।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि
भाद्रपद शुक्ल पंचमी, वि.सं.२०७२, शुक्रवार
ऋषिपंचमी
प्रवचन‒११


तत्त्वकी प्राप्ति हो जाय और होते ही वह दृढ़ हो जाय ऐसी बात बतायी जाती है । बिलकुल सबके अनुभवकी बात है । जड़ प्रकृति परिवर्तनशील है और चेतन परमात्मतत्त्वमें कभी परिवर्तन नहीं होता । वह सदा ज्यों-का-त्यों रहता है । न बदलनेवालेका और निरन्तर बदलनेवालेका‒दोनोंका हमें अनुभव है । बचपनसे लेकर अभीतक मैं वही हूँ‒इसमें ‘मैं वही हूँ’ यह अनुभव न बदलनेवालेका है । संसार, शरीर, मनोवृत्ति, भाव, घटना, परिस्थिति, अवस्था आदि बदलनेवाले हैं । यह सबका अनुभव है । परन्तु उन बदलनेवालेको जाननेवाले हम नहीं बदलते । बदलनेवालेमें जब हम स्थित रहते हैं, तब हमें सुख और दुःख होता है‒‘पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते ।’ (गीता १३ । २०) अर्थात् पुरुष सुख-दुःखके भोगनेमें हेतु होता है । कौन-सा पुरुष ? ‘पुरुषः प्रकृतिस्थो हि’ (गीता १३ । २१) अर्थात् प्रकृतिमें स्थित पुरुष ही भोक्ता बनता है । जो हमारी मनोवृत्ति बदलती है, हमारी अवस्था बदलती है, हमारी दशा बदलती है, हमारे भाव बदलते है, हमारी क्रियाएँ बदलती है, हमारी परिस्थितियाँ बदलती है‒इन बदलनेवालोमें जब हम स्थित होते हैं, तब हम प्रकृतिमें स्थित होते है । मनमें जो काम-क्रोध, हर्ष-शोक, राग-द्वेष आदि वृत्तियाँ पैदा होती हैं, उनमें जब हम स्थित होते है, तब हम पराधीन होते है और सुख-दुःखका भोग करते है ।

वास्तवमें एक दुःखके ही दो नाम सुख और दुःख है । जैसे दादकी बीमारी एक है पर उसीके दो नाम खुजली और जलन है । खुजली अच्छी लगती है और जलन बुरी लगती है तो जो अच्छी लगती है वह भी बीमारी है, जो बुरी लगती है वह भी बीमारी है । ऐसे ही बदलनेवालेके साथ मिलकर जो हम सुखी और दुःखी होते है, यह भी एक बीमारी है । बीमारीका मतलब यह कि हम अपने स्वरूपमें स्थित (स्वस्थ) नहीं है, प्रकृतिमें स्थित है । जब हम बदलनेवाली वृत्तियोंमें, भावोंमें, क्रियाओंमें स्थित नहीं होते, इनसे अलग रहते है, तब हम स्वस्थ रहते है । तब हम सुख-दुःखमें समान रहते है‒‘समदुःखसुखः स्वस्थः’ (गीता १४ । २४) सम्पूर्ण अवस्थाओं, दशाओं, परिस्थितियों और घटनाओंमें हम रहते हैं, यह हमारा अनुभव है । अगर ऐसा नहीं हो तो सम्पूर्ण अवस्थाओं, दशाओं आदिका ज्ञान हमें कैसे होता ? हमें इनका ज्ञान होता है, इससे सिद्ध होता है कि हम रहते है । हमें जाग्रत् स्वप्न, सुषुप्ति, मूर्च्छा, समाधिका ज्ञान होता है । सुख-दुःखका भी ज्ञान होता है । शोक, मोह, चिन्ता, राग, द्वेष आदिका भी हमें ज्ञान होता है तो हम शोक, मोह, चिन्ता, भय, उद्वेग आदिसे रहित है । अगर ऐसा नहीं है तो हमें सुखका अनुभव होगा, दुःखका अनुभव नहीं होगा, हम शोकमें ही रात-दिन रहते हैं तो प्रसन्नताका हमें अनुभव नहीं होगा । परंतु ऐसा है नहीं । अनुकूलता-प्रतिकूलताको लेकर ठीक और बेठीक‒दोनोंका ज्ञान हमें होता है तो वास्तवमें हम ठीक-बेठीकसे ऊँचे है । इस निर्द्वन्द्वतामें हम स्थित हो जायँ तो सुगमतासे मुक्त हो जायँ‒‘निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते ॥’ (गीता ५ । ३)

