।। श्रीहरिः ।।

            


आजकी शुभ तिथि–
   आश्विन कृष्ण चतुर्थी, वि.सं.-२०७८, शनिवार
                             
      भगवान्‌में मन कैसे लगें ?


जब सम्बन्ध भगवान्‌के साथ जोड़ लेंगे तो उनकी बातें ही सुनेंगे । बादमें तरह-तरहकी बातें कौन सुनेगा ? बताओ ! सुनें तो असर नहीं होगा । उसी रीतिसे दूसरी बातें नहीं सुनते जिस रीतिसे लड़की दूसरे लड़कोंकी बातें नहीं सुनती । केवल सम्बन्धवाले लड़केकी बात सुनती है; उसको कभी देखा नहीं, पहले सुना भी नहीं, बस माँ-बापने सम्बन्ध कर दिया कि हमने अमुकको लड़की दी । इसी प्रकार भगवान्‌से सम्बन्ध जोड़ लेना है । हमें तो भगवत्प्राप्ति करना है फिर भगवान्‌की बात अच्छी लगेगी । स्वतः ही, स्वाभाविक ही । फिर मन और कहीं क्यों जायगा ? कहाँ जायगा ? हमें मतलब ही नहीं है दूसरेसे भाई !

हमें क्या काम दुनियासे हमें श्रीकृष्ण प्यारे हैं ।

यशोदा नन्दके नन्दन     मेरे  आँखोंके तारे हैं ॥

हमें क्या मतलब ? दुनियासे क्या लेना-देना ? न लेना है, न देना है । हमारे तो एक भगवान्‌ हैं और वे ही हमारे हैं ।

भगवान्‌के गुण सुनें, उनके चरित्र सुनें, उनकी महिमा सुनें । उनके परायण होवें । सुननेसे बड़ा लाभ होता है । भक्तोंके चरित्रोंसे बड़ा लाभ होता है । वह भी एक बढ़िया उपाय है । दिनमें घंटा, दो घंटा आप कहीं एकान्तमें बैठ जाओ, कमरेमें बैठ जाओ । दरवाजा कर लो बन्द । भक्तोंके चरित्र पढ़ो । जिनको पढ़ते-पढ़ते गद्‌गद हो जाय और प्रियता आवे, उस समय पुस्तकको छोड़ दो । नाम-जप है, कीर्तन है, शुरू कर दो । भगवान्‌का चिन्तन-भजन शुरू कर दो । जब मन फिर इधर-उधर जावे और वैसी बात न रहे, तो फिर एक पन्ना पीछेसे पढ़ो । फिर पढ़ते-पढ़ते भाव आ जावे फिर छोड़ दो वहाँ । पुस्तक पढ़ना या पूरा करना है‒यह मतलब नहीं । मन लगाना है । बस, वहाँ लगा दिया । उसके बाद फिर नाम-जप करते रहो, कीर्तन करते रहो । प्रार्थना करते रहो । भगवान्‌से बातें करते रहो मनमें । हमारा मन नहीं लगता महाराज ! मैं ‌क्या करूँ ? आप कब दर्शन दोगे ? आपके चरणोंमें कब प्रेम  होगा ? ऐसे एक पुस्तक निकली है गीता‌प्रेससे ‘ध्यानावस्थामें प्रभुसे वार्तालाप’ । उस पुस्तकके अनुसार करो, बड़ा लाभ होगा । चलते-फिरते भगवान्‌से बात करना शुरू कर दो । मनसे प्रश्न पूछो तो मनसे उत्तर मिले । जो स्फुरणा हो जाय फिर भगवान्‌से पूछो‒सुगमतासे मन लग जायगा । इसी प्रकार विनयपत्रिका ले ली अथवा कोई स्तुति ले ली । स्तुति करते-करते मन लग जाय तब चिन्तन करना, नाम-जप करना शुरू कर दो । जब छूट जाय तो फिर पढ़ना शुरू कर दो । इन बातोंमेंसे कोई बात अपनाकर आप देखें । ऐसे तो यह युक्तिसंगत जँचती है । बात यह ठीक है । ऐसे हो सकता है कि नहीं ? यदि सम्भव है तो करके देखो । करके देखनेसे पता लगता है कि कहाँ-कहाँ विघ्न आते हैं ? कहाँ बाधा आती है ? क्यों बाधा आती है ? इन बातोंका पता लगेगा ।

