।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि–
आषाढ़ कृष्ण प्रतिपदा , वि.सं.–२०७०, सोमवार
मुक्ति और भक्ति

          भगवान्‌का अंश होनेसे जीवमात्रमें भगवान्‌के प्रति स्वतः एक आकर्षण विद्यमान है । यह सिद्धान्त है कि आकर्षण सजातीयतामें होता है; अतः अंशका अंशीकी तरफ स्वतः आकर्षण होता है; जैसे‒पृथ्वीका अंश होनेसे ऊपर फेंके गये पत्थरका स्वतः पृथ्वीकी तरफ (नीचे) आकर्षण होता है । जैसे भगवान्‌ और उनका अंश जीव‒दोनों अविनाशी है । परन्तु जब जीव अहम्‌के साथ अपना सम्बन्ध मान लेता है, शरीरमें मैं-मेरापन कर लेता है, तब यही आकर्षण संसारकी तरफ हो जाता है । वास्तवमें संसारकी तरफ शरीरका ही आकर्षण होता है; क्योंकि शरीर समष्टि संसारका अंश है; परन्तु शरीरसे तादात्मयके कारण जीव उस आकर्षणको अपना मानता है ।

जीवमें जो एक स्वतःसिद्ध आकर्षण है, वह भगवान्‌की तरफ होनेसे ‘प्रेम’ और संसारकी तरफ होनेसे ‘राग’ हो जाता है । संसारका आकर्षण (राग) भी बढ़ता रहता है*और भगवान्‌का आकर्षण (प्रेम) भी बढ़ता रहता है† । परन्तु दोनोंमें फर्क यह है कि अनित्य होनेसे संसारका आकर्षण भी अनित्य होता है और नित्य होनेसे भगवान्‌का आकर्षण भी नित्य होता है । इसलिये संसारका रस तो नीरसतामें बदल जाता है, पर प्रेमका रस सदा सरस ही रहता है । वह प्रेम-रस प्रतिक्षण बढ़ता ही रहता है, उसका कभी अन्त आता ही नहीं ! ‘दिने दिने नवं नवं नमामि नन्दसम्भवम् ।’

         एक मार्मिक बात है कि जैसे जीवका भगवान्‌की ओर आकर्षण है, ऐसे ही भगवान्‌का भी जीवकी ओर आकर्षण है‒‘सब मम प्रिय सब मम उपजाए’ (मानस ७/८६/२) । जीव तो संसारमें आकर्षण (राग) पैदा करके भगवान्‌से विमुख हो जाता है, पर भगवान्‌ कभी जीवसे विमुख नहीं होते । जीवके प्रति उनके प्रेममें कभी किंचिन्मात्र भी कमी नहीं आती; क्योंकि वे पूर्ण हैं । इस प्रेमके कारण ही भगवान्‌ जीवको निरन्तर अपनी ओर खींचते रहते हैं, उसको किसी भी अवस्था, परिस्थिति आदिमें टिकने नहीं देते ! कोई भी अवस्था, परिस्थिति नित्य नहीं रहती । जीव जिसको भी पकड़ता है, उसको भगवान्‌ छुड़ा देते हैं, यही भगवान्‌का जीवको अपनी ओर खींचना है । इतना ही नहीं, जीवको सांसारिक भोग और संग्रहसे स्वतः अरुचि, ग्लानि भी होती है; परन्तु हृदयमें भोग और संग्रहका महत्त्व होनेसे वह उनको पकड़े रखता है, छोड़ता नहीं । भगवान्‌ छुड़ाते रहते हैं और वह नया-नया पकड़ता रहता है ! आखिर भगवान्‌का अंश जो ठहरा !

