।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि–
मार्गशीर्ष कृष्ण तृतीया, वि.सं.–२०७५, सोमवार
स्त्री-सम्बन्धी बातें



भागवतमें आया है‒

तत्तेऽनुकम्पां सुसमीक्षमाणो भुञ्जान एवात्मकृतं विपाकम् ।
हृद्वाग्वपुर्भिर्विदधन्नमस्ते जीवेत यो मुक्तिपदे स दायभाक् ॥
                                         ( श्रीमद्भा १० । १४ । ८)

जो मनुष्य क्षण-क्षणपर बड़ी उत्सुकतासे आपकी कृपाका ही भलीभाँति अनुभव करता रहता है और प्रारब्धानुसार जो कुछ सुख या दुःख प्राप्त होता है, उसे निर्विकार मनसे भोग लेता है एवं जो प्रेमपूर्ण हृदय, गद्‌गद वाणी और पुलकित शरीरसे अपनेको आपके चरणोंमें समर्पित करता रहता है‒इस प्रकार जीवन व्यतीत करनेवाला मनुष्य ठीक वैसे ही आपके परमपदका अधिकारी हो जाता है जैसे अपने पिताकी सम्पत्तिका पुत्र !’

विधवा स्त्रीको अपने चरित्रकी विशेष रक्षा करनी चाहिये । अगर वह व्यभिचार करती है तो वह अपने दोनों कुलोंको कलंकित करती है, मर्यादाका नाश करती है और मरनेके बाद घोर नरकोंमें जाती है । अतः उसको मर्यादामें रहना चाहिये, धर्म-विरुद्ध काम नहीं करना चाहिये । माता कुन्तीकी तरह उसको अपने वैधव्य-धर्मका पालन करना चाहिये । माता कुन्तीको याद करनेसे अपने धर्मके पालनका बल मिलता है ।

प्रश्न‒आजकल स्त्रीको पुरुषके समान अधिकार देनेकी बात कही जाती है, क्या यह ठीक है ?

उत्तर‒यह ठीक नहीं है । वास्तवमें स्त्रीका समान अधिकार नहीं है, प्रत्युत विशेष अधिकार है ! कारण कि वह अपने पिता आदिका त्याग करके पतिके घरपर आयी है; अतः घरमें उसका विशेष अधिकार होता है । वह घरकी मालकिन, बहूरानी कहलाती है । बाहर पतिका विशेष अधिकार होता है । जैसे रथ दो पहियोंसे चलता है पर दोनों पहिये अलग-अलग होते हैं । अगर दोनों पहियोंको एक साथ लगा दिया जाय तो रथ कैसे चलेगा ? जैसे दोनों पहिये अलग-अलग होनेसे ही रथ चलता है, ऐसे ही पति और पत्नीका अपना अलग-अलग अधिकार होनेसे ही गृहस्थ चलता है । अगर समान अधिकार दिया जाय तो स्त्रीकी तरह पुरुष गर्भ-धारण कैसे करेगा ? अतः अपना-अपना अधिकार ही समान अधिकार है । इसीमें दोनोंकी स्वतन्त्रता है ।

अपना-अपना अधिकार ही श्रेष्ठ है, उत्तम है । हमारेको थोड़ा अधिकार दिया गया है और पुरुषको ज्यादा अधिकार दिया गया है‒इस बातको लेकर ही भीतरमें यह वासना होती है कि हमारेको समान अधिकार मिले, पूरा अधिकार मिले । इस वासनामें हेतु है‒बेसमझी, मूर्खता । समझदारी हो तो थोड़ा ही अधिकार बढ़िया है । कर्तव्य अधिक होना चाहिये । कर्तव्यका दास अधिकार है, पर अधिकारका दास कर्तव्य नहीं है । यदि अपने कर्तव्यका तत्परतासे पालन किया जाय तो संसार, सन्त-महात्मा, शास्त्र और भगवान्‒ये सब अधिकार दे देते हैं । 

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।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि–
मार्गशीर्ष कृष्ण द्वितीया, वि.सं.–२०७५, रविवार
स्त्री-सम्बन्धी बातें



प्रश्न‒स्त्री पुनर्विवाह क्यों नहीं कर सकती ?

