।। श्रीहरिः ।।

इच्छाके त्याग

और

कर्तव्य-पालनसे लाभ-३

(गत् ब्लॉगसेआगेका)
भगवान् ने सबसे श्रेष्ठ मानव-शरीर दिया है । ऐसे मानव-शरीरका समय श्रेष्ठ-से-श्रेष्ठ कामोंमें लगानेके लिये है । उस समयको बरबाद करना बड़ा भारी नुकसान है । रूपया फिर पैदा किया जा सकता है । जवान बेटा मर जाय तो जो छोटे बालक हैं, वे जवान हो सकते हैं । गृहस्थोंके नये पैदा हो सकते हैं । परन्तु उम्र (समय) किसी भी रीतिसे पैदा नहीं होती, वह तो नष्ट-ही-नष्ट होती है । पैसोंका तो आप बहुत ख्याल रखते हो, एक-एक पैसा सोच-सोचकर, समझ-समझकर खर्च करते हो; और हवाई जहाजको देखनेमें चार-पाँच मिनट खर्च कर देते हो ! क्या फायदा निकला ? बताओ ? स्वास्थ्य सुधार कि समाज सुधरा ? रुपये मिले कि भगवान् मिले ? क्या मिला ? आपको समयरूपी जो असली धन मिला हुआ है, उसको बरबाद क्यों करते हो ? अगर आप सावधान रहो, समयको बरबाद न करके अच्छे-से-अच्छे, उत्तम-से-उत्तम काममें लगाओ तो लोकमें और परलोकमें—दोनों जगह आपकी उन्नति होगी, इसमें सन्देह नहीं है । आप किसी भी क्षेत्रमें जाओ, आपकी उन्नति होगी । नास्तिक-से-नास्तिक मनुष्य भी अगर सोच-समझकर समयका सदुपयोग करे, तो उसकी धारणाके अनुसार, क्रियाके अनुसार उसकी जरूर उन्नति होगी, उसको जरूर सफलता मिलेगी, फिर समयका सदुपयोग करनेसे आस्तिक मनुष्यको भगवान् की प्राप्ति हो जाय, इसमें तो कहना ही क्या है ?

दूसरेका हक मत आने दो । स्त्रीका जो हक है, वह स्त्रीको दे दो । उसका जितना अधिकार है, उसे छीनो मत । उसके प्रति अपना जो कर्तव्य है, उसका पूरा पालन करो । बेटेका जितना हक है, वह उसको दे दो । बेटेके प्रति बापकाजो कर्तव्य है, उसका पूरा पालन करो । माता-पिताने आपको पैदा किया है, आपका पालन-पोषण किया है, आपको शिक्षित बनाया है; अतः उनके प्रति अपने कर्तव्यका पूरा पालन करो । आपपर उनका जो अधिकार है, उसकी रक्षा करो । उनका हक उनको दे दो । कपूत मत कहलाओ । ऐसे ही पड़ोसी है, जिनसे व्यवहार, व्यापार आदि करते हैं, उनका हक मत आने दो । उनके साथ स्नेहका, ईमानदारीका व्यवहार करो । इस तरह हर जगह सावधान रहो । इतने करनेपर भी ऋण अदा नहीं होगा; परन्तु नया ऋण नहीं चढ़ेगा ।

सावधानी रखनेपर ही आपको पता लगेगा कि हम कहाँ-कहाँ दूसरेका हक मार रहे हैं । अभी तो दूसरेके हकका पता ही नहीं लगता । अभी आपसे पूछा जाय तो आप कहेंगे कि हम तो किसीका हक लेते ही नहीं । हम तो ठीक करते हैं । हम पाप करते ही नहीं । मेरेको ऐसे व्यक्ति भी मिले हैं, जो कहते हैं कि ‘भजन करनेकी क्या जरूरत है, हम पाप तो करते ही नहीं । भगवान् का भजन वह करे, जो पाप करता है ।’ उनको होश ही नहीं है, पता ही नहीं है कि पाप क्या होता है, अन्याय क्या होता है । इसलिये हर समय सावधानी रखें कि अभी जो बातें सुनी हैं, इनका हम उम्रभर पालन करेंगे । अब कभी गफलत, भूल नहीं करेंगे ।

अभी मैंने बताया कि पैसोंका, पदार्थोंका सम्बन्ध इच्छा अथवा चिन्तनके साथ नहीं है, उनका सम्बन्ध कर्मोंके साथ है—इस बातको समझनेकी बड़ी भारी आवश्यकता है । आप कहें कि ऐसे काम कैसे चलेगा ? हम तो गृहस्थी हैं, कई काम धन्धे हैं, इसलिये चिन्तन करना ही पडता है, तो ‘काम कैसे करें, सेवा कैसे करें’—इस तरहका चिन्तन (विचार) करना दोष नहीं है । मुझे रुपये मिल जायँ, वस्तुएँ मिल जायँ—इस तरहका चिन्तन करना दोष है ।

श्रोता—चिन्ता भी हो जाती है महाराजजी !

स्वामीजी—चिन्ता हो जाती है तो चिन्ता छोड़ो और काम करो । चिन्ता करनेसे बुद्धि नष्ट होगी—‘बुद्धिः शोकेन नश्यति ।’ शान्तिपूर्वक विचार करो तो बुद्धि विकसित होगी । चिन्ता करना और चीज है, विचार करना और चीज है । ‘काम किस रीतिसे करें, किस रीतिसे कुटुम्बका पालन करें, किस तरहसे व्यापार करें; किस तरहसे सबके साथ व्यवहार करें’—ऐसा शान्त-चित्तसे विचार करो । विचार करनेसे बुद्धि विकसित होगी । परन्तु चिन्ता करोगे कि ‘हाय, क्या करें ! इतने कुटुम्बका पालन कैसे करें । पैदा है नहीं, क्या करें !’ तो बुद्धि और नष्ट हो जायगी, काम करनेमें भी बाधा लगेगी, फायदा कोई नहीं होगा । इसलिये चिन्ता न करके विचार करो, उद्योग करो, पुरुषार्थ करो, निकम्मे मत रहो । सत्संग करो, पुस्तकें पढ़ो और स्वयं विचार करो अथवा आपसमें विचार-विनिमय करो ।


—‘साधन-सुधा-सिन्धु’ पुस्तकसे
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।। श्रीहरिः ।।
इच्छाके त्याग

और

कर्तव्य-पालनसे
लाभ-२

(गत् ब्लॉगसे आगेका)

आप कह सकते है कि बड़ा परिवार है, रोटी-कपड़ेकी भी तंगी है, काम चलता नहीं फिर इच्छा किये बिना कैसे रहें ? तो इच्छा करनेसे वस्तुएँ थोड़े ही मिलेंगी । वस्तुएँ तो काम करनेसे मिलेंगी । इसलिये वस्तुओंकी इच्छा न करके काम करनेकी इच्छा करो । निकम्मे, निरर्थक मत रहो । न्याययुक्त काम करो । झूठ, कपट, बेईमानी, ठगी, धोखेबाजी मत करो । अन्तःकरणमें रुपयोंको महत्त्व मत दो । यह जो लोभ है, संग्रह करनेकी इच्छा है, इसका त्याग कर दो, तो आपका नया प्रारब्ध बन जायगा अर्थात् जो आपके भाग्यमें लिखा नहीं है, वह आपके पास आ जायगा ! परन्तु आपके लोभका त्याग हो जाना चाहिये और इतना दृढ़ निश्चय होना चाहिये कि चाहे मर जायँ पर पाप नहीं करेंगे, अन्याय नहीं करेंगे, झूठ-कपट-जालसाजी नहीं करेंगे । अगर मर भी जायँ तो क्या फर्क पड़ेगा ? मरना तो एक बार है ही; फिर पापकी पोटली साथमें लेकर क्यों मरो ? पापकी पोटली साथमें लिये बिना मर जाओ तो हर्ज क्या है ? अगर पाप किये बिना पैसा नहीं मिलता हो तो भूखे भले ही मर जाओगे, पर नरकोंमें नहीं जाओगे । अगर पाप करके जीओगे तो नरकोंमें जाओगे ही । नरकोंसे बच नहीं सकोगे, ब्रह्माजी भी बचा नहीं सकेंगे । अतः इच्छा कर्तव्यकी करो, निकम्मे मत रहो । इस विषयमें मैं चार बातें कहता हूँ—

(१) अपना सब समय अच्छे-से-अच्छे, ऊँचे-से-ऊँचे काममें लगाओ । निकम्मे मत रहो, निरर्थक समय बरबाद मत करो । ताश-चोपड़, खेल-तमाशा, बीडी-सिगरेट पीना, सिनेमा-नाटक देखना—ये सब फालतू काम हैं, तमोगुणी काम हैं, जिनसे अधोगतिमें (नीच योनियोंमें और नरकोंमें) जाना पड़ेगा—‘अधो गच्छन्ति तामसाः’ (गीता १४/१८) ऐसे व्यर्थ कामोंमें समय मत लगाओ । जिससे शरीरका निर्वाह हो, स्वास्थ्य ठीक रहे, दुनियाका हित हो, परमात्माकी प्राप्ति हो, ऐसे काममें लगे रहो ।

(२) जिस किसी कामको करो, उसको सुचारुरूपसे करो, जिससे आपके मनमें सन्तोष हो और दूसरे भी कहें कि बहुत अच्छा काम करता है । लिखना हो, पढ़ना हो, मुनीमी करना हो, बिक्री करना हो, खरीदारी करना हो आदि-आदि संसारका जो कुछ काम करना हो, उसको बड़े सुचारुरूपसे, सांगोपांग करो । माता-बहनें रसोई बनायें तो अच्छी तरहसे बनायें । सामग्री भले ही कैसी हो, पर चीज बढ़िया बनायें । भोजन ठीक तरहसे परोसें । सबको कैसे सन्तोष हो, सबको किस तरहसे सुख पहुँचे—ऐसा भाव रखकर सब काम करें ।

(३) इस बातका ध्यान रखो कि आपके पास दूसरेका हक न आ जाय । आपका हक दूसरेके पास भले ही चला जाय, पर दूसरेका हक आपके पास बिलकुल न आये ।

(४) अपने व्यक्तिगत जीवनके लिये कम-से-कम खर्चा करो । शरीर-निर्वाहके लिये, खाने-पीनेके लिये, ओढ़ने-पहननेके लिये कम खर्चा करो, साधारणरीतिसे काम चलाओ । ऐश-आराम, स्वाद-शौकीनी मत करो । अगर ऐसे काम करोगे तो आपको घाटा नहीं रहेगा, करके देख लो ।

आजकल लोग कहते हैं कि क्या करें, निठल्ले बैठे हैं, काम नहीं है । यह बिलकुल फालतू बात है । निठल्ले क्यों बैठे हो ? नाम-जप करो, कीर्तन करो, गीता-रामायण आदिका पाठ करो । घरका काम करो—घरमें झाड़ू लगाओ, बरतन धोओ, जुते साफ करो, नालियाँ साफ करो, शौचालय साफ करो । इस तरह कुछ-न-कुछ करते रहो । करना चाहो तो बहुत काम निकल सकता है । काम करनेसे अन्तःकरण निर्मल होगा । ताश-चौपड़ खेलने आदि फालतू कामोंके लिये समय ही नहीं मिलना चाहिये । छुट्टीका दिन हो तो यों ही निकम्मे फिरेंगे, फालतू घूमने चले जायँगे, सिनेमा देखेंगे, खेल करेंगे, पानी उछालेंगे, धक्का देंगे—इस तरह फालतू समय बरबाद करेंगे । यह मानव-शरीरका समय ऐसे बरबाद करनेके लिये नहीं है । तेलीके घरमें तेल होता है तो वह लोटा भरके पैर धोनेके लिये थोड़े ही है !


(शेष आगेके ब्लॉगमें)

—‘साधन-सुधा-सिन्धु’ पुस्तकसे
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इच्छाके त्याग

और

कर्तव्य-पालनसे
लाभ-१

श्रोता—आपको आध्यात्मिक लाभ कैसे हुआ ?

स्वामीजी—मुझे तो सत्संगसे लाभ हुआ है । मैं साधनको इतना महत्त्व नहीं देता, जितना सत्संगको देता हूँ । दूसरोंके लिये भी मैं समझता हूँ कि अगर वे मन लगाकर, गहरे उतरकर सत्संगकी बातें समझें तो उनको लाभ बहुत हो सकता है । एक विशेष बात कह देता हूँ कि अगर आप सत्संगको महत्त्व दें और उसको गहरे उतरकर समझें तो मेरेको जितने वर्ष लगे, उतने वर्ष आपको नहीं लगेंगे ! बहुत जल्दी आपकी उन्नति होगी—ऐसा मेरेको स्पष्ट दीखता है, मेरेको सन्देह नहीं है इस बातपर । इस विषयमें मैं आपको अयोग्य, अनधिकारी नहीं मानता हूँ । आपमें जो कमी है, उस कमीको दूर करनेकी सामर्थ्य आपमें पूरी है । मेरी धारणासे आपमें केवल इस विषयकी उत्कण्ठाकी कमी है । वह उत्कण्ठा जाग्रत हो जाय तो आप पापीसे-पापी हों, मूर्ख-से-मूर्ख हों और आपके पास थोड़ा-से-थोड़ा समय हो तो भी आपका उद्धार हो सकता है । उत्कण्ठा जाग्रत् होगी संसारकी लगनका त्याग करनेसे ।

कबीरा मनुआँ एक है, भावे जहाँ लगाय ।
भावे हरि की भगति कर, भावे विषय कमाय ॥

सांसारिक संग्रह और भोगोमें जो लगन लगी है, उसको मिटा दो तो परमात्मप्राप्तिकी सच्ची लगन लग जायगी । इतना रूपया हो गया; इतना और हो जाय; इतना सुख भोग लें, ऐश-आराम कर लें; मान मिल जाय, बड़ाई मिल जाय, नीरोगता मिल जाय, समाजमें मेरा ऊँचा स्थान हो जाय, हम ऐसे बन जायँ—ये जितनी इच्छाएँ हैं, इनका त्याग कर दो तो आपको सच्ची लगन लग जायगी । जितनी लगन लगनी चाहिये, उतनी नहीं लग रही है तो इसका कारण यह है कि जितना त्याग होना चाहिये, उतना नहीं हो रहा है । त्याग क्या है ? गीताने इच्छाके त्यागको ही ‘त्याग’ कहा है । इच्छा क्या है ? ऐसा तो होना चाहिये और ऐसा नहीं होना चाहिये—यह इच्छा है ।

श्रोता—इच्छा किये बिना शरीरका, कुटुम्बका पालन-पोषण कैसे होगा ?

