।। श्रीहरिः ।।



आजकी शुभ तिथि–
     पौष शुक्ल तृतीया, वि.सं.-२०७८, बुधवार

स्वार्थरहित सेवाका महत्त्व


परमश्रेयकी प्राप्तिमें केवल अपनी स्वार्थ-भावना ही बाधक है । आपके पास जितनी वस्तुएँ हैं, वे समष्टिकी हैं और सबकी सेवाके लिये हैं । उन वस्तुओंसे अपना निर्वाह भी दूसरोंकी सेवाके लिये करो, अपने सुखभोगके लिये नहीं‘एहि तन कर फल विषय न भाई’ (मानस ७/४४/१) । मनुष्य-शरीरका उद्देश्य विषय-भोग करना, संसारका सुख लेना नहीं है, प्रत्युत सबकी सेवा करना है । इसीलिये सबको सुख कैसे पहुँचे, सबको आराम कैसे पहुँचे, सबका भला कैसे होयही चिन्तन करो, यही विचार करो । ब्रह्माजी कहते हैं

इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः ।

तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो     यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः ॥

(गीता ३/१२)

‘यज्ञसे भावित (पुष्ट) हुए देवता ही तुमलोगोंको कर्तव्यपालनकी आवश्यक सामग्री देते रहेंगे । इस प्रकार उन देवताओंसे प्राप्त हुई समग्रीको दूसरोंकी सेवामें लगाये बिना जो मनुष्य स्वयं ही उसका उपभोग करता है, वह चोर ही है ।’

मनुष्यको जो सामग्री मिली है, वह सबकी सेवा करनेके लिये मिली है केवल अपने उपभोगके लिये नहीं, जो अकेला उसका उपभोग करता है, उसको चोर कहा गया है‘स्तेन एव सः’ । अगर मिली हुई सामग्री अपने उपभोगके लिये ही होती, तो उसको चोर नहीं कहते ! इसलिये मनुष्यको जो भी सामग्री मिली है, उसको अकेले भोगनेका अधिकार नहीं है । जैसे परिवारमें जो आदमी पैसे कमाता है, उसके द्वारा कमाये हुए पैसोंपर अकेले उसका हक नहीं लगता, प्रत्युत उसके पूरे परिवारका हक लगता है । अगर वह अपनी स्त्रीसे कह दे कि ‘मैं अकेला ही खाऊँगा; तू तो घरपर ही बैठी रहती है, तेरेको क्यों दिया जाय ? माँ-बापसे कहे कि आप तो ऐसे ही घरपर बैठे रहते हैं, आपको क्यों दिया जाय ? मैंने मेहनत की है, मैंने कमाया है; अतः मैं अकेला ही भोग करूँगा’ तो ऐसी परिस्थितिमें क्या परिवारमें सुख-शान्ति रहेगी ? परिवारका काम ठीक तरहसे चलेगा ? कभी नहीं । इसी तरहसे अगर लोग केवल अपने स्वार्थकी पूर्तिमें ही लगे रहेंगे तो सृष्टिका काम ठीक तरहसे नहीं चलेगा ।