यदि मन अधिक चंचल हो तो आप जप करते रहे, थोड़ी-थोड़ी देर बाद भगवान्‌से कहता रहे कि आपके चरणोंमें मन नहीं लगता । हे भगवन् ! मन नहीं लगता है । नमस्कार करे और कहता रहे । यह बड़ी सरल बात है । नाम-जप करता रहे, आधा मिनट हुआ, एक मिनट हुआ फिर कह दिया, महाराज ! मन नहीं लगता ! कहना‒प्रार्थना हो गयी । भगवान्‌की याद आ गयी । नाम-जप हो रहा है । पाँच-सात दफे मालामें कह देवे । महाराज, मन नहीं लगता । हे नाथ ! मैं भूल जाता हूँ । हे नाथ ! मन नहीं लगता । नमस्कार करते रहो, कहते रहो । षोड्श-मन्त्र ब्रह्माजीका बताया हुआ है, यह जपता रहे और प्रार्थना करता रहे । हे नाथ ! मन नहीं लगता । हे भगवन्‌ क्या करूँ ? महाराज ! आपके चरणोंमें मन नहीं लगता । कहते रहो । उनकी कृपासे मन लगने लगेगा ।

नारायण !     नारायण !!     नारायण !!!

‘जीवनोपयोगी प्रवचन’ पुस्तकसे

|
।। श्रीहरिः ।।

           


आजकी शुभ तिथि–
   आश्विन कृष्ण तृतीया, वि.सं.-२०७८, शुक्रवार
                             
      भगवान्‌में मन कैसे लगें ?


आप जो सम्बन्ध भगवान्‌के साथ मान लें, भगवान्‌ भी वही सम्बन्ध माननेको तैयार हैं । आपको सरलतासे जैसा भाव आवे, वैसा ही भाव कर लो ।

तू दयालु, दीन हौं, तू दानि हौं भिखारी ।

हौं  प्रसिद्ध  पातकी,  तू पाप-पुंज-हारी ॥

नाथ तू अनाथको,  अनाथ  कौन  मोसो ।

मो समान आरत नहीं,  आरतिहर तोसो ॥

ऐसे ही तुलसीदासजी आगे कहते हैं‒

तोहिं मोहिं नाते अनेक,   मानिये जो भावै ।

ज्यों-त्यों तुलसी कृपालु ! चरन-सरन पावै ॥

ऐसे ही मान लो । भगवान्‌के प्रति भाव बदल लो । भगवान्‌को भगवान्‌ ही मान लो चाहे अपना प्यारा मान लो, जो भाव प्यारा लगे उनके साथ वही भाव मान लो । यहाँ कई वर्षों पहले व्याख्यान करते हुए मेरेसे एक भाईने प्रश्न किया‒मुझे तो माँका नाम प्यारा लगता है । प्रत्येकका ही ऐसा भाव होता है कि माँ अच्छी लगती है । पालन करनेवाली होती है माँ, बूढ़े हो जायँ तबतक माँ याद आती है । माँका स्नेह होता है । स्नेहका प्रभाव ज्यादा हो जाता है । तो, मेरेसे पूछा था एक सज्जनने कि भगवान्‌को हम माँ कहकर पुकार सकते हैं क्या ?

भगवान्‌में स्त्री-पुरुषका बिलकुल भेद है ही नहीं । माँ कहोगे तो माँ-रूपमें आ जायेंगे भगवान्‌ । प्रबोध-सुधाकर पुस्तकमें श्रीशंकराचार्यजी महाराज (वेदान्तके आचार्य)-ने, ‘मातः कृष्णाऽभिधाना’ लिखा है । वे भी कृष्णभगवान्‌को माँ कहकर पुकारते हैं । माँ कहकर पुकारो । माँ-नामसे यदि स्नेह जागृत होता हो, मन लगता हो तो भगवान्‌को माँ कहो, पिता कहो, भाई कहो । जो नाम प्यारा लगे, जो सम्बन्ध प्यारा लगे । ऐसा नहीं मान सको तो राधाजीको माँ बना लो, नहीं तो कृष्ण माँ हैं मेरी । ऐसा मान लो ।

