।। श्रीहरिः ।।
 
तुमको लाखों प्रणाम....!!

हरि का नाम जपानेवाले, हरि का नाम जपानेवाले,
गीता पाठ पढ़ानेवाले, गीता रहस्य बतानेवाले,
जग की चाह छुड़ानेवाले, प्रभु से संबंध जुड़ानेवाले,
प्रभुकी याद दिलानेवाले, तुमको लाखों परनाम ॥टेक॥
जग में महापुरुष नहिं होते, सिसक सिसक कर सब ही रोते,
आँसू पोंछनेवाले, सबका आँसू पोंछनेवाले,
सबकी पीड़ा हरनेवाले, सबकी जलन मिटानेवाले,
सबको गले लगानेवाले, तुमको लाखों परनाम ॥१॥
जनम मरन के दुख से मारे, भटक रहे हैं लोग बिचारे,
पथ दरशानेवाले, प्रभु का पथ दरशानेवाले,
प्रभु का मार्ग दिखानेवाले, सत का संग करानेवाले,
हरि के सनमुख करनेवाले, तुमको लाखों परनाम ॥२॥
उच्च नीच जो भी नर नारी, संशय हरनेवाले, सबका संशय हरनेवाले,
सबका भरम मिटानेवाले, सबकी चिन्ता हरनेवाले,
सबको आसिस देनेवाले, तुमको लाखों परनाम ॥३॥
हम तो मूरख नहीं समझते, संतन का आदर नहिं करते,
नित समझानेवाले, हमको नित समझानेवाले,
हमसे नहिं उकतानेवाले, हमपर क्रोध न करनेवाले,
हमपर किरपा करनेवाले, तुमको लाखों परनाम ॥४॥
अब तो भवसागर से तारों, शरण पड़े हम बेगि उबारो,
पार लगानेवाले, हमको पार लगानेवाले,
हमको पवित्र करनेवाले, हमपर करुणा करनेवाले,
हमको अपना कहनेवाले, तुमको लाखों परनाम ॥५॥

अन्तिम प्रवचन

(ब्रह्मलीन श्रद्धेय स्वामी श्रीरामसुखदासजी महाराजके आषाढ़ कृष्ण द्वादशी, विक्रम सम्वत-२०६२, तदनुसार ३ जुलाई, २००५ को परमधाम पधारनेके पूर्व दिनांक २९-३० जून, २००५ को गीताभवन, स्वर्गाश्रममें दिया गया अन्तिम प्रवचन)

       एक बहुत श्रेष्ठ, बड़ी सुगम, बड़ी सरल बात है । वह यह है कि किसी तरहकी कोई इच्छा मत रखो । न परमात्माकी, न आत्माकी, न संसारकी, न मुक्तिकी, न कल्याणकी, कुछ भी इच्छा मत करो और चुप हो जाओ । शान्त हो जाओ । कारण कि परमात्मा सब जगह शान्तरूपसे परिपूर्ण है । स्वतः-स्वाभाविक सब जगह परिपूर्ण है । कोई इच्छा न रहे, किसी तरहकी कोई कामना न रहे तो एकदम परमात्माकी प्राप्ति हो जाय, तत्त्वज्ञान हो जाय, पूर्णता हो जाय !

       यह सबका अनुभव है कि कोई इच्छा पूरी होती है, कोई नहीं होती । सब इच्छाएँ पूरी हो जायँ यह नियम नहीं है । इच्छाओंका पूरा करना हमारे वशकी बात नहीं है, पर इच्छाओंका त्याग करना हमारे वशकी बात है । कोई भी इच्छा, चाहना नहीं रहेगी तो आपकी स्थिति स्वतः परमात्मामें होगी । आपको परमात्मतत्त्वका अनुभव हो जायगा । कुछ चाहना नहीं, कुछ करना नहीं, कहीं जान नहीं, कहीं आना नहीं, कोई अभ्यास नहीं । बस, इतनी ही बात है । इतनेमें ही पूरी बात हो गयी ! इच्छा करनेसे ही हम संसारमें बँधे हैं । इच्छा सर्वथा छोड़ते ही सर्वत्र परिपूर्ण परमात्मामें स्वतः-स्वाभाविक स्थिति है ।

