प्रश्न‒प्राणीसेवा
ही प्रभु-सेवा है, सेवा और पूजामें अन्तर क्या है ? उत्तर‒हाँ जी । काम कर देना सेवा है । पूजन होता है चन्दनसे,
अगरबत्तीसे, दीपक दिखानेसे, आरती करनेसे, फूल चढ़ानेसे । यह पूजा होती है । इसको भी
सेवा कह देते हैं, पर पूजा है यह । तो पूजा करनेमें जिसका हम पूजन करते हैं, उसको
ऐसा कोई लाभ नहीं होता । पुष्प चढ़ा दिया तो क्या हुआ, चन्दन चढ़ा दिया तो क्या हुआ
? धूप-दीप कर दिया तो क्या मिल गया उसको ? उसको सुख ज्यादा होता है सेवा करनेसे ।
पग-चम्पी कर दी, स्नान करा दिया, कपड़े धो दिये । ऐसे यदि
वह उनकी सेवा करे तो सुख ज्यादा होता है, पर सेवा बुद्धिसे भी विशेष अगर पूजा
बुद्धिसे करता है तो स्वयं गद्गद हो जाता है । मस्त हो जाता है वह कहीं सेवाका
काम मिले तो ! सेवामें पूजा-बुद्धि हो जाती है तो निहाल हो जाता है ।
चरण-चम्पी करता है एक तो और एक चरण छूता है । चरण छूनेमें, जिसके चरण छूता है,
उसको कुछ नहीं मिलता । स्वयं अभिमान भले ही कर ले । और चरण-चम्पी करता है तो थकावट
दूर होती है । भाव
चरण छूनेका है और पूजा-बुद्धि है तो चरण छूनेमात्रसे जैसे बिजलीका करंट आता है,
ऐसे ही उसके आनन्दका एक करंट आता है । ऐसे चरण-चम्पी करना सेवा है और चरण छूना पूजा है । यह पूजाका और सेवाका भेद
है । जितना अपने अभिमानका त्याग होता है, उसको सुख कैसे पहुँचे ? उसको आराम कैसे
पहुँचे ? यह सेवाभाव होता है । वह पूजनीय, आदरणीय है; वह
हमारा भोजन भी स्वीकार कर ले, चन्दन भी स्वीकार कर ले, हमारा नमस्कार भी स्वीकार
कर ले तो मैं निहाल हो जाऊँ ! यह पूजाका भाव है । जहाँ पूज्यभाव
होता है, वहाँ भारी कैसे लगे ? वो तो त्याग करता रहता है, हरदम ही विचार करता रहता
है, किस तरहसे मेरेको सेवा मिल जाय । सेवा मिल जाय तो अपना अहोभाग्य समझता है कि
बस निहाल हो गया आज तो ! और ऐसा मालूम पड़ता है कि इनकी कृपासे ही यह हो रहा है ।
मेरेमें यह भाव है न, यह इनकी कृपा है । काम भी इनकी कृपासे होता है । वह तो
जीवन्मुक्त हो गया महाराज ! इतना मस्त हो गया । उसकी तो सेवा-पूजा देखकर दूसरे आदमियोंका
कल्याण हो जाय । अगर उसका भाव यह है तो ऐसी बात
है और भारी लगता है तो आलस्य है, प्रमाद है, अभिमान आदि दोष है । यह बात है
भैया ! जितना ही दुःख होता है, आनन्द नहीं आता है, उसमें अपने दोष है भीतर । अपने
दोष न रहनेसे बहुत ही मौज होती है । जितना निर्दोष जीवन है, उतना उसके आनन्द रहता
है । इस बातको समझते नहीं, इस वास्ते लोग चोरी करते हैं,
चालाकी कर लेते हैं, ठग लेते हैं, उससे खुदको दुःख होगा, शान्ति नहीं रह सकती,
उससे प्रसन्नता नहीं रह सकती । परन्तु पदार्थोंमें ज्यादा आसक्ति है,
पदार्थोंको मूल्यवान समझता है; इस वास्ते झूठ-कपट कर, धोखा दे राजी होता है । यह महान् पतनका रास्ता है । बहुत नुकसान कर लिया अपना
! और जितना निर्दोष जीवन होता है, अपना शुद्ध जीवन होता है; आलस्य, प्रमाद, झूठ,
धोखेबाजी, लोभ, क्रोध, कामना कुछ नहीं होती, उतना अन्तःकरण निर्मल होता है, हल्का
होता है, मस्ती रहती है, आनन्द हरदम रहता है‒ कंचन खान खुली घट माहीं । रामदास के टोटो नाहीं ॥ भीतरसे आनन्द उमड़ता है । जैसे शीत-ज्वर चढ़े तो भीतरसे ही ठण्ड लगती है । ऐसे भीतरसे आनन्द उठता है उसके, बाह्य-पदार्थोंसे सुख लेनेकी इच्छा नहीं होती । |
भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम् । व्यवसायात्मिका
बुद्धिः समाधौ न विधीयते ॥ (गीता
२/४४) भोग और
ऐश्वर्यमें जिसकी आसक्ति है । भोग भोगना और पदार्थोंका संग्रह करना‒दो ही बात
बतायी । ‘यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते’
तो क्रियाओंमें और पदार्थोंमें नहीं फँसना । भोग जितना होता है, वह क्रियाजन्य
होता है । भोग होता है, क्रिया होती है उसमें क्रिया-जन्य सुख है और संग्रह है‒वह
पदार्थजन्य । पदार्थोंका संग्रह कर लूँ । इस वास्ते भगवान्ने कहा‒‘पत्रं पुष्पं फलं तोयम्’ ये वस्तु अर्पण कर दो । और
अगाड़ी ‘यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्’ ।
क्रिया अर्पण कर दो । तो ‘शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे
कर्मबन्धनैः’, दोनों बन्धनोंसे छूट जायगा । क्रिया
और पदार्थ‒ये दो रूप ही हैं प्रकृतिके । प्रकृतिसे सम्बन्ध-विच्छेद हो जायगा । क्रिया
और पदार्थोंके वशमें रहेगा, वो प्रकृतिके वशमें रहेगा, जन्मेगा और मरेगा । ‘कारणं गुणसंगोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु’ (गीता १३/२१) ।
गुण सात्त्विक, राजस् और तामस होते हैं । पदार्थ भी सात्त्विक, राजस् और तामस होते
हैं । जो पदार्थ और
क्रियाओंमें आसक्त है, वो फँस जायगा । तो इसमें न फँसे‒इसका उपाय है आज्ञापालन । ‘अग्या सम न सुसाहिब सेवा’
आज्ञापालनके समान कोई सेवा है ही नहीं । कृत्यकृत्य हैं
अपने । कुछ करना नहीं, कुछ पाना नहीं, कुछ लेना नहीं, कुछ सम्बन्ध ही नहीं अपने ।
लाठी है उसे जँचे वैसे चला दो । मालाको घुमाओ, वैसे घुमा दो । माला, लाठी कुछ कहती
नहीं कि यूँ घूमाओ, यूँ करो । तुम्हारी मर्जी है, जैसे करो । ऐसे बड़ा आनन्द है‒शिष्यके लिये, पुत्रके लिये, स्त्रीके लिये,
नौकरके लिये, प्रजाके लिये । बहुत आनन्द है ! अपना कुछ है ही नहीं । मालिक कहे,
वैसे कर दिया । हरदम मस्त रहे, दुःख और सन्ताप कुछ है ही नहीं । न अपनी कोई चीज
है, न कोई क्रिया है, न अपने कुछ लेना है, न कुछ करना है । शास्त्रोंने
पतिव्रताकी बड़ी महिमा गायी है । पतिव्रताकी महिमा क्यों है ? पति कहे ज्यों करे, उसकी राजीमें राजी रहे । अपना कुछ नहीं । अपने-आप भी अपनी नहीं । वो तो पतिकी है बस, उसके हाथका खिलौना है । खिलाओ, पिलाओ, मर्जी आवे ज्यों चलाओ । ऐसे ही पुत्र होता है । पुत्रका, शिष्यका, पत्नीका बहुत जल्दी कल्याण होता है । अपनी हेकड़ी छोड़ी कि हुआ कल्याण । अपनेपर काम आ जाय तो विचार करना पड़ता है कि यह करें कि नहीं करे, यह ठीक है कि बेठीक है । पर उन्होंने कह दिया, अपने कर दिया । क्यों कर दिया कि उन्होंने कह दिया इस वास्ते कर दिया । अपने क्या मतलब ? बोलो, इसमें शंका क्या है ? अरे ! अभिमान भरा है भीतरमें भाई ! अभिमान भरा है अभिमान ! अभिमान, आलस्य, प्रमाद‒ऐसी वृत्तियाँ भरी हैं । तामसी वृत्तियाँ कम होते ही सुगमतासे कल्याण हो जाता है और ज्यादा होती है तो देरी लगती है । शास्त्रविहित ही करना है, निषिद्ध थोड़े ही करना है । |
परतन्त्रता
