।। श्रीहरिः ।।

   



आजकी शुभ तिथि–
       पौष कृष्ण सप्तमी, वि.सं.-२०७८, रविवार
              अनित्य सुखकी रुचि 
        मिटानेकी आवश्यकता


भोगोंकी रुचिकी पूर्ति कभी नहीं होगी । इसकी तो निवृत्ति ही होगी । रुचिकी पूर्ति असम्भव है । ज्यों-ज्यों भोग भोगोगे, रुपयोंका संग्रह करोगे, त्यों-त्यों उनकी रुचि बढ़ती जायगी‒‘जिमि प्रतिलाभ लोभ अधिकाई’ ।

न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति ।

हविषा   कृष्णवर्त्मेव   भूय   एवाभिवर्धते ॥

(श्रीमद्भागवत ९/१९/१४)

विषयोंके उपभोगसे यह रुचि शान्त नहीं होती । आगमें सुहाता-सुहाता घी डालते रहें तो क्या आग बुझ जायगी ? वह तो और बढ़ेगी । ऐसे ही भोगोंकी और संग्रहकी रुचि आगे-आगे बढ़ती रहेगी । अन्तमें सब छोड़कर मरना पड़ेगा । यह जो मनमें आदर-सत्कारकी, मान-बड़ाईकी रुचि है कि लोग मेरेको अच्छा कहें, बड़ा कहें, आराम दें, सुख दें, मेरे अनुकूल बन जायँ, यह बहुत घातक है । साधकके लिये तो महान्‌ ही घातक है । इस रुचिसे केश जितना भी फायदा नहीं है और नुकसान महान्‌ है ।

यह बात बिलकुल नहीं है कि रुचि नष्ट नहीं होती । अगर रुचि नष्ट न होती हो तो किसीकी भी नष्ट नहीं होनी चाहिये । आजतक किसीकी भी रुचिकी पूर्ति नहीं हुई, पर यह हटी है सैकड़ोंकी‒‘बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः’ (गीता ४/१०) । रुचिका नाश करनेवाले इतिहासमें सैकड़ों-हजारों आदमी मिलेंगें, पर रुचिकी पूर्ति करनेवाला एक भी आदमी नहीं मिलेगा । जिसकी पूर्ति होती ही नहीं, उसको छोड़नेमें क्या हानि है आपको ?

श्रोता‒महाराजजी, बालकपनमें जो रुचि थी, वह तो खत्म हो गयी । बालकपनतक तो वह रुचि रहेगी ।

स्वामीजी‒बालकपनवाली रुचिमें फर्क नहीं पड़ेगा, चाहे आप बूढ़े हो जाओ । विषय बदल गया, स्थान बदल गया, पर रुचि वही (पहलेवाली) है, मिटी नहीं है । अब आप मिटाओगे तो टिकेगी नहीं, रखोगे तो मिटेगी नहीं । आप रखोगे तो उसको मिटानेकी ताकत ब्रह्माजीमें भी नहीं है । बड़े-बड़े सन्त-महात्मा, जीवन्मुक्त महापुरुष भी आपकी रुचिको मिटा नहीं सकते । आप मिटाओ तो मिट जायगी । आप नहीं छोड़ोगे तो वे कैसे छुड़वायेंगे ? आप चाहो तो छूट सकती है; और नहीं छूटे तो प्रार्थना करो, रोओ, भगवान्‌से कहो कि यह छूटती नहीं तो भगवान्‌की कृपासे छूट जायगी । खास बात है कि आप इसको छोड़नेका विचार ही नहीं करते । एक बहुत मार्मिक बात है कि सांसारिक रुचिके त्यागकी जितनी महिमा है, उतनी दया, क्षमा, उदारता आदि अच्छे-अच्छे गुण धारण करनेकी भी नहीं है । यह जो निषेधात्मक साधन है, यह विधेयात्मक साधनसे भी ऊँचा है, पर लोग इस तरफ ध्यान कम देते हैं । निषेधात्मक साधन करनेसे विध्यात्मक साधन स्वतः होता है । जो साधन स्वतः होता है, उसका अभिमान नहीं होता ।