        बच्चेका माँसे जितना प्रेम होता है, उससे भी बहुत प्रेम माँका बच्चेसे होता है । परन्तु बच्चा माँके प्रेमको पहचानता नहीं । अगर बच्चा माँके प्रेमको पहचान ले तो वह माँकी गोदीमें रो ही नहीं सकता ! अगर माँकी गोदीमें रोयेगा तो हँसेगा कहाँ ? ऐसे ही भगवान्‌का जीवसे कम प्रेम नहीं है । काकभुशुण्डिजी बालरूप भगवान्‌ श्रीरामके साथ खेलते-खेलते जब उनके पास आते हैं, तब भगवान्‌ हँसने लगते है और जब उनसे दूर चले जाते हैं, तब भगवान्‌ रोने लगते हैं‒‘आवत निकट हँसहिं प्रभु भाजत रुदन कराहिं’ (मानस ७/७७ क) । यह भगवान्‌का जीवके प्रति कितना प्रेम है ! परन्तु अपनेको शरीर माननेके कारण, संसारमें आकर्षण (राग) होनेके कारण जीव भगवान्‌के आकर्षण (प्रेम) को पहचानता नहीं । अगर वह भगवान्‌के प्रेमको पहचान जाय तो उसका संसारमें आकर्षण हो ही नहीं !

     (शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒ ‘जिन खोजा तिन पाइया’ पुस्तकसे
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              * न जातुः कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति ।
                     हविषा   कृष्णवर्त्मेव   भूय    एवाभिवर्धते ॥
                                                (श्रीमद्भा॰ ९/१९/१४; मनु॰ २/९४)

                     ‘जिमि प्रतिलाभ लोभ अधिकाई’ (मानस १/१८०/१; ६/१०२/१)

           † ‘प्रतिक्षणवर्धमानम्’ (नारद॰ ५४)

            प्रेम सदा बढ़िबौ करै, ज्यों ससिकला सुबेष ।
                  पै पुनो यामें नहीं,    ताते   कबहुँ   न  सेष ॥

 
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।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि–
ज्येष्ठ पूर्णिमा, वि.सं.–२०७०, रविवार
पूर्णिमा
गीताकी विलक्षण बात

(गत ब्लॉगसे आगेका)
         रतनगढ़के सन्त बखतनाथजी महाराजकी बात सुनी है । वे बड़े ऊँचे महात्मा थे । असमसे एक आदमी बढ़िया एरण्डी लाया और उनके पास रखकर बोला कि महाराज ! सरदीके समय इसको आप काममें लें । कुछ देरके बाद एक पण्डितजी आये । उन्होंने वह एरण्डी अपने हाथमें लेकर देखी और उसकी प्रशंसा करते हुए कहा कि महाराज ! यह कपड़ा तो बड़ा अच्छा है ! देखकर उसको रख दिया । जब पण्डितजी जाने लगे, तब महात्माने कहा कि इस एरण्डीको आप ले जाओ । पण्डितजी बोले कि महाराज ! यह तो आपके लिये आयी है । वह आदमी बड़े प्रेमसे आपके लिये लाया है; अतः आप रखें । महात्मा बोले कि नहीं पण्डितजी ! इसको आप ले जायँ । पण्डितजी बोले कि मैं कैसे ले जाऊँ ? यह तो आपकी ही है । महात्मा बोले कि यह हमारे कामकी नहीं है । आप बुरा मत मानना, आपको यह पसन्द आ गयी तो अब यह आपकी हो गयी ! पण्डितजीको लेनेमें बड़ा संकोच हुआ, पर महात्माने वह एरण्डी उनको जबर्दस्ती दे ही दी । कारण यह था कि पण्डितजीका उस एरण्डीमें मन चलनेसे वह उच्छिष्ट, अशुद्ध हो गयी, महात्माके कामकी नहीं रही । इसी तरह जिस वस्तुमें हमारा मन चल जाता है, हमारा राग हो जाता है, वह वस्तु अशुद्ध हो जाती है ।

      अपनी मानते ही वस्तु अशुद्ध हो जाती है और भगवान्‌की मानते ही वह शुद्ध और भगवत्स्वरूप हो जाती है । इसी तरह अपने-आपको भगवान्‌से अलग मानते ही हम अशुद्ध हो जाते हैं और भगवान्‌का मानते ही शुद्ध और भगवत्स्वरूप हो जाते हैं । वास्तवमें सब वस्तुएँ भगवान्‌की और भगवत्स्वरूप ही हैं । उनको हमने भगवान्‌से अलग और अपना मान लिया, यह हमारी भूल है । इस भूलको मिटाना है । इस भूलको मिटा दें तो शुभ-अशुभ कर्मोंका बन्धन मिट जायगा और ‘वासुदेवः सर्वम्’ का अनुभव हो जायगा ।

        प्रश्न‒हमारे किए हुए कर्मोंके फलस्वरूप जो वस्त्तु हमें मिलती है, वह हमारी ही तो हुई ! फिर उसको हम अपना क्यों न मानें ?