दीखती है तो अभिमानके कारण दीखती है । अभिमान नहीं रखना है । अपनेको कोई कहे, वैसा करनेमें बहुत आनन्द है । कहे जैसा
करनेमें अपनेपर कुछ जिम्मेवारी नहीं रहती, किंचिन्मात्र भी अपनेपर आफत नहीं रहती ।
कहे ज्यों कर दें, बोलो ! इसमें तनिक भी परतन्त्रता मालूम देती है ? परतन्त्रता है
ही नहीं इसमें । अभिमानके
कारण परतन्त्रता प्रतीत होती है । बड़ी स्वतन्त्रता, बड़ी आजादी है इसमें ।
कह दिया, वैसा कर दिया, बस । अपनेपर कोई जिम्मेवारी नहीं, किंचिन्मात्र जिम्मेवारी
नहीं; न पहले, न उस समय, न पीछे । ‘तूने ऐसा कैसे कर दिया ?’ कि ‘कह दिया, इसलिये
कर दिया ।’ अभिमानके कारण यह बात समझमें नहीं आती । मौज बहुत है इसमें बोलो !
इसमें शंका करो । अरे भाई ! सीधी-सी बात बात है । कौन-सी गूढ़ पंक्ति है ? करना
पड़ता है अभिमानीको । अभिमान
आया है न भीतर, वह चुभता है, वह करने नहीं
देता, बुरा लगता है । साईकिलको घुमा लें, गोल-गोल तो घूम जावे, सीधी चलावे,
खड़ी कर दो तो खड़ी हो जाय, उतर जाओ तो उतर जाओ, चढ़ जाओ तो चढ़ जाओ । आगे चलाकर पीछे
चलाई फिर आगे चलाई और फिर पीछे चलाई । साईकिल कहती है कि बार-बार ऐसा क्यों चलाते
हो ? कहती है क्या ? मर्जी है मालिककी चलाओ, मत चलाओ, गोल चलाओ, खड़ी कर दो । जँचे
जैसे चलाओ, हमें क्या मतलब है ? देखो, भारी तब लगता है, जब
आज्ञा देनेवाला है उसमें आदर-बुद्धि नहीं है, पूज्य-बुद्धि नहीं है और
पूज्य-बुद्धि होती तो वह कुछ कह दे तो इतनी खुशी होती है कि कह नहीं सकते । कभी
कहते नहीं, मेरेको कह दिया, कितने आनन्दकी बात है ! आप-से-आप यदि करते तो
इतने फायदेकी नहीं होती । उन्होंने आज्ञा दे दी । मेरेको कह दिया ओ हो ! मैं तो
बड़भागी हूँ, ऐसे बहुत आनन्द आता है; परन्तु
आज्ञा देनेवालेमें पूज्यबुद्धि, आदरभाव होना चाहिये । तीन तरहका काम
है‒एक काम करना है, एक सेवा करना है, एक पूजा
करना है । काम तो नौकर भी कर देगा । जिसमें सेवकपनका भाव रहता है, वो सेवा
करता है जबकि काम वह-का-वह ही है । उस समय वह सेवा हो जाती है और वह ही जब जिसकी
आज्ञाका पालन करता है, उसपर बहुत पूज्य भाव रखता है, जैसे भगवद्बुद्धि है, भगवान्
है साक्षात्, वे कहे कि तू ऐसा कर दे तो कितना आनन्द आवे इसमें !‒वह पूजा होती है ।
वह ही काम पूजा हो जायगा । पिताकी सेवा करनेमें भीतरमें पूज्य भाव रहे कि मेरा
अहोभाग्य है । जीवन सफल हो गया, समय सफल हो गया, वस्तु सफल हो गयी कि इनकी सेवामें
लग गयी । तब वह पूजा हो जाती है । आदर ज्यादा होनेसे
पूजा, कम आदर होनेसे सेवा और स्वार्थके लिये, तनख्वाहके लिये काम करता हो तो वह है
काम‒ये तीन भेद हो जाते हैं भावके कारणसे । जितना ही भाव त्यागका होता है, उतना ही
श्रेष्ठ होता है । अपने द्वारा कामनाका त्याग और उसमें पूज्य बुद्धि‒ये दो
चीजें है खास ।
हमें तो
गीतामें सातवें और नवें अध्यायमें दो बातें ही खास दीखती है । सातवेंमें तो ‘कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः’ कामनाके कारण और नवमें ‘न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते’ (गीता ९/२४)
मेरेको जानते नहीं, इस वास्ते पतन होता है । तो भगवद्बुद्धि
हो और इधर स्वार्थका त्याग हो तो उसकी मुक्ति हो गयी, बन्धन रहा ही नहीं ।
