।। श्रीहरिः ।।
भगवान्

आज ही मिल सकते है-४


(गत् ब्लॉगसे आगेका)
भगवान् कैसे मिलें ? कैसे मिलें ? ऐसी अनन्य लालसा हो जायगी तो भगवान् जरुर मिलेंगे, इसमें सन्देह नहीं है । आप और कोई इच्छा न करके, केवल भगवान् की इच्छा करके देखो कि वे मिलते है कि नहीं मिलते हैं ! आप करके देखो तो मेरी भी परीक्षा हो जायगी कि मैं ठीक कहता हूँ कि नहीं ! मैं तो गीताके बलपर कहता हूँ । गीतामें भगवान् ने कहा है—‘ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्’ (४/११) ‘जो भक्त जिस प्रकार मेरी शरण लेते हैं, मैं उन्हें उसी प्रकार आश्रय देता हूँ ।’ हमें भगवान् के बिना चैन नहीं पड़ेगा । हम भगवान् के बिना रोते हैं तो भगवान् भी हमारे बिना रोने लग जायँगे ! भगवान् के समान सुलभ कोई है ही नहीं ! भगवान् कहते हैं—

अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः ।
तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः ॥
(गीता ८/१४)

‘हे पृथानन्दन ! अनन्य चित्तवाला जो मनुष्य मेरा नित्य-निरन्तर स्मरण करता है, उस नित्य-निरन्तर मुझमें लगे हुए योगीके लिये मैं सुलभ हूँ अर्थात उसको सुलभतासे प्राप्त हो जाता हूँ ।’
भगवान् ने अपनेको तो सुलभ कहा है, पर महात्माको दुर्लभ कहा है—

बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यन्ते ।
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः ॥
(गीता ७/१९)

‘बहुत जन्मोंके अन्तिम जन्ममें अर्थात् मनुष्यजन्ममें ‘सब कुछ परमात्म ही हैं’—इस प्रकार जो ज्ञानवान मेरे शरण होता है, वह महात्मा अत्यन्त दुर्लभ है ।’

हरि दुरलभ नहिं जगत में, हरिजन दुरलभ होय ।
हरि हेरयाँ सब जग मिलै, हरिजन कहिं एक होय ॥

भगवान् के भक्त तो सब जगह नहीं मिलते, पर भगवान् सब जगह मिलते हैं । भक्त जहाँ भी निश्चय कर लेता है, भगवान् वहीं प्रकट हो जाते हैं—

आदि अंत जन अनंत के, सारे कारज सोय ।
जेहि जिव ऊर नहचो धरै, तेहि ढिग परगट होय ॥

प्रह्लादजीके लिये भगवान् खम्भेमेंसे प्रकट हो गये—

प्रेम बदौं प्रहलादहिको, जिन पाहनतें परमेस्वरु काढे ॥
(कवितावली ७/१२७)

भगवान् सबके परम सुहृद हैं । वे पापी, दुराचारीको जल्दी मिलते हैं । माँ कमजोर बालकको जल्दी मिलती है । एक माँके दो बेटे हैं । एक बेटा तो समयपर भोजन कर लेता है, फिर कुछ नहिं लेता और दूसरा बेटा दिनभर खाता रहता है । दोनों बेटे भोजनके लिये बैठ जायँ तो माँ पहले उसको रोटी देगी जो समयपर भोजन करता है; क्योंकि वह भूखा उठ जायगा तो शामतक खायेगा नहीं । दूसरे बेटेको माँ कहती है कि तु ठहर जा; क्योंकि वह तो बकरीकी तरह दिनभर चरता रहता है । दोनों एक ही माँके बेटे हैं,फिर भी माँ पक्षपात करती है । इसी तरह जो एक भगवान् के सिवाय कुछ नहीं चाहता, उसको भगवान् सबसे पहले मिलते हैं; क्योंकि वह भगवान् को अधिक प्रिय है । वह एक भगवान् के सिवाय अन्य किसीको अपना नहीं मानता । वह भगवान् के लिये दुःखी होता है तो भगवान् से उसका दुःख सहा नहीं जाता ।

कोई चार-पाँच वर्षका बालक हो और उसका माँसे झगडा हो आय तो माँ उसके सामने ढीली पड़ जाती है । संसारकी लड़ाईमें तो जिसमें अधिक बल होता है, वह जीत जाता है, पर प्रेमकी लड़ाईमें जिसमें अधिक प्रेम होता है, वह हार जाता है । बेटा माँसे कहता है कि मैं तेरी गोदमें नहीं आऊँगा, पर माँ उसकी गरज करती है कि आ जा, आ जा बेटा ! माँमें यह स्नेह भगवान् से ही तो आया है । भगवान् भी भक्तकी गरज करते हैं । भगवान् को जितनी गरज है, उतनी गरज दुनियाको नहीं है । माँको जितनी गरज होती है, उतनी बालकको नहीं होती । बालक तो माँका दूध पीते समय दाँतोंसे काट लेता है, पर माँ क्रोध नहीं करती । अगर वह क्रोध करे तो बालक जी सकता है क्या ? माँ तो बालकपर कृपा ही करती है । ऐसे ही भगवान् हमारी अनन्त जन्मोंकी माता है । वे भक्तकी उपेक्षा नहीं कर सकते । भक्तको वे अपना मुकुटमणि मानते हैं—‘मैं तो हूँ भगतन को दास, भगत मेरे मुकुटमणि’ । भक्तोंका काम करनेके लिये भगवान् हरदम तैयार रहते हैं । जैसे बच्चा माँके बिना नहीं रह सकता और माँ बच्चेके बिना नहीं रह सकती, ऐसे ही भक्त भगवान् के बिना नहीं रह सकता और भगवान् भक्तके बिना नहीं रह सकते ।
—‘मानवमात्रके कल्याणके लिये’ पुस्तकसे

http://www.swamiramsukhdasji.org/swamijibooks/pustak/pustak1/html/mannavmatr%20ke%20kalyan%20ke%20liye/manav001.htm

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।। श्रीहरिः ।।
भगवान्
आज ही मिल सकते है-३

(गत् ब्लॉगसे आगेका)

वास्तवमें भगवान् मिले हुए ही हैं । आपकी सांसारिक इच्छा ही उनको रोक रही है । आप रुपयोंकी इच्छा करते हो, भोगोंकी इच्छा करते हो तो भगवान् उनको जबर्दस्ती नहीं छुडाते । अगर आप सांसारिक इच्छाएँ छोड़कर केवल भगवान् को ही चाहो तो आपको कौन रोक सकता है ? आपको बाधा देनेकी किसीको ताकत नहीं है । अगर आप भगवान् के लिये व्याकुल हो जाओ तो भगवान् भी व्याकुल हो जायँगे । आप संसारके लिये व्याकुल हो जाओ तो संसार व्याकुल नहीं होगा । आप संसारके लिये रोओ तो संसार राजी नहीं होगा । पर भगवान् के लिये रोओ तो वे भी रो पड़ेंगे ।

बालक सच्चा रोता है या झूठा, यह माँ ही समझती है । बालकके आँसू तो आये नहीं, केवल ऊँ-ऊँ करता है तो माँ समझ लेती है कि यह ठगाई करता है ! अगर बालक सच्चाईसे रो पड़े, उसको साँस ऊँचे चड जायँ तो माँ सब काम भूल जायगी और चट उसको उठा लेगी । अगर माँ उस बालकके पास न जाय तो उस माँको मर जाना चाहिये ! उसके जीनेका क्या लाभ ! ऐसे ही सच्चे ह्रदयसे चाहनेवालेको भगवान् न मिलें तो भगवान् को मर जाना चाहिये !

एक साधु थे । उनके पास एक आदमी आया और उसने पूछा कि भगवान् जल्दी कैसे मिलें ? साधुने कहा कि भगवान् उत्कट चाहना होनेसे मिलेंगे । उसने पूछा कि उत्कट चाहना कैसी होती है ? साधुने कहा कि भगवान् के बिना रहा न जाय । वह आदमी ठीक समझा नहीं और बार-बार पूछता रहा कि उत्कट चाहना कैसी होती है ? एक दिन साधुने उस आदमीसे कहा कि आज तुम मेरे साथ नदीमें स्नान करने चलो । दोनों नदीमें गये और स्नान करने लगे । उस आदमीने जैसे ही नदीमें डुबकी लगायी, साधुने उसका गला पकड़कर नीचे दबा दिया । वह आदमी थोड़ी देर नदीके भीतर छटपटाया, फिर साधुने उसको छोड़ दिया । पानीसे ऊपर आनेपर वह बोला कि तुम साधु होकर ऐसा काम करते हो ! मैं तो आज मर जाता ! साधुने पूछा कि बता, तेरेको क्या याद आया ? माँ याद आयी, बाप याद आया या स्त्री-पुत्र याद आये ? वह बोला कि महाराज, मेरे तो प्राण निकले जा रहे थे, याद किसकी आती ? साधु बोले कि तुम पूछते थे कि उत्कट अभिलाषा कैसी होती है, उसीका नमूना मैंने तेरेको बताया है । जब एक भगवान् के सिवाय कोई भी याद नहीं आयेगा और उनकी प्राप्तिके बिना रह नहीं सकोगे, तब भगवान् मिल जायँगे । भगवान् की ताकत नहीं है कि मिले बिना रह जायँ ।

भगवान् कर्मोंसे नहीं मिलते । कर्मोंसे मिलनेवाली चीज नाशवान् होती है । कर्मोंसे धन, मान, आदर, सत्कार मिलता है । परमात्मा अविनाशी हैं । वे कर्मोंका फल नहीं हैं, प्रत्युत आपकी चाहनाका फल है । परन्तु आपको परमात्माके मिलनेकी परवाह ही नहीं है, फिर वे कैसे मिलेंगे ? भगवान् मानो कहते हैं कि मेरे बिना तेरा काम चलता है तो मेरा भी तेरे बिना काम चलता है । मेरे बिना तेरा काम अटकता है तो मेरा काम भी तेरे बिना अटकता है । तु मेरे बिना नहीं रह सकता तो मैं भी तेरे बिना नहीं रह सकता ।

आपमें परमात्मप्राप्तिकी जोरदार इच्छा है ही नहीं । आप सत्संग करते हो तो लाभ जरुर होगा । जितना सत्संग करोगे, विचार करोगे, उतना लाभ होगा—इसमें सन्देह नहीं है । परन्तु परमात्माकी प्राप्ति जल्दी नहीं होगी । कई जन्म लग जायँगे, तब उनकी प्राप्ति होगी । अगर उनकी प्राप्तिकी जोरदार इच्छा हो जाय तो भगवान् को आना ही पड़ेगा । वे तो हरदम मिलनेके लिये तैयार हैं ! जो उनको चाहता है, उसको वे नहीं मिलेंगे तो फिर किसको मिलेंगे ? इसलिए ‘हे नाथ ! हे मेरे नाथ !’ कहते हुए सच्चे ह्रदयसे उनको पुकारो ।

सच्चे ह्रदयसे प्रार्थना, जब भक्त सच्चा गाय है ।
तो भक्तवत्सल कान में, वह पहुँच झट ही जाय है ॥

भक्त सच्चे ह्रुदयसे प्रार्थना करता है तो भगवान् को आना ही पडता है । किसीकी ताकत नहीं जो भगवान् को रोक दे । जिसके भीतर एक भगवान् के सिवाय अन्य कोई इच्छा नहीं है, न जीनेकी इच्छा है, न मरनेकी इच्छा है, न मानकी इच्छा है, न सत्कारकी इच्छा है, न आदरकी इच्छा है, न रुपयोंकी इच्छा है, न कुटुम्बकी इच्छा है, उसको भगवान् नहीं मिलेंगे तो क्या मिलेगा ? आप पापी हैं या पुण्यात्मा हैं, पढ़े-लिखे हैं या अपढ़ हैं, इस बातको भगवान् नहीं देखते । वे तो केवल आपके हृदयका भाव देखते हैं—

रहति न प्रभु चित चूक किए की ।
करत सुरति सय बार हिए की ॥
(मानस,बाल।२९/३)