हमारे पास जो कुछ है, वह सब हमें संसारसे ही मिला है । शरीर और उसके लिये अन्न, जल, वस्त्र, हवा, रहनेका स्थान आदि हमें समष्टि संसारसे मिले हैं । धनी-से-धनी व्यक्ति, राजा-महाराजा भी ऐसा नहीं कह सकता कि मैं दूसरेसे सेवा लिये बिना अपना निर्वाह कर लूँगा । कैसे कर लेगा ? वह सड़कपर चलेगा, तो क्या सड़क अपनी बनायी हुई है ? किसी वृक्षके नीचे ठहरेगा, तो क्या वह वृक्ष अपना लगाया हुआ है ? कहीं जल पीयेगा, तो क्या कुआँ अपना खुदवाया हुआ है ? उसे संसारसे लेना ही पड़ेगा, परवश होकर लेना पड़ेगा । लेना तो पशुओंको भी पड़ेगा, फिर मनुष्यकी बुद्धिकी क्या विशेषता हुई ? लिया है तो देना भी चाहिये; परवशतासे जो लिया है, उससे भी ज्यादा देना हैयह मनुष्यबुद्धिकी विशेषता है । भगवान्‌ने कहा है‘ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः’ (गीता १२/४) ‘जो मनुष्य प्राणिमात्रके हितमें रत होते हैं, वे मेरेको ही प्राप्त होते हैं ।’ प्राणिमात्रके हितमें रति होनी चाहिये । उनका हित कर देंयह हाथकी बात नहीं है । सारा संसार मिलकर एक आदमीकी इच्छा भी पूरी नहीं कर सकता, तो फिर एक आदमी सारे संसारकी इच्छा पूरी कैसे कर देगा ? मनुष्यका कर्तव्य यह है कि उसके पास जो सामग्री है, उसको वह उदारतापूर्वक दूसरोंके हितके लिये समर्पित कर दे । ऐसा करनेसे उसको कल्याणकी प्राप्ति हो जायगी ।

मनुष्य जितना-जितना व्यक्तिगत स्वार्थभाव रखेगा, उतना ही वह संसारमें नीचा माना जायगा । कमानेवाला केवल अपना ही पेट भरेगा, अकेला ही सामग्रीका उपभोग करेगा तो वह न घरमें आदर पायेगा, न बाहर । वह जितना-जितना व्यक्तिगत स्वार्थका त्याग करके कुटुम्बकी सेवा करेगा, उतना ही वह अच्छा माना जायगा । अगर वह केवल कुटुम्बका ही नहीं, पड़ोसियोंका भी हित चाहेगा तो वह और श्रेष्ठ होगा । केवल पड़ोसियोंका ही नहीं, सम्पूर्ण गाँवका हित चाहेगा तो वह और श्रेष्ठ होगा । केवल गाँवका ही नहीं, प्रान्तका हित चाहेगा तो वह और श्रेष्ठ होगा । अगर वह देश-विदेशका, सम्पूर्ण पृथ्वीका हित चाहेगा तो वह और श्रेष्ठ होगा ! अगर वह देवता, पशु, पक्षी, वृक्ष आदि मात्र जीवोंका हित चाहेगा तो वह और श्रेष्ठ होगा । अगर वह भगवान्‌की सेवा करेगा, भगवान्‌का भजन-कीर्तन-ध्यान करेगा तो वह सर्वश्रेष्ठ हो जायगा । जैसे वृक्षके मूलमें जल डालनेसे सम्पूर्ण वृक्ष स्वतः हरा हो जाता है, ऐसे ही संसाररूपी वृक्षके मूल भगवान्‌का चिन्तन करनेसे, भजन करनेसे संसारमात्रकी सेवा स्वतः हो जाती है ।

सिद्धान्त यह हुआ कि मनुष्यके द्वारा जितनी व्यापक सेवा होगी, उतना ही वह श्रेष्ठ हो जायगा । हमें जो कुछ मिला है, वह सृष्टिसे मिला है । इसलिये उसको बड़ी ईमानदारीसे सृष्टिकी सेवामें लगा देना चाहिये । यह गीताका कर्मयोग है ।

नारायण !     नारायण !     नारायण !

‘कल्याणकारी प्रवचन’ पुस्तकसे

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।। श्रीहरिः ।।

     


