।। श्रीहरिः ।।

                                                                                                                                                                      




           आजकी शुभ तिथि–
फाल्गुन कृष्ण षष्ठी वि.सं.२०७७, गुरुवा

सदुपयोगसे कल्याण


लोगोंमें कहावत है‒‘छल-बलकी खेती भली, बेला-पुलको दान ।’ वर्षा बरसते ही चट खेती कर लो तो वह हो जायगी । दो दिनके बाद वह नहीं होगा, जो आरम्भमें हो जायगा । इसी प्रकार जब सुपात्र मिल जाय, तभी दान दे दो तो उसका बड़ा भारी पुण्य होता है । द्रौपदीकी एक बात हमने सुनी है । द्रौपदी पहले जन्ममें एक स्त्री थी । एक दिन वह नदीमें जल भरने गयी । सरदीका समय था । एक ब्राह्मण देवता लँगोटी लगाकर नदीमें स्नान कर रहा था । संयोगवश उसकी लँगोटी पानीमें बह गयी । बाहर माताएँ खड़ी थीं । वह बेचारा ठण्डसे काँपने लगा । परन्तु बाहर कैसे आये ? कपड़ा था नहीं पासमें । उस स्त्रीने देखा कि इस बेचारेके पास कपड़ा नहीं है और सरदीमें ठिठुर रहा है । उसने अपनी साड़ीकी लीरी फाड़कर उसकी तरफ फेंकी, पर वह बह गयी । एक-दो लीरी फाड़कर उसकी तरफ फेंकी, पर वे भी बह गयीं । फिर एक लीरी पत्थर बाँधकर फेंकी तो वह उसके हाथमें आ गयी और उसकी लँगोटी लगाकर वह बाहर निकल आया । उस स्त्रीके मनमें यह भाव नहीं आया कि अपनी साड़ी कैसे फाड़ दूँ ? उस एक चीरीकी लीरसे कितना बढ़ गया चीर ! जब द्रौपदीका चीर खींचा गया, उस समय भगवान्‌ने कहा‒

आरतवान अतीतको, दीवी चीर कि लीर ।

मैं न बढ़ायौ द्रौपदी,   तू हि बढ़ायौ चीर ॥

बेचारा दुःखी ब्राह्मण जलमें काँप रहा था । लज्जा-निवारणके लिये तूने अपना चीर फाड़कर दे दिया । उसी कारण यह तुम्हारा चीर बढ़ गया । ‘दुस्सासन की भुजा थकित भई, बसन रूप भये स्याम ।’ इस प्रकार समयपर जो दान दिया जाता है, वस्तुका सदुपयोग किया जाता है, उसका बड़ा भारी माहात्म्य होता है ।

आपके पास शक्ति कम है, परिस्थिति भी बड़ी विकट आयी हुई है, फिर भी आप घबरायें नहीं, प्रत्युत सोचें कि इस समय क्या किया जाय । कुछ-न-कुछ उपाय निकल आयेगा । आपके द्वारा बड़ा उपकार हो जायगा । जो आपका कल्याण कर देगा । सज्जनो ! वस्तु, परिस्थितिकी महिमा नहीं है, उसके उपयोगकी महिमा है । आप अनुकूल परिस्थितिका भी सदुपयोग कर सकते हैं और प्रतिकूल परिस्थितिका भी । स्वस्थताका भी सदुपयोग कर सकते हैं और अस्वस्थताका भी । पासमें बहुत कुछ हो अथवा कुछ न हो‒दोनों परिस्थितियोंका आप सदुपयोग कर सकते हैं । इसलिये आप अपनी परिस्थिति देखकर घबरायें नहीं । उस परिस्थतिका सदुपयोग करें तो भगवान्‌ प्रसन्न हो जायँगे ।

नारायण !     नारायण !!     नारायण !!!

‒ ‘भगवान्‌से अपनापन’ पुस्तकसे

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।। श्रीहरिः ।।

                                                                                                                                                                     