वे हृदयकी बातको याद रखते हैं, पहले किये पापोंको याद रखते ही नहीं ! भगवान् का अंतःकरण ऐसा है, जिसमें आपके पाप छपते ही नहीं ! केवल आपकी अनन्य लालसा छपती है ।
(शेष आगेके ब्लॉगमें )
—‘मानवमात्रके कल्याणके लिये’ पुस्तकसे

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।। श्रीहरिः ।।
भगवान्
आज ही मिल सकते हैं-२

(गत् ब्लॉगसे आगेका)
गोरखपुरकी एक घटना है । संवत् २००० से पहलेकी बात है । मैं गोरखपुरमें व्याख्यान देता था । वहाँ सेवारामजी नामके एक सज्जन थे, जो बैंकमें काम करते थे । एक दिन मैंने व्यख्यानमें कह दिया कि अगर आपका दृढ़ विचार हो जाय कि भगवान् आज मिलेंगे तो वे आज ही मिल जायँगे ! उन सज्जनको यह बात लग गयी । उन्होंने विचार कर लिया कि हमें तो आज ही भगवान् से मिलना है । वे पुष्पमाला, चन्दन आदि ले आये कि भगवान् आयेंगे तो उनको माला पहनाऊँगा, चन्दन चढाऊँगा ! वे कमरा बन्द करके भगवान् के आनेकी प्रतीक्षामें बैठ गये । समयपर भगवान् के आनेकी सम्भावना भी हो गयी और सुगंध भी आने लगी, पर भगवान् प्रकट नहीं हुए । दूसरे दिन उन्होंने मेरेसे कहा कि आज आप मेरे घरसे भिक्षा लें । मैं कई घरोंसे भिक्षा लेकर पाता था । उस दिन उनके घर गया तो उन्होंने मेरेसे पूछा कि भगवान् मिलनेवाले थे, सुगंध भी आ गयी थी, फिर बाधा क्या लगी कि वे मिले नहीं ? मैंने कहा कि भाई ! मेरेको इसका क्या पता ? परन्तु मैं तुम्हारेसे पूछता हूँ कि क्या तुम्हारे मनमें यह बात आती थी कि इतनी जल्दी भगवान् कैसे मिलेंगे ? वे बोले कि यह बात तो आती थी ! मैंने कहा कि इसी बातने अटकाया ! अगर मनमें यह बात होती कि भगवान् मेरेको अवश्य मिलेंगे, उनको मिलना ही पड़ेगा तो वे जरुर मिलते । भगवान् ऐसे कैसे जल्दी मिलेंगे—ऐसा भाव करके तुमने ही बाधा लगायी है ।

अगर आप विचार कर लें कि भगवान् आज मिलेंगे तो वे आज ही मिल जायँगे ! परन्तु मनमें यह छाया नहीं आनी चाहिये कि इतनी जल्दी कैसे मिलेंगे ? भगवान् आपके कर्मोंसे अटकते नहीं । अगर आपके दुष्कर्मसे, पापकर्मसे भगवान् अटक जायँ तो वे मिलकर भी क्या निहाल करेंगे ? परन्तु भगवान् किसी कर्मसे अटकते नहीं । ऐसी कोई शक्ति है ही नहीं, जो भगवान् को मिलनेसे रोक दे । वे न तो पापकर्मोंसे अटकते हैं, न पुण्यकर्मोंसे अटकते हैं । वे सबके लिये सुलभ हैं । अगर भगवान् हमारे पापोंसे अटक जायँ तो हमारे पाप भगवान् से प्रबल हुए ! अगर पाप प्रबल (बलवान्) हैं तो भगवान् मिलकर भी क्या निहाल करेंगे ? जो पापोंसे अटक जाय, उसके मिलनेसे क्या लाभ ? परन्तु भगवान् इतने निर्बल नहीं हैं, जो पापोंसे अटक जायँ । उनके समान बलवान् कोई है नहीं, हुआ नहीं, होगा नहीं, हो सकता ही नहीं । आपकी जोरदार इच्छा हो जाय तो आप कैसे ही हों, भगवान् तो मिलेंगे, मिलेंगे, मिलेंगे ! उनको मिलाना पड़ेगा, इसमें सन्देह नहीं है । परमात्माकी प्राप्तिके लिये ही तो मानवजन्म मिला है, नहीं तो पशुमें और मनुष्यमें क्या फर्क हुआ ?
खादते मोदते नित्यं शुनकः शूकरः खरः ।
तेषामेषां को विशेषो वृत्तिर्येषां तु तादृशी ॥
सूकर कूकर ऊँट खर, बड़ पशुअन में चार ।
तुलसी हरि की भगति बिनु, ऐसे ही नर नार ॥

देवता भोगयोनि है । वे भी चाहते हैं कि भगवान् हमारेको मिलें—‘देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकाङ्क्षिणः’ (गीता ११/५२) । वे भगवान् को
चाहते तो हैं, पर भोगोंकी इच्छाको नहीं छोडते । यही दशा मनुष्योंकी है । अगर आप ह्रदयसे भगवान् को चाहो तो उनको मिलना ही पड़ेगा, इसमें सन्देह नहीं है । पर आप ही बाधा लगा दो कि भगवान् नहीं मिलेंगे, तो फिर वे नहीं मिलेंगे ! गीतामें साफ़ लिखा है—
अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक् ।
साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः ॥
क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्र्वच्छान्तिं निगच्छति ।
कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति ॥
(९/३०-३१)
‘अगर कोई दुराचारी-से-दुराचारी भी अनन्य भक्त होकर मेरा भजन कर्ता है तो उसको साधु ही मानना चाहिये । कारण कि उसने निश्चय बहुत अच्छी तरह कर लिया है ।’
‘वह तत्काल (उसी क्षण) धर्मात्मा हो जाता है और निरन्तर रहनेवाली शान्तिको प्राप्त हो जाता है । हे कुन्तीनन्दन ! मेरे भक्तका पतन नहीं होता—ऐसी तुम प्रतिज्ञा करो ।’

तात्पर्य है कि दुराचारी-से दुराचारी मनुष्य भी यदि ‘अनन्यभाक्’ हो जाय अर्थात् भगवान् के सिवाय कोई चाहना न रखे तो उसको भी साधु मान लेना चाहिये; क्योंकि उसने निश्चय पक्का कर लिया है कि भगवान् जरुर मिलेंगे ।

आप केवल भगवान् की ही इच्छा करो, और कोई इच्छा मत करो । न जीनेकी इच्छा करो, न मरनेकी इच्छा करो । न मानकी इच्छा करो, न बड़ाईकी इच्छा करो । न भोगोंकी इच्छा करो, न रुपयोंकी इच्छा करो । केवल एक भगवान् की इच्छा करो तो वे मिल जायँगे । कम-से-कम मेरी बातकी परीक्षा तो करके देखो ! भगवान् आपको मिलते नहीं; क्योंकि आप उनको चाहते नहीं । आपके भीतर रुपयोंकी चाहना हो तो भगवान् बीचमें कूदकर क्यों पड़ेंगे ? संसारमें सबसे रद्दी वस्तु रूपया है । रुपयोंसे रद्दी चीज दूसरी कोई है ही नहीं । ऐसी रद्दी चीजमें आपका मन अटका हुआ हो तो भगवान् कैसे मिलेंगे ? रुपये देकर आप भोजन, वस्त्र, सवारी आदि खरीद सकते हो, पर रूपया खुद न तो खानेके काम आता है, न पहननेके काम आता है, न सवारीके काम आता है । तात्पर्य है कि रुपये काम नहीं आते, प्रत्युत उनका खर्च काम आता है ।

परमात्मा इच्छामात्रसे मिलते हैं । उनको रोकनेकी ताकत किसीमें भी नहीं है । छोटा बालक रोता है तो माँ आ ही जाती है । बालक घरका कुछ काम नहीं करता, उल्टे काम करनेमें आपको बाधा लगता है, पर जब वह रोने लगता है, तब सब घरवाले उसके पक्षमें हो जाते हैं । सास-ससुर, देवर-जेठ सभी कहते हैं कि बहू ! बालक रो रहा है, उसको उठा ले । माँको सब काम छोडकर बालकको उठाना पडता है । बालकका एकमात्र बल रोना ही है—‘बालानां रोदनं बलम्’ । रोनेमें बड़ी ताकत है । आप सच्चे ह्रदयसे व्याकुल होकर भगवान् के लिये रोने लग जाओ तो जितने भगवान् के भक्त हुए हैं, सन्त-महात्मा हुए हैं, वे सब-के-सब आपके पक्षमें हो जायँगे और भगवान् को उलाहना देंगे कि आप मिलते क्यों नहीं ? वे ही भगवान् के सास-ससुर आदि हैं !
(शेष आगेके ब्लॉगमें )
—‘मानवमात्रके कल्याणके लिये’ पुस्तकसे
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।। श्रीहरिः ।।
भगवान्
आज ही मिल सकते है

परमात्मप्राप्ति बहुत सुगम है । इतना सुगम दूसरा कोई काम नहीं है । परन्तु केवल परमात्माकी ही चाहना रहे, साथमें दूसरी कोई चाहना न रहे । कारण कि परमात्माके समान दूसरा कोई है ही नहीं । जैसे परमात्मा अनन्य हैं, ऐसे ही उनकी चाहना भी अनन्य होनी चाहिये । सांसारिक भोगोंके प्राप्त होनेमें तीन बातें होनी जरुरी हैं—इच्छा, उद्योग और प्रारब्ध । पहले तो सांसारिक वस्तुको प्राप्त करनेकी इच्छा होनी चाहिये, फिर उसकी प्राप्तिके लिये कर्म करना चाहिये । कर्म करनेपर भी उसकी प्राप्ति तब होगी, जब उसके मिलनेका प्रारब्ध होगा । अगर प्रारब्ध नहीं होगा तो इच्छा रखते हुए और उद्योग करते हुए भी वस्तु नहीं मिलेगी । इसलिए उद्योग तो करते हैं नफेके लिये, पर लग जाता है घाटा ! परन्तु परमात्माकी प्राप्ति इच्छामात्रसे होती है । इसमें उद्योग और प्रारब्धकी जरुरत नहीं है । परमात्माके मार्गमें घाटा कभी होता ही नहीं, नफा-ही-नफा होता है ।

एक परमात्माके सिवाय कोई भी चीज इच्छामात्रसे नहीं मिलती । कारण यह है कि मनुष्यशरीर परमात्माकी प्राप्तिके लिये ही मिला है । अपनी प्राप्तिका उद्देश्य रखकर ही भगवान् ने हमारेको मनुष्यशरीर दिया है । दूसरी बात, परमात्मा सब जगह हैं । सुईकी तीखी नोक टिक जाय, इतनी जगह भी भगवान् से खाली नहीं है । अतः उनकी प्राप्तिमें उद्योग और प्रारब्धका काम नहीं है । कर्मोंसे वह चीज मिलती है, जो नाशवान् होती है । अविनाशी परमात्मा कर्मोंसे नहीं मिलते । उनकी प्राप्ति उत्कट इच्छामात्रसे होती है ।

पुरुष हो या स्त्री हो, साधु हो या गृहस्थ हो, पढ़ा-लिखा हो या अपढ़ हो, बालक हो या जवान हो, कैसा ही क्यों न हो, वह इच्छामात्रसे परमात्माको प्राप्त कर सकता है । परमात्माके सिवाय न जीनेकी चाहना हो, न मरनेकी चाहना हो, न भोगोंकी चाहना हो, न संग्रहकी चाहना हो । वस्तुओंकी चाहना न होनेसे वस्तुओंका आभाव नहीं हो जायगा । जो हमारे प्रारब्धमें लिखा है, वह हमारेको मिलेगा ही । जो चीज हमारे भाग्यमें लिखी है, उसको दूसरा नहीं ले सकता—‘यदस्मदीयं न ही तत्परेषाम्’ । हमारेको आनेवाला बुखार दूसरेको कैसे आयेगा ? ऐसे ही हमारे प्रारब्धमें धन लिखा है तो जरुर आयेगा । परन्तु परमात्माकी प्राप्तिमें प्रारब्ध नहीं है ।