स्वामीजी—पालन-पोषण इच्छासे नहीं होता है । इस बातको समझनेकी कृपा करो । कृपानाथ ! पैसोंका पैदा होना, पदार्थोंका प्राप्त होना इच्छापर बिलकुल निर्भर नहीं है । पदार्थोंकी प्राप्ति होती है पूर्वके कर्मोंसे और अभीके कर्मों-(उद्योगों-) से । कारण कि कर्मोंका और पदार्थोंका घनिष्ठ सम्बन्ध है । इच्छाका और पदार्थोंका बिलकुल ही सम्बन्ध नहीं है । आपमेंसे कोई भी कह सकता है कि मैंने धनकी इच्छा नहीं की, इसलिये मैं निर्धन रहा । अगर इच्छा कर लेता तो धनवान् हो जाता । वास्तवमें यह बात है ही नहीं । इस बातको आप समझनेकी कृपा करो । इच्छाके साथ पदार्थोंका बिलकुल सम्बन्ध नहीं है । पदार्थोंका सम्बन्ध कर्मोंके साथ है; क्योंकि क्रिया और पदार्थ—ये दोनों ही प्राकृत चीजें हैं, दोनों एक ही तत्त्व हैं । अतः पदार्थोंका सम्बन्ध पूर्वके अथवा वर्तमानके कर्मोंके साथ है । पूर्वके कर्मोंको प्रारब्ध कहते हैं और वर्तमानके कर्मोंको पुरुषार्थ कहते हैं ।

इच्छाके साथ पदार्थोंका सम्बन्ध बिलकुल नहीं है । अगर मैं इच्छा करूँ कि मेरा पालन-पोषण हो जाय, तो क्या इस प्रकार इच्छा करनेसे मेरा पालन-पोषण हो जायगा । आपलोगोंसे कहें कि घण्टाभर आप सब मिल करके यह इच्छा करो कि इसके कुटुम्बका पालन-पोषण हो जाय और इसको एक कौड़ी भी मत दो, तो क्या इसके कुटुम्बका पालन-पोषण हो जायगा ? कदापि नहीं । इच्छाके साथ केवल परमात्माका सम्बन्ध है । अगर परमात्माकी प्राप्तिकी तीव्र इच्छा, उत्कट अभिलाषा हो जाय तो उसकी प्राप्ति हो जायगी ! इसका कारण क्या है ? पदार्थोंका हमारेसे अलगाव है । पदार्थ हमारेसे दूर हैं; देशसे दूर हैं, कालसे दूर हैं, व्यक्तिसे दूर हैं; इसलिये उनकी प्राप्ति कर्मोंसे होगी । परन्तु परमात्मा देशसे दूर नहीं हैं, कालसे दूर नहीं हैं, वस्तुसे दूर नहीं हैं, व्यक्तिसे दूर नहीं हैं । जहाँ हम ‘मैं’ कहते हैं, वहाँ भी परमात्मा परिपूर्ण हैं; इसलिये उनकी प्राप्ति इच्छामात्रसे हो जायगी । परमात्माकी तरह रुपये सब जगह मौजूद नहीं हैं । उनको तो पैदा करना पड़ता है । परन्तु परमात्माको पैदा नहीं करना पड़ता, उनको कहींसे लाना नहीं पड़ता ।

(शेष आगेके ब्लॉगमें)
—‘साधन-सुधा-सिन्धु’ पुस्तकसे
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मनुष्यका

वास्तविक सम्बन्ध-३

(गत् ब्लॉगसे आगेका)
संसारके साथ हमारा सम्बन्ध केवल सेवा करनेके लिये ही है । सेवाके सिवाय संसारसे और कोई मतलब नहीं । माता- पिताकी सेवा करनी है, स्त्री-पुत्रका पालन-पोषण करना है । सेवा करनी है । उनके साथ सम्बन्ध माननेसे वास्तविक शान्ति नहीं मिलती । शान्ति तो उनकी सेवा करके सम्बन्ध-विच्छेद करनेसे मिलती है । संसारके साथ माना हुआ ऐसा कोई सम्बन्ध नहीं है, जिसके लिये मनुष्य नींद, भूख और प्यास भी छोड़ दे । परन्तु भगवान् के साथ सम्बन्ध जुड़नेपर नींद अच्छी नहीं लगती, खाना-पीना अच्छा नहीं लगता, यहाँतक कि शरीरका मोह भी नहीं रहता; क्योंकि भगवान् के साथ हमारा सम्बन्ध असली है ।

नारदजीके पूर्वजन्मके वर्णनमें आता है कि जब उनकी माताकी मृत्यु हो गयी, तब वे जंगलकी ओर चल दिये । उनको यह ख्याल ही नहीं आया कि जंगलमें क्या खायेंगे-पियेंगे ? कहाँ रहेंगे ? वहाँ एक वृक्षके नीचे बैठे । उनका मन भगवान् में लगा गया, समाधी लग गयी । उनको अपने हृदयमें भगवान् का रूप दीखने लगा । कुछ देर बाद सहसा समाधी खुल गयी तो वे बड़े व्याकुल हुए । तब आकाशवाणी हुई कि इस शरीर छूटनेके बाद जब ब्रह्माजीके पुत्ररूपसे तुम्हारा जन्म होगा, तब मेरे दर्शन होंगे । ऐसी आकाशवाणी सुनकर नारदजी प्रतीक्षा करने लगे कि कब यह शरीर छूटेगा, कब मैं मरूँगा ! दुनिया चाहती है कि हम सदा जीते ही रहें और वे चाहते है कि मैं मर जाऊँ !

संसारमें अपने शरीरके जीनेकी जितनी इच्छा होती है, उतनी कुटुम्बके जीनेकी इच्छा नहीं होती । गाय अपने बछड़ेपर बहुत स्नेह रखती है । वह बछड़ेको छोडकर जंगलमें चरनेको भी नहीं जाती । परन्तु जब उसको लाठी मारने लगते हैं, तब वह जंगलमें चली जाती है । जंगलमें चरते-चरते जब उसको बछड़ा याद आ जाता है, तब वह ‘हुम्’—ऐसे हुंकार करती है और मुहँसे घास गिर जाता है । शामके समय जब वह वापस लौटती है, तब वह सब गायोंसे आगे भागती है और हुंकार करती हुई बछड़ेके पास जाती है, उसको प्यार करती है, दूध पिलाती है । इस प्रकार उसका बछड़ेपर भी प्रेम है और घासपर भी प्रेम है, पर अपने शरीरपर सबसे ज्यादा प्रेम है । जब शरीरपर लाठी पड़ती है, तब वह बछड़ेको, घासको, सबको छोड़ देती है । जब शरीरपर आफत आती है, तब किसीकी परवाह नहीं करती । तात्पर्य है कि शरीरमें उसका एक नम्बरका प्रेम है, बछड़ेमें दो नम्बरका प्रेम है और घासमें तीन नम्बरका प्रेम है । अतः शरीरसे मोह तो पशुका भी होता है । परन्तु मनुष्य शरीरसे मोह छोडकर भगवान् से प्रेम कर सकता है ।

शरीर तो हरदम बदलता है; अतः यह तो हरदम रहता नहीं, पर भगवान् हरदम रहते हैं । हम तो भगवान् के ही हैं—यह जब पहचान हो जाती है, तब मनुष्य शरीरकी आसक्ति-कामना छोडकर भगवान् में ही लग जाता है । अतः भगवान् के साथ हमारा सम्बन्ध असली है और शरीर-संसारके साथ हमारा सम्बन्ध नकली है—इस वास्तविकताको जानकर सब प्रकारसे भगवान् में ही लग जाना चाहिये ।

—‘साधन-सुधा-सिन्धु’ पुस्तकसे

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मनुष्यका

वास्तविक सम्बन्ध-२

(गत् ब्लॉगसे आगेका)
कितनी विलक्षण बात है कि संसारके वियोगका अनुभव जीवमात्रको है ! मनुष्य, पशु, पक्षी आदि सब नींद लेते हैं । तात्पर्य है कि संसारसे वियोग हरेक प्राणी चाहता है । संसारके संयोगमें तो कमीसे भी काम चल सकता है; जैसे—किसीको भोजन अच्छा मिलता है, किसीको भोजन अच्छा नहीं मिलता; किसीको मकान अच्छा मिलता है, किसीको मकान नहीं मिलता, इसमें सबकी विषमता है । दो मनुष्योंकी भी आराम-सामग्री एक समान नहीं होती । परन्तु नींद सबकी एक समान होती है । यहाँ एक बात सोचनेकी है कि नींदकी तरफ हमारी जो प्रवृत्ति होती है, उसमें हमें न कुछ उद्योग करना पडता है, न कुछ चिन्तन करना पडता है, न कुछ काम करना पडता है, न कुछ याद करना पडता है । तात्पर्य है कि कुछ न करनेसे नींद आ जाती है । नींदके लिये ऐसा नहीं है कि इतना उद्योग करो,तब नींद आयेगी !

नींदमें सबसे सम्बन्ध-विच्छेद होता है । परन्तु संसारके साथ माने हुए सम्बन्धको पकडे हुए ही नींद लेते हैं, इसलिये जगनेपर फिर उसीमें (संसारमें) लग जाते हैं । फिर भी संसारके साथ माना हुआ सम्बन्ध स्थिर नहीं रहता । अवस्था बदल जाती है, व्यक्ति बदल जाते हैं, देश बदल जाता है, काल बदल जाता है—यह सब तो बदल जाता हैं, पर संसारसे सम्बन्ध विच्छेद कभी नहीं बदलता । कारण कि संसारके साथ सम्बन्ध तो हमारा माना हुआ है, अवास्तविक है, पर संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद माना हुआ नहीं है, प्रत्युत वास्तविक है । इसलिये संसारसे निरन्तर सम्बन्ध-विच्छेद हो रहा है । बालकपनसे सम्बन्ध-विच्छेद हुआ, जवानीसे हुआ, वृद्धावस्थासे हुआ, निरोगतासे हुआ, रोगीपनेसे हुआ, धनवत्तासे हुआ, निर्धनतासे हुआ और कई व्यक्तियोंसे संयोग होकर वियोग हुआ । इस प्रकार संसारका सम्बन्ध तो छिन्न-भिन्न होता ही रहता है; क्योंकि यह सम्बन्ध नकली है, माना हुआ है । हमने बड़ी भारी भूल यह की कि माने हुए सम्बन्धको तो सच्चा मान लिया, पर संसारसे जो सम्बन्ध विच्छेद हो रहा है, उसकी तरफ खयाल ही नहीं किया कि यह भी तो हमारा अनुभव है । संसारके सम्बन्ध-विच्छेदसे जितना सुख मिलता है, उतना पदार्थोंसे नहीं मिलता । अगर पदार्थोंसे सुख मिलता, तो नींद छूट जाती ।


जब भगवान् के भजनमें रस आने लगता है, तब नींद, भूख और प्यास भी छूट जाती है, इनकी भी परवाह नहीं रहती । नींद,भूख और प्यास शरीर-निर्वाहकी खास चीजें हैं, पर भजनमें इनको भी भूल जाते हैं । इसका अर्थ यह हुआ कि हमारा असली सम्बन्ध भगवान् के साथ है । असली सम्बन्ध जाग्रत हो जाय तो फिर नकली सम्बन्धको कौन रखना चाहेगा ? शरीर-संसारके साथ माने हुए नकली सम्बन्धोंको हम छोड़ दें तो आज ही निहाल हो जायँ ! सम्बन्धको छोडकर जाना कहीं नहीं है, न जंगलमें जाना है, न साधु बनना है । केवल यह मान लेना है कि यह संसार वास्तवमें हमारा नहीं है । हमारे तो केवल भगवान् ही हैं । व्यक्तियोंसे हमारा जो सम्बन्ध दीखता है, वह उनकी सेवा करनेके लिये है । वस्तुओंसे हमारा जो सम्बन्ध दीखता है, वह उनको दूसरोंकी सेवामें लगानेके लिये है । न तो हमारे लिये कोई व्यक्ति है और न हमारे लिये कोई वस्तु है । जो हमारे कहलाते हैं, उन माता, पिता, स्त्री, पुत्र, भाई, भौजाई आदिकी सेवा कर दो, बस । वस्तुएँ तो उनकी सेवाके लिये हैं और वे सेवनीय हैं । शरीर उनका ही है, इसलिये शरीरको उनकी सेवामें लगा दो । हमें उनसे कुछ लेना ही नहीं है । उनकी वस्तुओंको उन्हींकी सेवामें लगा देना है । इसीको कर्मयोग कहते हैं—

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि ॥
(गीता २/४७)

‘कर्तव्य-कर्म करनेमें ही तेरा अधिकार है, फलोमें कभी नहीं । अतः तू कर्मफलका हेतु भी मत बन और तेरी अकर्मण्यतामें भी आसक्ति न हो ।’

खूब तत्परतासे, अच्छी तरहसे कर्म करना है; क्योंकि मनुष्य-शरीर सेवा करनेके लिये ही मिला है, भोग भोगनेके लिये नहीं । हमें जो विवेक मिला है, वह शरीरके साथ माने हुए सम्बन्धका विच्छेद करनेके लिये मिला है, शरीरके साथ चिपकनेके लिये नहीं ।
(शेष आगेके ब्लॉगमें)

—‘साधन-सुधा-सिन्धु’ पुस्तकसे

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मनुष्यका


वास्तविक सम्बन्ध-१

संसारसे हमारा सम्बन्ध निरन्तर नहीं रहता—इस वास्तविकताको हम सब जानते हैं । परन्तु इस जानकारीपर हम कायम नहीं रहते—इतनी गलती है । अगर इस जानकारीपर हम कायम रह जायँ अर्थात् संसारसे अपना सम्बन्ध न मानें तो आज, अभी बेड़ा पार है ! हम संसारसे जो अपना सम्बन्ध मानते हैं, उसको छोड़े बिना हम रह ही नहीं सकते । संसारके सम्बन्धक बिना तो हम रह सकते हैं, पर वियोगके बिना हम रह ही नहीं सकते, जी ही नहीं सकते । इस बातपर आप खूब ध्यान देकर विचार करें । संसारकी जिन वस्तुओं, व्यक्तियों, पदार्थोंके साथ हम अपना सम्बन्ध मानते हैं, उनके सम्बन्धसे हमें उतना सुख नहीं मिलता, जितना उनके वियोगसे सुख मिलता है । जैसे हमारेको गाढ़ नींद आती है तो उस समय हमारा किसी व्यक्ति या वस्तुसे किञ्चिन्मात्र भी सम्बन्ध नहीं रहता । गाढ़ नींदमें हम सम्पूर्ण वस्तु-व्यक्तियोंको भूल जाते हैं । उनको भुलनेसे जितना सुख मिलता है, उतना सुख उनको याद रखनेसे, उनके साथ रहनेसे नहीं मिलता—यह हम सबका अनुभव है ।

