आजकी शुभ तिथी—आश्विन कृष्ण नवमी, सं. २०६७, शनिवार, महात्मा गाँधी-जयन्ती, मातृनवमी, नवमीश्राद्ध
Kalyankari Pravachanआजकी शुभ तिथी—आश्विन कृष्ण अष्टमी, सं. २०६७, शुक्रवार, जीवत्पुत्रिकाव्रत, अष्टमीश्राद्ध
Kalyankari Pravachanआजकी शुभ तिथी—आश्विन कृष्ण सप्तमी, सं. २०६७, गुरुवार, सप्तमीश्राद्ध
Sundar Samajaka Nirmanआजकी शुभ तिथी—आश्विन कृष्ण षष्ठी, सं. २०६७, बुधवार, षष्ठीश्राद्ध
sundar samajaka nirmanआजकी शुभ तिथी—आश्विन कृष्ण पंचमी, सं. २०६७, मंगलवार, पंचमीश्राद्ध
Jivanopayogi Pravachanआजकी शुभ तिथी—आश्विन कृष्ण चतुर्थी, सं. २०६७, सोमवार, चतुर्थीश्राद्ध
Jivanopayogi Pravachanआजकी शुभ तिथी—आश्विन कृष्ण तृतीया, सं. २०६७, रविवार, तृतीयाश्राद्ध
Jivanopayogi Pravachanआजकी शुभ तिथी—आश्विन कृष्ण द्वितीया, सं. २०६७, शनिवार, द्वितीया श्राद्ध
Jivanopayogi Pravachanआजकी शुभ तिथी—आश्विन कृष्ण प्रतिपदा, सं. २०६७, शुक्रवार, प्रतिपदा-श्राद्ध
Jivanopayogi Pravachanआजकी शुभ तिथी—भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी, सं. २०६७, बुधवार
श्रीअनन्तचतुर्दशीव्रत, व्रत-पूर्णिमा
आजकी शुभ तिथी—भाद्रपद शुक्ल एकादशी, सं. २०६७, रविवार
पद्माएकादशीव्रत, श्रीवामनद्वादशीव्रत
आजकी शुभ तिथी—भाद्रपद शुक्ल दशमी, सं. २०६७, शुक्रवार
एकादशीव्रत रविवारको है
आजकी शुभ तिथी—भाद्रपद शुक्ल अष्टमी, सं. २०६७, बुधवार,राधाष्टमी
Kalyankari Pravachanआजकी शुभ तिथी—भाद्रपद शुक्ल षष्ठी, सं. २०६७, सोमवार,लोलार्कषष्ठीव्रत
Kalyankari Pravachanआजकी शुभ तिथी—भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी, सं. २०६७, रविवार,ऋषिपञ्चमीव्रत
Kalyankari Pravachanआजकी शुभ तिथी—भाद्रपद अमावस्या, सं. २०६७, बुधवार,कुशोत्पाटिनी अमावस्याके बारेमें नीचे पढ़ें ।
Kalyankari Pravachan Kushotpatini Amavasyaआजकी शुभ तिथी—भाद्रपद कृष्ण एकादशी, सं. २०६७, शनिवार, जयाएकादशीव्रत
Kalyankari Pravachanआजकी शुभ तिथी—श्रावण पूर्णिमा, सं. २०६७, मंगलवार, रक्षाबंधन
Bhagavatprapti Sahaj Hai(गत् ब्लॉगसे आगेका)
केवल भोजन ही नहीं, गहना पहनें तो ठाकुरजीको अर्पण करके । ठाकुरजीका ही कपड़ा पहनें । सब चीजें प्रसादरूपमें ग्रहण करें तो सब चीजें पवित्र हो जाती हैं । आपने देखा है कि नहीं, ठाकुरजीके प्रसाद लगावें और वह बाँटें तो हरेक आदमी हाथ पसारेगा । छोटे-से-छोटा कणका दो तो वह राजी हो जायगा । लखपति हो चाहे करोड़पति हो, आपके सामने हाथ पसारेगा और प्रसादका आप छोटा-सा कणका दे दें, वह राजी हो जायगा । वह क्या मीठेका भूखा है ?