           आजकी शुभ तिथि–
फाल्गुन कृष्ण पंचमी वि.सं.२०७७, बुधवा

सदुपयोगसे कल्याण


एक बच्चा कुछ बोझा उठाता है तो कहते हैं कि वाह-वाह, कितना बोझा उठा लिया ! जब कि उसी बोझेको आप एक हाथसे उठाकर रख सकते हैं । बच्चेने अपनी पूरी शक्ति लगाकर बोझा उठाया, इसीलिये आप उसकी वाह-वाह करते हैं । ऐसे ही सज्जनो ! आपको जो वस्तु, परिस्थिति आदि मिली है, उसीका सदुपयोग करो । आप चाहते हैं कि धन मिल जाय, अच्छी परिस्थिति मिल जाय, हमारा शरीर निरोग हो जाय तो हम अपना कल्याण कर लेंगे, पर क्या करें, हमारे पास विद्या, बुद्धि, योग्यता नहीं ! वास्तवमें आपके पास विद्या, बुद्धि, योग्यताकी कोई आशा रखता ही नहीं । भगवान्‌ भी आशा नहीं रखते । आपके पास जितना है, उसीका अच्छी तरहसे उपयोग कीजिये; भगवान्‌ कल्याण कर देंगे । सज्जनो ! परिस्थिति कल्याण करनेवाली नहीं होती । कल्याण करनेवाली है‒परिस्थितिका सदुपयोग करनेकी युक्ति । वह आप ठीक तरहसे विचारपूर्वक समझ लें और परिस्थितिका सदुपयोग करें तो उससे कल्याण हो जायगा ।

बचपनमें पढ़ी हुई एक कहानी याद आ गयी । ‘बीरबल-विनोद’ पुस्तकमें बादशाह अकबर और बीरबलका संवाद है । एक बार बादशाहने पूछा कि शस्त्र कौन-सा बड़ा है, जिससे विजय हो जाय ? बीरबलने सीधी राजस्थानी भाषामें उत्तर दिया‒‘ओसाण’ (अवसर) । बादशाहने विचार किया कि इसकी परीक्षा करेंगे । एक दिन बीरबल बादशाहके साथ जंगलमें गया । वह बड़ा बुद्धिमान्‌ ब्राह्मण था । बादशाहकी उसपर बड़ी कृपा थी । वह अपनी रसोई अलग बनाकर खाता था । वहाँ जंगलमें वह एकान्तमें अपनी रोटी बना रहा था । बादशाहने एक हाथीको मदिरा पिलाकर बीरबलकी तरफ छोड़ दिया कि देखें, अब यह कैसे अपनी रक्षा करता है ? बीरबलने देखा लिया कि हाथी आ रहा है । वहाँ एक कुतिया बैठी थी । बीरबलने कुतियाको रोटीका टुकड़ा दिया । ज्यों ही हाथी नजदीक आया, कुतियाके पैर पकड़कर हाथीपर फेंका । कुतिया जाकर हाथीके माथेपर लगी । हाथी भाग गया पीछे कि न जाने यह क्या आफत आ गयी ! अब हाथी भगानेका यह भी शस्त्र कभी किसीने सुना है ? यह तो मौका, अवसर है कि हाथीको भगा दिया । बादशाहने कहा कि ठीक है जो ओसाण (अवसर) आ जाय, वही शस्त्र है । इसी तरह जो अवसर आ जाय वही दान है, पुण्य है ।

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।। श्रीहरिः ।।

                                                                                                                                                                    




           आजकी शुभ तिथि–
फाल्गुन कृष्ण चतुर्थी वि.सं.२०७७, मंगलवा

सदुपयोगसे कल्याण


अब आप विचार करें, इतना दान-पुण्य करनेपर भी युधिष्ठिरजीका यज्ञ उतना बड़ा नहीं हुआ, जितना उस ब्राह्मणके द्वारा हुआ । अधिक दान देनेसे अधिक पुण्य हो जायगा‒यह बात है ही नहीं । बहनोंके मनमें बहुत रहती है कि हमारे पास धन होगा तो ऐसा दान करूँगी, ऐसा उद्यापन करूँगी, वैशाख नहाऊँगी, ऐसा करूँगी, वैसा करूँगी । न जाने कितने-कितने मनोराज्य होते हैं ! बहनों ! आपके पास जितना है, उसके अनुसार करो । मालपर जगात (टैक्स) लगती है । आपके पास माल नहीं तो जगात किस बातकी ? आपके पास जितना है, उतना ही आपपर लागू होता है ।

सत्त सारु बाँटिये,    ‘नापो’   कहत  नरां ।

निपट नकारो न दीजिये, उणद देख घरां ॥

‘नापो कवि कहते हैं कि मनुष्यो ! अपनी शक्तिके अनुसार दान दो । घरमें अभाव देखकर किसीको साफ़ ‘ना’ मत कहो, प्रत्युत कुछ-न-कुछ दे दो ।

