।। श्रीहरिः ।।

‘वासुदेवः सर्वम’ का

साधन कैसे सिद्ध हो ?-२

( गत् ब्लॉगसे आगेका )

सन्तोंने कहा है—


हाथ काम मुख राम है, हिरदै साची प्रीत ।
दरिया गृहस्थी साध की, याही उत्तम रीत ॥


हाथसे काम करते रहें और मुखसे राम-राम करते रहें । इसके साथ ही भगवान् से बार-बार कहते रहें कि ‘हे नाथ ! मैं आपको भूलूँ नहीं’ । किसीको बुरा मत मानें । किसीको बुरा मान लिया तो समझें कि हमारा व्रत भंग हो गया ! अतः उसको प्रत्यक्ष अथवा मनसे नमस्कार करके क्षमा माँग ले । फिर भगवान् से प्रार्थना करें कि ‘हे नाथ ! मैं भूलूँ नहीं; हे प्रभो ! मेरा यह साधन सिद्ध हो जाय !’ एक साधु थे । उनको सत्संगमें कोई बात अच्छी लगती तो भगवान् से कह देते कि ‘महाराज ! यह बात आप अपने खजानेमें जमा कर लो, अगर मैं भूल जाऊँ तो मेरेको याद दिला देना’ । भगवान् के समान कोई मालिक नहीं, कोई नौकर नहीं, कोई मित्र नहीं ! अचानक बैठे-बैठे भगवान् की याद आ जाय तो यह समझकर बड़े खुश हो जाना चाहिए कि भगवान् मेरेको याद कर रहे हैं ! भगवान् ने मेरे ऊपर बड़ी कृपा कर दी ! मैं तो भूल गया था, पर भगवान् ने याद कर लिया, जिससे मेरेको भगवान् याद आ गए । इस प्रकार भगवान् की कृपाका आश्रय लेनेपर ‘वासुदेवः सर्वम्’ का साधन सुगम हो जायगा; क्योंकि ‘सब कुछ भगवान् ही हैं’ —यह बात कृपासे समझमें आती है, अपनी बुद्धिमानीसे, अपने उद्योगसे नहीं । उद्योग करनेसे तो कर्तृत्व आता है, जो इसके अनुभवमें बाधक है । आजतक जितने भी महात्मा हुए हैं, वे भगवत्कृपासे जीवन्मुक्त, तत्वज्ञ और भगवत्प्रेमी हुए हैं, अपने उद्योगसे नहीं । इसलिए साधकको उद्योगका आश्रय न लेकर भगवत्कृपाका ही आश्रय लेना चाहिए । शरीर-इन्द्रियोंकी सार्थकताके लिए उद्योग करना चाहिए, पर परमात्मतत्व उद्योगसाध्य नहीं है ।
—‘अमरताकी ओर’ पुस्तकसे


http://www.swamiramsukhdasji.org/swamijibooks/pustak/pustak1/html/amarta%20ki%20or/ch5_74.htm

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।। श्रीहरिः ।।
‘वासुदेवः सर्वम्’ की सिद्धि कैसे करें ?


प्रश्न—सब कुछ भगवान् ही हैं—ऐसा अनुभव करनेका साधन क्या है ? किस तरह इसकी सिद्धि होती है ?
उत्तर—अगर आप ‘वासुदेवः सर्वम्’ का अनुभव करना चाहते हैं तो बड़ी दृढधातासे इस बातको मान लें कि जिस शरीरको हम अपना मानते हैं, वह हमें संसारसे मिला है और छूट जायगा; अतः वह मेरा नहीं है । प्रत्यक्ष बात है कि शरीर जन्मसे पहले मेरा नहीं था और मृत्युके बाद मेरा नहीं रहेगा और अभी भी प्रतिक्षण मेरेसे अलग हो रहा है । जितनी उम्र बीत गयी, उतना तो शरीर हमसे अलग हो गया है, अब बाकी कितना रहा है, इसका पता नहीं । कर्मयोगकी दृष्टिसे शरीर संसारका है, ज्ञानयोगकी दृष्टिसे प्रकृतिका है और भक्तियोगकी दृष्टिसे परमात्माका है । शरीरको किसीका भी मानें, पर यह मेरा नहीं है—यह सर्वसिद्धान्त है । जो वस्तु मिली हुई है और बिछुड जायगी, वह अपनी कैसे हुई ? शरीर मिला हुआ है, बिछुड जायगा और निरन्तर बिछुड रहा है—ये तीनों बातें सन्देहरहित हैं ।


इस प्रकार शरीरको संसारका मानकर संसारकी सेवामें लगा दें और शरीर, मन, वाणीसे किसीका भी बुरा न चाहें तो ‘वासुदेवः सर्वम्’ का अनुभव हो जायगा । हमें वही सेवा करनी है,जिसको करनेकी हमारेंमें सामर्थ्य है और सेवा लेनेवाला हमारेसे न्याययुक्त सेवा चाहता है । जो हमारेसे अन्याययुक्त, शास्त्रविरुद्ध सेवा चाहता है, उसको नहीं करना है । हम ‘वासुदेवः सर्वम्’ का अनुभव करना चाहते हैं, तो अन्याययुक्त काम हम नहीं करें और न्याययुक्त काम भी उतना करें, जितनी हमारी शक्ति है । एक मार्मिक बात है कि भला करनेकी अपेक्षा बुरा न करना ( बुराईका त्याग ) बहुत ऊँची साधना है । भलाई करनेमें जोर आता है, पर बुराई न करनेमें कोई जोर नहीं आता । बुराई न करनेसे दो बातें होंगी—केवल भलाई करेंगे अथवा कुछ भी नहीं करेंगे । कुछ भी नहीं करनेसे परमात्मामें स्वतः स्थिति होती है; क्योंकि कुछ करनेसे ही संसारमें स्थिति होती है । भलाई करनेसे अभिमान आ सकता है, पर बुराई न करनेसे अभिमान आता ही नहीं । इसलिए बुराईका त्याग करें अर्थात् न बुरा करें, न बुरा सोचें और न बुरा कहें ।
भागवतमें ‘वासुदेवः सर्वम्’ का साधन बताया है—


विसृज्य स्मयमानान् स्वान् दृशं व्रिडां च दैहिकीम् ।
प्रणमेद् दण्डवद् भूमावाश्वचाण्डालगोखरम् ॥
( श्रीमद्भागवत ११/२९/१६ )

‘हँसी उड़ानेवाले अपने लोगोंको और अपने शरीरकी दृष्टिको भी लेकर जो लज्जा आती है, उसको छोडकर अर्थात् उसकी परवाह न करके कुत्ते, चाण्डाल, गौ एवं गधेको भी पृथ्वीपर लंबा गिरकर भगवद् बुद्धिसे साष्टांग प्रणाम करें ।’


जो भी प्राणी सामने आये, उसको साष्टांग प्रणाम करें । शरीरकी लज्जा आती हो तो उसको छोड़ दें और लोग हँसी उड़ाते हों उसकी परवाह मत करें; क्योंकि हमें उससे क्या मतलब ? हमें तो ‘वासुदेवः सर्वम्’ सिद्ध करना है । दृढ़ निश्चय हो जायगा तो ऐसा करनेमें कठिनता नहीं होगी । अगर कठिनता लगती हो तो मनसे ही दण्डवत् प्रणाम कर लें । ऐसा कोई प्राणी न छूटे, जिसको नमस्कार न किया हो । किसी भी वर्ण, आश्रम, जाति, धर्म, सम्प्रदायका मनुष्य हो, वह भगवान् ही है । इसमें चार बातें है—१. इन प्राणियोंके भीतर भगवान् हैं, २. ये भगवान् के भीतर हैं, ३. ये भगवान् के हैं और ४. ये भगवान् ही हैं—ऐसा मानना सबसे सुगम है । अतः ऐसा मान लें कि ये भगवान् के हैं, भगवान् को प्यारे है, इसलिए हम इनको प्रणाम करते हैं । ऐसा करनेका परिणाम क्या होगा, यह भगवान् बताते हैं—


नरेष्वभीक्ष्णं मद्भावं पुंसो भावयतोऽचिरात् ।
स्पर्धाऽसूयातिरस्काराः साहङ्कारा वियन्ति हि ॥
(श्रीमद्भागवत ११/२९/१५ )


‘जब भक्तका सम्पूर्ण स्त्री-पुरुषोंमें निरन्तर मेरा ही भाव हो जाता है अर्थात् उनमें मुझे ही देखता है, तब शीध्र ही उसके चित्तसे ईर्ष्या, दोषदृष्टि, तिरस्कार आदि दोष अहंकार-सहित सर्वथा दूर हो जाते हैं ।’


इसलिए मनुष्यमात्रमें भगवान् का भाव रखें । कहीं भाव न हो सके तो मनसे माफ़ी माँग लें । किसीको कहनेकी, जनानेकी जरुरत नहीं । शरीर-मन-वाणीसे संसारकी सेवा करनी है और संसार भगवान् का विराट् रूप है । अतः भगवान् के ही शरीर-मन-वाणीसे भगवान् की ही सेवा करनी है । फिर ‘वासुदेवः सर्वम्’ सिद्ध हो जायगा; क्योंकि यह कोई नया निर्माण नहीं है, प्रत्युत पहलेसे ही है । इसके लिए विद्याध्ययन, धनसम्पत्ति, बल, अनुष्ठान आदिकी जरुरत नहीं है । इसको हरेक भाई-बहन कर सकता है ।

—‘अमरताकी और’ पुस्तकसे

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।। श्रीहरिः ।।
मुक्ति सहज है-३


‘मारहिं काल अचान चपेटकी होय घडीकमें राखकी ढेरी ।’ वह दिन अचानक आ जायेगा । कहाँ बैठे हो ? आप और हम मृत्युलोकमें बैठे हैं । यहाँ सब मरनेवाले, मरनेवाले ही रहते हैं । मरनेवालोंकी जमात है । कोई रहनेवाला दिखता है क्या आपको ? फिर आप अकेले कैसे रह जाओगे भाई ! सन्तोंने कहा है —



कोई आज गया कोई काल गया कोई जावनहार तैयार खड़ा ।
नहीं कायम कोई मुकाम यहाँ चिरकालसे ये ही रिवाज रही ॥



यहाँकी रिवाज यही रही है । अब रिवाज कैसे मिटा दोगे ? अनादिकालसे ऐसी रीति चली आ रही है ।
इस वास्ते सन्तोंने कहा है —



घर घर लाग्यो लायाणो घर घर दाह पुकार ।
जन हरिया घर आपणो राखे सो हुशियार ॥



क्या कृपा की है सन्तोंने ! आग लग जाती है न, घरोंमें ! उसे मारवाड़ी भाषामें ‘लायाणो लाग्यो’ कहते हैं । आग लग गयी । घर-घर आग लगी हुई है । ये शरीर हैं, ये सब मौतरूपी ‘आग’में जल रहे हैं । जैसे लकड़ी आगमें जलती है । ज्यों जलती है त्यों ही कम होती जाती है । ऐसे ही ये शरीर कालरुपी आगमें जल रहे हैं, उमर कम हो रही है । परन्तु दीखती है साबत । लकड़ी भी दीखती है साबत, पर जल रही है,कम हो रही है । ऐसे ही ये शरीर कालरूपी आगमें जल रहे हैं, भस्म हो रहे हैं तो ‘घर घर लाग्यो लायाणो घर घर डाह पुकार’ डाह हो रही है, पुकार हो रही है । ‘जन हरिया घर आपणो राखे सो हुशियार’ कैसे रखे ? कि भगवान् के सन्मुख हो जाय, प्रभुको पुकारें फिर मौज हो जाय, आनंद हो जाय ।



जिन सन्तोंके जीनेसे बहुत लोगोंका उद्धार हो जाय,जिनका नाम लेकर लोग सुखी हो जायँ, याद करके खुशी हो जायँ । ऐसे जितने सन्त हुए हैं उनकी वाणी याद करो । उसके अनुसार जीवन बनाओ तो निहाल हो जाओगे, कारण कि उन्होंने रास्ता सुलटा ले लिया । इस वास्ते वे ठेट पहुँच गये । आज दौड़ते तो सभी हैं, पर अंधे होकर चलते हैं । नाशवान् की तरफ चलते हैं । अरे ! अविनाशीकी तरफ चलो भाई ! नाशवान् की तरफ चलनेसे अविनाशी तत्व कैसे मिलेगा ? उत्पन्न-नष्ट होनेवाले पदार्थोंके पीछे पड़े हैं । इनसे निर्वाहमात्र कर लें । लेकिन भीतरसे यह ध्यान नहीं होना चाहिए कि पदार्थ ले लें, भोग ले लें, सुख ले लें । कुछ नहीं मिलेगा । उमर खत्म हो जायगी । समय बरबाद हो जायगा, पीछे पछताना होगा ।



सो परत्र दुख पावइ सिर धुनी धुनी पछिताइ ।
कालहि कर्महि ईश्वरहि मिथ्या दोष लगाइ ॥



भाई ! संसारकी तरफ न जा करके भगवान् की तरफ चलो । आजतक बहुत उमर चली गयी, बहुत समय चला गया, अब भी जा रहा है । प्रभुको पुकारो, ‘हे नाथ ! हे नाथ !! हे नाथ !!!’ भगवान् के नामका जप करो रात-दिन । संसारमें उपकार करो, सेवा करो । तनसे, मनसे, वचनसे, धनसे जो शक्ति, सामर्थ्य एवं योग्यता है । ये संसारकी चीज संसारको दे दो । यही मुक्ति है । आनंद हो गया, मौज हो गयी । शरीर मात्र संसारका और ये स्वयं मात्र परमात्माका । शरीर संसारको सौंप दें तो सब ठीक हो जायेगा । मुक्ति सहज ही हो जायगी ।



नारायण ! नारायण !! नारायण !!!

