।। श्रीहरिः ।।
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आजकी शुभ तिथि–
फाल्गुन शुक्ल प्रतिपदा, वि.सं.–२०६९, मंगलवार
पारमार्थिक उन्नति धनके आश्रित नहीं
(गत ब्लॉगसे आगेका)
धर्मके लिये तो सही पैसोंकी भी जरूरत नहीं है, फिर पापसे कमाये हुए पैसोंकी क्या जरूरत है ? हमारे घरमें पानीका नल लगा है तो इसका मतलब यह नहीं कि हम धोये हुए कपड़ोंको कीचड़से मैला कर लें और फिर उनको नलसे धोयें । ऐसे ही झूठ, कपट, बेईमानी करके कमाये हुए पैसोंसे धर्म करते हो, तो फिर पहले पाप ही क्यों करते हो ? कपड़ेमें एक छटाँक कीचड़ लग जाय तो वह एक छटाँक जलसे साफ नहीं होता । सेरोंभर जल लगनेपर भी बाहरसे भले ही धुल जाय, पर भीतरसे गंदापन बाकी रह ही जाता है । इसलिये धर्मके लिये भी जो पाप करता है कि पाप करके पैसा कमायें और फिर उसे अच्छे काममें लगा दें, तो उसका पैसा अच्छे काममें लगेगा ही नहीं और लगेगा तो भी वह पापसे शुद्ध होगा नहीं । सब-का-सब पैसा लगा दें, तो भी वह पाप दूर नहीं होगा । अगर धर्म करनेकी आपकी इच्छा होती तो पहले पाप करते ही नहीं । अगर पाप करते हो, तो केवल लोगोंको दिखानेके लिये धर्म करते हो । धर्मकी भावना भीतर है ही नहीं । असली धर्मका तत्त्व जाननेवाला धर्मके लिये पाप कर ही नहीं सकता ।
एक बड़े सदाचारी और विद्वान ब्राह्मण थे । उनके घरमें प्रायः रोटी-कपड़ेकी तंगी रहती थी । साधारण निर्वाहमात्र होता था । वहाँके राजा बड़े धर्मात्मा थे । ब्राह्मणीने अपने पतिसे कई बार कहा कि आप एक बार तो राजासे मिल आओ, पर ब्राह्मण कहते कि वहाँ जानेके लिये मेरा मन नहीं करता । ब्राह्मणीने कहा कि मैं आपसे माँगनेके लिये नहीं कहती । वहाँ जाकर आप माँगो कुछ नहीं, केवल एक बार जाकर आ जाओ । ज्यादा कहा तो स्त्रीकी प्रसन्नताके लिये वे राजाके पास चले गये । राजाने उनको बड़े त्यागसे रहनेवाले गृहस्थ ब्राह्मण जानकर उनका बड़ा आदर-सत्कार किया और उनसे कहा कि आप एक दिन और पधारें । अभी तो आप अपनी मर्जीसे आये हैं, एक दिन आप मेरेपर कृपा करके मेरी मर्जीसे पधारें । ऐसा कहकर राजाने उनकी पूजा करके आनन्दपूर्वक उनको विदा कर दिया । घर आनेपर ब्राह्मणीने पूछा कि राजाने क्या दिया ? ब्राह्मण बोले‒दिया क्या, उन्होंने कहा कि एक दिन आप फिर आओ । ब्राह्मणीने सोचा कि अब माल मिलेगा । राजाने निमन्त्रण दिया है, इसलिये अब जरूर कुछ देंगे ।
एक दिन राजा रात्रिमें अपना वेश बदलकर, बहुत गरीब आदमीके कपड़े पहनकर धूमने लगे । ठण्डीके दिन थे । एक लुहारके यहाँ एक कड़ाह बन रहा था । उसमें घन मारनेवाले आदमीकी जरूरत थी । राजा इस कामके लिये तैयार हो गये । लुहारने कहा कि एक घंटा काम करनेके दो पैसे दिये जायँगे । राजाने बड़े उत्साहसे, बड़ी तत्परतासे दो घंटे काम किया । राजाके हाथोंमें छाले पड़ गये, पसीना आ गया, बड़ी मेहनत पड़ी । लुहारने चार पैसे दे दिये । राजा उन चार पैसोंको लेकर आ गया और आकर हाथोंपर पट्टी बाँधी । धीरे-धीरे हाथोंमें पड़े छाले ठीक हो गये ।
एक दिन ब्रह्माणीके कहनेपर वे ब्राह्मण-देवता राजाके यहाँ फिर पधारे । राजाने उनका बड़ा आदर किया, आसन दिया, पूजन किया और उनको वे चार पैसे भेंट दे दिए । ब्राह्मण बड़े सन्तोषी थे । वे उन चार पैसोंको लेकर घर पहुँचे । ब्राह्मणी सोच रही थी कि आज खूब माल मिलेगा । जब उसने चार पैसोंको देखा तो कहा कि राजाने क्या तो दिया और क्या आपने लिया ! आप-जैसे पण्डित ब्राह्मण और देनेवाला राजा ! ब्राह्मणीने चार पैसे फेंक दिये । जब सुबह उठकर देखा तो वहाँ चार जगह सोनेकी सीकें दिखायी दीं । सच्चा धन उग जाता है । सोनेकी उन सीकोंको वे रोजाना काटते पर दूसरे दिन वे पुनः उग आतीं । उनको खोदकर देखा तो मूलमें वे ही चार पैसे मिले !
राजाने ब्राह्मणको अन्न नहीं दिया; क्योंकि राजाका अन्न शुद्ध नहीं होता, खराब पैसोंका होता है । मदिरा आदिपर लगे टैक्सके पैसे होते हैं, चोरोंको दण्ड देनेसे प्राप्त हुए पैसे होते हैं‒ऐसे पैसोंको देकर ब्राह्मणको भ्रष्ट नहीं करना है । इसलिये राजाने अपनी खरी कमाईके पैसे दिये । आप भी धार्मिक अनुष्ठान आदिमें अपनी खरी कमाईका धन खर्च करो ।
नारायण ! नारायण !! नारायण !!!
‒ ‘वास्तविक सुख’ पुस्तकसे

