।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि–
भाद्रपद कृष्ण प्रतिपदा, वि.सं.–२०७५, सोमवार
                 दुर्गतिसे बचो




मनुष्य, देवता, पितर, यक्ष-राक्षस, भूत-प्रेत, पशु-पक्षी आदि सम्पूर्ण प्राणियोंमें हमारे प्रभु ही हैं, इन प्राणियोंके रूपमें हमारे प्रभु ही हैं‒ऐसा समझकर (भगवद्‌बुद्धिसे) निष्कामभावपूर्वक सबकी सेवा की जाय तो परमात्माकी प्राप्ति हो जाती है ।

उपर्युक्त दोनों बातोंका तात्पर्य यह हुआ कि अपनेमें सकामभावका होना और जिसकी सेवा की जाय, उसमें भगवद्‌बुद्धि न होना ही जन्म-मरणका कारण है । अगर अपनेमें निष्कामभाव हो और जिसकी सेवा की जाय, उसमें भगवद्‌बुद्धि (भगवद्भाव) हो तो वह सेवा परमात्मप्राप्ति करानेवाली ही होगी ।

एक विलक्षण बात है कि अगर भगवान्‌की उपासनामें सकामभाव रह भी जाय तो भी वह उपासना उद्धार करनेवाली ही होती है, पर भगवान्‌में अनन्यभाव होना चाहिये । भगवान्‌ने गीतामें अर्थार्थी, आर्त, जिज्ञासु और ज्ञानी‒इन चारों भक्तोंको उदार कहा है (७ । १८), और ‘मेरा पूजन करनेवाले मेरेको ही प्राप्त होते हैं’ऐसा कहा है (७ । २३; ९ । २५) । मनुष्य किसी भी भावसे भगवान्‌में लग जाय तो उसका उद्धार होगा ही ।

देवता आदिकी उपासनाका फल तो अन्तवाला (नाशवान्) होता है (७ । २३), क्योंकि देवताओंके उपासक पुण्यके बलपर स्वर्गादि ऊँचे लोकोंमें जाते हैं और पुण्यके समाप्त होनेपर फिर लौटकर आते हैं । परंतु परमात्माकी प्राप्ति अन्तवाली नहीं होती (८ । १६), क्योंकि यह जीव परमात्माका अंश है (१५ । ७) । अतः जब यह जीव अपने अंशी परमात्माकी कृपासे उनको प्राप्त हो जाता है तो फिर वह वहाँसे लौटता नहीं ( ८ । २१, १५ । ६) । कारण कि परमात्माकी कृपा नित्य है और स्वर्गादि लोकोंमें जानेवालोंके पुण्य अनित्य हैं ।

ज्ञातव्य

प्रश्न‒भगवान्‌ने कहा है कि भूत-प्रेतोंकी उपासना करनेवाले भूत-प्रेत[1] ही बनते हैं (९ । २५); ऐसा क्यों ?

उत्तर‒भूत-प्रेतोंकी उपासना करनेवालोंके अन्तःकरणमें भूत-प्रेतोंका ही महत्त्व होता है और भूत-प्रेत ही उनके इष्ट होते हैं; अतः अन्तकालमें उनको प्रेतोंका ही चिन्तन होता है और चिन्तनके अनुसार वे भूत-प्रेत बन जाते हैं । (८ । ६) ।



[1] जो यहाँसे चला जाता है, मर जाता है, उसको ‘प्रेत’ कहते हैं और उसके पीछे जो मृतक-कर्म किये जाते हैं, उनको शास्त्रीय परिभाषामें ‘प्रेतकर्म’ कहते हैं । जो पाप-कर्मोंके फलस्वरूप भूत, पिशाचकी योनिमें चले जाते हैं, उनको भी ‘प्रेत’ कहा जाता है; अतः यहाँ पापोंके कारण नीच योनियोंमें गये हुएका वाचक ही ‘प्रेत’ शब्द आया है ।

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।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि–
श्रावण पूर्णिमा, वि.सं.–२०७५, रविवार

रक्षाबन्धन,श्रावणीकर्म
दुर्गतिसे बचो




(४) पितरोंके भक्त पितरोंका पूजन करते हैं और इसके फलस्वरूप वे पितरोंको प्राप्त होते हैं अर्थात् पितृलोकमें चले जाते हैंपितॄन्यान्ति पितृवताः (९ । २५) । (परंतु यदि वे निष्कामभावसे कर्तव्य समझकर पितरोंका पूजन करते हैं, तो वे मुक्त हो जाते हैं ।)

(५) राजस मनुष्य यक्ष-राक्षसोंका पूजन करते हैं (१७ । ४) और फलस्वरूप यक्ष-राक्षसोंको प्राप्त होते हैं अर्थात् उनकी योनिमें चले जाते हैं[1]