अब ध्यान देकर इस बातको आप ठीक तरहसे समझें । नींद लेनेकी प्रवृत्ति हमारी जन्मसे ही है । आप याद करें तो बचपनसे लेकर आज-दिनतक हम नींद लेते ही रहे हैं अर्थात् संसारको भूलते ही रहे हैं । नींद लिये बिना अर्थात् संसारसे विमुख हुए बिना हम आठ पहर भी जी नहीं सकते । अगर कई दिनतक नींद न आये तो मनुष्य पागल हो जाय । जितनी खुराक नींदसे हमें मिलती है, उतनी खुराक पदार्थों, व्यक्तियोंके सम्बन्धसे नहीं मिलती । पदार्थों, व्यक्तियोंका सम्बन्ध रखनेसे तो थकावट होती है । नींदसे वह थकावट मिटती है और शरीर, इन्द्रियाँ, अन्तःकरणमें नयी शक्ति, स्फूर्ति, ताजगी आती है । पदार्थों और व्यक्तियोंके सम्बन्धसे ताजगी नष्ट होती है ।

बचपनमें खिलौने जितने अच्छे लगते थे, उतने पदार्थ और व्यक्ति अच्छे नहीं लगते थे । खेल जितना अच्छा लगता था, उतना घर अच्छा नहीं लगता था । अब युवावस्थामें रुपये अच्छे लगने लग गये । अब खिलौने अच्छे नहीं लगते, पर नींद अब भी वैसी-की-वैसी प्रिय लगती है । जब खिलौने प्रिय लगते थे, तब भी नींद अच्छी लगती थी और नींदसे सुख मिलता था । अब रुपये अच्छे लगने लगे तो भी नींद अच्छी लगती है । परन्तु रुपयोंको भुला करके जो नींद आती है, वह नींद रुपयोंसे भी ज्यादा अच्छी लगती है । जब विवाह हुआ तब स्त्री, पुत्र, परिवार बड़ा अच्छा लगने लगा, जिनके लिये रुपये भी खर्च कर देते हैं । परन्तु जब गहरी नींद आने लगती है, तब स्त्रीको, पुत्रको, मित्रोंको, कुटुम्बियोंको भी छोड़ देते हैं । जिनके मोहमें फँसकर झूठ, कपट, बेईमानी, चोरी, ठगी, धोखेबाजी आदि कर लेते हैं, उन सबका गाढ़ नींदमें त्याग कर देते हैं । जब वृद्धावस्था आती है, तब परिवारमें, पोता-पोती, दोहता-दोहतीमें मोह बढ़ जाता है; परन्तु गाढ़ नींद आनेपर इनको भी छोड़ देते हैं । अगर वैराग्य हो जाता है तो धन, मकान, स्त्री, पुत्र, परिवार आदिको छोडकर साधु हो जाते हैं, विरक्त-त्यागी बन जाते हैं, तब भी नींद लेते हैं । नींदमें साधुपनेका भी वियोग होता है, विरक्त-त्यागीपनेका भी वियोग होता है । इस प्रकार प्रत्येक परिस्थितिमें नींद अच्छी लगती है । नींद नहीं आये तो अच्छा है—ऐसा भाव कभी नहीं होता, प्रत्युत नींद आ जाय तो अच्छा है—यह भाव रहता है । नींद लेनेकी पूरी तयारी करते हैं । अच्छा बिछौना बिछाते हैं । खूब बढ़िया तकिया लगते हैं, गद्दा लगते हैं, पंखा लगाते हैं, जिससे आरामसे नींद आ जाय । हल्ला-गुल्ला न हो, ऐसी व्यवस्था करते हैं । जब नींद आने लगती है, तब तरह-तरहके भोग, मनोहर दृश्य, सिनेमा आदि नहीं सुहाते । तब यही कहते हैं कि भाई, अब तो हमें नींद लेने दो; अब हम सोयेंगे । इससे सिद्ध हुआ कि नींद सब वस्तु-व्यक्तियोंसे बढ़कर प्यारी है । नींदके लिये सबका त्याग किया जा सकता है, पर नींदका त्याग नहीं किया जा सकता । परन्तु कहीं भगवान् के भजनमें प्रेम हो जाय, भजनमें रस आने लग जाय, तो फिर नींद भी अच्छी नहीं लगती । संतोंका पद आता है—‘बैरिन हो गई निंदरिया’ अर्थात् यह नींद तो हमारी वैरिन हो गयी; नींद नहीं आये तो अच्छा है । इससे सिद्ध होता है कि जिसके लिये प्यारी-सी-प्यारी नींदका भी त्याग हो जाता है, उस परमात्माके साथ ही हमारा वास्तविक सम्बन्ध है । संसारके साथ हमारा सम्बन्ध बनावटी है, भूलसे माना हुआ है । इसलिये संसारके संयोगके बिना तो हम रह सकते हैं, पर वियोगके बिना हम रह ही नहीं सकते । संसारके वियोगसे सुख होता है—यह हम सबका अनुभव है ।

(शेष आगेके ब्लॉगमें)
—‘साधन-सुधा-सिन्धु’ पुस्तकसे

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परमात्मप्राप्तिकी

सुगमता-२

आप कृपा करके ऐसा मत मानें कि वह ‘है’ दूर है, वह आयेगा अथवा हम उनके पास जायँगे, तब उससे मिलन होगा । नहीं तो भजन करते हुए आप तो समझते हैं कि हम भगवान् के पास जा रहे हैं, पर वास्तवमें भगवान् से अपनेको दूर कर रहे हैं, भगवान् से अपने सम्बन्धके अभावको दृढ़ कर रहे हैं । भगवान् तो फिर मिलेंगे, अभी तो नहीं मिलेंगे—ऐसी धारणा रखते हुए राम-राम जपते हैं, कृपा करके इस धारणाको छोड़ दो । हमें अनुभव नहीं हो रहा है—यह बात मानो तो कोई हर्ज नहीं, पर यह बात दृढतासे मान लो कि भगवान् सब जगह मौजूद हैं । ‘मैं हूँ’—इसमें भी भगवान् हैं, मनमें भी हैं, बुद्धिमें भी हैं, वाणीमें भी हैं । राम-राम-राम—इस आवाजमें भी भगवान् हैं । देखनेमें, सुननेमें, समझनेमें जो कुछ भी आ रहा है, वह सब भगवान् ही हैं । भगवान् कहते हैं—

मनसा वचसा दृष्ट्या गृह्यतेऽन्यैरपीन्द्रीयैः ।
अहमेव न मत्तोऽन्यदिती बुध्यध्वमञ्जसा ॥
(श्रीमद्भागवत ११/१३/२४)

मनसे, वाणीसे, दृष्टिसे, तथा अन्य इन्द्रियोंसे भी जो कुछ ग्रहण किया जाता है, वह सब मैं ही हूँ । मुझसे भिन्न और कुछ नहीं है—यह सिद्धान्त आपलोग तत्त्वविचारके द्वारा समझ लीजिये ।

अतः ‘भगवान है’—इतना आप मान लो, भले ही उनका अनुभव अभी न हो । सन्त-महात्मा कहते हैं, वेद-पुराण कहते हैं, बड़े-बड़े जानकर कहते हैं कि ‘वह है’ । बस ‘वह है’—ऐसा मानते हुए लगनपूर्वक राम-राम जप करो तो बहुत जल्दी अनुभव हो जायगा । उसका अनुभव कैसे हो ? क्या करूँ ? कैसे करूँ ? किससे पूछूँ ?—यह जिज्ञासा जोरदार हो जाय । राम-नामको छोडो मत; क्योंकि इसके सिवाय संसारमें और कोई सहारा नहीं है । मरनेपर भी कहते हैं—‘राम-नाम सत्य है’ । शरीर-संसार असत् है । अतः राम-राम करते रहो । ‘र’ में, ‘आ’ में, ‘म’ में, जीभमें, मनमें, स्फुरणामें, चिन्तनमें, बुद्धिमें, मैंपनमें—सब जगह वह परमात्मा परिपूर्ण है । जो सबमें रमण करता है और जिसमें सभी रहते हैं, उसका नाम ‘राम’है ।

राम-नामका जप बहुत ही महान् और सुगम है साधन है । कल लकवेकी बीमारीवाले एक भाई मिले थे, वे और कुछ नहीं बोल सकते थे, केवल राम-राम बोल सकते थे । उनसे भी पहले एक भाई कलकत्तामें मिले थे, वे भी कुछ नहीं बोल सकते थे, केवल ‘राम’—इतना कह सकते थे । राम-नाम लोकमें, परलोकमें सब जगह शान्ति देनेवाला, सबको सुख देनेवाला है ।

सुमिरत सुलभ सुखद सब काहू । लोक लाहु परलोक निबाहू ॥
(मानस १/२०/१)

आप यह बात चाहे श्रद्धासे मान लो, चाहे विश्वाससे मान लो, चाहे युक्तिसे मान लो, चाहे अनुभवसे मान लो, चाहे सोच-समझकर मान लो कि परमात्मा सब जगह हैं; जहाँ आप हो, वहीं परमात्मा हैं । आपकी एकता परमात्माके साथ है,बदलनेवाले शरीरके साथ नहीं । शास्त्र भी डंकेकी चोटसे कहता है कि परमात्मा सब जगह हैं, सबमें हैं, सबके अपने हैं, सबके सुहृद् हैं । आप इसको दृढतासे मान लो । साधकसे बड़ी भूल यह होती है कि वह ‘भजन’ करेंगे, फिर परमात्मा मिलेंगे—ऐसा मान लेता है । यह भविष्यकी आशा ही महान् बाधक है । शास्त्रोंसे, सन्तोंके कहनेसे, किसीके कहनेसे यह मान लो कि परमात्मा तो मिले हुए ही हैं, केवल हमें दिखते नहीं । वर्तमानमें परमात्माका अभाव स्वीकार मत करो । अपनेको उनका अनुभव नहीं हो रहा है; अतः अनुभव कैसे हो—इसके लिये रात-दिन राम-राम रटना शुरू कर दो । फिर देखो तमाशा ! कितना जल्दी अनुभव होता है ।

जो जिव चाहे मुक्ति को, तो सुमिरीजै राम ।
हरिया गैले चालतां, जैसे आवै गाम ॥



—‘साधन-सुधा-सिन्धु’ पुस्तकसे

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।। श्रीहरिः ।।

परमात्मप्राप्तिकी

सुगमता-१

मैं जो बात कहता हूँ, उसको आप कृपा करके मान लें । मैं ऐसी बात कहता हूँ, जो आपकी जानी हुई है । कोई नयी बात नहीं बताता हूँ । कोई भाई-बहन क्या ऐसा जानता है कि मैं पहले नहीं था और पीछे नहीं रहूँगा ? यह प्रश्न स्वयंके विषयमें हैं, शरीरके विषयमें नहीं । शरीर तो पैदा होनेसे पहले नहीं था और मरनेके बाद नहीं रहेगा । परन्तु मैं पहले नहीं था और पीछे नहीं रहूँगा तथा अब भी मैं नहीं हूँ—ऐसे अपने अभावका अनुभव भी किसीको होता है क्या ? अपने अभावका अनुभव किसीको कभी नहीं होता । मैं क्या था, क्या रहूँगा, क्या हूँ—ऐसा विचार तो हो सकता है, पर ‘मैं हूँ कि नहीं हूँ ?’—ऐसा विचार, सन्देह कभी नहीं होता ।

‘मैं हूँ’—यह जो अपनी सत्ता, अपना होनापन है, उसका कभी किञ्चिन्मात्र भी अभाव नहीं होता—‘नाभावो विद्यते सतः’ (गीता २/१६) जिसका कभी अभाव नहीं होता, उसमें कभी कमी नहीं आती । जिसमें कोई कमी नहीं आती, उसके लिये क्या चाहिये ? कुछ नहीं चाहिये । कारण कि चाहना तो कमीमें ही होती है । जिसका कभी अभाव नहीं होता, जिसमें कभी कमी नहीं आती, जो नित्य-निरन्तर ज्यों-का-त्यों रहता है, उसके लिये करना क्या बाकी रहा ? जानना क्या बाकी रहा ? पाना क्या बाकी रहा ? परन्तु उस ‘है’ में स्थित न होकर, जो प्रतिक्षण नष्ट हो रहा है, उस शरीरमें आप स्थित हो जाते हैं, तब करना भी बाकी रहता है, जानना भी बाकी रहता है और पाना भी बाकी रहता है ।

इस बातको भी आप जानते हैं कि शरीर प्रतिक्षण बदलता है, कभी भी एकरूप नहीं रहता । अगर शरीर एकरूप रहता, तो बचपनका शरीर अभी भी रहना चाहिये था । परन्तु बचपनका शरीर अभी नहीं है—यह सबका अनुभव है । बचपनका शरीर किसी एक दिनमें, एक महीनेमें अथवा एक वर्षमें नहीं बदला है, प्रत्युत प्रत्येक वर्षमें, प्रत्येक महीनेमें, प्रत्येक दिनमें, प्रत्येक घण्टेमें, प्रत्येक मिनटमें और प्रत्येक सेकण्डमें बदलता है । अतः केवल बदलनेके पुञ्जका नाम शरीर है । शरीरादि पदार्थ स्थूल बुद्धिसे दीखते हैं । सूक्ष्म बुद्धिसे देखें तो केवल परिवर्तन-ही-परिवर्तन दीखेगा, वस्तु नहीं दिखेगी । जैसे पंखा चलता है तो गोल चक्कर दीखता है, पर वास्तवमें गोल चक्कर नहीं है । पंखेकी ताड़ी अलग-अलग है, पर तेजीसे घुमनेके कारण गोल चक्कर दीखता है । ऐसे ही बदलनेके कारण पदार्थ, शरीर दीखता है । यह शरीर है—ऐसा कहनेमें तो देरी लगती है, पर इसके बदलेमें देरी नहीं लगती । यह तो हरदम बदलता रहता है । परन्तु स्वयं (स्वरूप) नित्य-निरन्तर ज्यों-का-त्यों रहता है । नित्य-निरन्तर रहनेवाले स्वयंको जब प्रतिक्षण बदलनेवाले शरीरके साथ मिला लेते हैं, तब कामना, इच्छा, वासना, तृष्णा आदि पैदा होती हैं । इसीसे सब अनर्थ होते हैं ।