— ‘भगवत्प्राप्ति सहज है’ पुस्तकसे(दि.१६/०४/१९८३, मुरली मनोहर धोरा, बीकानेरके प्रवचनसे)
http://www.swamiramsukhdasji.org/swamijibooks/pustak/pustak1/html/bhagwatprapti%20sahaj%20hai/ch1_6.htm
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।। श्रीहरिः ।।
मुक्ति सहज है-२


जैसे कोयला काला होता है तो वह काला कब हुआ ? अग्रिसे अलग हुआ तब काला हुआ । अग्रिमें रहते हुए तो वह चमकता था । परन्तु अलग हुआ तो काला हो गया । अब इसे कोई धोवे, साफ करे तो इसका कालापन, साफ नहीं होता । इसके लिये आता है—‘कोयला हो नहीं उजला सौ मन साबुन लगाय ।’ सौ मन साबुन लगानेपर भी उजला नहीं होता तो कैसे हो ! कि यह जिसका अंश है, जिससे यह अलग हुआ है, उसी आगमें रख दिया जाय तो चमक उठेगा । पर आगका अंगार लेकर लाईन खींची जाय तो वह भी काली खीची जायगी । क्योंकि वह भी आगसे अलग हो गया । ऐसे यह जीव परमात्मासे अलग हुआ तब काला हुआ । अब उस कालेपनको धोनेके लिये साबुन लगाता है कि धन हो जाय, मान हो जाय, बड़ाई हो जाय, आदर हो जाय तो हम सुखी हो जायेंगे । इससे सुख नहीं होगा तो किससे सुख होगा ? यह अपने अंशी परमात्माको अपना मान लेगा तो सुखी हो जायगा, चमक उठेगा ।

आप थोड़ा-सा विचार करो तो पता चले कि लाखों-अरबों मनुष्योंमें से दो-चार मनुष्य भी सुखी हो गये क्या ? धनसे, मानसे, बड़ाईसे बड़े-बड़े मिनिस्टरी जिनके पास हैं, वे सुखी हो गये हैं क्या ? बड़े-बड़े धनियोंसे, बड़े-बड़े विद्वानोंसे आप एकान्तमें मिलो कि आप सुखी हो गये हैं क्या ? आपको कोई दुःख तो नहीं है । जो सच्चे हृदयसे परमात्मा लगे हैं उनको भी पूछो । तब आपको वास्तविकताका पता लग जायगा । जो ‘बाह्यस्पर्श’ है वे तो दुःखोंके कारण हैं । असली सुखकी प्राप्तिके लिये क्या करें ? भगवान् को पुकारो ‘हे नाथ ! हे नाथ ! हम तो भूल गये महाराज !’ भगवान् को याद दिला दो तो भगवान् कृपा कर देंगे फिर मौज हो जायगी ।
‘सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति ॥’ (गीता ५/२९)

प्राणिमात्रके सुहृद् परमात्माके रहते हुए हम दुःख पावें बड़े आश्चर्य की बात है । महान् आनन्दस्वरूप वे परमात्मा हमारे खुदके हैं कैसी मौजकी बात है । पर यह अपने परमात्माको छोड़कर परायोंसे प्रेम करता है । बच्चे आपसेमें खेलते हुए जब कोई किसीको मारपीट करता है, तब दौड़ करके माँके पास आता है तो माँकी गोदमें ही रहो ना ! मौजसे, आनन्दसे ! क्यों बाहर जावे ? ऐसे ही यह जीव भगवान् से विमुख होकर दुःख पाता है । इस वास्ते नाशवान् से विमुख हो जाय, क्योंकि भाई ! यह तो ठहरने वाला है नहीं । सन्तों ने कहा है ।

चाख सब छाड़िया माया रस खारा हो ।

नाम सुधा रस पीजिये छिन बारम्बारा हो ॥

हमने तो यह सब चख लिया; पर मायाका रस खारा है । मीठा तो भगवान् का नाम है । नाम लेकर पुकारो, ‘हे नाथ ! हे नाथ ! हे प्रभो !’ ऐसे प्रभुको पुकारो तो निहाल हो जाओगे । ‘शरणे आया बहुत सुख पायो’ इस प्रकार सन्तोंने कहा है । प्रभुके चरणोंके शरण होनेमें बड़ा सुख है । असली सुख है । असली सुखसे वञ्चित क्यों रहते हो ? सबके लिए खुला पड़ा है यह नामका खजाना । कैसा ही मनुष्य क्यों न हो ? ‘अपि चेत्सुदुराचारः’ पापी-से-पापी भी, दुष्ट-से-दुष्ट भी भगवान् के सन्मुख हो जाय ।

सन्मुख
होई जीव मोहि जबही । जन्म कोटि अघ नासहिं तबही ॥

करोड़ों जन्मोंके पाप नष्ट हो जा, क्योंकि पाप सब आगंतुक हैं और तुम परमात्माके हो । इस वास्ते परमात्माके हो जाओ । संसारकी सब चीजें मिट रही है अब उनको पकड़कर सुखी रहना चाहते हैं । तुम खुद रहनेवाले और यह सदा मिटनेवाला तो मिटनेवालेसे कबतक काम चलाओगे ? सोचते नहीं, विचार नहीं करते कि ऐसा सुख ले-लेकर कबतक काम चलाओगे भाई ! घरमें धान्य होता है तब तो रोजाना रोटी बनाओ मौजसे; परन्तु दूसरोंसे ले करके थोडा किसीसे लिया, थोडा किसीसे लिया, ऐसे काम कबतक चलेगा ?


सुख लेते समय यह तो सोचो कि लेकर करोगे क्या ? जिस शरीरके सुखके लिए तुम लेते हो वह शरीर तो प्रतिक्षण अभावमें जा रहा है बेचारा ! इसके लिए सुख पाना चाहते हो । बड़े आश्चर्यकी बात है ! वहम यह हो रहा है कि हम जी रहे हैं । सच्ची बात है कि हम मर रहे हैं, पर ऐसा कह दें किसीको तो नाराज हो जाय कि हमें मरनेकी बात कह दी । अरे भाई ! असली बात है कि हम हरदम मर रहे हैं । कल इस समय जितनी उम्र थी अब उतनी नहीं है । २४ घंटे उम्र कम हो गई । मृत्युका दिन २४ घंटे नजदीक आ गया और यूँ आते-आते चट आ जायेगा वह दिन । वह दिन पता नहीं है कब आ जाय ।
— ‘भगवत्प्राप्ति सहज है’ पुस्तकसे(दि.१६/०४/१९८३, मुरली मनोहर धोरा, बीकानेरके प्रवचनसे)

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।। श्रीहरिः ।।
मुक्ति सहज है

देखो, वस्तु, व्यक्ति और क्रिया—ये तीन चीजें दीखनेमें आती हैं । इनमें वस्तु और क्रिया—ये दोनों प्रकृति हैं और व्यक्त रूपमें जो दीखता है, यह शरीर भी प्रकृति ही है; परन्तु इसके भीतरमें जो न बदलने वाला है, यह परमात्मा अंश है । अब अगर ‘यह’ वस्तु, क्रिया और व्यक्तिमें नहीं उलझे, तो यह स्वाभाविक ही मुक्त है; क्योंकि ‘यह’ परमात्माका साक्षात् अंश है । इसके लिये कहा है—‘चेतन अमल सहज सुख रासी’—यह चेतन है, शुद्ध है, मलरहित है और सहज सुखराशि है, महान् आनन्दराशि है । यह महान आनन्दराशि अपने स्वरूपकी तरफ ध्यान न दे करके संसारके सम्बन्धके सुख चाहने लग गया । इससे यही भूल हुई है । यह संयोगजन्य सुखमें फँस गया । जैसे, धन मिले तो सुख हो, भोजन मिले तो सुख हो, भोग मिले तो सुख हो, कपड़ा, वस्तु, आदर, मान-सत्कार मिले तो सुख हो । यह बड़े आश्चर्यकी बात है कि स्वयं नित्य-निरन्तर रहने वाला है । ‘सहज सुख रासी’ स्वाभाविक ही सुखराशि है; परन्तु इसमें यह वहम पड़ गया है कि संसारके पदार्थ मिलनेसे सुख होगा । यह बिछुड़ेगा जरूर ही ‘संयोगा विप्रयोगान्ताः’ जितने संयोग होते हैं उनका अन्तमें वियोग होता है तो सम्बन्धसे होनेवाला सुख रहेगा कैसे ? मनुष्य यह विचार नहीं करता है कि आज दिनतक संयोगसे जितने सुख लिये थे वे आज नहीं रहे । संयोगसे होनेवाले सुखका नमूना तो देख ही लिया; लेकिन अब भी चेत नहीं करते फिर और चाहते हैं कि संयोगसे सुख ले लें ।


जबतक बाहरके संयोगके सम्बन्धसे सुख लेगा, तबतक इसकों वास्तविक सुख नहीं मिलेगा ‘बाह्यस्पर्शेव्षसक्तात्मा’ (गीता ५/२१) बाह्य सुख (संयोगजन्य सुख) में आसक्त नहीं होगा तो ‘विन्दत्यात्मनि यत्सुखम्’ उस विलक्षण सुखको आप-से-आप प्राप्त हो जायगा । संसारके सम्बन्धसे सुख लेनेसे इसका वास्तविक सुख गुम हो गया । वह सुख नहीं हैं; परन्तु यह उस सुखसे वियुक्त हो गया । जिनको वह सुख मिल गया वे आनन्दित हो गये । उनके कभी सांसारिक सुखकी इच्छा ही नहीं रहती । क्योंकि उनको जो वास्तविक सुख मिला, आनन्द मिला उसके समान कोई दूसरा सुख है नहीं । यह स्वयं सुखराशि होकर संयोगजन्य सुख चाहता है, सांसारिक सुखमें राजी होता है—यह बड़े भारी आश्चर्य की बात है । मिलने वाले व बिछुड़नेवाले सुखमें राजी होता है । आप ‘स्वयम्’ रहनेवाले हैं और यह सुख आने-जानेवाला है तो इस सुखसे कैसे काम चलेगा ?



आप रहनेवाले और आपके भीतर परमात्मा रहनेवाले हैं । रहनेवाले परमात्माके साथ रह जाओ तो सदाके लिये सुख मिल जाय । वह सुख कभी मिटेगा नहीं । उत्पन्न और नष्ट होनेवाले शरीरके साथ तथा संयोग और वियोग होनेवाले पदार्थोंसे सुख लेगा तो वह सुख कितना दिन रहेगा ? संतोंने कहा कि ‘ऐसी मूढ़ता या मनकी’ ऐसी मूढ़ता है इस मनकी । ‘परिहरि राम-भगति सुर-सरिता’ भगवान् की भक्ति गंगाजी है उसको छोड़ करके ‘आस करत ओस कनकी’ रात्रिमें ओस पड़ती है, घासकी पत्तीपर जलकी बूँदें चमकती हैं उस ओस-कणसे तृप्ति करना चाहता है । तात्पर्य हुआ भगवान् की भक्तिरूपी गंगाजी बह रही है उसको छोड़ करके ओस-कणके समान—धनसे सुख मिल जाय, स्त्रीसे सुख मिल जाय, पुत्रसे सुख मिल जाय, मानसे सुख मिल जाय, बड़ाईसे सुख मिल जाय, नीरोगतासे सुख मिल जाय आदि संयोगोंसे सुखको चाहता है । इन पदार्थोंमें सुख ढूँढ़ता है, इनके पीछे भटकता है—ये तो ओसकी बूँदें है भाई ! तरह-तरह की चमकती हैं । थोड़ा-सा सूर्य चढ़ा कि खत्म हो जायँगी, सूख जाएँगी तो इनसे तृप्ति कैसे हो जायगी ? ओसके कणोंसे प्यास कैसे बुझेगी ? ‘ऐसी मूढ़ता या मनकी’ तो भाई ! सच्चा सुख चाहते हो उन परमात्माकी तरफ चलो, उनके साथ सम्बन्ध मानो ।

— ‘भगवत्प्राप्ति सहज है’ पुस्तकसे(दि.१६/०४/१९८३, मुरली मनोहर धोरा, बीकानेरके प्रवचनसे)

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।। श्रीहरिः ।।
तत्वज्ञानका सहज उपाय-३

एक प्रकाश्य (संसार) है और एक प्रकाशक (परमात्मा) है अथवा एक ‘यह’ है और एक उसका आधार, प्रकाशक, अधिष्ठान ‘सत्ता’ है । अहम् न तो प्रकाश्य (‘यह’) में है और न प्रकाशक (सत्ता) में ही है, प्रत्युत केवल माना हुआ है । जिसमें संसार (‘यह’) की इच्छा भी है और परमात्मा (सत्ता) की इच्छा भी है, उसका नाम ‘अहम्’ है और वही ‘जीव’ है । तात्पर्य है कि जडके सम्बन्धसे संसारकी इच्छा अर्थात् ‘भोगेच्छा’ है और चेतनके सम्बन्धसे परमात्माकी इच्छा अर्थात् ‘जिज्ञासा’ है । अतः अहम् (जड-चेतनकी ग्रंथि) में जड-अंशकी प्रधानतासे हम परमात्माको चाहते है# । माने हुए अहम् का नाश होनेपर भोगेच्छा मिट जाती है और जिज्ञासा पूरी हो जाती है अर्थात् तत्व रह जाता है । वास्तवमें परमात्माकी इच्छा भी संसारकी इच्छाके कारण ही है । संसारकी इच्छा न हो तो तत्वज्ञान स्वतःसिद्ध है ।

साधनकी ऊँची अवस्थामें ‘मेरेको तत्वज्ञान हो जाय, मैं मुक्त हो जाऊँ’—यह इच्छा भी बाधक होती है । जबतक अंतःकरणमें असत् की सत्ता दृढ़ रहती है, तबतक तो जिज्ञासा सहायक होती है, पर असत् की सत्ता शिथिल होनेपर जिज्ञासा भी तत्वज्ञानमें बाधक होती है । कारण कि जैसे प्यास जलसे दूरी सिद्ध करती है, ऐसे ही जिज्ञासा तत्वसे दूरी सिद्ध करती है, जब कि तत्व वास्तवमें दूर नहीं है, प्रत्युत नित्यप्राप्त है । दूसरी बात, तत्वज्ञानकी इच्छासे व्यक्तित्व (अहम्) दृढ़ होता है, जो तत्वज्ञानमें बाधक है । वास्तवमें तत्वज्ञान, मुक्ति स्वतःसिद्ध है । तत्वज्ञानकी इच्छा करके हम अज्ञानको सत्ता देते है, अपनेमें अज्ञानकी मान्यता करते है, जब कि वास्तवमें अज्ञानकी सत्ता है नहीं । इसलिए तत्वज्ञान होनेपर फिर मोह नहीं होता —‘यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहम्’ (गीता ४/३५); क्योंकि वास्तवमें मोह है ही नहीं । मिटता वही है, जो नहीं होता और मिलता वही है, जो होता है ।
साधकको स्वतःस्वाभाविक एकमात्र ‘है’ (सत्ता) का अनुभव हो जाय —इसीका नाम जीवन्मुक्ति है, तत्वबोध है । कारण कि अन्तमें सबका निषेध होनेपर एक ‘है’ ही शेष रह जाता है । वह ‘है’ अपेक्षावाले ‘नहीं’ और ‘है’ —दोनोंसे रहित है अर्थात् उस सत्तामें ‘नहीं’ भी नहीं है और ‘है’ भी नहीं है । वह सत्ता ज्ञानस्वरूप है, चिन्मयमात्र है । वह सत्ता नित्य जाग्रत् रहती है । सुषुप्तिमें अहंसहित सब करण लीन हो जाते है, पर अपनी सत्ता लीन नहीं होती—यह सत्ताकी नित्यजागृति है । वह सत्ता कभी पुरानी नहीं होती, प्रत्युत नित्य नयी ही बनी रहती है; क्योंकि उसमें काल नहीं है । उस सत्तामात्रका ज्ञान होना ही तत्वज्ञान है और सत्तामें कुछ भी मिलाना अज्ञान है ।

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मैं सदा जीता रहूँ, कभी मरुँ नहीं—यह ‘सत्’ की इच्छा है; मैं सब कुछ जान लूँ, कभी अज्ञानी न रहूँ—यह ‘चित्’ की इच्छा है और मैं सदा सुखी रहूँ, कभी दुःखी न होऊ—यह ‘आनंद’ की इच्छा है । इस प्रकार सत्-चित्-आनंदस्वरूप परमात्माकी इच्छा जीवमात्रमें रहती है । परन्तु जड़से सम्बन्ध माननेके कारण उससे भूल यह होती है कि वह इन इच्छओंको नाशवान् संसारसे ही पूरी करना चाहता है; जैसे—वह शरीरको लेकर जीना चाहता है, बुद्धि लेकर जानकार बनना चाहता है और इन्द्रियोंको लेकर सुखी होना चाहता है।
-'साधन-सुधा-सिन्धु' पुस्तकसे
http://www.swamiramsukhdasji.org/swamijibooks/pustak/pustak1/html/sadhansudhasindhu/ch51_146.htm
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।। श्रीहरिः ।।