पहले आरम्भ-आरम्भमें ही सम्बन्ध जोड़नेमें मन जगह-जगह जाता है । उद्देश्य एक बना लें । लक्ष्य एक बना लें । बस, फिर बादमें जगह-जगह मन नहीं जायगा, फिर एकमें ही मन रहेगा । जैसे लड़का हो या लड़की । आप उसका सम्बन्ध करते हो, लड़केका सम्बन्ध करते हो तो अनेक लड़कियोंकी बातें करो तो छोरा सुनेगा । लड़कीका सम्बन्ध आप करते हो, अपनी स्त्रीसे बातें करते हो कि देखो वहाँ ऐसा लड़का है, इतना पढ़ा-लिखा है । इस प्रकारकी बातें करोगे‒तो लड़की सुनेगी । ऐसी बातें लड़की कबतक सुनती है ? जबतक उसका सम्बन्ध पक्का नहीं हो जाता । आप सम्बन्ध पक्का कर दें, अमुकके साथ बात पक्की हुई । उसके बाद (सम्बन्ध पक्का होनेके बाद) छोरी केवल उसकी बात सुनेगी । दूसरेकी बात इस प्रकारसे नहीं सुनेगी । सुनेगी तो परवाह नहीं करेगी । ऐसे ही लड़केका यदि किसीके साथ सम्बन्ध पक्का हो गया तो लड़का सम्बन्धवाली उस लड़कीकी ही बात सुनेगा कि कैसी योग्यता है ? कैसी बात है ? लड़की भी छिप-छिपकर सुनती है । यह क्या है ? सम्बन्ध हो गया न अब । सम्बन्ध न होता, तो इस प्रकार नहीं सुनती । बहुत-सी बातें होती है, पर नहीं सुनते । तो हम भगवान्‌की बातें क्यों नहीं सुनते हैं, क्योंकि सम्बन्ध जोड़ा नहीं । जब सम्बन्ध भगवान्‌के साथ जोड़ लेंगे तो उनकी बातें ही सुनेंगे ।

|
।। श्रीहरिः ।।

            



आजकी शुभ तिथि–
   आश्विन कृष्ण द्वितीया, वि.सं.-२०७८, गुरुवार
                             
    मनकी चंचलता कैसे दूर हो ?


मन कैसे स्थिर हो ? मनको स्थिर करनेके लिये बहुत सरल युक्ति बताता हूँ । आप मनसे भगवान्‌का नाम लें और मनसे ही गणना रखें । राम-राम-राम‒ऐसे रामका नाम लें । एक राम, दो राम, तीन राम, चार राम, पाँच राम । न तो एक-दो-तीन बोलें, न अँगुलियोंपर रखें, न मालापर रखें । मनसे ही नाम लें और मनसे ही गणना करें । करके देखो मन लगे बिना यह होगा नहीं और होगा तो मन लग ही जायगा ।

एकदम सरल युक्ति है‒मनसे ही नाम लो, मनसे ही गिनती करो और फिर तीसरी बार देखो तो उसको लिखा हुआ देखो । “राम” ऐसा सुनहरा चमकता हुआ नाम लिखा हुआ दीखे । ऐसा करनेसे मन कहीं जायगा नहीं और जायगा तो यह क्रिया होगी नहीं । इतनी पक्की बात है । कोई भाई करके देख लो । सुगमतासे मन लग जायगा । कठिनता पड़ेगी तो यह क्रम छूट जायगा । न नाम ले सकोगे, न गणना कर सकोगे, न देख सकोगे । इसलिये मनकी आँखोंसे देखो, मनके कानोंसे सुनो, मनकी जबानसे बोलो । इससे मन स्थिर हो जायगा ।

दूसरा उपाय यह है कि जबानसे आप एक नाम लो और मनसे दूसरा । जैसे मुँहसे नाम जपो‒

हरे राम हरे  राम   राम  राम हरे  हरे ।

हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे ॥

ऐसा करते रहो । भीतर राम-राम-राम‒कहकर मन लगाते रहो । देखो मन लगता है या नहीं । ऐसा सम्भव है तभी बताता हूँ । कठिन इसलिये है कि मन आपके काबूमें नहीं है । मन लगाओ, इससे मन लग जायगा ।

तीसरा उपाय बतावें । अगर मन लगाना है तो मनसे कीर्तन करो । मनसे ही रागनीमें गाओ । मन लग जायगा । जबानसे मत बोलो । कण्ठसे कीर्तन मत करो । मनसे ही कीर्तन करो और मनकी रागनीसे भगवान्‌का नाम जपो ।

पहले रागको मिटाना बहुत आवश्यक है और राग मिटता है सेवा करनेसे । उत्पन्न और नष्ट होनेवाली वस्तुओंके द्वारा किसी तरहसे सेवा हो जाय, यह भाव रखना चाहिये । पारमार्थिक मार्गमें, अविनाशीमें, भगवान्‌की कथामें अगर राग हो जाय तो प्रेम हो जायगा । भगवान्‌में, भगवान्‌के नाममें, गुणोंमें, लीलामें आसक्ति हो जाय तो बड़ा लाभ होता है । अपने स्वार्थ और अभिमानका त्याग करके सेवा करें तो भी राग मिट जाता है ।

नारायण !     नारायण !!     नारायण !!!