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।। श्रीहरिः ।।
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आजकी शुभ तिथि–
फाल्गुन अमावस्या, वि.सं.–२०६९, सोमवार
सोमवती अमावस्या
पारमार्थिक उन्नति धनके आश्रित नहीं

(गत ब्लॉगसे आगेका)
सज्जनो ! अपना उद्धार कर लो, अभी मौका है । भगवान्‌ने बड़ी कृपा करके यह मानव-शरीर दिया है । यह मानव-शरीर भगवान्‌का भजन करनेके योग्य है, इसलिये इसको निरर्थक नष्ट मत होने दो । इस संसारमें अपना कोई भी नहीं है, अपने तो एक परमात्मा ही हैं । यह जो आपके पास धन है, शरीर है, योग्यता है, यह संसारकी सेवाके लिये है । शरीर भी आपका नहीं है, मन-बुद्धि-इन्द्रियाँ भी आपकी नहीं हैं, कुटुम्ब भी आपका नहीं है, रुपये-पैसे भी आपके नहीं हैं । ये तो दूसरोंकी सेवा करनेके लिये हैं । अपने लिये तो केवल परमात्मा ही हैं । इससे भी बढ़िया बात है कि आप परमात्माके लिये हो जाओ । परमात्मासे अपने लिये कुछ भी मत चाहो । जो परमात्मासे कुछ भी नहीं चाहता, उसकी गरज परमात्मा करते हैं !
एक बाबाजी थे । एक दिन वे एक ऊँची टोपी पहनकर बड़ी मस्तीसे भजन कर रहे थे । भगवान्‌ विनोदी ठहरे, वे बाबाजीके पास आये और बोले‒वाह-वाह, आज तो बड़ी ऊँची टोपी लगाकर बैठे हो ! बाबाजी बोले‒किसीसे माँगकर थोड़े ही लाया हूँ, अपनी है । भगवान्‌ने कहा‒मिजाज करते हो ? बाबाजी बोले‒उधार लाये हैं क्या मिजाज ? भगवान्‌ बोले‒तुम मेरेको जानते हो कि नहीं ? बाबाजी बोले‒अच्छी तरहसे जनता हूँ । भगवान्‌ने कहा‒मैं सबको कह दूँगा कि यह अभिमानी है, भक्त नहीं है, तब क्या दशा होगी ? दुनिया भक्त मानकर ही तो तुम्हारी सेवा करती है और तुम मिजाज करते हो ? बाबाजी बोले‒तुम कह दोगे तो मैं भी कह दूँगा कि मैंने भजन करके देखा है, भगवान्‌ कुछ भी नहीं हैं । तुम्हारी प्रसिद्धि तो हमने ही कर रखी है, नहीं तो कौन पूछता तुम्हें ?भगवान्‌ बोले‒ऐसा मत कहना । बाबाजीने कहा‒तो आप भी मत कहना, हम भी नहीं कहेंगे । इस प्रकार भक्त भगवान्‌की भी गरज नहीं करते । ऐसे भक्तोंके लिये भगवान्‌ कहते हैं‒‘मैं तो हूँ भगतनको दास, भगत मेरे मुकुटमणि ।’ भक्तोंमें ऐसा नहीं है कि साधु ही भक्त होते हैं, बहनें भी भक्त होती हैं ।
मीरा जाई मेड़ते            परणाई चितोड़ ।
राम भगतिके कारणे सकल सृष्टि को मोड़ ॥
राम दड़ी चौड़े पड़ी, सब कोई खेलो आय ।
दावा नहीं संतदास,       जीते सो ले जाय ॥
जाट भजो गूजर भजो, भावे भजो अहीर ।
तुलसी रघुबर नाम में, सब काहू का सीर ॥
कोई भी क्यों न हो, वह भगवान्‌का अंश है । भगवान्‌का अंश होनेसे प्रत्येक जीवका भगवान्‌पर हक लगता है; जैसे बालकका अपनी माँपर हक लगता है । भगवान्‌ हमें कपूत या सपूत कह सकते हैं, पर ‘पूत नहीं है’ अर्थात्‌ मेरा नहीं है‒ऐसा नहीं कह सकते । हम चाहे कपूत हैं, चाहे सपूत, पर पूत तो हैं ही, हैं तो हम भगवान्‌के ही । अब कपूताई दूर कर दो काम बन गया, बस । इतनी-सी बात है, कोई लंबी-चौड़ी बात नहीं ।
आप कहते हैं कि धनके बिना धार्मिक आयोजन कैसे होगा ? वास्तवमें उस धनको ही धार्मिक आयोजनोंकी गरज है, धार्मिक आयोजनोंको उस धनकी गरज नहीं है । जो धनकी गरज मानते हैं, वे धने दास हैं, धर्मके दास नहीं ।
    (शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒ ‘वास्तविक सुख’ पुस्तकसे
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।। श्रीहरिः ।।

