भगवान् कहते हैं‒ मनसा वचसा दृष्ट्या
गृह्यतेऽन्यैरपीन्द्रियैः । अहमेव न
मत्तोऽन्यदिति बुध्यध्वमञ्जसा ॥ (श्रीमद्भा॰ ११/१३/२४) ‘मनसे, वाणीसे,
दृष्टिसे तथा अन्य इन्द्रियोंसे जो कुछ ग्रहण किया जाता है, वह सब मैं ही हूँ ।
अतः मेरे सिवाय दूसरा कुछ भी नहीं है‒यह सिद्धान्त आप विचारपूर्वक शीघ्र समझ लें
अर्थात् स्वीकार कर लें ।’ तात्पर्य है कि चिन्मय
सत्तारूपसे केवल परमात्म-तत्त्व ही ग्रहणमें आ रहा है । कारण कि ग्रहण सत्ताका ही
होता है । जिसकी सत्ता ही नहीं, उसका ग्रहण कैसे होगा ? जब सबमें एक अविभक्त सत्ता
(‘है’) ही परिपूर्ण है, तो फिर उसमें मैं, तू, यह और वह‒ये चार विभाग कैसे हो सकते
हैं ? अहंता और ममता कैसे हो सकती है ? राग-द्वेष कैसे हो सकते हैं ? जिसकी सत्ता ही नहीं
है, उसको मिटानेका अभ्यास भी कैसे हो सकता है ? भगवान् कहते हैं‒ नासतो विद्यते भावो नाभावो
विद्यते सतः । (गीता २/१६) ‘असत्का भाव
विद्यमान नहीं है और सत्का अभाव विद्यमान नहीं है ।’ तात्पर्य है कि असत्की नित्यनिवृत्ति है और सत्की नित्यप्राप्ति है ।
नित्यनिवृत्तकी निवृत्ति और नित्यप्राप्तकी प्राप्तिमें क्या कठिनता और क्या
सुगमता ? क्या करना और क्या न करना ? क्या पाना और क्या खोना ? खोया कहे सो बावरा, पाया कहे सो कूर । पाया खोया कुछ नहीं,
ज्यों-का-त्यों भरपूर ॥ सर्वत्र परिपूर्ण चिन्मय
सत्तामें न देश है, न काल है, न वस्तु है, न व्यक्ति है, न अवस्था है, न परिस्थिति
है, न घटना है । उस सत्तामें न आना है, न जाना है; न जीना है, न मरना है; न लेना
है, न देना है; न करना है, न नहीं करना है; न समाधि है, न व्युत्थान है; न बन्धन
है, न मोक्ष है; न भोगेच्छा है, न मुमुक्षुता है; न बोलना है, न सुनना है; न पढ़ना
है, न लिखना है; न प्रश्न है, न उत्तर है । उसमें न कोई लाभ है, न हानि है; न कोई
बड़ा है, न छोटा है; न कुछ बढ़िया है, न घटिया है‒ किं भद्रं किमभद्रं वा
द्वैतस्यावस्तुनः क्रियत् । (श्रीमद्भा॰ ११/२८/४) ‘जब द्वैत नामकी
कोई वस्तु ही नहीं है, तो फिर उसमें क्या अच्छा और क्या बुरा ?’ अच्छा-बुरा, ठीक-बेठीक, विधि-निषेध‒यह सब मनुष्यलोककी मर्यादा है । मर्यादापर ठीक चलना मनुष्यका कर्तव्य है । मर्यादापर ठीक चलनेसे विवेकका आदर होता है और विवेकका आदरसे वह विवेक बोधमें परिणत हो जाता है । बोध होनेपर कुछ भी करना, जानना और पाना बाकी नहीं रहता अर्थात् मनुष्य कृतकृत्य, ज्ञातज्ञातव्य और प्राप्तप्राप्तव्य हो जाता है । |