‘जीवनोपयोगी प्रवचन’ पुस्तकसे

|
।। श्रीहरिः ।।

           



आजकी शुभ तिथि–
   आश्विन कृष्ण द्वितीया, वि.सं.-२०७८, बुधवार
                             
    मनकी चंचलता कैसे दूर हो ?


भगवान्‌से प्रेम हो, इसकी बड़ी महिमा है, इसकी महिमा ज्ञान और मोक्षसे भी अधिक कहें तो अत्युक्ति नहीं । इस प्रेमकी बड़ी अलौकिक महिमा है । इससे बढ़कर कोई तत्त्व है ही नहीं । ज्ञानसे भी बढ़कर प्रेम है । उस प्रेमके समान दूसरा कुछ नहीं है । भगवान्‌में प्रेम हो जाय तो सब ठीक हो जाय ।

वह प्रेम कैसे हो ? संसारसे राग हटनेसे भगवान्‌में प्रेम हो जाय । राग कैसे हटे ? भगवान्‌में प्रेम होनेसे दोनों ही बातें हैं‒राग हटाते जाओ और भगवान्‌में प्रेम बढ़ाते जाओ । पहले क्या करें ? भगवान्‌में प्रेम बढ़ाओ । जैसे रामायणका पाठ होता है । अगर मन लगाकर और अर्थको समझकर पाठ किया जाय तो मन बहुत शुद्ध होता है । राग मिटता है और प्रेम जागृत होता है । उसमें एक बड़ा विलक्षण रस भरा हुआ है । पाठका साधारण अभ्यास होनेसे तो आदमी उकता सकता है, परन्तु जहाँ रस मिलने लगता है, वहाँ आदमी उकताता नहीं । इसमें एक विलक्षण रस भरा है‒प्रेम । आप पाठ करके देखो । उसमें मन लगाओ । भक्तोंके चरित्र पढ़ो, उससे बड़ा लाभ होता है, क्योंकि वह हृदयमें प्रवेश करता है । जब प्रेम प्रवेश करेगा तो राग मिटेगा, कामना मिटेगी । उनके मिटनेसे निहाल हो जाओगे । यह विचारपूर्वक भी मिटता है, पर विचारसे भी विशेष काम देता है प्रेम । प्रेम कैसे हो ?

जो संत ईश्‍वरभक्त  जीवनमुक्त पहले  हो गये ।

उनकी कथाएँ गा सदा मन शुद्ध करने के लिये ॥

मनकी शुद्धिकी आवश्यकता बहुत ज्यादा है । मनकी चंचलताकी अपेक्षा अशुद्धि मिटानेकी बहुत ज्यादा जरूरत है । मन शुद्ध हो जायगा तो चंचलता मिटना बहुत सुगम हो जायगा । निर्मल होनेपर मनको चाहे कहींपर लगा दो ।

कपट, छल, छिद्र भगवान्‌को सुहाते नहीं । परन्तु इनसे आप डरते ही नहीं । झूठ बोलनेसे, कपट करनेसे, धोखा देनेसे‒इनसे तो बाज आते ही नहीं । इनको तो जान-जानकर करते हो । तो मन कैसे लगे ? बीमारी तो आप अपनी तरफसे बढ़ा रहे हो । इसमें जितनी आसक्ति है, प्रियता है, वह बहुत खतरनाक है विचार करके देखो । आसक्ति बहुत गहरी बैठी हुई है । भीतर पदार्थोंका महत्त्व बहुत बैठा हुआ है । यह बड़ी भारी बाधक है । इसे दूर करनेके लिये सत्संग और सत्‌-शास्त्रोंका अध्ययन करना चाहिये, जिससे बहुत आश्चर्यजनक लाभ होता है ।

|
।। श्रीहरिः ।।

          



आजकी शुभ तिथि–
   आश्विन कृष्ण प्रतिपदा, वि.सं.-२०७८, मंगलवार
                             
    मनकी चंचलता कैसे दूर हो ?