अगर हम नित्य-निरन्तर रहनेवाले नहीं होते, तो पहले किये हुए कर्मोंका फल आगे किसको भोगना पड़ेगा ? हम पहले थे, तभी तो पहले किये हुए कर्मोंका फल अब भोग रहे हैं; और हम आगे रहेंगे, तभी तो अभी किये हुए कर्मोंका फल आगे भोगना पड़ेगा । पहले हमने जो कर्म किये थे, वे परिवर्तनशील शरीरके साथ मिलकर ही किये थे और अब उनका फल भी शरीरके साथ मिलकर ही भोगेंगे । अगर हम शरीरके साथ न मिलें तो न पहलेका कर्म स्पर्श करेगा, न अभीका कर्म स्पर्श करेगा और न भविष्यका कर्म स्पर्श करेगा । कारण कि ‘है’ में कभी अभाव नहीं होता और अभाव हुए बिना उसमें दूसरी वस्तुका स्पर्श नहीं होता, प्रवेश नहीं होता । वह ‘है’ सदा ज्यों-का-त्यों रहता है, इसलिये उसका अनुभव करनेवाले महापुरुषोंने कहा है—

है सो सुन्दर है सदा, नहिं सो सुन्दर नाहिं ।
नहिं सो परगट देखिये, है सो दीखे नाहिं ॥

‘है’ तो सबका द्रष्टा है, वह दीखे कैसे ? आँखसे सबको देखते हैं, पर आँख नहीं दीखती, परन्तु जिससे देखते हैं, वही आँख है । इसी प्रकार हम ‘है’ को अर्थात् अपने होनेपनको देख नहीं सकते; परन्तु जिससे यह सब दिख रहा है, वही ‘है’ है । इस बातको आप मान लें । आप कह सकते हैं कि हमें उसका अनुभव नहीं हो रहा है । अतः उसके अनुभवके लिये आप जिज्ञासा करें, व्याकुल हो जायँ ।

(शेष आगेके ब्लॉगमें)
—‘साधन-सुधा-सिन्धु’ पुस्तकसे

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।। श्रीहरिः ।।

भगवत्प्राप्ति

क्रियासाध्य नहीं-३

(गत् ब्लॉगसे आगेका)
भगवान् हमारे हैं और हम भगवान् के हैं—यह सच्ची बात है । इसलिये भजन-ध्यान करते हुए इस बातको विशेषतासे याद रखें कि भगवान् अभी हैं, यहाँ हैं, मेरेमें हैं और मेरे हैं । अब निराशाकी जगह ही कहाँ है ? जैसे बालक मानता है कि माँ मेरी है, तो वह माँ पर अपना हक लगता है, पूरा अधिकार जमाता है । माँ इधर-उधर देखती है तो उसकी ठोड़ी पकडकर कहता है कि तू मेरी तरफ ही देख, बस । अतः माँको उसकी तरफ देखना पडता है । ऐसे ही हम भगवान् से कह दें कि हम तुम्हारे हैं, तुम हमारे हो, इसलिये मेरी तरफ ही देखो । सन्तोनें कहा है—‘न मैं देखूँ और को, न तोहि देखन देउँ ।’ मैं औरको देखूँगा नहीं और तेरेको भी दूसरी तरफ देखने दूँगा नहीं । ऐसा होनेपर भगवान् वशमें हो जायँगे । हम जो दूसरी तरफ देखते हैं, यही बाधा है ।

एक बानि करुणानिधान की । सो प्रिय जाकें गति न आन की ॥
(मानस ३/१०/४)

इसलिये कोई कैसा ही हो, उसको भगवान् की तरफसे निराश नहीं होना चाहिये । आपका विश्वास न बैठे तो जप करो, कीर्तन करो, सब कुछ करो और विश्वास बैठे तो भी सब कुछ करो; क्योंकि यह तो करनेकी चीज है ! परन्तु जप-ध्यान आदिके द्वारा भगवान् पर कोई कब्ज़ा कर ले—यह बात नहीं है । हम अपने-आपको देकर ही उनपर कब्ज़ा कर सकते हैं । हम अपने-आपको संसारको दे रखा है, इसलिये दुःख पा रहे है । अगर अपने-आपको भगवान् को दे दें, तो निहाल हो जायँ ।

बिलकुल शास्त्र-सम्मत बात है कि क्रियाओंके द्वारा भगवान् पर कब्जा नहीं कर सकते । कितनी ही योग्यता प्राप्त कर लें, उनपर अधिकार नहीं जमा सकते । कारण कि इनके द्वारा अधिकार उसीपर होता है, जो इनसे कमजोर होता है । सौ रुपयोंके द्वारा हम उसी चीजपर कब्जा कर सकते हैं, जो सौ रुपयोंसे कम कीमतकी है । कोई चीज सौ रुपयोंकी है तो हम एक सौ पचीस रुपये देकर उस चीजपर कब्जा कर सकते हैं । ऐसे ही भगवान् को किसी योग्यतासे खरीदेंगे, तो उस योग्यतासे कमजोर भगवान् ही मिलेंगे । अतः ये विरक्त हैं, ये त्यागी हैं, ये विद्वान हैं, ये बड़े हैं, इनको भगवान् मिलेंगे हमारेको नहीं—यह धारणा बिलकुल गलत है । अगर आप भगवान् के लिये व्याकुल हो जाओ, उनके बिना न रह सको, तो बड़े-बड़े पण्डित और बड़े-बड़े विरक्त तो रोते रहेंगे, पहले आपको भगवान् मिलेंगे । आप भगवान् के बिना रह नहीं सकोगे तो भगवान् भी आपके बिना रह नहीं सकेंगे । इसलिये परमात्माकी तरफसे किसीको कभी किंचिन्मात्र भी निराश नहीं होना चाहिये और संसारकी आशा नहीं रखनी चाहिये । कारण कि संसार आशामात्रसे नहीं मिलेगा । अगर मिल भी जायगा तो टिकेगा नहीं । अगर यह टिक भी जायगा तो आपका शरीर नहीं टिकेगा । संसार अभावस्वरूप हैं, इसलिये उसका सदा अभाव ही रहेगा । परमात्मा भाव-स्वरूप हैं, इसलिये उनका सदा भाव ही रहेगा, अभाव कभी होगा ही नहीं—यह सिद्धान्त है ।


—‘साधन-सुधा-सिन्धु’ पुस्तकसे
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।। श्रीहरिः ।।

भगवत्प्राप्ति

क्रियासाध्य नहीं-२

(गत् ब्लॉगसे आगेका)
भगवान् ने अपनेको प्राणिमात्रका सुहृद कहा है—‘सुहृदं सर्वभूतानां’ (गीता ५/२९), तो क्या दुष्ट-से-दुष्ट मनुष्यके भी भगवान् सुहृद नहीं हैं ? मैं कैसा ही क्यों न हूँ, क्या भगवान् मेरे सुहृद नहीं हैं ? अगर उनमें पक्षपात है तो वे भगवान् कैसे ? मैं दुष्ट हूँ, ज्यादा अयोग्य हूँ तो भगवान् की कृपा मेरेपर अधिक होगी—

‘पापी हुलास विशेषी अबकी बेर उबारियो ।’
(करुणासागर)

पापीके मनमें अधिक आनन्द होता है; क्योंकि भगवान् पतित-पावन हैं । इसलिये उनपर पतितोंका ज्यादा हक लागत है । माँ अपने अयोग्य लड़केका ज्यादा खयाल रखती है, तो क्या भगवान् मेरा खयाल नहीं रखेंगे ? वे मेरेपर कृपा न करें—यह हो ही नहीं सकता । इसलिये भजन-ध्यान करते हुए, नाम-जप करते हुए इस बात पर विशेष ध्यान दें कि जिह्वामें, नाममें, श्वासमें, मनमें, बुद्धिमें, अन्तःकरणमें, शरीरमें सब जगह परमात्मा परिपूर्ण हैं, पूरे-के-पूरे विद्यमान हैं । वे सबमें लबालब भरे हुए हैं । अब यह शंका होती है कि जब वे परमात्मा सबमें हैं, सब जगह मौजूद हैं तो फिर नाम-जप क्यों करते हैं ? नाम-जपके बिना हमारेको संतोष नहीं होता; इसलिये करते हैं । सनकादि ऋषियोंकी बात आपने सुनी होगी । वे चारों भाई एक समान ही ब्रह्मज्ञानी हैं । उनमें एक तो भगवान् की कथा सुनाता है और बाकीके तीन कथा सुनाते हैं । इस प्रकार ब्रह्मज्ञानी होते हुए भी वे भगवान् की कथा कहते रहते हैं; क्योंकि भगवान् की कथा ही ऐसी है—

आत्मारामाश्च मुनयो निर्ग्रथा अप्युरुक्रमे ।
कुर्वन्त्यहैतुकीं भक्तिमित्थम्भूतगुणो हरिः ॥
(श्रीमद्भागवत १/७/१०)

ज्ञानके द्वारा जिनकी चित्-जड-ग्रन्थि कट गयी है, ऐसे आत्माराम मुनिगन भी भगवान् की निष्काम भक्ति किया करते हैं, क्योंकि भगवान् के गुण ही ऐसे हैं कि वे प्राणियोंको अपनी और खींच लेते हैं ।

भगवान् हैं ही ऐसे कि उनके भजनके बिना साधक रह नहीं सकता । उतना रस, उतना आनन्द कहीं है ही नहीं । इसलिये हम उनका भजन करते हैं । भजनके द्वारा हम भगवान् को खरीद लेंगे—ऐसा भाव मत रखना । भगवान् तो अपनी कृपासे ही पधारते हैं । भजन-ध्यान, नाम-जप, कीर्तन आदिमें हमारा अनन्य प्रेम होना चाहये । कारण कि हमने संसारमें आसक्ति, प्रियता करके बड़ी भारी गलती की है । अब इस गलतीके संशोधनके लिये हमें भजन-ध्यान, नाम-जप आदि करना है । परमात्मा भजन-ध्यान आदिके अधीन हैं—ऐसी बात नहीं है । भगवान् स्वयं कहते हैं—

‘नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया ।’
(गीता ११/५३)

अर्थात् मैं वेदाध्ययन, तप, दान, यज्ञ आदिके द्वारा प्राप्त नहीं किया जा सकता । उपनिषदोंमें आता हैं—

‘नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन ।’
(कठोपनिषद १/२/२३)

अर्थात् प्रवचनसे, पण्डिताईसे, बहुत शास्त्रोंका बोध होनेसे परमात्मा नहीं मिलते । इसका आप उलटा अर्थ मत लेना कि सत्संग सुनना, पढ़ना, शास्त्रोंका ज्ञान प्राप्त करना खराब है । इनको तो करते ही रहना है । कहनेका भाव यह है कि इनके द्वारा भगवान् के ऊपर कब्जा नहीं कर सकते, अधिकार नहीं जमा सकते । जैसे, किसी वस्तुकी जो कीमत होती है, वह कीमत पूरी देनेपर उस वस्तुपर हमारा अधिकार हो जाता है । परन्तु भगवत्प्राप्तिके विषयमें ऐसी बात नहीं है । साधन करके भगवान् पर अधिकार नहीं किया जा सकता । उनपर अधिकार करनेका भी एक तरीका है । वह तरीका यह है कि सर्वथा भगवान् का ही हो जाय । तन, मन, वचन, विद्या, बुद्धि, अधिकार आदि किसीका भी किंचिन्मात्र भी सहारा न लेकर केवल भगवान् का ही हो जाय, तो भगवान् उसके वशमें हो जायँगे । परन्तु हमने साधना की है, हमने जप किया है, हमने कीर्तन किया है, हमने अभ्यास किया है, हम गीताको जानते हैं, हम अनेक शास्त्रोंको जानते हैं—ऐसी हेकड़ीसे भगवान् वशमें हो जायँ, यह असम्भव बात है । भगवान् वशमें होते हैं तो कृपा-परवश ही होते हैं । उनकी कृपा उसीपर होती है है, जो सर्वथा उनका हो जाता है । वे सस्ते हैं तो इतने सस्ते है कि ‘हे नाथ ! मैं आपका हूँ ।’—इतना सुनते ही भगवान् कहते हैं कि ‘हाँ बेटा ! मैं तेरा हूँ ’ आप कितनी ही विद्या, बुद्धि, योग्यता आदि लगा लो, उससे आपका ज्ञान बढ़ सकता है, आपमें पवित्रता आ सकती है, पर उससे भगवान् वशमें हो जायँ—यह बात नहीं होगी ।


(शेष आगेके ब्लॉगमें)

—‘साधन-सुधा-सिन्धु’ पुस्तकसे

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।। श्रीहरिः ।।

भगवत्प्राप्ति


क्रियासाध्य नहीं-१


एक विशेष बात ध्यान देनेकी है कि जिसको मुक्ति, कल्याण अथवा भगवत्प्राप्ति कहते है, वह स्वतःसिद्ध है, क्रियाके द्वारा सिद्ध होनेवाली चीज नहीं है । यह बहुत विलक्षण बात है ! आप कृपा करके इस बातकी तरफ ध्यान दें । संसारकी जितनी भी वस्तुएँ हैं, वे सब प्रकृतिका कार्य होनेसे उनमें हरदम परिवर्तन होता रहता है । क्रियाशील होनेसे उन वस्तुओंकी प्राप्ति भी कर्मोंके द्वारा होती है । अतः संसारकी वस्तुएँ क्रियासाध्य हैं । परन्तु परमात्मतत्त्व सदा ज्यों-का-त्यों रहता है, उसमें कभी कोई परिवर्तन नहीं होता । अतः परमात्मतत्त्व क्रियासाध्य नहीं है । सिद्धान्तकी एक बहुत बढ़िया और सूक्ष्म बात यह है कि परमात्मतत्त्व स्वतःसिद्ध है । वह क्रियाओंके द्वारा प्रापणीय नहीं है । यह बात विशेष ध्यान देनेकी है । आपका ध्यान आकृष्ट करनेके लिये कहता हूँ कि यह बात मेरेको बहुत वर्षोंके बाद सन्तोंसे मिली है । यह बात सर्वशास्त्रसम्मत भी है । अतः केवल इस बातकी तरफ ही आप ध्यान दें तो बहुत ही लाभकी बात है । अब इसका खुलासा कहता हूँ, आप ध्यान दें ।