आजकी शुभ तिथि–
     पौष शुक्ल द्वितीया, वि.सं.-२०७८, मंगलवार

स्वार्थरहित सेवाका महत्त्व


जैसे हाथ, पैर, इन्द्रियाँ, प्राण, मन, मस्तिष्क आदि एक ही शरीरके अनेक अवयव हैं और ये सब मिलकर शरीर-निर्वाहके लिये काम करते हैं । इन सबके काम तो अलग-अलग हैं, पर अलग-अलग काम करते हुए भी ये सभी परस्पर एक-दूसरेके हितमें लगे रहते हैं । ऐसे ही संसारमात्रके जो अनेक प्राणी हैं, उन सबको भी मिलकर समष्टि संसारके हितके लिये काम करना चाहिये । गलती वहाँ होती है, जब वे केवल अपने लिये ही काम करते हैं । जैसे, हाथ केवल अपने लिये ही काम करें, पैर, आँख, कान आदि किसीके लिये नहीं, तो शरीरका निर्वाह नहीं होगा । पैर कहें कि हम तो अपने लिये ही काम करेंगे, शरीरको हम क्यों उठायें ? हाथोंको हम क्यों उठायें ? तो शरीरका काम नहीं चलेगा । इसी तरह स्वार्थमें आकर हर प्राणी अपना स्वार्थ सिद्ध करना चाहे तो संसारका काम नहीं चलेगा । अपने स्वार्थके लिये काम करनेसे ही काम बिगड़ता है ।

सम्पूर्ण प्राणी एक ही संसारके अनेक अवयव हैं । किसी भी रीतिसे शरीर संसारसे अलग सिद्ध नहीं हो सकता । बनावटकी दृष्टिसे, धातुकी दृष्टिसे, संरक्षककी दृष्टिसे देख लो, शरीरको संसारसे अलग सिद्ध नहीं कर सकते । जैसे शरीरके अवयव अलग-अलग होते हुए भी एक ही शरीरके अंग हैं, ऐसे ही संसारमें छोटे-बड़े जितने भी प्राणी हैं, वे सब एक विराट्‌ (समष्टि-संसार)-के ही अंग हैं । एक विराट्‌के अंग होकर भी वे अपना व्यक्तिगत स्वार्थ सिद्ध करते हैंयह गलती है ।

अपना स्वार्थ सिद्ध करें या नहीं करेंइसका ज्ञान पशु-पक्षियोंमें नहीं है; परन्तु मनुष्यमें इसका ज्ञान (विवेक) है । मनुष्य विवेकपूर्वक यह विचार कर सकता है कि यह सम्पूर्ण संसार अपना कुटुम्ब है, फिर एक अपने स्वार्थके लिये काम कैसे करें ? नीतिमें भी आया है

अयं निजः परो वेत्ति गणना लघुचेतसाम् ।

उदारचरितानां  तु     वसुधैव कुटुम्बकम् ॥

(पञ्चतन्त्र, अपरीक्षित ३७)

‘यह जो हमारा है और यह दूसरोंका (पराया) हैंऐसा विचार तो तुच्छ हृदयवाले लोगोंका हुआ करता है । जिनका हृदय उदार है, उनके लिये तो सारा संसार ही कुटुम्ब है ।’

संसारका कोई भी प्राणी हो, चाहे वह स्थावर हो या जंगम, अपने ही कुटुम्बका है । शास्त्रोंमें आया है कि जैसे अपने घरमें रहनेवाले लोग अपने कुटुम्बी हैं, ऐसे ही अपने घरमें रहनेवाली चीटियाँ, मक्खियाँ, चूहे आदि भी अपने कुटुम्बी ही हैं । वे भी उस घरको अपना घर मानते हैं । चिड़िया उस घरमें जहाँ अपना घोंसला बनाती हैं, वहाँ दूसरी चिड़ियोंको नहीं रहने देती । विचार करें, एक घरमें कितने घर हैं ! अतः घरको केवल अपना ही मानना और केवल अपने घरके लिये ही सब काम करना पशुता है । मनुष्यता नहीं । भागवतमें आया है कि इस पशुबुद्धिका त्याग कर दो‘पशुबुद्धिमीमां जहि’ (श्रीमद्भागवत १२/५/२) । सबके हितमें अपना हित मानना ही मनुष्यबुद्धि है ।