बन्धन दो ही हैं‒एक है पदार्थ और एक है क्रिया । एक तो काम करना और एक धन चाहना ।
इन दोमें जिनकी आसक्ति होती है, जिनकी प्रियता होती है, वह पारमार्थिक रुचि नहीं
कर सकता । |
कई वर्ष पहलेकी बात है । बाँकुड़ा जिलेमें अकाल पड़ गया तो
गीताप्रेसके संस्थापक, संचालक तथा संरक्षक सेठजी श्रीजयदयालजी गोयन्दकाने वहाँ कई
जगह कीर्तन आरम्भ करवा दिया और लोगोंसे कहा कि वहाँ बैठकर दो घण्टे कीर्तन करो और
आधा सेर चावल ले जाओ । पैसे देनेसे वे मांस, मछली आदि खरीदेंगे, पर चावल देनेसे वे
चावल खायेंगे ही, इसलिये चावल देना शुरू किया । इस तरह उन्होंने सौ-सवा सौ कैम्प
खोल दिये । एक दिन सेठजी वहाँ देखनेके लिये गये । रात्रिमें वे जहाँ ठहरे थे, वहाँ
बहुत-से बंगाली लोग इकठ्ठे हुए । उन्होंने सेठजीकी बड़ी प्रशंसा की और कहा कि आपने
हमारे जिलेको जिला दिया ! सेठजी बोले कि देखो, तुमलोग झूठी प्रशंसा करते हो, हमने क्या खर्च किया है ? हम मारवाड़से यहाँ आये
थे । यहाँ आकर हमने बंगालसे जितना कमाया, वह सब-का-सब दे दें तो आपकी ही
वस्तु आपको दी, हमने अपना क्या दिया ? वह भी सब नहीं दिया है । वह सब दे दें और
फिर हम मारवाड़से लाकर दें, तब यह माना जायगा कि हमने दिया । इस तरह हमें हरेकको उसीकी वस्तु समझकर उसको देनी है । देकर हम उऋण हो
जायँगे, नहीं तो ऋण रह जायगा । अपनेमें सेवकपनेका अभिमान भी नहीं होना चाहिये ।
घरमें रसोई बनती है तो बच्चे भी खाते हैं, स्त्रियाँ भी खाती हैं, पुरुष भी खाते
हैं; क्योंकि उसमें सबका हिस्सा है । इसी तरह कोई भूखा आ जाय, कुत्ता आ जाय, कौआ आ
जाय तो उनका भी उसमें हिस्सा है । उनके हिस्सेकी चीज उनको दे दें । इस प्रकार निःस्वार्थभावसे आचरण करनेपर हमारा कल्याण हो जायगा
। गीतामें आया है‒ स्वकर्मणा तमभ्यर्च सिद्धिं विन्दति मानवः ॥ (१८/४६) ‘अपने कर्तव्य कर्मके द्वारा उस परमात्माका
पूजन करके मनुष्य सिद्धिको प्राप्त हो जाता है ।’ तात्पर्य है कि ब्राह्मण ब्राह्मणोचित कर्मोंके द्वारा पूजन
करे, क्षत्रिय क्षत्रियोचित कर्मोंके द्वारा पूजन करे, वैश्य वैश्योचित कर्मोंके
द्वारा पूजन करे और शूद्र शूद्रोचित कर्मोंके द्वारा पूजन करे । इस प्रकार सबका
पूजन, सबका हित करनेसे अपना कल्याण हो जाता है‒यह बात गीतामें बहुत विलक्षण रीतिसे
बतायी गयी है । यदि हम सुख चाहते हैं तो दूसरोंको भी सुख
पहुँचाना हमारा कर्तव्य है । यदि हम अपने पास कुछ भी नहीं रखते हैं तो दूसरोंको
देनेका विधान हमारेपर लागू भी नहीं होता । इन्कमपर टैक्स लगता है । हमने कमाया है तो उसपर टैक्स लगेगा । यदि हमने कमाया
ही नहीं तो उसपर टैक्स कैसे लगेगा ? अतः यदि हम अपने पास वस्तुएँ रखते हैं तो उनसे
दूसरोंकी सेवा करनी है, दूसरोंका हित करना है । गीताका तात्पर्य सबके कल्याणमें है और
सबके कल्याणमें ही हमारा कल्याण निहित है । जो लोगोंको अन्न बाँटता है क्या
वह भूखा रहेगा ? क्या उसका हित नहीं होगा ? उसका हित अपने-आप हो जायगा । चाहे धनी हो, चाहे गरीब हो; चाहे बहुत परिवारवाला हो चाहे
अकेला हो; चाहे बलवान् हो, चाहे निर्बल हो; चाहे विद्वान् हो, कल्याणमें सबका समान
हिस्सा है । जैसे, एक माँके दस बेटे होते हैं तो क्या माँके दस हिस्से होते हैं ?