गीताने सुखकी रुचिको ज्ञानियों (विवेकियों)-का नित्य वैरी बताया है‒‘ज्ञानिनो नित्यवैरिणा’ (३/३९) । अज्ञानीको तो भोगोंमें सुख दीखता है, पर ज्ञानी सुखकी रुचि पैदा होते ही समझता है कि यह मेरा पतन करनेवाली चीज है । इसकी कभी पूर्ति नहीं होगी । यह आग है, आग‒‘दुष्पूरेणानलेन च’ ! इससे बड़ा भारी नुकसान है । इसलिये सज्जनो ! कम-से-कम इतना तो करो कि रुचिके वशमें होकर कोई कार्य मत करो । उसके वशीभूत होकर कार्य करते रहोगे तो वह कभी मिटनेवाली नहीं है । हजारों, लाखों, करोड़ों, अरबों जन्मोंतक भी वह मिटेगी नहीं ।

आप कितने भी पढ़ जाओ, कितने ही व्याख्यान देनेवाले बन जाओ, कितनी ही पुस्तकें लिख दो, कितने ही बड़े बन जाओ, पर जबतक संयोगजन्य सुखकी रुचि रहेगी, तबतक शान्ति नहीं मिलेगी । यह सुखकी रुचि आपका पतन करेगी ही । जितना नुकसान हो रहा है, सब इसीसे हो रहा है । संसारमें जितने कराह रहे हैं, दुःख पा रहे हैं, रो रहे हैं, कष्ट पा रहे हैं, चिल्ला रहे हैं, नरकोंमें पड़े हैं, चौरासी लाख योनियोंमें पड़े हैं, सब इस रुचिका ही फल है । इस रुचिके रहते हुए आपको किसी तरहसे शान्ति नहीं मिलेगी । इसलिये कृपा करके इस रुचिका नाश करो । आपसे न हो तो भगवान्‌से प्रार्थना करो कि हे नाथ ! इस रुचिका नाश हो जाय !

आपके भीतर रुचिका नाश करनेकी रुचि पैदा हो जाय अर्थात्‌ आपका पक्का विचार हो जाय कि इसको मिटाना है तो वह मिट जायगी ।

नारायण !     नारायण !!     नारायण !!!

‒ ‘नित्ययोगकी प्राप्ति’ पुस्तकसे

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।। श्रीहरिः ।।

  



आजकी शुभ तिथि–
       पौष कृष्ण षष्ठी, वि.सं.-२०७८, शनिवार
              अनित्य सुखकी रुचि 
        मिटानेकी आवश्यकता


श्रोता‒अखण्ड साधन कैसे हो ?

स्वामीजी‒अखण्ड साधन होगा सांसारिक सुखकी आसक्ति छोड़नेसे । सांसारिक वस्तुओंके संग्रहकी और उनसे सुख लेनेकी रुचिका अगर आप नाश कर दें तो निहाल हो ही जाओगे, इसमें किंचिन्मात्र भी सन्देह नहीं है । मैं रुपयोंका त्याग करनेकी बात नहीं कहता हूँ, साधु बननेकी बात नहीं कहता हूँ । मैं आपसे हाथ जोड़कर विशेषतासे प्रार्थना करता हूँ कि संग्रहकी और भोगकी जो रुचि है, उस रुचिका आप किसी तरहसे नाश कर दें । अगर उस रुचिका नाश हो जाय तो बहुत बड़ा लाभ होगा । रुचिसे आपका और दुनियाका पतन होगा, इसके सिवाय कुछ नहीं मिलेगा । संग्रह और भोगकी रुचि बड़ा भारी पतन करनेवाली चीज है, इसमें कोई सन्देह नहीं है । नाशवान्‌की तरफ रुचि महान्‌ अनर्थका हेतु है । विष खा लेनेसे इतनी हानि नहीं है, जितनी हानि इससे है‒‘हा हन्त हन्त विषभक्षणतोऽप्यसाधु’ । अष्टावक्रगीतामें लिखा है‒

मुक्तिमिच्छसि चेत्तात विषयान्विषवत्त्यज ।

(१/२)

‘यदि मुक्तिकी इच्छा रखते हो तो विषयोंका विषके समान त्याग कर दो ।’

