।। श्रीहरिः ।।

  


आजकी शुभ तिथि–
     माघ शुक्ल चतुर्थी, वि.सं.-२०७८, शुक्रवार
        गीताकी अलौकिक शिक्षा


संसारमें अपने-अपने क्षेत्रमें जो मनुष्य दूसरोंके द्वारा मुख्य, श्रेष्ठ माने जाते हैं, उन आचार्य, गुरु, अध्यापक, व्याख्यानदाता, महन्त, शासक, मुखिया आदिपर दूसरोंको शिक्षा देनेकी, दूसरोंका हित करनेकी विशेष जिम्मेवारी रहती है । अतः उनके लिये गीता कहती है‒

यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः ।

स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥

(३/२१)

‘श्रेष्ठ मनुष्य जो-जो आचरण करता है, दूसरे मनुष्य वैसा-वैसा ही आचरण करते हैं और वह जो कुछ कहता है, दूसरे मनुष्य उसीके अनुसार करते हैं ।’

उपर्युक्त श्लोकमें श्रेष्ठ मनुष्यके आचरणके विषयमें तो ‘यत्-यत्’, ‘तत्-तत्’ और ‘एव’‒ये पाँच पद आये हैं, पर प्रमाण (वचन)-के विषयमें ‘यत्’ और ‘तत्’‒ये दो ही पद आये हैं । इसका तात्पर्य यह है कि मनुष्यके आचरणोंका असर दूसरोंपर पाँच गुना (अधिक) पड़ता है और वचनोंका असर दो गुना (अपेक्षाकृत कम) पड़ता है । जो मनुष्य स्वयं कर्तव्यका पालन न करके केवल अपने वचनोंसे दूसरोंको कर्तव्यपालनकी शिक्षा देता है, उसकी शिक्षाका लोगोंपर विशेष असर नहीं पड़ता । शिक्षाका लोगोंपर विशेष असर तभी पड़ता है, जब शिक्षा देनेवाला स्वयं भी निष्कामभावसे शास्त्र और लोककी मर्यादाके अनुसार चले । इसलिये भगवान्‌ अपना उदाहरण देते हुए कहते हैं कि यद्यपि मेरे लिये त्रिलोकीमें कुछ भी कर्तव्य और प्राप्तव्य नहीं है, तो भी मैं जहाँ जिस रूपसे अवतार लेता हूँ, वहाँ उस अवतारके अनुसार ही अपने कर्तव्यका पालन करता हूँ । यदि मैं निरालस्य होकर, सावधानीपूर्वक कर्तव्यका पालन न करूँ तो मुझमें श्रद्धा-विश्वास रखनेवाले दूसरे लोग भी वैसा ही करने लग जायँगे, अर्थात्‌ वे भी प्रमादमें, असावधानीसे अपने कर्तव्यकी उपेक्षा करने लग जायँगे, जिससे परिणाममें उनका पतन हो जायगा (३/२२-२३) ।

मनुष्यमात्रमें तीन कमियाँ होती हैं‒करनेकी कमी, जाननेकी कमी और पानेकी कमी । इन तीनों कमियोंको दूर करके अपना उद्धार करनेके लिये मनुष्यको तीन शक्तियाँ भी प्राप्त हैं‒करनेकी शक्ति, जाननेकी शक्ति और माननेकी शक्ति । इन तीनों शक्तियोंके रहते हुए भी मनुष्य केवल बेसमझी और सुखासक्तिके कारण अपनेमें कमीका दुःख भोगता है । यदि वह इन तीनों शक्तियोंका सदुपयोग करे तो अपनी कमियोंकी पूर्ति करके पूर्णताको प्राप्त कर सकता है, अपना मनुष्य जन्म सार्थक कर सकता है[*] निष्कामभावसे दूसरोंके हितके लिये कर्म (सेवा) करना ‘करनेकी शक्ति’ का सदुपयोग है, जो ‘कर्मयोग’ है । शरीरसे असंग होकर अपने स्वरूपमें स्थित होना ‘जाननेकी शक्ति’ का सदुपयोग है, जो ‘ज्ञानयोग’ है । भगवान्‌को अपना और अपनेको भगवान्‌का मानना ‘माननेकी शक्ति’ का सदुपयोग है, जो ‘भक्तियोग’ है । गीता इन तीनों ही योगमार्गोंकी शिक्षा देती है; जैसे‒