         प्रत्येक कार्यमें तटस्थ रहो । न राग करो, न द्वेष करो ।

तुलसी ममता राम सों,     समता सब संसार ।
राग न रोष न दोष दुख, दास भए भव पार ॥

      एक क्रिया है और एक पदार्थ है । क्रिया और पदार्थ यह प्रकृति है । क्रिया और पदार्थ दोनोंसे संबंध-विच्छेद करके एक भगवान्‌के आश्रित हो जायँ । भगवान्‌के शरण हो जायँ, बस । उसमें आपकी स्थिति स्वतः है । ‘भूमा अचल शाश्वत अमल सम ठोस है तू सर्वदा’‒ ऐसे परमात्मामें आपकी स्वाभाविक स्थिति है । स्वप्नमें एक स्त्रीका बालक खो गया । वह बड़ी व्याकुल हो गयी । पर जब नींद खुली तो देखा कि बालक तो साथमें ही सोया है‒ तात्पर्य है कि जहाँ आप हैं, वहाँ परमात्मा पूरे-के-पूरे विद्यमान है । आप जहाँ हैं, वहीं चुप हो जाओ !!

‒२९ जून २००५, सायं लगभग ४ बजे
**** **** ****
     श्रोता‒कल आपने बताया कि कोई चाहना न रखे । इच्छा छोड़ना और चुप होना दोनोंमें कौन ज्यादा फायदा करता है ?

    स्वामीजी‒मैं भगवान्‌का हूँ, भगवान्‌ मेरे हैं, मैं और किसीका नहीं हूँ, और कोई मेरा नहीं है । ऐसा स्वीकार कर लो । इच्छारहित होना और चुप होना‒दोनों बातें एक ही हैं । इच्छा कोई करनी ही नहीं है, भोगोंकी, न मोक्षकी, न प्रेमकी, न भक्तिकी, न अन्य किसीकी ।

       श्रोता‒इच्छा नहीं करनी है, पर कोई काम करना हो तो ?

     स्वामीजी‒काम उत्साहसे करो, आठों पहर करो, पर कोई इच्छा मत करो । इस बातको ठीक तरहसे समझो । दूसरोंकी सेवा करो, उनका दुःख दूर करो, पर बदलेमें कुछ चाहो मत । सेवा कर दो और अन्तमें चुप हो जाओ । कहीं नौकरी करो तो वेतन भले ही ले लो, पर इच्छा मत करो ।

      सार बात है कि जहाँ आप हैं, वहीं परमात्मा हैं । कोई इच्छा नहीं करोगे तो आपकी स्थिति परमात्मामें ही होगी । जब सब परमात्मा ही हैं तो फिर इच्छा किसकी करें ? संसारकी इच्छा है, इसलिये हम संसारमें हैं । कोई भी इच्छा नहीं है तो हम परमात्मामें हैं ।

‒ ३० जून २००५, दिनमें लगभग ११ बजे

‒ ‘एक सन्तकी वसीयत’ पुस्तकसे

(सन्तोंके वचनों, उपदेशोंके अनुसार अपना जीवन बन जाय‒यही उनके प्रति अपनी सही अर्थमें स्मृति-पुष्पांजलि, कृतज्ञता है । अतः हम सब स्वामीजी महाराजके वचन दृढ़तापूर्वक स्वीकार करके अपना जीवन सफल बनायें )



|
।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि–
आषाढ़ कृष्ण द्वादशी, वि.सं.–२०७०, गुरुवार
सत्स्वरूपका अनुभव

(गत ब्लॉगसे आगेका)
ये प्राकृत पदार्थ किसको व्यथा नहीं पहुँचाते ? जो सम रहता है, उसको । आप सम नहीं रहते तो कभी सुख पाते हो, कभी दुःख पाते हो । आपने मुफ्तमें बड़े परिश्रमसे बन्धनको पकड़ा है, पर वह टिकेगा नहीं, टिक सकता नहीं । परन्तु आप नये-नये बन्धनको पकड़ते रहते हो । बचपन छूट गया तो जवानीको पकड़ लिया और जवानी छूट गयी तो वृद्धावस्थाको पकड़ लिया । आगन्तुकको पकड़कर मुफ्तमें दुःख पाते रहते हो । कृपा करो, आप अपने स्वरूपमें स्थित रहो ।

        श्रोता‒महाराजजी ! तुलसीदासजीको जब शारीरिक कष्ट हुआ तो वे भी सम नहीं रह सके और उन्होंने हनुमानबाहुक लिखा, तो हमारी क्या ताकत है कि सम रह जायँ ?