तत्वज्ञानका सहज उपाय-२


मनुष्य है, पशु है, पक्षी है, ईंट है, चूना है, पत्थर है—इस प्रकार वस्तुओंमें तो फर्क है, पर ‘है’ में कोई फर्क नहीं है । ऐसे ही मैं मनुष्य हूँ, मैं देवता हूँ, मैं पशु हूँ, मैं पक्षी हूँ—इस प्रकार मनुष्य आदि योनियाँ तो बदली हैं, पर स्वयं नहीं बदला है । अनेक शरीरोंमें, अनेक अवस्थाओंमें चिन्मय सत्ता एक है । बालक, जवान और वृद्ध—ये तीनों अलग-अलग हैं, पर तीनों अवस्थाओंमें सत्ता एक है । कुमारी, विवाहिता और विधवा—ये तीनों अलग-अलग हैं, पर इन तीनोंमे सत्ता एक है । जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति, मूर्च्छा और समाधि—ये पाँचों अवस्थाएं अलग-अलग हैं, पर इन पाँचों में सत्ता एक है । अवस्थाएँ बदलती हैं, पर उनको जाननेवाला नहीं बदलता । ऐसे ही मूढ़, क्षिप्त, विक्षिप्त, एकाग्र, और निरुद्ध—इन पाँचों वृत्तियों में फर्क पड़ता है, पर इनको जाननेवालेमें कोई फर्क नहीं पड़ता ।


यदि जाननेवाला भी बदल जाय तो इन पाँचोंकी गणना कौन करेगा ? एक मार्मिक बात है कि सबके परिवर्तनका ज्ञान होता है, पर स्वयंके परिवर्तनका ज्ञान कभी किसीको नहीं होता । सबका इदंतासे भान होता है, पर अपने स्वरूपका इदंतासे भान कभी किसीको नहीं होता सबके अभावका ज्ञान होता है, पर अपने अभावका ज्ञान कभी किसीको नहीं होता । तात्पर्य है कि ‘है’ (सत्तामात्र) में हमारी स्थित स्वतः है करनी नहीं है । भूल यह होती है कि हम ‘संसार है’—इस प्रकार ‘नहीं’ में ‘है’ का आरोप कर लेते हैं । ‘नहीं’ में ‘है’ का आरोप करनेसे ही ‘नहीं’ (संसार) की सत्ता दीखती है और ‘है’ की तरफ दृष्टि नहीं जाती । वास्तवमें ‘है में संसार’—इस प्रकार ‘नहीं’ में ‘है’ का अनुभव करना चाहिये । ‘नहीं’ में ‘है’ का अनुभव करनेसे ‘नहीं’ नहीं रहेगा और ‘है’ रह जायगा । भगवान् कहते हैं। नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः। (गीता २/१६)

‘असत् की सत्ता विद्यमान नहीं है अर्थात् असत् का अभाव ही विद्यमान है और सत् का अभाव विद्यमान नहीं है अर्थात् सत् का भाव ही विद्यमान है ।’एक ही देश काल वस्तु, व्यक्ति, अवस्था, परिस्थिति आदिमें अपनी जो परिच्छिन्न सत्ता दीखती है, वह अहम् (व्यक्तित्व, एकदेशीयता) को लेकर ही दीखती है । जबतक अहम रहता है, तभी तक मनुष्य अपनेको एक देश, काल आदिमें देखता है । अहम् के मिटने पर एक देश, काल आदिमें परिच्छिन सत्ता नहीं रहती, प्रत्युत अपरिच्छिन्न सत्तामात्र रहती है ।


वास्तवमें अहम है नहीं, प्रत्युत केवल उसकी मान्यता है । सांसारिक पदार्थोंकी जैसी सत्ता प्रतीत होती है, वैसी सत्ता भी अहम् की नहीं है । सांसारिक पदार्थ तो उत्पत्ति-विनाशवाले हैं, पर अहम् उत्पत्ति-विनाशवाला भी नहीं है । इसलिये तत्त्वबोध होने पर शरीरादि पदार्थ तो रहते हैं, पर अहम् मिट जाता है ।


अतः तत्त्वबोध होने पर ज्ञानी नहीं रहता, प्रत्युत ज्ञानमात्र रहता है । इसलिये आजतक कोई ज्ञानी हुआ नहीं, ज्ञानी है नहीं, ज्ञानी होगा नहीं और ज्ञानी होना सम्भव ही नहीं । अहम् ज्ञानीमें होता है, ज्ञानमें नहीं । अतः ज्ञानी नहीं है, प्रत्युत ज्ञानमात्र है, सत्तामात्र है । उस ज्ञानका कोई ज्ञाता नहीं है, कोई धर्मी नहीं है, मालिक नहीं है । कारण कि वह ज्ञान स्वयंप्रकाश है, अतः स्वयंसे ही स्वयंका ज्ञान होता है । वास्तवमें ज्ञान होता नहीं है, प्रत्युत अज्ञान मिटता है । अज्ञान मिटानेको ही तत्त्वज्ञानका होना कह देते हैं ।

—'साधन-सुधा-सिन्धु' पुस्तकसे

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।। श्रीहरिः ।।

तत्त्वज्ञानका सहज उपाय-१


हमारा स्वरूप चिन्मय सत्तामात्र है और उसमें अहम् नहीं है—यह बात यदि समझमें आ जाय तो इसी क्षण जीवनमुक्ति है ! इसमें समय लगनेकी बात नहीं है । समय तो उसमें लगता है, जो अभी नहीं और जिसका निर्माण करना है । जो अभी है, उसका निर्माण नहीं करना है, प्रत्युत उसकी तरफ दृष्टि डालनी है, उसको स्वीकार करना है जैसे—


संकर सहज सरूपु सम्हारा लागि समाधि अखंड अपारा
(रामचरितमानस, बालकाण्ड ५८/४)

दो अक्षर हैं—‘मैं हूँ’ । इसमें ‘मैं’ प्रकृतिका अंश है और ‘हूँ’ परमात्माका अंश है । ‘मैं’ जड़ है और ‘हूँ’ चेतन है । ‘मैं’ आधेय है और ‘हूँ’ आधार है । ‘मैं’ प्रकाश्य है और ‘हूँ’ प्रकाशक है । ‘मैं’ परिवर्तनशील है और ‘हूँ’ अपरिवर्तनशील है । ‘मैं’ अनित्य है और ‘हूँ’ नित्य है । ‘मैं’ विकारी है और ‘हूँ’ निर्विकार है । ‘मैं’ और ‘हूँ’ को मिला लिया—यही चिज्जडग्रन्थि (जड़-चेतन की ग्रन्थि) है, यही बन्धन है, यही अज्ञान है । ‘मैं’ और ‘हूँ’ को अलग-अलग अनुभव करना ही मुक्ति है तत्त्वबोध है । यहाँ यह जान लेना आवश्यक है कि ‘मैं’ को साथ मिलानेसे ही ‘हूँ’ कहा जाता है । अगर ‘मैं’ को साथ न मिलायें तो ‘हूँ’ नहीं रहेगा, प्रत्युत ‘है’ रहेगा । वह ‘है’ ही अपना स्वरूप है ।

एक ही व्यक्ति अपने बापके सामने कहता है कि ‘मैं बेटा हूँ’, बेटेके सामने कहता है कि ‘मैं बाप हूँ’, दादाके सामने कहता है कि ‘मैं पोता हूँ’, पोताके सामने कहता है कि ‘मैं दादा हूँ’, बहनके सामने कहता है कि ‘मैं भाई हूँ’, पत्नीके सामने कहता है कि ‘मैं पति हूं’, भानजेके सामने कहता है कि ‘मैं मामा हूँ’, मामाके सामने कहता है कि ‘मैं भानजा हूँ’ आदि-आदि । तात्पर्य है कि बेटा, बाप, पोता, दादा, भाई, पति, मामा, भानजा आदि तो अलग-अलग हैं, पर ‘हूँ’ सबमें एक है । ‘मैं’ तो बदला है, पर ‘हूँ’ नहीं बदला । वह ‘मैं’ बापके सामने बेटा हो जाता, बेटेके सामने बाप हो जाता है अर्थात् वह जिसके सामने जाता है, वैसा ही हो जाता है । अगर उससे पूछें कि ‘तू कौन है’ तो उसको खुदका पता नहीं है ! यदि ‘मैं’ की खोज करें तो ‘मैं’ मिलेगा ही नहीं, प्रत्युत सत्ता मिलेगी । कारण कि वास्तवमें सत्ता ‘है’ की ही है, ‘मैं’ की सत्ता है ही नहीं ।

बेटेकी अपेक्षा बाप है, बापकी अपेक्षा बेटा है—इस प्रकार बेटा, बाप, पोता, दादा आदि नाम अपेक्षासे (सापेक्ष) हैं; अतः ये स्वयंके नाम नहीं हैं । स्वयंका नाम तो निरपेक्ष ‘है’ है । वह ‘है’ ‘मैं’ को जाननेवाला है । ‘मैं’ जाननेवाला नहीं है और जो जाननेवाला है, वह ‘मैं’ नहीं है । ‘मैं’ ज्ञेय (जानने में आनेवाला) है और ‘है’ ज्ञाता (जाननेवाला) है । ‘मैं’ एकदेशीय है और उसको जानने वाला ‘है’ सर्वदेशीय है । ‘मैं’ से सम्बन्ध मानें या न मानें, ‘मैं’ की सत्ता नहीं है । सत्ता ‘है’ की ही है । परिवर्तन ‘मैं’ में होता है, ‘है’ में नहीं । ‘हूँ’ भी वास्तव में ‘है’ का ही अंश है । ‘मैं’ पनको पकड़नेसे ही वह अंश है । अगर मैं-पन को न पकड़ें तो वह अंश (‘हूँ’) नहीं है, प्रत्युत ‘है’ (सत्ता मात्र है) ‘मैं’ अहंता और ‘मेरा बाप, मेरा बेटा’ आदि ममता है । अहंता-ममतासे रहित होते ही मुक्ति है—
निर्ममो निरहंकारः स शान्तिमधिगच्छति ॥
(गीता २/७१)
यही ‘ब्राह्मी स्थिति’ है । इस ब्राह्मी स्थितिको प्राप्त होनेपर अर्थात् ‘है’ में स्थितिका अनुभव होने पर शरीरका कोई मालिक नहीं रहता अर्थात् शरीरको मैं—मेरा कहनेवाला कोई नहीं रहता ।

(शेष आगेके ब्लोगमें)

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।। श्रीहरिः ।।


जिन खोजा तिन पाइया-२


(गत ब्लॉगसे आगेका)

यह संसार दीखता है, इसमें अलग-अलग शरीर हैं । स्थूल, सूक्ष्म और कारण—ये तीन शरीर है । कोई स्थिर रहनेवाला (स्थावर) शरीर है, कोई चलने-फिरने वाला (जंगम) शरीर है । स्थिर रहनेवालोंमें पीपलका वृक्ष है, कोई नीमका वृक्ष है, कोई आमका वृक्ष है, कोई करीलका वृक्ष है । तरह-तरहके पौधे हैं, घास हैं । चलने-फिरने वालोंमें कई तरहके पशु-पक्षी, मनुष्य आदि हैं । ये सभी पृथ्वी पर हैं । पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश—ये पंच महाभूत हैं । इनसे आगे समष्टि अहंकार है । फिर महत्तत्त्व (समष्टि बुद्धि) है । महत्तत्त्वके बाद फिर मूल प्रकृति है । ये सब मिलकर संसार हैं । संसारके आदिमें भी परमात्मा हैं, अन्तमें भी परमात्मा हैं और बीचमें अनेक रूपसे दीखते हुए भी तत्त्वसे परमात्मा ही हैं ।

मनसा वचसा दृष्टया गृह्यतेऽन्यैरपीन्द्रियै: ।

अहमेव न मत्तोऽन्यदिति बुध्यध्वजमंज्जसा ॥
(श्रीमद्भागवत ११/१३/२४)

‘मनसे, वाणीसे, दृष्टिसे तथा अन्य इन्द्रियोंसे जो कुछ ग्रहण किया जाता है, वह सब मैं ही हूँ । अत: मेरे सिवाय दूसरा कोई भी नहीं है—यह सिद्धान्त आप विचारपूर्वक शीघ्र समझ लें अर्थात् स्वीकार कर लें ।’ देखने, सुनने और चिन्तन करनेमें जितना संसार आता है, वह मोहमूल ही है; क्योंकि उसकी वास्तविक और स्वतन्त्र सत्ता है ही नहीं—
‘देखिअ सुनिअ गुनिअ मन माहीं, मोह मूल परमारथु नाहीं’ ॥
(रामचरितमानस २/९२/४)

संसार पहले नहीं था, पीछे नहीं रहेगा, केवल बीचमें बना हुआ दीखता है । बनी हुई (बनावटी) चीज निरन्तर मिट रही है और स्वत: सिद्ध परमात्मतत्त्व ही अनेक रूपोंसे दीखता है । परमात्मतत्त्व एक होते हुए भी अनेक रूपोंसे दीखता है और अनेक रूपोंसे दीखने पर भी स्वरूपसे एक ही रहता है । कारण कि वह एक ही था, एक ही है और एक ही रहेगा । वह एक रूपसे दीखे तो भी वही है और अनेक रूपसे दीखे तो भी वही है । जलसे बने भाप, बादल, बर्फ आदि सब जल ही है, सोनेसे बने गहने सोना ही है, मिट्टीसे बने बर्तन मिट्टी ही है । इसी तरह जो अनेक रूपोंमें एक परमात्मतत्त्वको ही देखता है, वही तत्त्वज्ञ, जीवन्मुक्त, ज्ञानी-महात्मा होता है । कारण कि उसको यथार्थ ज्ञान हो गया, उसने परमात्माको तत्त्वसे जान लिया । तत्त्वसे जानते ही वह परमात्मामें प्रविष्ट हो जाता है—‘ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम्’ (गीता १८/५५) फिर एक तत्त्व ही शेष रह जाता है । परमात्मतत्त्व पहले एक था, पीछे एक रहेगा और अभी अनेक रूपोंसे दीखता है—ये तीनों बातें काल (भूत, भविष्य और वर्तमान) को लेकर हैं । परन्तु उस तत्त्वमें काल है ही नहीं । इसी तरह वहाँ न देश है, न क्रिया है, न वस्तु है, न व्यक्ति है, न घटना है, न परिस्थिति है, न अवस्था है । केवल एक अद्वैत तत्त्व है ।


-'साधन-सुधा-सिन्धु' पुस्तकसे


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।। श्रीहरिः ।।


जिन खोजा तिन पाइया

परमात्मतत्त्व अद्वितीय है। उपनिषद् में आया है-
सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम् ।
(छान्दोग्य. ६/२/१)
‘हे सोम्य ! आरम्भमें यह एकमात्र अद्वितीय सत् ही था’ ।
तात्पर्य है कि वह तत्त्व अद्वैत है । उस तत्त्वमें किसी भी तरहका भेद नहीं है । भेद तीन तरहका होता है—स्वगत भेद, सजातीय भेद और विजातीय भेद । जैसे, एक शरीरमें भी पैर अलग हैं, हाथ अलग हैं, पेट अलग हैं, सिर अलग हैं—यह ‘स्वगत भेद’ है । वृक्ष-वृक्षमें कई भेद हैं, गाय-गायमें अनेक भेद हैं—यह ‘सजातीय भेद’ है । वृक्ष अलग हैं और गाय, भैंस, भेंड़ आदि पशु अलग हैं—यह स्थावर और जंगम का भेद ‘विजातीय भेद’ है । परमात्मतत्त्व ऐसा है कि उसमें न स्वगत भेद है, न सजातीय भेद है और न विजातीय भेद है । परमात्मतत्त्वमें कोई अवयव नहीं है, इसलिये उसमें ‘स्वगत भेद’ नहीं है । जीव भिन्न-भिन्न होने पर भी स्वरूपसे एक ही हैं; अत: उसमें ‘सजातीय भेद’ भी नहीं है । वह परमात्मतत्त्व सत्तारूपसे एक ही है ।