आजकी शुभ तिथि–

फाल्गुन कृष्ण त्रयोदशी, वि.सं.–२०६९, रविवार

महाशिवरात्री

पारमार्थिक उन्नति धनके आश्रित नहीं


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           जैसे, हमें सौ रुपयोंमें धड़ी मिलती हैं, तो क्या दूकानदारके सौ रुपये लगे हैं ? अगर उसके सौ रुपये लगे हैं, तो फिर वह बेचे ही क्यों ? अतः जो चीज पैसोंसे मिलती है, वह पैसोंसे कम कीमती होती है । पैसोंके बदले जो कोई मिलेगा, वह पैसोंका गुलाम ही होगा । सत्संग पैसोंसे नहीं होता । यह तो भगवान्‌की कृपासे ही होता है‒‘बिनु हरिकृपा मिलहिं नहिं संता’ (मानस ५/७/२) । कृपा करते समय भगवान्‌ यह नहीं देखते कि इसने कितना पुण्य किया है ? इसमें कितनी योग्यता है ? इसका कितना अधिकार है ?

सतगुरु पूठा इंद्रसम, कमी न राखी कोय ।

वैसा ही फल निपजै, जैसी भूमि होय ॥

             वर्षा तो बरस जाती है, पर आगे भूमिमें जैसा बीज होगा वैसा ही फल होगा । मारवाड़के लोग समझते हैं, एक मतीरा होता है और एक बिस्लुम्बा (तसुम्बा) होता है । दोनोंकी बेल बराबर ही दीखती है और फल भी आरम्भमें समान दीखता है । परन्तु मतीरा तो मीठा होता है और बिस्लुम्बा बड़ा कड़ुआ होता है । वर्षा भी एक, जमीन भी एक, धुप भी एक, खाद भी एक, फिर यह फर्क क्यों हैं ? फर्क बिजमें हैं; जैसा बीज होगा, उसीके अनुसार फल होगा । वह बीज बदला नहीं जा सकता । ऐसे ही चौरासी लाख योनियाँ बदली नहीं जा सकतीं , पर मनुष्य बदल सकता है । मनुष्य अपनेको बहुत बड़ा सन्त-महात्मा, तत्त्वज्ञ, जीवन्मुक्त बना सकता है‒इतनी योग्यता भगवान्‌ने दी है । परन्तु मनुष्यने वह योग्यता पैसोंमें लगा दी है ! तेलीके घर तेल होता है, वह पैर धोनेके लिये थोड़े ही होता है ? लाखों रुपयोंकी एक मणि लाकर दी, तो बोरीमेंसे एक धागा निकाल लिया और मणिको उसमें पिरोकर पैरोंमें बाँध लिया । बाँधनेवालेकी बुद्धि तो देखो ! राजाके मुकुटपर लगनेवाली मणि क्या पैरोंमें बाँधनेके लिये है ? ऐसे ही मनुष्य-जीवन-जैसी बढ़िया चीजको तुच्छ भोगोंमें और रुपयोंके संग्रहमें लगा दिया ! मनुष्यजन्म खराब क्यों किया भाई ? तुम्हारी जगह कोई दूसरा जीव आता तो अपना कल्याण करता बेचारा । परन्तु तुमने आकार यह सीट रोक ली । गीता कहती है कि ऐसा आदमी निरर्थक ही जीता है‒‘मोघं पार्थ स जीवति’ (३/१६) । अर्थात्‌ वह मर जाय तो अच्छा है ! कारण कि मनुष्य-शरीर पाकर कल्याण नहीं करता, रात-दिन पशुओंकी तरह भोग भोगनेमें लगा हुआ है । पशुओंके भी बाल-बच्चे होते हैं तो वे राजी होते हैं । एक सूअरीके पाँच-सात, दस-ग्यारह बच्चे होते हैं तो वे राजी होते हैं । इतने बच्चे उसके साथ घूमते हैं, तो वह राजी होती है । ऐसे ही आप भी बाल-बच्चोंमें राजी होते हैं । यह मनुष्य-जीवन इसीलिये मिला है क्या ? बच्चोंका पालन-पोषण करो, उनको शिक्षा दो, पर उनमें मोह मत करो । अगर वे आपका कहना नहीं मानते तो उनका भाग्य फूट गया, पर आपका तो काम बन गया ! एक कुम्हार था । एक दिन वह अपने घर गया और उसने अपनी स्त्रीसे पूछा कि रसोई बनायी या नहीं ? स्त्रीने कहा कि रसोई तो नहीं बनी । घरमें अन्नका दाना भी नहीं है, किसकी रसोई बनायें ? वह कुम्हार एक हाँड़ी लेकर बाजार गया और एक दूकानदारसे कहा कि यह हाँड़ी ले लो और बदलेमें थोड़ा बाजरा दे दो । दूकानदारने हाँड़ी लेकर बदलेमें थोड़ा बाजरा दे दिया । कुम्हार बाजरा लेकर घरपर आया । फिर उन्होंने रसोई बनाकर भोजन कर लिया । दूसरे दिन वह दूकानदार कुम्हारसे मिला तो उसने कहा‒अरे ! यह कैसी हाँड़ी दी तुमने ? हाँड़ी तो फूटी हुई थी, चूल्हेपर रखी तो आग बुझ गयी । तुम्हारी हाँड़ी तो चढ़ी ही नहीं ! तब वह कुम्हार बोला लि तुम्हारी हाँड़ी तो नहीं चढ़ी, पर हमारी हाँड़ी तो चढ़ गयी (हमारी रसोई तो बन गयी) । ऐसे ही जो अपना काम कर ले उसकी हाँड़ी तो चढ़ ही गयी । आप बालकोंका ठीक तरहसे पालन-पोषण करें, उनको अच्छी शिक्षा दें तो आपकी हाँड़ी चढ़ गयी ।

(शेष आगेके ब्लॉगमें)

