।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि–
भाद्रपद कृष्ण नवमी, वि.सं.–२०७५, मंगलवार
दुर्गतिसे बचो




 प्रश्न‒जो भूत-प्रेतकी बाधाको दूर किया करते हैं, ऐसे तान्त्रिकोंकी मरनेके बाद क्या गति होती है ?

उत्तर‒भूत-प्रेतकी बाधा दूर करनेवाले तांत्रिक भी मरनेके बाद प्रायः भूत-प्रेत ही बनते हैं; इसके अनेक कारण हैं; जैसे‒

(१) भूत-प्रेतको निकालनेवाले तान्त्रिकोंकी विद्या प्रायः मलिन होती है । उनका खान-पान एवं चिन्तन भी मलिन होता है । उस मलिनताके कारण उनकी दुर्गति होती है अर्थात् वे मरनेके बाड़ प्रेतयोनिमें चले जाते हैं ।

(२) भूत-प्रेत किसीके शरीरमें प्रविष्ट होते हैं तो उनको वहाँ सुख मिलता है, खाने-पीनेके लिये अच्छे पदार्थ मिलते हैं; अतः वे वहाँसे निकलना नहीं चाहते । परंतु तान्त्रिक लोग मन्त्रोंके द्वारा उनको जबरदस्ती निकालते हैं और मदिराकी बोतलमें बन्द करके उनको जमीनमें गाड़ देते हैं अथवा किसी वृक्षमें कीलित कर देते हैं, जहाँ वे सैकड़ों वर्षोंतक भूखे-प्यासे रहकर महान् दुःख पाते रहते हैं । उनको इस प्रकार दुःख देना बड़ा भारी पाप है; क्योंकि किसी भी जीवको दुःख देना पाप है । अतः उस पापके फलस्वरूप वे तांत्रिक मरनेके बाद प्रेतयोनियोमे चले जाते हैं ।

(३) भूत-प्रेतको निकालनेवाले तान्त्रिकोंमें प्रायः दूसरोंके हितकी भावना नहीं होती । वे केवल पैसोंके लोभसे ही इस कार्यमें प्रवृत्त होते हैं । वे ठगाई और चालाकी भी करते हैं । इस कारण भी उनको मरनेके बाद भूत-प्रेत बनना पड़ता है ।

अगर तान्त्रिकोंमें निःस्वार्थभावसे सबका हित करनेकी, उपकार करनेकी भावना हो अर्थात् जिसको भूत-प्रेतने पकड़ा है, उस व्यक्तिको सुखी करनेकी और भूत-प्रेतको निकालकर उसकी (गयाश्राद्ध आदिके द्वारा) सद्‌गति करनेकी भावना हो, चेष्टा हो तो वे भूत-प्रेत नहीं बन सकते । जिनमें सबके हितकी भावना है, उनकी कभी दुर्गति हो ही नहीं सकती । भगवान्‌ने कहा है कि जो सम्पूर्ण प्राणियोंके हितमें रत रहते हैं, वे मेरेको ही प्राप्त होते हैं‒‘ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः’ (१२ । ४) ।

प्रश्न‒भूत-प्रेतोंको बोतलमें बन्द करने, कीलित  करने आदिमें उन भूत-प्रेतोंके कर्म कारण हैं या बन्द करनेवाले कारण हैं ?

उत्तर‒मुख्यरूपसे उनके कर्म ही कारण हैं । उनका कोई ऐसा पापकर्म आ जाता है, जिसके कारण वे पकड़में आ जाते हैं । अगर उनके कर्म न हों तो वे किसीकी पकड़में नहीं आ सकते । परन्तु जो उनको कीलित आदि करनेमें निमित्त बनते हैं, वे बड़ा भारी पाप करते हैं । अतः मनुष्यको भूत-प्रेतोंके बन्धन, कीलनमें निमित्त बनकर पापका भागी नहीं होना चाहिये । हाँ, उनके उद्धारके लिये उनके नामसे भागवत-सप्ताह गयाश्राद्ध, भगवन्नाम-जप आदि करना चाहिये अथवा वे भूत-प्रेत अपनी मुक्तिका जो उपाय बतायें, उस उपायको करना चाहिये । जो इस प्रकार प्रेतात्माओंकी सद्‌गति करता एवं कराता है, उसको बड़ा भारी पुण्य होता है एवं वे दुःखी प्रेतात्मा भी प्रेतयोनिसे छूटनेपर उसको आशीर्वाद देते हैं ।

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।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि–
भाद्रपद कृष्ण अष्टमी, वि.सं.–२०७५, सोमवार
श्रीकृष्ण-जन्माष्टमी-व्रत
                 दुर्गतिसे बचो