जैसे, समुद्रमें तरंगें उठती हैं, बुदबुद पैदा होते हैं, ज्वार-भाटा आता है, पर यह सब-का-सब जल ही है । इस जलसे भाप निकलती है । वह भाप बादल बन जाती है । बादलोंसे फिर वर्षा होती है । कभी ओले बरसते हैं । वर्षाका जल बह करके सरोवर, नदी-नालेमें चला जाता है । नदी समुद्रमें मिल जाती है । इस प्रकार एक ही जल कभी समुद्र रूपसे, कभी भाप रूपसे, कभी बूँद रूपसे, कभी ओला रूपसे, कभी नदी रूपसे और कभी आकाशमें परमाणु रूपसे हो जाता है । समुद्र, भाप, बादल, वर्षा, बर्फ, नदी आदिमें तो फर्क दीखता है, पर जल तत्त्वमें कोई फर्क नहीं है । केवल जल-तत्त्वको ही देखें तो उसमें न समुद्र है, न भाप है, न बूँदें हैं, न ओले हैं, न नदी है, न तालाब है । ये सब जलकी अलग-अलग उपाधियाँ हैं । तत्त्वसे एक जलके सिवाय कुछ भी नहीं है । इसी तरह सोनेके अनेक गहने होते हैं । उनका अलग-अलग उपयोग, माप-तौल, मूल्य, आकार आदि होते हैं । परन्तु तत्त्वसे देखें तो सब सोना-ही-सोना है । पहले भी सोना था, अन्तमें भी सोना रहेगा और बीचमें अनेक रूपसे दीखने पर भी सोना ही है। मिट्टीसे घड़ा, हाँडी, ढक्कन, सकोरा आदि कोई चीजें बनती हैं । उन चीजोंका अलग-अलग नाम, रूप, उपयोग आदि होता है । परन्तु तत्त्वसे देखें तो उनमें एक मिट्टीके सिवाय कुछ भी नहीं है । पहले भी मिट्टी थी, अन्तमें भी मिट्टी रहेगी और बीचमें भी अनेक रूपसे दीखने पर भी मिट्टी ही है । इसी प्रकार पहले भी परमात्मा थे, बादमें भी परमात्मा रहेंगे और बीचमें संसार रूपसे अनेक दीखने पर भी तत्त्व से परमात्मा ही हैं—‘वासुदेव: सर्वम्।’
(शेष आगेके ब्लॉगमें)
'साधन-सुधा-सिंधु' पुस्तकसे
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दृढ़ भावसे लाभ

कहावत है कि ‘जिस गाँव में नहीं जाना है, उसका रास्ता क्यों पूछा जाय ?’ ऐसा दृढ़ भाव हो जाय कि ‘अपनी उम्रमें अमुक काम हमें नहीं ही करना है’ तो वह कार्य हो ही कैसे सकता है ? जैसे सिनेमा नहीं देखना है, तो नहीं ही देखना है । बीड़ी-सिगरेट आदि व्यसन नहीं करना है, तो नहीं ही करना है । चाय आज से नहीं पीना है, तो नहीं ही पीना है । समाप्त हुआ काम । अब झूठ नहीं बोलना है, तो झूठ बोलेंगे ही क्यों ? फिर झूठ निकल ही नहीं सकता । ऐसे ही प्रत्येक सद्गुण-सदाचारके ग्रहण और दुर्गुण-दुराचार के त्यागके लिये दृढ़ भाव बना लिया जाय तो यह भाव बहुत जल्दी बन सकता है और फिर वह अनायास ही आचरणमें भी आ सकता है ।

इसके लिये एक बहुत उपयोगी बात यह है कि हम अपनेको दृढ़प्रतिज्ञ बनावें । अर्थात् हरेक व्यवहारमें जो विचार कर लें, बस वैसा ही करें—यों करने पर विचारों की एक परिपक्वता हो जाती है, फिर संकल्प दृढ़ हो जाता है । इसी प्रकार जबानसे कह दें तो फिर वैसा ही करने की चेष्टा करें । बहुत ज्यादा दृढ़तासे कहें तो उसके पालनकी प्राणपर्यन्त चेष्टा करें । मर भले ही जायँ, पर अब तो करेंगे ऐसे ही । छोटे-छोटे कामोंमें इस प्रकार दृढ़ प्रतिज्ञताका स्वभाव बनानेकी चेष्टा करें तो हमारा स्वभाव सुधर जाता है । स्वभाव सुधरने पर फिर बड़ी-से-बड़ी बातें भी जो विचार कर लें, वे धारण हो जाती हैं । यह भाव-निर्माण तथा भाव-धारण-साधन बहुत सुगम है और बहुत ही श्रेष्ठ है ।

सेनामें लोग भरती होते हैं तो अपना नाम लिखा देते हैं और समझते हैं कि ‘हम तो सिपाही हो गये ।’ ऐसा भाव होने पर मन में स्वयं जिज्ञासा पैदा होती है कि सिपाही को क्या करना चाहिये । ऐसी जिज्ञासा होने पर शिक्षा दी जाती है और वह शिक्षा उनके धारण हो जाती है । ऐसे ही साधना करनेके लिये वैरागी पुरुष साधु बनता है, उसके मनमें आता है कि ‘मैं साधु बन गया’ तो ‘साधु को क्या करना चाहिये’—यह स्वयं उसके मनमें जिज्ञासा होती है । उसके बाद जब यह बताया गया है कि साधु का यह आचरण है, साधुको ऐसे बोलना, ऐसे उठना चाहिये, ऐसा आचरण करना चाहिये, यह व्यवहार करना चाहिये तो यह साधुताकी बात वह पकड़ लेता है; क्योंकि वह समझता है कि ‘मैं साधु हूँ, अत: मुझे अब साधुके अनुसार चलना ही है ।’ ऐसे ही अपने आपको साधक मान ले कि मैं तो भजन-ध्यान-साधन करने वाला साधक हूँ । जहाँ प्रवचनोंमें, ग्रंथोंमें यह बात आयेगी कि ‘साधकके लिये यों करना उचित है, साधकमें चंचलता नहीं चाहिये, उसे व्यर्थ समय नहीं गँवाना चाहिये, हर समय भगवत्-भजन, ध्यानादि करना चाहिये, कुसंग का त्याग करना चाहिये, सत्संग और स्वाध्याय करना चाहिये, आदि’— इस प्रकार साधकके लिये जो कर्तव्य बतलाये जायँगे, उन कर्तव्योंको वह अपनेमें लानेकी स्वत: ही विशेष चेष्टा करेगा; क्योंकि वह अपने-आपको साधक मानता है । अत: साधकके लिये जो बातें आवश्यक हैं वे उसमें आ जायँगी, धारण हो जायँगी; पर जो मनुष्य अपनेको साधक नहीं मानेगा, वह कोई बात चाहे सत्संगमें सुने, व्याख्यानमें सुने या ग्रन्थोंमें पढ़े, उसके हृदयमें वह विशेषतासे धारण नहीं होगी और उन बातोंके साथ उसका घनिष्ठ संबंध नहीं होगा ।

बहुत-से भाई-बहिन साधन करते हैं, जप-पाठ आदि नित्य-नियम करते हैं, परन्तु नित्य-नियमके साथ समझते हैं कि यह तो घंटे-डेढ़-घंटे करनेका काम है । शेष समयमें समझते हैं कि हम तो गृहस्थ हैं, हमें अमुक-अमुक काम करने हैं, हम अमुक घरके, अमुक जातिके, अमुक वर्णाश्रमके हैं । घंटे-डेढ़-घंटे भगवान् का भजन कर लेना है, गीतापाठ कर लेना है, कीर्तन कर लेना है । सत्संग प्रतिदिन मिल गया तो प्रतिदिन कर लिया । बारह महीनेसे मिल गया तो बारह महीनेसे कर लिया । सत्संग कर लिया, एक पारी निकल गयी । ऐसा भाव रहता है । इसलिये विशेष सुधार नहीं होता, वह उस सत्संगको ग्राह्य-दृष्टिसे नहीं देखता । ग्राह्य-दृष्टिसे देखने और साधारण कुतूहलनिवृत्ति-दृष्टिसे देखनेमें बड़ा अन्तर है । हम सत्संगको कुतूहलनिवृत्ति या मन बहलानेकी तरह सुनते हैं । अत: धारणा नहीं होता । इसलिये हमें सत्संगको—साधन को ग्राह्य-दृष्टिसे देखना चाहिये और ऐसा भाव रखना चाहिये कि हमें तो निरन्तर भगवान् का भजन-ध्यान ही करना है । जो कुछ कार्य करना है वह भी केवल भगवान् का ही और भगवान् के लिये ही करना है । इस दृष्टिसे भगवान् के नाते ही सब काम किये जायँ तो उससे महान् लाभ हो सकता है ।

—'एक साधे सब सधे' पुस्तकसे
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।। श्रीहरिः ।।


स्त्रीयोंके प्रति-२



मेरेको आश्चर्य होता है कि गर्भपात, नसबंधीके लिए प्रचार करती है, ऐसे ही बहनें प्रचार करती है कि गुरु बना लो । जिन्होंने गुरु बनाया है उसमें क्या विलक्षणता आयी है ? आप कोई बताओ ? अभिमान एक और बढ़ गया कि हमने गुरु बना लिया, तुमने नहीं बनाया । अभिमान खास पतनका कारण है । आसुरी संपत्ति है खास बंधनके लिए । आप तर्क करो हमारे सामने ! शास्त्रसे, युक्तिसे काटो हमारी बात ! अपना कल्याण करना है कि अभिमान बढ़ाना है ? नरकोमें जाना है ? बताओ क्या विचार है आपका ? कल्याण करनेका विचार है वह कभी अभिमान नहीं बढ़ाएगा । अभिमान छोडेगा, अहंकारका त्याग करेगा । अभिमान बढ़ाना है कि हमारा गायत्रीमें अधिकार है, हमारा ॐ में अधिकार है । इससे हम बड़े हो गए । तुम जिसको लेकर बड़े हो गए वह शरीर क्या है ? आश्चर्य आये ऐसी बात है । शरीर क्या है बताऊ ? यह मल-मूत्र बनानेकी मशीन है । भगवानको भोग लगे ऐसे बढ़िया-बढ़िया पदार्थ ले लो और विष्टा बना लो । गंगाजी, जमनाजीका पवित्र जल इसको पीला दो और पेशाब बना देगी ! बताओ; काटो, खंडन करो कोई भी ! उस शरीरमें अभिमान करना कि ‘मै बड़ा हूँ’, तो मल-मूत्रकी मशीनका अभिमान हुआ । इससे कल्याण, उद्धार होगा ? कभी संभव नहीं है ।

देखो एक मार्मिक बात बताऊ । वस्तु कोई अच्छी और खराब होती ही नहीं । सदुपयोग कल्याण करनेवाला है और दुरुपयोग पतन करनेवाला है । हरेक वस्तुका सदुपयोग करो । सदुपयोगकी महिमा है, दुरुपयोगकी निंदा है । उत्तरकाण्डमें काकभुशुण्डिजी और गरुड़जीका संवाद है । उसमें सात प्रश्न है, जिसमें पहला प्रश्न है कि सबसे दुर्लभ शरीर कौनसा है ? ध्यानसे सुनना कृपा करके ! तो उसका उत्तर दिया ‘सबसे दुर्लभ मानुष देही जीव चराचर जाचत जेही’ उस मनुष्य देहकी महिमा करते हुए आगे कहते है कि ‘नरक स्वर्ग अपवर्ग निसेनी, ज्ञान विराग भक्ति शुभ देनी’ । मनुष्य शरीरकी महिमामें पहला नंबर है नरक ! नरककी प्राप्तिका साधन है, तो यह महिमा हुई कि निंदा हुई ? मनुष्य शरीरका ऐसा फल है कि सीधा नरकोमें जाय । अगर इसका दुरुपयोग करेगा तो नरकोमें जायेगा । और सदुपयोग करेगा तो मुक्ति हो जायेगी । महिमा मानव शरीरकी नहीं है, महिमा सदुपयोगकी है । इस वास्ते चाहे भाईका शरीर हो चाहे बहनका शरीर हो, इसका सदुपयोग करो तो कल्याण हो जायेगा और दुरुपयोग करोगे तो नरक हो जायेगा । अधिकार पुरुषको ज्यादा दिया तो यह महेनत ज्यादा करे और जो मिले वह बहनोंको सुगमतासे मिल जाय । पति-पत्नी होते है तो पति जो शुभ काम करता है – संध्या करता है, गायत्री करता है, वेद पढता है, उसके धर्मका आधा अधिकार पत्नीको मिलता है । महेनत तो करे पुरुष और स्त्रीको मुफ्तमें मिले कल्याण । और स्त्री धर्म करें तो उसका आधा फल पतिको नहीं मिलता है, पर पाप करें तो पतिको फल भोगना पडता है । स्त्रीके किये हुआ पापका भागी पति होता है और पतिके धर्मका भाग लेती है पत्नी । धर्मपत्नी कहा है, पाप-पत्नी नहीं कहा है । धर्मका भाग लेती है मुफ्तमें, घर बैठे हुए । प्रत्यक्षमें देखो, कमाता पुरुष है और स्त्री मौजसे खाती है । पति पंडित हुआ और पत्नी पढ़ी हुई नहीं है पर पंडितानी कहलाती है । पढना एक अक्षर भी नहीं आता ! तो इससे अधिक अधिकार लेकर क्या कर लोगी ? माँ का दरज्जा श्रेष्ठ है, उतना पिताका नहीं है ।

हमने सुना है कि प्रणव पढ़ेगा और ॐ का ठीक उच्चारण ओम......ओम....ओम ऐसे करेगी तो गर्भपात हो जायेगा —यह बात मैंने सुनी है । तो अनर्थ होगा न ! आपका खास काम है गर्भ धारण करना उसमें बाधा होगी । अब आपको क्या कहूँ ? अन्नदाता हो आप हमारी ! हमें रोटी आपसे मिलती है, इनसे (पुरुष) नहीं मिलती है । आप सबको घरमें रोटी कौन खिलाता है ? आप जिससे जीते हो वह अन्न कौन देता है ? कमाकर आप लाते है पर सुधारकर आपके कामकी चीज बना देती है वरना रुपये खाओ, नोट चबा लो ! हमारे तो भाई ! इनसे भिक्षा मिलती है । फिर कृतघ्न क्यों होंगे ? ॐ, गायत्री, वेदोंका उच्चारण करना छोडो, राम-राम करो कल्याण हो जायेगा ।