‒ ‘वास्तविक सुख’ पुस्तकसे





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।। श्रीहरिः ।।
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आजकी शुभ तिथि–
फाल्गुन कृष्ण त्रयोदशी, वि.सं.–२०६९, रविवार
पारमार्थिक उन्नति धनके आश्रित नहीं
(गत ब्लॉगसे आगेका)
बीकानेरकी बात है । एक जगह सत्संग हो रहा था । गाड़ीसे उतरते ही लोग मुझे सीधे वहाँ ले गये और कहा कि कुछ सुनाओ । मैंने कहा‒मेरे मनमें तो ऐसी आयी है कि मेरे-जैसोंको तो यहाँसे कान पकड़कर निकाल देना चाहिये कि यहाँ सत्संग हो रहा है, तुम कैसे आ गये बीचमें । भगवान्‌के यहाँ पोल चलती है, इसलिये सत्संगकी बातें कहते और सुनते हैं, नहीं तो इतने ऊँचे दर्जेकी बातें हम सुननेके लायक नहीं हैं । फिर भी भगवान्‌ लाज रखते हैं कि कोई बात नहीं, बच्चा है बेचारा । ऊँचे दर्जेकी बात उनके सामने ही कहनी चाहिये, जो अधिकारी हैं । सन्तोंने कहा है‒
हरि हीरा की गाँठडी, गाहक बिनु मत खोल ।
आसी हीरा पारखी, बिकसी मँहगे मोल ॥
परन्तु भगवान्‌की इतनी कृपा है कि हमारे-जैसे अयोग्यको भी इतनी विचित्र-विचित्र बातें मिलती हैं । भगवान्‌ अधिकारी नहीं देखते, योग्यता नहीं देखते । वर्षा होती है तो जंगलपर भी पानी बरसता है और समुद्रपर भी । समुद्रमें पानीकी कमी है क्या ? पर फिर भी बरसता है । ऐसे ही जो सन्त-महात्मा होते हैं वे भी कृपा करके बरस पड़ते हैं, कोई ग्रहण करे, चाहे ग्रहण न करे । इसी तरह भगवान्‌ भी कृपा करते हैं, तो पात्र-कुपात्र नहीं देखते । कुपात्रको भी भगवान्‌ कृपा करके बढ़िया (सत्संगका) मौका देते हैं; अगर ऐसा बढ़िया मौका सुपात्रको मिल जाय तो फिर कहना ही क्या है ! मैंने तो एक सज्जनसे कहा था कि आपकी बुद्धि अच्छी है, अगर आप इधर लग जाओ तो बहुत लाभ उठा सकते हो । पर उन्होंने मेरी बात मानी नहीं । मेरे मनमें आयी कि ऐसी अच्छी बुद्धि है, अच्छे काममें लग जाय तो कितनी बढ़िया बात है ! परन्तु उनको जँचती नहीं तो हम क्या करें ?
आपलोगोंने धन कमानेमें खूब बुद्धि लगायी है । बेईमानी करनेमें, झूठ-कपट, ठगी-जालसाजी करनेमें, टैक्सोंसे बचनेमें बुद्धि लगानी पड़ती है । बिना बुद्धि लगाये ये काम नहीं होते । ज्यों-ज्यों नया कानून बनता है, त्यों-त्यों आपकी बुद्धि और तेज होती है । खुदसे काम न होता हो तो वकीलसे पूछते हैं; क्योंकि वह आपका अक्लदाता है, गुरुजी महाराज है । वह आपको बताता है कि ऐसा करो, इस तरहसे करो । उस गुरुजीसे शिक्षा ले-लेकर आप रात-दिन अध्ययन करनेमें लगे हैं; फिर मेरे-जैसे भिक्षुककी बात कौन माने ? आपको वहम है कि इनकी बात मानेंगे तो हम भी इन्हींकी तरह हो जायँगे ।