(६) तामस पुरुष भूत-प्रेतोंका पूजन करते हैं (१७ । ४) । भूत-प्रेतोंका पूजन करनेवाले भूत-प्रेतोंको प्राप्त होते हैं अर्थात् उनकी योनिमें चले जाते हैं‒‘भूतानि यान्ति भूतेज्या’ (९ । २५)[2]

गीतामें निष्कामभावसे मनुष्य, देवता, पितर, यक्ष-राक्षस आदिकी सेवा, पूजन करनेका निषेध नहीं किया गया है, प्रत्युत निष्कामभावसे सबकी सेवा एवं हित करनेकी बड़ी महिमा गायी गयी है (५ । २५, ६ । ३२, १२ । ४) । तात्पर्य है कि निष्कामभावपूर्वक और शास्त्रकी आज्ञासे केवल देवताओंकी पुष्टिके लिये, उनकी उन्नतिके लिये ही कर्तव्य-कर्म, पूजा आदि की जाय, तो उससे मनुष्य बँधता नहीं, प्रत्युत परमात्माको प्राप्त हो जाता है (३ । ११) । ऐसे ही निष्कामभावपूर्वक और शास्त्रकी आज्ञासे कर्तव्य समझकर पितरोंकी तृप्तिके लिये श्राद्ध-तर्पण किया जाय, तो उससे परमात्माकी प्राप्ति हो जाती है । यक्ष-राक्षस, भूत-प्रेत आदिके उद्धारके लिये, उन्हें सुख-शान्ति देनेके लिये निष्कामभावपूर्वक और शास्त्रकी आज्ञासे उनके नामसे गया-श्राद्ध करना, भागवत-सप्ताह करना, दान करना, भगवन्नामका जप-कीर्तन करना, गीता-रामायण आदिका पाठ करना आदि-आदि किये जायँ, तो उनका उद्धार हो जाता है, उनको सुख-शान्ति मिलती है और साधकको परमात्माकी प्राप्ति हो जाती है । उन देवता, पितर, यक्ष-राक्षस, भूत-प्रेत आदिको अपना इष्ट मानकर सकामभावपूर्वक उनकी उपासना करना ही खास बन्धनका कारण है; जन्म-मरणका, अधोगतिका कारण है ।



[1] गीतामें भगवान्‌ने यक्ष-राक्षसोंके पूजनका तो वर्णन कर दिया‒‘यक्षरक्षांसि राजसाः’ (१७ । ४), पर उनके पूजनके फलका वर्णन नहीं किया । अतः यहाँ ऐसा समझना चाहिये कि जैसे देवताओंका पूजन करनेवाले देवताओंको ही प्राप्त होते हैं (९ । २५), ऐसे ही यक्ष-राक्षसोंका पूजन करनेवाले यक्ष-राक्षसोंको ही प्राप्त होते हैं । कारण कि यक्ष-राक्षस भी देवयोनि होनेसे देवताओंके ही अन्तर्गत आते हैं ।

[2]सत्रहवें अध्यायके चौदहवें श्लोकमें ‘देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनम्’ पदसे जो देवता, ब्राह्मण, गुरुजन और ज्ञानीके पूजनकी बात कही गयी है, उसे यहाँ उपासनाके अन्तर्गत नहीं लिया गया है । कारण कि वहाँ ‘शारीरिक तप’ (केवल शरीर-सम्बन्धी पूजन, आदर-सत्कार आदि) का प्रसंग है, जो कि परम्परासे मुक्त होनेमें हेतु है । दूसरी बात, उन देवता, ब्राह्मण आदिका पूजन केवल शास्त्रकी आज्ञा मानकर कर्तव्यरूपसे करते हैं, उनको इष्ट मानकर नहीं करते ।

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।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि–
श्रावण शुक्ल चतुर्दशी, वि.सं.–२०७५, शनिवार
दुर्गतिसे बचो




गीतामें भगवान्, आचार्य, देवता, पितर, यक्ष-राक्षस, भूत-प्रेत आदिकी उपासनाका ( विस्तारसे अथवा संक्षेपसे) फलसहित वर्णन हुआ है; जैसे‒

(१) अर्थार्थी, आर्त, जिज्ञासु और ज्ञानी (प्रेमी) ‒ये चार प्रकारके भक्त भगवान्‌का भजन करते हैं अर्थात् उनकी शरण होते हैं (७ । १६) ।

भगवान्‌का भजन-पूजन करनेवाले भक्त भगवान्‌को प्राप्त हो जाते हैं‒‘मद्भक्ता यान्ति मामपि’ (७ । २३), ‘यान्ति मद्याजिनोऽपि माम्’ (९ । २५)[1]

