।। श्रीहरिः ।।

  


  आजकी शुभ तिथि–
वैशाख शुक्ल एकादशी, वि.सं.-२०८०, सोमवार

श्रीमद्भगवद्‌गीता

साधक-संजीवनी (हिन्दी टीका)



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सम्बन्ध‒कुलका क्षय करनेसे होनेवाले जिन दोषोंको हम जानते हैं, वे दोष कौन-से हैं ? उन दोषोंकी परम्परा आगेके पाँच श्‍लोकोंमें बताते हैं ।

सूक्ष्म विषय‒कुलके नाशसे सनातन कुलधर्मोंका नष्‍ट होना और अधर्मका बढ़ना ।

       कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः ।

धर्मे  नष्‍टे कुलं कृत्स्‍नमधर्मोऽभिभवत्युत ॥ ४० ॥

कुलक्षये = कुलका क्षय होनेपर

नष्‍टे = नाश होनेपर (बचे हुए)

सनातनाः = सदासे चलते आये

कृत्स्‍नम् = सम्पूर्ण

कुलधर्माः = कुलधर्म

कुलम् = कुलको

प्रणश्यन्ति = नष्‍ट हो जाते हैं

अधर्मः = अधर्म

उत = और

अभिभवति = दबा लेता है ।

धर्मे = धर्मका

 

व्याख्याकुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः’जब युद्ध होता है, तब उसमें कुल (वंश)-का क्षय (ह्रास) होता है । जबसे कुल आरम्भ हुआ है, तभीसे कुलके धर्म अर्थात् कुलकी पवित्र परम्पराएँ, पवित्र रीतियाँ, मर्यादाएँ भी परम्परासे चलती आयी हैं । परन्तु जब कुलका क्षय हो जाता है, तब सदासे कुलके साथ रहनेवाले धर्म भी नष्‍ट हो जाते हैं अर्थात् जन्मके समय, द्विजाति-संस्कारके समय, विवाहके समय, मृत्युके समय और मृत्युके बाद किये जानेवाले जो-जो शास्‍त्रीय पवित्र रीति-रिवाज हैं, जो कि जीवित और मृतात्मा मनुष्योंके लिये इस लोकमें और परलोकमें कल्याण करनेवाले हैं, वे नष्‍ट हो जाते हैं । कारण कि जब कुलका ही नाश हो जाता है, तब कुलके आश्रित रहनेवाले धर्म किसके आश्रित रहेंगे ?

‘धर्मे नष्‍टे कुलं कृत्स्‍नमधर्मोऽभिभवत्युत’जब कुलकी पवित्र मर्यादाएँ, पवित्र आचरण नष्‍ट हो जाते हैं, तब धर्मका पालन न करना और धर्मसे विपरीत काम करना अर्थात् करनेलायक कामको न करना और न करनेलायक कामको करनारूप अधर्म सम्पूर्ण कुलको दबा लेता है अर्थात् सम्पूर्ण कुलमें अधर्म छा जाता है ।

अब यहाँ यह शंका होती है कि जब कुल नष्‍ट हो जायगा, कुल रहेगा ही नहीं, तब अधर्म किसको दबायेगा ? इसका उत्तर यह है कि जो लड़ाईके योग्य पुरुष हैं, वे तो युद्धमें मारे जाते हैं; किन्तु जो लड़ाईके योग्य नहीं हैं, ऐसे जो बालक और स्‍त्रियाँ पीछे बच जाती हैं, उनको अधर्म दबा लेता है । कारण कि जब युद्धमें शस्‍त्र, शास्‍त्र, व्यवहार आदिके जानकार और अनुभवी पुरुष मर जाते हैं, तब पीछे बचे लोगोंको अच्छी शिक्षा देनेवाले, उनपर शासन करनेवाले नहीं रहते । इससे मर्यादाका, व्यवहारका ज्ञान न होनेसे वे मनमाना आचरण करने लग जाते हैं अर्थात् वे करनेलायक कामको तो करते नहीं और न करनेलायक कामको करने लग जाते हैं । इसलिये उनमें अधर्म फैल जाता है ।

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सूक्ष्म विषय‒अधर्म बढ़नेसे स्‍त्रियोंका दूषित होना और वर्णसंकर पैदा होना ।

अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्‍त्रियः ।

         स्‍त्रीषु दुष्‍टासु वार्ष्णेय     जायते वर्णसङ्करः ॥ ४१ ॥

कृष्ण = हे कृष्ण !

स्‍त्रीषु = स्‍त्रियोंके

अधर्माभिभवात् = अधर्मके अधिक बढ़ जानेसे

दुष्‍टासु = दूषित होनेपर

कुलस्‍त्रियः = कुलकी स्‍त्रियाँ

वर्णसङ्करः = वर्णसंकर

प्रदुष्यन्ति = दूषित हो जाती हैं (और)

जायते = पैदा हो जाते हैं ।

वार्ष्णेय = हे वार्ष्णेय !

 

व्याख्याअधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्‍त्रियः’धर्मका पालन करनेसे अन्तःकरण शुद्ध हो जाता है । अन्तःकरण शुद्ध होनेसे बुद्धि सात्त्विकी बन जाती है । सात्त्विकी बुद्धिमें क्या करना चाहिये और क्या नहीं करना चाहिये‒इसका विवेक जाग्रत रहता है । परन्तु जब कुलमें अधर्म बढ़ जाता है, तब आचरण अशुद्ध होने लगते हैं, जिससे अन्तःकरण अशुद्ध हो जाता है । अन्तःकरण अशुद्ध होनेसे बुद्धि तामसी बन जाती है । बुद्धि तामसी होनेसे मनुष्य अकर्तव्यको कर्तव्य और कर्तव्यको अकर्तव्य मानने लग जाता है अर्थात् उसमें शास्‍त्र-मर्यादासे उलटी बातें पैदा होने लग जाती हैं । इस विपरीत बुद्धिसे कुलकी स्‍त्रियाँ दूषित अर्थात् व्यभिचारिणी हो जाती हैं ।

स्‍त्रीषु दुष्‍टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसङ्करः’स्‍त्रियोंके दूषित होनेपर वर्णसंकर पैदा हो जाता है

१.परस्पर विरुद्ध धर्मोंका मिश्रण होकर जो बनता है, उसको संकर’ कहते हैं । जब कर्तव्यका पालन नहीं होता, तब धर्मसंकर, वर्णसंकर, जातिसंकर, कुलसंकर, वेशसंकर, भाषासंकर, आहारसंकर आदि अनेक संकरदोष आ जाते हैं ।

पुरुष और स्‍त्री‒दोनों अलग-अलग वर्णके होनेपर उनसे जो संतान पैदा होती है, वह वर्णसंकर’ कहलाती है ।

अर्जुन यहाँ कृष्ण’ सम्बोधन देकर यह कह रहे हैं कि आप सबको खींचनेवाले होनेसे कृष्ण’ कहलाते हैं, तो आप यह बतायें कि हमारे कुलको आप किस तरफ खींचेंगे अर्थात् किधर ले जायँगे ?

वार्ष्णेय’ सम्बोधन देनेका भाव है कि आप वृष्णिवंशमें अवतार लेनेके कारण वार्ष्णेय’ कहलाते हैं । परन्तु जब हमारे कुल (वंश)-का नाश हो जायगा, तब हमारे वंशज किस कुलके कहलायेंगे ? अतः कुलका नाश करना उचित नहीं है ।

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