त्याग क्या है ? भजन-स्मरण क्या है ? भगवत्सम्बन्धी बात क्या है ? धर्म क्या है ? इसको दूसरा कोई क्या जाने, जाननेवाला ही जानता है । परन्तु यह पैसोंके अधीन नहीं है, बाहरी चीजोंके अधीन नहीं है । यह तो भावके अधीन है‒‘भावग्राही जनार्दनः’ भगवान् भावग्राही हैं । जिसका भाव होगा, उसकी आध्यात्मिक उन्नति होगी । कलकत्तेकी बात है । एक धनी आदमी श्रीजयदयालजी गोयन्दकासे मलने आया । बात चलनेपर उसने कहा कि धनसे सब कुछ मिलता है । गोयन्दकाजीने कहा कि धनसे सब कुछ मिलता है, पर महात्मा नहीं मिलते । उसने कहा धनसे तो कई महात्मा आ जायँ । गोयन्दकाजी बोले कि जो धनसे मिलते हैं, वे महात्मा नहीं होते और जो महात्मा होते हैं, वे धनसे नहीं मिलते । धनसे धनका गुलाम मिलता है ।
(शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒ ‘वास्तविक सुख’ पुस्तकसे
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।। श्रीहरिः ।।

आजकी शुभ तिथि–

फाल्गुन कृष्ण एकादशी, वि.सं.–२०६९, शनिवार

विजया-एकादशीव्रत (वैष्णव)


पारमार्थिक उन्नति धनके आश्रित नहीं

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                 शरणानन्दजी महाराज सूरदास थे । वे एक जगह गये, जहाँ कोई परिचित आदमी नहीं था । वहाँसे उनको आगे स्टेशनतक जाना था, जिसका चार आना टिकट लगता था । वे एक आदमीसे बोले कि भाई ! टिकट लाकर दो । वह बोला‒बाबा, माफ करो ! महाराजजी बोले‒माफ कैसे करें तुमको ? माफ नहीं कर सकते । माफ तो तब करें जब मैं पात्र न होऊँ और तुम्हारे पास पैसा न हो । मैं पात्र हूँ और तुम्हारे पास पैसा है, फिर माफ कैसे कर दें ? उस आदमीको टिकट लाकर देना पड़ा । अपराधीको माफ नहीं किया जाता । अपराध क्या है ? जैसे तुम पैसा रखते हो वैसे मैं भी पैसा रख सकता था । पर मैंने पैसे रखे नहीं, तो वे पैसे कहाँ गये ? तुम्हारे पास ही रहे । तुम खजानची हो । जब हमें जरूरत हो, तब दिया करो । जिसको मिलता है, उसको अपने भाग्यका मिलता है । क्या आप अपने भाग्यका देते हो ? क्या आप रोटी नहीं खाते ? कपड़ा नहीं पहनते ? मकानमें नहीं रहते ? आप तो पूरा खाते हो, पहनते हो; परन्तु जो जमा करते हो, उसपर हमारा हक है । साहूकारीसे दे दो तो अच्छी बात है नहीं, तो दण्ड होगा । माफी कैसे होगी ?