परमात्म किसी मूल्यके बदले नहीं मिलते । मूल्यसे वही वस्तु मिलती है, जो मूल्यसे छोटी होती है । बाजारमें किसी वस्तुके जितने रुपये लगते हैं, वह वस्तु उतने रुपयोंकी नहीं होती । हमारे पास ऐसी कोई वस्तु (क्रिया और पदार्थ) है ही नहीं, जिससे परमात्माको प्राप्त किया जा सके । वह परमात्मा अद्वितीय है, सदैव है, समर्थ है, सब समयमें है और सब जगह है । वह हमारा है और हमारेमें है—‘सर्वस्य चाहं हृदि संनिविष्टः’ (गीता १५/१५), ‘ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति’ (गीता १८/६१) । वह हमारेसे दूर नहीं है । हम चौरासी लाख योनियोमें चले जायँ तो भी भगवान् हमारे हृदयमें रहेंगे । स्वर्ग या नरकमें चले जायँ तो भी वे हमारे हृदयमें रहेंगे । पशु-पक्षी या वृक्ष बन जायँ तो भी वे हमारे हृदयमें रहेंगे । देवता बन जायँ तो भी वे हमारे हृदयमें रहेंगे । तत्त्वज्ञ, जीवन्मुक्त बन जायँ तो भी वे हमारे हृदयमें रहेंगे । दुष्ट-से-दुष्ट, पापी-से-पापी, अन्यायी-से-अन्यायी बन जायँ तो भी भगवान् हमारे हृदयमें रहेंगे । ऐसे सबके हृदयमें रहनेवाले भगवान् की प्राप्ति क्या कठीन होगी ? पर जीनेकी इच्छा, मानकी इच्छा, बड़ाईकी इच्छा, सुखकी इच्छा, भोगकी इच्छा आदि दूसरी इच्छाएँ साथमें रहते हुए भगवान् नहीं मिलते । कारण कि भगवान् के समान तो भगवान् ही हैं । उनके समान दूसरा कोई था ही नहीं, है ही नहीं, होगा ही नहीं, हो सकता ही नहीं, फिर वे कैसे मिलेंगे ? केवल भगवान् की चाहना होनेसे ही वे मिलेंगे । अविनाशी भगवान् के सामने नाशवान् की क्या कीमत है ? क्या नाशवान् क्रिया और पदार्थके द्वारा वे मिल सकते हैं ? नहीं मिल सकते । जब साधक भगवान् से मिले बिना नहीं रह सकता, तब भगवान् भी उससे मिले बिना नहीं रहते; क्योंकि भगवान् का स्वभाव हैं—‘ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्’ (गीता ४/११) ‘जो भक्त जिस प्रकार मेरी शरण लेते हैं, मैं उन्हें उसी प्रकार आश्रय देता हूँ ।’

मान लें कि कोई मच्छर गरुड़जीसे मिलना चाहे और गरुड़जी भी उससे मिलना चाहें तो पहले मच्छर गरुड़जीके पास पहुँचेगा या गरुड़जी मच्छरके पास पहुँचेंगे ? गरुड़जीसे मिलनेमें मच्छरकी ताकत काम नहीं करेगी । इसमें तो गरुड़जीकी ताकत ही काम करेगी । इसी तरह परमात्मप्राप्तिकी इच्छा हो तो परमात्माकी ताकत ही काम करेगी । इसमें हमारी ताकत, हमारे कर्म, हमारा प्रारब्ध काम नहीं करेगा, प्रत्युत हमारी चाहना ही काम करेगी । हमारी चाहनाके सिवाय और किसी चीजकी आवश्यकता नहीं है ।

हम तो भगवान् के पास नहीं पहुँच सकते तो क्या भगवान् भी हमारे पास नहीं पहुँच सकते ? हम कितना ही जोर लगायें, पर भगवान् के पास नहीं पहुँच सकते । परन्तु भगवान् तो हमारे हृदयमें ही विराजमान हैं । द्रौपदीने भगवान् को ‘गोविन्द द्वारकावासिन्’ कहकर पुकारा तो भगवान् को द्वारका जाकर आना पड़ा । वह यहाँ कहती तो वे चट यहीं प्रकट हो जाते ! अगर हम ऐसा मानते हैं कि भगवान् अभी नहीं मिलेंगे तो वे नहीं मिलेंगे; क्योंकि हमने आड़ लगा दी ।

(शेष आगेके ब्लोगमें)
—‘मानवमात्रके कल्याणके लिये’ पुस्तकसे

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जिज्ञासाका विषय वास्तवमें जीव और जगत् है, परमात्मा नहीं । कारण कि जिज्ञासा अधूरी जानकारी (सन्देह) में होती है अर्थात् जिस विषयमें हम कुछ जानते है और कुछ नहीं जानते, वहाँ जिज्ञासा होती है । अतः जिस विषयको किंचिन्मात्र भी नहीं जानते, उसमें जिज्ञासा नहीं होती और जिस विषयको पूरी तरह जानते है, उसमें भी जिज्ञासा नहीं होती; क्योंकि उसका अनुभव होता है । परमात्माके विषयमें हम बिलकुल नहीं जानते; अतः परमात्मा जिज्ञासा या विचारका विषय नहीं है, प्रत्युत मान्यताका विषय है । जीव और संसारको हम पूरी तरह नहीं जानते; जैसे—मैं हूँ और संसार है—यह तो जानते हैं, पर मैं क्या हूँ और संसार क्या है—यह तत्वसे नहीं जानते । अतः जीव और संसार जिज्ञासाका विषय हैं ।

यद्यपि शास्त्रोंमें परमात्माको भी जिज्ञासाका विषय माना गया है—‘जगज्जीवपरात्मनाम्’, तथापि यह जिज्ञासाका विषय उन्हींके लिये है, जो वेदादिक शास्त्रोंपर और भक्तोंपर श्रद्धा-विश्वास रखते हों । वेदादिक शास्त्रोंमें और सन्तवाणीमें परमात्माका वर्णन किया गया है, अतः उस वर्णनको लेकर उनमें परमात्माकी जिज्ञासा होती है । तात्पर्य है कि परमात्माकी जिज्ञासा उनमें होती है, जो शास्त्र और संतको मानते हैं अर्थात् शास्त्रमें लिखा है, भक्तोंसे सुना है, पर अनुभव नहीं है—इसको लेकर जिज्ञासा होती है । जो वेदादिक शास्त्रोंको और भक्तोंको नहीं मानते, उनमें परमात्माकी जिज्ञासा नहीं होती । परन्तु जीव और जगत् की जिज्ञासा आस्तिक-नास्तिक सभीमें हो सकती है; क्योंकि मैं हूँ और जगत् है—इसका अनुभव सबको होता है । परमात्माका ऐसा अनुभव न होनेसे परमात्मा उनकी मान्यताका विषय होता है अर्थात् या तो वे परमात्माको मानते हैं अथवा नहीं मानते । इसलिए आस्तिक और नास्तिक— दोनों दर्शन पाये जाते हैं ।

जिज्ञासुमें ‘मैं जिज्ञासु हूँ’—ऐसा अहम् अर्थात् व्यक्तित्व रहता है, तबतक वह बातें तो सीख लेता है, पर उसको बोध नहीं होता । परन्तु सच्ची जिज्ञासा रहनेसे उसमें एक व्याकुलता पैदा होती है कि ‘मैंने इतना जान लिया, पर मेरेमें कोई फर्क नहीं पड़ा, कोई विलक्षणता नहीं आयी ! राग-द्वेष, हर्ष-शोक वही होते हैं, अनुकूलता-प्रतिकूलताका वही असर पडता है !’ ऐसी व्याकुलता होनेपर वह अहम् से सर्वथा विमुख हो जाता है । अहम् से सर्वथा विमुख होनेपर जिज्ञासु नहीं रहता, प्रत्युत शुद्ध जिज्ञासा रह जाती है और वह जिज्ञासा ज्ञान (बोध) में परिणत हो जाती है । ज्ञान होनेपर अहम् अर्थात प्रकृति तथा प्रकृतिके कार्यका सर्वथा आभाव हो जाता है और चेतन-स्वरुप ज्यों-का-त्यों रह जाता है अर्थात् प्राप्त हो जाता है । यहाँ यह जान लेना आवश्यक है कि ज्ञान जडका ही होता है, चेतनका नहीं । कारण कि चेतन तो ज्ञानस्वरुप ही है । अंतःकरणमें जडका महत्त्व होनेसे ही उसका अनुभव नहीं होता था । उसका अनुभव होनेपर अनुभवमात्र रह जाता है, अनुभव करनेवाला नहीं रहता; ज्ञानमात्र रह जाता है, ज्ञानी नहीं रहता ।
टिप्पणी—
जितना जानते है, उसीको पूरा मानकर जानकारीका अभिमान करनेसे मनुष्य नास्तिक बन जाता है; और उसमें सन्तोष न करके जितना जानते हैं, उसमें सन्तोष न करनेसे तथा जानकारीका अभाव खटकनेसे मनुष्य जिज्ञासु बन जाता है
—‘साधन-सुधा-सिन्धु’ पुस्तकसे(‘जिज्ञासा और बोध’, लेख नं।२७, पेज नं.५०, ज्ञानयोग)

http://www.swamiramsukhdasji.org/swamijibooks/pustak/pustak1/html/sadhansudhasindhu/ch27_50.htm

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एक निश्चय

भगवद्गीतासे, शास्त्रोंसे और सन्तोंसे मुझे बहुत विलक्षण-विलक्षण बातें मिली हैं । उनमेंसे एक बात आज मैं कहता हूँ । आपलोग कृपा करके ध्यान दें । एक ऐसी सरल बात है, जिससे साधनामें बहुत तेजीसे उन्नति हो सकती है, बड़ा विलक्षण आनंद प्राप्त हो सकता है, सदाके लिये दुःख-सन्ताप मिट सकता है । परन्तु वह सरल बात किसके लिये है ? जो अपना उद्धार चाहता है । मेरा कल्याण हो—यह भाव जितना ही अधिक होगा, उसके लिये यह बात उतनी ही सरल होगी ।

हम साधन करते-करते ऊँची स्थितिपर पहुंचते हैं, फिर हमें उस तत्त्वका अनुभव होता है—ऐसा एक प्रकार है । एक प्रकार ऐसा भी है कि साधन करते-करते हम जहाँ पहुँचते हैं, वहाँ हम पहलेसे ही जा बैठें तो उतना लंबा समय नहीं लगेगा, उतना परिश्रम नहीं पड़ेगा तथा लाभ बहुत जल्दी और विशेष होगा । इस विषयमें भगवान् ने कहा है कि ‘निश्चयवाली बुद्धि एक होती है और अव्यवसायी मनुष्योंकी बुद्धियाँ बहुशाखाओंवाली तथा अनन्त होती है’ (गीता २/४१) । ‘दुराचारी-से-दुराचारी मनुष्य भी यदि अनन्यभावसे मेरे भजनमें लग जाता है तो उसको साधु ही मानना चाहिये; क्योंकि उसने निश्चय बहुत अच्छा किया है’ (गीता ९/३०) । इस श्लोकमें आये हुए ‘सम्यग्व्यवसितो हि सः’ पदक तात्पर्य भी यही है कि ‘अब हमें परमात्माकी प्राप्ति ही करनी है, हमें इस मार्गपर ही चलना है’—ऐसा अटल निश्चय हो जाय । लोग निंदा करें या स्तुति करें, धन आ जाय या चला जाय, शरीर ठीक रहे या बीमार हो जाय, हम जीते रहें या मर जायँ, पर हम इस निश्चय पर अडिग रहेंगे । इस तरह ‘मैं’-पनमें यह भाव कर लिया जाय कि ‘मैं तो केवल पारमार्थिक साधक हूँ’ तो फिर साधन अपने-आप होगा ।

आरम्भमें भी हम अपना सम्बन्ध परमात्मासे मान लें कि ‘हम भगवान् के हैं और भगवान् हमारे हैं’ । यह बात बहुत बार आपने सुनी होगी और बहुत बार मैंने कही भी है, पर आपलोग ध्यान नहीं देते । मैं आज आपसे प्रार्थना करता हूँ कि आप इस बात पर विशेष ध्यान दें । मुझे तो अपना कल्याण करना है; क्योंकि मैं केवल परमात्मप्राप्तिके लिये हि यहाँ आया हूँ; जन्मा हूँ, दूसरा और कोई मेरा काम नहीं है—ऐसा आपका एक निर्णय हो जाय । इसीको व्यवसायात्मिका बुद्धि कहते हैं । ऐसी बुद्धिसे पापी-से-पापी मनुष्य भी बहुत जल्दी धर्मात्मा बन जाता है ‘क्षिप्रं भवति धर्मात्मा’ (गीता ९/३१) ।