      उत्तर‒जिससे हमने कर्म किये, वह क्रियाशक्ति भी हमारी नहीं है और उसके फलस्वरूप मिलनेवाली वस्तु भी हमारी नहीं है । कारण कि क्रियाशक्ति और वस्तु‒दोनों ही भगवान्‌से मिली हुई हैं और बिछुड़नेवाली हैं । शरीर कमजोर हो जाय, लकवा मार जाय तो हम क्या कर सकते हैं ? कर्मफल भी अपना नहीं है; अतः उसका भोग बाँधनेवाला है‒‘फले सक्तो निबध्यते’ (गीता ५/१२) । कर्म, कर्म-सामग्री, करनेकी योग्यता, बल आदि कुछ भी अपना नहीं है । इतना ही नहीं, कर्म करनेका विवेक भी अपना नहीं है, प्रत्युत भगवान्‌से मिला हुआ है ।

      जो वस्तु सदा हमारे साथ नहीं रह सकती और जिसके साथ हम सदा नहीं रह सकते, जिसपर हमारा आधिपत्य नहीं चलता, जो मिली है तथा बिछुड़नेवाली है, वह वस्तु अपनी कैसे हो सकती है ? कदापि नहीं हो सकती । जो वस्तु अपनी है ही नहीं, उसकी कामना कैसे होगी ? उसके त्यागका अभिमान भी कैसे आयेगा ? उसको अपना मान लिया‒यह बेईमानी थी । उसका त्याग कर दिया तो केवल अपनी बेईमानीका ही त्याग किया । इसमें अभिमान किस बातका ? बेईमानीके त्यागका नाम ही मुक्ति है ।

        जो वस्तु हमारी नहीं है, प्रत्युत दूसरेकी (भगवान्‌की) है और जो निरन्तर हमारा त्याग कर रही है, उसका भी त्याग अगर कठिन है तो फिर सुगम क्या है ? उसको अपना मानकर अपने पास रखनेमें ही कठिनता पड़ती है, उसका त्याग करनेमें क्या कठिनता है ? अगर ऐसा मानें कि त्याग करना कठिन है तो उसको अपने पास रखना असम्भव है । असम्भवकी अपेक्षा तो कठिन भी सुगम ही है । एक जवान लड़केने मुझे बताया कि ‘ हमारे मकानमें रहनेवाली एक युवा लड़की बार-बार कुचेष्टा करती थी, पर मैं कभी विचलित नहीं हुआ ! मैंने कहा कि ‘तुम बड़े जितेन्द्रिय हो’ तो वह बोला कि ‘मैं बड़ा जितेन्द्रिय हूँ‒यह बात नहीं है, प्रत्युत केवल इस बातसे मैं विचलित नहीं हुआ कि उस लड़कीपर मेरा हक नहीं लगता !’ अतः जिस वस्तुपर हमारा हक नहीं लगता, जो हमारी नहीं है, उसक हम अपना कैसे स्वीकार करें ? उसको अपना और अपने लिये स्वीकार करना बेईमानी है । सब दुःख, सन्ताप, नरक, जन्म-मरण आदि इस बेईमानीके ही फल हैं । इस बेईमानीके कारण ही संसार दुःखदायी होता है, जो कि वास्तवमें भगवत्स्वरूप ही है । अगर इस बेईमानीका त्याग कर दें अर्थात्‌ एक भगवान्‌के सिवाय अन्य किसको भी अपना न मानें तो ‘वासुदेवः सर्वम्’ का अनुभव हो जायगा ।

नारायण ! नारायण !! नारायण !!!