   (शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒‘साधकोंके प्रति’ पुस्तकसे

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।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि
भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी, वि.सं.२०७२, गुरुवार
श्रीविश्वकर्मापूजा, चन्द्रदर्शन निषिद्ध
प्रवचन‒१०


(गत ब्लॉगसे आगेका)
दुःखदायी परिस्थितिका सदुपयोग है‒सुखकी इच्छाका त्याग करना । सुखकी इच्छासे ही दुःख होता है । सुखकी इच्छाका त्याग कर दे तो दुःख होगा ही नहीं । जैसे, बीमार होनेपर, ‘मैं स्वस्थ हो जाऊँ’ ऐसी इच्छा रहनेसे ही दुःख होता है । यदि बीमारीको भगवान्की भेजी हुई तपस्या मानें तो दुःख नहीं होगा । एक व्यक्ति व्रत रखनेके कारण अन्न नहीं खाता और एक व्यक्तिको अन्न नहीं मिलता तो व्रत रखनेवालेको अन्न न मिलनेका दुःख नहीं होता; क्योंकि उसमें अन्न खानेकी इच्छा ही नहीं है । परन्तु अन्न खानेकी इच्छा रहनेपर अन्न न मिले तो दुःख होता है ।

प्रतिकूल-से-प्रतिकूल परिस्थिति आ जाय तो उससे एक तो पापोंका नाश होता है और एक नया विकास होता है । परन्तु दुःखसे दुःखी होनेपर विकास रुक जाता है । सुख आनेपर तो साधनमें बाधा आ सकती है, पर दुःख आनेपर बाधा आ ही नहीं सकती; क्योंकि दुःख अटकानेवाला नहीं है । इसलिये सुख आये या दुःख, नफा हो या घाटा, बीमारी आये या स्वस्थता, आदर हो या निरादर, प्रशंसा हो या निन्दा, प्रत्येक परिस्थितिमें साधकको समान रहना चाहिये । ऐसा सुख आ जाय, इतना नफा हो जाय, ऐसी प्रशंसा हो जाय आदिकी इच्छा रखनेसे वैसा तो होता नहीं, वह मुफ्तमें दुःख पाता रहता है । सुखदायी परिस्थितिमें सुखी होना भी भोग है और दुःखदायी परिस्थितिमें दुःखी होना भी भोग है । परन्तु दोनों परिस्थितियोंका सदुपयोग किया जाय तो भोग नहीं होगा, अपितु योग होगा अर्थात् उसके द्वारा परमात्मासे सम्बन्ध हो जायगा । भोगी व्यक्ति योगी नहीं हो सकता ।

दुःखदायी परिस्थितिमें भगवान्की स्मृति आयेगी, दूसरेका दुःख कैसा होता है‒इसका अनुभव होगा और दयाका भाव आयेगा । वास्तवमें दुःखदायी परिस्थिति पापोंका फल नहीं, सुखकी इच्छाका फल है । मूल बात तो यही है । दुःखदायी परिस्थितिको भले ही पापोंका फल मान लें, पर दुःखदायी परिस्थितिमें जो सुखकी इच्छा होती है; वह पापोंका फल नहीं, पापोंका कारण है । सुखकी इच्छा ही ‘काम’ है, जिससे सम्पूर्ण पाप होते है (गीता ३ । ३६-३७) । सुख भोगनेसे सुखेच्छा बढ़ती है और सुखेच्छा बढ़नेसे दुःख बढ़ता है । सुखेच्छाका त्याग करनेका उपाय है‒दूसरोंको सुख पहुँचानेका भाव । जैसे, हमारे पास अधिक धन है तो निर्धनोंको सुख कैसे हो ? हमारे पास विद्या अधिक है तो विद्याहीनोंको सुख कैसे हो ? हमारे पास जो भी सुखदायी सामग्री है, वह अपने भोगनेके लिये नहीं है । वह दूसरोंकी सेवा करनेके लिये ही है; दूसरोंके सेवामें लगाना ही उस सामग्रीका सदुपयोग है । सुख और दुःख सदुपयोग करनेसे ही मिटेंगे, भोगनेसे नहीं । सदुपयोग करनेसे हम सुख और दुःख दोनोंसे ऊँचे उठ जायँगे अर्थात् हमारा कल्याण हो जायगा । इसलिये प्रत्येक परिस्थिति हमारे कल्याणका साधन है । कारण कि भगवान्ने मनुष्यजन्म जीवके उद्धारके लिये दिया है । अतः उसे जो सामग्री दी है, वह कल्याणके लिये ही दी है ।