       स्वामीजी‒वे सम नहीं हुए तो उनकी मरजी, आप क्यों विषम होते हैं ? गोस्वामीजी हों या दूसरा कोई हो, हम उनकी पंचायती करते ही नहीं; हम तो अपनी पंचायती करते हैं ! आप क्यों सुखी-दुःखी होते हो ? कहीं ऐसा लिखा है कि जो तुलसीदासजीमें नहीं हुआ, वह आपमें नहीं होगा ? तुलसीदासजीके छोरा-छोरी नहीं हुए, पर आपके हो गये ! तुलसीदासजीमें जो बीमारी नहीं आयी, वह आपमें आ गयी ! जो तुलसीदासजीमें नहीं आयीं, वे कई बातें आपमें आ गयीं ! आपमें जो बातें आयी हैं, वे सब तुलसीदासजीमें आयी थीं क्या ? जितनी आपपर बीती है, उतनी तुलसीदासजीपर बीती थी क्या ? फिर तुलसीदासजीको बीचमें क्यों लाते हो ?

         मैं तो अपने अनुभवकी बात कहता हूँ, न तुलसीदासजीकी बात कहता हूँ, न शंकराचार्य आदिकी बात कहता हूँ । आप अनुभव करके देखो । अगर आपको अनुभव करना है तो इधर-उधरकी बात मत करो । आपसे चर्चा करके मैं इस नतीजेपर पहुँचा हूँ कि वास्तवमें अपने कल्याणकी इच्छा है ही नहीं । अपने कल्याणकी इच्छावाला दूसरी बात कर नहीं सकता । कल्याणकी सच्ची इच्छा हो तो सब सम्बन्ध तोड़कर भजनमें लग जाय । किसीसे न लेना है, न देना है, न आना है, न जाना है; किसीसे कोई मतलब नहीं । रोटी मिल जाय तो खा ली, और न मिले तो कोई परवाह नहीं‒‘जाहि विधि राखे राम ताहि विधि रहिये, सीताराम सीताराम सीताराम कहिये ।’ यदि रोटी न मिलनेपर मर जाओगे तो क्या रोटी खाकर जीते रहोगे ? क्या रोटी खानेवाला कभी मरता नहीं ? समय आनेपर सबको मरना पड़ेगा ही । इसलिये कोई करे या न करे, हमें तो अपना कल्याण करना है ।

कल्याण स्वतःसिद्ध है, बन्धन स्वतःसिद्ध नहीं है । बन्धन कृत्रिम है और आपका बनाया हुआ है । आप अपने-आपका अनुभव करो कि बालकपनसे आजतक आप वही हो कि दूसरे हो ? अवस्थाएँ बदलीं, देश बदला, काल बदला, परिस्थिति बदली, पर आप वही रहे । जो बदलता है, उसको ले-लेकर आप सुखी-दुःखी होते हो । आप अपने होनेपनमें स्थित रहो । जो बदलता है, उसमें क्यों स्थित होते हो ?
दौड़ सके तो दौड़  ले,    जब  लगि  तेरी  दौड़ ।
दौड़ थक्या धोखा मिट्या, वस्तु ठौड़-की-ठौड़ ॥

           श्रोता‒स्वामीजी ! अपने स्वरूपमें भी स्थित होना है और शरीरको चारा भी देना है..... ।

स्वामीजी‒दोनोंमें अपने स्वरूपमें स्थित होना है । शरीरके पीछे क्यों पड़े हो ? वह तो नष्ट हो रहा है ।

श्रोता‒उसको चारा तो देना पड़ेगा महाराजजी !