जो केवल यज्ञके लिये अर्थात्‌ निष्कामभावपूर्वक दूसरोंके हितके लिये कर्म करता है, वह कर्मयोगी कर्म-बन्धनसे छूट जाता है‒‘यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते’ (४/२३) । कारण कि शरीरादि पदार्थोंको अपना और अपने लिये न मानकर दूसरोंकी सेवामें लगानेसे इन पदार्थोंसे स्वतः सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है ।

जो सम्पूर्ण क्रियाओंको प्रकृतिके द्वारा होनेवाली देखता है और अपने-आपको किसी भी क्रियाका कर्ता नहीं देखता, उस ज्ञानयोगीको अपने स्वरूपका बोध हो जाता है ।[†]

जो संसारसे विमुख होकर केवल भगवान्‌की शरण हो जाता है और भगवान्‌के सिवाय कुछ भी नहीं चाहता, उसके उद्धारकी सम्पूर्ण जिम्मेवारी भगवान्‌पर ही आ जाती है । इसलिये भगवान्‌ स्वयं उस शरणागत भक्तके योगक्षेमका वहन करते हैं[‡], उसके सम्पूर्ण पापोंका नाश कर देते हैं[§], उसका मृत्युरूप संसार-समुद्रसे शीघ्र ही उद्धार कर देते हैं[**] और उसे तत्त्वज्ञान भी करा देते हैं[††]भक्तियोगमें यह विशेषता है कि भक्त भगवत्कृपासे भगवान्‌को तत्त्वसे जान भी जाता है, भगवान्‌के दर्शन भी कर लेता है और भगवान्‌को प्राप्त भी कर लेता है ।[‡‡]

इस प्रकार गीतामें ऐसी अनेक अलौकिक शिक्षाएँ दी गयी हैं, जिनके अनुसार आचरण करके मनुष्य सुगमतासे अपने परम लक्ष्य परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति कर सकता है ।

नारायण !     नारायण !!     नारायण !!!    

‒ ‘कल्याण-पथ’ पुस्तकसे



[*] एक विलक्षण बात है कि करनेकी कमी दूर होनेपर जानने और पानेकी कमी भी दूर हो जाती है, जाननेकी कमी दूर होनेपर करने और पानेकी कमी दूर हो जाती है तथा पानेकी कमी दूर होनेपर करने और जाननेकी कमी भी दूर हो जाती है ।

[†] तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः ।

   गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते ॥३ । २८॥

   नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति ।

   गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति ॥१४ । १९॥

   प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः ।

  यः पश्यति तथात्मानमकर्तारं स पश्यति ॥१३ । २९॥

[‡] अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते ।

  तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥ ९-२२॥

[§] सर्वधर्मान्परित्यज्य      मामेकं    शरणं   व्रज ।

   अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥ १८-६६॥

[**] तेषामहं  समुद्धर्ता      मृत्युसंसारसागरात् ।

   भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम् ॥ १२-७॥

[††] तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं           तमः ।

   नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता ॥ १०-११॥

[‡‡] भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन ।

  ज्ञातुं  द्रष्टुं  च  तत्त्वेन    प्रवेष्टुं  च  परन्तप ॥ ११-५४॥

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।। श्रीहरिः ।।

 


आजकी शुभ तिथि–
     माघ शुक्प्रल तृतीया, वि.सं.-२०७८, गुरुवार
        गीताकी अलौकिक शिक्षा


