।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि–
फाल्गुन कृष्ण षष्ठी, वि.सं. २०७५ सोमवार
प्राप्त तत्त्वका अनुभव
        


ग्रहण उसीका किया जाता है, जिसकी सत्ता हो । संसारकी स्वतन्त्र सत्ता ही नहीं है, वह एक क्षण भी नहीं ठहरता, फिर वह ग्रहणमें आ ही कैसे सकता है ? चेतनसे चेतनका ही ग्रहण होता है । स्वयं (आत्मा) चेतन है; अतः वह चेतन परमात्मतत्त्वको ही ग्रहण करता है, जडको नहीं । परन्तु जब स्वयं जडके साथ अपना सम्बन्ध मान लेता है, तब वह जड शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धिके द्वारा जडताको ही ग्रहण करता है । जडताको ग्रहण करनेसे वह चिन्मय तत्त्व (परमात्मा) से विमुख हो जाता है और उसमें जडता (शरीर) की मुख्यता हो जाती है । जडताकी मुख्यताको मिटानेके लिये साधकको चाहिये कि वह ‘यह सब नहीं है’–इस वास्तविकताको दृढ़तासे मान ले । ऐसा माननेसे उसका जडतासे सम्बन्ध-विच्छेद हो जायगा और ‘सब कुछ परमात्मा ही है’–यह अनुभवमें आ जायगा । तात्पर्य है कि उसके द्वारा जडताका ग्रहण नहीं होगा, प्रत्युत परमात्माका ही ग्रहण होगा ।


जैसे, मनुष्यकी दृष्टि जब गहनोंकी तरफ, उनके नाम, रूप, आकृति, तौल, मूल्य तथा उपयोगकी तरफ रहती है, तब उसकी दृष्टिमें सोनेकी मुख्यता नहीं रहती । ऐसे ही जब मनुष्यकी दृष्टि संसारकी तरफ रहती है, तब उसकी दृष्टि परमात्माकी तरफ नहीं जाती । अगर वह दृढ़तासे मान ले कि ‘यह सब नहीं है’ तो उसकी दृष्टिमें संसारकी स्वतन्त्र सत्ताका अभाव हो जायगा और ‘सब कुछ परमात्मा ही है’–यह अनुभवमें आ जायगा । तात्पर्य है कि उसकी दृष्टिमें संसार नहीं रहेगा, प्रत्युत परमात्मा ही रहेगा–‘वासुदेवः सर्वम्’ (गीता ७/१९), जो कि वास्तवमें है ।


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।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि–
फाल्गुन कृष्ण पंचमी, वि.सं. २०७५ रविवार
प्राप्त तत्त्वका अनुभव
        


एक दीखनेवाली वस्तु है और एक न दीखनेवाली वस्तु है । दीखनेवाली वस्तु ‘प्रतीति’ है[1] और न दीखनेवाली वस्तु ‘प्राप्त’ है । प्रतीतिको जड (प्रकृति) कहते हैं, जिसका असत्-रूपसे वर्णन किया जाता है और प्राप्तको चेतन (पुरुष) कहते हैं, जिसका सत्-रूपसे वर्णन किया जाता है–‘प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि’ (गीता १३/१९) । प्रतितिकी तो स्वतन्त्र सत्ता नहीं है और प्राप्तकी सत्ता ही होती है–‘नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः’ (गीता २/१६)

जड और चेतन–दोनों परस्परविरोधी स्वभाववाले हैं । जड तो नित्य-निरन्तर बदलता रहता है, एक क्षण भी स्थिर नहीं रहता और चेतन नित्य-निरन्तर ज्यों-का-त्यों रहता है, कभी एक क्षण भी बदलता नहीं । जैसे रात और दिनका कभी परस्पर संयोग नहीं हो सकता, ऐसे ही जड और चेतनका भी कभी परस्पर संयोग नहीं हो सकता । परन्तु गीतामें (१३/२६) आया है कि सम्पूर्ण प्राणी जड-चेतनके संयोगसे पैदा होते हैं । इसका तात्पर्य यह है कि चेतन ही जडके साथ अपना संयोग मानता है अर्थात् जड-चेतनका संयोग केवल चेतनकी मान्यता है, वास्तवमें है नहीं–‘जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत्’ (गीता ७/५); ‘मनः षष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति’ (गीता १५/७)इस माने हुए संयोगको छोड़नेकी जिम्मेवारी भी चेतनपर ही है; क्योंकि इसने ही जडको पकड़ा है ।