स्वामीजी‒चारा देनेके लिये कौन मना करता है ? कभी मना किया है मैंने स्वप्नमें भी ? पर अपनेको क्यों देना पड़ेगा, जिसको गरज है, वह दे या न दे । आप कहाँसे लाओगे देनेके लिये ? लोगोंका इधर-से-उधर दिया है और उधर-से-इधर लिया है, और आपने क्या किया है ? जो हैं, उन्हीं चीजोंमें उथल-पुथल किया है । चारा देना पड़े या न पड़े, कोई आवश्यकता नहीं आपको । जो जीवनमुक्त महापुरुष होते हैं, उनकी लोगोंको गरज हो तो वे उन्हें अन्न दें, वस्त्र दें, नहीं तो मरने दें ! उस महापुरुषको तो संसारसे कोई मतलब नहीं है, संसारसे कुछ लेना नहीं है । जिनको दूधकी गरज है, वे दूध देनेवाली गायका पालन अपने-आप करेंगे, ऐसे ही जिनको जीवनमुक्त महापुरुषकी गरज है, वे उनका पालन अपने-आप करेंगे । नहीं करेंगे तो उसको लेना है ही नहीं । उसका तो काम बन गया है !

आवश्यकताके अनुसार अन्न लेना, जल लेना और सोना‒इन तीन चीजोंके लिये मैं मना करता ही नहीं । भूख भी लगेगी, प्यास भी लगेगी, नींद भी आयेगी, ये तो आती रहेंगी, अपने क्या मतलब है इनसे ? जैसे कभी धूप आती है, कभी छाया आती है, कभी वर्षा आती है, कभी हवा चलती है, कभी ठण्डी आती है, कभी गरमी आती है, ऐसे ही भूख भी लगती है, प्यास भी लगती है । कभी संयोग होता है, कभी वियोग होता है; यह तो होता ही रहता है । इसको क्या आदर दें ? हो गया तो क्या, नहीं हो गया तो क्या ! आप तो वैसे-के-वैसे ही रहे । प्रत्यक्ष अनुभवकी बात है !

नारायण ! नारायण !! नारायण !!!

‒ ‘नित्ययोगकी प्राप्ति’ पुस्तकसे
|
।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि–
आषाढ़ कृष्ण एकादशी, वि.सं.–२०७०, बुधवार
योगिनी एकादशी-व्रत (सबका)
सत्स्वरूपका अनुभव

(गत ब्लॉगसे आगेका)
राग-द्वेष, हर्ष-शोक आदि जो दो चीजें हैं, वे आपमें नहीं हैं । वे बेचारी तो आपके सामने गुजरती हैं । कभी राग हो गया, कभी द्वेष हो गया, कभी हर्ष हो गया, कभी शोक हो गया, कभी निन्दा हो गयी, कभी प्रशंसा हो गयी । ये तो होनेवाले हैं और मिटनेवाले हैं । अब होनेवाले और मिटनेवालेको पकड़कर आप सुखी-दुःखी होते हैं ! ये तो आपके सामने आते हैं, बीतते हैं, गुजरते हैं । आप ज्यों-के-त्यों रहते हो । आपमें फर्क पड़ता नहीं, आप बदलते नहीं । जो बदलता नहीं, वह आपका स्वरूप है और जो बदलता है, वह प्रकृतिका है । इतनी सी बात है, लम्बी-चौड़ी बात ही नहीं है । कृपानाथ ! कृपा करो, आप अपने स्वरूपमें स्थित रहो । स्वरूपमें आपकी स्थिति स्वतः है । आगन्तुक सुख-दुःखमें, आगन्तुक राग-द्वेषमें आप अपनी स्थिति जबरदस्ती करते हो, और उसमें आपकी स्थिति कभी रह सकेगी नहीं । आप कितना ही उद्योग कर लो, न रागमें, न द्वेषमें, न सुखमें, न दुःखमें आपकी स्थिति रह सकेगी । कारण कि आप इनके साथ नहीं हो, ये आपके साथ नहीं है । आप कहते हैं कि मिटता नहीं, हम कहते हैं कि टिकता नहीं !

श्रोता‒इनमें अपनी जो स्थिति मान रखी है, उस मान्यतासे छूटनेका साधन क्या है ?

