।। श्रीहरिः ।।

                                                                        


आजकी शुभ तिथि–
     ज्येष्ठ शुक्ल सप्तमी, वि.सं.२०७८ गुरुवार

      सबसे सुगम परमात्मप्राप्ति

भगवान्‌ कहते हैं‒

मनसा वचसा दृष्ट्या गृह्यतेऽन्यैरपीन्द्रियैः ।

अहमेव    मत्तोऽन्यदिति  बुध्यध्वमञ्जसा ॥

(श्रीमद्भा ११/१३/२४)

‘मनसे, वाणीसे, दृष्टिसे तथा अन्य इन्द्रियोंसे जो कुछ ग्रहण किया जाता है, वह सब मैं ही हूँ । अतः मेरे सिवाय दूसरा कुछ भी नहीं है‒यह सिद्धान्त आप विचारपूर्वक शीघ्र समझ लें अर्थात्‌ स्वीकार कर लें ।’

तात्पर्य है कि चिन्मय सत्तारूपसे केवल परमात्म-तत्त्व ही ग्रहणमें आ रहा है । कारण कि ग्रहण सत्ताका ही होता है । जिसकी सत्ता ही नहीं, उसका ग्रहण कैसे होगा ?

जब सबमें एक अविभक्त सत्ता (‘है’) ही परिपूर्ण है, तो फिर उसमें मैं, तू, यह और वह‒ये चार विभाग कैसे हो सकते हैं ? अहंता और ममता कैसे हो सकती है ? राग-द्वेष कैसे हो सकते हैं ? जिसकी सत्ता ही नहीं है, उसको मिटानेका अभ्यास भी कैसे हो सकता है ?

भगवान्‌ कहते हैं‒

नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः ।

(गीता २/१६)

‘असत्‌का भाव विद्यमान नहीं है और सत्‌का अभाव विद्यमान नहीं है ।’

तात्पर्य है कि असत्‌की नित्यनिवृत्ति है और सत्‌की नित्यप्राप्ति है । नित्यनिवृत्तकी निवृत्ति और नित्यप्राप्तकी प्राप्तिमें क्या कठिनता और क्या सुगमता ? क्या करना और क्या न करना ? क्या पाना और क्या खोना ?

खोया कहे सो बावरा,    पाया  कहे सो कूर ।

पाया खोया कुछ नहीं, ज्यों-का-त्यों भरपूर ॥

सर्वत्र परिपूर्ण चिन्मय सत्तामें न देश है, न काल है, न वस्तु है, न व्यक्ति है, न अवस्था है, न परिस्थिति है, न घटना है । उस सत्तामें न आना है, न जाना है; न जीना है, न मरना है; न लेना है, न देना है; न करना है, न नहीं करना है; न समाधि है, न व्युत्थान है; न बन्धन है, न मोक्ष है; न भोगेच्छा है, न मुमुक्षुता है; न बोलना है, न सुनना है; न पढ़ना है, न लिखना है; न प्रश्न है, न उत्तर है । उसमें न कोई लाभ है, न हानि है; न कोई बड़ा है, न छोटा है; न कुछ बढ़िया है, न घटिया है‒

किं भद्रं किमभद्रं वा द्वैतस्यावस्तुनः क्रियत् ।

(श्रीमद्भा ११/२८/४)

‘जब द्वैत नामकी कोई वस्तु ही नहीं है, तो फिर उसमें क्या अच्छा और क्या बुरा ?’

अच्छा-बुरा, ठीक-बेठीक, विधि-निषेध‒यह सब मनुष्यलोककी मर्यादा है । मर्यादापर ठीक चलना मनुष्यका कर्तव्य है । मर्यादापर ठीक चलनेसे विवेकका आदर होता है और विवेकका आदरसे वह विवेक बोधमें परिणत हो जाता है । बोध होनेपर कुछ भी करना, जानना और पाना बाकी नहीं रहता अर्थात्‌ मनुष्य कृतकृत्य, ज्ञातज्ञातव्य और प्राप्तप्राप्तव्य हो जाता है ।