।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि–
श्रावण कृष्ण चतुर्दशी, वि.सं.–२०७०, सोमवार
श्रावण सोमवार-व्रत
अवस्थातीत तत्त्वका अनुभव


(गत ब्लॉगसे आगेका)
       अगर हम अवस्थाओंकी सत्ताको स्वीकार करें तो अवस्थाओंकी अनित्यता तथा अनेकता और अपनी नित्य तथा एक सत्ता अनुभवमें आती है और अगर हम अवस्थाओंकी सत्ताको स्वीकार न करें अर्थात्‌ अवस्थाओंकी कल्पना न करें तो एकमात्र अपनी नित्य सत्ता स्वतः ज्यों-की-त्यों अनुभवमें आती है । इसको यों भी कह सकते हैं कि हम अवस्थाओंकी सत्ताको मानें तो उनका अभाव दीखता है; परन्तु अपनी सत्ताको मानें अथवा न मानें, उसका भाव ही दीखता है, अभाव कभी नहीं दीखता । इसलिये गीताने कहा है‒‘नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः’ (२/१६) अर्थात्‌ असत्‌की सत्ता विद्यमान नहीं है और सत्‌का अभाव विद्यमान नहीं है । जो विद्यमान है, वह तत्त्व है और जो विद्यमान नहीं है, वह अतत्त्व है । तत्त्वमें अतत्त्व नहीं है और अतत्त्वमें तत्त्व नहीं है । परन्तु यह कथन अतत्त्वकी सत्ता माननेसे ही है ।

      अवस्थाओंकी सत्ता स्वीकार करके अपनेको अवस्थामें और अवस्थाको अपनेमें माननेसे संसारमें प्रवृत्ति (करना) और निवृत्ति (न करना) होती है । उस प्रवृत्ति और निवृत्तिको लेकर अपनेमें ‘कर्तृत्व’ दीखता है और उसके फलको लेकर अपनेमें ‘भोक्तृत्व’ दीखता है । अगर अवस्थाओंकी सत्ता स्वीकार न करें तो अपनेमें अकर्तृत्व और अभोक्तृत्वका अर्थात्‌ वास्तविक एवं निरपेक्ष निर्विकारताका अनुभव स्वतः हो जाता है ।

      जब साधक वर्तमानमें ‘नैव किञ्चित्करोमीति’ (गीता ५/८) ‘मैं स्वयं कुछ भी नहीं करता हूँ’‒इस प्रकार स्वयंको अकर्ता अनुभव करने लगता है, तब उसके सामने एक बड़ी समस्या आती है । जब उसको भूतकालमें किये हुए अच्छे कर्मोंकी याद आती है, तब वह सुखी हो जाता है कि मैंने बहुत अच्छा काम किया, बहुत ठीक किया ! और जब उसको निषिद्ध कर्मोंकी याद आती है, तब वह दुःखी हो जाता है कि मैंने बहुत बुरा काम किया, बहुत गलती की । इस प्रकार भूतकालमें किये गये कर्मोंके संस्कार उसको सुखी-दुःखी करते हैं । इस विषयमें एक मार्मिक बात है ।

       स्वरूपमें कर्तापन न तो वर्तमानमें हैं, न भूतकालमें और न भविष्यमें ही होगा । अतः साधकको यह देखना चाहिये कि जैसे वर्तमानमें स्वयं अकर्ता है*, ऐसे ही भूतकालमें भी स्वयं अकर्ता था । कारण कि वर्तमान ही भूतकालमें गया है । स्वरूप सत्तामात्र है और सत्तामात्रमें कोई कर्म करना बनता ही नहीं । कर्म केवल अहंकारसे मोहित अन्तःकरणवाले अज्ञानी मनुष्यके द्वारा ही होते हैं‒
अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते ॥
                                                   (गीता ३/२७)
           साधकको भूतकालमें किये हुए कर्मोंकी याद आनेसे जो सुख-दुःख होता है, चिन्ता होती है, यह भी वास्तवमें अहंकारके कारण ही है । वर्तमानमें अहंकारविमूढात्मा होकर अर्थात्‌ अहंकारके साथ अपना सम्बन्ध मानकर ही साधक सुखी-दुःखी होता है । स्थूलदृष्टिसे भी देखें तो जैसे अभी भूतकालका अभाव है, ऐसे ही भूतकालमें किये गये कर्मोंका अभी प्रत्यक्ष अभाव है । अतः भूतकालके अभावको भावरूप देखना, भूतकालकी घटनाओंको सत्ता देकर राजी-नाराज होना बिलकुल गलतीकी बात है ।