स्वामीजी‒साधन यही है कि नहीं मानेंगे । जो भूलसे मान लिया, उसको नहीं मानना ही साधन है । कितनी सीधी-सरल बात है ! कठिनताका नाम-निशान ही नहीं है । निर्माण करना हो, बनाना हो, उसमें कहीं कठिनता होती है, कहीं सुगमता होती है । जो ज्यों-का-त्यों विद्यमान है, उसको जाननेमें क्या कठिनता है ?

श्रोता‒जिस समय राग-द्वेष आते हैं, उस समय तो प्रभावित हो जाते हैं !

स्वामीजी‒तो प्रभावित होना आपकी गलती हुई, राग-द्वेषकी थोड़े ही गलती हुई ! आप राग और द्वेष‒दोनोंको जानते हो और दोनोंसे अलग हो । अब आप अलग होते हुए भी प्रभावित हो जाते हो, मिल जाते हो तो यह गलती मत करो ।

श्रोता‒उसका असर पड़ता है ।

स्वामीजी‒आप उसको आदर देते हो तो असर पड़ता है । आदर दोगे तो असर पड़ेगा ही ! ये तो आगन्तुक हैं । गीता साफ कह रही है‒‘आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व’ (२/१४) ‘ये आने-जानेवाले और अनित्य हैं, इनको सह लो, विचलित मत होओ ।’ आप मुफ्तमें विचलित होते हो, पत्थर उछालकर सिर नीचे रखते हो ! इसमें दूसरेका क्या दोष है ?

श्रोता‒यह सहना अभ्याससे आयेगा क्या ?

स्वामीजी‒आप सहते ही हो, नहीं तो क्या करोगे ? सुख आ जाय, उस समय आप क्या करोगे ? दुःख आ जाय, उस समय आप क्या करोगे ? जबरदस्ती तो सहते ही हो, जानकर सह लो तो निहाल हो जाओ ! नहीं तो भोगना पड़ेगा ही । नहीं सहोगे तो कहाँ जाओगे ? चाहे सुख आये, चाहे दुःख आये, आप तो ज्यों-के-त्यों ही रहते हैं ।
यं हि  न  व्यथयन्त्येते   पुरुषं पुरुषर्षभ ।
समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते ॥
                                                 (गीता २/१५)
      ‘हे पुरुषोंमें श्रेष्ठ अर्जुन ! सुख-दुःखमें सम रहनेवाले जिस धीर मनुष्यको ये मात्रास्पर्श (पदार्थ) व्यथा नहीं पहुँचाते, वह अमर हो जाता है ।’

    (शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒ ‘नित्ययोगकी प्राप्ति’ पुस्तकसे

|
।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि–
आषाढ़ कृष्ण दशमी, वि.सं.–२०७०, मंगलवार
एकादशी-व्रत कल है
सत्स्वरूपका अनुभव

(गत ब्लॉगसे आगेका)
श्रोता‒महाराजजी, अन्तःकरणमें राग-द्वेष रहते हुए ही क्रियाएँ होती हैं !

स्वामीजी‒बिलकुल क्रियाएँ होती हैं राग-द्वेष रहते हुए, परन्तु आपका कभी अभाव होता है क्या ? कितना ही राग-द्वेष हो जाय, कितना ही हर्ष-शोक हो जाय, आपमें कुछ फर्क पड़ता है क्या ?

श्रोता‒फर्क न पड़नेपर भी साधकमें घबराहट रहती है कि राग-द्वेष तो हो रहे हैं !

स्वामीजी‒आप राग-द्वेषको पकड़ लेते हो, बहते हुए को पकड़ लेते हो, तब घबराहट होती है । राग रहता नहीं, द्वेष रहता नहीं, वैर रहता नहीं, सुख रहता नहीं, दुःख रहता नहीं; जो रहता नहीं, उसको पकड़ लेते हो । आप उसको पकड़ो मत । आप तो वैसे-के-वैसे रहते हो । अगर वैसे नहीं रहते तो सुख-दुःखको, राग और द्वेषको आप अलग-अलग कैसे जानते हो । रागके समय रहते हो, वही द्वेषके समय रहते हो; द्वेषके समय रहते हो, वही रागके समय रहते हो, तब दोनोंका अनुभव होता है । जिसको दोनोंका अनुभव होता है, उसमें दोनों कहाँ हैं ?