हम यह मानते हैं कि परमात्मा सब समयमें हैं, सब जगहमें हैं, सभीके हैं और सबके हैं । अब इन चारों बातोंपर विचार करें । (१) परमात्मा सब समयमें हैं कि नहीं ? अगर इस समय नहीं हैं, तो परमात्मा सब समयमें हैं—यह कहना नहीं बनेगा । (२) परमात्मा सब जगह हैं तो यहाँ है कि नहीं ? अगर यहाँ नहीं हैं, तो परमात्मा सब जगह हैं—यह कहना नहीं बनेगा । (३) परमात्मा सभीमें हैं । वे जड़-चेतन, स्थावर-जंगम आदि सभीमें हैं । सजीवके दो भेद हैं—स्थावर और जंगम । वृक्ष आदि स्थावर हैं और मनुष्य, पशु-पक्षी आदि जंगम हैं । जड़-चेतनमें, स्थावर-जंगममें परमात्मा हैं । नीचे-से-नीचे समझे जानेवाले प्राणीमें तथा दुष्ट-से-दुष्ट आचरणवाले मनुष्यमें भी परमात्मा हैं । सन्त-महात्माओंमें भी परमात्मा हैं । शुद्ध-से-शुद्ध वस्तुमें तथा अपवित्र-से-अपवित्र वस्तुमें भी परमात्मा हैं । नरकोंमें भी परमात्मा परिपूर्ण हैं । जब वे सबमें हैं तो हमारेमें हैं कि नहीं ? अगर हमारेमें नहीं हैं, तो परमात्मा सबमें हैं—यह कहना नहीं बनेगा । (४) परमात्मा सबके हैं । यह नहीं कि वे साधुओंके हैं, गृहस्थोंके नहीं; भाइयोंके हैं, बहनोंके नहीं; ब्राह्मणोंके हैं, अन्त्यजोंके नहीं । ऐसा आप नहीं कह सकते है कि परमात्मा किसी व्यक्तिविशेषके हैं । परमात्मा दुष्ट-से-दुष्ट पुरुषके भी वैसे ही हैं, जैसे महात्मा-से-महात्मा पुरुषके हैं । परमात्मापर महात्मा-से-महात्माका जैसा हक लगता है, वैसा ही हक दुष्ट-से-दुष्टका भी लगता है । उनमें कभी किंचिन्मात्र भी पक्षपात नहीं है । उनमें पक्षपात हो ही नहीं सकता, असम्भव बात है । अतः परमात्मा सबके हैं, तो हमारे भी हैं । अगर वे हमारे नहीं है, तो परमात्मा सबके हैं —यह कहना नहीं बनेगा । अब सिद्ध क्या हुआ ? कि परमात्मा सब समयमें हैं तो अभी भी हैं, सब जगह हैं तो यहाँ भी हैं, सभीमें हैं तो मेरेमें भी हैं और सबके हैं तो मेरे भी हैं ।

उपर्युक्त चार बातोंकी तरफ ध्यान देनेसे एक बात सिद्ध होती है कि परमात्मा हमें नित्यप्राप्त हैं । हम भगवान् का भजन करते हैं, नाम-जप करते हैं, कीर्तन करते हैं, रामायण, भागवत आदि ग्रन्थ पढते हैं, सन्तोंकी वाणी पढ़ते हैं, तो यह भाव रहता है कि परमात्मा फिर मिलेंगे । अभी हम परमात्माकी प्राप्तिके योग्य नहीं हुए हैं, इसलिये परमात्मा अभी नहीं मिलेंगे, भविष्यमें मिलेंगे । यह धारणा साधकोंके लिये महान बाधक है । मनमें तो वे समझते हैं कि हम भगवान् की तरफ चल रहे हैं, पर वास्तवमें भगवान् से अलग होनेका उद्योग कर रहे हैं । यह चिन्तन कर रहें हैं अभी भगवान् नहीं मिलेंगे । अभी कैसे मिल जायँगे ? मैं योग्य नहीं हूँ, मैं पात्र भी नहीं हूँ । साधकके लिये यह धारणा महान पतन करनेवाली है । विचार करना चाहिये कि क्या हमारी अपात्रतासे भगवान् अटक सकते हैं ? क्या भगवान् इतने कमजोर हैं कि हम अयोग्य हैं, इसलिये वे हमें नहीं मिल सकते ? अगर ऐसी बात है तो फिर उनको दयालु कहना ही निरर्थक है । जब वे योग्यको मिलते हैं, अयोग्यको नहीं मिलते, तो फिर दयाका क्या लेना-देना ?

(शेष आगेके ब्लॉगमें)
—‘साधन-सुधा-सिन्धु’ पुस्तकसे

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।। श्रीहरिः ।।
परमात्मा

तत्काल

कैसे मिले ?-३

(गत् ब्लॉगसे आगेका)
श्रोता—दूसरी लालसा किसपर टिकी हुई है ?

स्वामीजी—दूसरी लालसाएँ संयोगजन्य सुखभोगकी लालासपर टिकी हुई हैं । संयोगजन्य सुखभोगकी जो लालसा है, मनमें जो रुचि है, यही बाधक है; सुख इतना बाधक नहीं है । असली बीमारी कहाँ है—इस बातका हमें तो कई वर्षोंतक पता नहीं लगा था । व्याख्यान देते-देते कई वर्ष बीत गये तब पता चला कि मनमें संयोगजन्य सुखकी जो लोलुपता है । यहाँ है वह बीमारी ! हमें सुख मिल जाय—बस, इस इच्छामें ही सब बाधाएँ हैं । यही अनर्थका मूल है, यही जहर है ।

श्रोता—संयोगजन्य सुखकी लालसा कैसे छूटे ?

स्वामीजी—इसके छुडानेका बड़ा सरल उपाय है । परन्तु इसको छोड़ना है—इतनी इच्छा आपके घरकी, स्वयंकी होनी चाहिये; क्योंकि इसके बिना कोई उपाय काम नहीं देगा । इसको हम छोड़ना चाहते हैं—इतने आप तैयार हो जाओ तो ऐसा सरल उपाय मेरे पास है है, जिससे बहुत जल्दी काम बन जाय ! मैंने जो पुस्तकोंमें पढ़ा है, सन्तोंसे सुना है, वह बात कहता हूँ । भाई-बहनोंके लिये, पढ़े-लिखे और अनपढ़ आदमियोंके लिये, छोटे-बडोंके लिये, सबके लिये सीधा सरल उपाय है कि दूसरोंको सुख कैसे पहुँचे ? दूसरोंको आराम कैसे मिले ? दूसरोंका भला कैसे हो ? —यह लालसा लग जाय तो अपने सुखकी लालसा छूट जायगी । करके देख लो, नहीं तो फिर मेरेसे पूछो कि यह तो हुआ नहीं ! युक्तिसंगत न दीखे तो कह दो कि यह युक्तिसंगत नहीं दीखता !

श्रोता—इसमें प्रारब्धकी बाधा है कि नहीं ?

स्वामीजी—इसमें प्रारब्धकी कोई बाधा नहीं है । इसमें प्रारब्ध मानना तो केवल बहानेबाजी है । प्रारब्ध ऐसा ही है, समय ऐसा ही आ गया, ईश्वरने कृपा नहीं की, अच्छे गुरु नहीं मिले, अच्छे महात्मा नहीं मिले, कोई बतानेवाला नहीं मिला, हमारा भाग्य ऐसा ही है—यह सब बहानेबाजी है, केवल परमात्मतत्त्वसे वञ्चित रहनेका उपाय है ।

ऐसा भी कभी हो सकता है कि ईश्वर अपनी प्राप्तिमें बाधा दे दे ? अथवा हमारा किया हुआ कर्म हमें बाधा दे ? या हमारी बनायी हुई वासना हमें बाधा दे दे ? कर्म हमने स्वयं किये हैं, वासनाएँ हमने स्वयं बनायीं है । जो चीज हमने पैदा कि है, उसको हम मिटा सकते हैं । गुरु कोई नहीं मिला तो गुरुकी जरूरत ही नहीं है । कोई महात्मा नहीं मिला तो महात्माकी जरूरत ही नहीं है । भगवान् ने जब अपनी प्राप्तिके लिये मनुष्य-शरीर दिया है तो अपनी प्राप्तिकी सामग्री कम दी है क्या ? अगर गुरुकी जरूरत होगी तो भगवान् को स्वयं गुरु बनकर आना पड़ेगा ! वे जगद्गुरु हैं—‘कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् ।’ अच्छे महात्मा संसारमें क्यों रहते हैं ? तत्त्वज्ञ, जीवन्मुक्त, परमात्माको प्राप्त हुए महापुरुष संसारमें जीते हैं, तो क्यों जीते हैं ? संसारमें आकर उन्हें जो काम करना था, वह काम तो उन्होंने पूरा कर लिया; अतः उनको उसी वक्त मर जाना चाहिये था ! परन्तु वे अब जीते हैं तो केवल हमारे लिये जीते हैं । उनपर हमारा पूरा हक लगता है । जैसे बालक दुःख पा रहा है तो माँ जीती क्यों है ? माँ तो बालकके लिये ही है, नहीं तो मर जाना चाहिये माँको ! जरूरत नहीं है उसकी ! ऐसे ही वे महात्मा पुरुष संसारमें जीते हैं, तो केवल जीवोंके कल्याणके लिये जीते हैं । इसीलिए महात्मा हमें नहीं मिलेंगे तो वे कहाँ जायँगे ? उनको मिलना पड़ेगा, झख मारकर आना पड़ेगा; अगर हम सच्चे हृदयसे परमात्माको चाहते हैं, तो गुरुकी जरूरत होनेपर गुरु अपने-आप आ जायगा । भगवान् गुरुको भेज देंगे । ऐसी कई घटनाएँ हुई हैं । यह एकदम सच्ची बात है । इसलिये प्रारब्ध और कर्म कुछ भी बाधक नहीं है । परमात्मप्राप्तिकी एक प्रबल इच्छा हो जाय तो अनन्त जन्मोंके पाप भस्म हो जायँगे ।

—‘साधन-सुधा-सिन्धु’ पुस्तकसे
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परमात्मा

तत्काल

कैसे मिले ?-२

(गत् ब्लॉगसे आगेका)
आपकी स्थिति परमात्मामें है । संसारमें आपकी स्थिति है ही नहीं । आपकी स्थिति तो अटल है और संसार आपके सामने बदलता है । संसारमें आपकी स्थिति है ही कहाँ ? बालकपन बदला, जवानी बदली, निरोग-अवस्था बदली, वृद्धावस्था बदली, रोग-अवस्था बदली, निरोग-अवस्था बदली, धनवत्ता बदली, निर्धनता बदली—ये सब बदलते रहे, पर आप वे-के-वे ही रहे । संसार आपके साथ कभी रह ही नहीं सकता और आप संसारके साथ कभी रह ही नहीं सकते । ब्रह्माजीकी भी ताकत नहीं है कि संसार आपके साथ और आप संसारके साथ रह जायँ । आपकी स्थिति सदा परमात्मामें रहती है । परमात्मा सदा आपके साथ रहते हैं और आप सदा परमात्माके साथ रहते हैं । अतः परमात्माकी प्राप्ति कठीन है ही नहीं । कठीन तो तब हो, जब परमात्माकी प्राप्तिके लिये कुछ करना पड़े । जब करना कुछ है ही नहीं, तब उसकी प्राप्ति कठीन कैसे ! कठिनता और सुगमताका सवाल ही नहीं है ।

श्रोता—बात तो यह ठीक जँचती है पर .....।

स्वामीजी—ठीक जँचती है तो मना कौन करता है ? आड़ तो आपने खुद ही लगा रखी है । वास्तवमें आपको परमात्मप्राप्तिकी परवाह ही नहीं है, चाहे प्राप्ति हो अथवा न हो !

संतदास संसार में , कई गुग्गु कई डोड ।
डूबन को साँसो नहीं, नहीं तिरन को कोड ॥

—गुग्गु (उल्लू-) को तो दिनमें नहीं दीखता और डोड-(एक प्रकारका बड़ा कौआ-) को रातमें नहीं दीखता । परन्तु संसारमें कई ऐसे लोग हैं, जिनको न दिनमें दीखता है और न रातमें दीखता है अर्थात् अपने उद्धारकी तरफ उनकी दृष्टि कभी जाती ही नहीं । उनमें न तो अपने डूबने-(पतन होने-) की चिन्ता है और न तैरने-(अपने उद्धार करने-) का उत्साह है ।

केवल यह लालसा हो जाय कि परमात्माकी प्राप्ति कैसे हो ? क्या करूँ ? कहाँ जाऊँ ? किससे पूछूँ ? यह लालसा जोरदार लगी कि परमात्माकी प्राप्ति हुई ! क्योंकि यह लालसा लगते ही दूसरी लालसाएँ छूट जाती हैं । जबतक दूसरी सांसारिक लालसाएँ रहती हैं तबतक एक अनन्य लालसा नहीं होती । परमात्मा अनन्य हैं; क्योंकि उनके समान दूसरा कोई है ही नहीं, इसलिये उनकी प्राप्तिकी लालसा भी अनन्य होनी चाहिये ।

श्रोता—परमात्माकी लालसा बनानी पड़ती है कि स्वतःसिद्ध है ?

स्वामीजी—परमात्माकी लालसा स्वतःसिद्ध है, दूसरी लालसाएँ आपने बनायी हैं । अतः उन लालासओंको छोड़ना है । अभी आप जिन लालासओंको जानते हो, आजसे पचास वर्ष पहले उनको जानते थे क्या ? जानते ही नहीं थे । इसलिये वे लालसाएँ बनावटी हैं । एक क्षण भी कोई लालसा टिकती नहीं, प्रत्युत बदलती रहती है, मिटती रहती है और आप नयी-नयी लालसा पकडते रहते हो ।

श्रोता—परमात्मप्राप्तिकी अनन्य लालसाके बिना भी परमात्मप्राप्ति हो सकती है क्या ?