कलकत्तेमें एक ब्राह्मणने मुझे बात पुछी कि कल्याण कैसे हो ? तो मैंने बताया कि भगवानके नामसे होता है, गायत्रीसे भी होता है । परन्तु मैंने एक बात कही, पंडितजीने काटी नहीं । मैंने कहा कि गायत्री जपोगे तो साथमें ब्राहमणपनेका अभिमान होगा और नाम-जप करोगे तो नम्रता, सरलता आ जायेगी । अंतःकरण निर्मल जितना रामनामसे होगा उतना गायत्रीसे नहीं होगा; शक्ति, तेज आ जायेगा । शाप-वरदान दे दोंगे । हम ब्राह्मण है—यह अभिमान होगा और अभिमानीका पतन होता है । आसुरी संपत्ति है —यह बात है महाराज ! इस वास्ते आपको अधिकार नहीं दिया तो शास्त्रने कृपाकी है, पति वेद, गायत्री पढ़े उसका आधा भाग आपको मुफ्तमें मिल जायेगा । यदि आप पापमें सम्मति देंगे तो आपको पाप होगा । इस वास्ते अधिकार तो केवल अभिमानके लिए है ।


—दि.२७/०१/१९९२, सायं ३ बजेके प्रवचनसे
सुनिए—
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स्त्रियोंके प्रति


श्रोता —‘ॐ’का उच्चारण स्त्रीको नहीं करना चाहिए, यह कहाँ तक उचित है ?
स्वामीजी —ठीक ही है । देखो, इसमें गहरे उतरके देखो तो केवल अभिमानके सिवाय कुछ तत्व नहीं है । जो अभिमान ‘संसृति मूल सूलप्रद नाना, सकल शोकप्रद अभिमाना’ । सिवाय अभिमानके कुछ तत्व नहीं है इस प्रश्नमें ! हमारे ‘ॐ’ का अधिकार चाहिए । आप अधिकार लेकर करोगे क्या ? अधिकारमें धिक्कार है । जो अधिकार लेकर उपकार नहीं करता उसके अधिकारमें ‘अ’ नहीं रहता, धिक्कार रहता है । अपना कल्याण करना है कि अधिकार करना है । खुब गहरी रीतिसे समझो । स्त्रियोंके लिए छूट दी गयी, इनका कल्याणतो ‘एक ही धर्म एक ही व्रत नेमा, काय वचन मन पतिपद प्रेमा’ । इससे घृणा हो रही है कि ऐसा क्यों कहा ? आजकलके सुधारक कहते है कि स्त्री जातिका शास्त्रोंने तिरस्कार किया । और गर्भ गिराने, कन्याका गर्भ गिरा देना । हमें तो समझमें नहीं आती यह बात । महान अनर्थ करते है, मातृशक्तिका नाश कर रहे है । हम सब जितने बैठे है, माँ से ही पैदा हुए है, माँ से ही पले है और पहला गुरु माँ ही है । उस शक्तिका ही नाश कर देना, कितनी कृतघ्नता है । उस नाशमें भी अधिकार ! हम तो अधिकार नहीं मानते है । जो ॐ का उच्चारण करनेसे फायदा होता है, उससे ज्यादा राम-रामसे भला होगा ।


कलकत्तेकी बात है, बहुत वर्षोंकी, साठ वर्ष हुए होंगे पूरा संवत याद नहीं है । उस समय प्रसंग चला था तो मैंने यह बात कही थी कि ॐ उच्चारण करना, गायत्री पढना इससे कल्याण होगा, वह कल्याण सुगमतासे हो जाय तो आपको क्या बाधा है ? शास्त्रोंमें लिखा है, विष्णुपुराणमें आता है और दूसरी जगह भी आता है । उसमें लिखा है कि कलियुगमें जितना कल्याण जल्दी होता है, और शुद्रोंका कल्याण जितना जल्दी होता है, स्त्रियोंका कल्याण जितना जल्दी होता है ; उतना दुसरोंका जल्दी होता ही नहीं । जो हमारे लिए आफत छुडाई है और कल्याणकी बात सुगमतासे बताई है उससे घृणा हो रही है । अभिमानके कारण कि हमारा अधिकार होना चाहिए । अरे ! अधिकारमें क्या पड़ा है ? कल्याण होना चाहिए । मुक्ति जितनी ब्राह्मणोंके लिए कठीन है उतनी क्षत्रियोंके लिए नहीं है । देखो गीताजीकी एक बात बताऊ आपको । ब्राह्मणके लिए नौ धर्म बताये है, ‘शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च । ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम्’ ॥ (गीता १८/४२), क्षत्रियके लिए सात—‘शौर्यं तेजो धृतिदाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम् । दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम्' ॥ (गीता १८/४३), वैश्य-बनियोंके लिए तीन —कृषी, गौरक्षा और व्यापार और शूद्रोंके लिए एक ‘परिचर्यात्मकं’, सेवा (गीता १८/४४) । ब्राह्मणका नौ धर्म पालन करनेसे जो कल्याण होगा,वही शुद्रको एक धर्मका पालन करनेसे हो जायेगा । ‘स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः’(गीता १८/४५), अपने–अपने कर्मका निष्ठापूर्वक पालन करनेसे कल्याण हो जायेगा । कितनी सुगमता बताई ! और स्त्रीके लिए तो ‘एक ही धर्म एक ही व्रत नेमा,काय वचन मन पतिपद प्रेमा’ । इसमें आज बात उठाते है कि शास्त्रोंमें स्त्रीका तिरस्कार किया गया, बड़ा अपमान किया गया ! अरे आप मातृशक्ति हो ! गर्भ गिरना —यह सम्मान है स्त्री जातिका ? महान अपमान है, स्त्री जातिकी घृणा है, पर ‘विनाश काले विपरीत बुद्धि’ ।

स्त्रियोंको ॐ का उच्चारणका निषेध किया तो आफत ही छुड़ायी ! गायत्रीमें कितनी आफत है, तीन बार स्नान करो, अग्निहोत्र करना पडता है, वेद पढना पडता है । मनुजीने लिखा है कि स्त्रियोंके लिए पतिके घरमें रहना ही गुरुकुलका वास है और रसोई बनाना ही अग्निहोत्र है । कितनी सुगमता बतायी, सुगमतासे कल्याण हो जाय । आफतको चाहते हो कि हमारा अधिकार है ॐ का उच्चारण करनेका !

(शेष आगेके ब्लॉगमें)

—दि. २७/०१/१९९२, सायं ३ बजेके प्रवचनसे
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।। श्रीहरिः ।।

किसके भरोसे बैठे हो ?

विशेष कामकी, साधनकी बात है, जिससे अपना उत्थान हो जाय । नामकी महिमा जो जप करनेसे समझमें आती है वह पढने, कहने,सुननेसे नहीं आती है । भोजनकी महिमा जो भोजन करनेसे समझमें आती है ऐसी भोजनकी बातें करनेसे नहीं आती । संसार परिवर्तनशील प्रत्यक्ष दिखता है, उसको भी नहीं मानते है; क्या करें ? आपके,हमारे शरीरको देखो तो कितना बदल गया ! और बदलता ही चला जा रहा है । बचपनमें मेरेको किसीने देखा हो और आज देखे तो पहचान ही नहीं सकता । संसार मात्र प्रतिक्षण बदलता है । केवल परिवर्तनका पुंज है, उसका नाम संसार है । ऐसी कोई क्षण नहीं है जिसमें बदलता न हो—यह बात है । इसमें निश्चिंत बैठे है, आश्चर्यकी बात है । एक क्षणका भी भरोसा नहीं है । न जाने किस समयमें श्वास निकल जाएँ । बहार जानेवाला श्वासका क्या विश्वास कि लौटके आएगा ? कुछ भरोसा नहीं है । यह रहेगा नहीं, रह सकता ही नहीं । वहम है कि हम जी रहे है । बिलकुल झूठी बात है, मर रहे है । प्रतिक्षण मर रहे है । इधर ध्यान ही नहीं है । कहते है, सुनते है पर इधर ख्याल ही नहीं है । अपनेको स्थायी मान रहे है, आश्चर्यकी बात है । झूठ, कपट, बेईमानी, धोखेबाजी, विश्वासघात करके धन इकठ्ठा कर रहे है । सुख भोगनेके लिए कितने-कितने अन्याय, पाप, अत्याचार कर रहे है । गीताजीमें कहा है —भोग और ऐश्वर्यमें आसक्त है वह परमात्मकी तरफ चल ही नहीं सकते है, जा नहीं सकते है ।
( दि.२७/०१/९२ दोपहर ३ बजेके प्रवचनका आंशिक भाग )
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।। श्रीहरिः ।।

समान वर्तावसे हानि


(गत ब्लोगसे आगेका)

खास सार बात है यह, करके देख लो आप ! राग-द्वेष मिटा दो फिर कोई बंधन हो तो हमें कहना । शरणानंदजीने कहा कि सबसे राग-द्वेष छोडकर यहाँ आकार बैठ जाओ । मुक्ति न हो तो फांसी लगादो हमको ! राग-द्वेष ही तो बंधन है । और क्या बंधन है ?


अब वर्णाश्रम तो मिटाओ और टोली बनाओ । यह कम्युनिस्ट है, यह सोश्यालिस्ट है । यह हिंदू परिषद है, यह मुस्लिम लीग है । नयी-नयी रचना करते है और जो बिलकुल ठीक है वर्णाश्रम, उसको तो मिटाओ और नयी-नयी पार्टीयों बनाओ । मैंने तो एक बार ऐसा व्याख्यान दिया कि पहले ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र चार वर्ण थे । तो चार वर्णमें राग-द्वेष होता है और अब पार्टीयों कितनी बनी है ।ब्राह्मणोंमें और चमारोंमें कभी लड़ाई हुई नहीं और पार्टीयोमें लड़ाई बिना रहे नहीं ।एक जगह कौरव-पाण्डवमें लड़ाई है तो राजपूत-राजपूत ही लड़ते थे । अब सभी लड़ते है । बोले कि एकता करेंगे तो ऐसा जोर लगाया कि एक-एक तार हो गए; मतलब सभी अलग-अलग हो गए । माँ औरको वोट दे, बाप औरको वोट दे और बेटा औरको वोट दे । बताओ सच्ची है कि झूठी है बात ? विपरीत आचरण करते है ।

‘करत कुसंग चाहत कुशल यही बडो अफ़सोस है ।
महिमा घटी समुद्रकी रावण बस्यो पड़ोस ॥’


रावणके पड़ोसमें रहनेसे समुद्र बंधा गया । स्वयं तो करते नहीं और कही हुई सुनते नहीं । सुनें तो समझे नहीं और समझें तो मानें नहीं । अब क्या करें ? उपाय बताओ आप । नयी-नयी आफत पैदा करते है ।गर्भ गिराओ, नसबन्धी करो । क्यों आफत करो, आपको भगवानसे बुद्धि ज्यादा है ? जो अरबों वर्षोंसे तो करते है ।

भागलपुरकी एक लडकी ऋषिकेशमें मिली । जवान लडकी बोली कि मेरेको कई लोग मिले कि तुम विधवा हो गई है, ब्याह कर लें । लड़कीने कहा कि यदि विधवा विवाह बढ़िया है तो आपकी माँ विधवा है उसीको परणा दें । बढ़िया बात है तो पहले अपनी माँ से शुरू कर और बुरा है तो मुझे नरकोमें क्यों डालता है । मुझे अच्छा लगा कि लड़कीने बढ़िया बात कही ! एक कहे कि बकरेको चढाते है (बलि) तो कल्याण हो जाता है । तो बकरियोंको स्वर्ग भेजता है तो अपने बापको भेजो । नियत तो खराब है और बातें अच्छी-अच्छी करते है ।
नारायण.........नारायण............नारायण...............नारायण


—दि.२७/०१/१९९२, प्रातः ५ बजे प्रार्थनाकालीन प्रवचनसे

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।। श्रीहरिः ।।

राग-द्वेष मिटाओ

परमात्मप्राप्तिके मार्गमें खास बाधक है राग और द्वेष । यह लुटेरे है । जब संसारमें राग-द्वेष नहीं हुआ तो भगवानके भजनमें शुरू कर दिया कि शंकरजी को नहीं मानेगे । जयश्रीकृष्ण कहेंगे पर जयशंकर नहीं कहेंगे, राम-राम कहेंगे तो अनाश्रय हो जायेगा ! श्रीकृष्ण शरणं मम्, जयश्रीकृष्ण ही कहेंगे ! खास नरकोंमें ले जानेवाली चीजोंको साथ रखेंगे । उपसनामें,भगवानके चिन्तनमें भी राग-द्वेष रखेंगे, तो नरकोमें जाओ !



बाधा केवल अपने मनकी ही होती है । दूसरी बाधा कोई है नहीं, होगी नहीं, हो सकती नहीं । ‘मेरे मनकी हो जाय’—यह खास बाधा है । मेरा कहना मानो, यह खास लड़ाई है । कोई अल्लाह ओ अकबर कहता है तो जैसे कोई सीताराम कहे वैसा ही आनंद अपनेको आना चाहिए । खुशी होनी चाहिए, वह अपनी भाषामें कह रहा है (उपासना कर रहा है) । कोई भी परमात्मतत्वकी प्राप्ति चाहता है तो किसी रूप, किसी नामसे उपासना करें; ठीक ही है । हमारेको द्वेष क्यों होना चाहिए ? हम कृष्ण-कृष्ण कहते है तो राम-राम कहनेकी जरुरत नहीं है, पर राम-राम सुनकर भी आनंद आना चाहिए कि हमारे प्रभुका ही नाम ले रहा है ! राम, माधव, मुकुंद, दामोदर भगवानके नाम है, ऐसे ही अल्लाह, अकबर परमात्माके नाम ही है । आनंद आना चाहिए, प्रसन्नता होनी चाहिए । ठीक है, अपनी-अपनी भाषामें सब पुकारते है ।
ह्रदयमें से राग-द्वेष आप किसी तरहसे मिटा दो । हिसाब करते है तो किसी तरहसे करो, टोटल ठीक आना चाहिए, ऐसे ही टोटलमें राग-द्वेष नहीं रहना चाहिए । ठीक-बेठीक, अनुकूलता-प्रतिकूलता, राग-द्वेष मिटा दो । किसी तरहसे, शास्त्ररीतिसे या कैसे भी ! बेडा पार ...
‘ज्ञेयः स नित्य सन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति’ ।
‘निर्द्वन्द्वो ही महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते’ ॥ (गीता ५/३)
गीताजीमें कहा है । निर्द्वन्द हो जायेगा तो सुखपूर्वक मुक्त हो जायेगा । मुक्ति तो स्वतः है, यह राग-द्वेषकी कल्पना करके ही बंधन हुआ है । और बंधन क्या है ? यह ठीक है-यह बेठीक है,यह अच्छा है-यह बुरा है, भला है-मंदा है —यही बंधन है । यह खाता उठा दो चित्तसे, मुक्ति हो जायेगी ! करके देख लो आप । उपाय कोई भी कर लो, उपायके लिए स्वतंत्र हो आप ।
गीता, रामायण, बाइबल, कुरानमें लिखा हो वैसा करो; मरजी आवे किसी तरहसे कर लो । इनके सिवाय भी मर्जी आवे कर लो टोटलमें राग-द्वेष, हर्ष-शोक नहीं रहना चाहिए । ‘यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति । शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्यः स मे प्रियः’॥ (गीता १२/१७) कितने ही पढ़ जाओ, विद्वान हो जाओ, वेदोंके जानकर हो जाओ पर हृदयमें राग-द्वेष होगा तो कल्याण नहीं होगा । ‘आचार हीनं न पुनाति वेदः’ । आचार क्या है ? राग-द्वेष आदि न होना । गीताजी सबको अच्छी क्यों लगती है ? क्योंकि गीतामें खास मुक्ति, कल्याणकी बात बतायी है । कोई आग्रह,द्वेष नहीं । हिंदू, मुस्लिम,बौद्ध, ईसाई हो कि जैन हो, यहूदी, पारसी कोई हो आप ; किसी तरहसे राग-द्वेष मिटा दो, बेडा पार ! तुम हिंदू बन जाओ, तुम मुसलमान बन जाओ, अपनी-अपनी टोली बनाते हो तो राग-द्वेष तो रखते हो । टोली बनाओगे तो राग-द्वेष रहेगा कि नहीं ? ‘मन चंगा तो कठोती गंगा’, अपना मन चंगा(भला) बनालो । सिवाय मौजके कोई बात नहीं है । केवल आनंद ही आनंद है ! स्वतः सिद्ध मुक्ति,आनंद है ।
(शेष आगेके ब्लोगमें, दि.२७/०१/१९९२ के प्रार्थनाकालीन प्रवचनसे)

