।। श्रीहरिः ।।

                




           आजकी शुभ तिथि–
आश्विन (अधिक) कृष्ण, द्वितीया
वि.सं.२०७७, रविवा
साधनकी चरम सीमा


जैसे अभ्यास प्रिय लगता है, ऐसे भोग और संग्रह भी प्रिय लगते हैं । भोग और संग्रहकी आसक्ति जल्दी छूटती नहीं । इस आसक्तिके कारण साधनमें दृढ़ता नहीं आती‒

भोगेश्वर्यप्रसक्तानां          तयापहृतचेतसाम् ।

व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते ॥

                                                    (गीता २/४४)

‘उस पुष्पित वाणीसे जिसका अन्तःकरण हर लिया गया है अर्थात् भोगोंकी तरफ खिंच गया है और जो भोग तथा ऐश्वर्यमें अत्यन्त आसक्त हैं, उन मनुष्योंकी परमात्मामें एक निश्चयवाली बुद्धि नहीं होती ।’

उपर्युक्त दो कारणोंके रहते हुए कहनेपर भी, सुननेपर भी, पढ़नेपर भी परमात्माकी स्वीकृति नहीं होती । परमात्माके अंश तो हम पहलेसे ही हैं, अंश बनना थोड़े ही है ! परन्तु ऐसा होते हुए भी हम स्वीकार नहीं करते । जो परमात्माको स्वीकार कर लेता है, उसका गोत्र बदल जाता है । वह संसारका नहीं रहता । वह ‘अच्युत गोत्र’ हो जाता है । गोस्वामीजी महाराजने भी लिखा है‒‘साह ही को गोतु गोतु होत है गुलामको’ (कविता उत्तर१०७)

वेदान्तके ग्रन्थोंमें भी अभ्यासकी बात आती है । श्रवण, मनन, निदिध्यासनके बाद विविध समाधियोंकी बात आती है । समाधि वास्तवमें कारणशरीरसे अभ्यास है, जिसमें समाधि और व्युत्थान‒दो अवस्थाएँ होती हैं । परमात्माको प्राप्त होनेके बाद फिर व्युत्थान नहीं होता‒‘सदा भवति तन्मयः ।’ पातंजलयोगदर्शनमें अभ्यासका एक लक्षण बताया है‒‘तत्र स्थितौ यत्नोभ्यासः ॥’ (१/१३) अर्थात् चित्तकी स्थिरताके लिये प्रयत्न करना (बार-बार चेष्टा करना) अभ्यास है ।

भगवान्‌को एक बार स्वीकार करनेका तात्पर्य है कि इसमें अभ्यास नहीं है । एक बार भी इसलिये कहा है कि हमने अपने-आपको संसारी मान रखा है । इसलिये एक बार कह दें कि मैं संसारी नहीं हूँ, मैं तो केवल भगवान्‌का हूँ और केवल भगवान्‌ ही मेरे अपने हैं । स्त्री, पुरुष, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र आदि कोई भी जीव क्यों न हो, वह खास परमात्माका अंश है‒‘अमृतस्य पुत्राः’ । जो जिसका अंश होगा, वह उसीमें लीन होगा । जैसे जलका अंश जलमें ही लीन होगा । पृथ्वीका अंश पृथ्वीमें ही लीन होगा । ऐसे ही परमात्माका अंश परमात्मामें ही लीन होगा । परमात्मामें लीन होनेपर फिर एक परमात्मा ही रहेंगे‒‘वासुदेवः सर्वम्’

