।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि–
चैत्र कृष्ण द्वितीया, वि.सं.-२०७४, शनिवार
मैं नहीं, मेरा नहीं 


(गत ब्लॉगसे आगेका)

आज मैं एक विशेष, मार्मिक बात कहता हूँ । हम परमात्माके अंश हैं और स्थूल-सूक्ष्म-कारणशरीर प्रकृतिका अंश है । ये दो बातें आप ठीक तरहसे अलग-अलग समझ लें । यह बात पहले भी कही थी, पर अब आप विशेष ध्यान दें ।

भगवान्‌ने पृथ्वी, जल, तेज, वायु आकाश, मन, बुद्धि तथा अहंकारइन आठोंको अपनी अपरा प्रकृति (इतीयं मे) बताया है (गीता ७ । ४) । ऐसे ही जीवको अपनी परा प्रकृति (मे पराम्) बताया है, जिसने जगत्को धारण कर रखा है (गीता ७ । ५) । जगत् न परमात्माकी दृष्टिमें है, न महात्माकी दृष्टिमें है । इस जीवने ही जगत्को धारण किया है‘ययेदं धार्यते जगत्’ । जगत्को धारण करनेका तात्पर्य है कि इसने अपरा प्रकृतिके ‘मन, बुद्धि और अहंकार’ को धारण कर लिया अर्थात् पकड़ लिया है । पृथ्वीसे सूक्ष्म जल है, जलसे सूक्ष्म तेज है, तेजसे सूक्ष्म वायु है, वायुसे सूक्ष्म आकाश है, आकाशसे सूक्ष्म मन है, मनसे सूक्ष्म बुद्धि है और बुद्धिसे सूक्ष्म अहंकार है । सूक्ष्म होनेपर भी जो पृथ्वीकी जाति है, वही जाति मन, बुद्धि और अहंकारकी है । जब पृथ्वीको ‘मैं और मेरी’ नहीं कहते तो फिर मन, बुद्धि और अहम्को भी ‘मैं और मेरा’ मत कहो । यह बहुत मार्मिक बात है ! आप पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाशको तो अपना नहीं कहते, पर मन-बुद्धि-अहम्‌को अपना कहते हैं । यह गलती है । इन सबको भगवान्‌ने अपना कहा है । ये आठों अपरा हैं, आप परा हो । अपरा निकृष्ट है । इस अपराको पकड़ लियायही बन्धन है । मन, बुद्धि और अहम्‌ मेरे नहीं हैं । यह अपरा प्रकृति है । आपकी एकता परमात्माके साथ है । भगवान्‌ने जीवको अपना अंश कहा है‘ममैवाशो जीवलोके’ (गीता १५ । ७) मन-बुद्धि-अहम्को भगवान्‌ने अपना अंश नहीं कहा है । अतः अहम्‌ अपने साथ नहीं है ।

जैसे पृथ्वी, जल आदि अपना स्वरूप नहीं है, ऐसे ही मन, बुद्धि और अहंकार भी अपना स्वरूप नहीं है । यह खास बात है । अगर इसको भीतरसे स्वीकार कर लो तो शान्तिकी प्राप्ति हो जायगी । अहम्‌ दो तरहका होता है) धातुरूप अहंकार । जैसे पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश धातु हैं, ऐसे मन, बुद्धि और अहम्‌ भी एक धातु है । २) ग्रन्थिरूप अहंकार अर्थात् ‘मैं हूँ’ । यह खास बन्धन है । धातुरूप अहम्‌ और चेतन (परमात्माका अंश)‒दोनों मिलकर यह अहम्‌ है । यह अहम्‌ आपका नहीं है । अहम्‌ ‘मैं’ भी नहीं है और ‘मेरा’ भी नहीं है, इसलिये भगवान्‌ने कहा है‘निर्ममो निरहङ्कारः स शान्तिमधिगच्छति’ (गीता २ । ७१) अर्थात् जो निर्मम और निरहंकार होता है, वह शान्तिको प्राप्त होता है ।

ग्रन्थिरूप अहंकार जन्म-मरणका हेतु है । ज्ञान होनेपर जड-चेतनकी ग्रन्थिरूप अहंकार तो मिट जाता है, पर प्रकृतिका धातुरूप अहंकार नहीं मिटता । धातुरूप अहंकारसे उसके द्वारा व्यवहार होता ।