  करी गोपाल की सब होई ।
  जो अपनौं पुरुषारथ मानत,   अति  झूठौ  है सोई ॥
  साधन, मन्त्र, जन्त्र, उद्यम, बल, ये सब डारौ धोई ।
  जो कछु लिखिव राखी नँदनंदन मेटि सकै नहि कोई ॥
  दुख-सुख, लाभ-अलाभ समुझि तुम, कतहिं मरत हौ रोई ।
  सूरदास   स्वामी  करुनामय,    स्याम-चरन  मन  पोई ॥

नारायण !     नारायण !!     नारायण !!!

‒‘साधकोंके प्रति’ पुस्तकसे

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।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि
भाद्रपद शुक्ल तृतीया, वि.सं.२०७२, बुधवार
हरितालिका-व्रत
प्रवचन‒१०


(गत ब्लॉगसे आगेका)
एक शंका होती है कि हम पहले ही अपने दुःखसे दुःखी हैं, फिर दूसरेके दुःखसे भी दुःखी होने लगें तो हम तो हरदम रोनेमें ही रहे ! हमारा दुःख फिर कभी मिटेगा ही नहीं; क्योंकि संसारमें दुःखी तो मिलते ही रहेंगे ! इसका समाधान यह है कि जैसे हमारे ऊपर कोई दुःख आनेसे हम उसे दूर करनेकी चेष्टा करते है, वैसे ही दूसरेको दुःखी देखकर अपनी शक्तिके अनुसार उसका दुःख दूर करनेकी चेष्टा होनी चाहिये । उसका दुःख दूर करनेकी सच्ची भावना होनी चाहिये । अतः दूसरेके दुःखसे दुःखी होनेका तात्पर्य उसके दुःखको दूर करनेका भाव तथा चेष्टा करनेसे है, जिससे हमें प्रसन्नता ही होगी, दुःख नहीं । दूसरेके दुःखसे दुःखी होनेपर अपने पास शक्ति, योग्यता, पदार्थ आदि जो कुछ भी है, वह सब स्वतः दूसरेका दुःख दूर करनेमें लग जायगा । दुःखी व्यक्तिको सुखी बना देना तो हमारे हाथकी बात नहीं है पर उसका दुःख दूर करनेके लिये अपनी सुख-सामग्रीको उसके अर्पित कर देना हमारे हाथकी बात है । इस प्रकार सुख-सामग्रीके त्यागसे तत्काल शान्तिकी प्राप्ति होती है‒‘त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्’ (गीता १२ । १२)

पातञ्जलयोगदर्शन में आया है‒‘मैत्रीकरुणामुदि-तोपेक्षाणां सुखदुःखपुण्यापुण्यविषयाणां भावनातश्चि-त्तप्रसादनम् ।’ (१ । ३३) अर्थात् सुखीके साथ मैत्री, दुःखीके साथ करुणा, पुण्यात्माके साथ प्रसन्नता और पापात्माके साथ उपेक्षाकी भावना रखनेसे चित्त निर्मल होता है ।