शक्तिके अनुसार दो तो वह बड़ा भारी दान हो जायगा । महिमा वस्तुके सदुपयोगकी है । यह नहीं कि ज्यादा धन होगा तो हम दान-पुण्य करेंगे; तीर्थ, व्रत, यज्ञ आदि करेंगे, बड़े-बड़े सत्संग-समारोह करेंगे; परन्तु क्या करें, हमारे पास पैसा नहीं है ! सज्जनो ! पैसा नहीं है तो आपपर दान, तीर्थ, व्रत, यज्ञ आदि करना लागू ही नहीं होता । आप भी छोटे बालकसे उतनी ही आशा रखते हैं, जितना वह कर सकता है । क्या भगवान्‌ आप-जितने भी जानकार और दयालु नहीं हैं ? क्या भगवान्‌ आपकी शक्तिको नहीं जानते ? आपको उतना ही करना है, जितनी आपकी शक्ति है । आपके पास जो योग्यता, परिस्थिति आदि है, उसका सदुपयोग करो तो कल्याण कम नहीं होगा । युधिष्ठिरजीसे उस ब्राह्मणका यज्ञ कम नहीं था । पासमें खानेको भी नहीं था; परन्तु यज्ञ हो गया युधिष्ठिरजीके यज्ञसे बढ़कर !

ऐसी इच्छा न करें कि अधिक हो जाय तो अधिक करेंगे । जो पासमें है, उसीका अच्छे-से-अच्छा उपयोग करो । प्राप्त परिस्थितिका बढ़िया-से-बढ़िया सदुपयोग करें तो वह काम छोटा नहीं होगा, बड़े महत्त्वका हो जायगा । मैंने एक कथा सुनी है । वह किसी दाक्षिणात्य रामायणमें आती है, ऐसा सुना है । रामजी और रावणका आपसमें धमासान युद्ध हो रहा था । इतनेमें एक गिलहरी दोनों हाथोंमें तिनका लेकर रामजीसे पास पहुँची और बोली कि मैं अभी रावणको मार दूँ ! भगवान्‌ उसपर प्रसन्न हो गये । उसपर हाथ रखा, जिससे (अँगुलियोंके स्पर्शसे) वे लकीरें हो गयीं । गिलहरीमें रावणको मारनेकी क्या ताकत है ? पर उसने अपना पूरा बल लगा दिया, जिससे भगवान्‌ खुश हो गये ।

आप दूसरेके उद्धारके लिये अपनी पूरी शक्ति लगा दें । भगवान्‌ देखते हैं कि मामूली शक्ति होते हुए भी वह दूसरोंके उद्धारके लिये चेष्टा करता है तो मैं कम-से-कम इसका उद्धार तो कर ही दूँ ! साधारण शक्तिवाला भी जब अपनी पूरी शक्ति लगाकर दूसरोंके हितकी चेष्टा करता है, तो अच्छे-अच्छे सन्त महात्माओंपर और भगवान्‌पर भी उसका असर पड़ता है ।

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।। श्रीहरिः ।।

                                                                                                                                                                   




           आजकी शुभ तिथि–
फाल्गुन कृष्ण द्वितीया वि.सं.२०७७, सोमवा

सदुपयोगसे कल्याण


एक बार ब्राह्मणको कई दिनोंसे अन्न नहीं मिला । एक दिन जौके खेतमें कुछ जौ मिले । ब्राह्मणने लाकर घरमें दे दिए । सास-बहूने उनका आटा बनाया और भूनकर सतुआ तैयार किया । राजस्थानमें घी-चीनी डालकर जो सत्तू बनाया जाता है, वह नहीं । केवल आटा भुना हुआ सतुआ तैयार किया । चारों प्राणी कई दिनके भूखे थे । उन्होंने उस सतुआके पाँच विभाग किये ।

जब रसोई बनती है तब उसको पूरी-की-पूरी स्वयं खा लेना पाप है । जो केवल अपने लिये भोजन पकाकर खाते हैं, वे पापी पापका भक्षण करते हैं‒‘भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात्’ (गीता ३/१३) । मनुजीने भी कहा है‒‘केवलाघी भवति केवलादी’ जो अपने लिये भोजन बनाता है, वह पापका भक्षण करता है । रसोई बनी तो अतिथि-सत्कार करना गृहस्थका धर्म है । भगवान्‌ने ब्रह्मचारी, वानप्रस्थी, संन्यासी‒सबका पालन-पोषण करनेकी जिम्मेवारी गृहस्थपर रखी है । इसलिये कोई घरपर आ जाय तो कुछ दे दो । पेटभर खिलाना ही है‒ऐसा कोई नियम नहीं है; परन्तु कुछ दो । लौकिक कहावत है‒हाथका उत्तर दो, जबानका उत्तर मत दो ।