उत्तर‒माता-पिताने कन्यादान कर दिया तो अब उसकी कन्या संज्ञा ही नहीं रही; अतः उसका पुनः दान कैसे हो सकता है ? अब उसका पुनर्विवाह करना तो पशुधर्म ही है ।

सकृदंशो  निपतति    सकृत्कन्या   प्रदीयते ।
सकृदाह ददानीति त्रीण्येतानि सतां सकृत् ॥
   (मनुस्मृति ९ । ४७, महाभारत वन २९४ । २६)

कुटुम्बमें धन आदिका बँटवारा एक ही बार होता है, कन्या एक ही बार दी जाती है और मैं दूँगा’‒यह वचन भी एक ही बार दिया जाता है । सत्पुरुषोंके ये तीनों कार्य एक ही बार होते हैं ।’

शास्त्रीय, धार्मिक, शारीरिक और व्यवहारिक‒चारों ही दृष्टियोंसे स्त्रीके लिये पुनर्विवाह करना अनुचित है । शास्त्रीय दृष्टिसे देखा जाय तो शास्त्रमें स्त्रीको पुनर्विवाहकी आज्ञा नहीं दी गयी है । धार्मिक दृष्टिसे देखा जाय तो पितृऋण पुरुषपर ही रहता है । स्त्रीपर पितृऋण आदि कोई ऋण नहीं है । शारीरिक दृष्टिसे देखा जाय तो स्त्रीमें कामशक्तिको रोकनेकी ताकत है, एक मनोबल है । व्यावहारिक दृष्टिसे देखा जाय तो पुनर्विवाह करनेपर उस स्त्रीकी पूर्वसन्तान कहाँ जायगी ? उसका पालन-पोषण कौन करेगा ? क्योंकि वह स्त्री जिससे विवाह करेगी, वह उस सन्तानको स्वीकार नहीं करेगा । अतः स्त्रीजातिको चाहिये कि वह पुनर्विवाह न करके ब्रह्मचर्यका पालन करे, संयमपूर्वक रहे ।

शास्त्रमें तो यहाँतक कहा गया है कि जिस स्त्रीकी पाँच-सात सन्तानें हैं, वह भी यदि पतिकी मृत्युके बाद ब्रह्मचर्यका पालन करती है तो वह नैष्ठिक ब्रह्मचारीकी गतिमें जाती है । फिर जिसकी सन्तान नहीं है, वह यदि पतिके मरनेपर ब्रह्मचर्यका पालन करती है तो उसकी नैष्ठिक ब्रह्मचारीकी गति होनेमें कहना ही क्या है ?

प्रश्न‒यदि युवा स्त्री विधवा हो जाय तो उसको क्या करना चाहिये ?

उत्तर‒जीवित अवस्थामें पति जिन बातोंको अच्छा मानते थे और जो बातें उनके अनुकूल थीं, उनकी मृत्युके बाद भी विधवा स्त्रीको उन्हींके अनुसार आचरण करते रहना चाहिये । उसको ऐसा विचार करना चाहिये कि भगवान्‌ने जो प्रतिकूलता भेजी है, यह मेरी तपस्याके लिये है । जान-बूझकर की गयी तपस्यासे यह तपस्या बहुत ऊँची है । भगवान्‌के विधानके अनुसार किये गये तप, संयमकी बहुत अधिक महिमा है । ऐसा विचार करके उसको मनमें हर समय उत्साह रखना चाहिये कि मैं कैसी भाग्यशालिनी हूँ कि भगवान्‌ने मेरेको ऐसा तप करनेका सुन्दर अवसर दिया है !  

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।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि–
मार्गशीर्ष कृष्ण प्रतिपदा, वि.सं.–२०७५, शनिवार
स्त्री-सम्बन्धी बातें



प्रश्न‒पुरुष दूसरा विवाह कर सकता है या नहीं ?