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।। श्रीहरिः ।।


अमरताका अनुभव—२


गीतामें आया है—
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।

तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही।।
(गीता २/२२)

‘मनुष्य जैसे पुराने कपड़ोंको छोड़कर दूसरे नये कपड़े धारण कर लेता है, ऐसे ही देही पुराने शरीरोंको छोड़कर दूसरे नये शरीरोंमें चला जाता है।’
जैसे पुराने कपड़ोंको छोड़नेसे हम मर नहीं जाते और नये कपड़े धारण करनेसे हम पैदा नहीं हो जाते ऐसे ही पुराने शरीरको छोड़नेसे हम मर नहीं जाते और नया शरीर धारण करनेसे हम पैदा नहीं हो जाते । तात्पर्य है कि शरीर मरता है, हम नहीं मरते । अगर हम मर जायँ तो फिर पुण्य-पापका फल कौन भोगेगा ? अन्य योनियों में कौन जायगा ? बन्धन किसका होगा ? मुक्ति किसकी होगी ?शरीर नाशवान् है, इसको कोई रख सकता ही नहीं और हमारा स्वरूप अविनाशी है, इसको कोई मार सकता ही नहीं—
अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम् ।

विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति ।।
(गीता २/१७)
अविनाशी सदा अविनाशी ही रहेगा और विनाशी सदा विनाशी ही रहेगा । जो विनाशी है, वह हमारा स्वरूप नहीं है । हमने कुर्ता पहन लिया तो क्या कुर्ता हमारा स्वरूप हो गया ? हमने चादर ओढ़ ली तो क्या चादर हमारा स्वरूप हो गयी ? जैसे हम कपड़ोंसे अलग हैं ऐसे ही हम इन शरीरोंसे भी अलग हैं । इसलिए हमारे मनमें निरन्तर स्वतः यह बात रहनी चाहिये कि मैं मरनेवाला नहीं हूँ, मैं तो अमर हूँ । ‘अमर जीव मरे सो काया’ जीव अमर है, काया मरती है । अगर इस विवेकको महत्त्व दें तो मरनेका भय मिट जायगा । जब हम मरते ही नहीं तो फिर मरनेका भय कैसा ? और जो मरता ही है, उसको रखनेकी इच्छा कैसी ? हमारा बालकपना नहीं रहा तो अब हम बालकपनेको लाकर नहीं दिखा सकते ! क्योंकि वह मर गया, पर हम वही रहे । अतः शरीर सदा मरनेवाला है और मैं सदा अमर रहनेवाला हूँ—इसमें क्या सन्देह रहा ? अब केवल इस बातका आदर करना है इसको महत्त्व देना है, इसका स्वयं अनुभव करना है, कोरा सीखना नहीं है । जैसे धन मिल जाय तो भीतरसे खुशी आती है, ऐसे ही इस बातको सुनकर भीतरसे खुशी आनी चाहिये और जीनेकी इच्छा तथा मरनेका भय नहीं रहना चाहिये ! कारण कि जिस बातसे हमारा दुःख, जलन, सन्ताप, रोना मिट जाय, उसके मिलनेसे बढ़कर और क्या खुशीकी बात होगी ! ऐसा लाभ तो करोड़ों-अरबों रुपयोंके मिलनेसे भी नहीं होता। कारण कि अरबों-खरबों रुपये मिल जायँ और पृथ्वीका राज्य मिल जाय तो भी एक दिन वह सब छूट जाएगा, हमारे से बिछुड़ जायगा !

अरब खरब लौं द्रव्य है, उदय अस्त लौं राज ।

तुलसी जो निज मरन है, तो आवे किहि काज ।।

हम शरीरमें अपनी स्थिति मान लेते हैं, अपनेको शरीर मान लेते हैं तो यह हमारी गलती है । गलत बातका आदर करना और सही बातका निरादर करना ही मुक्तिमें खास बाधा है । अपनेको शरीर मानकर ही हम कहते हैं कि मैं बालक हूँ, मैं जवान हूँ, मैं बूढ़ा हूँ । वास्तवमें हम न बालक हुए, न हम जवान हुए, न हम बूढ़े हुए, प्रत्युत शरीर ही बालक हुआ, शरीर ही जवान हुआ, शरीर ही बूढ़ा हुआ । शरीर बीमार हो गया तो मैं बीमार हो गया, शरीर कमजोर हो गया मैं कमजोर हो गया, धन पासमें आ गया तो मैं धनी हो गया, धन चला गया तो मैं निर्धन हो गया—यह शरीर और धनके साथ एकता माननेसे ही होता है । जब क्रोध आता है, तब हम कहते हैं कि मैं क्रोधी हूँ ! विचार करें, क्या क्रोध सब समय रहता है ? सबके लिये होता है ? जो हरदम नहीं रहता और जो सबके लिये नहीं होता, वह मेरेमें कैसे हुआ ? कुत्ता घर में आ गया तो क्या वह घरका मालिक हो गया ? ऐसे ही क्रोध आ गया तो क्या मैं क्रोधी हो गया ? क्रोध तो आता है और चला जाता है, पर मैं निरन्तर रहता हूँ।

—‘अमरताकी और’ पुस्तकसे (पेज ५-९)


http://www.swamiramsukhdasji.org/swamijibooks/pustak/pustak1/html/amarta%20ki%20or/main.html

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।। श्रीहरिः ।।

अमरताका अनुभव—१



मनुष्यमात्रके भीतर स्वाभाविक ही एक ज्ञान अर्थात् विवेक है । साधकका काम उस विवेकको महत्त्व देना है । वह विवेक पैदा नहीं होता । अगर वह पैदा होता तो नष्ट भी हो जाता; क्योंकि पैदा होनेवाली हरेक चीज नष्ट होनेवाली होती है—यह नियम है । अतः विवेककी उत्पत्ति नहीं होती, प्रत्युत जागृति होती है । जब साधक अपने भीतर उस स्वतःसिद्धि विवेकको महत्त्व देता है, तब वह विवेक जाग्रत हो जाता है । इसीको तत्त्वज्ञान अथवा बोध कहा जाता है ।


मनुष्यतामात्रके भीतर स्वतः यह भाव रहता है कि मैं बना रहूँ, कभी मरूँ नहीं । वह अमर रहना चाहता है । अमरताकी इस इच्छासे सिद्ध होता है कि वास्तवमें वह अमर है । अगर वह अमर न होता तो उसमें अमरताकी इच्छा भी नहीं होती । जैसे, भूख और प्यास लगती है तो इससे सिद्ध होता है कि ऐसी वस्तु (अन्न और जल) है, जिससे वह भूख-प्यास बुझ जाय । अगर अन्न-जल न होता तो भूख-प्यास भी नहीं लगती । अतः अमरता स्वतःसिद्ध है । यहाँ शंका होती है कि जो अमर है, उसमें अमरताकी इच्छा क्यों होती है ? इसका समाधान है कि अमर होते हुए भी जब उसने अपने विवेकका तिरस्कार करके मरणधर्मा शरीरके साथ अपनेको एक मान लिया अर्थात् ‘शरीर ही मैं हूँ’—ऐसा मान लिया, तब उसमें अमरताकी इच्छा और मृत्युका भय पैदा हो गया ।


मनुष्यमात्रको इस बातका विवेक है कि यह शरीर (स्थूल, सूक्ष्म तथा कारणशरीर) मेरा असली स्वरूप नहीं है । शरीर प्रत्यक्ष रूपसे बदलता है । बाल्यावस्थामें जैसा शरीर था, वैसा आज नहीं है और आज जैसा शरीर है, वैसा आगे नहीं रहेगा । परन्तु मैं वही हूँ अर्थात् बाल्यवस्थामें जो मैं था, वही मैं आज हूँ और आगे भी रहूँगा । अतः मैं शरीरसे अलग हूँ और शरीर मेरेसे अलग है अर्थात् मैं शरीर नहीं हूँ—यह सबके अनुभवकी बात है । फिर भी अपनेको शरीरसे अलग न मानकर शरीरके साथ एक मान लेना अपने विवेकका निरादर है अपमान है, तिरस्कार है । साधकको अपने इस विवेकको महत्त्व देना है कि मैं तो निरन्तर रहने वाला हूँ और शरीर मरनेवाला है । ऐसा कोई क्षण नहीं है, जिसमें शरीर मरता न हो । मरनेके प्रवाहको ही जीना कहते हैं । वह प्रवाह प्रकट हो जाय तो उसको जन्मना कह देते हैं और अदृश्य हो जाय तो उसको मरना कह देते हैं । तात्पर्य है कि जो हरदम बदलता है, उसीका नाम जन्म है, उसीका नाम स्थिति है और उसीका नाम मृत्यु है । बाल्यवस्था मर जाती है तो वृद्धावस्था पैदा हो जाती है । इस तरह प्रतिक्षण पैदा होने और मरनेको ही जीना (स्थिति) कहते हैं । पैदा होने और मरनेका यह क्रम सूक्ष्म रीतिसे निरन्तर चलता रहता है । परन्तु हम स्वयं निरन्तर ज्यों-के-त्यों रहते हैं । अवस्थाओंमें परिवर्तन होता है, पर हमारे स्वरूपमें कभी किंचन्मात्र भी परिवर्तन नहीं होता । अतः शरीरतो निरन्तर मृत्युमें रहता है और मैं निरन्तर अमरतामें रहता हूँ—इस विवेकको महत्त्व देना है ।
(शेष आगेके ब्लॉगमें)

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।। श्रीहरिः ।।


क्रोधनाशका उपाय -२



(गत ब्लोगसे आगेका )
‘मेरेमें क्रोध है’ इस बातको कृपा करके छोड़ दो । भूतकालकी घटनासे अपनेको क्रोधी मान लेना —यह बड़ा अनर्थ है । क्रोध असाधन है, क्रोध विघ्नदायक है । क्रोध जब आ जाता है तब आदमीका विवेक नष्ट हो जाता है । क्रोध आते ही ‘क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः’ (गीता२/६३) । आपकी स्मृति नष्ट हो जाती है । मैं भगवानका हूँ, भगवानका भजन करता हूँ, मैं सत्संगी हूँ, मैं साधक हूँ —यह भूल जाता है । जिसके लिए मनुष्य जन्म मिला है और भजन–ध्यान करके परमात्मप्राप्ति चाहते है; उसको ही भूल गए तो कितना नुकसान हुआ ! ‘सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः’ गीताजी कहती है, बड़ी सच्ची बात है । दो बात हुई (१) हमारेमें क्रोध नहीं है और (२) क्रोधसे नुकसान होता है, इस वास्ते क्रोध हमें नहीं करना है ।
यह जो काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, विषमता आदि जितने दोष है; उनकी सत्ता नहीं है । मानो नित्य नहीं है, आगंतुक है । उनके स्वरुप पर विचार करो । उनकी स्वतंत्र सत्ता नहीं है —यह तीसरी बात याद कर लो । हमारेमें क्रोध कैसे नहीं है ? तो देखो सबके प्रति क्रोध होता है ? सब समयमें क्रोध होता है ? हरदम रहता है ? क्या क्रोधके सिवाय मेरेमें कुछ नहीं है ? सर्वथा आप क्रोधी हो ? अतः क्रोधकी सत्ता नहीं है । देखो ! मेरी बातें है, वह मुझे बड़े अच्छे संत-महात्माओंसे मिली है । उससे आपको जरुर लाभ होगा, पक्की बात कहता हूँ । आप करके देखो !
क्रोध आपमें और किसीमें भी नहीं है क्योंकि जहाँ जीवके स्वरुपके वर्णनमें कहा है ‘ईश्वर अंश जीव अविनाशी, चेतन अमल सहज सुखराशी’ । अपना विनाश नहीं होता तभी तो दोषोंको दूर करना है । ‘अमल’ —कोई दोष आपमें नहीं है । गोस्वामीजीकी वाणी पर विश्वास करो । भगवानकी वाणी ‘ममैवांशो जीवलोके’, बाप में होता हो तो बेटे में आवें ! ईश्वरमें यह दोष नहीं है । ‘क्रोधोऽपी शत्रु प्रथमः नराणाम् देहस्थितो देहविनाशनाय’ । क्रोधसे नुकसान, हानि होती है, आपको और दूसरों को भी । ‘नमोस्तुते क्रोधदेवाय स्वाश्रय ज्वालिने विषम’, क्रोधदेव आपको नमस्कार है । आप जहाँ आते हो, पहले अपने स्थानको जला देते हो । कितना कृतघ्न है । दुसरोंको तो बादमें जलावें, पहले आपको जलाता है । ‘जिस हांड़ीमें खावे उसीको फोड़े’ मारवाड़ी कहावत है । ऐसा दुष्ट है । जिस काष्ठ(लकड़ी)में अग्नि आवें, उसीको जला देती है । इस वास्ते इस क्रोधको छोडना है भाई ! पहले अपनेको फिर दुसरोंको जलावें आगकी तरह । क्रोधसे खून जल जाता है, नुकसान होता है ।
देखो एक और बढ़िया बात बताता हूँ । क्रोध आवें तो समझो कि यह हमारेमें तो है नहीं, कहाँसे आ गया ? तो हमारेको विपरीत बात होते ही कोई क्रोधका संस्कार पड़ा था, वह निकल गया । आया नहीं है, मन-बुद्धिमें संस्कार पड़ा था, वह निकल गया । आया हुआ मत मानो, निकल गया । जैसे गन्दी नालीको साफ करते है तो दुर्गन्ध आती है, यह वास्तवमें दुर्गन्ध आती नहीं है अपितु जा रही है सफाई से ।
साधन करनेवाले सज्जनोंको पुछता हूँ कि आपको पहले जैसा क्रोध आता है ? कम हुआ है न ? अतः क्रोध जा रहा है । (१) पहले क्रोध जल्दी-जल्दी, बार-बार आता था । अब उतना जल्दी नहीं आता है, देरी से आता है (२) पहले जितना जोरसे भभका आता था, उतना जोरसे अब नहीं आता (३) पहले जितनी देर ठहरता था, अब उतनी देर नहीं ठहरता है । यह तीन बातका अनुभव सबको होना ही चाहिए । अगर नहीं होता है तो साधन नहीं करते है । इससे सिद्ध हुआ कि क्रोध आता नहीं, जा रहा है । कभी-कभी साधन करनेवालेको बड़ा जोरसे क्रोध आता है, पहले से भी । यह मेरे अनुभवकी बात है । एक बार मैं कुएँसे पानी ले रहा था तो एक व्यक्तिने मेरा जल-छाना फेंक दिया तो मेरेको बडा क्रोध आया । मैंने निगाह करी कि मेरेको क्रोध आया उतना उसको नहीं आया । तो ऐसा क्यों हुआ ? कई दिन हमारे विपरीत होने पर, कई दिनका संग्रह हुआ गुस्सा एक साथ निकल गया ।
वर्तमानमें सब-के-सब निर्दोष है । यदि आपमें होता तो अभी होना चाहिए । अभी तो काम, क्रोध, लोभ नहीं है । आप स्वयं निमंत्रण देते हो तब आता है, सम्मति देते हो । आज ही विचार करो, आज ही फर्क पड जायेगा —ऐसी मेरी भावना है । आप नित्य है, क्रोध अनित्य है । नित्य-अनित्यका साथ कैसे हो सकता है ? भजन-सत्संग करनेवालोमें एक भयंकर दोष होता है कि यह सत्संगी नहीं है, मैं सत्संगी हूँ । दुसरेको मूर्ख समझता है । अच्छाईका अभिमान बुराईकी जड है । सभी दोष अहंकारकी छायामें आते है, रहते है । अभिमान कुसंग है । आप बहुत सावधान रहो । ‘सकल शोकदायक अभिमाना’, इसलिए नम्र होना चाहिए । साधककी रोजाना परीक्षा होती है, क्रोध आया तो फ़ैल हो गए । मुक्ति चाहते हो और यह क्रोध तो नरकोंका दरवाजा है । कोई अनुचित करें उसपर दया आनी चाहिए, क्रोध नहीं क्योंकि वह अपना अहित कर रहा है । प्रार्थना करो- हे नाथ ! हे प्रभु ! यह कैसे निर्मल हो जाय । यह बड़ी भारी सेवा है ।
जब कभी क्रोध आवें तो ‘आगमापायिनोऽनित्याः’, आनेजनेवाला और अनित्य है, मन ही मन कहो । जैसे बिच्छुका जहर मन्त्रसे उतर जाता है, ऐसे ही यह मन्त्र है । अच्छाईका अभिमान बुराईकी जड है —यह याद रखो । निर्दोषताके अभिमानसे दोष पुष्ट होते है । बडप्पनका गुण दुसरोंका दिया हुआ है, यदि सभी करोड़पति होते तो आपको लखपतिका अभिमान होता ? तो हमें उनके अहसानमंद होना चाहिए ।
श्रोता —लड़का कहना नहीं माने, चोरी करें तो गुस्सा करना चाहिए ?
स्वामीजी —हम उसका भला चाहते है । यह दया, प्रेम, अपनापन है । गुण है, दोष नहीं है । अतः क्रोध, गुस्सा दिखाना चाहिए, पर अपनेमें आना नहीं चाहिए, आना गलत है ।