यहाँ ‘वासुदेवः’ शब्द पुँल्लिंगमें होनेसे ‘वासुदेवः सर्वः’ कहना चाहिये था । परन्तु यहाँ ‘सर्वः’ की जगह ‘सर्वम्’ कहा गया है, जो नपुंसकलिंगमें है । अगर तीनों लिंगों (सर्वः, सर्वा, सर्वम्)-का एकशेष किया जाय तो नपुंसकलिंग ‘सर्वम्’ ही एकशेष रहता है[1] । नपुंसकलिंगके अंतर्गत तीनों लिंग आ जाते हैं । अतः ‘सर्वम्’ शब्दमें स्त्री, पुरुष और नपुंसक‒सबका समाहार हो जाता है । गीतामें जगत्‌, जीव और परमात्मा‒इन तीनोंके लिये पुँल्लिंग, स्त्रीलिंग और नपुंसकलिंग‒इन तीनों ही लिंगोंका प्रयोग किया गया है[2] । इससे सिद्ध होता है कि जगत्‌, जीव और परमात्मा‒ये तीनों ही ‘सर्वम्’ शब्दके अन्तर्गत हैं । अतः तीनों लिंगोंसे कही जानेवाली सब-की-सब वस्तुएँ तथा व्यक्ति आदि एक परमात्मा ही हैं‒‘वासुदेवः सर्वम्’



[1] उदाहरणार्थ, गीतामें आया है‒‘यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्’ (१८/५) । इसमें ‘यज्ञः’ शब्दका प्रयोग पुँल्लिंगमें और ‘दानम्’ तथा ‘तपः’ शब्दोंका प्रयोग नपुंसकलिंगमें किया गया है । अतः एकशेषमें नपुंसकलिंग और बहुवचन ‘पावनानि’ शब्दका प्रयोग हुआ है ।

[2] द्रष्टव्य‒ ‘गीता-दर्पण’ पुस्तककी लेख संख्या ९१‒’गीतामें ईश्वर, जीवात्मा और प्रकृतिकी अलिंगता’ ।


 

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।। श्रीहरिः ।।

               




           आजकी शुभ तिथि–
आश्विन (अधिक) कृष्ण, द्वितीया
वि.सं.२०७७, शनिवा
साधनकी चरम सीमा


यह अहंकृतभाव (अहंकार) अपरा प्रकृतिका अंश है । पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार‒ये उत्तरोत्तर पूर्वकी अपेक्षा सूक्ष्म हैं । इनमें अहंकार सबसे अधिक सूक्ष्म है । सबसे सूक्ष्म होनेपर भी यह है प्रकृतिका अंश । यह अपरा प्रकृति ही बन्धन करनेवाली है । अपरा प्रकृतिके सिवाय स्वयंमें कोई दोष नहीं है । स्वयं सर्वथा निर्दोष और भगवान्‌का अंश है । प्रकृतिका अंश प्रकृतिमें स्थित रहता है और भगवान्‌का अंश भगवान्‌में स्थित रहता है । परन्तु जीव प्रकृतिके अंश (मन-बुद्धि-इन्द्रियों)-को अपनी तरफ खींचता है अर्थात् अपना मान लेता है‒

मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति ॥

                                                      (गीता १५/७)

प्रकृति ईमानदार है कि अपनेमें ही स्थित रहती है, पर हम भूलसे प्रकृतिमें स्थित स्थूल-सूक्ष्म-कारणशरीरको अपना मान लेते हैं और बँध जाते हैं । स्थूलशरीरसे होनेवाली क्रियाएँ, सूक्ष्मशरीरसे होनेवाला चिन्तन और कारणशरीरसे होनेवाली समाधि‒ये सब प्रकृतिमें ही हैं । हम स्वयं प्रकृतिसे अतीत हैं‒‘गुणातीतः स उच्यते’ (गीता १४/२५)हम स्वयं साक्षात् भगवान्‌के हैं । इसलिये साधकको चाहिये कि वह एक बार, सरल हृदयसे दृढ़तापूर्वक स्वीकार कर ले कि मैं केवल भगवान्‌का ही हूँ और केवल भगवान्‌ ही मेरे अपने हैं । केवल इतना ही साधकका काम है और कोई काम नहीं है ।