(२) जो वास्तवमें जीवन्मुक्त, तत्त्वज्ञ, भगवत्प्रेमी महापुरुष हैं, जिनका जीवन शास्त्रोंके अनुसार है, वे ‘आचार्य’ होते हैं । ऐसे आचार्यकी आज्ञाका पालन करना, उनके सिद्धान्तोंके अनुसार अपना जीवन बनाना ही उनकी उपासना है (४ । ३४; १३ । ७) । इस तरह आचार्यकी उपासना करनेवाले मनुष्य मृत्युको तर जाते हैं (४ । ३५, १३ । २५) ।

(३) जो लोग कामनाओंमें तन्मय होते हैं और भोग भोगना तथा संग्रह करना‒इसके सिवाय और कुछ नहीं है, ऐसा निक्षय करनेवाले होते हैं, वे भोगोंकी प्राप्तिके लिये वेदोक्त शुभकर्म करते हैं (२ । ४२-४३) । कर्मोंकी सिद्धि  (फल) चाहनेवाले मनुष्य देवताओंकी उपासना किया करते हैं; क्योंकि मनुष्यलोकमें कर्मजन्य सिद्धि बहुत जल्दी मिल जाती है (४ । १२) । सुखभोगकी कामनाओंके द्वारा जिनका विवेक ढक जाता है, वे भगवान्‌को छोड़कर देवताओंकी शरण हो जाते हैं और अपने-अपने स्वभावके परवश होकर कामनापूर्तिके लिये अनेक नियमों, उपायोंको धारण करते हैं (७ । २०) । भगवान् कहते हैं कि जो-जो भक्त जिस-जिस देवताका पूजन करना चाहता है, उस-उस देवताके प्रति मैं उसकी श्रद्धाको दृढ़ कर देता हूँ । फिर वह उस श्रद्धासे युक्त होकर उस देवताकी उपासना करता है । परन्तु उसको उस उपासनाका फल मेरे द्वारा विधान किया हुआ ही मिलता है (७ । २१-२२) । तीनों वेदोंमें विधान किये हुए सकाम कर्मोंको करनेवाले, सोमरसको पीनेवाले पापरहित मनुष्य यज्ञोंके द्वारा इन्द्रका पूजन करके स्वर्गकी प्राप्ति चाहते हैं (९ । २०) । कामनायुक्त मनुष्य श्रद्धापूर्वक अन्य देवताओंका पूजन करते हैं, वे भी वास्तवमें मेरा (भगवान्‌का) ही पूजन करते हैं; परंतु उनका वह पूजन अविधिपूर्वक है (९ । २३) ।

देवताओंकी उपासना करनेवाले मनुष्य स्वर्गलोकमें जाते हैं और वहाँ अपने पुण्यका फल भोगकर फिर लौटकर मृत्युलोकमें आते हैं (९ । २०-२१) । देवताओंका पूजन करनेवाले देवताओंको प्राप्त होते हैं अर्थात् उनके लोकोंमें चले जाते हैं‒‘देवान्देवयजः’ (७ । २३); ‘यान्ति देवव्रता देवान्’ (९ । २५)



[1] गीतामें भगवान्‌की उपासनाका ही मुख्यतासे वर्णन हुआ है । ‘गीता-दर्पण’ में भी कई शीर्षकोंके अन्तर्गत भगवान्‌की उपासनाका अनेक प्रकारसे विवेचन किया गया है । अतः यहाँ भगवान्‌की उपासनाका वर्णन अत्यन्त संक्षेपसे किया गया है ।

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।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि–
श्रावण शुक्ल त्रयोदशी, वि.सं.–२०७५, शुक्रवार
भगवान्‌में मन कैसे लगें ?



बादमें तरह-तरहकी बातें कौन सुनेगा ? बताओ ! सुनें तो असर नहीं होगा । उसी रीतिसे दूसरी बातें नहीं सुनते जिस रीतिसे लड़की दूसरे लड़कोंकी बातें नहीं सुनतीं । केवल सम्बन्धवाले लड़केकी बात सुनती है; उसको कभी देखा नहीं, पहले सुना भी नहीं, बस माँ-बापने सम्बन्ध कर दिया कि हमने अमुकको लड़की दी । इसी प्रकार भगवान्‌से सम्बन्ध जोड़ लेना है । हमें तो भगवत्प्राप्ति करना है फिर भगवान्‌की बात अच्छी लगेगी । स्वतः ही, स्वाभाविक ही । फिर मन और कहीं क्यों जायगा ? कहाँ जायगा ? हमें मतलब ही नहीं है दूसरेसे भाई !

