।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि–
वैशाख शुक्ल चतुर्थी, वि.सं. २०७६ बुधवार
अपने प्रभुको कैसे पहचानें ?
        



जैसे हमें ‘मैं हूँ’–इस प्रकार अपने होनेपनका स्पष्ट अनुभव होता है, इसमें कभी किंचिन्मात्र भी सन्देह नहीं होता, ऐसे ही ‘सब कुछ परमात्मा ही हैं’–इसका स्पष्ट अनुभव होना चाहिये । ऐसा अनुभव होनेपर संसारका राग, सुखासक्ति सर्वथा मिट जाती है और संसार संसाररूपसे रहता ही नहीं, प्रत्युत भगवत्स्वरूप ही हो जाता है । मैं-तू-यह-वह कुछ नहीं रहता, केवल भगवान्‌-ही-भगवान्‌ रहते हैं; क्योंकि वास्तवमें भगवान्‌ ही हैं । ऐसा अनुभव करनेके लिये भगवान्‌में अपनी स्थिति नहीं करनी है, प्रत्युत अपने-आपको भगवान्‌के समर्पित कर देना है । अगर उसमें अपनी स्थित करेंगे तो अहम् (स्थिति करनेवाला) बना रहेगा । इसलिए ‘वासुदेवः सर्वम्’ का अनुभव करनेमें शरणागति मुख्य है । शरणागतिमें साधक पहले भगवान्‌के आश्रित होता है, फिर उसीमें मिल जाता है । जैसे, पहले कन्याका विवाह होता है, फिर वह अपने गोत्रको छोड़कर पतिके गोत्रवाली हो जाती है । ऐसे ही पहले भक्त ‘मैं भगवान्‌का हूँ और भगवान्‌ मेरे हैं’–इस प्रकार भगवान्‌के आश्रित होता है, फिर उसके शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धि-अहम् सब भगवान्‌में लीन हो जाते हैं अर्थात् केवल भगवान्‌-ही-भगवान्‌ रह जाते हैं । दूसरे शब्दोंमें, पहले साधक ‘मैं’ और ‘मेरा’ को छोड़कर ‘तू’ और ‘तेरा’ को स्वीकार करता है, फिर केवल तू-ही-तू रहा जाता है । यही ‘वासुदेवः सर्वम्’ है ।

नारायण !     नारायण !!     नारायण !!!


–‘सब जग ईश्वररूप है’ पुस्तकसे