           जो रात-दिन रुपयोंके लोभमें लगे हैं, वे इन बातोंको समझ ही नहीं सकते । जिस बाजारमें वे गये ही नहीं, उस बाजारके भावोंको वे कैसे समझेंगे ? वे जिस बाजारमें रहते हैं, उसी बजारके भावोंको वे समझ सकते हैं । वे रुपयोंके बाजारमें ही रहते हैं । त्यागका भी एक विलक्षण, अलौकिक बाजार है, पर उसकी बात वही समझ सकता है, जो उसी बाजारका हो ।

          एक अच्छे महात्मा थे । उनसे मैंने अलग-अलग समयपर दो प्रश्न किये । एक समय तो उनसे यह प्रश्न किया कि आप इतने ऊँचे दर्जेकी बातें हमें सुनते हो, पर क्या आप यह जानते हो कि हमलोग उस बातोंको ठीक समझते हैं ? अगर हमलोग उन बातोंको न समझते हों, तो उन बातोंका मूल्य क्या हुआ ? उन्होंने उत्तर दिया कि मेरी बातें आकाशमें रहेंगी; जब कोई समझदार होगा, पात्र होगा, उसके सामने वे प्रकट हो जायँगी । दूसरी बार मैंने कहा कि भगवान्‌के घरमें पोल है, न्याय नहीं है । उन्होंने पूछा‒कैसे ? तो मैंने कहा कि आप जैसे महात्माओंको हमारे सामने ले आये । हमलोग कोई पात्र थे क्या ? भूखेको अन्न देना चाहिये, प्यासेको जल देना चाहिये, ऐसे ही जो योग्य हों, उनको ऊँचे दर्जेकी बातें सुनानी चाहिये । आप जैसे तो सुनानेवाले मिले और हमे-जैसे पात्र मिले, इससे मालूम होता है कि भगवान्‌के घर बड़ी पोल है‒

अंधाधुंध सरकार है, तुलसी भजो निसंक ।


खीजे  दीनो  परमपद,   रीझै  दीनी  लंक ॥

एक बार मैंने कहा तो वे महात्मा बोले‒बेटी कौन-सी कुँआरी रहती है ? अच्छा वर मिल जाय तो ठीक है, नहीं तो कैसा भी वर मिले, विवाह तो करना ही पड़ता है । इस तरह पात्र न होनेपर भी भगवान्‌की ऊँचे दर्जेकी बातें मिल जाती हैं ।

     (शेष आगेके ब्लॉगमें)

‒ ‘वास्तविक सुख’ पुस्तकसे


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।। श्रीहरिः ।।

आजकी शुभ तिथि–

फाल्गुन कृष्ण दशमी, वि.सं.–२०६९, गुरुवार

विजया-एकादशीव्रत (स्मार्त)

विजया-एकादशीव्रत (वैष्णव) कल है ।

पारमार्थिक उन्नति धनके आश्रित नहीं

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            आपके पास धन है तो धनपर टैक्स लगेगा । आपके पास विद्या है तो विद्यापर टैक्स लगेगा । इनको दूसरोंकी सेवामें लगाओ । सरकार तो अपना टैक्स कान पकड़कर जबर्दस्ती ले लेगी । परन्तु जहाँ धर्मकी बात है, आप प्रसन्न होकर दोगे तो ले लेगा, नहीं तो आपपर कर्जा रहेगा ।

ब्रह्मचारी यतिश्चैव पक्वान्नं स्वामिनावुभौ ।

तयोरान्नमदत्वाे च भुक्त्वा चान्द्रयाणं चरेत् ॥

              एक तो ब्रह्मचारी और संन्यासी, जो त्यागी हैं, बनी बनायी रसोईके भागीदार हैं । भोजन बना हुआ हो तो इनको दे दो, बस । जो इनको अन्न न देकर खुद भोजन कर लेता है, वह एक महीनेका चान्द्रायण व्रत करे, तब उसकी शुद्धि होती है । इनको अन्न न देनेका पाप लगता है । जो खेतमें काम नहीं आया, दूकानमें काम नहीं आया, घरके धंधेमें काम नहीं आया, उसको भोजन कराओ और न कराओ तो पाप लग जाय‒यह कोई न्याय है ? हमने कमाया, हमने बनाया, हमने सब काम किया और उसने किसी भी काममें रत्तीभर भी सहायता नहीं की, उसको भोजन न दें तो पाप लग जाय, कितना अन्याय है ? इसका कारण क्या है ? जैसे आप धन इकठ्ठा करते हो, वैसे ही ब्रह्मचारी और साधु भी धन इकठ्ठा कर सकता है । ब्रह्मचारी और साधु पढ़े-लिखे भी होते हैं । कहीं घण्टाभर पढ़ा दें तो क्या उनको रोटी नहीं मिलेगी ? आपमें जो योग्यता है, वह योग्यता क्या उनमें नहीं है ? अगर वे धन इकठ्ठा करेंगे तो वह धन आपके यहाँसे ही आयेगा, और कहाँसे आयेगा बताओ ? उन्होंने धन इकठ्ठा नहीं किया तो वह धन आपके पास ही रहा और कहाँ रहा ? अतः जिसने थोड़ा भी धन नहीं लिया, सब धन आपके पास ही रहने दिया, उसको समयपर टुकड़ा तो दे दो ! नहीं देते हो तो पाप लगेगा ।

