।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि–
फाल्गुन कृष्ण द्वादशी, वि.सं. २०७५ रविवार
अहंकार तथा उसकी निवृति
        


साधनभेदसे कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग–ये तीन भेद भी अहंकारके कारण ही होते हैं । साधक ज्यों-ज्यों साधनमें आगे बढ़ता है, त्यों-त्यों अहंकार मिटता जाता है और ज्यों-ज्यों अहंकार मिटता जाता है, त्यों-त्यों कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोगका भेद भी मिटता जाता है । कर्मयोगमें अहंकारके रहते हुए भी साधन किया जा सकता है, जो कर्मयोग सिद्ध होनेपर मिट जाता है । ज्ञानयोगमें अहंकार ब्रह्मके साथ मिल जाता है । भक्तियोगमें अहंकार भगवान् के अर्पित हो जाता है । तात्पर्य है कि कर्मयोगमें अहम् शुद्ध होता है, ज्ञानयोगमें अहम् मिटता है और भक्तियोगमें अहम् बदलता है । अहम् का शुद्ध होना, मिटना और बदलना – ये तीनों परिणाममें एक हो जाते हैं ।

कर्मयोग भौतिक साधना है, ज्ञानयोग आध्यात्मिक साधना है और भक्तियोग आस्तिक साधना है । भौतिक साधनामें ‘अकर्म’ की मुख्यता रहती है, आध्यात्मिक साधनामें ‘आत्मा’ की मुख्यता रहती है और आस्तिक साधनामें ‘परमात्मा’ की मुख्यता रहती है । इसलिये कर्मयोगी सम्पूर्ण कर्मोंमें एक अकर्म को देखता है – ‘कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः’ (गीता ४/१८); ज्ञानयोगी सम्पूर्ण प्राणियोंमें एक आत्माको देखता है – ‘सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि’ (गीता ६/२९); और भक्तियोगी सबमें एक परमात्माको देखता है अर्थात् अनुभव करता है – ‘यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति’ (गीता ६/३०) । अकर्म, आत्मा तथा परमात्मा – तीनों तत्वसे एक ही हैं । अतः ‘अकर्म’ में आत्मा भी है और परमात्मा भी है, ‘आत्मा’ में अकर्म भी है और परमात्मा भी है तथा ‘परमात्मा’ में अकर्म भी है और आत्मा भी है । तात्पर्य है कि अहंकारके कारण अकर्म, आत्मा और परमात्मा – ये तीन भेद होते हैं । तत्वमें ये तीन भेद नहीं हैं ।

अकर्मका अनुभव करनेसे कर्मयोगी कृतकृत्य हो जाता है अर्थात् उसके लिये कुछ करना शेष नहीं रहता । आत्माका अनुभव करनेसे ज्ञानयोगी ज्ञातज्ञातव्य हो जाता है अर्थात् उसके लिये कुछ जानना शेष नहीं रहता । परमात्माका अनुभव करनेसे भक्तियोगी प्राप्तप्राप्तव्य हो जाता है अर्थात् उसके लिये कुछ पाना शेष नहीं रहता ।


कृतकृत्य होनेसे कर्मयोगी ज्ञातज्ञातव्य और प्राप्तप्राप्तव्य भी हो जाता है, ज्ञातज्ञातव्य होनेसे ज्ञानयोगी कृतकृत्य और प्राप्तप्राप्तव्य भी हो जाता है तथा प्राप्तप्राप्तव्य होनेसे भक्तियोगी कृतकृत्य और ज्ञातज्ञातव्य भी हो जाता है । कृतकृत्य, ज्ञातज्ञातव्य और प्राप्तप्राप्तव्य होनेसे तादात्म्यवाला अहंकार सर्वथा नष्ट हो जाता है और तत्व रह जाता है अर्थात् अनुभवमें आ जाता है । फिर साधकोंके साधनोंका भेद नहीं रहता । साधक साधन होकर साध्य हो जाता है ।

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।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि–
फाल्गुन कृष्ण एकादशी, वि.सं. २०७५ शनिवार
विजया एकादशी-व्रत (सबका)
अहंकार तथा उसकी निवृति
        


जब मनुष्यमें भोग भोगने और संग्रह करनेकी प्रवृति अधिक हो जाती है, तब उसमें स्वार्थ और अभिमान आ जाते हैं, जो कि आसुरी सम्पत्ति है । स्वार्थ और अभिमान आनेसे उसका अहंकार आसुरी सम्पत्तिवाला हो जाता है – ‘अहंकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः’ (गीता १६/१८); ‘दम्भाहङ्कारसंयुक्ताः’ (गीता १७/५) । आसुरी सम्पत्तिवाला अहंकार भयंकर नरकोंमें ले जाता है – ‘पतन्ति नरकेऽशुचौ’ (गीता १६/१६)