कोई लखपति, करोड़पति आपसे प्रसाद माँगे और अगर उसे आप कहें कि चलो बाजारमें मीठा दिलाऊँ आपको । तो वह नाराज हो जायगा । वह धनी आदमी कहेगा कि मिठाईका भूखा हूँ क्या मैं ? हमें प्रसाद चाहिये । प्रसादका कितना महत्त्व है बताओ ? ठाकुरजीका प्रसाद है । घरमें सब चीजें ठाकुरजीकी हैं ।
आप करें तो एक बात बतावें बहुत बढ़िया ! कृपा करके कर लें तो बहुत बढ़िया और फायदेकी बात है । घरमें जितना धन पड़ा है सबपर तुलसीदल रख दो । जितने गहने, कपड़े हैं सबपर तुलसीदल रख दो । घरपर भी धर दो । जितने भी गाय, भेड़, बकरी हैं, उनपर तुलसीदल रख दो । छोरा-छोरीपर भी धर दो । किनके बालक हैं ? ठाकुरजीके बालक हैं ।
एक चमत्कार है । आप कर सको तो बतावें, पर हृदयसे करो, जब होवे । छोरा उद्दण्ड है और कहना मानता नहीं । सच्चे हृदयसे अपनी ममता उठा लो कि मेरा है ही नहीं । केवल ठाकुरजीका ही है । छोरा बिलकुल सुधार जायगा । जैसे ठाकुरजीके भोग लगानेसे चीजें पवित्र हो जाती हैं । बड़े-बड़े पुरुष आदर करते हैं । ऐसे सच्चे हृदयसे अपनी ममता बिलकुल मिटाकर, केवल ठाकुरजीका मान लें तो वह शुद्ध हो जायगा, पवित्र हो जायगा । ऐसी बात करके देखो । शर्त यह है कि अपनी ममता बिलकुल उठा लें । जैसे मुसलमानोंका छोरा है, ऐसा ही यह छोरा है । मर जाय तो कोई असर नहीं हमारेपर । हमारा छोरा नहीं है अब मरा तो ठाकुरजीका । जब कि ठाकुरजीका मरता नहीं । यहाँ मर गया तो वहाँ जन्मा । ठाकुरजीसे बाहर होता ही नहीं । ऐसा करनेसे छोरा पवित्र हो जायगा । एकदम बात ठीक है । ममता ही मलिनता है । इसके कारण ही मलिन होता है । दान-पुण्य करते हैं तो इनके साथ अपना कोई सम्बन्ध नहीं मानें । “दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे” । (गीता १७/२०) ‘अनुपकारीणे’ का अर्थ यह नहीं कि कोई उपकार न कर दे हमारा । मानो पहले उपकार किया नहीं और आगे भी आशा नहीं है । ऐसेको दिया जाय, जिनसे अपना स्वार्थका सम्बन्ध न हो उनको दो चाहे घरवालोंके साथ स्वार्थका सम्बन्ध न रखो । एक ही बात रहेगी । टोटल एक हो आयेगा । चाहे तो अपनापन न हो, वहाँ सेवा करो अथवा जहाँ सेवा करो वहाँ अपनापन मिटा दो—एक ही बात होगी ।
भगवान्के हैं हम । भगवान्के दरबारमें रहते हैं । भगवान्का ही काम करते हैं । भगवान्के प्रसादसे भगवान्के जनोंकी सेवा करते हैं । मैं भी भगवान्का ही प्रसाद पाता हूँ—यह पञ्चामृत है असली । आजसे इस बातको पकड़ लो । “सर्वभावेन मां भजति” और सब भावोंसे भगवान्का ही भजन करें, तो भाव रखें कि ठाकुरजीका शरीर हैं । ठाकुरजीका काम करता हूँ मैं । तो ठाकुरजीपर एहसान कर सकते हैं कि महाराज ! आपका काम करता हूँ ।
(शेष आगेके ब्लॉगमें)

पञ्चामृत-१