जैसे, नरकोंमें प्राणियोंको उबलते हुए तेलमें डाल देते हैं, उनके शरीरके टुकड़े-टुकड़े कर देते हैं, फिर भी जिन पापकर्मोंके कारण वे नरकोंमें गये हैं, उन कर्मोंके समाप्त होनेतक वे प्राणी मरते नहीं । ऐसे ही मनुष्यका कोई बुरे कर्मोंका भोग आ जाता है तो उनमें भूत-प्रेत प्रविष्ट हो जाते हैं । जबतक कर्मोंका भोग बाकी रहता है, तबतक कितने ही उपाय करनेपर, मन्त्र-यन्त्र आदिका प्रयोग करनेपर भी भूत-प्रेत निकलते नहीं । जब कर्मोंका भोग समाप्त हो जाता है, तब किसी निमित्तसे वे निकल जाते हैं । तात्पर्य यह है कि जिनको प्रारब्धके अनुसार दुःख भोगना है, उन्हींमें प्रविष्ट होकर भूत-प्रेत उनको दुःख देते हैं ।

ऐसा देखा जाता है कि कुटुम्बका कोई व्यक्ति मरकर पितर बन जाता है तो वह जब आता है, तब किसी एक व्यक्तिमें ही आता है, हरेकमें नहीं आता । इससे पता लगता है कि जिसके साथ पुराना ऋणानुबन्ध होता है, उसीमें पितर आते हैं । इसी तरह भूत-प्रेत भी उसीमें आते हैं, जिसके साथ पुराना ऋणानुबन्ध होता है ।

भूत-प्रेत मनुष्यकी आयु रहते हुए उसको मार नहीं सकते । उसकी आयु समाप्त होनेपर ही वे उसको मार सकते हैं । इस विषयमें हमने एक बात सुनी है । लगभग सौ वर्ष पुरानी राजस्थानकी घटना है । कुछ मुसलमान गायोंको कसाईखाने ले जा रहे थे । वहाँके राजाको इसकी खबर मिली तो उसने अपने सिपाहियोंको भेजा । सिपाहियोंने उन मुसलमानोंको मारकर गायें छुड़ा लीं । उनमेंसे एक मुसलमान मरकर जिन्न बन गया और वह राजाके पीछे लग गया । राजाने बहुत उपाय किये, पर उसने छोड़ा नहीं । जिन्न कहता कि मैं एक आदमीकी बलि लेकर ही जाऊँगा । आखिर एक ठाकुरने कहा कि मैं अपनी बलि देनेके लिये तैयार हूँ । जिन्नने राजाको छोड़ दिया और तुरन्त उस ठाकुरको मार दिया । ठाकुरके इच्छानुसार उसके शवको (श्मशान-भूमिमें ले जानेसे पहले) उसके गुरुके पास ले जाया गया । जब लोग ठाकुरके शवको उसके गुरुके चारों तरफ घुमाकर (परिक्रमा दिलाकर) ले जाने लगे, तब गुरुके पास बैठे एक दूसरे सन्तने कहा कि शव खाली जा रहा है, कुछ देना चाहिये । गुरु बोले कि कुछ कर नहीं सकते, इसकी आयु पूरी हो गयी है । फिर विचार करके दोनों सन्तोंने अपनी आयुमेंसे बारह वर्षकी आयु देकर ठाकुरको जीवित कर दिया । तात्पर्य है कि राजाकी आयु पूरी नहीं हुई थी, इसलिये जिन्न उसको मार नहीं सका । परन्तु ठाकुरकी आयु पूरी हो चुकी थी, अतः जिन्नने उसको मार दिया ।

प्रश्न‒मृगीरोगवाले और प्रेतबाधावाले मनुष्योंके लक्षण प्रायः एक समान दीखते हैं; अतः उन दोनोंकी अलग-अलग पहचान कैसे हो ?


उत्तर‒मृगीरोगवाले व्यक्तिको तो मूर्च्छा होती है, पर प्रेतबाधावाले व्यक्तिको प्रायः मूर्च्छा नहीं होती, वह कुछ-न-कुछ बकता रहता है । मृगीरोगवाले व्यक्तिमें तो एक ही जीवात्मा रहती है पर प्रेतबाधावाले व्यक्तिमें जीवात्माके साथ प्रेतात्मा भी रहती है, जो उस व्यक्तिको कई तरहसे दुःख देती है, तंग करती है । मृगीरोगवाला व्यक्ति तो दवासे ठीक हो जाता है, पर प्रेतबाधावाला व्यक्ति दवासे ठीक नहीं होता ।

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।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि–
भाद्रपद कृष्ण सप्तमी, वि.सं.–२०७५, रविवार
                 दुर्गतिसे बचो




 प्रश्न‒भूत-प्रेत कहाँ रहते हैं ?