जब चेतन जडके साथ अपना सम्बन्ध मान लेता है, तब तादात्म्यरूप अहम् पैदा होता है । यह अहम् न केवल चेतनमें है और न केवल जडमें है, प्रत्युत जड-चेतनके माने हुए संयोग (चिज्जडग्रन्थि) में है । यह अहम् ही संसार-बन्धनका मूल कारण है । इस अहम्‌से ही ममता, कामना आदि अनेक दोषोंकी उत्पत्ति होती है । अतः इस अहम्‌को मिटानेके लिये साधक चाहे संसारकी दृष्टिसे ऐसा मान ले कि ‘संसारकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है’ चाहे परमात्माकी दृष्टिसे ऐसा मान ले कि ‘सब कुछ परमात्मा ही है’[2]

श्रीमद्भागवतमें भगवान्‌ने संसारकी दृष्टिसे कहा है–

किं भद्रं किमभद्रं वा द्वैतस्यावस्तुनः कियत् ।
वाचोदितं   तदनृतं   मनसा   ध्यातमेव च ॥
                                                 (११/२८/४)

‘संसारकी सब वस्तुएँ वाणीसे कही जा सकती हैं और मनसे सोची जा सकती हैं; अतः वे सब असत्य हैं । जब द्वैत नामकी कोई वस्तु ही नहीं है तो फिर उसमें क्या अच्छा और क्या बुरा ?’
         परमात्माकी दृष्टिसे कहा है–

मनसा वचसा दृष्ट्या गृह्यतेऽन्यैरपीन्द्रियैः ।
अहमेव  न  मत्तोऽन्यदिति   बुध्यध्वमञ्जसा ॥
                                                 (११/१३/२४)

‘मनसे, वाणीसे, दृष्टिसे तथा अन्य इन्द्रियोंसे[3] जो कुछ ग्रहण किया जाता है, वह सब मैं ही हूँ । अतः मेरे सिवाय दूसरा कुछ भी नहीं है–यह सिद्धान्त आप विचारपूर्वक शीध्र समझ लें अर्थात् स्वीकार कर लें ।’



[1] प्रतीतिके दो भेद हैं–प्रतीति और भान । प्रतीति इन्द्रियोंका विषय है और भान अन्तःकरणका विषय है । प्रतीति स्थूल है और भान सूक्ष्म है । सांसारिक पदार्थों, व्यक्तियों आदिकी प्रतीति होती है और इन्द्रियोंका, अहम्‌का भान होता है । तात्पर्य है कि प्रतीति और अनुभव–दोनोंके बीचमें भान है । भानका ज्ञाता स्वयं (आत्मा) है ।

[2] ज्ञानकी रुचिवाला साधक मानता है कि ‘यह सब कुछ नहीं है’ और भक्तिकी रुचिवाला साधक मानता है कि ‘सब कुछ परमात्मा ही है’ । रुचिभेद होनेपर भी परिणाममें दोनों एक हो जाते हैं अर्थात् दोनोंका यह अनुभव हो जाता है कि एक परमात्मतत्त्वके सिवाय कुछ नहीं है ।

[3] यहाँ ‘मनसा’ से अन्तःकरण, ‘वचसा’ से सभी कर्मेन्द्रियाँ और ‘दृष्ट्या’ से सभी ज्ञानेन्द्रियाँ लेनी चाहिये ।

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।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि–
फाल्गुन कृष्ण चतुर्थी, वि.सं. २०७५ शनिवार
वासुदेवः सर्वम्
        


सोनेके बने गहनोंके अनेक प्रकार है; कोई गलेमें पहननेका है, कोई हाथोंमें पहननेका है, कोई कानोंमें पहननेका है, कोई नाकमें पहननेका है, आदि-आदि । उन गहनोंकी अनेक प्रकारकी आकृतियाँ हैं, अनेक प्रकारके नाम हैं, अनेक प्रकारके उपयोग है, अनेक प्रकारके तौल है, अनेक प्रकारके मूल्य है । वे सब तो अनेक प्रकारके हैं, पर सोना अनेक प्रकारका नहीं है । जिसमें कोई प्रकार नहीं है, जो एक ही है, उसको जानना ही तत्त्वसे जानना है । ऐसे ही संसारमें मनुष्य, पशु, पक्षी, वृक्ष, पहाड़, पत्थर, ईंट, रेट, चूना, मिट्टी आदि तो अनेक प्रकारके हैं, पर जो उनके भीतर रहनेवाला है, उसका कोई प्रकार नहीं है । वह प्रकाररहित तत्त्व ही परमात्मा है ।