स्वामीजी—परमात्मप्राप्तिकी अनन्य लालसाके बिना, दूसरी लालसा रहते हुए भी उद्योग किया जा सकता है, भजन-स्मरण किया जा सकता है । परन्तु यह लम्बा रास्ता है, इससे तत्काल परमात्मप्राप्ति नहीं होगी । एक-दो जन्म, दस जन्म, पता नहीं कितने जन्ममें हो जाय तो हो जाय ! दूसरी लालसा रहनेसे ही तो हम अटके पड़े हैं, नहीं तो अटकते क्या ? जो सत्संगमें लगे हुए हैं, उनमें कुछ-न-कुछ पारमार्थिक लालसा है ही; परन्तु अनन्य लालसा न होनेसे ही परमात्मप्राप्तिमें देरी हो रही है ।

वास्तवमें देखा जाय तो पारमार्थिक लालासके बिना कोई प्राणी है ही नहीं । परन्तु इस बातका पता पशु-पक्षियोंको नहीं है । जो मनुष्य पशु-पक्षियोंकी तरह ही जीवन बिता रहे हैं, उनको भी इस बातका पता नहीं है । सभी उस तत्त्वको चाहते हैं । जैसे, कोई भी प्राणी मरना चाहता है क्या ? सभी प्राणी निरन्तर रहना चाहते है—यह ‘सत्’ की चाहना है ! कोई अज्ञानी रहना चाहता है क्या ? सभी जानना चाहते हैं—यह ‘चित्’ की चाहना है । कोई दुःखी रहना चाहता है क्या ? सभी सुखी रहना चाहते हैं—यह ‘आनन्द’ की चाहना है । इस प्रकार सत्-चित्-आनन्द-स्वरूप परमात्माकी चाहना सभीमें स्वाभाविक है । इसको कोई मिटा नहीं सकता, दूसरी चाहनाएँ जितनी ज्यादा पकड़ रखी हैं, उतनी ही परमात्मप्राप्तिमें देरी लगेगी । दूसरी चाहनाएँ जितनी मिटेंगी, उतनी ही जल्दी परमात्मप्राप्ति होगी । सर्वथा चाहना मिटा दो तो तत्काल परमात्मप्राप्ति हो जायगी ।
राज्यकी चाहना होनेसे ही ध्रुवजीको परमात्मप्राप्तिमें देरी लगी । इस चाहनाके कारण अन्तमें उनको पश्चात्ताप हुआ कि मैंने गलती कर दी ! आप जिन चाहनाओंको पूरी करना चाहते हैं, उन चाहनाओंका आपको पश्चात्ताप होगा और रोना पड़ेगा । अतः परमात्माकी प्राप्तिमें दूसरी लालसा बाधा है—इस बातपर विचार करनेसे दूसरी लालसा मिट जायगी । दूसरी लालसा परमात्मप्राप्तिमें बाधा देनेमें ही सहायता करती है । इससे लोक-परलोकमें किसी तरहका किञ्चिन्मात्र भी फायदा नहीं है । केवल नुकसानके सिवाय और कुछ नहीं है । दूसरी लालसा केवल आध्यात्मिक मार्गमें बाधा डालती है । अगर इससे कुछ फायदा हो तो कोई बताओ कि अमुक लालसासे इतना फायदा हो जायगा । इसमें कोरा नुकसान है । केवल नुकासनकी बात भी आप नहीं छोड़ सकते, तो क्या छोड़ सकते हैं ।

(शेष आगेके ब्लॉगमें)

—‘साधन-सुधा-सिन्धु’ पुस्तकसे

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।। श्रीहरिः ।।

परमात्मा

तत्काल कैसे मिले ?-१



श्रोता—जल्दी-से-जल्दी उद्धार कैसे हो ?

स्वामीजी—हमारा उद्धार हो जाय—यह एक ही लालसा हो जाय तो तत्काल उद्धार हो जायगा । एक बात आप ध्यान देकर सुनें । संसारका काम जैसे उद्योग करनेसे होता है, ऐसे ही हम समझते हैं कि परमात्माकी प्राप्ति भी उद्योग करनेसे होगी । वास्तवमें यह बात नहीं है, नहीं है, नहीं है ! वे तो सब जगह और सबमें ज्यों-के-त्यों परिपूर्ण हैं । जहाँ आप कहते है हैं कि ‘मैं हूँ’ वहाँ भी परमात्मा पूरे-के-पूरे विद्यमान हैं । अतः केवल लालसा होनेसे उनकी प्राप्ति ही जाती है ।

संसारकी कोई वस्तु केवल लालसासे नहीं मिलती । लालसा होगी, उद्योग करेंगे और भाग्यमें होगा, तभी वस्तु मिलेगी । जैसे, रुपये चाहिये तो रुपयोंकी लालसा हो, रुपयोंके लिये प्रयत्न किया जाय और प्रारब्धमें हो तो रुपये मिलेंगे, अगर प्रारब्धमें न हो तो इच्छा करनेपर और खूब चेष्टा करनेपर भी रुपयें नहीं मिलेंगे । परन्तु परमात्माकी प्राप्ति केवल इच्छासे ही हो जायगी । परमात्मप्राप्तिकी इच्छा होनेपर उद्योग अपने-आप होगा, परन्तु परमात्मप्राप्ति उद्योगके अधीन नहीं है । जो वस्तु उद्योगके अधीन होती है, क्रियाजन्य होती है, वह नाशवान् होती है । जिसकी उत्पत्ति होती है, उसका विनाश होता ही है । जो साधनासे मिलेगा, वह उत्पत्तिवाला होगा, वह मिट जायगा, रहेगा नहीं । परन्तु परमात्मा अनुत्पन्न तत्त्व है और सदा ज्यों-का-त्यों रहता है; अतः उसकी प्राप्ति केवल लालसासे हो जाती है ।

केवल परमात्माकी ही लालसा हो, दूसरी कोई भी लालसा न हो—

‘एक बानि करुनानिधान की । सो प्रिय जाकें गति न आन की ॥’
(मानस ३/१०/४)

दूसरी मान-बड़ाई, सुख-आराम आदिकी लालसा होनेसे ही संसारका सम्बन्ध है । दूसरी लालसा मिटने ही संसारका सम्बन्ध छूट जाता है और संसारका सम्बन्ध छूटते ही परमात्माकी प्राप्ति हो जाती है । परमात्मा तो पहलेसे ही मिला हुआ है । अन्यकी जो इच्छा है, वासना है, उसीसे संसारके साथ सम्बन्ध जुड़ा हुआ है । संसारसे सम्बन्ध जुड़नेके कारण परमात्माका अनुभव नहीं हो रहा है ।

संसारकी इच्छा करके, उद्योग करके कुछ नहीं पा सकोगे । केवल धोखा मिलेगा । परमात्मप्राप्तिसे वञ्चित रह जाओगे—इसके सिवाय और कुछ लाभ नहीं होगा । समय खाली चला जायगा, मनुष्य-शरीर व्यर्थ चला जायगा और मिलेगा कुछ नहीं; क्योंकि संसारका अभाव है । मनुष्यने अपने भीतर एक सिद्धान्त बैठा लिया है कि जो स्थिति अभी नहीं है, वह स्थिति हो जायगी तो हमने बड़ी उन्नति कर ली । यह महान् दोषकी बात है । पहले धन नहीं था, अब धन हो गया तो वह समझता है कि बड़ा भारी काम कर लिया ! लोग भी कहते हैं कि पहले साधारण आदमी था, अब लखपति-करोड़पति बन गया, तो बड़ा भारी काम कर लिया ! यह मुर्ख था, अब पण्डित बन गया, तो बड़ा भारी काम कर लिया ! इसको पहले कोई जानता नहीं था, अब संसारमें इसकी बड़ी प्रसिद्धि हो गयी, तो बड़ा भारी काम कर लिया ! इसका आदर कोई नहीं करता था, सब ठुकराते थे, अब इसका आदर हो गया, तो बड़ा काम कर लिया ! वास्तवमें कुछ नहीं किया है । धूलके दो दाने जितना भी काम नहीं किया है ! जो स्थिति पहले नहीं थी, वह स्थिति अब हो जाय तो अन्तमें वह नहीं रहेगी । जो पहले भी नहीं थी और पीछे भी नहीं रहेगी; उसको प्राप्त करना कोई बहादुरी नहीं है । जो सब देश, काल आदिमें मौजूद है, उस परमात्माको प्राप्त करना ही बहादुरी है । वह परमात्मा सदा ‘है’ ही रहेगा । वह ‘नहीं’ कभी हो ही नहीं सकता ।

(शेष आगेके ब्लॉगमें)
—‘साधन-सुधा-सिन्धु’ पुस्तकसे
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।। श्रीहरिः ।।

सुख-लोलुपताको

मिटानेका उपाय-२

(गत् ब्लॉगसे आगेका)

सुख इतना बाधक नहीं है, जितनी सुखकी लोलुपता बाधक है । सुख मिल जाय, सुख ले लूँ—यह इच्छा जितनी बाधक है, उतना सुख बाधक नहीं है । कारणकी सुख बेचारा आता है और चला जाता है, पर उसकी लोलुपता ज्यों-की-त्यों बनी रहती है । सुख नहीं है तो भी लोलुपता रहती है । सुख भोगते समय भी लोलुपता रहती है और सुख चला जाय तो भी लोलुपता रहती है । सुखमें जो खिंचाव रहता है, प्रियता रहती है, यही वास्तवमें बीमारी है । इसको मिटानेका सरल और श्रेष्ठ उपाय यह है कि दूसरोंको सुख कैसे हो—इसकी लगन लग जाय । आप कृपा करके आज ही इस बातको धारण कर लें कि दूसरोंको सुख कैसे पहुँचे, दूसरोंका भला कैसे हो, दूसरोंका हित कैसे हो । अगर भीतरसे यह लगन लग जायगी कि दूसरोंको सुख कैसे हो तो अपने सुखकी इच्छा छूट जायगी ।

अपनी सुख-लोलुपताको मिटानेके लिये दूसरोंको सुख पहुँचाना है, गायोंको सुख पहुँचाना है, गरीबोंको सुख पहुँचाना है, सबको सुख पहुँचाना है । अपनी सुख-लोलुपताको मिटानेके उद्देश्यसे अगर सेवा की जाय तो मेरा विश्वास है कि जरूर लाभ होगा, करके देख लो । आजकल सेवा करनेवालोंमें भी सच्ची लगनसे सेवा करनेवाले मनुष्य बहुत कम देखनेमें आते हैं । वे सेवा तो करते हैं, पर उसमें दिखावटीपन रहता है । भीतरसे यह लगन नहीं होती कि दूसरोंको सुख कैसे पहुँचे, दूसरोंका हित कैसे हो । गीता कहती है कि जो प्राणिमात्रके हितमें रत रहते हैं, वे भगवान् को प्राप्त होते हैं—‘ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः ॥’ (१२/४) ।

अब दूसरेकी सेवा किस रीतिसे करें, यह बताता हूँ । दूसरेकी सेवा करते समय अपने मनकी प्रधानता बिलकुल न रखें । केवल दूसरेके मनकी तरफ देखें कि वे कैसे राजी हों । किस तरहसे उनको सुख पहुँचे । हमें तो कई वर्षोंके बाद यह बात पकड़में आयी कि ‘मेरे मनकी बात पूरी हो’—यही कामना है । इसलिये अपनी मनमानी छोडकर दूसरेकी मनमानी करें । जो न्याययुक्त हो, शास्त्र-सम्मत हो, अपनी सामर्थ्यके अनुरूप हो—ऐसी दूसरेके मनकी बात पूरी करें, तो आपमें अपनी कामनाको मिटानेकी सामर्थ्य आ जायगी ।

जहाँ रहो, जिस क्षेत्रमें रहो केवल यह लगन रखो कि दूसरेको सुख कैसे मिले, दूसरेका हित कैसे हो । इस बातका ख्याल रखो कि किसीको मेरे द्वारा कष्ट न पहुँचे, सुख पहुँचे । जैसे गोस्वामी तुलसीदासजीने कहा—‘कामिहि नारि पियारि जिमि लोभिहि प्रिय जिमि दाम ।’ (मानस ७/३० ख); कामीको जैसे स्त्री प्यारी लगती है और लोभीको जैसे पैसा प्यारा लगता है, ऐसे ही आपको दूसरोंका हित प्यारा लगाने लगे । फिर देखो तमाशा, चट काम होगा । वर्षोंतक विचार और चिन्तन करनेपर जो बात मिली है, वह बात बतायी है आपको !

—‘साधन-सुधा-सिन्धु’ पुस्तकसे
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सुख-लोलुपताको

मिटानेका उपाय-१

अगर आप संयोगजन्य (सांसारिक) सुखकी आसक्ति मिटा दें तो अभी परमात्मतत्त्वका अनुभव हो जाय । संयोगजन्य सुखमें जो आकर्षण है—यही खास बीमारी है । विचार करनेसे यह बात ठीक समझमें आती है कि यह संयोगजन्य सुखकी लालसा ही परमात्मप्राप्तिमें खास बाधा है । संयोगजन्य अर्थात् पदार्थों, व्यक्तियों, परिस्थितियोंके सम्बन्धसे पैदा होनेवाला सुख नित्य-निरन्तर कैसे रह सकता है ? कारण कि जो चीज पैदा होती है, वह नष्ट ही होती है । अगर संयोगसे मिलनेवाला सुख असह्य हो जाय, इस कृत्रिम सुखका त्याग कर दिया जाय, तो ‘सहज सुख’ है, वह प्रकट हो जायगा; क्योंकि यह स्वयं सहज सुख-स्वरुप है—

ईश्वर अंस जीव अविनाशी । चेतन अमल सहज सुखरासी ॥
(मानस ७/११७/१)

जबतक संयोगजन्य सुखका त्याग नहीं करोगे, तबतक ‘हमारा सम्बन्ध संसारसे नहीं है, हमारा सम्बन्ध परमात्मासे है’—यह बात सुननेपर भी काममें नहीं आयेगी । ऐसे ही ‘संसार नाशवान् है, क्षणभंगुर है’—ऐसी बातें भले ही सुन लो, याद कर लो, पर अनुभव नहीं होगा । संसार असत्य है—ऐसा कहनेसे, सीख लेनेसे, याद करनेसे संसार छूटता नहीं । तात्पर्य है कि जबतक सांसारिक संयोगजन्य सुखकी आसक्ति रहेगी तबतक संसारकी असत्यताका अनुभव नहीं होगा । कारण कि आप संयोगजन्य सुखको सत्य मानकर ही उसको लेनेकी इच्छा करते हो, फिर संसारकी असत्यताका अनुभव कैसे कर सकते हो ?