अगर ऐसा मानें कि ज्ञान (मुक्ति) होनेपर आसुरी सम्पत्तिवाला अहंकार ही मिटता है, तादात्म्यरूप अहंकार नहीं मिटता तो यह मान्यता ठीक नहीं है । कारण कि आसुरी सम्पत्तिवाला अहंकार मिटनेसे नरकोंसे तो रक्षा होती है, पर मुक्ति नहीं होती । मुक्ति तो तादात्म्यरूप अहंकार मिटनेसे ही होती है । आसुरी सम्पत्तिवाला अहंकार तो तादात्म्यरूप अहंकारका ही स्थूल रूप है, जो जीवमात्रमें रहता है । इसी तादात्म्यरूप अहंकारको लक्ष्य करके भगवान् अर्जुनसे कहते हैं – ‘अथ चेत्त्वम् अहंकारात् न् श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि’ (गीता १८/५८); ‘यदहङ्कारमाश्रित्य न् योत्स्य इति मन्यसे’ (गीता १८/५९) ।


अहंकारकी उत्त्पत्ति अविद्यासे होती है – ‘अविद्यास्मितारागद्वेषाभिनिवेशाः क्लेशाः अविद्या क्षेत्रमुत्तरेषा¨¨¨¨¨¨  ̓ (योगदर्शन २/३-४)ज्ञान होने पर अविद्याका नाश हो जाता है । जब अविद्या नहीं रहेगी, तो फिर अविद्यासे होनेवाला अहंकार कैसे रहेगा ? जिस ज्ञानसे अविद्या न मिटे, वह ज्ञान कैसा ? वह तो सीखा हुआ ज्ञान है, अनुभव किया हुआ ज्ञान नहीं । अगर तादात्म्यरूप अहंकार नहीं मिटेगा तो जैसे बीजसे वृक्ष पैदा हो जाता है, ऐसे ही प्राकृत पदार्थ, व्यक्ति, क्रिया, परिस्थिति आदिका संग पाकर वह अहंकार भी आसुरी सम्पत्तिवाला हो जायेगा ।

गीतामें जहाँ ज्ञानके साधनोंका वर्णन हुआ है, वहाँ भगवान् ने अहंकारसे रहित होनेकी बात कही है – ‘अनहङ्‌कार एव च’ (गीता १३/८)जब साधकमें भी यह अहंकार दूर हो सकता है तो फिर सिद्ध होनेपर यह कैसे रहेगा ? सिद्ध होनेपर तो तादात्म्यरूप अहंकारका सर्वथा नाश हो जाता है । भगवान् ने कर्मयोगमें ‘निर्ममो निरहंकारः’ (गीता २/७१) पदोंसे, ज्ञानयोगमें ‘अहंकार¨¨¨विमुच्य निर्ममः’ (गीता १८/५३) पदोंसे और भक्तियोगमें ‘निर्ममो निरहंकारः’ (गीता १२/१३) पदोंसे तादात्म्यरूप अहंकारके नाशकी ही बात कही है ।


२. पारमार्थिक अहंकार

जब मनुष्यका उद्देश्य केवल सत्-तत्वको प्राप्त करनेका हो जाता है, तब वह उसकी प्राप्तिके लिये ‘मैं साधक हूँ’ – इस पारमार्थिक अहंकारको लेकर साधन करता है । ‘मैं साधक हूँ’ – यह अहंकार मुक्त्त करनेवाला है ।[1] अहम् में बैठी हुई बात निरन्तर रहती है । अतः ‘मैं साधक हूँ’ – ऐसा अहंकार दृढ़ होनेपर साधकके द्वारा निरन्तर साधन होता है ।

साधन करते समय तो वह साधक रहता ही है, सांसारिक कार्य करते समय भी वह साधक ही रहता है । इसीलिए वह जो भी सांसारिक कार्य करता है, वह अपने साधनके अनुरूप ही करता है । जैसे लोभी आदमी ऐसा कोई कार्य नहीं करता, जिससे धनका नाश हो, ऐसे ही वह साधक अपने साधनसे विरुद्ध कोई कार्य नहीं करता ।

साधककी साधनसे और साधनकी साध्यसे एकता होती है । इसीलिए जबतक साधक साधनमें तल्लीन नहीं होता, तबतक साध्य (परमात्मतत्व) की प्राप्ति नहीं होती । जबतक साधकमें अहंकार रहता है, तबतक वह साधनमें तल्लीन नहीं होता । अहंकार मिटनेपर साधक साधनमें तल्लीन हो जाता है अर्थात् साधक नहीं रहता, प्रत्युत साधनमात्र रह जाता है । साधनमात्र रहते ही साधन साध्यमें परिणत हो जाता है अर्थात् साध्यकी प्राप्ति हो जाति है ।