‒ ‘सब जग ईश्वररूप है’ पुस्तकसे

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।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि–
ज्येष्ठ शुक्ल चतुर्दशी, वि.सं.–२०७०, शनिवार
गीताकी विलक्षण बात


(गत ब्लॉगसे आगेका)
अन्नकूटका प्रसाद होता है, उसमें रसगुल्ला भी होता है और करेलेका साग भी होता है । एक मीठा है, एक कड़वा है, पर दोनों ही प्रसाद हैं । प्रसादमें स्वाद-दृष्टि नहीं रखी जाती, प्रत्युत स्वादमें प्रसाद-दृष्टि रखी जाती है*; क्योंकि प्रसाद इन्द्रियोंका विषय नहीं है, प्रत्युत भगवद्भावका विषय है । इसी तरह सम्पूर्ण पदार्थों और क्रियाओंको भगवान्‌को अर्पण कर दें तो वह सब ठाकुरजीका प्रसाद अर्थात्‌ भगवत्स्वरूप हो जायगा । कारण कि सब वस्तुएँ (क्रिया और पदार्थ) भगवान्‌की हैं तो वस्तुओंमें और भगवान्‌में कोई फर्क नहीं हुआ । जैसे धन धनवान्‌का है तो धनमें और धनवान्‌में कोई फर्क नहीं है; क्योंकि धनके बिना धनवान्‌ नहीं है और धनवान्‌के बिना धन नहीं है (धन मिट्टीकी तरह है) । क्रिया और पदार्थ प्रकृतिका कार्य (संसार) है और प्रकृति भगवान्‌की शक्ति है । शक्ति और शक्तिमान्‌में एकता होती है । शक्तिके बिना शक्तिमान्‌ नहीं है और शक्तिमान्‌के बिना शक्ति नहीं है† । अतः भगवान्‌की होनेसे सब वस्तुएँ भगवत्स्वरूप ही हैं‒ ‘वासुदेवः सर्वम्’ ।

         ऐसा मान लें कि हम भगवान्‌के ही हैं, भगवान्‌के घरमें रहते हैं, भगवान्‌के ही घरका काम करते हैं, भगवान्‌का ही दिया हुआ प्रसाद पाते हैं और भगवान्‌के दिये हुए प्रसादसे भगवान्‌के जनोंकी सेवा करते हैं । इस बातको सब-के-सब मान सकते हैं । भाई हो या बहन हो, छोटा हो या बड़ा हो, समझदार हो या बेसमझ हो, पढ़ा-लिखा हो या अपढ़ हो, बीमार हो या स्वस्थ हो, किसी वर्णका हो, किसी आश्रमका हो, किसी वेशका हो, किसी देशका हो, किसी सम्प्रदायका हो सब-के-सब इस बातको मान सकते हैं अर्थात्‌ सम्पूर्ण क्रियाओं और पदार्थोंको तथा अपने-आपको भगवान्‌के समर्पित कर सकते हैं । इस प्रकार समर्पण करनेसे क्या होगा ? इसको भगवान्‌ बताते हैं‒
शुभाशुभफलैरेवं    मोक्ष्यसे     कर्मबन्धनैः ।
संन्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि ॥
                                                   (गीता ९/२८)
         ‘इस प्रकार मेरे अर्पण करनेसे जिनसे कर्मबन्धन होता है, ऐसे शुभ (विहित) और अशुभ (निषिद्ध) सम्पूर्ण कर्मोंके फलोंसे तू मुक्त हो जायगा । ऐसे अपनेसहित सब कुछ मेरे अर्पण करनेवाला और सबसे मुक्त हुआ तू मेरेको प्राप्त हो जायगा अर्थात्‌ मेरा ही स्वरूप हो जायगा ।’

        जैसे अग्निमें ठीकरी, पत्थर तथा काले-से-काला कोयला भी डाल दें तो वह अग्निस्वरूप होकर चमकने लग जायगा, ऐसे ही भगवान्‌के अर्पण करनेसे अर्पित वस्तु (क्रिया और पदार्थ) तथा अर्पक‒दोनों भगवत्स्वरूप होकर चमकने लग जायँगे ।