उत्तर‒भूत-प्रेत प्रायः श्मशानमें, श्मशानके वृक्षोंमें रहते हैं । वे सरोवरके किनारे रहते हैं । वे सरोवरका पानी नहीं पी सकते, पर जलकी ठण्डी हवा उनको अच्छी लगती है, उससे उनको सुख मिलता है । पीपलके वृक्षका स्वभाव सबको आश्रय देनेका होनेसे उसकी छायामें भी भूत-प्रेत रहते हैं । कोई उनके नामसे छतरी बनवा देता है तो वे उसके भीतर रहते हैं । कोई मकान कई दिनसे सूना पड़ा हो तो उसमें भी भूत-प्रेत रहने लग जाते हैं ।

प्रश्न‒भूत-प्रेत किसी मनुष्यको पकड़ते हैं तो वे उसके शरीरमें किस द्वारसे प्रवेश करते हैं ?

उत्तर‒भूत-प्रेतोंका शरीर वायुप्रधान होता है; अतः वे मनुष्य-शरीरमें किसी भी द्वारसे प्रवेश कर सकते हैं । वे आँख, कान, त्वचा आदि किसी भी इन्द्रियसे शरीरमें प्रविष्ट हो सकते हैं । परन्तु वे प्रायः मलिन द्वारसे अर्थात् मल-मूत्रके स्थानसे अथवा प्राणोंसे ही मनुष्य शरीरमें प्रविष्ट होते हैं ।

प्रश्न‒शरीरमें प्रविष्ट होनेपर भूत-प्रेत कहाँ रहते हैं ?

उत्तर‒शरीरमे प्रविष्ट होकर भूत-प्रेत अहंवृत्तिमें अर्थात् अन्तःकरणमें रहते हैं ।

‘अहम्‌’ दो प्रकारका होता है‒ (१) अहंकार और (२) अहंवृत्ति । अहंकार जीवात्मामें रहता है और अहंवृत्ति अन्तःकरणमें रहती है । भूत-प्रेत श्वास आदिके द्वारा मनुष्यके शरीरमें प्रविष्ट होकर अहंवृत्तिमें रहकर इन्द्रियोंके स्थानोंको काममें लेते हैं ।

प्रश्र‒क्या शरीरमें एकसे अधिक भूत-प्रेत भी रह सकते हैं ?

उत्तर‒हाँ, रह सकते हैं । किसी-किसी व्यक्तिके शरीरमें एकसे अधिक भूत-प्रेत भी प्रविष्ट हो जाते हैं । जब वे उसके मुखसे बोलते हैं, तब सबकी अलग-अलग आवाज सुनायी पड़ती है ।

प्रश्र‒मनुष्य-शरीरमें प्रविष्ट होनेके बाद भूत-प्रेत हरदम उसीमें रहते हैं क्या ?

उत्तर‒भूत-प्रेत उसमें प्रायः आते-जाते रहते हैं । वे उसके पासमें ही घूमते रहते हैं और उनकी वायुके समान तेज गति होनेसे वे दूर भी चले जाते हैं । कुछ ऐसे भूत-प्रेत भी होते हैं, जो हरदम उसीमें रहते हैं ।

भूत-प्रेत हरेकको दुःख देनेमें, हरेक शरीरमें प्रविष्ट होनेमें स्वतन्त्र नहीं होते । वे अपनी मनमानी नहीं कर सकते । वे जिनके शासनमें रहते हैं, उनकी आज्ञाके अनुसार ही वे कार्य करते हैं अर्थात् शासकके आज्ञानुसार ही वे किसीके शरीरमें प्रविष्ट होते हैं, किसीको दुःख देते हैं । अगर शासक आज्ञा न दे तो वे हरेक व्यक्तिमें हरेक समयमें भी प्रविष्ट नहीं हो सकते । जैसे, शुभ कर्मोंके फलस्वरूप जो स्वर्गादि लोकोंमें जाते हैं, वे अगर मृत्युलोकमें किसीके साथ सम्बन्ध करते हैं तो उन लोकोंके शासकोंकी आज्ञाके अनुसार ही करते हैं । स्वतन्त्ररूपसे वे मृत्युलोकमें किसीके साथ बातचीत भी नहीं कर सकते । इसी तरह भूत-प्रेतयोनिमें भी शासक रहते हैं, जिनकी आज्ञाके अनुसार ही भूत-प्रेत सब कार्य करते हैं ।

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।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि–
भाद्रपद कृष्ण षष्ठी, वि.सं.–२०७५, शनिवार
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प्रश्न‒जो भगवन्नामका जप, स्वाध्याय आदि करते हैं, वे भी मरनेके बाद क्या भूत-प्रेत बन सकते हैं ?

