌के हैं । भगवान्‌की शक्तिसे ही भगवान्‌की प्रसन्नताके लिये हम भगवान्‌का ही काम कर रहे हैं‒इस प्रकार दृढ़ भावनासे भगवान्‌के प्रति ममत्व पैदा हो जायगा और फिर भगवान्‌का स्मरण स्वतः ही होने लगेगा । स्मरणके लिये प्रयासकी कोई आवश्यकता नहीं रहेगी । किन्तु जबतक घर आदिको अपना मानते रहेंगे, तबतक स्मरणमें भूल होगी ही । जैसे हम किसी धर्मशालामें ठहरते हैं तो यह बात जँच जाती है कि यह धर्मशाला हमारी नहीं है । इसी प्रकार घरमें रहते हुए यह बात जँच जानी चाहिये कि यह घर हमारा नहीं है, यहाँ तो थोड़े समयके लिये हम रहने आये हैं । इस बातको बहुत ही दृढ़तापूर्वक पकड़ लेना चाहिये कि यह घर मेरा नहीं, धनादि पदार्थ मेरे नहीं, परिवार मेरा नहीं, शरीर मेरा नहीं । ये तो थोड़े समयके लिये मिले हुए हैं । समय पूरा होते ही इनसे वियोग हो जायगा । यदि ये मेरे होते हो सदा मेरे साथ रहते; किन्तु इनपर न तो कोई  अधिकार ही चलता है, न इनमें हम इच्छानुसार परिवर्तन ही कर सकते हैं और न इनको मरने, नष्ट होनेसे बचा ही सकते हैं । तो ये पदार्थ आदि मेरे कैसे हो गये ? किसी भी युक्तिसे इनके साथ ‘मेरापन’ सिद्ध नहीं होता । अतः ये मेरे नहीं हैं, नहीं हैं, नहीं हैं ।

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