आप जहाँ रहते हैं, वहाँ अपने घरमें रहते हैं, अपने घरमें रहनेका माहात्म्य नहीं है, पर भगवान्के दरबारमें रहें तो बड़ा भारी माहात्म्य है । इस घरको तो आपने अपना माना है । पर यह घर पहलेसे भगवान्का ही था । अब भी है और पीछे भी भगवान्का ही रहेगा । मरोगे तो यह घर साथ थोड़े ही चलेगा । यह तो भगवान्का ही है । अतः आजसे आप मान लो कि भगवान्के घरमें रहते हैं । साक्षात् भगवान्के घरमें ही रहते हो । हरिद्वार आते हैं तो कहते हैं—ओहो ! हरकी पेड़ीयाँ हैं ये तो । वृन्दावन आ गये तो कहते हैं—भगवान्की लीलाभूमिमें हैं । अयोघ्यामें आ गये तो भगवान्के दरबारमें आ गये । भगवान्का दरबार मान लो, भगवान्का घर मान लो तो यही घर वृन्दावन हो गया । हरदम यही बात रहे कि हम तो भगवान्के घरमें ही रहते हैं और खास लाड़ले हैं हम तो भगवान्के । आजसे यह बात मान लो । अपने-अपने घरोंको अपना मत मानो । अरे ! भगवान्का ही घर है । अपना घर तो बीचमें माना है । पहले भगवान्का था और पीछे भी भगवान्का रहेगा । फिर बीचमें अपना कैसे हो गया ? छापा मारा मुफ्तमें ।
एक बातपर और ध्यान देना—जो भी काम करो, भगवान्का मानकर करो । खेती करो चाहे घरका काम-धन्धा करो, भोजन करो चाहे भजन करो, कपड़ा धोओ चाहे स्नान करो । शरीर भी भगवान्का है, तो भगवान्की सेवाके लिये इसका काम करते हैं । खाना-पीना भी भगवान्का काम है, काम-धन्धा भी भगवान्का ही करते हैं, सब संसारके मालिक भगवान् हैं तो सब शरीरोंके मालिक भी भगवान् हैं । तो शरीरोंका और संसारका काम किसका हुआ ? भगवान्का ही हुआ । कैसी मौजकी बात है ! भगवान्के दरबारमें रहते हैं और काम-धन्धा भी भगवान्का ही करते हैं—दो बात हुईं ।
अब तीसरी बात—घरमें जितनी चीजें हैं ये भी भगवान्की ही हैं । घर भगवान्का और आप भगवान्के तो चीजें किसी दूसरेकी हो सकती हैं क्या ? माताओं और बहिनोंको चाहिये कि उन भगवान्की चीजोंको लेकर रसोई बनावें । मनमें समझें कि ओहो ! मैं तो ठाकुरजीको भोग लगानेके लिये प्रसाद बना रहीं हूँ । ठाकुरजीको भोग लगावें । ठाकुरजीको भोग लगाकर घरके जितने लोग हैं, उनको ठाकुरजीके जन (पाहुने) समझकर प्रसाद जिमावें । उन्हें ऐसा माने कि ये सब ठाकुरजीके प्यारे जन हैं । ठाकुरजीके प्यारे लाड़ले बालक हैं । इनको भोजन करा रही हूँ । ठाकुरजीकी सेवा करा रही हूँ । जैसे किसी बच्चेको प्यार करे तो उसकी माता राजी हो जावे कि नहीं ? ऐसे ही भगवान्के बालकोंकी सेवा करें तो भगवान् राजी हो जावें । कैसी मौजकी बात है ! भगवान्की रसोई बनायी, भगवान्को भोग लगाया और भगवान्के ही बालकोंको भोग, प्रसाद जिमा दिया । अपने भी भोजन करें तो ठाकुरजीका प्रसाद समझते हुए भोजन करें । ठाकुरजीका प्रसाद है । कैसी मौजकी बात !