एक ही बात है कि संसारकी रुचि नष्ट होनी चाहिये । उस रुचिकी जगह भगवान्‌की रुचि हो जाय, तत्त्वज्ञानकी रुचि हो जाय, मुक्तिकी रुचि हो जाय, भगवत्प्रेमकी रुचि हो जाय, भगवद्दर्शनकी रुचि हो जाय तो निहाल हो जाओगे, इसमें किंचिन्मात्र भी सन्देह नहीं है । जीनेकी रुचिसे आप जी नहीं सकते । जीनेकी रुचि रखते हुए भी मरना पड़ेगा । अगर जीनेकी रुचिका त्याग कर दो तो कोई हानि नहीं होगी, प्रत्युत बड़ा भारी लाभ होगा । रुचिको कम कर दिया जाय तो भी बहुत लाभ होता है । रुचिके वशमें न हों तो भी बड़ा भारी लाभ होता है‒‘तयोर्न वशमागच्छेत्’ (गीता ३/३४) । अगर इसको नष्ट कर दो, तब तो कहना ही क्या है !

श्रोता‒रुचि नष्ट नहीं होती है महाराज !

स्वामीजी‒रुचि नष्ट नहीं होती है‒यह आपके वर्तमानकी दशा है । रुचि नष्ट न होती हो‒ऐसी बात है ही नहीं । यह रहनेकी चीज नहीं है । बालकपनमें खिलौनोंमें जो रुचि थी, वह आज है क्या ? कंकड़-पत्थरोंमें, काँचके लाल-पीले टुकड़ोंमें जो रुचि थी, वह रुचि आज है क्या ? रुचि मिटती नहीं‒यह बात नहीं है, रुचि तो टिकती ही नहीं, ठहरती ही नहीं । आप नयी-नयी रुचि पैदा कर लेते हो और कहते हो कि मिटती नहीं ! रुचि टिक सकती नहीं । नाशवान्‌की रुचि नाशवान् ही होती है । परमात्माकी रुचि हो तो वह मिटेगी नहीं, प्रत्युत परिणाममें परमात्माकी प्राप्ति करा देगी । गीता कहती है‒

जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते ।

(६/४४)

ऐसी जिज्ञासा न हो तो कोई बात नहीं । संसारकी रुचि हट जाय तो योगकी जिज्ञासा भी हो जायगी । रुचि हटती नहीं‒यह बिलकुल गलत बात है । रुचि मिटती नहीं‒यह तो आपकी दशा है, जिसको लेकर आप बोल रहे हो ।

भोग और संग्रहकी रुचि महान्‌ अनर्थकारक है । सन्तोंके संगको मुक्तिका दरवाजा और भोगोंकी रुचिवाले पुरुषोंके संगको नरकोंका दरवाजा बताया गया है‒‘महत्सेवां द्वारमाहुर्विक्तेस्तमोद्वारं योषितां सङ्गिसङ्गम्’ (श्रीमद्भागवत ५/५/२) । भोगोंका संग इतना नुकसानदायक नहीं है, जितना भोगोंकी रुचिवालोंका संग नुकसानदायक है । कोढ़ीके संगसे कोढ़ हो जाय, इस तरहकी बात है । अतः भोगोंकी रुचि रखनेमें आपका और दुनियाका बड़ा भारी नुकसान है और इसका त्याग करनेमें बड़ा भारी हित है । इसलिये कृपा करके दुनियाका हित करो । हित न कर सको तो कम-से-कम अहित तो मत करो ।

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।। श्रीहरिः ।।

 



आजकी शुभ तिथि–
       पौष कृष्ण पंचमी, वि.सं.-२०७८, शुक्रवार
       सुखासक्तिसे छूटनेका उपाय


 

बहुत वर्षोंतक मेरेमें यह जाननेकी लालसा रही कि गड़बड़ी कहाँ है ? बाधा किस जगह लग रही है ? न चाहते हुए भी मनमें मान-बड़ाईकी, आदर-सत्कारकी, पदार्थोंकी इच्छा हो जाती है, तो यह कहाँ टिकी हुई है ? यह छूटती क्यों नहीं ? वर्षोंके बाद इसकी जड़ मिली, वह है‒सुखकी लोलुपता । हमें यह बात वर्षोंके बाद मिली, आपको सीधी बता दी । आपको सुगमतासे मिल गयी, इसलिये आप इसका आदर नहीं करते । यदि कठिनतासे मिलती तो आप आदर करते । आप पहाड़ोंमें भटकते, बद्रीनारायण जाते, खूब तलाश करते और इस तरह भटकते-भटकते कोई सन्त मिल जाता तथा वह यह बात कहता तो आप इसका आदर करते । अब रुपये कमाते हो, कुटुम्बके साथ घरोंमें मौजसे बैठे हो और सत्संगकी बातें मिल जाती हैं तो आप उनका महत्त्व नहीं मानते । उलटे ऐसा मानते हो कि स्वामीजी तो यों ही कहते हैं, ये दुकानपर बैठें तो पता लगे ! इस तरह आप अपनी ही बातको प्रबल करते हो । सिद्ध क्या हुआ ? कि हमारी बात सच्ची है, इनकी (स्वामीजीकी) बात कच्ची है । आपने विजय तो कर ली, पर फायदा क्या हुआ ? आप जीत गये, हम हार गये, पर जीतमें आपका ही नुकसान ही हुआ ।