जैसे मिट्टीका ढेला मैं नहीं हूँ, ऐसे ही मन भी मैं नहीं हूँ, बुद्धि भी मैं नहीं हूँ, अहम्‌ भी मैं नहीं हूँ । यह अपरा प्रकृति है और मैं परमात्माकी परा प्रकृति हूँ । मैं भगवान्‌का अंश हूँ । पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार भगवान्‌के अंश नहीं हैं । अतः इनके साथ मेरा सम्बन्ध नहीं है । मनको अपना समझनेसे मन स्थिर नहीं होता । मनको अपना नहीं मानेंगे तो मन अपने-आप स्थिर हो जायगा, बुद्धि अपने-आप स्थिर हो जायगी ।

   (शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒‘मैं नहींमेरा नहीं’ पुस्तकसे

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।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि–
चैत्र कृष्ण प्रतिपदा, वि.सं.-२०७४, शुक्रवार
                      होली (वसन्तोत्सव)
मैं नहीं, मेरा नहीं 


(गत ब्लॉगसे आगेका)

शान्ति त्यागसे मिलती है‘त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्’ (गीता १२ । १२) मुश्किल यह हो गयी कि सभी शान्ति चाहते हैं, पर त्याग करना नहीं चाहते ! पुण्यका फल (सुख) चाहते हैं, पर पुण्य करना नहीं चाहते ! पापका फल (दुःख) नहीं चाहते, पर पाप करते हैं

पुण्यस्य फलमिच्छन्ति पुण्यं नेच्छन्ति मानवाः ।
न  पापफलमिच्छन्ति    पापं  कुर्वन्ति  यत्नतः ॥

शान्ति चाहते हो तो मैं-मेरेका त्याग करो । भगवान्‌ने अपरा प्रकृतिको अपना बताया है । जैसे पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाशपर अपना अधिकार नहीं है, ऐसे ही मन, बुद्धि और अहंकारपर भी अपना अधिकार नहीं है । मन, बुद्धि और अहंकार भी अपने नहीं हैं । ये सब भगवान्‌के हैं । भगवान्‌की चीज भगवान्‌को सौंप दें तो स्वतः शान्ति प्राप्त हो जायगी ।

अहंकार दो तरहका होता हैप्रकृतिका धातुरूप अहंकार और जड-चेतनकी ग्रन्थिरूप अहंकार । धातुरूप अहंकार तो परमात्माका है । परन्तु जड़ और चेतनकी एकता माननेसे जो अहंकार होता है, वह अपना माना हुआ है । उस अहंकारमें जड़-अंश प्रकृतिका मिला हुआ है और चेतन-अंश अपना मिला हुआ है । प्रकृतिके अंशको प्रकृतिका मानें और उसमें अपनापन छोड़ दें । फिर स्वतः-स्वाभाविक शान्ति प्राप्त हो जायगी । उसमें अपनापन करना ही बन्धन है ।

सब संसार ईश्वररचित है । उसमें अपनापन छोड़ दो तो सब ठीक हो जायगा । उसमें अपनापन रहेगा नहीं, रहनेवाला है ही नहीं । अपनापन छोड़ दो तो निहाल हो जाओगे, और रखोगे तो दुःख पाओगे । जिस संसारमें हम रहते हैं, उसमें अपनी चीज कोई नहीं है । अपने केवल भगवान् हैं । जो चीज अपनी नहीं है, उसका सदुपयोग करनेकी हमपर जिम्मेवारी है ।


आप कम जाननेवाले हैं, मैं ज्यादा जाननेवाला हूँइस भावसे मैं नहीं कह रहा हूँ । मैंने बहुत दिनोंतक व्याख्यान दिया, अब भाई-बहन साधनमें लग जायँ परमात्मप्राप्तिमे तत्परतासे लग जायँइस भावसे कह रहा हूँ । आप सबसे प्रार्थना है कि सच्चे हृदयसे भगवान्‌में लग जाओ । ‘हे नाथ ! हे नाथ !यह प्रार्थना मेरेको अच्छी लगती है ! यह प्रार्थना बड़ी लाभदायक है । चलते-फिरते, उठते-बैठते ‘हे नाथ ! मैं आपको भूलूँ नहीं’यह प्रार्थना करो । प्रभुसे माँगना है तो यही माँगो कि किसी भी अवस्थामें आपको भूलूँ नहीं ।