तुम्ही निबेदित भोजन करहीं ।
प्रभु प्रसाद पट भूषन धरहीं ॥
(मानस २/१२८/१)
(शेष आगेके ब्लॉगमें)
—‘जीवनोपयोगी प्रवचन’ पुस्तकसे
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विधियों-४
(गत् ब्लॉगसे आगेका)
संस्कृत भाषाका उच्चारणकरनेकी विधि
शब्दका जैसा रूप है, उसको बीचमेंसे तोडकर न पढ़े एवं लघु और गुरुका, विसर्गों और अनुस्वारोंका तथा श,ष, स का लक्ष्य रख कर पढ़े तो संस्कृत भाषाका उच्चारण शुद्ध हो जाता है ।
१—उच्चारणमें इ, उ, ऋ—इन तीन अक्षरोंके लघु और गुरुका ध्यान विशेष रखना चाहिये । क्योंकि अ और आ का उच्चारण-भेद तो स्पष्ट स्वतः ही हो जाता है और लृ का उच्चारण बहुत कम आता है तथा वह दीर्ध होता ही नहीं । ऐसे ही ए, ऐ, ओ, औ—ये अक्षर लघु होते ही नहीं ।
२—संयोगके आदिका, विसर्गोंके आदिका स्वर गुरु हो जाता है; क्योंकि संयोगका उच्चारण करनेसे पिछले स्वरपर जोर लगेगा ही तथा विसर्ग जो कि आधे ‘ह’ की तरह बोले जाते हैं, उनके उच्चारणसे भी स्वरपर जोर लगता ही है । जिससे पीछेवाला स्वर गुरु हो जाता है । व्यञ्जनोंका उच्चारण बिना स्वरके सुखपूर्वक होता ही नहीं और व्यञ्जनके आगे दूसरा व्यञ्जन आ जानेसे पीछेवाले स्वरके अधीन ही उसका उच्चारण रहेगा; इसलिये पीछेवाला स्वर गुरु होता है ।
३—अनुस्वार और विसर्ग किसी-न-किसी स्वरके ही आश्रित होते हैं; स्वरके बाद उच्चारित होनेसे ही उनकी अनुस्वार और विसर्ग संज्ञा होती है । अतः इनका उच्चारण करनेसे स्वाभाविक ही पिछला स्वर गुरु हो जाता है । यहाँ अनुस्वारके विषयमें यह ध्यान देनेकी बात है कि उसका उच्चारण आगेवाले व्यञ्जनके अनुरूप होता है अर्थात् आगेका व्यञ्जन जिस वर्णका होगा, उस वर्गके पञ्चम अक्षरके अनुस्वारका उच्चारण होगा । जैसे क, ख, ग, घ, ङ परे होनेपर अनुस्वरका उच्चारण ‘ङ्’ की तरह; च, छ, ज, झ, ञ परे होनेपर ‘ञ्’ की तरह; ट, ठ, ड, ढ, ण परे होनेपर ‘ण्’ की तरह; त, थ,द, ध, न परे होनेपर ‘न्’ की तरह; प, फ, ब, भ, म परे होनेपर ‘म्’ की तरह करना चाहिये । यह नियम केवल इन पचीस अक्षरोंके लिये ही है । य, र, ल, व, श, ष, स, ह—ये आठ अक्षर परे होनेपर शुद्ध अनुस्वरका ही उच्चारण करना ही चाहिये जो कि केवल नाशिकासे होता है ।
४—श, ष, स—इन तीनोंका उच्चारण-भेद समझते हुए इनको निम्नलिखित रीतिसे पढ़ना चाहिये । मूर्धासे ऊँचे तालुमें जीभ लगाकर ‘श’ का उच्चारण करनेसे तालव्य शकारका ठीक उच्चारण होगा तथा दाँतोंकी तरफ थोड़ा नीचे लगाकर ‘ष’ का उच्चारण करनेसे मूर्धन्य षकारका ठीक उच्चारण होगा एवं दोनों दाँतोंको मिलाकर ‘स’ का उच्चारण करनेसे स्वाभाविक ही जीभ दाँतोंके लगेगी, तब दन्त्य सकारका ठीक उच्चारण होगा ।
—‘गीता-दर्पण’ पुस्तकसे
http://www.swamiramsukhdasji.org/swamijibooks/pustak/pustak1/html/GeetaDarpan/purvarth/ch97_250.htm

गीता-पाठकी
विधियों-३
(गत् ब्लॉगसे आगेका)