एक भूल-भुलैया होती है । उसके भीतर जानेपर फिर बाहर निकलना मुश्किल हो जाता है । इसी तरह संसारमें ये जो राग-द्वेष हैं, वे भी भूल-भुलैया हैं । यह ठीक है, यह बेठीक है—इसमें मनुष्य ऐसा भूलता है कि इससे निकलना बड़ा मुश्किल हो जाता है । अतः इससे निकलनेके लिये आप एक ही निर्णय कर लें कि ‘हमें केवल परमात्माकी तरफ ही चलना है । हमें संसारमें न राग करना है, न द्वेष करना है; न हर्षित होना है, न शोक करना है ।’ ऐसा जिसका पक्का निश्चय होता है,वह द्वन्द्वोंमें नहीं फँसता और सुखपूर्वक मुक्त हो जाता है—‘निर्द्वन्दो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते’ (गीता ५/३) । समताका नाम ‘योग’ है—‘समत्वंयोग उच्यते’ (गीता २/४८) । अतः राग-द्वेष, हर्ष-शोक, ठीक-बेठीक—इन द्वन्दोंमें विचलित न होना ‘योग’ है और इस योगसे युक्त मनुष्य बहुत जल्दी ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है—‘योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म नचिरेणाधिगच्छति’ (गीता ५/६) । इस प्रकार सुखपूर्वक और बहुत जल्दी—दोनों बातें आ गयीं । परन्तु यह बात पढ़ लेनेपर, पढ़ा देनेपर, विवेचन कर देनेपर, लोगोंको सुना देनेपर भी जल्दी पकडमें नहीं आती । इस बातको काममें कैसे लाया जाय—इसकी विधि बताता हूँ । नीतिमें एक श्लोक आया है—
अमन्त्रमक्षरं नास्ति नास्ति मूलमनौषधम् ।
अयोग्यः पुरुषो नास्ति योजकस्तत्र दुर्लभः ॥

‘संसारमें ऐसा कोई अक्षर नहीं है जो मन्त्र न हो; ऐसी कोई जड़ी-बूटी नहीं है, जो औषधि न हो; और ऐसा कोई मनुष्य नहीं है, जो योग्य न हो, परन्तु इस अक्षरका ऐसा उच्चारण किया जाय तो यह अमुक काम करेगा, इस जड़ी-बूटीको इस प्रकार दिया जाय तो अमुक रोग दूर हो जायगा, यह मनुष्य इस प्रकार करे तो बहुत जल्दी इसकी उन्नति हो जायगी—इस प्रकार बतानेवाले पुरुष संसारमें दुर्लभ हैं ।’

किस बातको किस रीतिसे काममें लाया जाय, जिससे सुखपूर्वक मुक्ति हो जाय—इसमें आपको यह खास बात बतायी है कि अपना खुदका विचार, निश्चय एक हो जाय कि हमें तो परमात्माकी प्राप्ति ही करनी है । परमात्माकी प्राप्ति भी करनी है—इसमें ‘भी’ की जगह ‘ही’ हो जाय और ‘ही’ पर दृढ़ रहें कि हमें तो केवल इस तरफ ही चलना है । दुःख पायें, सुख पायें, कुछ भी हो जाय, हमें तो अपना उद्धार करना है— ऐसा पक्का विचार करके चलें तो बहुत सुगमतासे बहुत जल्दी कल्याण हो जाय । इसमें खुदका विचार ही काम आयेगा—
उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत् ।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥
(गीता ६/५)

‘स्वयं अपना उद्धार करे,अपना पतन न करे; क्योंकि यह आप ही अपना मित्र है और आप ही अपना शत्रु है ।’
‘बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः ।’
(गीता ६/६)

—जिसने अपनेसे अपनेपर विजय कर ली है, उसके लिये यह आप ही अपना मित्र है । अपनेसे अपनेपर विजय करना क्या है कि हम समताको धारण कर लें । मेरेको अपना कल्याण करना है—यह विचार पक्का हो जाय तो समता अपने-आप आ जायगी ।

आप और हम विचार करें कि हमारे सामने अनुकूलता-प्रतिकूलता कई बार आयी है और गयी है । हमने सुख भी भोग है और दुःख भी भोग है । परन्तु हमें शान्ति तो नहीं मिली ! वहम होता है कि ऐसा गुरु मिल जाय तो कल्याण हो जाय; ऐसा परिवार मिल जाय तो कल्याण हो जाय; ऐसी स्त्री मिल जाय तो बड़ा ठीक रहे; ऐसा मित्र मिल जाय तो हम निहाल हो जायँ; इतना धन मिल जाय तो हम निहाल हो जायँ; ऊँचा पद मिल जाय तो हम निहाल हो जायँ, आदि-आदि । इसमें आप विचार करें कि अनुकूल स्त्री किसीको नहीं मिली है क्या ? अनुकूल पुत्र किसीको नहीं मिला है क्या ? अनुकूल परिस्थिति किसीको नहीं मिली है क्या ? परन्तु क्या वे इच्छाओंसे रहित होकर परमात्माको प्राप्त हो गये ? विचार करनेसे दीखता है कि जिसको ये सब अनुकूलताएँ मिली हैं, उसकी इच्छाएँ नहीं मिटी हैं । वह कृतकृत्य, ज्ञात-ज्ञातव्य और प्राप्त-प्राप्तव्य नहीं हुआ है । अतः कोई भी इन परिस्थितियोंसे निहाल हो जाय—यह असम्भव बात है । कारण कि स्वयं बदलनेवाले नहीं हो । बदलनेवाली परिस्थितियोंसे आप ऊँचे कैसे हो जाओगे ? हो ही नहीं सकती । असम्भव बात है । मैंने इस विषयमें खुब अध्ययन किया है । आप परमात्मप्राप्तिका ही एक निश्चय कर लो, फिर अनुकूलता आपके पीछे दौड़ेगी ।
नाम नाम बिनु न रहे, सुनो सयाने लोय ।
मीरा सुत जायो नहीं, शिष्य न मुंड्यो कोय ॥

मीराबाईका नाम आज भी कितने आदरसे लिया जाता है ! उनका नाम लेनेसे, उनके पद गानेसे लोग अपनेमें पवित्रताका अनुभव करते हैं । उनमें क्या बात थी ? ‘मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई । जाके सिर मोर-मुकुट, मेरो पति सोई ॥’ एक ही निश्चय था कि मेरा पति वही है । क्या होगा, क्या नहीं होगा—इस बातकी कोई परवाह नहीं ! अहंता बदलनेपर, एक निश्चय होनेपर राग-द्वेष कुछ नहीं कर सकते । इनमें ताकत नहीं है अटकानेकी । केवल हमारा विचार पक्का होना चाहिये ।
—‘साधन-सुधा-सिन्धु’ पुस्तकसे, (सर्वोपयोगी, लेख नं.९१,पेज नं.७२९—७३१)
http://www.swamiramsukhdasji.org/swamijibooks/pustak/pustak1/html/sadhansudhasindhu/sarwopyogi/sarw91_729.htm
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।। श्रीहरिः ।।
सत्संगकी आवश्यकता-४

(गत् ब्लॉगसे आगेका)
जहाँ भक्तोंकी चर्चा होती है, वहाँ भगवान् स्वयं पधारते हैं । नाभाजी महाराजने ‘भक्तमाल’ की रचना की । उसके ऊपर प्रियादासजी महाराजने कवितामें टीका की । ये स्वयं ठाकुरजीका सिंहासन लगाकर, उन्हें कथा सुनाते थे । उनकी कथामें अनेक धनिक लोग भी आते थे । धनिकोंके आनेसे खतरा होता है । कुछ चोरोंने देखा कि यहाँ इतने धनी आदमी आते हैं, हम भी चलें । और कुछ नहिं मिला तो चोरोंने ठाकुरजीकी प्रतिमा चोरी कर ली । प्रियादासजी महाराजने कहा—‘हमारे मुख्य श्रोता चले गये, अब कथा किसे सुनावें ? कथा बन्द । ठाकुरजी चले गये । अब भोग किसे लगावें ? भोजन बनाना बन्द ! भूखे रहे । कथा भी बन्द रही । उधर चोरोंके बड़ी खलबली मची । वे वापस लाकर ठाकुरजीको दे देते हैं । जब ठाकुरजी आ गये तो स्नान किया, ठाकुरजीको स्नान, श्रृंगार कराया । रसोई बनायी, भोग लगाया । उसके बाद कथा चली । जब कथा चली तो प्रसंग कहाँतक चला— ऐसा किसीको याद नहीं रहा, तब ठाकुरजी स्वयं बोल पड़े कि अमुक प्रसंगतक कथा हुई थी । इस प्रकार स्वयं श्रीभगवान भक्तोंकी कथा ध्यानपूर्वक सुनते हैं ।

सूर्योदय होता है तो अन्धकार दूर हो जाता है, पर वह बाहरी अन्धकार होता है; किन्तु जब सत्संगरूपी सूर्य उदय होता है तो उससे भीतर (अंतःकरण) में रहनेवाला अँधेरा दूर हो जाता है । पाप दूर हो जाते हैं । शंकाएँ दूर हो जाती हैं । अन्तकरणमें रहनेवाली तरह-तरहकी उलझनें सुलझ जाती हैं—

राम माया सतगुरु दया, साधु संग जब होय ।
तब प्राणी जाने कछु, रह्यो विषय रस भोय ॥

भगवान् और सन्तोंकी जब पूर्ण कृपा होती है तब सत्संगति मिलती है—

संत बिसुद्ध मिलहिं परि तेहि । चितवहिं राम कृपा करि जेहि ॥
(मानस, सुन्दर.७/४)

विभीषणने हनुमानजीसे कहा—

अब मोही भा भरोस हनुमंता । बिनु हरि कृपा मिलहिं नहिं संता ॥

‘हे हनुमानजी ! अब मुझे पक्का भरोसा हो गया कि भगवान् जरुर मिलेंगे । आप मिल गये, इससे मालूम होता है कि श्रीभगवान् ने मुझपर विशेष कृपा की है । भगवान् ने मनुष्य-शरीर दिया, यह कृपा की, उसके बाद सत्संग दिया —यह विशेष कृपा है । ऐसी कृपाका लाभ हमें तो लेना ही चाहिये । दूसरोंको भी जो लेना चाहें तो देना चाहिये—

भरा सत्संग का दरिया, नहा लो जिसका जी चाहे ।
हजारो रतन बेकीमत, भरे आला से आला हैं ॥
लगाकर ज्ञान का गोता, निकालो जिसका जी चाहे ।

सत्संगरूपी दरियामें बहुत बढ़िया-बढ़िया रत्न हैं । इसमें ज्ञानकी डुबकी जितनी लगायेंगे, उतनी ही विलक्षण बातें मिलेंगी । सुननेसे तो मिलती ही हैं, सुनानेसे भी मिलती हैं । सुनानेमें भी ऐसी-ऐसी विलक्षण बातें पैदा होती हैं कि बड़ा भारी लाभ होता है । ऐसी कई बातें हमें सुननेवालोंकी कृपासे मिलती हैं ।

संत समागम हरि कथा तुलसी दुर्लभ दोय ।
सूत दारा अरु लक्ष्मी पापी के भी होय ॥

भगवान् की कथा और सत्संग—ये दो दुर्लभ वस्तुएँ हैं । पुत्र- और धन तो पापी मनुष्यके भी प्रारब्धानुसार होते ही हैं । रावणका भी बहुत बड़ा राज्य था—यह कोई बड़ी बात नहीं । बड़ी बात तो यह है कि भगवान् का चिन्तन हो, स्मरण हो, चर्चा हो तथा भगवान् की तरफ लग जायँ । सन्तोंने भी माँगा है—

राम जी साधु संगत मोही दीजिये ।
वाँरो संगत दो राम जी पलभर भूल न होय ॥

‘महाराज ! सत्संगति दीजिये, जिससे आपको क्षणभर भी नहीं भूलूँ ।’