मैं सुख ले लूँ, मेरा आदर हो जाय, मेरी बात रह जाय, मुझे आराम मिले, दूसरा मेरी सेवा करे‒यह भाव महान्‌ पतन करनेवाला है । अर्जुनने भगवान्‌से पूछा कि मनुष्य न चाहता हुआ भी पाप क्यों करता है ? तो भगवान्‌ने कहा कि ‘मुझे मिले’ यह कामना ही पाप कराती है (३/३६-३७) । जहाँ व्यक्तिगत सुखकी कामना हुई कि सब पाप, सन्ताप, दुःख, अनर्थ आदि आ जाते हैं । इसलिये अपनी सामर्थ्यके अनुसार सबको सुख पहुँचाना है, सबकी सेवा करनी है, पर बदलेमें कुछ नहीं चाहना है । हमारे पास अपने कहलानेवाले जो बल, बुद्धि, योग्यता आदि है, उसे निष्कामभावसे दूसरोंकी सेवामें लगाना है ।

हमारे पास वस्तुके रहते हुए दूसरेको उस वस्तुके अभावका दुःख क्यों भोगना पड़े ? हमारे पास अन्न, जल और वस्त्रके रहते हुए दूसरा भूखा, प्यासा और नंगा क्यों रहे ?‒ऐसा भाव रहेगा तो सभी सुखी हो जायँगे । एक-दूसरेके अभावकी पूर्ति करनेकी रीति भारतवर्षमें स्वाभाविक ही रही है । खेती करनेवाला अनाज पैदा करता था तो वह अनाज देकर जीवन-निर्वाहकी सब वस्तुएँ ले आता था । उसे सब्जी, तेल, घी, बर्तन, कपड़ा आदि जो कुछ भी चाहिये, वह सब उसे अनाजके बदलेमें मिल जाता था । सब्जी पैदा करनेवाला सब्जी देकर सब वस्तुएँ ले आता था । इस प्रकार मनुष्य कोई एक वस्तु पैदा करता था और उसके द्वारा वह सभी आवश्यक वस्तुओंकी पूर्ति कर लेता था । पैसोंकी आवश्यकता ही नहीं थी । परन्तु अब पैसोंको लेकर अपनी आदत बिगाड़ ली । पैसोंके लोभसे अपना महान्‌ पतन कर लिया । पैसोंका संग्रह करनेकी ऐसी धुन लगी कि जीवन-निर्वाहकी आवश्यक वस्तुएँ मिलनी कठिन हो गयीं ! कारण कि वस्तुओंको बेच-बेचकर रुपये पैदा कर लिये और उनका संग्रह कर लिया । इस बातका ध्यान ही नहीं रहा कि रुपये पड़े-पड़े स्वयं क्या काम आयेंगे ! रुपये स्वयं किसी काममें नहीं आयेंगे, प्रत्युत उनका खर्च ही अपने या दूसरोंके काममें आयेगा । परन्तु अन्तःकरणमें पैसोंका महत्त्व बैठा होनेसे ये बातें सुगमतासे समझमें नहीं आतीं । पैसोंकी यह भूख भारतवर्षकी स्वाभाविक नहीं है, प्रत्युत कुसंगतिसे आयी है ।

एक मार्मिक बात है कि जो दूसरेका अधिकार होता है वही हमारा कर्तव्य होता है । जैसे दूसरेका हित करना हमारा कर्तव्य है और दूसरोंका अधिकार है । माता-पिताकी सेवा करना, उन्हें सुख पहुँचाना पुत्रका कर्तव्य है और माता-पिताका अधिकार है । ऐसे ही पुत्रका पालन-पोषण करना और उसे श्रेष्ठ, सुयोग्य बनाना माता-पिताका कर्तव्य है और पुत्रका अधिकार है । गुरुकी सेवा करना, उनकी आज्ञाका पालन करना शिष्यका कर्तव्य है और गुरुका अधिकार है । ऐसे ही शिष्यका अज्ञानान्धकार मिटाना, उसे परमात्मतत्त्वका अनुभव कराना गुरुका कर्तव्य है और शिष्यका अधिकार है । अतः मनुष्यको अपने कर्तव्यपालनके द्वारा दूसरोंके अधिकारकी रक्षा करनी है । दूसरोंका कर्तव्य और अपना अधिकार देखनेवाला मनुष्य अपने कर्तव्यसे च्युत हो जाता है । इसलिये मनुष्यको अपने अधिकारका त्याग करना है और दूसरेके न्याययुक्त अधिकारकी रक्षाके लिये यथाशक्ति अपने कर्तव्यका पालन करना है । दूसरोंका कर्तव्य देखना और अपना अधिकार जमाना इहलोक और परलोकमें पतन करनेवाला है । वर्तमानमें जो अशान्ति, कलह, संघर्ष देखनेमें आ रहा है, उसका मुख्य कारण यह है कि लोग अपने अधिकारकी माँग तो करते है, पर अपने कर्तव्यका पालन नहीं करते । इसलिये गीता कहती है‒