         एक अच्छे गृहस्थ सेठ थे । वे भगवान्‌के बड़े भक्त थे । उनका दर्शन करनेके लिये एक साधु उनके घर आये । साधु उनसे मिलकर बड़े प्रसन्न हुए । साधुने उनका परिचय पूछा तो सेठने बताया कि मैं भी ठाकुरजीका हूँ और यह घर भी ठाकुरजीका है । सेठ साधुको अपना सब घर दिखाने लगे । साधुने पूछा‒यह मोटर किसकी हैं ? सेठ बोला‒ ठाकुरजीकी ! ये चीजें किसकी हैं ? ठाकुरजीकी ! ये किसके बच्चे खेल रहे हैं ? ठाकुरजीके ! यह स्त्री किसकी है ? ठाकुरजीकी ! ये लोग कौन है ? ठाकुरजीके ! पूरा मकान देखते-देखते ऊपर गये तो वहाँ मन्दिर था । यह मन्दिर किसका है ? ठाकुरजीका ! यह सामान किसका है ? ठाकुरजीका ! ये सोने-चाँदीके बर्तन किसके हैं ? ठाकुरजीके ! ये वस्त्र किसके हैं ? ठाकुरजीके । ये गहने किसके हैं ? ठाकुरजीके । साधुने ठाकुरजीकी तरफ संकेत करके पूछा‒ये किसके हैं ? सेठ बोला‒ये तो मेरे हैं‡ ! तात्पर्य है कि सब चीजें ठाकुरजीकी और ठाकुरजीके स्वरूप हैं, और ठाकुरजी हमारे हैं तो ठाकुरजीकी चीजें हमारी ही हुईं, पर ठाकुरजीके द्वारा हमारी होनेसे वे महान्‌ शुद्ध हो गयीं ! और स्वतन्त्र हमारी होनेसे महान्‌ अशुद्ध हो गयीं !

    (शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒ ‘सब जग ईश्वररूप है’ पुस्तकसे
                                                             _____________________
               * प्रसादमें स्वाद्बुद्धिकी मुख्यता नहीं रखनी चाहिये । स्वाद आ जाय तो वह दोषी नहीं है, पर स्वाद लेना दोषी है । स्वादका ज्ञान होना दोष नहीं है, पर स्वादमें राग होना दोषी है ।
          
           † यहाँ ऐसा समझना चाहिये कि शक्तिमानके बिना शक्ति तो नहीं रहती, पर शक्तिके बिना शक्तिमान रह सकता है; परन्तु उसकी ‘शक्तिमान’ संज्ञा नहीं रहती; क्योंकि वह स्वतः स्वतन्त्र तत्त्व है । शक्ति स्वतन्त्र तत्त्व नहीं है ।

‡ तन भी तेरा मन भी तेरा, तेरा पिण्ड परान ।
सब कुछ तेरा तू है मेरा, यह दादू का ग्यान ॥
               
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।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि–
ज्येष्ठ शुक्ल त्रयोदशी, वि.सं.–२०७०, शुक्रवार
गीताकी विलक्षण बात

(गत ब्लॉगसे आगेका)
अर्पण करनेसे भगवान्‌की पुष्टि हो जायगी, उनका खजाना बढ़ जायगा, यह बात नहीं है । भगवान्‌ने आत्मने पद ‘कुरुष्व’ पदका प्रयोग किया है‒‘तत्कुरुष्व मदर्पणम्’ । तात्पर्य है कि हम अर्पण करके भगवान्‌का घाटा नहीं मिटाते हैं, प्रत्युत अपना ही घाटा, अपनी ही आफत मिटाते हैं अर्थात् अर्पण करनेका हमें ही फल मिलेगा, हमारा ही कल्याण होगा । अगर ठीक अर्पण किया जाय तो अर्पक, अर्पण, अर्पित वस्तु और अर्प्य‒चारों एक अर्थात्‌ भगवत्स्वरूप हो जायँगे । कारण कि अर्पक (अर्पण करनेवाला), अर्पणरूपी क्रिया, अर्पित वस्तु और अर्प्य (भगवान्‌)‒चारों तत्त्वसे एक परमात्मा ही हैं‒‘वासुदेवः सर्वम्’ ।