इस बातका प्रत्यक्ष पता है कि संयोगजन्य सुख लेनेसे दुःख भोगना ही पडता है । ऐसा कोई प्राणी हो ही नहीं सकता, जो संयोगजन्य सुख तो भोगता रहे, पर उसको दुःख न भोगना पड़े । वह दुःखसे बच जाय—यह असम्भव है । फिर भी मनुष्य संयोगजन्य सुख क्यों नहीं छोडता ? वर्तमानमें संयोगसे जो सुख होता है, उसका जितना आकर्षण है, प्रियता है, विश्वास है, भरोसा है, उतना उसके परिणामपर विचार नहीं है । सुखभोगके परिणाममें क्या होगा—इसका वह विचार ही नहीं करता । उसके विचारमें आता भी है तो वह आँख मीच लेता है, उसको जानना नहीं चाहता । इसलिये भगवान् ने राजस सुखका वर्णन करते हुए बताया कि संयोगजन्य सुख आरम्भमें अमृतकी तरह और परिणाममें विषकी तरह होता है—विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेमृतोपमम् । परिणामे विषमिव....’ (गीता १८/३८) । इसके परिणामका विचार मनुष्य ही कर सकता है, पशु-पक्षी आदिमें इसका विचार करनेकी शक्ति ही नहीं है । देवतालोग तो सुख भोगानेके उद्देश्यसे ही स्वर्गमें रहते हैं, वे इसके परिणामको क्या जानेंगे ? मनुष्य-शरीर केवल परमात्मकी प्राप्तिके लिये ही मिला है; अतः इसमें परिणामका विचार करनेकी योग्यता है । इसलिये मनुष्यको हरदम संयोगजन्य सुखके परिणामकी तरफ दृष्टि रखनी चाहिये । हरदम सोचना चाहिये कि इसका परिणाम क्या होगा ? सांसारिक सुखका परिणाम दुःख होगा ही । भगवान् ने गीतामें कहा है—‘ये ही संस्पर्शजा भोग दुःखयोनय एव ते ।’ (गीता ५/२२) अर्थात् जितने भी सम्बन्धजन्य सुख हैं, वे सब-के-सब दुःखोंके कारण हैं । संसारमें जितने भी दुःख होते हैं—नरक होते हैं, कैद होती है, अपयश होता है, अपमान होता है, रोग होते हैं, शोक होता है, चिन्ता होती है, व्याकुलता होती है, घबराहट होती है, बैचेनी होती है—ये सब-के-सब संयोगजन्य सुखकी लोलुपताका ही नतीजा है ।

(शेष आगेके ब्लॉगमें)
—‘साधन-सुधा-सिन्धु’ पुस्तकसे

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अपने साधनको

सन्देहरहित बनायें-२

(गत् ब्लॉगसे आगेका)
श्रोता—भगवान् तो माता-पिता है, उनके सामने तो मनुष्य अबोध शिशु ही है ।

स्वामीजी—भगवान् के सामने ऐसा मानना की मैं तो अबोध शिशु हूँ, एक बालक हूँ, बेसमझ हूँ—यह बहुत अच्छी चीज है । बेसमझका अर्थ है की अभी समझना और बाकी है; बिलकुल नहीं समझता —ऐसी बात नहीं है । बालकके सामने मुहर और बतासा रख दो तो वह बतासा ले लेगा, पर मुहर नहीं लेगा । आपको वह बेसमझ दीखता है, पर अपनी दृष्टिसे वह बेसमझ नहीं है । अबोध होते हुए भी वह बोधपूर्वक काम करता है । आपको मुहर बढ़िया दीखती है, पर बच्चेको मुहर बढ़िया नहीं दीखती । उसकी समझमें मुहरमें कोई स्वाद नहीं, पर बतासा मीठा लगता है; अतः मुहरका वह क्या करे ? अपनी समझमें वह बढ़िया चीज लेता है । बतासा लेता है तो बोधपूर्वक ही लेता है, बेसमझीसे नहीं । ऐसे ही आपलोग धनमें, भोगोमें लगे हुए हो और इसको अच्छा समझते हो, पर ज्ञानीकी दृष्टिमें बिलकुल पापोमें लगे हो और नरकोमें, जन्म-मरणमें, दुःखमें जा रहे हो । परन्तु ऐसा कहनेपर आप मानते नहीं । बस, किसी तरहसे धन ले ही लो, भोग भोग ही लो । हम चाहे अज्ञानी कह दें, तो भी अपनेको अज्ञानी थोड़े ही मानोगे ? कहनेपर बुरा लगेगा, सहोगे नहीं ।

मैं अपने-आपको भी पूरा जानकर नहीं मानता हूँ । मैं सब विषयमें ठीक जानता हूँ—ऐसा मेरेको जँचता नहीं । किसी विषयमें मैं जानता हूँ तो उसको कह देता हूँ, पर मैं बड़ा जानकर हूँ, यह मेरे मनमें आती ही नहीं । इससे क्या होगा ? कि और जानकारी बढ़ेगी । अगर अपनेको जानकर मान लिया तो जानकारी बढ़नी समाप्त हो जायगी; क्योंकि भरे घड़ेको और क्या भरें ? उसमें गुंजाइश ही नहीं । जानकारी तब बढ़ेगी, जब अपनेमें कमी मालूम देगी । पुस्तकोमें हमने ऐसा पढ़ा है कि किसी भी कक्षामें रहें, अज्ञान (अनजानपना) आगे रहेगा—‘अज्ञानं पुरतस्तेषां भाति कक्षासु कासुचित् ।’ आपको कई बातें आती हैं, पर जुती बनानी आती है क्या ? कहना ही पड़ेगा कि मैं नहीं जानता । अतः कहीं-न-कहीं तो अनजानपना रहेगा ही ।

बहुत वर्षोंकी बात है, देशनोकमें चातुर्मास था । वहाँ मैंने कहा कि यह छोटा बालक मेरेसे ज्यादा जानकर है । कहा कैसे ? मेरेसे कोई पूछे कि इस बालककी माँ कौन-सी है, तो मैं नहीं बता सकता । परन्तु इस बालकसे कोई पूछे तो यह बता देगा कि अमुक मेरी माँ है । अतः यह ज्यादा जानकर हुआ कि नहीं ? किसी विषयमें यह जानकर है, किसी विषयमें मैं जानकर हूँ, तो टोटलमें बराबर ही हुए । इसलिये मैं जानकर हूँ—यह अभिमान करना गलतीकी बात है ।

सर्वथा जानकर तो केवल परमात्मा ही हैं । जो तत्वज्ञ है, जीवन्मुक्त है, वह तत्त्वके विषयमें तो जानकर है, पर बहुत-से विषयोंमें अनजान है । जो वास्तवमें तत्त्वको जाननेवाले हैं, उनमें जाननेका अभिमान नहीं होता । अगर अभिमान होता है तो तत्त्वको जाना ही नहीं । अभिमान तो किसी व्यक्तित्वको लेकर, किसी विशेषताको लेकर ही होता है । स्थूल शरीरकी स्थूल जगत् के साथ एकता है । सूक्ष्म शरीरकी सूक्ष्म जगत् के साथ एकता है । कारण शरीरकी कारण जगत् के साथ एकता है । आत्माकी आत्माके साथ एकता है । अतः एक देशमें वह विशेषता कैसे मानोगे ? अगर मानेगा तो वह अज्ञानी हुआ ।

श्रोता—महाराजजी ! मैं भगवान् का हूँ और भगवान् मेरे है—यह अभिमान क्या पतन करनेवाला नहीं है ?

स्वामीजी—नहीं, यह तो भगवान् का भजन है । भगवान् में ही अपनापन दीखना चाहिये । दूसरेमें अपनापन नहीं दीखना चाहिये । एक भगवान् ही मेरे हैं और कोई मेरा नहीं । ये शरीर, इन्द्रियाँ, मन बुद्धि आदि कोई मेरे नहीं ।

आज मनमें यह आयी कि किसी बातको आप मानो, किसी साधनमें चलो, उसमें सन्देह-रहित होकर, सुलझ करके चलो तो जरूर लाभ होगा । परन्तु अपनेमें अज्ञान है और साथमें संशय रखता है तो उसका पतन हो जायगा—‘अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति’ (गीता ४/४०) । उसका न यह लोक ठीक होगा, न परलोक ठीक होगा और न सुख ही मिलेगा—‘नायं लोकोस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः’ (गीता ४/४०) ।

—‘साधन-सुधा-सिन्धु’ पुस्तकसे
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अपने साधनको


सन्देहरहित बनायें-१


अपने साधनको निर्मल बनना चाहिये अर्थात् अपनेमें साधन-विषयक कोई भी शंका नहीं रहनी चाहिये । शंका रहे तो पुस्तकोंसे, प्रश्नोत्तरसे उसको दूर कर लेना चाहिये । संसार सत्य है—ऐसा अगर अपनेको अनुभव होता है, तो इसी बातपर डटे रहो । इसमें कोई सन्देह हो तो उसको दूर करते रहो । उसपर विचार करते रहो । शंकाओंको मत रखो । अपनेमें शंका रखनी गलती है । अगर आत्माकी, ब्रह्मकी सत्ता मानते हो तो उसीपर डटे रहो । ईश्वरकी सत्ता मानते हो तो उसीपर डटे रहो । उसमें शंका मत रखो । यह बात मेरेको बहुत बढ़िया लगती है, इसलिये आपको कहता हूँ । जो हम साधन करते हैं, वह इस तरहसे करें कि अपने हृदयको साफ कर दें ।

आपको जो बात पसंद हो, वही पूछो । मैं उसीमें बात बताऊँगा । मैं अपना मत आपपर लादता नहीं कि मेरा मत मान लो, मेरा मत ठीक है । आपकी जो मान्यता हो, उसीको मैं पुष्ट कर दूँगा, उसीमें बढ़िया बात बता दूँगा । उसके अनुसार ही आप चलो तो सिद्धि हो जायगी । जैसे कोई संसारको सत्य मानता है । संसार बहता है, पर मिटता नहीं । संसार जन्मता-मारता है, पर है नित्य । ऐसी जिसकी मान्यता हो, उसको चाहिये कि विवेक-विरोधी कोई काम न करे । संसारको सच्चा तो माने, पर झूठ, कपट, बेईमानी करे—यह ठीक नहीं । कारण कि आपके साथ कोई झूठ, कपट, बेईमानी करे तो आपको अच्छा नहीं लगता । आपको कोई ठगे तो बुरा लगता है । आपकी कोई चीज चुरा ले तो बुरा लगता है । अतः ऐसा आप न करें । संसारको भले ही सच्चा मानते रहें, पर जिसको आप बुराई समझते हैं, जिसको दूसरा कोई अपने साथ करें—ऐसा नहीं चाहते, उस बुराईको आप बिलकुल छोड़ दें, तो सिद्धि हो जायगी ।

श्रोता— अपनेमें जो बुराई है, वह क्या अभ्यास करनेसे छूट जायगी ?

स्वामीजी—बुराई अभ्याससे नहीं छूटती, विचारसे छूटती है । अपनेमें जो बुराई आयी है, उसको सत्संगके द्वारा, शास्त्रोंके द्वारा, सन्तोंके द्वारा ठीक तरहसे समझ करके विचारपूर्वक त्याग दें । बुराई त्यागनेका अभ्यास नहीं होता । त्याग विचारसे होता है, अभ्याससे नहीं । अभ्याससे एक नयी स्थिति बनाती है; जैसे—हम रस्सेपर नहीं चल सकते, पर इसका अभ्यास करें तो नटकी तरह हम भी रस्सेपर चल सकते हैं ।

श्रोता—अगर कोई अपनेको अज्ञानी मानता है, तो वह क्या करे ?

स्वामीजी—अज्ञानी मानता है तो अज्ञानको दूर करना चाहिये । अज्ञान किसीको भी अच्छा नहीं लगता । किसीसे कहें कि तू अज्ञानी है तो उसे अच्छा लगेगा क्या ? जब अज्ञान आदमीको अच्छा नहीं लगता तो वह अपनेको अज्ञानी कैसे मानेगा ? अपनेमें ज्ञानका अभिमान हो सकता है, अपनेमें अज्ञता रह सकती है, पर अपनेको सर्वथा अज्ञानी नहीं मान सकता, क्योंकि यह परमात्माका अंश है ।
(शेष आगेके ब्लॉगमें)

—‘साधन-सुधा-सिन्धु’ पुस्तकसे

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संकल्प-त्यागसे कल्याण-३

जैसे बच्चेने कह दिया और आपने कर दिया, तो आपने कृपा करके उसका कहना मान लिया । ऐसे ही संत-महात्मा भी हमारेपर कृपा करके हमारा कहना मान लेते है । जिसमें हमारा अनिष्ट न हो,अहित न हो, ऐसी बात कर देते हैं । उनका अपना कोई संकल्प नहीं होता । इसलिये दूसरेके संकल्पके अनुसार काम करना है, अपना संकल्प नहीं रखना है । इसमें हमें बाधा किस बातकी ? इसमें हम स्वतन्त्र हैं, पर दीखती है परतन्त्रता—‘सर्वाथान्विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी ।’ (गीता १८/३३) हमारा संकल्प पूरा होता है, तो उसमें एक सुख मिलता है । वह सुख ही बाँधनेवाला है । उस सुखमें ही मनुष्य पराधीन होता है । जिसमें सुख मिलता है, उसका गुलाम हो जाता है । रुपयोंसे सुख मिले तो रुपयोंका गुलाम, परिवारसे सुख मिले तो परिवारका गुलाम, नौकरसे सुख मिले तो नौकरका गुलाम, चेलेसे सुख मिले तो चेलेका गुलाम—जिससे सुख मिले, उसका गुलाम हो ही जायगा । आपने यह कहावत सुनी होगी कि ‘गरज गधेको बाप करे ।’ आप गरज रखोगे तो गधेको बाप बनना पड़ेगा । गरज क्या है ? कि हमारे बात पूरी होनी चाहिये, हमारे मनकी होनी चाहिये—यही गरज है । अगर मनुष्य गरजका त्याग कर दे तो वह सबका शिरोमणि बन जाय ! परमात्माका स्वरुप हो जाय ! परमात्मा सबकी चाहना पूरी करते हैं, उनकी चाहना कोई पूरी क्या करे ? उनकी चाहना तो है ही नहीं । इतनी विलक्षण अवस्था हमारी सबकी हो सकती है । केवल अपने संकल्पका त्याग कर दें । त्याग नहीं करनेसे संकल्प तो पूरे होंगे नहीं । जो संकल्प पूरे होनेवाले हैं, वे त्याग करनेपर भी पूरे होंगे । वह तो भगवान् के विधानके अनुसार होगा ही—‘राम कीन्ह चाहहिं सोई होई । करै अन्यथा अस नहिं कोई ॥ (मानस १/१२८/१) जो धन आनेवाला है, वह आयेगा; जो मान होनेवाला है, वह होगा । जो चीज आनेवाली है, वह आयेगी ही । हमें मिलनेवाली चीज दूसरेको कैसे मिलेगी ?—‘यदस्मदीयं न हि तत्परेषाम् ।’ तो फिर उसकी गुलामी क्यों करें । जो नहीं आनेवाली है, उसकी कितनी हि गुलामी करो, वह नहीं आयेगी । फिर हम चिन्ता क्यों करें ? चिन्ता भगवान् करें—‘चिन्ता दीनदयाल को, मो मन सदा आनन्द ।’ वे चिन्ता करें, न करें, उनकी मरजी, पर हम तो आनन्दमें रहें । अपना संकल्प रखनेसे ही सुखी- दुःखी होते है । अपना संकल्प न रखें तो क्यों सुखी-दुःखी हों ? हमें तो भगवान् की आज्ञाका पालन करना है, जो हमारा कर्तव्य है ।

श्रोता—संकल्पसे छुटनेका अत्यन्त सुगम उपाय क्या है ?