दि। ४/०२/१९९६, सायं ३ बजेके

स्वामीजीके जीवनके अनुभव सुनिए इस प्रवचनमें -(१) २२.३५ मिनट पर जल-छानेकी घटना (२) ३९ मिनट पर चिदंबरम यात्रा की घटना (३) ४८.१७ असमकी घटना


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।। श्रीहरिः ।।


क्रोधनाशका उपाय


प्रश्न आया है कि दोष छोड़ सकते नहीं और सब परमात्मा है यह स्वीकार नहीं कर सकते है । हम करना चाहते है पर होता नहीं है । हमारेमें दोष दिखते है, फिर आगे दोष होते रहते है, क्या करें ?
मैं बात बतता हूँ, इस बातको पकड़ लें और उसमें स्थिर होकर अनुभव करें, देखें । सबके कामकी बात है, ध्यान देकर आप सुनें । दोष क्या है ? गीतजीमें आया है कि ‘त्रिविधं नरकस्य द्वारं नाशनमात्मनः । कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत् ॥’(१६/२१) अपना पतन करनेवाले यह तीन प्रकारके दोष है । यह तीनों नर्कोंके दरवाजे है । इस वास्ते इनका त्याग करना चाहिए । तो हम विचार करते है कि हमारेको क्रोध आता है, उसके त्याग पर विचार करते है । क्रोध पर विजय कैसे हो ? हम नहीं चाहते तो भी आ जाता है , अचानक आ जाता है । बड़ा तंग करता है । इसका त्याग कैसे करें ? हम सह सकते नहीं है ।

क्रोध कब आता है ? जब कोई हमारा अपमान, तिरस्कार कर देता है, हमारे काममें कोई लाभ होता हो उसमें हानि पहुँचाता है । कोई दुखः देता है, हमारे विरुद्ध काम करता है तो क्रोध आ जाता है । उस क्रोधका हम त्याग करना चाहते है ।

तो सबसे मेरी प्रार्थना है कि आप पहले विचार करो कि क्रोधका हमें त्याग करना है । इस एक दोष पर विचार करते है । एक दोषका सर्वथा त्याग करने पर दूसरे दोष भी कम हो जाते है, मिट जाते है । इस वास्ते क्रोध पर विचार करते है । क्रोध हमारे अपनेमें भी दिखता है और दुसरोमें भी दिखता है, और लोग भी क्रोध करते है । अब यह क्रोध कैसे छूटे ? तो एक बात मैं बताता हूँ, इस पर आप द्रढतासे निश्चय कर लें । हमारेमें क्रोध नहीं है और दुसरोमें भी क्रोध नहीं है —यह द्रढ़तासे पकड़ लें । अभी आपसे पूछें तो कोई भाई-बहन कह सकता है कि अभी अपनेमें क्रोध है ? तो क्रोध हमारेमें है नहीं, आता है । यह बात सच्ची है न ? इसमें कोई संदेह हो तो पूछो भाई ! बहुत बड़े भारी लाभकी बात है । जो यह मान लेता है कि हमारेमें क्रोध है, उसीको क्रोध आता है । तो क्यों मान लेते है ? तो मेरेको कई बार क्रोध आया है । अतः भूतकालके क्रोधको याद करके अपनेमें क्रोधको जमा कर लेते है । यह भूल होती है । वर्षोंसे मैं देखता हूँ, मेरेमें क्रोध है । मेरेमें क्रोध है —यह भावना ही आपको क्रोधका नाश करने नहीं देती ।
आप क्रोध तो वख्त-वख्त पर करते है, बिना क्रोधके बहुत रहते हो । आप ज्यादा समय क्रोधी रहते हो कि बिना क्रोध रहते हो ?तो मैं मानता हूँ कि आप सभी ऐसा ही मानेंगे कि ज्यादा समयमें क्रोधसे रहित होते है । थोड़े समयमें ही क्रोधके सहित होते है । अपनी उम्र भरमें भी कभी आठ प्रहार क्रोध रहा है ? बिना क्रोध हम ज्यादा रहते है —यह सबका अनुभव है । तो हमारेमें क्रोध नहीं है । क्रोध आता है और जाता है । हमारेमें क्रोध है —यह क्रोधको निमंत्रण देना है । यह क्रोधकी खास जड है । खुब ख्याल करें आप । तो क्रोध मेरेमें नहीं है —यह द्रढतासे धारण कर लें ।

(शेष आगेके ब्लोगमें)

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।। श्रीहरिः ।।

संसारका आश्रय कैसे छूटे ?


हम भगवान् के आश्रित हो जायँ अथवा संसारका आश्रय छोड़ दें दोनोंका एक ही अर्थ होता है। संसारका आश्रय सर्वथा छूट जानेसे भगवान् का आश्रय स्वत: प्राप्त हो जाता है और भगवान् के सर्वथा आश्रित हो जाने से संसारका आश्रय स्वत: छूट जाता है । इन दोनोंमें से किसी एक की मुख्यता रखकर चलें अथवा दोनोंको साथ रखते हुए चलें, एक ही अवस्था हो जाती है अर्थात् कल्याण हो जाता है ।

भगवान् के आश्रित होनेमें संसारका आश्रय ही खास बाधक है । संसारका आश्रय न छूटनेमें खास कारण है—संयोगजन्य सुखकी आसक्ति । संयोगजन्य सुखमें मनका जो खिंचाव है, प्रियता है, यही संसारके आश्रयकी, संसारके संबंध की खास जड़ है । यह जड़ कट जाय तो संसारका आश्रय छूट जायगा । परन्तु भीतरसे संयोगजन्य सुखकी लोलुपता रहते हुए बाहरसे चाहे संबंध छोड़ दो, साधु भी बन जाओ, पैसा भी छोड़ दो, पदार्थ भी छोड़ दो, गाँव छोड़कर जंगलोंमें चले जाओ, तो भी संसारका आश्रय छूटेगा नहीं ।संयोगजन्य सुख आठ प्रकारका है—शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, मान (शरीर का आदर-सत्कार), बड़ाई (नाम की प्रशंसा) और आराम ।

ये आठ प्रकारके संयोगजन्य सुख ही मूल बाधाएँ हैं । जबतक इन सुखोंमें आकर्षण है, प्रियता है, ये अच्छे लगते हैं, तबतक संसारका आश्रय छूटता नहीं । अगर केवल भगवान् का ही आश्रय ले लिया जाय तो संसार का आश्रय छूट जायगा । संयोगजन्य सुखका बड़ा भारी आकर्षण है । पर वह कब छूटेगा ? जब मनुष्य केवल भगवान् का आश्रय लेकर भगवान् के भजन-स्मरणमें लीन होगा । भगवान् के भजन-स्मरण में लीन होने से जब पारमार्थिक सुख मिलने लगेगा, तब संयोगजन्य सुख सुगमतासे, सरलतासे, छूट जायगा ।

उस पारमार्थिक सुखमें इतनी विलक्षणता, अलौकिकता है कि उसके सामने संसारके सब सुख नगण्य हैं, तुच्छ हैं, कुछ नहीं हैं । जब वहाँ पारमार्थिक सुख मिलने लगेगा, तब संसारके सुख फीके पड़ जायँगे, स्वत: स्वाभाविक तुच्छ लगने लगेंगे । अत: उस पारमार्थिक सुखको, आनन्दको ही लेना चाहिये । उसको लेनेके दो तरीके हैं चाहे भावना-(भक्ति) से ले लो और चाहे विवेक-(ज्ञान-) से ले लो । भगवान् से ऐसे लो कि भगवान् हैं, वे मेरे हैं और मैं उनका हूँ—

मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई रे ।

भगवान् को अपना माननेके साथ-साथ ‘दूसरो न कोई’—यह मानना जरूरी है । परन्तु होता यह है कि संसारमें अपनापन रखते हुए भगवान् में अपनापन करते हैं । वास्तवमें संसारके साथ अपनापन रहता नहीं—यह निश्चित बात है । जन्मसे पहले जिस कुटुम्बके साथ अपनापन था, आज उस कुटुम्बकी याद ही नहीं है । इसी प्रकार आज जिस कुटुम्बके साथ, जिन रुपयोंके साथ, जिन भोगोंके साथ हमारा अपनापन है, वे भविष्यमें याद तक नहीं रहेंगे, संबंध तो क्या रहेगा ? अत: जो रहेगा ही नहीं, उसको छोड़नेमें क्या जोर आता है ? जो रहने वाला हो, उसको यदि छोड़नेके लिये कहा जाय, तब तो कुछ कठिनता भी मालूम देगी कि रहने वाली चीज को कैसे छोड़ दें ! पर संसार तो छूटेगा ही और छूटता ही चला जा रहा है; अत: उसको छोड़नेमें कठिनता कैसी ? केवल मूर्खता के कारण ही हमने उसको पकड़ रखा है।

थोड़ा-सा विचार करें तो बात स्पष्ट समझमें आती है कि बाल्यावस्थामें हमारा जिन मित्रोंके साथ, जिन खिलौनोंके साथ, जिन व्यक्तियोंके साथ संबंध था, वह संबंध आज केवल याद-मात्र है । आज वह संबंध नहीं है । न उस अवस्थाके साथ संबंध है, न उन घटनाओं के साथ संबंध है । न उन खिलौनोंके साथ संबंध है, न उस समयके साथ संबंध है । अब आप कहते हो कि हमारी बाल्यावस्था ऐसी थी और हम अड़ जायँ कि ऐसी नहीं थी, तो आपके पास कोई प्रबल प्रमाण नहीं है कि आप उसको हमें बता सकें । आप और हम जिद भले ही कर लें, पर ‘हमारी बाल्यावस्था ऐसी थी’—इसको आप और हम नहीं बता सकते । बतायें भी तो क्या बतायें और कैसे बतायें ?

किसकी ताकत है, जो उसको बता दे ? आपको अपनी बाल्यावस्था वर्तमान अवस्थाकी तरह सच्ची दीखती थी, पर आज आप उसको सिद्ध नहीं कर सकते, तो फिर आज आपकी जो अवस्था है, उसको आगे सिद्ध करना चाहेंगे तो कैसे करेंगे ? जिस तरहसे उस बाल्यावस्थाका समय बीता उसी तरहसे यह आजका समय बीत रहा है । भविष्यमें क्या होगा, अभी घण्टे भर बादमें क्या होगा, कुछ पता नहीं ! आजसे युगों पहले क्या हुआ, पता नहीं और आजसे युगों बाद क्या होगा, पता नहीं । वर्तमान भी बड़ी तेजीसे बीत रहा है । वर्तमान, ‘है’ का नाम नहीं है, प्रत्युत जो बरत रहा है अर्थात् तेजीसे जा रहा है, उसका नाम वर्तमान है । वर्तमान इतनी तेजीसे जा रहा है कि इसका एक क्षण भी स्थिर नहीं है । वर्तमान कोई काल है ही नहीं, केवल भूत और भविष्यकी सन्धिको वर्तमान कहा गया है । वर्तमान शब्दका अर्थ ही है—चलता हुआ । जो भविष्य है, वह सामने आ करके भूतमें जा रहा है, उसको वर्तमान कहते हैं । इस प्रकार जो कभी स्थिर रहता ही नहीं, जिसका प्रतिक्षण वियोग हो रहा है, उससे विमुख होनेमें क्या जोर आता है, बताओ ? यह तो जबरदस्ती छूटेगा, रहेगा नहीं । इसको रखना चाहोगे तो बेइज्जती, दु:ख, सन्ताप, जलन, आफतके सिवाय और कुछ मिलनेका है नहीं । परन्तु इसको छोड़ दोगे तो निहाल हो जाओगे ! अत: चाहे संसारके संबंधका त्याग कर दो चाहे भगवान् के साथ संबंध मान लो कि ‘हे भगवान् ! आप ही हमारे हो’। भगवान् का ही नाम लो, उनका ही चिन्तन करो, उनके आगे रोओ और कहो कि ‘महाराज ! संसार का त्याग करने में मैं तो हार गया, मुझे अपनी मनोवृत्तियाँ बड़ी प्रबल प्रतीत होती हैं।’ ऐसे करके भगवान् के शरण हो जाओ । तुलसीदासजी महाराज कहते हैं-

हौं हार्यो करि जतन बिबिध बिधि अतिसै प्रबल अजै ।
तुलसिदास बस होइ तबहिं जब प्रेर क प्रभु बरजै ।।

(विनय पत्रिका ८१)

हमारेसे तो ये शत्रु सीधे होते नहीं । वे प्रभु कृपा करेंगे, तभी ये सीधे होंगे । परन्तु अपनी शक्तिका पूरा उपयोग किये बिना मनुष्य अपनी शक्तिसे हताश नहीं हो पाता—अपने में असमर्थताका अनुभव नहीं कर पाता । अपनी शक्तिसे हताश हुए बिना अभिमान नहीं मिटता कि मैं ऐसा कर सकता हूँ । पूरी शक्ति लगाकर भी काम न बने तो कह दे कि ‘हे नाथ ! अब मैं कुछ नहीं कर सकता !’ तो फिर उसी क्षण काम बन जायगा । परन्तु पूरी शक्ति लगाये बिना ऐसी अनन्यता नहीं आती । इसलिये जो आप कर सकते हैं, उसे पूरा करके मन की निकाल दें । जब भीतर यह विश्वास जायगा कि मेरी शक्तिसे काम नहीं होगा, तब स्वत: पुकार निकलेगी कि ‘हे नाथ ! मेरी शक्तिसे नहीं होता’ और उसी क्षण भगवान् की शक्तिसे काम पूरा हो जायगा । अपनी शक्ति बाकी रखते हुए भगवान् के अनन्य शरण नहीं हो सकते । अगर अपनी शक्तिका कुछ आश्रय है कि हम कुछ कर सकते हैं, तो करके पूरा कर लो । जितना जोर लगाना हो, पूरा-का-पूरा लगा लो । पूरा जोर लगाने पर जब बाकी नहीं रहेगा, तब कार्य सिद्ध हो जायगा । कारण कि संसारका जो आश्रय है, वह परमात्माका आश्रय नहीं लेने देता, इतना ही उसका काम है और खुद वह रहता नहीं !