सज्जनो ! सत्संगसे जो लाभ होता है, वह साधनसे नहीं होता । साधन करके जो परमात्मतत्वको प्राप्त करना है, वह कमाकर धनी होनेके सामान है । किन्तु सत्संग सुनना तो गोदमें जाना सामान है । गोद चले जानेसे कमाया हुआ धन स्वतः मिल जाता है । सन्तोंने कितने वर्ष लगाये होंगे ? कितना साधन किया होगा ? कितनोंका संग किया होगा ? उस सबका सार आपको एक घण्टेमें मिल जाता है । गोद जानेमें क्या जोर आवे साहब ? आज कँगला और कल लखपति ! वह तो कमाये हुए धनका मालिक बन जाता है । सत्संगके द्वारा ऐसी-ऐसी चीजें मिलती हैं, जो बरसोंतक साधन करनेसे भी नहीं मिलतीं । इसलिए भाई ! सत्संग मिल जावे तो जरुर करना चाहिये । इससे मुफ्तमें कल्याण होता है, मुफ्तमें । कहा गया है —

जलचर थलचर नभचर नाना । जे जड चेतन जीव जहाना ॥
मति कीरति गति भूति भलाई । जब जेहि जतन जहाँ जेहि पाई ॥
सो जनाब सतसंग प्रभाऊ । लोकहुँ वेद न आन उपाऊ ॥
(मानस,बाल। ३/४—६)

और—

संत समागम करिये भाई, लोह पलट कंचन हो जाई ।
नानाविध वनराय कहीजे, भिन्न-भिन्न सब नाम धराई ॥
नौका रूप जानि सत्संगहि, या में सब मिल बैठो आई ।
और उपाय नहीं तिरने का, सुन्दर काढिहि राम दुहाई ॥

—‘साधन-सुधा-सिन्धु’

http://www.swamiramsukhdasji.org/swamijibooks/pustak/pustak1/html/sadhansudhasindhu/sarwopyogi/sarw43_615.htm
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।। श्रीहरिः ।।
सत्संगकी आवश्यकता-३

(गत् ब्लॉगसे आगेका)

सत्संगति सब मैलोंको दूर करती है; परन्तु सत्संग करते रहनेसे । यदि मनुष्य सत्संगति करे ही नहीं तो मैल दूर कैसे हो ? पित्तका बुखार होनेसे मिश्री कडवी लगती है, कैसे करें ? तो कडवी लगनेपर भी खाते रहो । मिश्रीमें खुदमें ताकत है कि वह पित्तको शान्त कर देगी और मीठी लगने लग जायगी । ऐसे ही सत्संग-भजनमें रूचि न हो तो भी सत्संग-भजन करते रहनेसे ज्यों-ज्यों पाप नष्ट होने लगेंगे, त्यों-त्यों सत्संगमें मिठास आने लगेगा ।

जिस मिठाईको हम चखे ही नहीं, उसका स्वाद हम कैसे जान सकते हैं । ऐसे ही जिन्होंने सत्संग किया ही नहीं, वे इसकी विशेषता नहीं जानते, फिर भी कह देते हैं कि हमने बहुत सत्संग सुना है । तो समझ लेना चाहिये कि उन्होंने विशेष सत्संग किया ही नहीं, अन्यथा सत्संगमें रूचि अवश्य बढ़ती—


राम चरित जे सुनत अघाहीं । रस बिसेष जाना तिन्ह नाहीं ॥
(मानस, उत्तर. ५३/१)


जो मनुष्य भगवान् के चरित्र सुनते हैं और तृप्त हो जाते हैं, उन्होंने राम-कथाका विशेष रस जाना ही नहीं । अन्यथा—


जिन्ह के श्रवन समुद्र समाना । कथा तुम्हारि सुभग सरि नाना ॥
भरहिं निरंतर होहिं न पूरे । ..........................................॥
(मानस, अयोध्या. १२८/४-५)


आपकी कथाएँ नदियोंके समान और उन सत्संग-प्रेमियोंके कान ऐसे समुद्रके समान हैं; जो निरंतर कथारूपी नदियोंके गिरने (मिलने) पर भी कभी पूरे भरते नहीं हैं । राजा पृथुने भगवान् की कथा सुननेके लिये दस हजार कान माँगे ।

पागल व्यक्ति जैसे सँभालकर नहीं बोल सकता —ऐसे ही संसारी पुरुष सत्संगके बारेमें उलटी-सीधी बातें कहते हैं—


बातुल भूत बिबस मतवारे । ते नहिं बोलहिं बचन बिचारे ॥
(मानस, बाल. ११५/७)

ऐसे लोगोंके पैरोंमें पड जाओ । उनसे कहो—‘आप पवित्र हो, बड़ी अच्छी बात है । आप सत्संगमें पधारो । अन्य सत्संगमें आनेवाले लोगोंको पवित्र करो ।’ ऐसे कहकर उन्हें सत्संगमें बुलाओ । नहीं आवे तो उनकी मरजी । गाली दें तो सह लो । जो गाली सुनाता है वह तो हमारे पापोंको दूर करता है ।

सत्संगकी महिमा कहाँतक कही जाय ? स्वयं भगवान् शंकर श्रीरामजीसे सत्संग माँगते हैं ।


बार बार बर मागउँ हरषि देहु श्रीरंग ।
पद सरोज अनपायनी भगति सदा सतसंग ॥
(मानस, उत्तर.१४(क))

भगवान् शंकरको कौन-सा पापा दूर करना था ? कौन-सी साधना सीखनी थी ? जो सदा सत्संग ही चाहते हैं । भगवान् शंकरको कोई राम-कथा सुनानेवाले मिलते हैं तो सुनते हैं और पार्वतीजी-जैसे सुननेवाले मिलते हैं तो सुनाते हैं ।


‘मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम् ।
कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च ॥
(गीता १०/९)

‘मेरमें चित्तवाले, मेरेमें प्राणोंको अर्पण करनेवाले भक्तजन आपसमें मेरे गुण, प्रभाव आदिको जानते हुए और उनका कथन करते हुए ही नित्य-निरंतर संतुष्ट रहते हैं और मेरेमें प्रेम करते हैं ।’

एक भक्त हो गये हैं— जयदेव कवि । ‘गीत-गोविन्द’ उनका बनाया हुआ बहुत सुन्दर संस्कृत-ग्रन्थ है । भगवान जगन्नाथ स्वयं उनके ‘गीत-गोविन्द’ को सुनते थे । भक्तोंकी बात भगवान् ध्यान देकर सुनते हैं । एक मालिन थी, उसको ‘गीत-गोविन्द’ का एक पद (धर) याद हो गया । वह बैगन तोडने जाती और पद गाती जाती थी । तो ठाकुरजी उसके पीछे-पीछे चलते और पद सुनते । पुजारीजी मंदिरमें देखते हैं कि ठाकुरजीका वस्त्र फटा हुआ है । उन्होंने पूछा—‘प्रभो ! आपके यहाँ मन्दिरमें रहते हुए, यह वस्त्र कैसे फट गया; ठाकुरजी बोले—‘भाई ! बैगनके कांटोंमें उलझकर फट गया ।’ पुजारीने पूछा—‘बैगनके खेतमें आप क्यों गये थे ?’ ठाकुरजीने बता दिया; मालिन ‘गीत-गोविन्द’ का धर गा रही थी,अतः सुनने चला गया । वह चलती तो मैं पीछे-पीछे डोलता था, जिससे कपड़ा फट गया । ऐसे स्वयं भगवान् भी सुनते है । क्या भगवान् के कोई रोग है, पाप है, जिसे दूर करनेके लिये वे सुनते हैं ? फिर भी वे सुनते हैं । भगवान् की कथा सुननेके अधिकारी भक्त हैं, ऐसे ही भक्तकी कथा सुननेके अधिकारी— भगवान् होते हैं ।

(शेष आगेके ब्लोगमें)

—‘साधन-सुधा-सिन्धु’ पुस्तकसे

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।। श्रीहरिः ।।
सत्संगकी
आवश्यकता-२
(गत ब्लोगसे आगेका )

ब्रह्माजीके चार मानस पुत्र सनकादि हैं । उनकी अवस्था सदा ही पाँच वर्ष की रहती है । वे जन्मजात सिद्ध हैं । ऐसे अनादि सिद्ध सनाकादिक—जिनके दसों दिशाएँ ही वस्त्र हैं, उनके एक ‘व्यसन’ है—
‘आसा बसन व्यसन यह तिन्हहीं ।

रघुपति चरित होई तहँ सुनहीं ॥’
(मानस, उत्तर. ३२/३)

जहाँ भी भगवान् की कथा हो, वहाँ वे सुनते हैं । दूसरा कोई कथा करने वाला न हो तो— तीन बन जाते हैं श्रोता और एक बन जाते हैं वक्ता । इस प्रकार मुक्त-पुरुष भी भगवान् की कथा सुनते हैं। परमात्म-तत्त्वमें निरन्तर लीन रहनेवाले जीवन्मुक्त पुरुष भी सत्संग जहाँ होता है, वहाँ सुनते हैं ।

जो संसारसे उद्धार चाहते हैं— ऐसे साधक भी सत्संग सुनते हैं, ताकि सांसारिक मोह दूर हो जाय, अन्त:करण शुद्ध हो जाय । क्योंकि ‘भवौषधात्’—अर्थात् यह संसारकी दवा है ।

जो साधारण संसारी मनुष्य हैं, साधन भी नहीं करते— उनके भी मनको, कानोंको, सत्संगकी बातें अच्छी लगती हैं— ‘श्रोत्रमनोऽभिरामात्’ सत्संगसे एक प्रकारकी शान्ति मिलती है, स्वाभाविक मिठास आती है ।

इसलिये तीन प्रकारके मनुष्योंका वर्णन किया—

(१) निवृत्ततर्षैरुपगीयमानात् (सिद्ध)
(२) भवौषधात् (साधक)
(३) श्रोत्रमनोऽभिरामात् (विषयी)

भगवान् के गुणानुवादसे उपराम कौन होते हैं ? जो नहीं सुनना चाहते । वे ‘पशुघ्र’ होते हैं अर्थात् महान् घातक (कसाई) होते हैं । ‘क उत्तमश्लोकगुणानुवादात् पुमान् विरज्यते’ कौन भगवान् के गुणनुवाद सुने बिना रह सकता है ? ‘विना पशुघ्रात्’ पशुघ्रातीके सिवाय ।
'पापवंत कर सहज सुभाऊ। भजनु मोर तेहि भाव न काऊ।।'
(मानस, सुन्दर. ४४/२)


महान् पापी अथवा ज्ञानका दुश्मन—इनके सिवाय हरिकथासे विरक्त कौन होगा ?

जहाँ भगवान् की कथा होती है, वहाँ भगवान्, भगवान् के भक्त, सन्त-महात्मा, नारद-सनकादि ऋषि-मुनि तथा जीवन्मुक्त-महापुरुष भी खिंचे चले आते हैं; क्योंकि यह अत्यन्त विलक्षण है ।

भगवान् की सवारी हैं गरुड़ । उन गरुड़जीके बारेमें कहा गया है— ‘गरुड़ महाग्यानी गुनरासी ।’ गरुड़जी जब उड़ते हैं तो उनके पंखोंसे सामवेदकी ऋचाएँ निकलती हैं । ‘हरिसेवक अतिनिकट निवासी’ । ऐसे गरुड़जी, जो सदा ही भगवान् के पास रहते हैं, उनको मोह हो गया, जब भगवान् श्रीरामको नागपाशमें बँधे देखा । भगवान् का यह चरित्र देखा तो उनके मनमें सन्देह हो गया कि ये काहेके भगवान्, जिनको मैंने नागपाशसे छुड़ाया । मैं नहीं छुड़ाता तो इनकी क्या दशा होती ?