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।

(२/४७)

‘अपने कर्तव्यका पालन करनेमें ही तुम्हारा अधिकार है, उसके फलोंमें नहीं ।’

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।। श्रीहरिः ।।



आजकी शुभ तिथि–
     माघ शुक्ल प्रतिपदा, वि.सं.-२०७८, बुधवार
        गीताकी अलौकिक शिक्षा


प्राणिमात्रके परम सुहृद् भगवान्‌के मुखसे निःसृत ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ मनुष्यमात्रके कल्याणके लिये व्यवहारमें परमार्थकी अलौकिक शिक्षा देती है । कोई भी व्यक्ति (स्त्री, पुरुष) हो और वह किसी भी वर्णमें हो, किसी भी आश्रममें हो, किसी भी सम्प्रदायमें हो, किसी भी देशमें, किसी भी वेशमें हो, किसी भी परिस्थितिमें हो, वहीं रहते हुए ही वह परमात्मतत्त्वको प्राप्त कर सकता है । यदि वह निषिद्ध कर्मोंका सर्वथा त्याग कर दे और निष्कामभावसे विहित कर्मोंको करता रहे तो इसीसे उसे परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति हो जायगी‒

सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ ।

ततो युद्धाय युज्यस्व  नैवं पापमवाप्स्यसि ॥

(२/३८)

‘जय-पराजय, लाभ-हानि और सुख-दुःखको समान समझकर फिर युद्धमें लग जा । इस प्रकार युद्ध करनेसे तू पाप (बन्धन)-को प्राप्त नहीं होगा ।’

युद्धसे बढ़कर घोर परिस्थिति और क्या होगी ? जब युद्ध-जैसी घोर परिस्थितिमें भी मनुष्य अपना कल्याण कर सकता है, तो फिर ऐसी कौन-सी परिस्थिति होगी, जिसमें रहते हुए मनुष्य अपना कल्याण न कर सके ?

सुख-दुःख, हानि-लाभ आदि सब आते हैं और चले जाते हैं, पर हम ज्यों-के-त्यों ही रहते हैं । अतः समतामें हमारी स्थिति स्वतः-स्वाभाविक है । उसी समताकी ओर गीता लक्ष्य करा रही है कि ये जो तरह-तरहकी परिस्थितियाँ आ रही हैं, उनके साथ मिलो मत, उनमें प्रसन्न-अप्रसन्न मत होओ, प्रत्युत उनका सदुपयोग करो । अनुकूल परिस्थिति आ जाय तो दूसरोंको सुख पहुँचाओ, दूसरोंकी सेवा करो और प्रतिकूल परिस्थिति आ जाय तो सुखकी इच्छाका त्याग करो । गीता कितनी अलौकिक शिक्षा देती है‒

परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ ।

(३/११)

‘एक-दूसरेको उन्नत करते हुए तुमलोग परम कल्याणको प्राप्त हो जाओगे ।’