    (शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒ ‘जिन खोजा तिन पाइया’ पुस्तकसे
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                              * शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते ॥ (गीता १३/३१)
                 ‘यह आत्मा शरीरमें रहता हुआ भी न करता है और न लिप्त होता है ।’
शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म       प्रारभते  नरः ।
न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः ॥
तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं  केवलं   तु  यः ।
पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न   पश्यति दुर्मतिः ॥
                                                 (गीता १८/१५-१६)
           ‘मनुष्य शरीर, वाणी और मनके द्वारा शास्त्रविहित अथवा शास्त्रविरुद्ध जो कुछ भी कर्म आरम्भ करता है, उसके ये (अधिष्ठान, कर्ता, करण, चेष्टा और दैव) पाँच हेतु होते हैं । परन्तु ऐसे पाँच हेतुओंके होनेपर भी जो उस (कर्मोंके) विषयमें केवल (शुद्ध) आत्माको कर्ता मानता है, वह दुर्मति ठीक नहीं समझता; क्योंकि उसकी बुद्धि शुद्ध नहीं है ।’

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।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि–
श्रावण कृष्ण त्रयोदशी, वि.सं.–२०७०, रविवार
अवस्थातीत तत्त्वका अनुभव



(गत ब्लॉगसे आगेका)
        अनुकूलताके समय प्रतिकूलता नहीं है और प्रतिकूलताके समय अनुकूलता नहीं है । परन्तु जिसको इन दोनों अवस्थाओंका ज्ञान है, उस स्वयंमें न अनुकूलता है, न प्रतिकूलता है । अनुकूलताकी अपेक्षा प्रतिकूलता है और प्रतिकूलताकी अपेक्षा अनुकूलता है । निरपेक्ष सत्ता (स्वयं) में न अनुकूलता है, न प्रतिकूलता ।

        बन्धन-अवस्थामें मुक्तिका अभाव है और मुक्त-अवस्थामें बन्धनका अभाव है । जैसे बन्धन-अवस्थामें मुक्ति नहीं है, ऐसे ही स्वयंमें बन्धन-अवस्था नहीं है और जैसे मुक्त-अवस्थामें बन्धन नहीं है, ऐसे ही स्वयंमें मुक्त-अवस्था भी नहीं है । बन्धनकी अपेक्षा मुक्ति है और मुक्तिकी अपेक्षा बन्धन है । अपेक्षा न हो तो स्वयंमें न बन्धन है, न मुक्ति ।

       इसी तरह सुख-दुःख, हर्ष-शोक, मान-अपमान, निन्दा-प्रशंसा आदि भी अवस्थाएँ हैं, पर जो इन अवस्थाओंको जाननेवाला है, उसमें ये अवस्थाएँ नहीं हैं ।

        जैसे सूक्ष्मदृष्टिसे देखें तो प्यास और जल‒दोनोंमें कोई फर्क नहीं है । प्यास लगनेपर जलका चिन्तन होता है और जिसका चिन्तन होता है, उसके साथ सम्बन्ध होता है । जब जल पीते हैं, तब प्यास शान्त हो जाती है । अतः प्यास और जल‒दोनोंमें जातीय एकता (सजातीयता) है । जलकी इच्छा ही प्यास है, जलका अभाव प्यास नहीं है । ऐसे ही धनकी इच्छा ही निर्धनता है*, धनका अभाव निर्धनता नहीं है । जैसे, कुत्तेके पास धनका अभाव है, पर वह निर्धन नहीं कहलाता । विरक्त, त्यागी पुरुषको कोई निर्धन नहीं कहता । तात्पर्य है कि जैसे, प्यास और जल एक है, ऐसे ही धनवत्ता और निर्धनता, विद्वत्ता और मूर्खता आदि भी एक हैं, क्योंकि दोनों ही सापेक्ष अवस्थाएँ हैं । अतः पहले मैं निर्धन था, अब मैं धनवान्‌ हूँ; पहले मैं मूर्ख था, अब मैं विद्वान्‌ हूँ‒यह केवल अवस्थाका परिवर्तन है । परन्तु स्वयं अवस्थातीत है । ऐसे ही मनुष्य स्वर्गमें जाता है अथवा ब्रह्मलोकमें जाता है तो यह केवल अवस्थाका परिवर्तन है‒‘आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिऽनोऽर्जुन’ (गीता ८/१६)