आज जो आध्यात्मिक उन्नतिमें देरी हो रही है, उसका खास कारण यही है कि आप अपना व्यक्तिगत हित ही चाहते हैं अर्थात्  अपने व्यक्तित्वको, परिच्छिन्नताको कायम रखते हैं । मेरी मुक्ति हो, मेरेको सुख मिले, मेरा हित हो, मेरा मतलब सिद्ध होइस व्यक्तित्वको, एकदेशीयताको आप छोड़ते नहीं । पशुका जो स्वभाव है, उसी स्वभावको लेकर आप काम करते हैं ।

गीतामें आया है

सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः ।

अनेन  प्रसविष्यध्वमेष   वोऽस्त्विष्टकामधुक् ॥

देवान्  भावयतानेन   ते  देवा भावयन्तु वः ।

परस्परं  भावयन्तः     श्रेयः  परमवाप्स्यथ ॥

(३/१०-११)

‘प्रजापति ब्रह्माजीने सृष्टिके आदिकालमें कर्तव्य-कर्मोंके विधानसहित प्रजाकी रचना करके उनसे (प्रधानतया मनुष्योंसे) कहा कि तुमलोग अपने कर्तव्यके द्वारा अपनी वृद्धि करो और वह कर्तव्य-कर्मरूप यज्ञ तुमलोगोंको कर्तव्य-पालनकी आवश्यक सामग्री प्रदान करानेवाला हो ! अपने कर्तव्य-कर्मके द्वारा तुमलोग देवताओंको उन्नत करो और वे देवतालोग अपने कर्तव्यके द्वारा तुमलोगोंको उन्नत करें । इस प्रकार एक-दूसरेको उन्नत करते हुए तुमलोग परम कल्याणको प्राप्त हो जाओगे ।’

तात्पर्य है कि आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वीके देवता तथा चन्द्र, सूर्य आदि देवता मात्र जीवोंकी वृद्धि करें, उनका पालन करें, उनकी सेवा करें । मनुष्य यज्ञके द्वारा देवातओंका पूजन करें, उनकी वृद्धि करें, उनकी सेवा करें । यहाँ ‘देव’ शब्द उपलक्षणरूपसे है; अतः ‘देव’ शब्दके अन्तर्गत मात्र प्राणियोंको लेना चाहिये । मनुष्यका कर्तव्य मात्र प्राणियोंका हित चाहना है, उनकी सेवा करना है । इसलिये मनुष्यको अपने-अपने कर्तव्य-कर्मोंके द्वारा दूसरोंकी सेवा करनी चाहिये । जैसे, ब्राह्मण अपने ब्राह्मणोचित कर्मसे सबकी सेवा करे, क्षत्रिय अपने क्षत्रियोचित कर्मसे सबकी सेवा करे, वैश्य अपने वैश्योचित कर्मसे सबकी सेवा करे और शूद्र अपने शूद्रोचित कर्मसे सबकी सेवा करे । इस प्रकार एक-दूसरेकी सेवा करनेसे परमश्रेयकी प्राप्ति हो जायगी ।

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आजकी शुभ तिथि–
     पौष शुक्ल प्रतिपदा, वि.सं.-२०७८, सोमवार

सेवाकी महत्ता


सेवा करनेका भाव असंगता लानेवाला है । अपने धर्मका, कर्तव्यका पालन करोगे, दूसरोंकी सेवा करोगे तो वैराग्य पैदा होगा‘धर्म तें बिरति जोग तें ग्याना’ (मानस ३/१६/१) । जैसे स्वायम्भुव मनुने अपना कोई स्वार्थ न रखकर धर्मसहित प्रजाका पालन किया, उसका हित किया तो उनको वैराग्य हो गया

होइ न बिषय बिराग     भवन बसत भा चौथपन ।

हृदयँ बहुत दुख लाग जनम गयउ हरिभगति बिनु ॥

(मानस १/१४२)

वैराग्य होनेपर वे स्त्रीसहित वनको चले गये । उन्होंने प्रजाके हितके लिये राज्य किया, इसीलिये उन्हें वैराग्य हुआ । अगर वे अपने लिये राज्य करते तो उन्हें वैराग्य नहीं होता । जहाँ लेनेकी इच्छा होती है, वहाँ राग पैदा होता है । राग अज्ञानका चिह्न है, अज्ञानकी खास पहचान है‘रागो लिङ्गमबोधस्य’ । जो रागी होता है, वह अज्ञानी होता है ।