       ठाकुरजीको भोग लगाकर फिर प्रसाद पाते हैं तो करोड़पति-अरबपति सेठ भी प्रसाद लेनेके लिये हाथ फैलाते हैं और एक कणका भी मिल जाय तो खुश हो जाते हैं । क्या वे मिठाईके भूखे हैं ? अगर हम कहें कि मिठाई माँगते हैं, इनको दस रुपयेकी मिठाई लाकर दे दो तो वे नाराज हो जायँगे । कारण कि वे मिठाईके नहीं, प्रसादके भूखे हैं । ठाकुरजीके अर्पण करनेसे वह वस्तु प्रसाद हो गयी, महान्‌ पवित्र अर्थात्‌ भगवत्स्वरूप हो गयी ! इसी तरह हम सब कुछ भगवान्‌के अर्पण कर दें तो वह सब-का-सब प्रसाद हो जायगा । हम भोजन करें तो ठाकुरजीका प्रसाद, कपड़ा पहनें तो ठाकुरजीका प्रसाद, माताएँ-बहनें गहने पहनें तो ठाकुरजीका प्रसाद‒सब कुछ ठाकुरजीका प्रसाद अर्थात्‌ भगवत्स्वरूप हो जायगा ।
तुम्हहि निबेदित भोजन करहीं ।
प्रभु प्रसाद   पट  भूषन  धरहीं ॥
                                        (मानस, अयोध्या॰ १२९/१)
        भगवान्‌के अर्पण करनेका तात्पर्य है‒मेरापन छोड़ना । मेरापन करनेसे वस्तुएँ अपवित्र हो जाती हैं और मेरापन सर्वथा छोड़नेसे महान्‌ पवित्र अर्थात्‌ भगवत्स्वरूप हो जाती हैं । आस्तिक गृहस्थोंके घरोंमें ठाकुरजीका मन्दिर होता है और माताएँ-बहनें घरवालोंसे पूछती हैं कि आज ठाकुरजीके लिये क्या बनेगा ? यह हमारी हिन्दू-संस्कृतिकी सभ्यता है । रसोई भी अपने लिये नहीं बनाती, प्रत्युत ठाकुरजीके लिये बनाती है । गीता कहती है‒
भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात् ॥
                                                        (३/१३)
‘जो केवल अपने लिये ही पकाते हैं, वे पापीलोग पापका ही भक्षण करते हैं ।’

       अगर यह कहें कि आज ठण्डी ज्यादा है, इसलिये ठाकुरजीको गरमागरम हलवेका भोग लगाओ, और अपने मुँहमें पानी आता हो तो यह ठाकुरजीको भोग नहीं लगेगा; क्योंकि यह जूठन हो गया । परन्तु ठाकुरजीके लिये बनी हुई रसोईमें नमककी परीक्षा करनेके लिये थोड़ी चीज लेकर (रसोईके बाहर जाकर) चख भी लें तो वह रसोई जूठी नहीं होगी । इस प्रकार मनमें खानेकी हो तो न चखनेपर भी वह जूठन हो जाता है और मनमें खानेकी न हो तो नमककी परीक्षाके लिये चखनेपर भी वह जूठन नहीं होता; क्योंकि भावकी प्रधानता है । इसलिये अपने मनमें खानेकी न हो और ठाकुरजीको भोग लगाया जाय । फिर उसको ठाकुरजीका प्रसाद समझकर आनन्दपूर्वक पाया जाय ।

    (शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒ ‘सब जग ईश्वररूप है’ पुस्तकसे
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आजकी शुभ तिथि–
ज्येष्ठ शुक्ल द्वादशी, वि.सं.–२०७०, गुरुवार
गीताकी विलक्षण बात