यह एक वहम है कि अन्तःकरण शुद्ध होनेसे कर्ता शुद्ध हो जायगा । सभी कारक क्रियाके होते हैं । कर्ता, कर्म, करण, सम्प्रदान, अपादान, अधिकरण‒ये सब क्रियाके हैं, प्रकृतिके हैं । यह प्रकृति जिससे प्रकाशित होती है, वह ज्यों-का-त्यों रहता है । अतः आप राग-द्वेषसे डरो मत । ये तो मिटनेवाले हैं, आने-जानेवाले हैं । असत्‌ तो मिट रहा है । किसीकी ताकत नहीं कि असत्‌को स्थिर रख सके और सत्‌का विनाश कर सके । असत्‌ तो टिक नहीं सकता और सत्‌ मिट नहीं सकता । असत्‌में किसीकी स्थिति हुई नहीं, होगी नहीं और हो सकती नहीं; एवं सत्‌से अलग कोई हुआ नहीं, होगा नहीं और हो सकता नहीं ।

श्रोता‒असत्‌में स्थित होकर ही तो भोक्ता बनता है !

स्वामीजी‒बिलकुल, इसमें कहना ही क्या है ! वह असत्‌में स्थिति मान लेता है, स्थित होता नहीं । अगर आपकी स्थिति सत्‌में है तो फिर असत्‌में स्थिति कैसे हुई ? अगर असत्‌में स्थिति है तो फिर सत्‌में स्थिति कैसे हुई ? रागमें आपकी स्थिति है तो द्वेष कैसे होगा ? और द्वेषमें आपकी स्थिति है तो राग कैसे हुआ ? राग और द्वेष तो संसारके हैं, उसमें आप लिप्त हो जाते हो । आपमें न राग है, न द्वेष है, न हर्ष है, न शोक है । बड़ी सीधी-सरल बात है । इसमें कठिनताका नामोनिशान ही नहीं है !

श्रोता‒फिर गडबड़ी कहाँ है ?

स्वामीजी‒असत्‌को आप छोड़ना नहीं चाहते‒यहाँ ही गडबड़ी है ! संयोगजन्य सुख आपने मान रखा है, यहाँ गडबड़ी है ।

श्रोता‒असत्‌का त्याग कैसे हो ?

स्वामीजी‒अरे ! असत्‌को आप पकड़ सकते ही नहीं । किसीकी ताकत नहीं कि असत्‌को पकड़ ले । असत्‌का त्याग करना है, त्याग तो अपने-आप हो रहा है !

सुख और दुःख, राग और द्वेष‒दोनोंका जिसको अनुभव होता है, उसमें न सुख है, न दुःख है, न राग है, न द्वेष है, न हर्ष है, न शोक है । जो इन सबसे रहित है, वह आपका स्वरूप है । जिसमें राग-द्वेष आदि होते हैं, वह आपका स्वरूप नहीं है । सीधी बात है !

    (शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒ ‘नित्ययोगकी प्राप्ति’ पुस्तकसे
|
।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि–
आषाढ़ कृष्ण नवमी, वि.सं.–२०७०, सोमवार
सत्स्वरूपका अनुभव

(गत ब्लॉगसे आगेका)
किसीकी ताकत नहीं कि असत्‌के साथ चिपक जाय, असत्‌के साथ रह जाय । कैसे रह जायगा ? असत्‌ तो परिवर्तनशील है । पर मेहनत सब उसीके साथ चिपकनेकी होती है । कोरी फालतू मेहनत होती है । अपने होनेपनमें क्या फर्क पड़ता है ? क्रियाओं और पदार्थोंके परिवर्तनको अपनेमें मान लो तो आपकी मरजी है, होनेपनमें कोई परिवर्तन है नहीं । आने-जानेवालोंमें परिवर्तन है, प्रकाशमें परिवर्तन नहीं है । ऐसे जो सबका प्रकाशक है, स्वयंप्रकाश है, प्रकाशस्वरूप है, उसमें कभी परिवर्तन नहीं होता । जो है, उसमें नहीं-पना नहीं हो सकता और जो नहीं है, उसमें है-पना नहीं हो सकता‒‘नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः’ (गीता २/१६) । असत्‌की सत्ता नहीं होती और सत्‌का अभाव नहीं होता । सत्‌ सदा ज्यों-का-त्यों, अटल, अखण्ड रहता है और उसमे सबकी स्थिति स्वतः है । परन्तु जो मिटता है, उसमें आप स्थिति मान लेते हैं कि मैं धनी हूँ, मैं रोगी हूँ, मैं नीरोग हूँ, मेरा सम्मान है, मेरा अपमान है । मिटनेवालेको आप पकड़ नहीं सकोगे, चाहे युग-युगान्तरोंतक मेहनत कर लो ! अपनी स्वतःसिद्ध सत्तामें स्थित हो जाओ तो गुणातीतके सब लक्षण आपमें आ जायँगे । वास्तवमें वे लक्षण आपमें हैं, पर बदलनेवालेके साथ मिल जानेसे उनका अनुभव नहीं हो रहा है ।