मनुष्यने यह समझ रखा है कि मनको कब्जेमें करना बहुत आवश्यक है । मन नहीं लगा तो कुछ नहीं हुआ । राम-राम करनेसे क्या फायदा ? मन तो लगा ही नहीं । मन लग जाय तो सब ठीक हो जाय । परन्तु मनका लगना या न लगना खास बात नहीं है । मनमें संसारका जो राग है, आसक्ति है, प्रियता है, यही अनर्थका हेतु है । मन लग भी जायगा तो सिद्धियोंकी प्राप्ति हो जायगी; परन्तु जबतक संसारमें आसक्ति है, कल्याण नहीं होगा । जब भीतरसे राग और आसक्ति निकल जायगी, तब जन्म-मरण छूट जायगा । दुःख होगा ही नहीं; क्योंकि राग और आसक्ति ही सब दुखोंका कारण है ।

पदार्थोंमें, भोगोंमें, व्यक्तियोंमें, वस्तुओंमें, घटनाओंमें जो राग है, मनका खिंचाव है, प्रियता है, वही दोषी है । मनकी चंचलता इतनी दोषी नहीं है । वह भी दोषी तो है, परन्तु लोगोंने केवल चंचलताको ही दोषी मान रखा है । वास्तवमें दोषी है राग, आसक्ति और प्रियता । साधकके लिये इस बातको जाननेकी बड़ी आवश्यकता है कि प्रियता ही वास्तवमें जन्म-मरण देनेवाली है ।

ऊँच-नीच योनियोंमें जन्म होनेका हेतु गुणोंका संग है । आसक्ति और प्रियताकी तरफ तो खयाल ही नहीं है, पर चंचलताकी तरफ खयाल होता है । विशेष लक्ष्य इस बातका रखना है कि वास्तवमें प्रियता बाँधनेवाली चीज है । मनकी चंचलता उतनी बाँधनेवाली नहीं है । चंचलता तो नींद आनेपर मिट जाती है, परन्तु राग उसमें रहता है । राग (प्रियता)-को लेकर वह सोता है ।

मेरेको इस बातका बड़ा भारी आश्चर्य है कि मनुष्य रागको नहीं छोड़ता ! आपको रुपये बहुत अच्छे लगते हैं । आप मान-बड़ाई प्राप्त करनेके लिये दस-बीस लाख रुपये खर्च भी कर दोगे; परन्तु रुपयोंमें जो राग है, वह आप खर्च नहीं कर सकते । रुपयोंने क्या बिगाड़ा है ? रुपयोंमें जो राग है, प्रियता है, उसको निकालनेकी जरूरत है । इस तरफ लोगोंका ध्यान ही नहीं है, लक्ष्य भी नहीं है । इसलिये आप इसपर ध्यान दें । यह जो राग है, इसकी महत्ता भीतर जमी हुई है । वर्षोंसे सत्संग करते हैं, विचार भी करते हैं, परन्तु उन पुरुषोंका भी ध्यान नहीं जाता कि इतने अनर्थका कारण क्या है ? व्यवहारमें, परमार्थमें, खान-पान, लेने-देनेमें सब जगह राग बहुत बड़ी बाधा है । यह हट जाय तो आपका व्यवहार भी बड़ा सुगम और सरल हो जाय । परमार्थ और व्यवहारमें भी उन्नति हो जाय ।

विशेष बात यह है कि आसक्ति और राग खराब हैं । ऐसी सत्संगकी बातें सुन लोगे, याद कर लोगे, पर रागके त्यागके बिना उन्नति नहीं होगी । तो प्रश्न आपने किया कि मनकी चंचलता कैसे दूर हो ? पर मूल प्रश्न यह होना चाहिये कि राग और प्रियताका नाश कैसे हो ? भगवान्‌ने गीतामें इस रागको पाँच जगह बताया है ।

‘इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ ।’ (३/३४)

स्वयंमें, बुद्धिमें, इन्द्रियोंमें और पदार्थोंमें‒यह पाँच जगह राग बैठा है । पाँच जगहमें भी गहरी रीतिसे देखा जाय तो मालूम होता है कि ‘स्वयं’ में जो राग है, वही शेष चारमें स्थित है । अगर ‘स्वयं’ का राग मिट जाय तो आप निहाल हो जाओगे । चित्त चाहे चंचल है, परन्तु रागके स्थानपर भगवान्‌में प्रेम हो जाय तो रागका खाता ही उठ जायगा । भगवान्‌में आकर्षण होते ही राग खत्म हो जायगा ।

|