ब्राह्मणने बलिवैश्वदेव कर दिया, भगवान्‌को भोग लगा दिया, फिर पाँच पत्तलोंमें परोस करके बाहर जाकर अतिथिको देखने लगे । रसोई बनकर तैयार हो जाय तो बलिवैश्वदेव करके जितनी देरमें एक गाय दुहे, उतनी देर अतिथिकी प्रतीक्षा करनी चाहिये । अतिथि न आये तो उसका हिस्सा निकालकर भोजन कर सकते हैं । अगर भोजनसे पहले अतिथि आ जाय तो अतिथिको भोजन देकर फिर स्वयं भोजन करना चाहिये । इतनेमें ही एक ब्राह्मण आ गये । उनको भिक्षाके लिये कहा तो वे आ गये । उनको भीतर ले गये और अतिथिके लिये रखा हुआ सतुआ दे दिया । उसको वे पा गये । घरके ब्राह्मण देवाताने उनको अपने हिस्सेका सतुआ दे दिया । अतिथि ब्राह्मण वह भी पा गये । ब्राह्मणीने जाकर अपने पतिदेवसे कहा कि प्राणनाथ ! अभीतक अतिथिकी तृप्ति नहीं हुई है, उसको मेरा भी हिस्सा दे दो । ब्राह्मणने उसको समझाया कि देखो, तुम स्त्री जाति हो, भूख अधिक लगती है । तुम भूख सहन नहीं कर सकोगी । जब हमने अतिथिका सत्कार कर दिया तो गृहस्थके धर्मका पालन हो गया । तुम कोई चिन्ता मत करो । ब्राह्मणीने कहा कि आप भूखे रहें और मैं खाऊँ‒ऐसा कभी हो नहीं सकता । ब्राह्मणीने ज्यादा हठ किया तो उसका हिस्सा भी अतिथिको दे दिया । वे उसे भी पा गये । अब बेटा पहुँचा पिताजीके पास । दान-पुण्य करना, श्राद्ध आदि करना परिवारके बड़े (मुख्य) व्यक्तिका काम होता है । इसलिये लड़केने अतिथिको अपना हिस्सा खुद न परोसकर पिताजीसे प्रार्थना की । पिताजी (ब्राह्मण)-ने कहा कि देखो बेटा ! तेरी अवस्था छोटी है । छोटी अवस्थामें अग्नि तेज होती है, भूख ज्यादा लगती है । इसलिये तुम खाओ । हम तो बूढ़े हैं, हमारी कोई बात नहीं । बेटा माना नहीं । उसने बहुत हठ किया तो उसका हिस्सा भी अतिथिको परोस दिया । अब बेटेकी बहू पहुँची अपनी सासके पास और बोली कि माताजी ! मेरा भाग भी अतिथिको दे दीजिये, जिससे वे तृप्त हो जायँ । हम कई दिनोंसे भूखे हैं, एक दिन और भूखे रह जायँ तो क्या है ! बहुत हठ करनेपर उसका हिस्सा भी अतिथिको दे दिया । अतिथिको देकर चारों प्राणी बहुत प्रसन्न हुए कि आज तो बड़े आनन्दकी बात हो गयी !

यदि कोई दान देकर पछताता है, दुःखी हो जाता है, तो वह दान उतना फलीभूत नहीं होता । देकर प्रसन्न हो जाय कि आज हम निहाल हो गये ! अपना पेट भरा रहनेपर अन्न देना सुगम है । लाखों, करोड़ों रुपये रहनेपर थोड़े रुपये देना सुगम है । परन्तु भूखे पेट अन्न देना मामूली बात नहीं, बड़ा मुश्किल काम हैं । आपने सुन लिया, हमने कह दिया, जोर क्या आया ? पता तब लगे जब ऐसा काम पड़े । वे चारों प्राणी देकर बहुत प्रसन्न हुए कि आज तो हम निहाल हो गये ! वे अतिथि ब्राह्मण धर्मराजरूपसे प्रकट हो गये और बोले कि तुम कितने धर्मात्मा हो‒इसकी मैंने परीक्षा ली थी । आज मैं हार गया, तुम जीत गये ! तुमने धर्मपर विजय प्राप्त कर ली । अब तुम स्वर्गमें चलो । वे सब धर्मराजके साथ चले गये । वह नेवला कहता है कि मैंने यह सब देखा ! पत्तलके ऊपर आचमनका पानी बिखरा था । वहाँ जाकर जब मैंने लोट लगायी तो शरीरके जितने भागमें वह पानी लगा, उतना भाग सोनेका हो गया । बाकीका भाग भीगा नहीं, इसलिये पूरा शरीर सोनेका नहीं हुआ । मैंने इस यज्ञकी महिमा सुनी कि युधिष्ठिरजी महाराजने बड़ा भारी यज्ञ किया है । यहाँ आकर मैं कीचड़में लोटा तो कीचड़ और लग गया, रोयाँ (रूआँ) एक भी सोनेका नहीं हुआ ! आप इस यज्ञकी झूठी प्रशंसा क्यों करते हो ?

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