सेवा करनेसे सम्बन्ध उसका जुड़ता है, जो कुछ लेना चाहता है और लेना वही चाहता है, जो शरीर और पदार्थोंके साथ ‘मैं’ और ‘मेरा’ का सम्बन्ध रखता है । जिसको सेवक कहलानेकी भी इच्छा नहीं है, प्रत्युत केवल दूसरोंको सुख पहुँचे, आराम पहुँचे, उनका भला हो, उनका कल्याण होइसके लिये ही तनसे, मनसे, वचनसे, धनसे, विद्यासे, बुद्धिसे, योग्यतासे, पदसे, अधिकारसे सबको सुख-ही-सुख पहुँचाता है, मनमें सबका हित-ही-हित करनेका भाव रखता है, वह मुक्त हो जाता है । जैसे, पानीमें रहकर पानीको अपनी ओर लोगे तो डूब जाओगे; और हाथोंसे, लातोंसे मारते रहोगे तो तर जाओगे । इसी तरह इस संसार-समुद्रमें जो लेना चाहता है, वह डूब जाता है और जो देना-ही-देना चाहता है, वह कभी नहीं डूबता ।

भगवान्‌ और उनके भक्त (सन्त-महात्मा) बिना कारण सबकी सेवा करनेवाले हैं

हेतु रहित जग जुग उपकारी ।

तुम्ह तुम्हार सेवक असुरारी ॥

(मानस ७/४७/३)

इसलिये वे बँधते नहीं । वे बँधे क्यों; उनके तो दर्शनसे ही मुक्ति हो जाती है ! कारण कि उनमें स्वार्थ है ही नहीं, किसीसे कुछ लेना है ही नहीं, प्रत्युपकारकी इच्छा है ही नहीं । इसलिये सेवा करनेसे बन्धन नहीं होता ।

श्रोताभरत मुनिने दया करके हरिणके बच्चेका पालन किया, पर अगले जन्ममें वे हरिण बन गये, ऐसा क्यों ?

स्वामीजीपहले भरत मुनिका उद्देश्य तो सेवा करनेका ही था, पर बादमें उनका हरिणके बच्चेपर मोह हो गया । हरिणके बच्चेपर उनका इतना अधिक मोह हो गया कि कभी वह दिखायी नहीं देता तो वे उसके वियोगमें ऐसे व्याकुल हो जाते, जैसे कोई पुत्रके वियोगसे व्याकुल होता है । वह ऐसे खेलता था, ऐसे गोदीमें आता था, ऐसे बोलता था, ऐसे शरीर खुजलाता था, ऐसे फुदकता थाइस तरह वे उसका चिन्तन करने लगते थे । इसी मोहके कारण उनको अगले जन्ममें हरिण बनना पड़ा, दयाके कारण नहीं । उनको मोह दयासे नहीं हुआ, प्रत्युत भूलसे हुआ । वास्तवमें मोह तो पहलेसे ही था, वही मोह दयाका रूप धारण करके आ गया । मोहके कारण ही बन्धन होता है । दया-परवश होकर सेवा करनेसे बन्धन नहीं होता ।