स्वीकृति दो बार नहीं होती, प्रत्युत एक ही बार होती है । स्वीकृतिमें अभ्यास नहीं है । विवाह होनेपर कन्या अपनेको पत्नीरूपमें स्वीकार कर लेती है तो इसके लिये उसको माला नहीं फेरनी पड़ती । स्वीकृतिमात्रसे वह पतिकी हो जाती है । ऐसे ही स्वीकृतिमात्रसे साधकका बेड़ा पार हो जायगा । परन्तु प्रायः एक बार स्वीकृति होती नहीं है । इसमें दो कारण मुख्य मालूम देते हैं‒ १-अभ्यासका महत्त्व और २-भोग तथा संग्रहकी आसक्ति ।

आजतक जितने काम किये हैं, सब अभ्याससे किये हैं । इसलिये अन्तःकरणमें यह बात बैठी हुई है कि परमात्माकी प्राप्ति भी अभ्याससे होगी । वास्तवमें अभ्याससे परमात्माकी प्राप्ति नहीं होती । अभ्याससे नया सीखना होता है । अभ्यासमें जड़की सहायता लेनी ही पड़ती है; परन्तु परमात्माकी प्राप्ति जड़की सहायतासे नहीं होती, प्रत्युत जड़के त्यागसे होती है । जड़की सहायतासे संसारका कार्य होता है । परमात्माकी प्राप्तिमें कुछ भी करना है ही नहीं । बिना जड़की सहायतासे कुछ भी करना होता ही नहीं । परन्तु अभ्यास करनेका बहुत ज्यादा आग्रह होनेसे, अभ्यासका स्वभाव पड़ा हुआ होनेसे साधक पूछता है कि बोलो, फिर क्या करें ? यह विषय तो जान लिया, अब क्या करें ?


 

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।। श्रीहरिः ।।

              




           आजकी शुभ तिथि–
आश्विन (अधिक) कृष्ण प्रतिपदा
वि.सं.२०७७, शुक्रवा
साधनकी चरम सीमा


किसी भी मार्गका साधक क्यों न हो, उसे अन्तमें ‘वासुदेवः सर्वम्’ तक पहुँचना है । सब कुछ परमात्मा ही हैं, मैं-तू-यह-वह नहीं है‒यहाँतक पहुँचना है । इस विषयमें साधकको कभी निराश नहीं होना चाहिये, बड़े उत्साहसे चलना चाहिये । कारण यह है कि यह सच्‍ची बात है ।

नाशवान्‌ पदार्थोंकी तरफ चलते हुए जीवको कभी सुख-शान्ति नहीं मिल सकते । इसलिये धन, सम्पत्ति, वैभव, जमीन-जायदाद आदि कितने ही मिल जायँ, तृष्णा छूटती नहीं । कारण यह है कि जीव साक्षात् परमात्माका अंश है । परमात्माका अंश प्राकृत पदार्थोंसे कैसे तृप्त हो सकता है ? भगवान्‌ने कहा है‒

ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः ।

                                              (गीता १५/७)

‘इस संसारमें जीव बना हुआ आत्मा (स्वयं) मेरा ही सनातन अंश है ।’

भगवान्‌ने यहाँ ‘ममांशः’ (मम अंशः) नहीं कहा, प्रत्युत ‘ममैवांशः’ (मम एव अंशः) कहा । इसका तात्पर्य है कि जीव केवल भगवान्‌का ही अंश है, इसमें प्रकृतिका अंश किंचिन्मात्र भी नहीं है । यद्यपि अपरा और परा‒दोनों प्रकृतियाँ भगवान्‌की ही हैं, तथापि भगवान्‌ने कभी भी तथा कहीं भी अपरा प्रकृतिको अपना अंश नहीं बताया । पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, मन, बुद्धि तथा अहंकार‒ये आठ प्रकारकी ‘अपरा प्रकृति’ हैं और जीवात्मा ‘परा प्रकृति’ हैं । ‘ममैवांशः’ कहनेका तात्पर्य है कि जीव अपरा प्रकृतिसे सर्वथा रहित है । जैसे शरीरमें माता और पिता‒दोनोंके अंशका मिश्रण है, ऐसे ही जीवमें भगवान्‌ और प्रकृति‒दोनोंके अंशका मिश्रण नहीं है । जीव केवल भगवान्‌का अंश है; अतः जैसे भगवान्‌ हैं, वैसे ही यह भी है‒