उत्तर‒प्रायः ऐसे मनुष्य भूत-प्रेत नहीं बनते । परन्तु नामजपकी रुचिकी अपेक्षा जिनकी सांसारिक पदार्थोंमें, अपनी सेवा करनेवालोंमें, अपने अनुकूल चलनेवालोंमें ज्यादा रुचि (आसक्ति) हो जाती है और अन्तसमयमें साधनमें स्थिति न रहकर सांसारिक पदार्थोंकी, सेवा करनेवालोंकी याद आ जाती है, वे मरनेके बाद भूत-प्रेत बन सकते हैं । ऐसे भूत-प्रेत किसीको तंग नहीं करते किसीको दुःख नहीं देते ।

कर्मोंकी गति बड़ी ही गहन है‒‘गहना कर्मणो गतिः’ (४ । १७) । अतः पाप-पुण्य, भाव आदिमें तारतम्य रहनेसे भूत-प्रेत आदिकी योनि मिल जाती है । भगवान्‌ने स्वयं कहा है कि कर्म और अकर्म क्या है‒इस विषयमें बड़े-बड़े विद्वान्‌लोग भी मोहित हो जाते हैं (४ । १६) ।

प्रश्न‒दुर्घटनामें मरनेवाले एवं आत्महत्या करनेवाले प्रायः भूत-प्रेत क्यों बनते हैं ?

उत्तर‒बीमारीमें तो ‘मेरेको मरना है’ऐसी सावधानी, होश रहता है; अतः बीमार व्यक्ति संसारसे उपराम होकर भगवान्‌में लग सकता है । परन्तु दुर्घटनाके समय मनमें कुछ-न-कुछ मनोरथ, चिन्तन रहता है, जिसके रहते हुए मनुष्य अचानक मर जाता है । अगर उस समय मनमें खराब चिन्तन हो, भगवान्‌का चिन्तन न हो तो वह आदमी भूत-प्रेत बन जाता है । दुर्घटनाके समय मारनेवालेकी तरफ मनोवृत्ति होनेसे उसीका चिन्तन होता है, इस कारण भी दुर्घटनामें मरनेवाला भूत-प्रेत बन जाता है । परन्तु जो संसारसे उपराम होकर पारमार्थिक मार्गमें लगा हुआ हो, वह दुर्घटना आदिमें अचानक मर भी जाय तो भी वह भूत-प्रेत नहीं बनता । तात्पर्य है कि अन्तःकरणमें सांसारिक राग, आसक्ति, कामना, ममता आदि रहनेसे ही मनुष्यकी अधोगति होती है । जिसके अन्तःकरणमें सांसारिक राग आदि नहीं है, उसका शरीर किसी भी देशमें, किसी भी जगह किसी भी समय छूट जाय तो वह भूत-प्रेत नहीं बनता; क्योंकि भूत-प्रेतयोनिमें ले जानेवाली सामग्री ही उसमें नहीं होती ।

जो क्रोधमें आकर अथवा किसी बातसे दुःखी होकर आत्महत्या कर लेता है, वह दुर्गतिमें चला जाता है अर्थात् भूत-प्रेत-पिशाच बन जाता है । आत्महत्या करनेवाला महापापी होता है । कारण कि यह मनुष्य-शरीर भगवत्प्राप्तिके लिये ही मिला है; अतः भगवत्प्राप्ति न करके अपने ही हाथसे मनुष्य-शरीरको खो देना बड़ा भारी पाप है, अपराध है, दुराचार है । दुराचारीकी सद्‌गति कैसे होगी ? अतः मनुष्यको कभी भी आत्महत्या करनेका विचार मनमें नहीं आने देना चाहिये ।


मनुष्यपर कोई बड़ी भारी आफत आ जाय, कोई भयंकर रोग हो जाय तो वह यही सोचता है कि अगर मैं मर जाऊँ तो सब कष्ट मिट जायँगे । परन्तु वास्तवमें आत्महत्या करनेपर कर्मोंका भोग (कष्ट) समाप्त नहीं होता, उसको तो किसी-न-किसी योनिमें भोगना ही पड़ेगा । आत्महत्या करके वह एक नया पापकर्म करता है, जिसके फलस्वरूप उसको नीच योनिमें जाना पड़ेगा, भूत-प्रेत बनना पड़ेगा और हजारों वर्षोंतक दुःख पाना पड़ेगा ।

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