सभी एक-दूसरेके अभावकी पूर्ति करें, एक-दूसरेको सुख पहुँचायें, एक-दूसरेका हित करें तो अनायास ही सबका कल्याण हो जाय‒‘ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः’ (१२/४) । इसलिये दूसरोंका हित करना है, दूसरेको सुख देना है, दूसरेको आदर देना है, दूसरेकी बात रखना है, दूसरेको आराम देना है, दूसरेकी सेवा करनी है । दूसरा हमारी सेवा करे या न करे, इसकी परवाह नहीं करनी है अर्थात्‌ हमें दूसरेका कर्तव्य नहीं देखना है, प्रत्युत निष्कामभावसे अपने कर्तव्यका पालन करना है; क्योंकि दूसरेका कर्तव्य देखना हमारा कर्तव्य नहीं है । यहाँ एक खास बात समझनेकी है कि हमें मिलनेवाली वस्तु, परिस्थिति आदि दूसरे व्यक्तिके अधीन नहीं है, प्रत्युत प्रारब्धके अधीन है । प्रारब्धके अनुसार जो वस्तु, परिस्थिति आदि हमें मिलनेवाली है, वह न चाहनेपर भी मिलेगी । जैसे न चाहनेपर भी प्रतिकूल परिस्थिति अपने-आप आती है, ऐसे ही अनुकूल परिस्थिति भी अपने-आप आयेगी । दूसरे व्यक्तिको भी वही मिलेगा, जो उसके प्रारब्धमें है, पर हमें उसकी ओर न देखकर अपने कर्तव्यकी ओर देखना है अर्थात्‌ अपने कर्तव्यका पालन (सेवा) करना है । दूसरी बात, हमारी सेवाके बदलेमें दूसरा हमारी भी सेवा करेगा तो हमारी सेवाका मूल्य कम हो जायगा; जैसे‒हमने दूसरेको दस रुपये दिये और उसने हमें पाँच रुपये लौटा दिया तो हमारा देना आधा ही रह गया ! अतः यदि दूसरा बदलेमें हमारी सेवा न करे तो हमारा बहुत जल्दी कल्याण होगा । यदि दूसरा हमारी सेवा करे अथवा हमें दूसरेसे सेवा लेनी पड़ी तो उसका बड़ा उपकार मानें, पर उसमें प्रसन्न न हो । प्रसन्न (राजी) होना भोग है और भोग दुःखका कारण है‒‘ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते’ (५/२२) ।

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।। श्रीहरिः ।।



आजकी शुभ तिथि–
     माघ अमावस्या, वि.सं.-२०७८, मंगलवार
                सेवा (परहित)


सेवाके लिये वस्तुकी कामना करना गलती है । जो वस्तु मिली हुई है, उसीसे सेवा करनेका अधिकार है ।

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संसारमें दूसरोंके लिये जैसा करोगे, परिणाममें वैसा ही अपने लिये हो जायगा । इसलिये दूसरोंके लिये सदा अच्छा ही करो ।

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जो अपने स्वार्थ और अभिमानका त्याग करके केवल दूसरोंके हितमें लगा है, उसका जीना ही वास्तवमें जीना है ।

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जो सेवा लेना चाहते हैं, उनके लिये तो वर्तमान समय बहुत खराब है, पर जो सेवा करना चाहते हैं, उनके लिये वर्तमान समय बहुत बढ़िया है ।

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हमारी किसी भी क्रियासे किसीको किंचिन्मात्र भी दुःख न हो‒यह भाव सेवाहै ।

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निःस्वार्थभावसे दूसरोंकी सेवा करनेसे व्यवहार भी बढ़िया होता है और ममता भी टूट जाती है ।

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घरवालोंकी सेवा करनेसे मोह होता ही नहीं । मोह होता है कुछ-न-कुछ लेनेकी इच्छासे ।

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भगवान्‌को प्राप्त करके मनुष्य संसारका जितना उपकार कर सकता है, उतना किसी दान-पुण्यसे नहीं कर सकता ।

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जो हमसे द्वेष रखता है, उसकी सेवा करनेसे अधिक लाभ होता है; क्योंकि वहाँ सेवाका सुखभोग नहीं होता ।

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कभी सेवाका मौका मिल जाय तो आनन्द मनाना चाहिये कि भाग्य खुल गया !

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सम्पूर्ण प्राणियोंके हितसे अलग अपना हित माननेसे अहम् बना रहता है, जो साधकके लिये आगे चलकर बाधक होता है । अतः साधकको प्रत्येक क्रिया संसारके हितके लिये ही करनी चाहिये ।

   

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