         वास्तवमें प्यासकी जितनी सत्ता है, उतनी जलकी सत्ता नहीं है । कारण कि प्याससे जलके साथ सम्बन्ध जुड़ता है और प्यास मिटनेसे जलके साथ सम्बन्ध-विच्छेद होता है । ऐसे ही संसारकी इच्छासे संसारके साथ सम्बन्ध जुड़ता है । संसारकी प्राप्ति होनेपर संसारकी इच्छा मिटती नहीं, प्रत्युत और बढ़ती है; क्योंकि संसारकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है । परन्तु परमात्माकी नित्य सत्ता है । तात्पर्य है कि संसारकी प्राप्ति होनेपर भी कमीकी पूर्ति नहीं होती, प्रत्युत कमी बढ़ती है । जैसे, धन मिलनेपर भी धनकी इच्छा बढ़ती है और इच्छा बढ़नेसे धनका अभाव तथा दुःख, सन्ताप, जलन आदि बढ़ते है । परन्तु परमात्माकी प्राप्ति होनेपर कमीका सदाके लिये अत्यन्त अभाव हो जाता है तथा कुछ भी करना, जानना और पाना बाकी नहीं रहता; क्योंकि परमात्मामें कमी है ही नहीं ।

    (शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒ ‘जिन खोजा तिन पाइया’ पुस्तकसे
                                                            _____________________________ 
              *‘को वा दरिद्रो हि विशालतृष्णः’ (प्रश्नोत्तरी ५)

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।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि–
श्रावण कृष्ण द्वादशी, वि.सं.–२०७०, शनिवार
अवस्थातीत तत्त्वका अनुभव



(गत ब्लॉगसे आगेका)
      जाग्रत्‌, स्वप्न आदि अवस्थाओंकी तरह बाल, युवा और वृद्ध‒ये तीनों भी अवस्थाएँ हैं । बाल्यावस्थामें युवावस्था-वृद्धावस्थाका अभाव है, युवावस्थामें बाल्यावस्था-वृद्धावस्थाका अभाव है और वृद्धावस्थामें बाल्यावस्था-युवावस्थाका अभाव है । परन्तु अपना अभाव किसी भी अवस्थामें नहीं है और अपनेमें सम्पूर्ण अवस्थाओंका अभाव है । इसको यों भी कह सकते हैं कि जैसे अभी युवावस्थामें बाल्यावस्था-वृद्धावस्थाका अभाव है, ऐसे ही स्वयंमें युवावस्थाका भी अभाव है । जो सम्पूर्ण अवस्थाओंमें रहनेवाला है, उसमें अवस्था कहाँ है ? मणियोंकी मालामें सूतकी तरह सम्पूर्ण अवस्थाओंमें अपनी सत्ता अनुस्यूत है । जैसे सूतमें मणियाँ नहीं हैं, ऐसे ही सत्ता (स्वरूप) में अवस्थाएँ नहीं हैं ।

     जैसे उपर्युक्त अवस्थाएँ शरीरमें होती है, ऐसे ही उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय‒ये तीन अवस्थाएँ संसारमें होती हैं । उत्पत्ति-अवस्थामें स्थिति और प्रलयका अभाव है, स्थिति-अवस्थामें उत्पत्ति और प्रलयका अभाव है तथा प्रलय-अवस्थामें उत्पत्ति और स्थितिका अभाव है । परन्तु परमात्मतत्त्वमें सम्पूर्ण अवस्थाओंका सदा अभाव है ।