अस्सी-नब्बे, सौ वर्षका कोई आदमी मर जाय तो उसके लिये दुःख नहीं होता; परन्तु पचीस वर्षका कोई जवान आदमी मर जाय तो दुःख होता है । जरा सोचो कारण क्या है । बड़े-बूढ़े तो विशेष बुद्धिमान् और अनुभवी होते हैं, उनका अध्ययन बहुत होता है, इसलिये उनसे ज्यादा लाभ लिया जा सकता है; फिर भी उनके मरनेका दुःख इसलिये नहीं होता कि अब उनसे कुछ लेनेकी इच्छा नहीं रही । भीतर यह भाव रहता है कि अब उनसे मिलेगा कुछ नहीं, इसलिये वह मर जाय तो कोई हर्ज नहीं । मैंने खुद लोगोंके मुखसे यह सुना है कि बूढ़ेका मरना तो ब्याहकी तरह है । ऐसे ही कोई बीस वर्षका आदमी है और पाँच वर्षतक बीमार-ही-बीमार रहा; सब वैद्योंने, डाक्टरोंने जवाब दे दिया कि अब यह जीनेवाला नहीं है और पचीस वर्षकी उम्रमें वह मर गया तो उसके मरनेका भी दुःख नहीं होता । कारण कि दुःख तभी होता है, जब उससे कुछ-न-कुछ मतलब रहता है, सेवाकी आशा रहती है । यह आशा ही बाँधनेवाली है । जो आशा नहीं रखता, वह बँधता नहीं, उसको कोई बाँध सकता ही नहीं ।

कोई सम्बन्धी मर जाय तो उसके पीछे श्राद्ध करते हैं, दान, पुण्य करते हैं । इसका अर्थ यह है कि जो उससे लिया था, वह कर्जा उतर जाय । उससे जितना सुख लिया है, उतनी ही उसकी याद आती है, उतना ही हमें उसके वियोगका दुःख होता है । छोटे बच्चेको गोदीमें खिला करके जो सुख लिया है, उसका भी नतीजा दुःख ही होगा । सांसारिक सुखका नतीजा दुःख ही है । सांसारिक सुख दुःखोंकी जड़ है । उस सुखको लोगे तो बन्धन होगा ही । अगर वह सुख नहीं लोगे, प्रत्युत सुख दोगे तो किसीकी ताकत नहीं कि आपको बाँध दे । जहाँ कुछ-न-कुछ स्वार्थ है, मनमें सुख, आराम, मान, बड़ाई आदि लेनेकी इच्छा है, वहींपर बन्धन है । मेरेको व्याख्यान देते हुए वर्ष बीत गये, पर बन्धनकी जड़ कहाँ हैइसका पता जल्दी नहीं लगा । पीछे इसका पता लगा कि मनमें कुछ-न-कुछ लेनेकी इच्छा ही बन्धनकी जड़ है । ऐसी दुर्लभ बात है यह ! अगर संसारकी किसी चीजको देखकर राजी होते हैं तो यह भी सुखका भोग है, जो बाँधनेवाला है । अनुकुलताकी इच्छा करेंगे तो दुःख आयेगा ही । इसलिये हरदम सावधान रहो कि किसीसे सुख नहीं लेना है, आराम नहीं लेना है, मान नहीं लेना है, बड़ाई नहीं लेनी है । हमें किसीसे कुछ लेना है ही नहीं । जहाँ लेना हुआ कि फँसे ! केवल देना-ही-देना है । सेवा-ही-सेवा करनी है । सेवा करनेसे पुराना ऋण उतर जायगा और लेनेकी इच्छा न रखनेसे नया ऋण नहीं चढ़ेगा तो हम मुक्त हो जायँगे ।

नारायण !     नारायण !     नारायण !

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।। श्रीहरिः ।।

   


आजकी शुभ तिथि–
     पौष अमावस्या, वि.सं.-२०७८, रविवार

सेवाकी महत्ता


एक परमात्मतत्त्व ही ऐसा है, जिसको जो चाहे, उसको वह मिल जाय । धन, सम्पत्ति, वैभव, मान, आदर, निरोगता आदिको जो चाहे, उसको ये मिल जायँयह नियम नहीं है । ये धन, सम्पत्ति आदि सबको नहीं मिल सकते, मिलेंगे तो थोड़े-बहुत मिलेंगे, एक समान नहीं मिलेंगे । परन्तु परमात्मतत्त्व सबको मिलेगा, एक समान मिलेगा और जो चाहे, उसको मिलेगा; क्योंकि उसका सबके साथ घनिष्ठ सम्बन्ध है । जीव परमात्माका साक्षात् अंश है‘ममैवांशो जीवलोके’ (गीता १५/७) इसलिये उसका परमत्मापर पूरा हक लगता है । जैसे, माँपर सब बालकोंका हक लगता है, सब बालक अपनी माँकी गोदीमें जा सकते हैं । ऐसे ही परमात्मा सबके माता-पिता हैं‘त्वमेव माता च पिता त्वमेव ।’ वे सदासे ही सबके माता-पिता हैं और सदा ही रहेंगे, इसलिये उनकी प्राप्तिमें कोई भी मनुष्य अयोग्य नहीं है, अनधिकारी नहीं है, निर्बल नहीं है । अतः किसीको भी परमात्मतत्त्वसे हताश होनेकी किंचिन्मात्र भी गुंजाइश नहीं है । कितनी विलक्षण बात है !