परंतु गीताने इन चारों बातोंको दोंमें बाँट दिया है‒‘मैत्रः करुण एक च’ (१२ । १३) । तात्पर्य यह कि सुखी और पुण्यात्माको देखकर मैत्री हो एवं दुःखी और पापात्माको देखकर करुणा हो । पापात्माकी उपेक्षासे उतना लाभ नहीं होता, जितना करुणासे होता है । मैत्री और करुणाके भावसे अन्तःकरण निर्मल हो जाता है । सुखीको देखकर ईर्ष्या करनेसे और दुःखीको देखकर अभिमान करनेसे अन्तःकरण मैला हो जाता है । पापात्मासे घृणा-द्वेष करनेपर भी अन्तःकरण मैला हो जाता है । हमारे सामने चाहे जैसी परिस्थिति, अवस्था, देश, काल, व्यक्ति, वस्तु आदि आये, वह सब-की-सब परमात्माकी प्राप्तिमें साधन-सामग्री है । यदि मनुष्य उसका सदुपयोग करनेकी विद्या सीख जाय तो फिर उसका कल्याण निश्चित है ।

कैसी ही परिस्थिति क्यों न हो, उसका सदुपयोग करना चाहिये । यदि सदुपयोग करना न आये तो सत्-शास्त्रोंमें देखे, संत-महापुरुषोंसे पूछे, स्वयं विचार करे, भगवान्‌को याद करे और उनसे प्रार्थना करे तो सद्बुद्धि पैदा हो जायेगी । उसके अनुसार आचरण करनेसे उद्धार हो जायेगा । गीता हमें सिखाती है‒

सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ ।
ततो युद्धाय युज्यस्व  नैवं पापमवाप्स्यसि ॥
                                                    (२ । ३८)

‘जय-पराजय, लाभ-हानि और सुख-दुःखको समान समझकर, उसके बाद युद्धके लिये तैयार हो जा, इस प्रकार युद्ध करनेसे तू पापको नहीं प्राप्त होगा ।’

युद्धसे भी क्रूर कर्म और क्या होगा ? पर वह भी जय-पराजय आदिमें सम होकर किया जाय, तो कल्याण करनेवाला हो जाता है । परन्तु प्रत्येक कर्म शास्त्रकी मर्यादाके अनुसार होना चाहिये । प्रत्येक परिस्थितिमें हमारे सामने दो ही चीजें आती हैं‒कर्म और उसका फल । अतः प्रत्येक कर्तव्य कर्म शास्त्रकी आज्ञाके अनुसार स्वार्थ और अभिमानका त्याग करके केवल दूसरोंके हितके लिये करें और फल (सुख-दुःखादि) में सम रहें । ऐसा करनेसे परमात्मामें अपनी स्वतःसिद्ध स्थितिका अनुभव हो जायगा ।

   (शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒‘साधकोंके प्रति’ पुस्तकसे

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।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि
भाद्रपद शुक्ल द्वितीया, वि.सं.२०७२, मंगलवार
प्रवचन‒१०


मनुष्यका कल्याण किसी परिस्थितिके अधीन नहीं है, अपितु उसके सदुपयोगमें है । कैसी ही प्रतिकूल परिस्थिति क्यों न हो, उसमें वह अपना कल्याण कर सकता है । मनुष्य परिस्थितिको बदलनेका प्रयास अधिक करता है कि निर्धनता चली जाय और धनवत्ता आ जाय, मूर्खता चली जाय और विद्वत्ता आ जाय, रोग चला जाय और नीरोगता आ जाय, इत्यादि । इसीमें उसका बहुत समय चला जाता है । परंतु कल्याण करनेके लिये ‘प्राप्त परिस्थितिका सदुपयोग कैसे किया जाय’‒इसपर विचार करें तो बहुत लाभ होगा ।