      व्यष्टि (शरीर) में स्वयंकी सत्ता है और समष्टि (संसार) में परमात्मतत्त्वकी सत्ता है । व्यष्टि और समष्टिका भेद भी कल्पित है तथा स्वयं और परमात्मतत्त्वका भेद भी कल्पित है ।

    धनवत्ता-निर्धनता, विद्वत्ता-मूर्खता, सरोगता-नीरोगता, अनुकूलता-प्रतिकूलता आदि सब अवस्थाएँ हैं । धनवत्ताके समय निर्धनताका अभाव है और निर्धनताके समय धनवत्ताका अभाव है । परन्तु स्वयंका अभाव दोनों ही अवस्थाओंमें नहीं है और स्वयंमें दोनों ही अवस्थाओंका अभाव है । इसको यों भी कह सकते हैं कि धनको सत्ता और महत्ता देनेसे ही धनवत्ता और निर्धनता है । अगर धनको सत्ता और महत्ता न दें तो न धनवत्ता है, न निर्धनता है ।

        विद्वत्तामें मूर्खताका अभाव है और मूर्खतामें विद्वत्ताका अभाव है, ऐसे ही स्वयंमें मूर्खताका भी अभाव है । विद्याको सत्ता और महत्ता देनेसे ही विद्वत्ता और मूर्खताका भान होता है । अगर विद्याको सत्ता और महत्ता न दें तो न विद्वता हैं, न मूर्खता है । विद्वत्ता और मूर्खता दोनों सापेक्ष अवस्थाएँ हैं । निरपेक्ष सत्ता (स्वयं) में न विद्वत्ता है, न मूर्खता ।

        रोगावस्थामें नीरोगताका अभाव है और निरोगावस्थामें रोगका अभाव है । परन्तु स्वयंका अभाव दोनों ही अवस्थाओंमें नहीं है और स्वयंमें दोनों ही अवस्थाओंका अभाव है । अगर स्वयं दोनों अवस्थाओंमें होता तो अवस्थाके बदलनेपर स्वयं भी बदल जाता और अवस्थाके बदलनेका ज्ञान भी स्वयंको नहीं होता । अगर स्वयंमें दोनों अवस्थाएँ होतीं तो अवस्थाका भेद नहीं होता और अवस्थाका अभाव भी नहीं होता तथा एक ही अवस्था निरन्तर रहती । परन्तु अवस्थाओंके बदलनेका अनुभव तो सबको होता है, पर अपने बदलनेका अनुभव कभी किसीको हुआ नहीं, होगा नहीं, है नहीं और हो सकता नहीं ।

     (शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒ ‘जिन खोजा तिन पाइया’ पुस्तकसे

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।। श्रीहरिः ।।



आजकी शुभ तिथि–
श्रावण कृष्ण एकादशी, वि.सं.–२०७०, शुक्रवार
कामदा एकादशी-व्रत (सबका)
अवस्थातीत तत्त्वका अनुभव


[ पाठकोंसे प्रार्थना है कि इस लेखको मनोयोगपूर्वक धीरे-धीरे, समझ-समझकर पढ़ें । ]

           श्रीमद्भगवद्गीतामें आया है‒
नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः ॥
                                                        (२/२४)
      ‘यह सत्य-तत्त्व नित्य रहनेवाला, सबमें परिपूर्ण, अचल, स्थिर स्वभाववाला और अनादि है ।’