ईश्वर अंश   जीव अबिनाशी ।

चेतन अमल सहज सुखराशी ॥

                                      (मानस, उत्तर ११७/१)

शुद्ध परमात्माका अंश होनेसे जीवात्मा कर्तृत्व-भोक्तृत्वसे रहित है । इसलिये गीतामें आया है‒

अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः    ।

शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते ॥

                                                 (१३/३१)

‘हे कुन्तीनन्दन ! यह (पुरुष स्वयं) अनादि होनेसे और गुणोंसे रहित होनेसे अविनाशी परमात्मस्वरूप ही है । यह शरीरमें रहता हुआ भी न करता है और न लिप्त होता है ।’

कर्तृत्व-भोक्तृत्व वास्तवमें प्रकृतिमें ही हैं । इसलिये साधकको कर्तृत्व-भोक्तृत्वका त्याग नहीं करना है, प्रत्युत इनको अपनेमें स्वीकार ही नहीं करना है । वास्तवमें शरीरमें रहता हुआ भी स्वयं कभी कर्ता-भोक्ता बना ही नहीं, कभी बनेगा ही नहीं, कभी बन सकता ही नहीं । गीतामें आया है‒

यस्य नाहंकृतो भावो  बुद्धिर्यस्य  न  लिप्यते ।

हत्वापि सा इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते ॥

                                                    (१८/१७)

‘जिसका अहंकृतभाव (मैं कर्ता हूँ‒ऐसा भाव) नहीं है और जिसकी बुद्धि लिप्त नहीं होती, वह (युद्धमें) इन सम्पूर्ण प्राणियोंको मारकर भी न मारता है और न बँधता है ।’

  

 

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।। श्रीहरिः ।।

             




           आजकी शुभ तिथि–
आश्विन (अधिक) पूर्णिमावि.सं.२०७७, गुरुवा

भगवान्‌ हमारी प्रतीक्षा कर रहे हैं



सत्‌-तत्त्वकी प्राप्ति किसी क्रियासे नहीं होती । कारण कि प्रत्येक क्रिया असत्‌में ही होती है, जबकि सत्‌-तत्त्वकी प्राप्ति असत्‌के त्यागसे होती है । कामनाओंका अन्त होनेपर असत्‌का भी त्याग हो जाता है और सत्‌-तत्त्वकी अभिलाषा जाग्रत्‌ होनेपर भूतकालकी स्मृति नहीं होती, वर्तमानमें सत्‌-तत्त्वको पानेकी व्याकुलता जाग्रत्‌ होती है और भविष्यकी आशा मिट जाती है । सत्‌-तत्त्वकी अभिलाषा सम्पूर्ण कामनाओंको मिटाकर सत्‌-तत्त्वकी अनुभूति करा देती है ।

जिनको हम सांसारिक सुख कहते हैं, वे सब वास्तवमें मनकी थकावट हैं । मनकी थकावटसे होनेवाला सुख तो मिट जाता है, पर पारमार्थिक आनन्द मिटता नहीं । वह आनन्द ही हमारा स्वरूप है । मनकी थकावट हमारा स्वरूप नहीं है ।

जब संसारके सभी सुख (सुखासक्ति) मिट जाते हैं, तब उस परमसुखका अनुभव होता है, जिसका वर्णन नहीं हो सकता‒‘यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः’ (गीता ६/२२) । उस परमसुखका अनुभव होनेपर सभी कामनाओंका नाश हो जाता है तथा किसी प्रकारकी कोई कमी शेष नहीं रहती‒‘रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते’ (गीता २/५९)

