।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि–
  मार्गशीर्ष शुक्ल प्रतिपदा, वि.सं.२०७६ बुधवार
          परम शान्तिका उपाय


मनुष्य केवल अपने अनुभवका आदर करे तो उसका काम बन जाय । अनुभव क्या है ? अपने पास जो चीज मिली है वह सब अपनी नहीं है । यह खास बात है । जो मिली हुई होती है वह अपनी नहीं होती है । इस बातपर विचार करें । ऐसा माननेसे ममता मिट जाती है । ममता ही नहीं; अहंता भी मिट जाती है । इस शरीरको भगवान्‌ने ‘इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रम्’ (गीता १३/१) । ‘इदम्’ (यह) कहा है । जो ‘यह’ होता है वह ‘मैं’ नहीं होता और जो ‘मैं’ होता है, वह ‘यह’ नहीं होता । ‘इदं शरीरम्’ कहकर आगे शरीरका विवेचन करते हैं‒

महाभूतान्यहंकारो    बुद्धिरव्यक्तमेव च ।
इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः ॥
                                   (गीता १३/५)

पाँच महाभूत, अहंकार, बुद्धि, इन्द्रियाँ तथा मन-प्रकृति-सहित सब ‘इदं शरीरम्’ के अन्तर्गत हैं । अतः यह शरीर ‘मैं’ नहीं हूँ ‒ इस बातको दृढ़तासे समझ लें ।

फिर प्रश्न उठता है कि यह शरीर मेरा है ? आप इस शरीरको जितना और जैसे चाहें रख सकते है क्या ? इसमें जो परिवर्तन चाहें कर सकते हैं क्या ? वृद्धावस्थाको रोक सकते हैं क्या ? इसे मौतसे बचा सकते हैं क्या ? यदि ये आपके हाथकी बात नहीं, तो फिर यह शरीर आपको कैसे ? अतः ममता और अहंकारको जीवित रहते हुए छोड़ दो ।

निर्ममो निरहंकारः स शान्तिमधिगच्छति ।
                                    (गीता २/७१)

इससे शान्तिको प्राप्त हो जाओगे । अहन्ता-ममताको नहीं छोड़ेंगे, तो भी ये तो छूटेंगे ही । ये ‘मैं’ पन और ‘मेरा’ पन रहेंगे नहीं । परन्तु आप इन्हें नहीं छोड़ेंगे तो अशान्ति, दुःख, सन्ताप और जलन होते रहेंगे । इस शरीरसे किये गये पाप तथा पुण्यके फल भोगनेके लिये अनेक जन्म लेने पड़ेंगे । इसलिये यदि आप यह स्वीकार कर लें कि शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि तथा अहम् मेरे नहीं है तो इनके द्वारा की गयी क्रिया भी आपकी नहीं होगी । इस बातको गीताने कहा है‒गुणा गुणेषु वर्तन्त (३/२८) अर्थात् गुण ही गुणोंमें बरत रहे हैं ।

प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः ।
अहंकारविमूढ़ात्मा   कर्ताहमिति  मन्यते ॥
                                   (गीता ३/२७)

वास्तवमें सब कर्म प्रकृतिके गुणोंद्वारा किये जाते हैं । परन्तु अहंकारसे मोहित अन्तःकरणवाला पुरुष (अज्ञानी) मैं कर्ता हूँ, ऐसा मान लेता है । तो क्या करना है ?


करना है‒‘नैव किंचित्करोमीति युक्तो मन्येत्’ ऐसा मान लेना कि कुछ नहीं करता हूँ, क्योंकि मैं जाननेवाला हूँ और ये सब जाननेमें आनेवाले हैं । इनसे होनेवाली क्रियाएँ मेरी कैसे हुई ?