संसारमें ऐसी कोई भी परिस्थिति नहीं है कि जिसमें जीवका कल्याण न हो सकता हो । कारण कि परमात्मा किसी भी परिस्थितिमें कम या अधिक, समीप या दूर नहीं है, अपितु प्रत्येक परिस्थितिमें समानरूपसे विद्यमान हैं । अतः प्रत्येक परिस्थिति परमात्माकी प्राप्तिमें साधक हो सकती है, बाधक नहीं । मनुष्य-जन्म परमात्माकी प्राप्तिके लिये ही मिला है और किन्हीं दो मनुष्योंकी भी परिस्थिति समान नहीं रहती । इसलिये किसी एक परिस्थितिमें ही परमात्माकी प्राप्ति होती हो तो सब मनुष्योंका कल्याण हो सकता है‒यह बात नहीं कही जाती, अपितु यह कहते कि किसी एकका ही कल्याण होगा । अतः साधकको प्रत्येक परिस्थितिका सदुपयोग करना चाहिये । सदुपयोगके लिये पहले परिस्थितिको देखे कि वह हमारे अनुकूल है या प्रतिकूल ? यदि प्रतिकूल है, तो उसमें अनुकूलताकी इच्छाका त्याग करना है । प्रतिकूल परिस्थिति दुःखदायी तभी होती है, जब सुखदायी परिस्थितिकी इच्छा करते है । इसलिये यदि सुखदायी परिस्थिति-(अनुकूलता-) की इच्छाका त्याग करें तो दुःखदायी परिस्थिति (प्रतिकूलता) विकासका कारण हो जायगी । ऐसे ही सुखदायी परिस्थिति आये तो उसके सुख-भोगका और ‘वह बनी रहे’ ऐसी इच्छाका त्याग करना है; क्योंकि वह रहनेवाली है ही नहीं । उसका सुख स्वयं न भोगकर उसके द्वारा दूसरोंकी सेवा करनी है; क्योंकि अनुकूल परिस्थिति दूसरोंकी सेवाके लिये ही है, अपने सुखभोगके लिये नहीं ।

एहि तन कर फल बिषय न भाई ।
स्वर्गउ   स्वल्प   अंत    दुखदाई ॥
                                  (मानस ७ । ४३ । १)

‘त्याग’ अर्थात् सुखका भोग नहीं करना और ‘सेवा’ अर्थात् दूसरोंको सुख पहुँचाना‒ये दोनों ही चीजें कल्याण करनेवाली हैं, जिसे प्रत्येक मनुष्य कर सकता है । त्यागमें सेवा होती है और सेवामें त्याग होता है ।

मनुष्य दुःखदायी परिस्थितिमें भी दूसरोंकी सेवा कर सकता है, दूसरोंको सुख पहुँचा सकता है । कोई कहे कि मेरे पास पैसे नहीं हैं, तो दूसरेको सुख कैसे पहुँचाऊँ ! तो पैसोंसे ही दूसरोंको सुख पहुँच सकता हो‒ऐसी बात नहीं है । हमारे हृदयमें दूसरोंको सुख पहुँचानेका भाव होना चाहिये । दूसरा दुःखी है तो उसके साथ हम भी हृदयसे दुःखी हो जायँ कि उसका दुःख कैसे मिटे ? उससे प्रेमपूर्वक बात करें और सुनें । उससे कहें कि दुःखदायी परिस्थिति आनेपर घबराना नहीं चाहिये; ऐसी परिस्थिति तो भगवान् राम एवं नल, हरिश्चन्द्र आदि अनेकों बड़े-बड़े पुरुषोंपर भी आयी है; आजकल तो अनेक लोग तुम्हारेसे भी अधिक दुःखी है; हमारे लायक कोई काम हो तो कहना, इत्यादि । ऐसी बातोंसे वह राजी हो जायगा । ऐसे ही सुखी व्यक्तिसे मिलकर हम भी हृदयसे सुखी हो जायँ कि बहुत अच्छा हुआ तो वह राजी हो जायेगा । इस प्रकार हम सुखी और दुःखी‒दोनों व्यक्तियोंकी सेवा कर सकते हैं । दूसरेके सुख और दुःख‒दोनोंमें सहमत होकर हम दूसरेको सुख पहुँचा सकते है । केवल दूसरोंके हितका भाव ‘सर्वभूतहिते रताः’ निरन्तर रहनेकी आवश्यकता है । जो दूसरोंके दुःखसे दुःखी और दूसरोंके सुखसे सुखी होते है, वे संत होते हैं‒‘पर दुख दुख सुख सुख देखे पर’ (मानस ७ । ३७ । १)