—‘कल्याणकारी प्रवचन’ पुस्तकसे

http://www.swamiramsukhdasji.org/swamijibooks/pustak/pustak1/html/klyankariprawachana/main.html

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।। श्रीहरिः ।।

अपने अनुभवका आदर करो


पुरुषमें यह जो कर्तापन, भोक्तापन है वह प्रकृतिके संबंधसे है । अगर प्रकृतिका संबंध न हो तो स्वयंमें कर्तापन, भोक्तपन नहीं है । आप कभी सुखी होते हो, कभी दुःखी होते हो, इस पर आप थोड़ा गहरा विचार करो और समझमें न आवे तो शंका करो ! सुखी और दुःखी होते हो तो सुख भी आपके साथ नहीं रहता है और दुःख भी आपके साथ नहीं रहता है । अगर सुख आपके साथ रहता तो दुःखी नहीं होते और दुःख आपके साथ रहता तो आप सुखी नहीं होते ! तो आप सुखी-दुःखी होते हो और सुख-दुःख मिटते है और आप रहते है । इस बात पर ध्यान देनेसे प्रत्यक्ष बात है कि आप उनसे अलग हो । सुख और दुःख आते है और जाते है और आप रहते हो ! —इस अनुभवका आदर करो, इसमें कोई शंका हो तो पूछो ! तत्त्वज्ञान, जीवनमुक्ति, परमात्मतत्वकी प्राप्ति कहते है, बहुत सुगम है । बड़ी सरल है । कितनी विलक्षण बात है की सुख-दुःख आते जाते रहते है और आप आते-जाते नहीं हो ! रहते हो ! प्रकृतिमें स्थित होनेसे सुखी-दुःखी होते हो । प्रकृति और पुरुष दो है । प्रकृति जड़ है, आप चेतन हो । प्रकृति द्रश्य है, परिवर्तनशील है और आप द्रष्टा एवं अपरिवर्तनशील हो । सुख-दुःख बदलनेवाले है, रहते नहीं है पर आप अपनेको सुखी-दुःखी मान लेते हो !
अनुकूल परिस्थिति आनेसे मैं सुखी हो गया और प्रतिकूल परिस्थिति आनेसे मैं दुःखी हो गया ! आप सुखी-दुःखी नहीं होते हो ! आपके सामने सुख-दुःख आता है और जाता है । तो आज आपको यह बात मान लेनी चाहिए की सुख-दुःख आने-जानेवाले है, उनके साथ मिलो मत ! ‘समदुःखःसुखः स्वस्थः’ । ‘स्व’ में स्थित होना है, प्रकृतिमें स्थित होनेमें तो महेनत होगी, ‘स्व’में स्थित होने में क्या महेनत होगी ? आप स्वयं स्थित हो । ‘मैं हूँ’ इस सत्तामें सुख-दुःख आनेसे क्या फर्क पड़ा ? अपने होनापन में ! कोई शास्त्रोंकी गहरी बात नहीं कहता हूँ, अपनी सीधी सादी बात कहता हूँ । ‘स्व’में स्थित होनेमें आदमीको कुछ नहीं करना पड़ता, कहीं जाना नहीं पड़ता, कोई उद्योग, परिश्रम नहीं करना पड़ता ! ‘स्व’में स्थित हो स्वतः ! सत्ताका अनुभव करो ! ‘आप हो’ इसका पता नहीं है तो किसका पता है बताओ ? ‘मै हूँ’, ‘स्व’का पता निरंतर रहता है ! थोड़ा ध्यानपूर्वक सुनो ! सुख-दुःख आगंतुक है, क्या आप आगंतुक हो कि कभी रहते हो और कभी नहीं रहते हो ? बताओ ? यही तो अनुभव है ! अनुभव कोई जानवर होता है ?
देखो भाई ! मनुष्यमें विचारकी प्रधानता है । और विचारकी बात नहीं मानोगे तो क्या मानोगे ? बताओ ? विवेक और विचार ही मनुष्यता है, इसके बिना तो पशुता है, मनुष्यता है ही नहीं ! पशुता कहता हूँ तो पशुका निरादर होता है ! बोलो कोई प्रश्न करो ? प्रश्न तो यह होना चाहिए कि हम तो रहनेवाले है और आने-जानेवालेके साथ कैसे रहे ? कैसे पकड़ सकें ? उसके साथ हो नहीं सकते आप ! मेरी बातमें कोइ शंका हो तो बताओ आप ? अनुभव क्यों नहीं होता है क्योंकि आप सीखि हुई बात बोलते हो ! अनुभवका आदर नहीं करनेसे सीखि हुई कहता हूँ ! इसी क्षण मान लो, स्वीकार कर लो ! इसमें कोई अभ्यास नहीं है । समय नहीं लगता है । समय तो निर्माण करनेमें लगता है । जो है वैसा स्वीकार करनेमें क्या समय लगे ? अभ्याससे तत्व नहीं मिलता है । बड़ी पक्की बात कहता हूँ ! भले दुनिया मात्र कह दे कि अभ्याससे होता है !! अभ्याससे एक नई अवस्था बन जाएगी, तत्त्व कैसे मिलेगा ? अभ्यास तो इन्द्रियोंसे, मन, बुद्धिसे होगा । अभ्यास प्रकृतिके अंतर्गत होगा, अभ्यास करनेमें परतंत्रता होगी ! प्रकृतिसे अतीतमें अभ्यास क्या करेगा ? सुख-दुःखके भोगी होनेसे आदर नहीं होता है । और आप सुख-दुःखके भोगी कैसे होंगे ? सुख-दुःखके भोगी भी होते हो और अलग भी कहते हो ? इसीलिए तो आपको सीखि हुई कहता हूँ ! क्या नींदमें कहता हूँ ऐसा आपको !! सुख-दुःखके भोगी हो जाते और सुख-दुःखमें समान है; तभी तो सीखि हुई कहता हूँ, भोगी कहता हूँ ! सीखि हुई बात कहनेमें नाराज होते हो, अपना अपमान समझते हो !
अनुभवका आदर करो, उसमें स्थित रहो । आप स्थित रहते नहीं कि स्थित रह सकते नहीं ? अपनी भूलको भूल स्वीकार करते ही भूल मिट जाएगी ! अंधेरेको दीपक लेकर देखने जाओगे तो अंधेरा टिकेगा क्या ? जानोगे तो भूल कैसे रहेगी ! और भूल रहेगी तो जानोगे कैसे ? बिल्कुल विरोधी बात है । मूर्खको कुटना (मारना) सोरा (आसान) है पर समझाना कठिन है । कृपानाथ आप कृपा करो ! आप जो समझते हो उसका आदर करो, उसमें आरूढ़ (स्थित) रहो, उसको महत्व दो ! नहीं तो आप ठंडमें यहाँ क्यों आए हो ? क्या धन मिलता है ? विचारसे ठीक समझमें आता है उसपर कायम रहना है की बेविचार पर ? और यह कब करना है बोलो ? किस दिन पर छोड़ रखा है ? बेटा–पोता हो जाएगा तब करोगे ? माँ-बाप मर जायेंगे तब करोगे बोलो ? तो आप मान लो बात को ! मैं बहुत राजी हो जाऊँगा । इतना राजी तो भिक्षा देंगे उससे भी नहीं होऊँगा !
नारायण......... नारायण................... नारायण..................... नारायण
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।। श्रीहरिः ।।

साधन तत्व

मनकी स्थिरता और चंचलता जिस प्रकाशमें होते है, उसमें स्थिति स्वतः है । चंचलता और स्थिरतासे वृत्ति हटा लो । यह खुदको हटाना पड़ेगा । एक मुमुक्षा होती है और एक लोभ होता है । मुमुक्षा तो कल्याण करती है और लोभको गीतजीमें नरकोंका द्वार बताया है । तो अपने सुनते है उसमें अच्छी बातोंमे लोभ पैदा हो जाता है, यह कल्याण नहीं करता है । साधककी योग्यता, श्रद्धा, विश्वास और स्वतः उसमें प्रेम होनेसे साधन सिद्ध होता है । यदि श्रद्धा, विश्वास और लगन नहीं है, केवल महिमा सुनकर लग रहा है — यह लालच है, लोभ है । उससे काम सिद्ध नहीं होता है । जिस साधनको कर सकता है, उसको तो करता नहीं और जिस साधनको कर सकते नहीं उसकी चाहना; यह लोभ है । इससे साधक भटक जाता है, उन्नति नहीं कर सकता ।
आप चाहते हो कि मनकी चंचलता और स्थिरतासे अलग जो तत्व है उसका अनुभव हो, तो उसका अनुभव तब होगा जब आप दोनोंसे अपना अलग अनुभव कर लें । यह योग्यता होनी चाहिए आपमें, नहीं तो जिसमें आपकी योग्यता हो वह साधन करो । नहीं तो सबसे सीधा, सरल साधन है — राम...राम.....राम करो । यह छोड़ो नहीं । भोजन करें तो भी मनमें राम-राम चलता रहें, शौच, स्नान करें तो भी रामनाम चलता रहें, नेत्रोंसे दिखता रहे । यह आप कर सकते हो, उसको तो करते नहीं और जो चाहते हो वह होता नहीं ! तो फिर साधनसे रीते(खाली) रह जाओगे । आप राम राम राम कर सकते हो । छूट जाय तो हे नाथ ! हे नाथ !! पुकारो । भूल जाओ तो दुःख हो की मैं कैसे भूल गया ? यदि अभी मर जाते तो क्या दशा होती ? बार-बार हे नाथ भूलूँ नहीं —यह प्रार्थना करते रहो । तो यह साधन सिद्ध हो जाएगा । आप यह कर सकते हो की नहीं बताओ ? बोलो ? एक बात सभी भाई-बहन ध्यान से सुनें, मार्मिक बात है कि साधन कोई छोटा नहीं होता है । अपनी योग्यताके अनुसार होगा, वही बढ़िया होगा । जिसमें आपका प्रेम, श्रद्धा, विश्वास हो और समझमें आए कि यह मैं कर सकता हूँ, वही साधन आपके लिए बढ़िया होगा
मनमें चंचलता और स्थिरता तो आती है और जाती है । आप नित्य स्थिर हो । उसके साथ मिलो मत, स्थिर हो जाएगा । आता है और जाता है, वह आपसे अलग है । आगंतुक है मुसाफिरकी तरह ! घरका मालिक आता है तो भी रहता है, जाता है तो भी रहता है । और आने-जानेवाला घरमें बैठा हो तो भी घरमें नहीं है । ‘चंदनकी चुटकी भली गाड़ो भलो न काठ, चतुर नर एक ही भलो मूरख भला न साठ’ । तो आपकी समझमें आता हो, संदेह हो तो प्रगट करो ! उसपर विचार करें । हमसबमें एक कमी होती है । क्या कमी है ? कोई छूमंतर कर देगा तो हो जाएगा ! गुरुजी, महात्मा, संत, भगवान् कर देंगे — यह आशा गलत है । आप कर सकते हो उतना करो तो छूमंतरवाला भी मिल जाएगा । और खुद करो नहीं और दूसरा कर देगा यह कभी होगा नहीं । आपकी लगन न हो तो कभी होनेवाला नहीं है । जैसे एक बालक है, चलना सिखता है । सीडी पर चढ़नेका प्रयत्न करता है, हाथ, पैर और पेटका ज़ोर लगाकर महेनत करता है तो माँ थोड़ा सहारा लगा देती है तो वह चढ जाता है । माँ पडने नहीं देती, पासमें खड़ी है, झेल लेती है । पर आप जितना चढ सकते हो उतना नहीं चढो, कर सकते हो उतना न करो तो जो हमारी सदाकी माँ, हमारे सबकी है वह कैसे आए ? ‘त्वमेव माता च पिता त्वमेव’ । अपनी बल, बुद्धि, समझ लगाकर अपना साधन करो । उसमें आप अपना समय, समझ, सामग्री और शक्तिको बचाओ मत ! बुराई भी बिना बलके नहीं होती है ! बुराई कर लेगें और भलाई होती नहीं— यह गलत बात है । होती नहीं तो बुराई कैसे कर ली ? झूठ बोलता है, सच बोलना होता नहीं, गलतीकी बात है । बोलनेकी शक्ति न होती तो झूठ कैसे बोलते ?
एक और बात बताऊँ । घरमें जितने है, उन सबको सुख पहुँचाओ, आदर करो । महिमा करो, आराम दो, भोजन दो, सुख दो और उनसे सुख चाहो मत । यह महेनत करते कराते आप इसको १२ महीनोंमें सिद्ध कर लो । आप लेनेका उद्देश हटाओ । केवल देनेका उद्देश रखो ! सेवा करते रहो, चाहो मत ! यदि आपने यह १२ महीनोंमें कर लिया तो बड़ा भारी काम कर लिया, यह साधना है ।
तीसरा साधन; आप सबको सुख पहुँचाओ, सुख न पहुँचाओ तो किसीको दुःख मत दो । शरीरसे, वाणीसे , मनसे किसीका बुरा मत करो, बुरा मत चाहो ! यह व्रत, नियम ले लो । जैसे एकादशीका व्रत करते है तो एक दाना अनाजका खा लेते है तो व्रत भंग हो जाता है । पेट तो भरता नहीं और व्रत भंग हो गया ! ऐसे ही किसीका बुरा चाहा तो व्रत भंग हो गया ।
किसीकी मौत पर राजी होना, उसकी हत्यामें शामिल होनेके समान है, मनसे शामिल हो गए कि नहीं ? किसीकी मौतमें राजी होना पापकी बात है क्योंकि कोई भी मरना चाहता नहीं है । आप साधना करके ऊँचा उठना चाहते हो तो अनुकूलतामें राजी मत हो ! आराम, सुख लेनेसे, उससे राजी होनेसे पुण्य नष्ट होते है । यह आपकी कमाई हुई पूंजी है । उसको अपने पास रहने दो । आप साधना करो; संत, महात्मा, भगवान् मदद करेंगे । अपनी सामर्थ्य, समय, सामग्री और समझ पूरी लगा दो ! क्या आप राम राम राम नहीं कर सकते हो ? क्या पसीना आता है ? ‘दिल में जाग्रत रहिए बंदे’ पता नहीं अचानक मौत कब आ जाय ? मरना पड़ेगा तो सावधान रहो ! भगवान् आपसे उतना ही चाहते है, आशा रखते है ; जीतना आप कर सको ! आप जितना कर सको उतनी ही आपकी जिम्मेवारी है ।

दि।१६/१०/१९९१, सायं ४.३० बजेके प्रवचनसे
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