उत्तर‒अगर पहली स्त्रीसे सन्तान न हुई हो तो पितृऋणसे मुक्त होनेके लिये, केवल सन्तान-उत्पत्तिके लिये पुरुष शास्त्रकी आज्ञाके अनुसार दूसरा विवाह कर सकता है । अपने सुखभोगके लिये वह दूसरा विवाह नहीं कर सकता; क्योंकि यह मनुष्य-शरीर अपने सुख-भोगके लिये है ही नहीं ।

पुनर्विवाह अपनी पूर्वपत्नीकी आज्ञासे, सम्मतिसे ही करना चाहिये और पत्नीको भी चाहिये कि वह पितृऋणसे मुक्त होनेके लिये पुनर्विवाहकी आज्ञा दे दे । पुनर्विवाह करनेपर भी पतिको अपनी पूर्वपत्नीका अधिकार सुरक्षित रखना चाहिये; उसका तिरस्कार, निरादर कभी नहीं करना चाहिये, प्रत्युत उसको बड़ी मानकर दोनोंको उसका सम्मान करना चाहिये ।

जिसकी सन्तान तो हो गयी, पर स्त्री मर गयी, उसको पुनर्विवाह करनेकी जरूरत ही नहीं है; क्योंकि वह पितृऋणसे मुक्त हो गया । परन्तु जिसकी भोगासक्ति नहीं मिटी है, वह पुनर्विवाह कर सकता है; क्योंकि अगर वह पुनर्विवाह नहीं करेगा तो वह व्यभिचारमें प्रवृत्त हो जायगा, वेश्यागामी हो जायगा, जिससे उसको भयंकर पाप लगेगा । अंतः इस पापसे बचनेके लिये और मर्यादामें रहनेके लिये उसको शास्त्रकी आज्ञाके अनुसार पुनर्विवाह कर लेना चाहिये ।

प्रश्न‒पहले राजालोग अनेक विवाह करते थे तो क्या ऐसा करना उचित था ?

उत्तर‒जो राजालोग अपने सुखभोगके लिये अधिक विवाह करते थे, वे आदर्श नहीं माने गये हैं । केवल राजा होनेमात्रसे कोई आदर्श नहीं हो जाता । जो शास्त्रकी आज्ञाके अनुसार चलते थे, धर्मका पालन करते थे, वे ही राजालोग आदर्श माने गये हैं ।

वास्तवमें विवाह करना कोई ऊँचे दर्जेकी चीज नहीं है और आवश्यक भी नहीं है । आवश्यक तो परमात्मप्राप्ति करना है । इसीके लिये मनुष्य-शरीर मिला है, विवाह करनेके लिये नहीं । स्त्री-पुरुषका संग तो देवतासे लेकर भूत-प्रेत आदितक स्थावर-जंगम हरेक योनिमें होता है; अतः यह कोई महत्ताकी बात नहीं है । परन्तु परमात्मप्राप्तिका अवसर, अधिकार, योग्यता आदि तो मनुष्यजन्ममें ही है । मनुष्य परमात्मप्राप्तिका जन्मजात अधिकारी है । जो विचारके द्वारा अपनी विषयासक्तिको, भोगासक्तिको नहीं छोड़ पाते, ऐसे कमजोर मनुष्योंके लिये ही विवाहका विधान किया गया है । भोगोंको भोगकर उनसे विरक्त होनेके लिये, उनमें अरुचि करनेके लिये ही गृहस्थाश्रममें प्रवेश करना चाहिये । जो विषयासक्तिको नहीं छोड़ पाते, उनपर ही पितृऋण रहता है अर्थात् उपकुर्वाण ब्रह्मचारीपर ही वंश-परम्परा चलानेका दायित्व रहता है, नैष्ठिक ब्रह्मचारी और भगवान्‌के भक्तपर नहीं । तात्पर्य है कि पितृऋण उसी पुरुषपर रहता है, जो भोगासक्ति नहीं मिटा सका । जिसमें भोगासक्ति नहीं है, उसपर कोई ऋण रहता ही नहीं, चाहे वह कर्मयोगी, ज्ञानयोगी, भक्तियोगी आदि कोई भी क्यों न हो ! कारण कि इन्कमपर ही टैक्स लगता है, मालपर ही जगात लगती है । जिसके पास इन्कम है ही नहीं, उसपर टैक्स किस बातका ? माल है ही नहीं तो जगात किस बातकी ?   

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आजकी शुभ तिथि–
कार्तिक पूर्णिमा, वि.सं.–२०७५, शुक्रवार
श्रीगुरुनानकदेव-जयन्ती, कार्तिकी पूर्णिमा
स्त्री-सम्बन्धी बातें



जिन्होंने आत्महत्याका प्रयास किया और बच गये, उनसे यह बात सुनी है कि आत्महत्या करनेमें बड़ा भारी कष्ट होता है और पश्चात्ताप होता है कि मैं ऐसा नहीं करता तो अच्छा रहता, अब क्या करूँ ? आत्महत्या करनेवाले प्रायः भूत-प्रेत बनते हैं और वहाँ भूखे-प्यासे रहते हैं, दुःख पाते हैं । तात्पर्य है कि आत्महत्या करनेवालोंकी बड़ी भारी दुर्गति होती है ।

प्रश्न‒अगर पति त्याग कर दे तो स्त्रीको क्या करना चाहिये ?

