शरीर-निर्वाहके लिये तो चिन्ता (विचार) करनेकी जरूरत ही
नहीं है, पर शरीर छूटनेके बाद क्या होगा–इसके लिये चिन्ता करनेकी जरूरत है ।
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जो होनेवाला है, वह होकर ही रहेगा और जो नहीं होनेवाला है,
वह कभी नहीं होगा, फिर चिन्ता किस बातकी ?
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हमें अपने लिये कुछ नहीं चाहिये; क्योंकि स्वरूपमें अभाव
नहीं है और शरीरको जो चाहिये, वह प्रारब्धके अनुसार पहलेसे ही निश्चित है, फिर चिन्ता
किस बातकी ?
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भगवान्की ओरसे हमारे निर्वाहका प्रबन्ध तो है, पर भोगका
प्रबन्ध नहीं है । इसलिये निर्वाहकी चिन्ता और भोगकी इच्छा नहीं करनी चाहिये ।
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भगवान् जो कुछ करते हैं और करेंगे, उसीमें मेरा हित है–ऐसा
विश्वास करके हर परिस्थितिकी प्राप्तिमें निश्चिन्त रहना चाहिये ।
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दुःख-चिन्ताका कारण वस्तुओंका अभाव नहीं है, प्रत्युत
मूर्खता है । यह मूर्खता सत्संगसे मिटती है ।
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मनुष्य ज्यों-ज्यों अपने शरीरकी चिन्ता छोड़ता है, त्यों-त्यों
उसके शरीरकी चिन्ता संसार करने लगता है ।
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भगवान्के भरोसे रहनेपर किसी प्रकारकी चिन्ता टिक ही नहीं
सकती ।
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जिसे नहीं करना चाहिये, उसे
करनेसे और जिसे करना चाहिये, उसे नहीं करनेसे चिन्ता और भय होते हैं ।
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भगवान् हमसे ज्यादा जानते हैं, हमसे ज्यादा समर्थ हैं और
हमसे ज्यादा दयालु है, फिर हम चिन्ता क्यों करें ?
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