एक धनी आदमीने कहा कि स्वामीजी रुपयोंके तत्त्वको जानते नहीं तो मैंने कहा कि देखो, मैंने रुपये रखे भी हैं और उनका त्याग भी किया है, इसलिये दोनोंको जानता हूँ । परन्तु आपने रुपये रखे हैं, उनका त्याग नहीं किया है, इसलिये आप एक ही बातको जानते हो, दोनोंको नहीं जानते । कोई तत्त्व नहीं है रुपयोंमें । आप लोभसे दबे हुए हो, आपने रुपयोंका महत्त्व स्वीकार कर लिया है, फिर कहते हो कि हम जानते हैं । धूल जानते हो आप ! जानते हो ही नहीं ।

परमात्माको जाननेके लिये परमात्माके साथ अभिन्न होना पड़ता है और संसारको जाननेके लिये संसारसे अलग होना पड़ता है । परमात्मासे अलग रहकर परमात्माको नहीं जान सकते और संसारसे मिले रहकर संसारको नहीं जान सकते‒यह सिद्धान्त है । ऐसा सिद्धान्त क्यों है ? कि वास्तवमें आप परमात्माके साथ अभिन्न हो और संसारसे अलग हो । परन्तु आपने अपनेको परमात्मासे अलग और संसारसे अभिन्न मान लिया, अब कैसे जानोगे ? जो बीड़ी, सिगरेट आदि पीता है, वह बीड़ी आदिको जान नहीं सकता । जो इनको छोड़ देता है, उसको इनका ठीक-ठाक ज्ञान हो जाता है । एक बार मैंने कहा कि चाय छोड़ दो । बहुतोंने चाय छोड़ दी । पासमें ही एक वकील बैठे थे, वे कुछ भी बोले नहीं । तीन-चार दिन बादमें वे मेरे पास आये और बोले कि चाय तो मैंने भी उसी दिन छोड़ दी थी, पर सभामें मेरी बोलनेकी हिम्मत नहीं हुई । चाय छोड़नेके बाद यह बात मेरी समझमें आयी कि जिस प्यालेसे गोमांसभक्षी चाय पीता है, छूतकी महान्‌ बीमारीवाला चाय पीता है, उसी प्यालेसे हम चाय पीते हैं ! इससे सिद्ध हुआ कि संसारको छोड़े बिना उसके तत्त्वको नहीं जान सकते ।

सत्‌की प्रप्तिकी लालसा करो तो असत्‌ छूट जायगा और असत्‌का त्याग करो तो सत्‌की प्राप्ति हो जायगी । दोनोंमेंसे कोई एक करो तो दोनों हो जायँगे । असत्‌का संग करते हुए, आसक्ति रखते हुए असत्‌को नहीं जान सकते और सत्‌से दूर रहकर बड़ी-बड़ी पण्डिताईकी बातें बघार लो, षट्‌शास्त्री पण्डित बन जाओ, तो भी सत्‌को नहीं जान सकते ।

संसारकी आसक्ति दूर करनेका सुगम उपाय है‒दूसरोंको सुख देना । माता, पिता, स्त्री, पुत्र, भाई, भौजाई आदि सबको सुख दो, पर उनसे सुख मत लो तो सुगमतासे आसक्ति छूट जायगी ।

नारायण !     नारायण !!     नारायण !!!

‒ ‘स्वाधीन कैसे बनें ?’