माँ तो सभी बेटोंके लिये पूरी-की-पूरी होती है । दसों बेटे पूरी माँको अपनी मानते
हैं । ऐसे ही भगवान् पूरे-के-पूरे हमारे हैं । भगवान्के हिस्से नहीं होते । हम सब उनकी गोदमें बैठनेके समान अधिकारी हैं । इसलिये
हम सब आपसमें प्रेमसे रहें और एक-दूसरेका हित करें‒यह गीताका सिद्धान्त है‒‘परस्परं भावयन्तः’, ‘सर्वभूतहिते रताः ।’ प्रश्न‒दान देनेमें, सेवा
करनेमें पात्र-अपात्रका विचार करना चाहिये कि नहीं ? उत्तर‒अन्न, जल, वस्त्र और औषध‒इनको देनेमें पात्र-अपात्र आदिका
विचार नहीं करना चाहिये । जिसको अन्न, जल आदिकी आवश्यकता है, वही पात्र है । परन्तु कन्यादान, भूमिदान, गोदान आदि विशेष दान करना हो तो उसमें देश,
काल, पात्र आदिका विशेष विचार करना चाहिये । अन्न, जल, वस्त्र और औषध‒इनको देनेमें यदि हम
पात्र-कुपात्रका अधिक विचार करेंगे तो खुद कुपात्र बन जायँगे और दान करना कठिन हो
जायगा ! अतः हमारी दृष्टिमें अगर कोई भूखा, प्यासा आदि दीखता हो तो उसको अन्न, जल
आदि दे देना चाहिये । यदि वह अपात्र भी हुआ तो हमें पाप नहीं लगेगा । प्रश्न‒दूसरोंको देनेसे
लेनेवालेकी आदत बिगड़ जायगी, लेनेका लोभ पैदा हो जायगा; अतः देनेसे क्या लाभ ? उत्तर‒दूसरेको निर्वाहके लिये दें, संचयके लिये नहीं अर्थात्
उतना ही दें, जिससे उसका निर्वाह हो जाय । यदि लेनेवालेकी आदत बिगड़ती है तो यह दोष वास्तवमें देनेवालेका है अर्थात्
देनेवाला कामना, ममता, स्वार्थ आदिको लेकर देता है । यदि
देनेवाला निःस्वार्थ-भावसे, बदलेकी आशा न रखकर दे तो जिसको देगा, उसका स्वभाव भी देनेका बन जायगा, वह भी सेवक बन जायगा !