इसी प्रकार भगवान् श्रीरामको, हा सीते ! हा सीते ! पुकारते हुए जंगलमें भटकते देखकर सतीको सन्देह हो गया था कि ये कैसे भगवान् जो अपनी स्त्रीको ढूँढ़ते फिर रहे हैं और उसके वियोगमें रुदन कर रहे हैं ।

गरुड़जी और सतीके उदाहरण इसलिये दिये कि इन्हें स्वयं श्रीरामजीके चरित्र देखनेसे मोह पैदा हो गया और चरित्र-श्रवणसे मोह दूर हुआ । इससे सिद्ध हुआ कि भगवान् के चरित्र देखनेसे भी भगवान् के चरित्र सुनना बढ़िया है । साक्षात् दर्शनसे भी चरित्र सुनना उत्तम है; क्योंकि दर्शनोंसे तो मोह पैदा हुआ है और कथा सुननेसे दूर हुआ ।

भगवान् की कथा गरूड़, सती आदिके मोह का दूर करती है, इसका तात्पर्य यह है कि जिनको मोह हो गया, वे भी सत्संगके अधिकारी है तो जिनको मोह नही है वे तत्त्वज्ञ पुरूष भी अधिकारी है तथा घोर संसारी आदमी सुनना चाहें तो वे भी अधिकारी हैं । कोई ज्ञानका दुश्मन ही हो तो उसकी बात अलग है । हरि-कथामें रुचि नही तो भाई, अन्तःकरण बहुत मैला है । मामूली मैला नही है । मामूली मैला होगा तो स्वच्छ हो जायगा, परन्तु ज्यादा मैला होनेसे सत्संग अच्छा नहीं लग सकता ।
(शेष आगेके ब्लोगमें)
-'साधन-सुधा-सिन्धु' पुस्तकसे

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।। श्रीहरिः ।।


सत्संग की आवश्यकता-१


एक सत्संगी भाईने एक व्यक्तिसे सत्संगमें चलनेको कहा तो वह व्यक्ति बोला- ‘मैं पाप नहीं करता, अत: मुझे सत्संगमें जानेकी आवश्यकता नहीं सत्संगमें वे जाते हैं, जो पापी होते हैं । वे सत्संगमें जाकर अपने पाप दूर करते हैं । जिस प्रकार अस्पतालमें रोगी जाते हैं और अपना रोग दूर करते हैं । निरोग व्यक्तिको अस्पतालमें जानेकी क्या आवश्यकता ? जब हम पाप नहीं करते तो हम सत्संगमें क्यों जायें ? ऊपरसे देखने पर यह बात ठीक भी दीखती है।

अब इस बातको ध्यान देकर समझें । श्रीमद्भागवतमें एक श्लोक आता है—

निवृत्ततर्षैरुपगीयमानाद् भवौषधाच्छ्रोत्रमनोऽभिरामात्।


क उत्तमश्लोकगुणांनुवादात् पुमान् विरज्येत विना पशुघ्रात्।।
(श्रीमद्भा.१०/१/४)

‘जिनकी तृष्णाकी प्यास सर्वदाके लिये बुझ चुकी है, वे जीवन्मुक्त महापुरुष जिसका पूर्ण प्रेमसे अतृप्त रहकर गान किया करते हैं, मुमुक्षुजनोंके लिये जो भवरोगका रामबाण औषध है तथा विषयी लोगोंके लिये भी उनके कान और मनको परम आह्लाद देनेवाला है, भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रके ऐसे सुन्दर, सुखद, रसीले, गुणानुवादसे पशुघाती अथवा आत्मघाती मनुष्यके अतिरिक्त और कौन ऐसा है जो विमुख हो जाय, उससे प्रीति न करे ?’

मनुष्य तीन प्रकार को होते हैं—एक जीवन्मुक्त, दूसरे साधक तथा तीसरे साधारण संसारी (विषयी) व्यक्ति ।

जिनके कोई तृष्णा नहीं रही, कामना नहीं रही, जो पूर्ण पुरुष हैं, जो ‘आत्माराम’ हैं, जिनके ग्रन्थि-भेदन हो गया है, जो शास्त्र-मर्यादासे ऊपर उठ गये हैं—ऐसे जीवन्मुक्त, तत्त्वज्ञ महापुरुष भी भगवान् की भक्ति करते हैं, भजन करते हैं और भगवान् के गुण सुनते हैं—


‘जीवनमुक्त ब्रह्मपर चरित सुनहिं तजि ध्यान ।’
(मानस, उत्तर. ४२)


‘जो निरन्तर भगवान् का ध्यान करते हैं, वे भी ध्यान छोड़कर भगवान् के चरित्र सुनते हैं ।’

(शेष आगेके ब्लॉगमें)
—‘साधन सुधा सिन्धु’ पुस्तकसे

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।। श्रीहरिः ।।
परमात्मप्राप्तिमें देरी क्यों?-२

(गत् ब्लोगसे आगेका)
अगर परमात्माकी प्राप्ति करना चाहते हो तो अपनेको स्त्री या पुरुष न मनाकर अपना सम्बन्ध परमात्मके साथ जोड़ो । शरीर तो मिला है और बिछुड जायगा । इस शरीरमें ही आप अटक जाओगे तो फिर परमात्माकी प्राप्ति कैसे होगी ? परमात्माकी प्राप्ति तब होगी, जब परमात्माके साथ सम्बन्ध जोड़ोगे । कोई कपूत हो या सपूत हो, पूत तो वह है ही । कपूत भी बेटा है, सपूत भी बेटा है । अतः हम कैसे ही हों, अच्छे हों या मंदे हों, परमात्माके ही है । परमात्माकी प्राप्ति न स्त्रीको होती है, न पुरुषको होती है । विवाह करना हो तो अपनेको स्त्री-पुरुष मानो । स्त्रीको पुरुष मिलेगा, परमात्मा कैसे मिलेंगे ? पुरुषको स्त्री मिलेगी, परमात्मा कैसे मिलेंगे ? परमात्मा तो साधकको मिलेंगे । साधक स्वयं होता है, शरीर नहीं होता । मुक्ति भी स्वयंकी होती है, शरीरकी नहीं होती । अतः हम न स्त्री हैं, न पुरुष हैं, प्रत्युत हम परमात्माके हैं । परमात्मा हमारे हैं । हम और किसीके नहीं हैं । और कोई हमारा नहीं है । जिसको प्राप्त करना हो, उसके साथ अपना घनिष्ठ सम्बन्ध जोड़ो । परमात्माकी प्राप्तिमें स्त्रीपना और पुरुषपना—दोनों ही बाधक हैं । अपनेको स्त्री या पुरुष माननेवाला तो शरीरमें ही बैठा है, फिर उसको परमात्मा कैसे मिलेंगे ? मैं भगवान् का हूँ, भगवान् मेरे हैं—यह मान लो तो बड़ा भारी काम हो गया ! यह मामूली साधन नहीं हुआ है । भगवान् की और आपकी जाति एक हो गयी, जो कि वास्तवमें है ।

जाति, कुल, विद्या, सम्प्रदाय आदिका अभिमान परमात्माकी प्राप्तिमें बाधक है । भगवान् जिस जातिके हैं, उसी जातिके हम हैं । भगवान् के साथ हमारा असली सम्बन्ध है, बाकी सब सम्बन्ध नकली हैं । हम भगवान् के अंश हैं—‘ममैवांशो जीवलोके’ (गीता १५/७) । हम संसारके अंश नहीं हैं । हम साक्षात् भगवान् के बेटा-बेटी हैं । सांसारिक स्त्री-पुरुष तो हम बादमें बने हैं—‘सो मायाबस भयउ गोसाई’ (मानस, उत्तर.११७/२)

यहाँ शंका हो सकती है कि ‘मैं भगवान् की बेटी हूँ’—ऐसा माननेसे अपनेमें स्त्रीभाव रह जायगा ! वास्तवमें ऐसी बात नहीं है । अगर भगवान् के साथ सम्बन्ध माननेसे स्त्रीभाव रह भी जाय तो वह मिट जायगा । भगवान् का सम्बन्ध ऐसा विलक्षण है कि सभी सम्बन्धोंको काट देता है । कारण कि सब सम्बन्ध झूठे हैं, पर भगवान् का सम्बन्ध सच्चा है । भगवान् ने कहा है कि जीव केवल मेरा ही अंश है—‘ममैवांशो जीवलोके’ । सच्ची बातके आगे झूठी बात कैसे टिकेगी ? परन्तु आप ‘मैं स्त्री हूँ या मैं पुरुष हूँ’— इस बातको ही महत्त्व देते रहोगे तो यह कैसे मिटेगा ? ‘जदपि मृषा छूटत कठिनई’ । इसलिए एक भगवान् के सिवाय दूसरेका सर्वथा निषेध कर दो—‘मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरों न कोई’ । भगवान् मिलें चाहे उम्रभर न मिलें, दर्शन दें चाहे न दें, पर हम तो भगवान् के ही हैं । भरतजी कहते हैं—

जानहुँ रामु कुटिल करि मोही । लोग कहउ गुर साहिब द्रोही ॥
सीता राम चरन रति मोरें । अनुदिन बढ़उ अनुग्रह तोरें ॥
(मानस, अयोध्या. २०५/१)

हम जैसे हैं, भगवान् के हैं । अच्छे हैं तो भगवान् के हैं, बुरे हैं तो भगवान् के हैं । जैसे विवाहित स्त्री भीतरसे अपनेको कुँआरी नहीं मान सकती, इसी तरह भक्त भगवान् के सिवाय दुसरेको अपना मान सकता ही नहीं । झूठी बात कैसे माने ? भगवान् को हरेक आदमी अपना मान सकता है । पापी-से पापी, दुष्ट-से–दुष्ट आदमी भी भगवान् को अपना मान सकता है । कारण कि यह मान्यता सच्ची है, दूसरी सब मान्यताएँ झूठी हैं । आपको हजारों आदमी कह दें कि तुम भगवान् के नहीं हो तो उनसे यही कहें कि आपको पता नहीं है । भगवान् भी कह दे कि तुम हमारे नहीं हो तो उनसे कहें कि आपको भूल हो सकती है, पर मेरेको भूल नहीं हो सकती ! इतना पक्का विचार होना चाहिये !
अस अभिमान जाइ जनि भोरे । मैं सेवक रघुपति पति मोरे ॥
(मानस, अरण्यकाण्ड ११/११)

इस तरह दृढतासे भगवान् में अपनापन हो जाय तो फिर परमात्मप्राप्तिमें देरी नहीं लगेगी ।
—‘सब साधनोंका सार’ पुस्तकसे
http://www.swamiramsukhdasji.org/swamijibooks/pustak/pustak1/html/sab%20sadano%20ka%20sar/ch5_33.htm
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।। श्रीहरिः ।।
परमात्मप्राप्तिमें देरी क्यों?


परमात्मप्राप्तिका उद्देश्य लेकर चलनेवाले जितने भी मनुष्य हैं, उन सबको परमात्मप्राप्ति होगी, पर कब होगी ? कितने जन्मोंके बाद होगी ? इसका पता नहीं है । शरीरको अपना और अपने लिए मानते हुए कोई साधन करेगा तो उसको कितने जन्म लेने पड़ेंगे, कितनी योनियाँ भोगनी पड़ेंगी, इसका कुछ पता नहीं है । इसलिए मेरी शुरूसे यही लगन रही है कि मनुष्यको जल्दी परमात्मप्राप्ति कैसे हो ?

यद्यपि किया हुआ साधन निरर्थक नहीं जाता, तथापि परमात्माकी प्राप्ति जल्दी कैसे हो, यह लगन होनी चाहिये । लगन नहीं होगी तो कई जन्म लग जायँगे । जो वस्तु कल मिलेगी, वह आज मिलनी चाहिये, आज भी अभी मिलनी चाहिये । परमात्मा भी मौजूद हैं, फिर देरी किस बातकी ? परमात्मप्राप्तिमें देरीकी बात मेरेको सुहाती नहीं । जो काम जल्दी हो सके, उसके लिए देरी क्यों ? जो काम अभी हो सके, उसके लिए कल क्यों ?