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।। श्रीहरिः ।।



आजकी शुभ तिथि–
       पौष कृष्ण चतुर्थी, वि.सं.-२०७८, गुरुवार
       सुखासक्तिसे छूटनेका उपाय


 

एक राजपूत था और एक बनिया था । दोनों आपसमें भिड़ गये तो राजपूतको गिराकर बनिया ऊपर चढ़ बैठा । राजपूतने उससे पूछा‒अरे ! तू कौन है ? उसने कहा‒मैं बनिया हूँ । सुनते ही राजपूतने जोशमें आकर कहा कि अरे ! बनिया मेरेको दबा दे ! यह कैसे हो सकता है ! और चट बनियेको नीचे दबा दिया । यह तो एक दृष्टान्त है । तात्पर्य यह है कि आप तो निरन्तर रहनेवाले हो और कामना निरन्तर रहनेवाली है ही नहीं । जैसे राजपूतने सोचा कि मैं तो क्षत्रिय हूँ, मेरेको बनिया नहीं दबा सकता, ऐसे ही आप भी राजपूत हो, भगवान्‌के पूत हो; आप विचार करो कि असत्‌की कामना मेरेको कैसे दबा सकती है ? कामना भी असत्‌की और कामना खुद भी असत्‌, वह सत्‌को दबा दे‒यह हो ही नहीं सकता । बस, इतनी ही बात है । लम्बी-चौड़ी बात है ही नहीं । अब इसमें क्या कठिनता है, आप बताओ ? एकदम सीधी बात है । आप थोड़ी हिम्मत रखो कि मैं तो हरदम रहनेवाला हूँ । बालकपनसे लेकर अभीतक मैं वही हूँ । मैं पहले भी था, अब भी हूँ और बादमें भी रहूँगा, नहीं तो किये हुए कर्मोंका फल आगे कौन भोगेगा ? मैं तो रहनेवाला हूँ और ये शरीर आदि असत्‌ वस्तुएँ रहनेवाली हैं ही नहीं । इनके परवश मैं कैसे हो सकता हूँ ? नहीं हो सकता । आप हिम्मत मत हारो ।

हिम्मत मत छाड़ो नरां,    मुख सूं कहतां राम ।

हरिया हिम्मत सूं कियां, ध्रुव का अटल धाम ॥

ये बातें बहुत सुगम हैं । आप पूरा विचार नहीं करते‒यह बाधा है । न तो स्वयं सोचते हो और न कहनेपर स्वीकार करते हो । अब क्या करें, बताओ ? आप सत्‌ हो और ये बेचारे असत्‌ है, आगन्तुक हैं । आप मुफ्तमें ही इनसे दब गये । अपने महत्त्वकी तरफ आप ध्यान नहीं देते । आप कौन है‒इस तरफ आप ध्यान नहीं देते । आप परमात्माके अंश हो । आपमें असत्‌ कैसे टिक सकता है ? यह आपके बलसे ही बलवान् हुआ है । इसमें खुदका बल नहीं है । यह तो है ही असत्‌ ! आप सत्‌ हो और आपने ही इसको महत्त्व दिया है ।

जैसे किसीका पुत्र मर गया, तो बड़ा शोक होता है कि मेरा लड़का चला गया ! लड़का तो एक बार मरा और शोक रोजाना करते हो, तो बताओ कि शोक प्रबल है या लड़केका मरना प्रबल है ? लड़का तो एक बार ही मर गया, खत्म हुआ काम, पर शोकको आप जीवित रखते हो । शोकमें ताकत कहाँ है रहनेकी ? शोक तो लड़केके मरनेसे पैदा हुआ है बेचारा ! उस शोकको आप रख सकोगे नहीं । कुछ वर्षोंके बाद आप भूल जाओगे । शोक आपसे-आप नष्ट हो जायगा । आप बार-बार याद करके उसको जीवित रखते हो, फिर भी उसको जीवित रख सकोगे नहीं । दस-पन्द्रह वर्षके बाद वह यादतक नहीं आएगा । इसलिये उत्पन्न और नष्ट होनेवाली वस्तुको आप महत्त्व मत दो, उसकी परवाह मत करो । हमारी बात तो इतनी ही है कि आप असत्‌को महत्त्व क्यों देते हो ? अपने विवेकको महत्त्व क्यों नहीं देते ?