[1] ‘अस अभिमान जाइ जनि भोरे । मैं सेवक रघुपति पति मोरे ॥ʼ

दासोऽहं कौशलेन्द्रस्य’ – यह पारमार्थिक अहंकार है । वास्तवमें यह अहंकार नहीं है, प्रत्युत भगवान् पर दृढ़ विश्वास है और तादात्म्यरूप अहंकार का नाश करके मुक्ति देनेवाला है ।

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।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि–
फाल्गुन कृष्ण दशमी, वि.सं. २०७५ शुक्रवार
एकादशी-व्रत कल है
अहंकार तथा उसकी निवृति
        


सम्पूर्ण सृष्टि त्रिगुणात्मक है । श्रीमद्भागवतमें अहंकारको भी तीन प्रकार का बताया गया हैसात्त्विक, राजस और तामस । अतः सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुणके जितने भी भेद सृष्टिमें पाये जाते हैं, वे सब अहंकारमें ही हैं । जबतक व्यष्टि अहंकार रहता है, तबतक साधकोंमें और उनके साधनोंमें भेद रहता है । परन्तु तत्त्वकी प्राप्ति होनेपर भेद नहीं रहता । जबतक दार्शनिकोंमें और दर्शनशास्त्रका अध्ययन करनेवालोंमें किञ्चित् भी व्यष्टि अहंकार रहता है, तबतक दर्शनोंका भेद रहता है  ।[1] अहम्‌के कारण ही दार्शिनिकोंमें परस्पर विरोध और अपने-अपने मतका आग्रह (पक्षपात) रहता है, जिससे वे अपने मतका मण्डन और दूसरेके मतका खण्डन करते हैं । तात्पर्य है कि सूक्ष्म अहम् (आंशिक व्यक्तित्व) रहनेसे ही मतभेद होता है, तत्त्वमें मतभेद नहीं है । अहम्‌का अत्यन्त अभाव होनेपर भेद नहीं रहता, प्रत्युत तत्त्व रहता है । तत्त्वमें अहम् नहीं है और अहम्‌में तत्त्व नहीं है । अहम्‌से पृथक्ता पैदा होती है । जहाँ पृथक्ता है, वहाँ बोध कहाँ और जहाँ बोध है, वहाँ पृथक्ता कहाँ ?

मैं हूँ’–इसमें मैंजड़ है और हूँचेतन है । जड़की मुख्यतासे संसारकी इच्छा और चेतनकी मुख्यतासे परमात्माकी इच्छा उत्पन्न होती है । तात्पर्य है कि संसारकी इच्छामें मैंकी प्रधानता और परमात्माकी इच्छामें हूँकी प्रधानता रहती है । मैं (जड़) की प्रधानता होनेसे जीव संसारी होता है और हूँ (चेतन) की प्रधानता होनेसे जीव साधक होता है । अतः मुख्यरूपसे तादात्म्यरूप अहंकारके दो भेद हैं१. लौकिक अहंकार, जैसे–‘मैं संसारी हूँऔर २. पारमार्थिक अहंकार; जैसे–‘मैं साधक हूँ

१.   लौकिक अहंकार

जब मनुष्यका उद्देश्य असत् भोग और संग्रहको प्राप्त करनेका हो जाता है, तब उसमें मैं संसारी हूँ’–यह लौलिक अहंकार रहता है । ऐसा अहंकार दृढ़ होनेपर मनुष्य निरन्तर संसारी रहता है । सांसारिक कार्य करते समय तो वह संसारी रहता ही है, साधन करते समय भी वह संसारी ही रहता है । इसीलिए वह जो भी साधन करता है, वह कामनाको लेकर (कामनापूर्तिके लिये) ही करता है और वह साधन उसमें साधकपनका अभिमान बढ़ानेवाला होता है । अभिमान अहंकारका ही स्थूलरूप है ।



[1]न्याय, वैशेषिक, योग, सांख्य, पूर्वमीमांसा और उत्तरमीमांसाये छः आस्तिक (ईश्वरकी सत्ता माननेवाले) दर्शन हैं । न्यायदर्शन और वैशेषिक दर्शनमें भौतिकताकी प्रधानता है । योगदर्शन और सांख्यदर्शनमें भौतिक और अध्यात्मिक दोनोंका ही वर्णन है । पूर्वमीमांसामें स्वर्गादिकी प्राप्ति और उत्तरमीमांसा (वेदान्तदर्शन) में ब्रह्मकी प्राप्ति मुख्य है । इन दोनों दर्शनोंको मीमांसाकहनेका तात्पर्य है कि इनमे अपने विचार (दर्शन अर्थात् अनुभव) की मुख्यता नहीं है, प्रत्युत वैदिक मन्त्रोंपर विचारकी मुख्यता है । इन दोनोंमें वेदान्त-दर्शनके कई भेद हैं; जैसेअद्वैत, द्वैत, विशिष्टाद्वैत, शुद्धाद्वैत, द्वैताद्वैत, अचिन्त्यभेदाभेद आदि ।

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