   जैसे, गंगाजी निरन्तर बहती रहती है, पर जिसके ऊपर बहती हैं, वह आधारशिला ज्यों-की-त्यों स्थिर रहती है । गंगाजीका जल कभी स्वच्छ होता है, कभी मटमैला होता है । कभी जल गरम होता है, कभी ठण्डा हो जाता है । कभी तेज प्रवाहके कारण जल आवाज करने लगता है, कभी शान्त हो जाता है । परन्तु आधारशिला ज्यों-की-त्यों रहती है, उसमें कभी कोई फर्क नहीं पड़ता । इसी तरह कभी जलमें मछलियाँ आ जाती है, कभी सर्प आदि जन्तु आ जाते हैं, कभी लकड़ीके सिलपट तैरते हुए आ जाते हैं, कभी पुष्प बहते हुए आ जाते हैं, कभी कूड़ा-कचरा आ जाता है, कभी मैला आ जाता है, कभी गोबर आ जाता है, कभी कोई मुर्दा बहता हुआ आ जाता है, कभी कोई जीवित व्यक्ति तैरता हुआ आ जाता है । ये सब तो आकर चले जाते हैं, पर आधारशिला ज्यों-की-त्यों अचल रहती है । ऐसे ही सम्पूर्ण अवस्थाएँ, परिस्थितियाँ, घटनाएँ, क्रियाएँ आदि निरन्तर बह रही हैं, पर सबका आधार स्वयं (सत्य-तत्त्व) ज्यों-का-त्यों अचल रहता है । परिवर्तन अवस्थाओं आदिमें होता है, तत्त्वमें नहीं ।

       वास्तवमें अवस्थाओंकी स्वतन्त्र सत्ता ही नहीं है । कारण कि जिसका कभी कहीं भी अभाव होता है, उसका सदा सब जगह ही अभाव होता है और वह असत्‌ होता है‒ ‘नासतो विद्यते भावः’ । जिसका कभी कहीं भी अभाव नहीं होता, उसका सदा ही सब जगह भाव होता है और वह सत्‌ होता है‒‘नाभावो विद्यते सतः’ (गीता २/१६) । अवस्थाओंमें सत्ताका अभाव है और स्वयंमें परिवर्तन (क्रिया) का अभाव है । अज्ञानके कारण ही मनुष्यको स्वयंकी सत्ता अवस्थाओंमें दीखती है और अवस्थाओंका परिवर्तन स्वयंमें दीखता है । अतः अवस्थाओंकी सत्ता मानना भी भ्रम अर्थात्‌ मिथ्या है और स्वयंमें परिवर्तन मानना भी भ्रम है । अवस्थामें स्वयंको देखना भी भ्रम है और स्वयंमें अवस्थाको देखना भी भ्रम है । तत्त्वबोध होनेपर यह भ्रम नहीं रहता ।

     अगर हम अवस्थाओंमें होते और अवस्थाएँ हमारेमें होतीं तो हम एक अवस्थामें ही रहते, दूसरी अवस्थामें जा सकते ही नहीं । एक अवस्थाको छोड़कर दूसरी अवस्थामें वही जा सकता है, जो अवस्थाओंसे अलग है । यह हमारा प्रत्यक्ष अनुभव भी है कि कोई भी अवस्था निरन्तर नहीं रहती, पर हम स्वयं निरन्तर रहते हैं ।

    जैसे, जाग्रत्‌, स्वप्न, सुषुप्ति, समाधि और मूर्च्छा‒ये पाँच अवस्थाएँ हैं । जाग्रत्‌-अवस्थामें स्वप्न-सुषुप्ति-समाधि-मूर्च्छाका अभाव है, स्वप्न अवस्थामें जाग्रत्‌-सुषुप्ति-समाधि-मूर्च्छाका अभाव है, सुषुप्ति-अवस्थामें जाग्रत्‌-स्वप्न-समाधि-मूर्च्छाका अभाव है, समाधि अवस्थामें जाग्रत्‌-स्वप्न-सुषुप्ति-मूर्च्छाका अभाव है और मूर्च्छा अवस्थामें जाग्रत्‌-स्वप्न-सुषुप्ति-समाधिका अभाव है । परन्तु अपना अभाव किसी भी अवस्थामें नहीं है और अपनेमें सम्पूर्ण अवस्थाओंका अभाव है‒यह सर्वानुभूत स्वतःसिद्ध बात है । जैसे अभी जाग्रत्‌-अवस्थामें स्वप्न-सुषुप्ति आदि अवस्थाओंका अभाव है, ऐसे ही स्वयंमें जाग्रत्‌-अवस्थाका भी अभाव है । तात्पर्य है कि स्वयंमें कोई भी अवस्था नहीं है । वह अवस्थातीत तत्त्व है ।

    (शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒ ‘जिन खोजा तिन पाइया’ पुस्तकसे