(गत ब्लॉगसे आगेका)
जैसे चनेका आटा (बेसन) गेहूँ, बाजरी आदिके आटेसे भी फीका होता है, उसमें मिठास नहीं होती । उस आटेकी बूँदी बनाते हैं । फिर उस बूँदीको चीनीकी चाशनीमें डाल देते हैं । इससे वह मीठी बूँदी बन जाती है । वह बूँदी खानेमें बड़ी मीठी लगती है । उस बूँदीके आठ-दस दाने मुखमें लेकर कुछ देर चूसते रहें तो वह बिलकुल फीकी हो जाती है । कारण कि वह तो फीकी ही थी । उसमें जो मिठास थी, वह उसकी न होकर चीनीकी थी । इसी तरह संसार भी फीका है, अर्थात्‌ संसारका जो ‘है’-पना है, वह संसारका न होकर परमात्माका ही है । केवल रागके कारण ही संसारका ‘है’-पना दीखता है । परन्तु यह दृष्टान्त एकदेशीय है । कारण कि बूँदीको चूसनेसे उसकी मिठास तो निकल जाती है, पर फीका बेसन शेष रह जाता है । परन्तु परमात्माका अनुभव होनेपर संसारका संसाररूपसे अत्यन्त अभाव हो जाता है, कुछ भी नहीं बचता प्रत्युत परमात्मा ही बचते है‒‘शिष्यते शेषसंज्ञः’* ।
(२)
       संसारमें दो चीजें हैं‒पदार्थ और क्रिया । मात्र पदार्थ और क्रियाएँ भगवान्‌की हैं और भगवान्‌के ही स्वरूप हैं । इसलिये भगवान्‌ कहते हैं कि जितने भी पदार्थ हैं और जितनी भी क्रियाएँ हैं, उन सबको अपना न मानकर मेरे अर्पण कर दो‒
पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति ।
तदहं    भक्त्युपहृतमश्नामि     प्रयतात्मनः ॥
                                                     (गीता ९/२६)
       ‘जो भक्त पत्र, पुष्प, फल, जल आदि (यथासाध्य प्राप्त पदार्थ) को भक्तिपूर्वक मेरे अर्पण करता है, उस मेरेमें तल्लीन हुए अन्तःकरणवाले भक्तके द्वारा भक्तिपूर्वक दिये हुए उपहार (भेंट) को मैं खा लेता हूँ अर्थात्‌ अपनेमें मिला लेता हूँ‒एक कर देता हूँ ।’
यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत् ।
यत्तपस्यसि   कौन्तये   तत्कुरुष्व मदर्पणम् ॥
                                                     (गीता ९/२७)
        ‘हे कुन्तीपुत्र ! तू जो कुछ करता है, जो कुछ खाता है, जो कुछ यज्ञ करता है, जो कुछ दान देता है और जो कुछ तप करता है, वह सब मेरे अर्पण कर दे ।’

        धन, जमीन, मकान, कपड़े, गहने, अपना शरीर, माँ-बाप, स्त्री, बच्चे, भाई-बहन आदि जो कुछ है, सब-के-सब भगवान्‌के अर्पण कर दें । अर्पण करनेका अर्थ है‒उनमें मेरापन छोड़ दें । अर्पण करनेसे वस्तुएँ तो तोलाभर भी घटेंगी नहीं, पर अर्पक (अर्पण करनेवाला) निहाल हो जायगा । कारण कि अर्पित वस्तु भगवान्‌की और भगवत्स्वरूप ही थी । उसको अपना मानना अर्पककी गलती थी । अतः अर्पित करनेसे अर्पककी गलती, बेसमझी, आफत मिट जाती है । जैसे आहुति अग्निमें मिलकर अग्निरूप हो जाती है, ऐसे ही अर्पित वस्तु भगवान्‌में मिलकर भगवत्स्वरूप हो जाती है ।

     (शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒ ‘सब जग ईश्वररूप है’ पुस्तकसे
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           *गीतामें आया है‒‘यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन । ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा ॥ (४/३७) । यहाँ भी ऐसा समझना चाहिये कि अग्निसे लकड़ियाँ जलनेपर राख शेष रह जाती है, पर ज्ञानरूपी अग्निसे कर्म जलनेपर कर्म और कर्मफल (पदार्थमात्र) कुछ भी शेष नहीं रहता, प्रत्युत परमात्मतत्त्व ही शेष रहता है ।

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