         श्रोता‒महाराजजी ! क्रियाओंमें भी तो वही सत्ता है !

स्वामीजी‒क्रियाओंकी सत्ता है ही नहीं । क्रियाएँ तो आरम्भ होती हैं और नष्ट होती हैं । मैंने व्याख्यान शुरू किया और अब खत्म हो रहा है । क्रिया और पदार्थ सब खत्म होनेवाले हैं ।

श्रोता‒बिना सत्ताके क्रिया कैसे हुई ? सत्ता है, तभी तो क्रिया हुई !

स्वामीजी‒तो बस, सत्ता हुई मूलमें, क्रिया कहाँ हुई ? यही तो हम कहते हैं ! क्रियाका अभाव होता है । सत्ताका अभाव कभी होता ही नहीं । बिलकुल प्रत्यक्ष बात है । इसका कोई खण्डन कर सकता ही नहीं । किसीकी ताकत नहीं कि इसका खण्डन कर दे । असत्‌की सत्ता भी सत्‌के अधीन है, सत्‌की सत्ता भी सत्‌के अधीन है । असत्‌की स्वतन्त्र सत्ता कभी हुई नहीं, कभी होगी नहीं, कभी हो सकती नहीं । इसलिये अपने स्वरूपमें स्थित रहो, इधर-उधर चलो ही मत । ‘समदुःखसुखः स्वस्थः’‒सुख-दुःख तो आते-जाते हैं, इसमें आप स्वतः ही सम हो । अगर आप सम नहीं हो तो यह सुख हुआ और यह दुःख हुआ‒इन दोनोंका ज्ञान कैसे होता है ? सुख आता है तो आप सुखके साथ मिलकर सुखी हो जाते हो और दुःख आता है तो दुःखके साथ मिलकर दुःखी हो जाते हो । अगर आप सुखके साथ मिल ही जाते तो फिर दुःखके साथ नहीं मिल सकते और दुःखके साथ मिल जाते तो फिर सुखके साथ नहीं मिल सकते । अतः वास्तवमें आप सुख-दुःख दोनोंसे अलग हो, पर भूलसे अपनेको सुख-दुःखके साथ मिला हुआ मानकर सुखी-दुःखी हो जाते हो । सुख और दुःख तो बदलनेवाले है, पर आप न बदलनेवाले हो । आपके सामने कभी सुख आता है, कभी दुःख, कभी मान होता है, कभी अपमान; कभी आदर होता है, कभी निरादर; कभी विद्वत्ता आती है, कभी मूर्खता; कभी रोग आता है, कभी नीरोगता; पर आप वही रहते हो । अगर वही नहीं रहते तो इन सबका अलग-अलग अनुभव कैसे होता ? अगर अलग-अलग अनुभव होता है तो फिर आपका अभाव कैसे हुआ ? सुख-दुःख आदिका अभाव हुआ । अतः कृपानाथ ! आप इतनी कृपा करो कि अपने होनेपनमें स्थित रहो । आपका होनापन स्वतः सिद्ध है, कृतिसाध्य नहीं है । उधर दृष्टि नहीं डाली, बस इतनी बात है !

    (शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒ ‘नित्ययोगकी प्राप्ति’ पुस्तकसे

|