(गत ब्लॉगसे आगेका)
प्रश्न‒माता-पिताने हमें जन्म देकर संसार-बन्धनमें डाल दिया, आफतमें डाल दिया; फिर हमारेपर उनका ऋण कैसे ?
उत्तर‒यह बात बिलकुल
गलत है । माता-पिताने तो मनुष्यशरीर देकर संसार-बन्धनसे, जन्म-मरणसे छूटनेके
लिये बड़ा भारी अवसर दिया है । माता-पिताने पुत्रको न तो बन्धनमें डाला है और न उनका
पुत्रको बन्धनमें, आफतमें डालनेका उद्देश्य ही है । वे प्रत्येक अवस्थामें, जाने-अनजाने सदा
पुत्रका भला ही चाहते हैं और भला ही करते हैं । परन्तु हम पदार्थोंमें, भोगोंमें, परिस्थितियोंमें, व्यक्तियोंमें
ममता करके उनसे सुख भोगनेकी इच्छासे ही बन्धनमें, आफतमें पड़ते हैं । तात्पर्य है
कि अपने सुखकी इच्छा, सुखका
भोग, सुखकी
आशाका त्याग करके यदि पुत्र माता-पिताकी सेवाको परमात्मप्राप्तिका साधन मानकर तत्परतासे
उनकी सेवा करे तो उसको संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद होकर परमात्माकी प्राप्ति हो जायगी
।
पुत्रको माता-पिताके
कर्तव्यकी तरफ दृष्टि डालनी ही नहीं चाहिये । उसे तो केवल अपना ही कर्तव्य देखना चाहिये
। जो अपने कर्तव्यको न देखकर माता-पिताके कर्तव्यको देखता
है वह अपने कर्तव्यसे च्युत हो जाता है अर्थात् कर्तव्य-पालनसे पतित हो जाता है ।
किसी भी शास्त्रमें किसीको भी माता-पिताके, गुरुजनोंके कर्तव्यको देखनेका
अधिकार नहीं दिया गया है । पहले मनुष्य किसीके कर्तव्यको नहीं देखते थे, प्रत्युत अपना
कर्तव्य देखते थे, अपने कर्तव्यका पालन करते थे, इसीसे वे जीवन्मुक्त, भगवद्भक्त होते
थे । अगर वे दूसरोंका कर्तव्य देखते, अपना ही स्वार्थ देखते तो आजकी
तरह ही मनुष्य-समुदाय होता । जिन्होंने केवल अपना कर्तव्य देखा है, उसका पालन किया
है, उन सन्त-महात्माओं, धर्मात्माओंको भारतकी जनता कितनी आदरदृष्टिसे देखती है
! अतः मनुष्यको अपने कर्तव्यका कभी परित्याग नहीं करना चाहिये ।
कर्तव्यके विषयमें
एक मार्मिक बात है कि केवल कर्तव्य समझकर उसका पालन करनेसे
सम्बन्ध-विच्छेद होता है; जैसे‒जो माता-पिताकी सेवा केवल
अपना कर्तव्य समझकर करते हैं, उनका माता-पितासे सम्बन्ध-विच्छेद
होता है, उनका माता-पिताके चरणोंमें प्रेम नहीं होता । परन्तु जो अपने शरीरको माता-पिताका
ही मानकर तत्परतासे आदर और प्रेमपूर्वक उनकी सेवा करते हैं, उनका माता-पितामें
प्रेम हो जाता है । जैसे मनुष्य भोजन करनेको, जल
पीनेको अपना कर्तव्य नहीं मानते, प्रत्युत प्राणोंका
आधार मानते हैं, ऐसे ही माता-पिताकी सेवाको प्राणोंका
आधार मानना चाहिये । उनकी सेवाको ही अपना जीवन मानना चाहिये, अपना
खास काम मानना चाहिये‒
सेवहि लखनु सीय रधुबीरहि
।
जिमि अबिबेकी
पुरुष सरीरहि ॥
(मानस, अयोध्या॰ १४२
। २)
इस
प्रकार माता-पिताकी सेवाको अपने प्राणोंका, जीवनका
आधार मानकर करनेसे ‘मैं’ और ‘मेरा’-पन
मिट जाता है; क्योंकि शरीरको माता-पिताका ही मानकर
उनकी सेवामें अर्पण करनेसे, शरीरपर अपना कोई
अधिकार न माननेसे अहंता-ममता नहीं रहती ।
(शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒ ‘गृहस्थमें
कैसे रहें ?’ पुस्तकसे
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