   (शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒‘साधकोंके प्रति’ पुस्तकसे

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आजकी शुभ तिथि
भाद्रपद शुक्ल प्रतिपदा, वि.सं.२०७२, सोमवार
प्रवचन‒९


(गत ब्लॉगसे आगेका)
स्वयं (स्वरूप) परमात्मासे अभिन्न है, परंतु संसार और शरीरसे सम्बन्ध माननेके कारण परमात्मासे भिन्नता प्रतीत होती है । अतः संसार और शरीरसे विमुख हो जायँ कि यहमैंनहीं औरमेरानहीं; औरमैंप्रभुका हूँ और प्रभु ‘मेरे’ हैं‒इस प्रकार परमात्माके सम्मुख हो जायँ । सम्मुख होते ही उनसे अभिन्नता हो जाती है । अभिन्नताके बाद फिर बड़ा विचित्र आनन्द है । वह (द्वैत) अद्वैतसे भी सुन्दर है‒‘भक्त्यर्थं कल्पितं द्वैतमद्वैतादपि सुन्दरम्’ । वहाँ केवल आनन्द-ही-आनन्द है, मस्ती-ही-मस्ती है । उसे प्राप्त करना चाहें तो अभी कर सकते है । प्राप्त क्या करना है, वह तो प्राप्त ही है । केवल दृष्टि उधर करनी है । इतनी सीधी, सरल और श्रेष्ठ बात कोई नहीं है । गीतामें भगवान् कहते हैं‒

भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः ।
ततो  मां  तत्त्वतो  ज्ञात्वा   विशते  तदनन्तरम् ॥
                                                        (१८ । ५५)

‘पराभक्तिके द्वारा वह मुझ परमात्माको, मैं जो हूँ और जितना हूँ, ठीक वैसा-का-वैसा तत्त्वसे जान लेता है तथा उस भक्तिसे मुझे तत्त्वसे जानकर तत्काल ही मुझमें प्रविष्ट हो जाता है ।’

‘विशते तदनन्तरम्’ पदोंका यह अभिप्राय है कि भगवान्को तत्त्वसे जानने अर्थात् उनका अनुभव होनेके बाद फिर उनसे अभिन्न होनेमें एक क्षणका भी अन्तर नहीं पड़ता । शरीर-संसारसे माना हुआ सम्बन्ध छूटते ही ज्यों-के-त्यों विद्यमान परमात्माका अनुभव हो जाता है । उनका अनुभव होते ही तत्काल भिन्नता मिट जाती है । वास्तवमें भिन्नता है ही नहीं, तभी वह मिटती है । यदि वास्तवमें भिन्नता होती, तो उस (सत्‌) का अभाव कैसे होता ?

असत् (संसार) में जो आकर्षण या प्रियता है, वह ‘आसक्ति’ कहलाती है । वही आकर्षण भगवान्में हो जाय, तो उसे ‘भक्ति’ या ‘प्रेम’ कहते हैं । धनमें, भोगोंमें, परिवार आदिमें जो हमारा खिंचाव है, वह खिंचाव भगवान्की तरफ होते ही भक्ति हो जाती है । वास्तवमें अपनेमें भक्तिका संस्कार‒भगवान्का खिंचाव स्वतः है, पर असत्से सम्बन्ध जोड़नेसे असत्की ओर खिंचाव हो गया । लक्ष्य (परमात्मा) की प्राप्ति होनेपर असत्का खिंचाव सर्वथा मिट जाता है ।

अब के सुलताँ फनियान समान हैं,
बाँधत पाग अटब्बर की ।
तजि एकहिं दूसरे को जो भजै,
कटि जीभ गिरै वा लब्बर की ॥
सरनागति ‘श्रीपति’ श्रीपतिकी,
नहिं त्रास है काहुहि जब्बर की ।
जिनको हरि की परतीति नहीं,
सो करौ मिलि आस अकब्बर की ॥

नारायण !     नारायण !!     नारायण !!!