               जो धनका संग्रह करता है, वह धन समुदायमेंसे ही आता है, उतनी कमी हो जाती है समुदायमें । पर जिसने धन लिया ही नहीं, वह धन किसके पास रहा, बताओ ? समुदायके पास ही तो रहा । जितने जीव जन्म लेते हैं, उनका प्रारब्ध पहले बनता है, पीछे शरीर मिलता है । उसके जीवन-निर्वाहके लिये अन्न, जल आदिका प्रबन्ध पहलेसे किया रहता है । अतः उसका कहीं-न-कहीं अन्न है, कहीं-न-कहीं जल है, कहीं-न-कहीं वस्त्र है । वह जी रहा है तो उसका उन अन्न, जल, वस्त्र आदिपर हक है । आपके पास जो आवश्यकतासे अधिक अन्न, जल आदि है, उसपर उसका हक लगता है । अतः वह सामने आये तो उसका हक उसे दे दो ।

    (शेष आगेके ब्लॉगमें)

‒ ‘वास्तविक सुख’ पुस्तकसे

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।। श्रीहरिः ।।
06 March 2013_पारमार्थिक उन्नति धनके आश्रित नहीं
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।। श्रीहरिः ।।
05 March 2013_पारमार्थिक उन्नति धनके आश्रित नहीं
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।। श्रीहरिः ।।
04 March 2013_सत्संगकी आवश्यकता
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।। श्रीहरिः ।।
03 March 2013_सत्संगकी आवश्यकता
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।। श्रीहरिः ।।
02 March 2013_सत्संगकी आवश्यकता
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।। श्रीहरिः ।।
01 March 2013_सत्संगकी आवश्यकता
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।। श्रीहरिः ।।
28 Feb.2013_पारमार्थिक उन्नति धनके आश्रित नहीं
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।। श्रीहरिः ।।
27 Feb.2013_पारमार्थिक उन्नति धनके आश्रित नहीं
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।। श्रीहरिः ।।
26 Feb.2013_पारमार्थिक उन्नति धनके आश्रित नहीं
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।। श्रीहरिः ।।
25 Feb.2013_धन-संग्रहसे हानि
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।। श्रीहरिः ।।
24 Feb.2013_धन-संग्रहसे हानि
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।। श्रीहरिः ।।
23 Feb.2013_धनके लोभमें निन्दा
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।। श्रीहरिः ।।
22 Feb.2013_धनके लोभमें निन्दा
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।। श्रीहरिः ।।
21 Feb.2013_मनुष्य-जीवनकी सफलता
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।। श्रीहरिः ।।
20 Feb.2013_मनुष्य-जीवनकी सफलता
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।। श्रीहरिः ।।
20 Feb.2013_मनुष्य-जीवनकी सफलता
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।। श्रीहरिः ।।
19 Feb.2013_मनुष्य-जीवनका उद्दश्य
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।। श्रीहरिः ।।
18 Feb.2013_मनुष्य-जीवनका उद्दश्य
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।। श्रीहरिः ।।

17 Feb.2013_मनुष्य-जीवनका उद्दश्य
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।। श्रीहरिः ।।
16 Feb.2013_तत्त्वका अनुभव कैसे हो
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।। श्रीहरिः ।।

आजकी शुभ तिथि–

माघ शुक्ल पंचमी, वि.सं.–२०६९, शुक्रवार

तत्त्वका अनुभव कैसे हो ?