श्रीशरणानन्दजी महाराजने लिखा है कि जीव-ब्रह्मकी एकता कभी हुई नहीं, कभी हो सकती नहीं । इसका तात्पर्य है कि जीवपना छूटनेपर ब्रह्मकी प्राप्ति होती है । यह सूक्ष्म विवेचन है । इसी तरह कहा जाता है कि साधुको परमात्माकी प्राप्ति नहीं होती, गृहस्थको परमात्माकी प्राप्ति नहीं होती, ब्राह्मणको परमात्माकी प्राप्ति नहीं होती तो इसका तात्पर्य है कि साधुपनेका अभिमान रहते हुए परमात्मप्राप्ति नहीं होती । ब्राह्मणपनेका अभिमान रखते हुए परमात्मप्राप्ति नहीं होती । अभिमान छूटेगा, तब प्राप्ति होगी । इन सब बातोंको कहनेका तात्पर्य यही है कि परमात्मप्राप्तिमें देरी मत करो । आपके कैसे ही पाप-ताप हों, आप कितने ही दुर्गुणी-दुराचारी हों, पर आपकी लगन लग जाय तो आज परमात्मप्राप्ति हो सकती है ।

साध्यकी प्राप्ति साधकको ही हो सकती है, ब्राह्मण, साधु आदिकी कैसे होगी ? ब्राह्मणको ब्राह्मण-कन्या विवाहके लिए मिल सकती है, पर परमात्मा कैसे मिलेंगे ? साधुको भिक्षा मिल सकती है, पर परमात्मा कैसे मिलेंगे ? शरीरधारीको परमात्माकी प्राप्ति नहीं होती । साधक शरीरधारी नहीं होता । अपनेको पुरुष या स्त्री मानेंगे तो परमात्मप्राप्ति कैसे होगी ? मैं स्त्री या पुरुष हूँ ही नहीं, मैं तो भगवान् का हूँ—ऐसा भाव होगा तो बहुत जल्दी कल्याण हो जायगा । अपनेको स्त्री या पुरुष मानना तो सांसारिक व्यवहार (मर्यादा)-के लिए है । परन्तु पारमार्थिक मार्गमें अपनेको स्त्री या पुरुष मानेंगे तो बहुत देरी लगेगी । चिन्मयकी प्राप्ति चिन्मयको ही होगी, जडको कैसे हो जायगी ?

समताकी प्राप्तिको बहुत ऊँचा बताया है । सेठजी श्रीजयदयालजी गोयन्दकाने लिखा है कि गीताके अनुसार अगर समता आ गयी तो दूसरे लक्षण भले ही न आयें,परमात्मप्राप्ति हो जायगी और समता नहीं आयी तो भले ही दूसरे बड़े-बड़े लक्षण आ जायँ, परमात्मप्राप्ति नहीं होगी । वह समता ममताका त्याग करते ही आ जाती है !
तुलसी ममता राम सों, समता सब संसार ।
(दोहावली ९४)


श्रीशरणानन्दजी महाराजने साफ लिखा है कि ममताको छोडते ही समता आ जायगी । दूसरी बात उन्होंने लिखी है कि अपने लिए तप करना भी भोग है और परमात्माके लिए झाड़ू लगाना भी पूजा है ! हिरण्यकशिपूने कितनी कठोर तपस्या की ! ब्रह्माजीने यह कह दिया कि ऐसी तपस्या आजतक किसीने नहीं की । परन्तु उसको तपस्यासे क्या परमात्मप्राप्ति हो गयी ? उसका परमात्मप्राप्तिका उद्देश्य ही नहीं था । इन बातोंका तात्पर्य परमात्मप्राप्ति जल्दी करनेमें है ।

—‘सब साधनोंका सार’ पुस्तकसे

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।। श्रीहरिः ।।
सच्ची आस्तिकता-२



( गत् ब्लॉगसे आगेका )
भगवान् ने कहा है—‘ममैवांशो जीवलोके’ ( गीता १५/७ ) । भगवान् का अंश होनेके कारण जीवका सम्बन्ध केवल भगवान् के साथ है, प्रकृतिके साथ बिलकुल नहीं है । इसलिए जड-चेतनका ठीक-ठीक विवेक करना साधकके लिए बहुत आवश्यक है । साधकको यह जानना चहिये कि हमारा विभाग ही अलग है । हम चेतन विभागमें हैं । जड विभागसे हमारा किंचिन्मात्र भी सम्बन्ध नहीं है । सम्पूर्ण पदार्थ और क्रियाएँ जड-विभागमें हैं । चेतन-विभागमें न पदार्थ है, न क्रिया है । वास्तवमें पदार्थ और क्रियाकी सत्ता ही नहीं है । इसलिए साधकको पदार्थ और क्रियासे रहित होना नहीं है, प्रत्युत वह स्वतः इनसे रहित है । साधक अव्यक्त ( निराकार ) और अक्रियरूप है । मात्र ‘करना’ प्रकृतिका और ‘न करना’ स्वयंका होता है । परमात्मतत्व ज्यों-का-त्यों विद्यमान है, उसके लिए कुछ न करनेकी जरुरत है । करनेका आश्रय प्रकृतिका आश्रय है । वह छोड़ दिया तो तत्व ज्यों-का-त्यों रहा । तत्वमें न पदार्थ है, न क्रिया है, प्रत्युत केवल विश्राम है ।

भगवान् ने जीवात्माके लिए कहा है—‘नित्यः सर्वगतः’ ( गीता २/२४ ), ‘येन सर्वमिदं ततं’ ( गीता २/१७ ) अर्थात् इस जीवात्मासे यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है, यह नित्य रहनेवाला और सबमें परिपूर्ण है । इसलिए साधकको चाहिये कि वह शरीर-अंतःकरणको न देखकर अपनी सर्वव्यापी सामान्य सत्तामें स्थित हो जाय । जो सब जगह व्याप्त है, वही साधकका स्वरुप है । उसका स्वरुप शरीर-अंतःकरणमें नहीं है । साधकमें ‘मैं हूँ’ की मुख्यता न होकर ‘है’ की मुख्यता रहे । जो ‘है’, वही वास्तवमें अपना है ।

गीतामें भगवान् ने कहा है—‘मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति’ ( ७/७ ) और सन्त-महत्मओंका भी अनुभव है—‘वासुदेवः सर्वम्’ ( ७/१९ ) । भगवान् और उनके भक्त—ये दो ही संसारका अकारण हित करनेवाले है* । इसलिए इन दोनोंकी बात मान लेनी चहिये । उनकी बातके आगे हमारी बातका कोई मूल्य नहीं है । हमें भले ही वैसा न दिखे, पर बात उनकी ही सच्ची है । इसलिए हमें जगत् को जगत्-रूपसे न देखकर भगवत्-रूपसे ही देखना चाहिये । संसारमें जो सात्विक, राजस और तामस भाव ( गुण, पदार्थ और क्रिया ) देखनेमें आते हैं, वे भी भगवान् के ही स्वरुप हैं । भगवान् के स्वरुप होते हुए भी वे गुण हमारे उपास्य नहीं हैं । हमारा उपास्य गुणातीत है । इसलिए भगवान् ने कहा है—‘न त्वहं तेषु ते मयि’ ( गीता ७/१२ ) ‘मैं उनमें और वे मुझमें नहीं हैं’ । गुण उपास्य इसलिए नहीं हैं कि हमें तीनों गुणोंसे ऊँचा उठना है । कारण कि जो मनुष्य तीनों गुणोंसे मोहित होता है, वह गुणातीत भगवान् को नहीं जानता+। जो गुणोंसे मोहित नहीं होते, उनको सब जगह भगवान् ही दिखते हैं, पर गुणोंसे मोहित मनुष्यको संसार ही दीखता है, भगवान् नहीं दीखते ।

यहाँ शंका हो सकती है कि भगवान् में राजस-तामस भाव कैसे होते हैं ? इसका समाधान है कि जैसे घर एक ही होता है, पर उसमें रसोई भी होती है और शौचालय भी अथवा एक ही शरीरमें उत्तमांग भी होते है और अधमांग भी, ऐसे ही एक भगवान् में सात्विक भाव भी हैं और राजस-तामस भाव भी ।

संसारको मिथ्या मानकर केवल भगवान् को सत्य मानना भी एक पद्धति ( साधना-मार्ग ) है । पर इस पद्धतिमें संसार बहुत दूरतक साथ रहता है । कारण कि त्याग करनेसे त्याज्य वस्तुकी सूक्ष्म सत्ता बनी रहती है । इसलिए इस पद्धतिमें भगवान् से अभेद तो होता है, पर अभिन्नता ( आत्मीयता ) नहीं होती । परन्तु जो संसाररूपसे भगवान् को देखते हैं, वे भगवान् के साथ अभिन्न हो जाते हैं ।



टिप्पणी—
* हेतु रहित जग जुग उपकारी । तुम्ह तुम्हार सेवक असुरारी ॥
( रामचरितमानस, उत्तरकाण्ड ४७/३ )


+ त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत् ।
मोहितं नाभिजानाति मामेभ्यः परमव्ययम् ॥
( गीता ७/१३ )

—‘मेरे तो गिरधर गोपाल’ पुस्तकसे

http://www.swamiramsukhdasji.org/swamijibooks/pustak/pustak1/html/meretogirdhargopal/ch5_38.htm

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।। श्रीहरिः ।।
सच्ची आस्तिकता-१


गीता भगवानके समग्ररूपको मानती है, उसीको महत्त्व देती है और उसीकी प्राप्तिमें ही मानव-जीवनकी पूर्णता मानती है । सब कुछ भगवान् ही हैं—‘वासुदेवः सर्वम्’ ( गीता ७/१९ )—यह भगवान् का समग्ररूप है । सगुण-निर्गुण, साकार-निराकार, द्विभुज, चतुर्भुज, सहस्रभुज आदि रूप तथा पदार्थ और क्रियारूप सम्पूर्ण जगत्, सम्पूर्ण जीव, सम्पूर्ण देवता—ये सब-के-सब भगवान् के समग्ररूपके अंतर्गत आ जाते हैं । इसलिए जो समग्रको जान लेना है, उसके लिए कुछ भी जानना शेष नहीं रहता— ‘यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते’ ( गीता ७/२ ) समग्रको जाननेका मुख्य साधन है— शरणागति । इसलिए भगवान् ने गीतोपदेशका पर्यवसान शरणागतिमें ही किया है— ‘सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज’ ( गीता १८/६६ ) भगवान् ने गीताभरमें केवल शरणागतिको ही ‘सर्वगुह्यतमं’ ( सबसे अत्यन्त गोपनीय ) कहा है— ‘सर्वगुह्यतमं भूयः श्रृणु’ ( गीता १८/६४ ) ।

वास्तवमें सत्ता एक ही है । उस एक परमात्माकी सत्ताके अधीन जीवकी सत्ता है और जीवके अधीन जगत् की सत्ता है । जीव और जगत्— दोनों परमात्मामें भासित होते हैं । गीताके सातवें अध्यायमें भगवान् ने जीवको अपनी ‘परा प्रकृति’ और जगत् को अपनी ‘अपरा प्रकृति’ बताया है । परा और अपरा— दोनों भगवान् की शक्तियाँ हैं । अतः इनको अपनी प्रकृति बतानेमें भगवान् का तात्पर्य है कि ये दोनों मेरेसे अलग नहीं हैं । शक्तिमानसे अलग शक्तिकी कोई स्वतन्त्र सत्ता नहीं होती । शक्तिमान शक्तिके बिना रह सकता है, पर शक्ति शक्तिमानके बिना नहीं रह सकती ।

अब शंका होती है कि जब जीव ( परा ) और जगत् ( अपरा )—दोनों ही भगवान् से अभिन्न हैं तो फिर जगत् की सत्ता अलग क्यों दीखती है ? इसके उत्तरमें भगवान् ने कहा है—‘जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत्’ ( गीता ७/५ ) अर्थात जीवने ही जगत् को धारण किया है अर्थात जगत् को सत्ता और महत्ता दी है । जीव केवल मेरा ( भगवान् का ) अंश है—‘ममैवांशो जीवलोके’ (गीता १५/७ ) परन्तु यह मिलने और बिछुडनेवाले शरीर-इन्द्रियों-मन-बुद्धिको अपना मान लेता है— ‘मनः षष्ठानिन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति’ ( गीता १५/७ ) । जगत् के साथ अपना सम्बन्ध माननेके कारण ही यह जन्म-मरणके चक्करमें पड़कर दुःख पा रहा है । जीवके द्वारा जगत् से माना हुआ यह सम्बन्ध ही सम्पूर्ण योनियोंका कारण है— ‘एतद्योनिनी भूतानि सर्वाणीत्युपधारय’ ( गीता ७/६ ) अर्थात् इन दोनोंके माने हुए संयोगके कारण ही सम्पूर्ण स्थावर-जंगम प्राणी पैदा होते हैं । तात्पर्य हुआ कि जीवके द्वारा अपरासे जोड़ा गया सम्बन्ध ही मूल दोष है, जिससे सम्पूर्ण दोषोंकी उत्पत्ति होती है ।