गीताका पाठ करनेके तीन प्रकार हैं—सृष्टिक्रम, संहारक्रम और स्थितिक्रम । गीताके पहले अध्यायके पहले श्लोकसे लेकर अठारहवें अध्यायके अन्तिम श्लोकतक सीधा पाठ करना अथवा प्रत्येक अध्यायके पहले श्लोकसे लेकर, उसी अध्यायके अन्तिम श्लोकतक सीधा पाठ करना ‘सृष्टिक्रम’ कहलाता है । अठारहवें अध्यायके अन्तिम श्लोकसे लेकर पहले अध्यायके पहले श्लोकतक उलटा पाठ करना अथवा प्रत्येक अध्यायके अन्तिम श्लोकसे लेकर उसी अध्यायके पहले श्लोकतक उलटा पाठ करना ‘संहारक्रम’ कहलाता है । छठे अध्यायके पहले श्लोकसे लेकर अठारहवें अध्यायके अन्तिम श्लोकतक सीधा पाठ करना और पाँचवें अध्यायके अन्तिम श्लोकसे लेकर पहले अध्यायके पहले श्लोकतक उलटा पाठ करना ‘स्थितिक्रम’ कहलाता है । ब्रह्मचारी सृष्टिक्रमसे, संन्यासी संहारक्रमसे और गृहस्थ स्थितिक्रमसे पाठ कर सकते हैं । परन्तु यह कोई नियम नहीं है । वास्तवमें किसी भी प्रकारसे गीताका पाठ किया जाय, उससे लाभ-ही-लाभ है ।
गीताका पाठ सम्पुटसे, सम्पुटवल्लीसे अथवा बिना सम्पुटके भी किया जाता है । गीताके जिस श्लोकका सम्पुट देना हो, पहले उस श्लोकका पाठ करके फिर अध्यायके एक श्लोकका पाठ करे । फिर सम्पुटके श्लोकका पाठ करके अध्यायके दूसरे श्लोकका पाठ करे । इस तरह सम्पुट लगाकर पूरी गीताका सीधा या उलटा पाठ करना ‘सम्पुट-पाठ’ कहलाता है । सम्पुटके श्लोकका दो बार पाठ करके फिर अध्यायके एक श्लोकका पाठ करे । फिर सम्पुटके श्लोकका दो बार पाठ करके अध्यायके दूसरे श्लोकका पाठ करे । इस तरह सम्पुट लगाकर पूरी गीताका सीधा या उलटा पाठ करना ‘सम्पुटवल्ली-पाठ’ कहलाता है । गीताके पूरे श्लोकोंका सम्पुट अथवा सम्पुटवल्लीसे पाठ करनेसे एक विलक्षण शक्ति आती है, गीताका विशेष मनन होता है, अन्तःकरण शुद्ध होता है, शान्ति मिलती है और परमात्माप्राप्तिकी योग्यता आ जाती है ।
सम्पुट न लगाकर पाठ करना ‘बिना सम्पुटका पाठ’ कहलाता है । मनुष्य प्रतिदिन बिना सम्पुटका अठारह अध्यायोंका पाठ करे अथवा नौ-नौ अध्याय करके दो दिनमें अथवा छः-छः अध्याय करके तीन दिनमें अथवा दो-दो अध्याय करके नौ दिनमें गीताका पाठ करे । यदि पंद्रह दिनमें गीताका पाठ पूरा करना हो तो प्रतिपदासे एकादशीतक एक-एक अध्यायका, द्वादाशीको बारहवें और तेरहवें अध्यायका, त्रयोदशीको चौदहवें और पन्द्रहवें अध्यायका, चतुर्दशीको सोलहवें और सत्रहवें अध्यायका तथा अमावस्या और पूर्णिमाको अठारहवें अध्यायका पाठ करे । किसी पक्षमें तिथि घटती हो, तो सातवें और आठवें अध्यायका एक साथ पाठ करे । इसी तरह किसी पक्षमें तिथि बढती हो, तो सोलहवें और सत्रहवें इन दोनों अध्यायोंका अलग-अलग दो दिनमें पाठ कर ले ।
यदि पूरी गीता कण्ठस्थ हो तो क्रमशः प्रत्येक अध्यायके पहले श्लोकका पाठ करते हुए पूरे अठारहों अध्यायोंके पहले श्लोकोंका पाठ करे । फिर क्रमशः अठारहों अध्यायोंके दूसरे श्लोकोंके पाठ करे । इस प्रकार पूरी गीताका सीधा पाठ करे । इसके बाद अठारहवें अध्यायका अन्तिम श्लोक, फिर सत्रहवें अध्यायका अन्तिम श्लोक—इस तरह प्रत्येक अध्यायके अन्तिम श्लोकका पाठ करे । फिर अठारहवें अध्यायका उपान्त्य (अन्तिम श्लोकके पीछेका) श्लोक, फिर सत्रहवें अध्यायका उपान्त्य श्लोक—इस तरह प्रत्येक अध्यायके उपान्त्य श्लोकका पाठ करे । इस प्रकार पूरी गीताका उलटा पाठ करे ।
(शेष आगेके ब्लॉगमें)
—‘गीता-दर्पण’ पुस्तकसे