(गत ब्लॉगसे आगेका)
            हम पढ़ाई करते हैं तो अध्यापक ‘क, ख, ग, घ.....’ लिखकर बता दे और हम वैसे ही मानकर याद कर लें तो हम पढ़े-लिखे हो जायँगे । ऐसे ही अंग्रेजीकी ‘A, B, C, D....’ लिखकर बता दे और हम वैसे ही मानकर सीख लें तो हमें अंग्रेजी आने लगेगी । अब इसका तो पता लगता नहीं कि ‘A’‒यह ‘ए’ कैसे हुआ ? दो लाइनें इस तरह खींच दीं तथा एक लाइन बीचमें लगा दी और कहा यह ‘A’ है, तो हमने मान लिया कि ठीक है साहब, यह ‘ए’ है । अब माननेके सिवाय दूसरा कोई उपाय नहीं है । अध्यापक जैसा कह दे, उसकी हाँ-में-हाँ मिला दे तो हम सीख जायँगे और एक दिन पंडित हो जायँगे । ऐसे ही जो सन्त-महात्मा हैं, जिनपर हमारी श्रद्धा है, वे जैसा कहें, उनकी हाँ-में-हाँ मिला दे तो फिर हमें वैसा ही अनुभव हो जायगा, इसमें किंचिन्मात्र भी सन्देह नहीं है । अक्षरोंके ज्ञानमें तो छोटा-बड़ा होता है; परन्तु तत्त्वज्ञानमें छोटा-बड़ा होता ही नहीं । आजतक सनकादिक, नारदजी, व्यासजी आदि जितने बड़े-बड़े महापुरुष हुए हैं, उनको जो बोध प्राप्त हुआ है, वही बोध आज एक साधारण आदमीको प्राप्त हो सकता है; जिससे बढ़कर कोई विद्वता नहीं है, जिससे बढ़कर कोई सुख-आनन्द नहीं है, जिससे बढ़कर कोई उन्नति नहीं ही, जिससे बढ़कर कोई चीज नहीं है, उसको मनुष्यमात्र प्राप्त कर सकता है । उस तत्त्वको प्राप्त करनेके लिये ही मनुष्यका निर्माण हुआ है । खाना-पीना, सोना आदि तो कुत्तोंमें, गधोंमें भी होता है । उनमें भी बाल-बच्चे होते हैं, परिवार होता है । अब इतना ही काम मनुष्यने कर लिया तो मनुष्यजन्मकी महिमा क्या हुई ? यह तो पशुपना ही है । आकृति तो मनुष्यकी दीखती है, पर मनुष्यपना नहीं है । मनुष्यपना तो वह है, जिसके लिये भगवान्‌ने कृपा करके मनुष्य-शरीर दिया है‒
कबहुँक करि करुना नर देही ।
                           देत ईस     बिनु   हेतु सनेही ॥                           
                                                           (मानस ७/४४/३)
           ऐसे मौकेको भोग भोगने और संग्रह करनेमें ही लगा दिया ! यह तू किस काममें लग गया ? यह क्या धंधा बीचमें ही छेड़ दिया ? कहाँ पहुँचना था तुझे और कहाँ बीचमें अटक गया ? ये भोग भी यहीं छूट जायँगे, शरीर भी यहीं छूट जायगा, रुपये भी यहीं छूट जायँगे । जो छूट जायँगे उनसे तुझे क्या मिला ? असली मिलना तो वह है, जो कभी छूटे नहीं, सदा साथ रहे । इसलिए सज्जनो ! चीज तो वह लो, जो सदा साथ रहे, कभी इधर-उधर हो ही नहीं । शरीरके टुकड़े-टुकड़े कर दिए जायँ, तो भी उस चीजको कोई हमारेसे छीन न सके ।
     (शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒ ‘वास्तविक सुख’ पुस्तकसे
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।। श्रीहरिः ।।
14 Feb.. 2013_तत्त्वका अनुभव कैसे हो
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13 Feb.. 2013_दृढ़ निश्चयकी महिमा
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12 Feb.. 2013_दृढ़ निश्चयकी महिमा
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11 Feb.. 2013_भगवत्प्राप्तिसे ही मानव-जीवनकी सार्थकता
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10 Feb.. 2013_भगवत्प्राप्तिसे ही मानव-जीवनकी सार्थकता
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09 Feb.. 2013_भगवत्प्राप्तिसे ही मानव-जीवनकी सार्थकता
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08 Feb.. 2013_भगवत्प्राप्तिसे ही मानव-जीवनकी सार्थकता
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07 Feb.. 2013_भगवत्प्राप्तिसे ही मानव-जीवनकी सार्थकता
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06 Feb.. 2013_भगवत्प्राप्तिसे ही मानव-जीवनकी सार्थकता
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05 Feb.. 2013_भगवत्प्राप्तिसे ही मानव-जीवनकी सार्थकता
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04 Feb.. 2013_भगवत्प्राप्तिके लिये भविष्यकी अपेक्षा नहीं
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03 Feb.. 2013_भगवत्प्राप्तिके लिये भविष्यकी अपेक्षा नहीं
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02 Feb.. 2013_भगवत्प्राप्तिके लिये भविष्यकी अपेक्षा नहीं
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01 Feb.. 2013_भगवत्प्राप्तिके लिये भविष्यकी अपेक्षा नहीं
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31 Jan. 2013_भगवत्प्राप्तिके लिये भविष्यकी अपेक्षा नहीं
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