‘वासुदेवः सर्वम्’ अर्थात् सब कुछ भगवान् ही हैं—यह गीताका सर्वोपरि सिद्धान्त है । इसका अनुभव करनेका मनुष्यमात्र अधिकारी है । प्रत्येक देश, वर्ण, आश्रम, सम्प्रदाय आदिका मनुष्य भगवान् का भक्त होकर ‘वासुदेवः सर्वम्’ का अनुभव कर सकता है । कारण कि भगवान् की प्राप्ति शरीरके द्वारा नहीं होती, प्रत्युत शरीरके सम्बन्ध-विच्छेदसे होती है । शरीरसे सम्बन्ध-विच्छेदके लिए तीन बातोंको जानना आवश्यक है —शरीर ‘मैं’ नहीं हूँ, शरीर ‘मेरा’ नहीं है और शरीर ‘मेरे लिए’ नहीं है । यह सिद्धान्त है कि जो वस्तु मिलने और बिछुडनेवाली होती है, वह अपनी और अपने लिए नहीं होती । एक भगवान् ही हमारे ऐसे साथी हैं, जो सदा हमारे साथ रहते हैं, कभी हमसे बिछुडते नहीं । परन्तु जो मनुष्य मिलने और बिछुडनेवाली वस्तुओंमें ही उलझे रहते हैं, नाशवान् भोगोंमें और संग्रहमें ही लगे रहते हैं, वे सदा साथ रहते हुए भी भगवान् को न प्राप्त होकर बार-बार संसारमें जन्मते-मरते रहते हैं—‘अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि’ ( गीता ९/३ ) ।

संसारकी स्वतंत्र सत्ता नहीं है । उसको जीवने ही अहंता-ममता-कामनाके कारण स्वतन्त्र सत्ता दी है । जबतक साधकमें अहंता-ममता-कामना रहती है, तबतक उसको यह मानना चहिये कि परमात्मामें संसार है और संसारमें परमात्मा है । परन्तु जब उसकी अहंता-ममता-कामना मिट जायगी, तब उसकी दृष्टिमें न संसारमें परमात्मा रहेंगे, न परमात्मामें संसार रहेगा, प्रत्युत परमात्मा- ही-परमात्मा रहेंगे । परमात्मामें संसारको देखना अथवा संसारमें परमात्माको देखना अधूरी आस्तिकता है । परन्तु केवल परमात्माको ही देखना पूरी आस्तिकता है ।

—‘मेरे तो गिरधर गोपाल’ पुस्तकसे

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।। श्रीहरिः ।।
कल्याणका निश्चित उपाय
भगवान् ने जीव पर कृपा करके उसको अपना कल्याण करनेके लिए हीमनुष्यशरीर दिया है अपना कल्याण करनेके सिवाय मनुष्यजन्मकादूसरा कोई प्रयोजन है ही नहीं शरीर, धन-संपत्ति, जमीन-मकान, स्त्री-पुत्रआदि जितनी भी सांसारिक वस्तुएं हैं, वे सब-की-सब मिलने औरबिछुडनेवाली हैं अतः कोई कितना ही बड़ा धनवान बन जाय, बलवानबन जाय, विद्वान बन जाय, ऊँचे पदवाला बन जाय, बड़े कुटुम्बवाला बनजाय, पर अपने कल्याणके बिना ये सब-की-सब वस्तुएँ अपने कुछ काम आयेंगी बिना दुल्हेकी बरातकी तरह सम्पूर्ण सांसारिक भोग व्यर्थ हैं इसलिए मनुष्यका खास कर्त्तव्य हैअपना कल्याण करना

एक मार्मिक बात है कि अपना कल्याण करनेमें मनुष्यमात्र सर्वथा स्वतंत्र है, समर्थ है, योग्य है, अधिकारी है कारण कि भगवान् जीवको मनुष्यशरीर देते हैं तो उसके साथ ही अपना कल्याण करनेकी स्वतंत्रता, सामर्थ्य, योग्यता और अधिकार भी प्रदान करते हैं

अब प्रश्न उठता है कि मनुष्य अपना कल्याण करनेके लिए क्या करें ? इसका उत्तर है कि यदि मनुष्य इन चार बातोंको दृढतासे स्वीकार करले तो उसका कल्याण हो जाएगा
- मेरा कुछ भी नहीं है
- मेरेको कुछ भी नहीं चाहिए
- मेरा किसीसे कोई सम्बन्ध नहीं है
- केवल भगवान् ही मेरे हैं

मिलने और बिछुडनेवाली वस्तुओंको अपना मानना मूल दोष है, जिससे सम्पूर्ण दोषोंकी उत्पत्ति होती है । वास्तवमें अनन्त ब्रह्माण्डोंमें केश-जितनी वस्तु भी अपनी नहीं है । इसलिए ‘मेरा कुछ भी नहीं है’— ऐसा स्वीकार करनेसे जीवनमें निर्दोषता आ जाती है । निर्दोषता आते ही मनुष्य धर्मात्मा हो जाता है ।

जब मेरा कुछ है ही नहीं, तो फिर हम किस वस्तुकी चाहना करें ? अतःमेरेको कुछ भी नहीं चहिये’—ऐसा स्वीकार करते ही जीवनमें निष्कामता जाती है निष्कामता आते ही मनुष्य योगी हो जाता है अर्थात् उसको समत्वरूप योगकी प्राप्ति हो जाती हैमत्वं योग उच्यते’ ( गीता २/४८ ) कोई भी कामना होनेसे उसको चित्तवृतिनिरोधरूप योगकी भी प्राप्ति हो जाती है‘योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः’ ( योगदर्शन १/२ )
मनुष्यमात्रका स्वरुप स्वतः असंग है‘असंगो ह्ययं पुरुषः’ ( बृहदा. ४/३/१५ ) अतः मिलने और बिछुड़नेवाले किसी भी वस्तु-व्यक्तिके साथ अपना सम्बन्ध माननेसे मनुष्यको अपनी असंगताका अनुभव हो जाता है असंगताका अनुभव होनेपर वह ज्ञानी हो जाता है

जीवमात्र परमात्माका अंश है‘ममैवांशो जीवलोके’ ( गीता १५/७ ) भगवान् का अंश होनेके नाते केवल भगवान् ही हमारे हैं भगवान् के सिवाय दूसरा कोई हमारा नहीं है इस प्रकार भगवान् में अपनापन स्वीकार करते ही मनुष्य भक्त हो जाता है

धर्मात्मा, योगी, ज्ञानी और भक्त होनेमें ही मनुष्यका कल्याण निहित है । ऐसा होनेमें कठिनाई भी नहीं है; क्योंकि वास्तवमें मनुष्यमात्रका स्वरुप स्वतः निर्दोष, निष्काम, असंग और भगवान् का अंश है । तात्पर्य है कि हमारा स्वरुप सत्तामात्र है । उस सत्तामें निर्दोषता, निष्कामता और असंगता स्वतःसिद्ध है और वह सत्ता भगवान् का अंश है । इसलिए साधकका कर्तव्य है कि वह उपर्युक्त चारों बातोंको दृढ़तासे स्वीकार कर ले । फिर उसका कल्याण निश्चित है ।

—‘सब साधनोंका सार’ पुस्तकसे
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।। श्रीहरिः ।।


विभूतियोंका क्या अर्थ है ?


अब आप ध्यान देकर सुनें । अब एक बात बताता हूँ अपने कामकी । आपको कोई भी सुन्दर रूप दिखे । बहुत सुन्दर दिखे तो उस रूपपर दृष्टि न रख करके की भाई, यह सुन्दरता कहाँसे आयी ? यह आयी हुई सुन्दरता है । क्या पहचान है कि आयी हुई है ? अगर इसकी यह सुन्दरता होती तो हरदम रहनी चाहिए । जैसे नये खिले हुए फूलकी सुन्दरता रहती है, दो-तीन दिनोंके बाद वह सुन्दरता रहती है क्या ? ऐसे स्वाद है, सुन्दरता है, शब्द है, स्पर्श है, रूप है, रस है, गन्ध है, जितने जो विषय हैं, जिनमें मनुष्यका आकर्षण होता है । क्या वे विषय पहले वहाँ इतने सुन्दर थे और क्या वैसे रहेंगे ? तो वहाँ सुन्दरता उसकी नहीं है, उसमें आयी हुई है । और जिससे आयी है, वो नित्य-सौन्दर्य है वहाँ, नित्य-ऐश्वर्य है, नित्य-माधुर्य है । परमात्माके गुण विलक्षण हैं और दिव्य हैं, अलौकिक और नित्य हैं । उनकी आभाकी ये झलक आती है संसारमें । हम इन्द्रियोंके आकर्षणसे उसमें उलझ जाते हैं । वो वास्तवमें तत्व नहीं हैं । उनके भीतर जो भरा हुआ है वही तत्व है । उसीकी आभा आती है । तो जहाँ कहीं भी महत्ता दिखे, श्रेष्ठता दीखे, विलक्षणता दीखे, विचित्रता दीखे, वहाँ उन चीजोंकी कभी भी नहीं माननी चाहिये । वहाँ ऐसा माने कि आयी हुई है इनमें, है नहीं इनमें । जीवन दीखता है, जीते हुए मनुष्य विलक्षण दीखते हैं तो भगवान् कहते हैं ‘भूतनामस्मि चेतना’ ( गीता १०/२२ ) वो चेतना मेरी है । इसीका नाम विभूतियाँ है । भगवान् ने विभूतियाँ बतायी हैं तो तुम इस संसारको मत देखो । इनमें जो कुछ सार चीज है, असली चीज है । वह मेरा स्वरूप है ।


अलौकिकता दीखते ही परमात्माकी ओर वृत्ति जानी चाहिए अचानक, कि यह विलक्षणता दूसरी आ नहीं सकती, इन हाड-मांसमें हो नहीं सकती, इन चीजोंमें हो नहीं सकती । बहुत विचित्र व्याख्यान हुआ । बहुत विचित्र शास्त्रका ज्ञान हुआ, उस ज्ञानमें भी विभूति उस परमात्माकी ही है । उस विचित्र व्याख्यानमें भी उस परमात्माकी ही विभूति है । विचित्र-विवेचनमें भी परमात्माकी विभूति है । विचित्र प्रसन्नता होती है, आनंद होता है, कीर्तन करते हैं उसमें विलक्षणता आती है, वो विलक्षणता उस परमात्माकी होती है । जहाँ कहीं आपको विलक्षणता दीखे, आकर्षण दीखे । वहाँ संसारमें न अटक करके उसके मूलमें परमात्मतत्वकी ओर हमारी वृत्ति जोरदार जानी चाहिये । तब उस परमात्माको पहिचान सकेंगे और इसमें उलझ गए, शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्धमें, संसारमें तो परमात्मतत्वकी प्राप्ति नहीं होगी । क्योंकि हम तो यहाँ नकलीमें ही उलझ गये, यहाँ ही फँस गये । तो इसमें न फँस करके, उस परमात्मतत्वकी ओर वृत्ति जावे । यही विभूतियोंका अर्थ है, यही विश्वरूपका अर्थ है, उस परमात्मतत्वको ठीक-ठीक तरहसे जानना चाहिये । सबमें वह परमात्मा परिपूर्ण है । सब देशमें है, सब कालमें है, सब वस्तुमें है, सब व्यक्तियोंमें है, संपूर्ण घटनाओंमें है; परन्तु देखनेवाला इन घटनाओंमें, परिस्थितियोंमें, वस्तुओंमें, व्यक्तियोंमें, इन क्रियाओंमें उलझे नहीं और उसको देखे तो वह दिखेगा । और इनमें उलझ जावोगे तो वह नहीं दिखेगा । यहीं फँस जायगा ।


नारायण ! नारायण !! नारायण !!!


—‘भगवद् प्राप्ति सहज है’ पुस्तकसे पेज नं. ४३/४४ से

११/०६/१९८३ के प्रवचनसे ( गीता भवन, स्वर्गाश्रम, ऋषिकेश )
http://www.swamiramsukhdasji.org/swamijibooks/pustak/pustak1/html/bhagwatprapti%20sahaj%20hai/ch4_43.htm

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