मैंने जो पुस्तकोंमें पढ़ा है, सुना है, विचार किया है, उससे मेरे भीतर यह बात दृढ़तासे बैठी हुई है कि किसी वस्तु, अवस्था, परिस्थिति, घटना, क्रिया, आदिकी महिमा नहीं है, प्रत्युत उनके सदुपयोगकी महिमा है । हमारी कैसी ही बुद्धि हो, कैसी ही परिस्थिति हो, कैसी ही अवस्था हो, कैसा ही संयोग हो, उसीका ठीक तरहसे सदुपयोग किया जाय तो परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति हो जाय । कारण कि मनुष्यजन्म मिला ही इसके लिये है ।

कबहुँक करि करुना नर देही ।

देत  ईस  बिनु   हेतु  सनेही ॥

(मानस ७/४४/३)

बिना हेतु कृपा करनेवाले प्रभुने कृपा करके मनुष्य-शरीर दिया है तो क्या भगवान्‌की कृपा निष्फल होगी ? भगवान्‌की कृपा कभी निष्फल नहीं होती । हाँ, इतनी बात है कि भगवान्‌ने मनुष्यको स्वतन्त्रता दी है । इस स्वतन्त्रताका वह चाहे जो उपयोग कर सकता है, चाहे इसका सदुपयोग करके परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति कर ले, अपना कल्याण कर ले और चाहे इसका दुरुपयोग करके चौरासी लाख योनियोंमें अथवा नरकोंमें चला जाय । वास्तवमें यह स्वतन्त्रता भगवान्‌ने मनुष्यको अपना कल्याण करनेके लिये दी है । अतः मनुष्य क्या करे ? इसके भीतर इस बातकी लगन लग जाय कि परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति कैसे हो ? रामायणमें आया है

एक  बानि  करुनानिधान  की ।

सो प्रिय जाकें गति न आन की ॥

(मानस ३/१०/४)

भगवान्‌का एक स्वभाव है, एक बाण है कि जिसका एक भगवान्‌के सिवाय दूसरा कोई सहारा नहीं है, वह भगवान्‌को बहुत प्यारा लगता है । इसलिये भगवान्‌ने अर्जुनको पूरी गीता सुनाकर कहा‘मामेकं शरणं व्रज’ (१८/६६), तेरेसे और कुछ न हो तो एक मेरी शरणमें आ जा । ‘माम् एकम्’ का अर्थ यह नहीं है कि भगवान् पाँच-सात हैं और उनमेंसे एककी शरण आ जा, प्रत्युत यहाँ इसका अर्थ हैअनन्य शरण । अर्जुनने कहा था कि मैं धर्मका निर्णय नहीं कर सकता‘धर्मसम्मूढचेताः’ (२/७), तो भगवान् कहते हैं कि तेरेको धर्मका निर्णय करनेकी जरूरत नहीं है, तू सम्पूर्ण धर्मोंका आश्रय छोड़कर एक मेरी शरणमें आ जा‘सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज’ (१८/६६) । अतः ‘हे नाथ ! मैं आपका हूँ और आप मेरे हो ।’ संसारकी कोई वस्तु, कोई प्राणी मेरा नहीं है और मैं किसीका नहीं हूँइस प्रकार भगवान्‌के शरण हो जायँ ।

