मेरा कुछ नहीं है, मुझे कुछ नहीं चाहिये और मुझे अपने लिये
कुछ नहीं करना है–ये तीन बातें शीघ्र उद्धार करनेवाली हैं ।
भगवान्का संकल्प हमारे कल्याणके लिये है । अगर हम अपना कोई
संकल्प न रखें तो भगवान्के संकल्पके अनुसार अपने-आप हमारा कल्याण हो जायगा ।
संसारका काम तो और कोई भी कर लेगा, पर अपने कल्याणका काम तो
खुदको ही करना पड़ेगा; जैसे–भोजन और दवाई खुदको ही लेनी पड़ती है ।
अपने कल्याणके लिये किसी नयी परिस्थितिकी
जरूरत नहीं है । प्राप्त परिस्थितिके सदुपयोगसे ही कल्याण हो सकता है ।
कल्याण क्रियासे नहीं होता, प्रत्युत भाव और
विवेकसे होता है ।
घरमें रहनेवाले सभी लोग अपनेको सेवक और
दूसरोंको सेव्य समझें तो सबकी सेवा हो जायगी और सबका कल्याण हो जायगा ।
भोगोंकी प्रियता जन्म-मरण देनेवाली और भगवान्की
प्रियता कल्याण करनेवाली है ।
अपना कल्याण चाहनेवाला सच्चे हृदयसे प्रार्थना करे तो भगवान्के दरबारमें उसकी सुनवायी जल्दी होती है ।
किसीका भी कल्याण होता है तो उसके मूलमें
किसी सन्तकी अथवा भगवान्की कृपा होती है ।
संसारमें सन्त-महात्माओंकी, उपदेश
देनेवालोंकी कमी नहीं है । परन्तु अपना कल्याण करनेमें खुदकी लगन, लालसा, मान्यता,
श्रद्धा ही काम आती है ।