   (शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒‘मैं नहींमेरा नहीं’ पुस्तकसे

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।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि–
 फाल्गुन शुक्ल चतुर्दशी, वि.सं.-२०७४, गुरुवार
         अनुदया पूर्णिमा, श्रीचैतन्य महाप्रभु-जयन्ती
        होलिकादाह रात्रिमें ६.५८ बजे भद्राके बाद 
मैं नहीं, मेरा नहीं 


(गत ब्लॉगसे आगेका)

श्रोताकई महिलाएँ भूलसे गर्भपात करवा चुकी हैं उनके लिये क्या प्रायश्चित्त है, जिससे उनके कल्याणमें कोई बाधा नहीं रहे ?

स्वामीजीनामजप करें । सवा लाखसे कम नहीं और तीन लाखसे ज्यादा नहींइतना नामजप रोजाना (एक वर्षतक) करें । भगवान्से प्रार्थना करें कि फिर कभी ऐसा काम नहीं करूँगी । सब माफ हो जायगा ।

श्रोताशरीरके रहते हुए भगवत्प्राप्ति होनेकी क्या कसौटी है ? कैसे पता चले कि भगवत्प्राप्ति हो गयी ?

स्वामीजीभोजन करनेकी क्या कसौटी है ? जल पीनेकी क्या कसौटी है ? बताओ । मानो तृप्त हो गये, अब कुछ भी नहीं चाहिये । इस तरह कुछ भी नहीं चाहिये, कभी भी नहीं चाहिये, किंचिन्मात्र भी नहीं चाहिये-यह कसौटी है । भगवत्प्राप्ति होनेपर स्वप्नमें भी कोई चाहना नहीं रहती । सदाके लिये तृप्ति हो जाती है ।

श्रोतासन्तकी लिखी हुई पुस्तक पढ़ना, सन्तके मुखसे प्रवचन सुनना और सन्तके पास जाकर बैठनाइन तीनोंमें कौन-सी बात श्रेष्ठ है ?

स्वामीजीसन्तके वचन पढ़ना-सुनना और वचनोंमें जो अच्छा लगे, उनका पालन करना ।

श्रोतामेरी सन्तोंके दर्शनकी इच्छा होती है, पर पतिदेव मना करते हैं ! वे कहते हैं कि सन्तोंके दर्शनसे क्या मिलता है ? उनको क्या समझाऊँ ?

स्वामीजीसन्तोंके दर्शनसे पाप दूर हो जाते हैं‘संत दरस जिमि पातक टरई’ (मानस, किष्णिन्धा १७ । ३)

गंगा पापं शशी तापं   दैन्यं कल्पतरुर्हरेत् ।
पापं ताप तथा दैन्यं सद्य: साधुसमागमः ॥
                             (र्गासहिता, अश्वमेध ६२ । ९)

‘गंगा पापका, चन्द्रमा तापका और कल्पवृक्ष दीनताका नाश करता है । परन्तु सन्तोंका संग पाप, ताप और दीनतातीनोंका तत्काल नाश कर देता है ।’

श्रोतामैंने बहुत मन्दिरोंके, तीर्थोंके दर्शन किये, पर मेरी श्रद्धा नहीं हो रही है, क्या करूँ ?

स्वामीजीकोई हर्ज नहीं । भगवान्पर श्रद्धा होती है कि नहीं ?

श्रोताभगवान्पर श्रद्धा होती है

स्वामीजीबस, एक भगवान्पर श्रद्धा करो । अन्य किसीपर श्रद्धा करनेकी जरूरत नहीं । न साधुओंपर श्रद्धा करनेकी जरूरत है, न तीर्थोंपर । एक कहावत है कि हाथीके पैरमें सब पैर समा जाते हैं‘सर्वे पदा हस्तिपदे निमग्नाः’ ।

श्रोताभगवान्के स्मरण और ध्यानमें क्या अन्तर है ?

स्वामीजीस्मरण पहले होता है, ध्यान पीछे होता है । स्मरणमें बार-बार भगवान्की याद आती है । ध्यानमें वृत्ति भगवान्में लग जाती है । वृत्ति तल्लीन होनेपर समाधि होती है ।


   (शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒‘मैं नहींमेरा नहीं’ पुस्तकसे

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