यहाँ एक बात समझनेकी है कि संसारके लोग (माता-पिता, स्त्री-पुत्र आदि) आपसे न्याययुक्त आशा रखते हैं और आप उसको पूरी कर सकते हो तो उनकी वह आशा आप पूरी कर दो अर्थात् उनकी सेवा कर दो । केवल सेवा करनेके लिये ही मात्र संसारके साथ सम्बन्ध रखो । संसारसे लेनेके लिये सम्बन्ध मत रखो; क्योंकि संसारकी कोई भी वस्तु स्थायी नहीं है और आप स्थायी हैं । अतः संसारकी कोई भी वस्तु आपके साथ रहनेवाली नहीं है । इसलिये जितने आपके सम्बन्धी या कुटुम्बी कहलाते हैं, वे चाहे शरीरके नाते हों, चाहे देशके नाते हों, चाहे और किसी नाते हों, उनकी सेवा कर दो । कारण कि आपके पास जो वस्तुएँ हैं, वे उनकी हैं, उनके हककी हैं । उनका हक उनको दे दो । उनसे लेनेकी इच्छा रखोगे तो आपपर उनका ऋण हो जायगा । ऋण होनेसे मुक्ति नहीं होगी, कल्याण नहीं होगा । उनकी सेवा करनेसे कल्याण होगा । अतः संसारके साथ सम्बन्ध केवल उसकी सेवाके लिये ही रखना है, अपने लिये नहीं । सेवाके लिये सम्बन्ध रखोगे तो सब राजी हो जायँगे । कुटुम्बी नाराज तभी होते हैं, जब उनसे हम कुछ लेना चाहते हैं । अगर उनपर अपना हक न मानकर केवल उनकी सेवा ही करना चाहेंगे तो कोई नाराज नहीं होगा । अतः संसारमें रहनेका बढ़िया तरीका भी यही है और मुक्त होनेका तरीका भी यही है । दोनों हाथोंमें लड्डू हैं‘दुहूँ हाथ मुद मोदक मोरें’ अर्थात् संसार भी राजी हो जाय और परमात्मा भी प्रसन्न हो जायँ, जिससे आपका कल्याण हो जाय !

आपका उद्देश्य केवल परमात्माकी प्राप्ति करना है तो बस, परमात्माके शरण हो जाओ । संसारका आश्रय छोड़ दो । अपनी शक्तिके अनुसार संसारकी सेवा कर दो । सेवा करनेसे संसार राजी हो जायगा और प्रभुके चरणोंकी शरण होनेसे प्रभु प्रसन्न हो जायँगे तथा हमारा कल्याण स्वतः ही हो जायगा । अपने कल्याणके लिये नया उद्योग नहीं करना पड़ेगा । कितनी सरल और सीधी बात है ।

लेनेकी इच्छासे मनुष्यका संसारके साथ सम्बन्ध जुड़ता है और देनेकी इच्छासे सम्बन्ध टूटता हैयह बड़ी मार्मिक बात है । लेनेकी इच्छासे जोड़ा गया सम्बन्ध बाँधनेवाला होता है और देनेकी इच्छासे जोड़ा गया सम्बन्ध मुक्त करनेवाला होता है । इसलिये सेवा-समितिवाले मेला-महोत्सवमें सबका प्रबन्ध करते हैं, सबकी सेवा करते हैं । कोई बीमार हो जाय तो उसे कैम्पमें ले जाते हैं और उसका इलाज करते हैं, मर जाय तो दाह-संस्कार कर देते हैं, पर रोता कोई नहीं । जहाँ ‘सेवा करनेमात्रका सम्बन्ध होता है, वहाँ रोना नहीं होता । जहाँ कुछ-न-कुछ लेनेकी आशासे सम्बन्ध जुड़ा हुआ है, वहीं रोना होता है ।’ लेनेकी इच्छा ही गुणोंका संग है, जिससे जन्म-मरण होता है

कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु ॥

                                (गीता १३/२१) 


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