हमें क्या काम दुनियासे हमें श्रीकृष्ण प्यारे हैं ।
यशोदा नन्दके नन्दन     मेरे  आँखोंके तारे हैं ॥

हमें क्या मतलब ? दुनियासे क्या लेना-देना ? न लेना है, न देना है । हमारे तो एक भगवान्‌ हैं और वे ही हमारे हैं ।

भगवान्‌के गुण सुनें, उनके चरित्र सुनें, उनकी महिमा सुनें । उनके परायण होवें । सुननेसे बड़ा लाभ होता है । भक्तोंके चरित्रोंसे बड़ा लाभ होता है । वह भी एक बढ़िया उपाय है । दिनमें घंटा, दो घंटा आप कहीं एकान्तमें बैठ जाओ, कमरेमें बैठ जाओ । दरवाजा कर लो बन्द । भक्तोंके चरित्र पढ़ो । जिनको पढ़ते-पढ़ते गद्‌गद हो जाय और प्रियता आवे, उस समय पुस्तकको छोड़ दो । नाम-जप है, कीर्तन है, शुरू कर दो । भगवान्‌का चिन्तन-भजन शुरू कर दो । जब मन फिर इधर-उधर जावे और वैसी बात न रहे, तो फिर एक पन्ना पीछेसे पढ़ो । फिर पढ़ते-पढ़ते भाव आ जावे फिर छोड़ दो वहाँ । पुस्तक पढ़ना या पूरा करना है‒यह मतलब नहीं । मन लगाना है । बस, वहाँ लगा दिया । उसके बाद फिर नाम-जप करते रहो, कीर्तन करते रहो । प्रार्थना करते रहो । भगवान्‌से बातें करते रहो मनमें । हमारा मन नहीं लगता महाराज ! मैं ‌ क्या करूँ ? आप कब दर्शन दोगे ? आपके चरणोंमें कब प्रेम  होगा ? ऐसे एक पुस्तक निकली है गीता‌प्रेससे ‘ध्यानावस्थामें प्रभुसे वार्तालाप’ । उस पुस्तकके अनुसार करो, बड़ा लाभ होगा । चलते-फिरते भगवान्‌से बात करना शुरू कर दो । मनसे प्रश्न पूछो तो मनसे उत्तर मिले । जो स्फुरणा हो जाय फिर भगवान्‌से पूछो‒सुगमतासे मन लग जायगा । इसी प्रकार विनयपत्रिका ले ली अथवा कोई स्तुति ले ली । स्तुति करते-करते मन लग जाय तब चिन्तन करना, नाम-जप करना शुरू कर दो । जब छूट जाय तो फिर पढ़ना शुरू कर दो । इन बातोंमेंसे कोई बात अपनाकर आप देखें । ऐसे तो यह युक्तिसंगत जँचती है । बात यह ठीक है । ऐसे हो सकता है कि नहीं ? यदि सम्भव है तो करके देखो । करके देखनेसे पता लगता है कि कहाँ-कहाँ विघ्न आते हैं ? कहाँ बाधा आती है ? क्यों बाधा आती है ? इन बातोंका पता लगेगा ।

यदि मन अधिक चंचल हो तो आप जप करते रहे, थोड़ी-थोड़ी देर बाद भगवान्‌से कहता रहे कि आपके चरणोंमें मन नहीं लगता । हे भगवन् ! मन नहीं लगता है । नमस्कार करे और कहता रहे । यह बड़ी सरल बात है । नाम-जप करता रहे, आधा मिनट हुआ, एक मिनट हुआ फिर कह दिया, महाराज ! मन नहीं लगता ! कहना‒प्रार्थना हो गयी । भगवान्‌की याद आ गयी । नाम-जप हो रहा है । पाँच-सात दफे मालामें कह देवे । महाराज, मन नहीं लगता । हे नाथ ! मैं भूल जाता हूँ । हे नाथ ! मन नहीं लगता । नमस्कार करते रहो, कहते रहो । षोड्श-मन्त्र ब्रह्माजीका बताया हुआ है, यह जपता रहे और प्रार्थना करता रहे । हे नाथ ! मन नहीं लगता । हे भगवन्‌ क्या करूँ ? महाराज ! आपके चरणोंमें मन नहीं लगता । कहते रहो । उनकी कृपासे मन लगने लगेगा ।

नारायण !     नारायण !!     नारायण !!!

‘जीवनोपयोगी प्रवचन’ पुस्तकसे

हे नाथ ! सबको अपने चरणोंकी प्रीत देना....
आपके पावन चरणोंकी भक्ति प्रदान करना....
सब आपके प्रेमी हो, भक्त हो......
सर्वे भवन्तुः सुखिनः....!!!

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