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।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि–
श्रावण कृष्ण दशमी, वि.सं.–२०७०, गुरुवार
एकादशी-व्रत कल है 
गीताकी शरणागति
 

(गत ब्लॉगसे आगेका)
         जो मनुष्योंमें भी नीचे हैं, जन्मसे भी नीचे हैं, कर्मसे भी नीचे हैं, योग्यतासे भी नीचे हैं और जो पशु-पक्षी आदि जंगम तथा वृक्ष-लता आदि स्थावर जीव हैं, वे भी यदि भगवान्‌के चरणोंका आश्रय ले लें तो भगवत्कृपासे उनका भी उद्धार हो जाता है ! भगवान्‌ कहते हैं‒
मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य     येऽपि स्युः पापयोनयः ।
स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम् ॥
किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या        भक्ता राजर्षयस्तथा ।
                                                          (गीता ९/३२-३३)

           ‘हे पार्थ ! जो भी पापयोनिवाले हों तथा जो भी स्त्रियाँ, वैश्य और शूद्र हों, वे भी सर्वथा मेरी शरण होकर निःसन्देह परमगतिको प्राप्त हो जाते हैं । फिर जो पवित्र आचरणवाले ब्राह्मण और ऋषिस्वरूप क्षत्रिय मेरे भक्त हों, वे परमगतिको प्राप्त हो जायँ, इसमें तो कहना ही या है !’

        इस प्रकार गीतामें शरणागतिका भाव बहुत विलक्षण रीतिसे आया है । भगवान्‌ने संसारकी सम्पूर्ण अच्छी-अच्छी बातोंका सार गीतामें संग्रह कर दिया है, मानो गागरमें सागर भर दिया है ! उनमें भी शरणागति सम्पूर्ण गीताका सार है । उस शरणागतिको यदि कोई स्वीकार कर ले तो वह निहाल हो जायगा । उसमें बड़ी विलक्षणता आ जायगी । उसके भीतर बिना पढ़े वेदोंका तात्पर्य स्वतः स्फुरित हो जायगा । उसके लिये कुछ भी करना, जानना और पाना शेष नहीं रहेगा । अतः शरणागतिकी अनन्त अपार महिमा है !

नारायण ! नारायण !! नारायण !!!

‒ ‘जित देखूँ तित तू’ पुस्तकसे

         संयोगजन्य सुखकी लालसा जितनी घातक है, उतना सुख घातक नहीं है । शरीर बना रहे‒यह भाव जितना घातक है, उतना शरीर घातक नहीं है । कुटुम्बका मोह जितना घातक है, उतना कुटुम्ब घातक नहीं है । रुपयोंका लोभ जितना घातक है, उतने रुपये घातक नहीं हैं ।

          जो दीखता है, उस संसारको अपना नहीं मानना है, प्रत्युत उसकी सेवा करनी है और जो नहीं दीखता, उस भगवान्‌को अपना मानना है तथा उसको याद करना है ।

        मिले हुए संसारका दुरुपयोग मत करो, जाने हुए तत्त्वका अनादर मत करो और माने हुए परमात्मामें सन्देह मत करो ।

       हमारे हृदयमें जड़ता (शरीर-संसार) का जितना आदर हुआ है, उतना ही परमात्माका अनादर हुआ है और वह अनादर ही हमारा पतन करेगा, हमारी अधोगति करेगा ।

        नाशवान्‌ पदार्थोंकी महत्त्वबुद्धि मनुष्यको पददलित करती है और परमात्माकी महत्त्वबुद्धि उसको ऊँचा उठाती है ।

       जो जिस वस्तु, व्यक्ति आदिका दुरुपयोग करता है, उसको उससे वंचित होनेका दुःख भोगना ही पड़ता है ।

          जो अपना है, वह सदा ही अपना है और जो किसी भी समय अपना नहीं है, वह कभी भी अपना नहीं हो सकता ।

         जो सभीका होता है, वही हमारा होता है । जो किसी भी समय किसीका नहीं होता, वह हमारा हो ही नहीं सकता ।

‒ ‘अमृतबिन्दु’ पुस्तकसे
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