‒‘साधकोंके प्रति’ पुस्तकसे

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।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि
भाद्रपद अमावस्या, वि.सं.२०७२, रविवार
प्रवचन‒९


(गत ब्लॉगसे आगेका)
जहाँ साधक ‘मैं हूँ’ मानता है, वहाँ भगवान् उससे भी अधिक सूक्ष्मरूपसे विराजमान है । ‘मैं हूँ’ क्षेत्रज्ञ अर्थात् क्षेत्र (शरीर) को जाननेवाला (गीता १३ । १) और भगवान् कहते है कि सब क्षेत्रोंमें क्षेत्रज्ञ मैं ही हूँ‒‘क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत ।’ (गीता १३ । २) । तात्पर्य यह कि क्षेत्रज्ञ तो केवल एक शरीरके साथ सम्बन्ध रखनेवाला है पर क्षेत्रज्ञमें जो परमात्मा है, उनका किसी शरीरके साथ सम्बन्ध नहीं है और सबमें परिपूर्ण होनेके कारण उनका सबसे सम्बन्ध है ! वे ही वास्तवमें अपने है । हम जिस शरीरको अपना मानते है, वह कभी अपना था नहीं, है नहीं और रहेगा नहीं । पर परमात्मा अपने थे, अपने है और अपने रहेंगे । वे अपनेसे कभी विमुख नहीं हुए । हम ही उनसे विमुख हुए है । वे परमात्मा बड़े मधुर है, बड़े प्रिय है और वे अपनेमें हैं‒ऐसा माननेपर वे याद किये बिना ही याद रहेंगे, भजन किये बिना ही उनका भजन होगा, चिन्तन किये बिना ही उनका चिन्तन होगा । उनमें स्वतः ऐसी प्रियता होगी, जैसी अपने शरीरमें और अपने जीते रहनेमें भी नहीं है ।

‘मैं हूँ’ में जो हूँहै, वह शरीरको लेकर है । उस हूँमें ‘है’ रूपसे परमात्मा ही है । तू है, यह है, वह है‒सब जगह परमात्मा ही ‘है’-रूपसे विद्यमान है । जड़ और चेतनमें, स्थावर और जंगममें, उत्पत्ति, स्थिति और विनाशमें, भाव और अभावमें‒सब जगह वे परमात्मा ज्यों-के-त्यों है । साधक यदि ‘हूँ’ का त्याग कर दे अर्थात् मैं’ (अहंता) को मिटाकर सामान्य सत्तामें स्थित हो जाय (जो वास्तवमें है) और हूँरूपसे विद्यमान परमात्माको अपना मान ले, तो फिर उनकी विस्मृति नहीं होगी । जप-ध्यानादि भी स्वतः होंगे, करने नहीं पड़ेंगे । अपनेमें प्रभु स्वतः है, बनावटी नहीं है । जो अपनेमें स्वतः है, उसकी ओर दृष्टि करनेमें देरी किस बातकी ? अपनेमें प्रभुको देखनेवाला कौन है ? जो क्षेत्रको देखता था, वही अपनेमें प्रभुको देखता है । जिसका अंश है, उसीको देखता है । अपने अंशीको देखते ही वह अंशीमें मिल जाता है ।

अंशीमें मिलनेके दो तरीके है‒अभेदपूर्वक और अभिन्नता-पूर्वक । पहले अभेद होता है, फिर अभिन्नता होती है । अभेदमें भेदकी कुछ गन्ध रहती है, पर अभिन्नतामें यह नहीं रहती । अभिन्नता वास्तविक है । अभिन्नता भेद-उपासनामें भी होती है और अभेद-उपासनामें भी होती है । भेदमें अभिन्नता ऐसे होती है कि जैसे कहींका लड़का और कहींकी लड़की गृहस्थमें आकर एक हो जाते है तो भिन्न-भिन्न होनेपर भी उनमें अभिन्नता हो जाती है । इसी प्रकार दो मित्रोंमें भी अभिन्नता होती है । भिन्न-भिन्न होते हुए भी अभिन्न हो जाना ‘ज्ञान’ है और अभिन्न होते हुए भी भिन्न-भिन्न हो जाना ‘भक्ति’ है ।

   (शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒‘साधकोंके प्रति’ पुस्तकसे

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