अब आप विचार करें, इतना दान-पुण्य करनेपर भी युधिष्ठिरजीका यज्ञ उतना बड़ा नहीं
हुआ, जितना उस ब्राह्मणके द्वारा हुआ ।
अधिक दान देनेसे अधिक पुण्य हो जायगा‒यह बात है ही नहीं
। बहनोंके मनमें बहुत रहती है कि हमारे पास धन होगा तो ऐसा दान करूँगी, ऐसा
उद्यापान करूँगी, वैशाख नहाऊँगी, ऐसा करूँगी, वैसा करूँगी । न जाने कितने-कितने
मनोराज्य होते हैं ! बहनों ! आपके पास जितना है, उसके
अनुसार करो । मालपर जगात (टैक्स) लगती है । आपके पास माल नहीं तो जगात किस बातकी ?
आपके पास जितना है, उतना ही आपपर लागू होता है ।
सत्त सारु बाँटिये, ‘नापो’
कहत नरां ।
निपट नकारो न दीजिये, उणद देख घरां ॥
‘नापो कवि कहते हैं कि मनुष्यो ! अपनी
शक्तिके अनुसार दान दो । घरमें अभाव दिखकर किसीको साफ़ ‘ना’ मत कहो, प्रत्युत
कुछ-न-कुछ दे दो ।’
शक्तिके अनुसार दो तो वह बड़ा भारी दान हो जायगा
। महिमा वस्तुके सदुपयोगकी है । यह नहीं कि ज्यादा धन होगा तो हम दान-पुण्य करेंगे; तीर्थ, व्रत, यज्ञ आदि
करेंगे, बड़े-बड़े सत्संग-समारोह करेंगे; परन्तु क्या करें, हमारे पास पैसा नहीं है
! सज्जनो ! पैसा नहीं है तो आपपर दान, तीर्थ, व्रत, यज्ञ
आदि करना लागू ही नहीं होता । आप भी छोटे बालकसे उतनी ही आशा रखते हैं,
जितना वह कर सकता है । क्या भगवान् आप-जितने भी जानकर और दयालु नहीं हैं ? क्या
भगवान् आपकी शक्तिको नहीं जानते ? आपको उतना ही करना है, जितनी आपकी शक्ति है । आपके पास जो
योग्यता, परिस्थिति आदि है, उसका सदुपयोग करो तो कल्याण कम नहीं होगा ।
युधिष्ठिरजीसे उस ब्राह्मणका यज्ञ कम नहीं था । पासमें खानेको भी नहीं था; परन्तु
यज्ञ हो गया युधिष्ठिरजीके यज्ञसे बढ़कर !
ऐसी इच्छा न करें कि अधिक हो जाय तो अधिक करेंगे । जो पासमें है, उसीका अच्छे-से-अच्छा उपयोग
करो । प्राप्त परिस्थितिका बढ़िया-से-बढ़िया सदुपयोग करें तो वह काम छोटा
नहीं होगा, बड़े महत्त्वका हो जायगा । मैंने एक कथा सुनी है । वह किसी दाक्षिणात्य रामायणमें आती है, ऐसा सुना है ।
रामजी और रावणका आपसमें धमासान युद्ध हो रहा था । इतनेमें एक गिलहरी दोनों
हाथोंमें तिनका लेकर रामजीसे पास पहुँची और बोली कि मैं अभी रावणको मार दूँ !
भगवान् उसपर प्रसन्न हो गये । उसपर हाथ रखा, जिससे (अंगुलियाँके स्पर्शसे) वे
लकीरें हो गयीं । गिलहरीमें रावणको मारनेकी क्या ताकत है
? पर उससे अपना पूरा बल लगा दिया, जिससे भगवान् खुश हो गये ।
आप दूसरेके उद्धारके लिये अपनी पूरी शक्ति लगा
दें । भगवान् देखते हैं कि मामूली शक्ति होते हुए भी वह दूसरोंके उद्धारके लिये
चेष्टा करता है तो मैं कम-से-कम इसका उद्धार तो कर ही दूँ ! साधारण शक्तिवाला भी
जब अपनी पूरी शक्ति लगाकर दूसरोंके हितकी चेष्टा करता है, तो अच्छे-अच्छे सन्त
महात्माओंपर और भगवान्पर भी उसका असर पड़ता है ।
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