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।। श्रीहरिः ।।



आजकी शुभ तिथि–
       पौष कृष्ण तृतीया, वि.सं.-२०७८, बुधवार
       सुखासक्तिसे छूटनेका उपाय


आप कामनाकी उत्पत्ति और विनाशको जाननेवाले हो । जो उत्पत्ति और विनाशको जाननेवाला होता है, वह अविनाशी होता है, बड़ा होता है । जो उत्पन्न और नष्ट होता है, वह छोटा होता है, पर जो उसकी उत्पत्ति और विनाशको जाननेवाला होता है, वह बड़ा होता है ।

श्रोता‒सुखकी आसक्ति हमारेपर एकदम अधिकार जमा लेती है । उस समय हमें अपने बलका पता ही नहीं लगता । हम निर्बल हो जाते हैं, पराजित हो जाते हैं !

स्वामीजी‒जिस समय कामना पैदा होती है, आसक्ति पैदा होती है, उस समय उसका बड़ा असर पड़ता है‒यह बात ठीक है; परन्तु इस बातपर विश्वास रखो कि सत्‌-वस्तु तो निष्कामता ही है । अतः निष्कामभावको सकामभाव दबा ही नहीं सकता । सकामभाव उत्पन्न और नष्ट होता है, पर निष्कामभाव सकामभावके उत्पन्न होनेसे पहले भी रहता है, सकामभावके नष्ट होनेके बाद भी रहता है और सकामभावके समय भी ज्यों-का-त्यों रहता है । वास्तवमें निष्कामभाव ही नित्य है । इसलिये कामना पैदा होनेपर आप उससे हार स्वीकार मत करो । बड़ी-से-बड़ी कामना हो जाय, कामनामें आप बह जाओ, कामनाके वशीभूत हो जाओ तो भी आप कृपा करके इतना खयाल रखो कि यह कामना टिकनेवाली नहीं है और निष्कामता मिटनेवाली नहीं है । कामना तो उत्पन्न और नष्ट होती है, पर आप हरदम रहते हो । अतः कामना आपमें तो नहीं हुई, फिर वह आपको कैसे ढक सकती है, आपको कैसे पराजित कर सकती है ? आप जिस समय अपनेको पराजित मानते हो, उस समय भी यह बात जाग्रत्‌ रखो कि कामना आगन्तुक है, यह रहनेवाली नहीं है । भगवान्‌ने साफ कहा है कि आप इनके आने-जानेकी तरफ देखो, इनके आने-जानेका खयाल रखो । फिर सुगमतासे इनपर विजय प्राप्त कर लोगे आप कामनामें कितने ही बह जाओ, पर ‘आगमापायिनोऽनित्याः’ को याद रखो । मैंने कई बार कहा है कि अरे भाई ! यह मन्त्र है ! जैसे बिच्छू डंक मार दे तो उसका मन्त्रद्वारा झाड़ा करनेसे जहर उतर जाता है, ऐसे ही आप ‘आगमापायिनोऽनित्याः’ का जप शुरू कर दें तो कामना आदि आगन्तुक दोषोंका जहर उतर जायगा, उनकी जड़ कट जायगी । इतनी शक्ति है भगवान्‌के कहे हुए इन शब्दोंमें ! यह क्रियात्मक साधन है और बड़ा सुगम है, आप करके देखो ।

भागवतके ये पद मेरेको बहुत प्रिय लगते हैं‒‘जुषमाणश्च तान् कामान् दुःखोदर्कांश्च गर्हयन्’ (११/२०/२८) । अगर भोगोंका त्याग न कर सके तो उनको दुःखरूप समझकर, उनकी निन्दा करते हुए भोगें । भोगोंको भोगते हुए भी उनको अच्छा न समझें, उनको नापसन्द करें, तो उनसे छुटकारा मिल जायगा । उनके परवश होनेपर भी आप उनसे दबो मत । केवल इतना याद रखो कि हम रहनेवाले हैं और ये जानेवाले हैं । आप करके देखो । यह साधन कठिन है क्या ? अभी इसका विचार कर लो, मनन कर लो तो फिर इसको भूलोगे नहीं । असत्‌में रहनेकी ताकत नहीं है । असत्‌की सत्ता नहीं होती और सत्‌का अभाव नहीं होता‒‘नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः’ (गीता २/१६) । आपकी सत्ता है और आप असत्‌से दब जाते हैं, तो यह दबना इतना दोषी नहीं है, जितना दोषी असत्‌का महत्त्व मानना है कि यह तो बड़ा प्रबल है । यह मान्यता ही गजब करती है ।

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