रामायणमें आया है‒ सर्बस दान दीन्ह सब
काहू । जेहिं पावा राखा नहिं ताहू ॥ (मानस, बाल॰ १९४/४) नारायण ! नारायण
!! नारायण !!! ‒ ‘जित देखूँ तित तू’ पुस्तकसे |
सबके हितका भाव हरेक भाई-बहन रख सकते हैं । यह भाव गृहस्थ
भी रख सकते हैं, साधु-संन्यासी भी रख सकते हैं, दरिद्र-से-दरिद्र मनुष्य भी रख
सकते हैं, धनी-से-धनी मनुष्य भी रख सकते हैं । हमारे पास जो वस्तुएँ हैं, वे किसकी
हैं‒इसका पता नहीं है, पर कोई अभावग्रस्त आदमी सामने आ जाय तो वस्तुको उसीकी समझकर
उसको दे दें‒‘त्वदीयं वस्तु गोविन्द तुभ्यमेव समर्पये ।’
जैसे हमारे पास कोई सज्जन आता है और कहता है कि ‘भाई, आज मेरेको मेलेमें जाना है ।
मेरे पास एक हजार रुपये हैं, कोई जेब न कतर ले, इसलिये इन रुपयोंको आपके पास रखता
हूँ ।’ वह रुपये रखकर चला जाता है । शामको वह आकर रुपये माँगता है और हम उसको
रुपये वापस दे देते हैं तो क्या हमने दान कर दिया ? दान नहीं किया, प्रत्युत उसीकी
वस्तु उसको दे दी । शास्त्रमें आया है कि रसोई बननेके बाद यदि ब्रह्मचारी और
संन्यासी आ जायँ तो उनको अन्न न देनेसे पाप लगता है, जिसकी शुद्धि चान्द्रायणव्रत
करनेसे होती है । यदि उनको थोड़ा-स अन्न भी दे दें तो इतनेमें हमारे धर्मका पालन हो
जायगा और पाप नहीं लगेगा । इसमें कोई शंका कर सकता है कि हमने पैसे कमाये, उससे सब
सामग्री लाये और रसोई बनायी, पर कोई संन्यासी आ जाय तो उसको न देनेसे पाप लग जायगा‒यह
कैसा न्याय है ? इसका समाधान यह है कि जिसने संन्यास ले लिया, त्याग कर दिया और जो
अपने पासमें कुछ नहीं रखता, उसके हकका धन कहाँ गया ? यदि वह चाहता तो दूकान, खेत
आदिमें काम करके, पढ़ाने-लिखानेका काम करके अपने जीवन-निर्वाहके योग्य धन कमा सकता
था, रुपयोंका संग्रह कर सकता था, पर वह उसने नहीं किया तो वे रुपये हमारे पास ही
रहे ! इसलिये समयपर भोजनके लिये आ जाय तो उसको रोटी दे दें‒यह हमारा कर्तव्य है ।
नहीं देंगे तो उसका हमपर ऋण रहेगा, हमें पाप लगेगा । साधुओंकी भिक्षावृत्तिको शास्त्रोंमें बहुत अधिक पवित्र
बताया गया है; क्योंकि कई घरोंसे थोड़ा-थोड़ा लेनेसे देनेवालेपर कोई भार भी नहीं
पड़ता और लेनेवालेकी उदरपूर्ति भी हो जाती है । इसलिये इसको ‘माधुकरी वृत्ति’ भी
कहते हैं । ‘मधुकर’ नाम भौंरे अथवा मधुमक्खीका है । मधुमक्खी हरेक पुष्पसे
थोड़ा-थोड़ा रस लेती है और किसी पुष्पका नुकसान भी नहीं करती । एक साधु थे । उनसे
किसीने पूछा कि ‘आप भोजन कहाँ पाते हो ? पासमें एक पैसा तो है नहीं !’ साधुने कहा
कि ‘भिक्षा पा लेते हैं ।’ उसने फिर पूछा कि ‘कभी भिक्षा न मिले तो ?’ साधु बोला‒‘तो
भूखको ही पा लेते हैं !’ भूखको पानेका तात्पर्य है कि आज हम भोजन नहीं करेंगे, कल
करेंगे । संसारमें एक-दूसरेको दिये बिना, एक-दूसरेकी सेवा किये बिना
किसीका भी निर्वाह नहीं हो सकता । राजा-महाराजा कोई क्यों न हो, अपने निर्वाहके
लिये कुछ-न-कुछ सहायता लेनी ही पड़ती है । इसलिये गीतामें आया है‒ देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः । परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ ॥ (३/११) ‘अपने कर्तव्य-कर्मके द्वारा तुमलोग
देवताओंको उन्नत करो और वे देवातालोग अपने कर्तव्यके द्वारा तुमलोगोंको उन्नत करें
। इस प्रकार एक-दूसरेको उन्नत करते हुए तुमलोग परम कल्याणको प्राप्त हो जाओगे ।’
कितनी विलक्षण बात है कि एक-दूसरेका पूजन (सेवा) करते-करते
परम कल्याणकी प्राप्ति हो जाती है ! |