यदि मनुष्य दुःखसे बचना चाहे तो वह सुखकी इच्छाको मिटा दे । यदि रोगसे बचना चाहे तो भोगकी इच्छाको मिटा दे । यदि अपमानसे बचना चाहे तो सम्मानकी इच्छाको मिटा दे । यदि शोकसे बचना चाहे तो हर्षकी इच्छाको मिटा दे । तात्पर्य है कि दुःखका निर्माण स्वयं हमने किया है । हमारी इच्छाके बिना कोई हमें दुःखी, पराधीन नहीं कर सकता ।

एक मार्मिक बात है कि मनुष्यको जिस वस्तुकी आवश्यकता है, उसको प्राप्त करनेकी सामर्थ्य उसमें विद्यमान है । तात्पर्य है कि मनुष्य जो कुछ कर सकता है, उसीसे उसकी आवश्यकताकी पूर्ति हो सकती है । संसार भी मनुष्यसे वही आशा करता है, जो वह कर सकता है । भगवान्‌ भी वही आज्ञा देते हैं, जो वह कर सकता है । मनुष्य जो कर सकता है, उसको न करना ही अकर्तव्य है । जबतक मनुष्यकी वास्तविक आवश्यकताकी पूर्ति नहीं होती, तबतक उसका करना समाप्त नहीं होगा, वह कुछ-न-कुछ करता ही रहेगा । कारण कि करना साधन है, साध्य नहीं । साध्यकी प्राप्ति होनेपर साधन शेष नहीं रहता अर्थात् आवश्यकता शेष न रहनेपर करना भी शेष नहीं रहता, मनुष्य कृत्यकृत्य हो जाता है ।

परमात्माकी अनन्त शक्ति प्राणिमात्रको निरन्तर अपनी ओर खींचती रहती है । इसीलिये कोई भी परिस्थिति निरन्तर नहीं रहती । मनुष्यकी ममता कहीं भी स्थायी नहीं रहती । उसका प्रत्येक वस्तु तथा व्यक्तिसे निरन्तर सम्बन्ध-विच्छेद होता रहता है । परमात्माकी वह अनन्त शक्ति न तो मनुष्योंपर शासन करती है, न उनकी स्वतन्त्रता छीनकर उनको पराधीन बनाती है । यह नियम है कि जो वस्तु जिससे उत्पन्न होती है, अन्तमें उसीमें विलीन होती है, तभी पूर्णता होती है । जीव परमात्मासे अलग हुआ है; अतः जबतक वह परमात्मामें विलीन नहीं होगा, तबतक पूर्णता नहीं होगी, वह भटकता ही रहेगा । इसीलिये परमात्माको छोड़कर अन्य वस्तु, व्यक्ति, क्रिया, अवस्था, परिस्थिति आदिकी ममता-कामनामें फँसना व्यर्थ है । उनकी प्राप्तिके लिये प्रयत्न करना व्यर्थ चेष्टा है । जीवकी स्वाभाविक गति परमात्मामें विलीन होनेकी ही है । जब हम अपनी स्वाभाविक गतिसे विमुख होकर अन्य वस्तु, व्यक्ति आदिसे सम्मुख हो जाते हैं, तब भगवान्‌की कृपा उस वस्तु, व्यक्ति आदिसे वियोग करा देती है । जबतक हमारा परमात्मासे योग नहीं होगा, तबतक प्रत्येक संयोगका वियोग होता रहेगा‒यह नियम है । संसारमें होनेवाला परिवर्तन निरन्तर यह शिक्षा दे रहा है कि तुम मेरेमें मत फँसो । मैं तुम्हारा लक्ष्य नहीं हूँ । तुम्हारा लक्ष्य परमात्मा है, जो निरन्तर तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा है ।

नारायण !     नारायण !!     नारायण !!!

‒ ‘सन्त-समागम’ पुस्तकसे

 

 

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