उत्तर‒वह अपने पिताके घरपर रहे । पिताके घरपर रहना न हो सके तो ससुराल अथवा पीहरवालोके नजदीक किरायेका कमरा लेकर उसमें रहे और मर्यादा, संयम, ब्रह्मचर्यपूर्वक अपने धर्मका पालन करे, भगवान्‌का भजन-स्मरण करे । पितासे या ससुरालसे जो कुछ मिला है, उससे अपना जीवन-निर्वाह करे । अगर धन पासमें न हो तो घरमें ही रहकर अपने हाथोंसे कातना-गूँथना, सीना-पिरोना आदि काम करके अपना जीवन-निर्वाह करे । यद्यपि इसमें कठिनता होती है, पर तपमें कठिनता ही होती है, आराम नहीं होता । इस तपसे उसमें आध्यात्मिक तेज बढ़ेगा, उसका अन्तःकरण शुद्ध होगा ।

माता-पिता, भाई-भौजाई आदिको विशेष ध्यान देना चाहिये कि बहन-बेटी धर्मकी मूर्ति होती है; अतः उसका पालन-पोषण करनेका बहुत पुण्य होता है । उनको यह उक्ति अक्षरशः चरितार्थ कर लेनी चाहिये‒बिपति काल कर सतगुन नेहा’ (मानस, किष्किन्धा ७ । ३) अर्थात् विपत्तिके समय बहन-बेटी आदिसे सौगुना स्नेह करे । यदि वे ऐसा न कर सकें तो लड़कीको विचार करना चाहिये कि जंगलमें रहनेवाले प्राणियोंका भी भगवान् पालन-पोषण करते हैं, तो क्या वे मेरा पालन-पोषण नहीं करेंगे ! सबके मालिक भगवान्‌के रहते हुए मैं अनाथ कैसे हो सकती हूँ ! इस बातको दृढ़तासे धारण करके भगवान्‌के भरोसे निधड़क रहना चाहिये, निर्भय, निःशोक, निश्चिन्त और निःशंक रहना चाहिये । एक विधवा बहन थी । उसके पास कुछ नहीं था । ससुरालवालोंने उसके गहने भी दबा लिये । वह कहती थी कि मुझे चिन्ता है ही नहीं ! दो हाथोंके पीछे एक पेट है फिर चिन्ता किस बातकी !

लड़कियोंको बचपनसे ही कातना-गूँथना, सीना-पिरोना, पढ़ना-पढ़ाना आदि सीख लेना चाहिये । विवाह होनेपर पतिकी सेवामें कमी नहीं रखनी चाहिये, पर भीतरमें भरोसा भगवान्‌का ही रखना चाहिये । असली सहारा भगवान्‌का ही है । ऐसा सहारा न पतिका है, न पुत्रका है और न शरीरका ही है‒यह बिलकुल सच्ची बात है । अतः यदि पति त्याग कर दे तो घबराना नहीं चाहिये । इस विषयमें अपनी कोई त्रुटि हो तो तत्काल सुधार कर लेना चाहिये और अपनी कोई त्रुटि न हो तो बिलकुल निधड़क रहना चाहिये । हृदयमें कमजोरी तो अपने भाव और आचरण ठीक न रहनेसे ही आती है । अपने भाव और आचरण ठीक रहनेसे हृदयमें कमजोरी कभी आती ही नहीं । अतः अपने भावों और आचरणोंको सदा शुद्ध, पवित्र रखते हुए भगवान्‌का भजन-स्मरण करते रहना चाहिये । भगवान्‌के भरोसे किसी बातकी परवाह नहीं करनी चाहिये ।


आजके युवकोंको चाहिये कि वे स्त्रियोंको छोड़ें नहीं । स्त्रीका त्याग करना महापाप है, बड़ा भारी अन्याय है । ऐसा करनेवाले भयंकर नरकोंमें जाते हैं ।   

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