जैसे गहनोंमें परिवर्तन होता है, पर सोनेमें परिवर्तन नहीं होता । गहने बदल जाते हैं, पर सोना वही रहता है । ऐसे ही संसारमें निरन्तर परिवर्तन हो रहा है, पर इसमें जो अपरिवर्तनशील परमात्मतत्त्व है, वह ज्यों-का-त्यों रहता है । भगवान्‌ने कहा है–‘विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति’ (गीता १३/२७) अर्थात् नष्ट होनेवालोंमें जो एक नष्ट न होनेवाला तत्त्व है, उसको देखनेवाला ही वास्तवमें सही देखता है । जैसे, स्थूल-दृष्टिसे देखा जाय तो कपड़े सब नष्ट हो जाते हैं, पर रूई रहती है । बर्तन सब नष्ट हो जाते हैं, पर मिट्टी रहती है । अस्त्र-शस्त्र सब नष्ट हो जाते हैं, पर लोहा रहता है । गहने सब नष्ट हो जाते हैं, पर सोना रहता है । ऐसे ही सब-का-सब संसार नष्ट होनेवाला है, पर परमात्मतत्त्व नष्ट होनेवाला नहीं है । उस कभी न बदलनेवाले और कभी नष्ट न होनेवाले तत्त्वकी तरफ ही देखना है, उसको ही मानना है, उसको ही जानना है, उसको ही महत्त्व देना है ।

जैसे हम कहते हैं कि ‘यह पदार्थ है’ तो इसमें पदार्थ तो परिवर्तनशील संसार है और ‘है’ अपरिवर्तनशील परमात्मतत्त्व है । संसारमें देश, काल, क्रिया, वस्तु, व्यक्ति आदि तो अनेक हैं, पर उन सबमें ‘है’ (सत्ता) रूपसे विद्यमान परमात्मतत्त्व एक ही है । साधककी दृष्टि निरन्तर उस ‘है’ (परमात्मतत्त्व) पर ही रहनी चाहिये । वह ‘है’ एक ठोस चीज है और सबको नित्य-निरन्तर प्राप्त है । संसार कभी किसीको प्राप्त हुआ नहीं, प्राप्त है नहीं, प्राप्त होगा नहीं और प्राप्त हो सकता नहीं । हमसे भूल यह होती है कि हम उस शरीर-संसारको ‘है’ (प्राप्त) मान रहे हैं, जो वास्तवमें है नहीं । शरीर पहले नहीं था–यह सबका अनुभव है, आगे यह शरीर नहीं रहेगा–यह भी सबका अनुभव है और शरीर प्रतिक्षण नष्ट हो रहा है–यह भी सबका अनुभव है । इस अनुभवको ही महत्त्व देना है ।

अगर भक्तिकी दृष्टिसे देखें तो सब रूपोंमें एक परमात्मा ही हमारे सामने आते हैं । हमें भूख लगती है तो अन्नरूपसे वे ही आते हैं, हमें प्यास लगती है तो जलरूपसे वे ही आते हैं, हम रोगी होते हैं तो औषधिरूपसे वे ही आते हैं, हम भोगी होते हैं तो भोग्यरूपसे वे ही आते हैं, हमें गरमी लगती है तो छायारूपसे वे ही आते हैं, हमें सरदी लगती है तो वस्त्ररूपसे वे ही आते हैं । तात्पर्य है कि सब रूपोंमें आये परमात्माका भोग करने लग जाते हैं तो परमात्मा दुःखरूपसे, नरकरूपसे आते हैं !

प्रश्न–परमात्मा अन्न, जल आदि नाशवान् वस्तुओंके रूपमें क्यों आते हैं ?

उत्तर–हम अपनेको शरीर मानकर अपने लिये वस्तुओंकी आवश्यकता मानते हैं और उनकी इच्छा करते हैं तो परमात्मा भी वैसे ही बनकर हमारे सामने आते हैं । हम असत्‌में स्थित होकर देखते हैं तो परमात्मा भी असत्-रूपसे ही दीखते हैं । हम परमात्माको जैसा देखना चाहते हैं, वे वैसे ही दीखते हैं–‘ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्’ (गीता ४/११) । जैसे बालक खिलौना चाहता है तो माँ रुपये खर्च करके भी उसको खिलौना लाकर देती है, ऐसे ही हम जो चाहते हैं, परम दयालु परमात्मा उसी रूपसे हमारे सामने आते हैं । अगर हम भोगोंको न चाहें तो भगवान्‌को भोगरूपसे क्यों आना पड़े ? बनावटी रूप क्यों धारण करना पड़े ?

नारायण !   नारायण !!   नारायण !!!


–‘वासुदेवः सर्वम्’ पुस्तकसे

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