स्वामीजी—अत्यन्त सुगम उपाय है कि दूसरा मेरा कहना माने—यह आग्रह छोड़ दे । ‘मेरा कल्याण हो जाय’—यह एक ही उद्देश्य बन जाय । जैसे मनुष्य रुपये कमानेमें लग जाता है तो उसका अपमान करो, निंदा करो, किसी तरहसे तंग करो, वह सब सह लेता है । इन्सपेक्टर आ करके कई तरहसे तंग करता है तो कुछ रुपये देकर छुटकारा करता है । यह सब रुपयोंका लोभ कराता है । ऐसे ही कल्याणका लोभ हो जायगा तो यह बात सुगम हो जायगी । कल्याणका लोभ होनेपर फिर जिस तरहसे पारमार्थिक लाभ न हो, उस जगह टिक नहीं सकेंगे; जिस सत्संगमें पारमार्थिक लाभ न हो, उस सत्संगमें ठहर नहीं सकेंगे; जिस पुस्तकको पढ़नेसे पारमार्थिक लाभ न हो, वह पुस्तक पढ़ नहीं सकेंगे; जिस व्यक्तिके संगसे पारमार्थिक लाभ न हो, उस व्यक्तिका संग नहीं कर सकेंगे ।

—‘साधन-सुधा-सिन्धु’ पुस्तकसे

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संकल्प-त्यागसे कल्याण-२

(गत् ब्लॉगसे आगेका)
दूसरोंके लिये रहें, अपने लिये नहीं—इसमें परतन्त्रता दीखती है, पर वास्तवमें इसमें स्वतन्त्रता है । माँ-बापके लिये आदर्श बेटा बन जाओ, पत्नीके लिये आदर्श पति बन जाओ, पुत्रके लिये आदर्श पिता बन जाओ, भाईके लिये आदर्श भाई बन जाओ, बहनके लिये आदर्श भाई बन जाओ, समाजके लिये आदर्श सदस्य बन जाओ । परन्तु माँ-बाप हमारे लिये हैं, स्त्री हमारे लिये है, पुत्र हमारे लिये है, जनता हमारे लिये है—ऐसा होगा, तो यह संकल्प हो जायगा और इसमें आप फँस जाओगे । संकल्पसे कामना पैदा होती है—‘संकल्पप्रभवान्कामान्’ (गीता ६/२४) । कामनासे क्रोध, क्रोधसे सम्मोह, सम्मोहसे स्मृतिनाश, स्मृतिनाशसे बुद्धिका नाश, बुद्धिके नाशसे मनुष्यका पतन हो जाता है (गीता २/६२-६३) ।

श्रोता—महाराज ! इतनी कृपा करो कि यह बात काममें आ जाय ।

स्वामीजी—मेरी दृष्टीसे तुम ध्यान नहीं देते हो । ध्यान दो तो आँख खुल जाय । यह संकल्प-त्यागकी बात मेरेको इतनी विचित्र दीखती है कि जैसे नींदमें पड़े हुए आदमीकी नींद खुल जाय, बेहोश आदमीको होश आ जाय ! इस बातसे इतना फरक पडता है ! जैसे दूध पीते हुए बालकके मुखसे स्तन हटा दे तो वह छटपटाता है, सह नहीं सकता, पर बल नहीं होनेसे बेचारा करे क्या ! ऐसे ही इन बातोंकी आपमें रूचि लगेगी तो न हरेक कथामें ठहर सकोगे, न हरेक परिस्थितिमें ठहर सकोगे । जैसे रुपयोंके लिये आदमी चाहे जो कर लेता है; माँको छोड़ देता है, स्त्रीको छोड़ देता है, बच्चोंको छोड़ देता है और जगह चला जाता है कि रूपया मिलेगा । परन्तु यह चीज रुपयोंसे भी बढ़िया है । रुपये तो थोड़े दिनके हैं । या तो रुपये चले जायँगे, या आप रुपये छोडकर मर जाओगे, परन्तु यह जन्म-जन्मान्तरोंतक साथ रहनेवाली चीज है । ऐसी बढ़िया चीज है कि आदमी निहाल हो जाय, जीवन सफल हो जाय, विलक्षण आनन्द हो जाय, स्वाधीन हो जाय, मुक्त हो जाय ! अपना संकल्प न रखे तो योगारूढ़ हो जाय । योगारूढ़ होनेपर एक शान्ति मिलेगी, एक निर्विकल्पता मिलेगी । उसका भी रस नहीं भोगें तो मुक्ति हो जायगी । अगर रस भोगेंगे तो अटक जायँगे‘सुखसंगेन बध्नाति’ (गीता १४/६) ।

मेरे विचार यह होता है कि आप जो पूछें, वही कहूँ । इसका मतलब है कि आपका संकल्प पूरा हो । हमारी बात पूरी हो—ऐसा नहीं । आप कह देते हो कि जो तुम्हारे मनमें आये, वह कहो । तो फिर यह आपके मनकी हो गयी । इसमें बड़ा ही आनन्द है । हमें अपने लिये कुछ करना ही नहीं, अपने लिये कुछ चाहिये ही नहीं, अपना कुछ है ही नहीं । कैसी मौजकी बात है ! ‘सदा दीवाली सन्तकी, आठों पहर आनन्द ।’ कोर आनन्द ही आनद है !

ऐसा होना चाहिये और ऐसा नहीं होना चाहिये—यह संकल्प है; परन्तु ऐसा करना चाहिये और ऐसा नहीं करना चाहिये—यह संकल्प नहीं है । करनेमें तो बिलकुल विचारपूर्वक करना है, समझ-समझकर करना है—‘सुचिन्त्य चोक्तं सुविचार्य यत्कृतं सुदीर्घकालेपि न याति विक्रियाम् ।’ करनेमें सावधान रहना है और होनेमें प्रसन्न रहना है । ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन’ (गीता २/४७)—कर्म करनेमें ही हमारा अधिकार है, फलमें नहीं । करनेका विचार संकल्प नहीं होता, फलका विचार संकल्प होता है । करनेका विचार तो कर्तव्य होता है । हमारे अनुकूल काम हो; जो हम न चाहें, वह नहीं हो—यह संकल्प है । जो आपके अनुकूल हो जायगा, उसकी पराधीनता आपको भोगनी ही पड़ेगी । मैं शब्द ज्यादा कहता हूँ, पर सच्ची बात है कि भगवान् को भी पराधीन होना पडता है, आप क्या चीज हो ! ‘अहं भक्तपराधीनो ह्यस्वतन्त्र इव द्विज ।’ (श्रीमद्भागवत ९/४/२३)—मैं भक्तोंके पराधीन हूँ,स्वतन्त्र नहीं । भक्त भगवान् के संकल्पके अनुसार करता है, इसलिये भगवान् को उसका दास होना पडता है—‘मैं तो हूँ भगतनको दास, भगत मेरे मुकुटमणि ।’ आपके मनके अनुसार चलनेवालेका गुलाम आपको बनना पड़ेगा, पड़ेगा, पड़ेगा ! कोई बचा सकता नहीं ! आपका अपना संकल्प ही नहीं होगा तो आप कभी पराधीन, गुलाम हो ही नहीं सकते ।


(शेष आगेके ब्लॉगमें)

—‘साधन-सुधा-सिन्धु’ पुस्तकसे

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।। श्रीहरिः ।।

संकल्प-त्यागसे कल्याण-१

संसार अपने लिये नहीं है । जो अपने लिये संसारकी जरूरत नहीं मानता, वह संसारके लिये उपयोगी हो जाता है; और जो अपने लिये संसारकी जरूरत मानता है, वह संसारके लिये अनुपयोगी हो जाता है, संसारके कामका नहीं रहता । अतः घरमें रहो तो घरवालोंके लिये रहो, आश्रममें रहो तो आश्रमवालोंके लिये रहो, किसी समुदायमें रहो तो समुदायवालोंके लिये रहो, अपने लिये नहीं । उनके लिये हम कब होंगे ? जब अपना कोई संकल्प नहीं रखेंगे । अपना संकल्प रखेंगे तो हम पराधीन हो जायँगे । अपना संकल्प क्या है ? ऐसा होना चाहिये और ऐसा नहीं होना चाहिये—यह संकल्प है । परमात्माकी प्राप्ति होनी चाहिये—यह संकल्प नहीं है; यह तो आवश्यक तत्त्व है, मनुष्य जन्मका असली प्रयोजन है । संसारकी घटना ऐसी होनी चाहिये, ऐसी नहीं होनी चाहिये; ऐसी परिस्थिति आनी चाहिये, ऐसी परिस्थिति नहीं आनी चाहिये—यह जो चीज है न; यह संकल्प है । हमें मनुष्य-शरीर मिला है, वह परिस्थितिके लिये नहीं मिला है, प्रत्युत परिस्थितियोंसे अतीत तत्त्वको प्राप्त करनेके लिये मिला है । परिस्थितियोंसे अतीत जो तत्त्व है, वह किसी अवस्थाके अधीन नहीं है, किसी योग्यताके अधीन नहीं है, किसी विशेष व्यक्तिके अधीन नहीं है । वह स्वाधीन तत्त्व है । स्वाधीन तत्त्वकी प्राप्ति स्वाधीनतापूर्वक होती है । इसमें पराधीन नहीं रहना पडता । परन्तु संकल्प स्वाधीनतापूर्वक होता ही नहीं । हम भोग चाहते हैं, मान चाहते हैं, आदर चाहते हैं, आराम चाहते है, जीना चाहते हैं, लाभ चाहते हैं—यह परतन्त्र हैं, स्वतन्त्र नहीं है । इसकी पूर्तिमें परतन्त्रता रहेगी ही, स्वतन्त्रता हो ही नहीं सकती ।

संकल्पोंका कायदा यह है कि कई संकल्प पूरे होते हैं और कई पूरे नहीं होते । यह सबका अनुभव है । संकल्पोंका पूरा होना अथवा न होना हमारे अधीन नहीं है, भगवान् के विधानके अधीन है । हम अभिमान कर लेते हैं कि हमने इतना धन कमा लिया, हमारे इतने बेटा-पोता हैं, हमारे इतने श्रोता हैं आदि । परन्तु ये हमारे अधीन नहीं हैं । अगर संकल्पोंकी पूर्ति हमारे अधीन हो, तो फिर कोई संकल्प अधूरा रहना ही नहीं चाहिये, सभी संकल्प पूरे होने चाहिये । भगवान् का एक विधान है, उस विधानसे ही ये पूरे होते हैं । मनुष्यका काम है उस विधानका आदर करना । वह भगवान् के विधानका आदर करेगा तो उसका कल्याण हो जायगा । उसने भगवान् के विधानको स्वीकार कर लिया तो अब उसके कल्याणमें बाधा देनेवाला कोई है ही नहीं । उसका कभी अहित होता ही नहीं, सदा हित-ही-हित होता है । अतः अपना संकल्प न रखें ।

(शेष आगेके ब्लॉगमें)
—‘साधन-सुधा-सिन्धु’ पुस्तकसे

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।। श्रीहरिः ।।


कल्याणका सुगम उपाय
अपनी मनचाहीका त्याग-३

(गत् ब्लॉगसे आगेका)
हमारा मनचाहा होता है तो अभिमान आता है और मनचाहा नहीं होता है तो क्रोध आता है । अभिमान और क्रोध—दोनों ही आसुरी सम्पत्ति हैं । अतः अपना संकल्प रखनेवाला आसुरी सम्पत्तिसे बच नहीं सकता । आसुरी सम्पति बाँधनेवाली, जन्ममरणको देनेवाली है‘निबन्धायासुरी मता’ (गीता १६/५) । अपना संकल्प नहीं रखे तो आसुरी सम्पत्ति आ ही नहीं सकती ।

मुक्ति जितनी सीधी-सरल है, उतना सरल कोई काम नहीं है ही नहीं । कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग—सभी सरल हैं । कठिनता अपनी रुचिकी पूर्ति करनेमें है । इसके सिवाय और क्या कठिनता है ? बताओ । जितनी कठिनता आती है, वह इसीमें आती है, वह इसीमें आती है कि हमारी मनचाही बात हो जाय ।

अर्जुनने पूछा कि मनुष्य न चाहता हुआ भी पाप क्यों करता है ? तो भगवान् ने उत्तर दिया ‘काम एष’ (गीता ३/३७) अर्थात् कामना । कामना क्या ? मेरी मनचाही हो जाय—यही मूलमें कामना है । मेरेको व्याख्यान देते हुए भी वर्षोंके बाद यह बात मिली तो बड़ी प्रसन्नता हुई कि जड़ तो आज ही मिली है ! मनकी बात पूरी होनेमें स्वतन्त्रता मानते हैं, पर है महान परतन्त्रता;क्योंकि यह दूसरेके अधीन है । दूसरा हमारी बात पूरी करे—यह हमारे अधीन है क्या ? मुफ्तमें कोरी पराधीनता लेना है, और ‘पराधीन सपनेहुँ सुखु नाहीं’ (मानस १/१०२/३) ।

श्रोता—महाराजजी ! अपनी बात सत्य प्रतीत हो, न्यायके अनुकूल प्रतीत हो, तो उसपर अडिग रहे या न रहे ?
स्वामीजी—अगर वह दूसरोंके अधीन है तो उसमें अडिग मत रहो । हमारी बात सत्य है, न्याययुक्त है, कल्याणकारी है, वर्तमानमें और परिणाममें हित करनेवाली है, तो उस बातका हम अनुष्ठान करें । परंतु दूसरा भी वैसा ही करे—यह बिलकुल गलत है । इसमें हमारा अधिकार नहीं है ।

श्रोता—यह परिवारमें सब एक-दूसरेसे जुड़े रहते हैं । हमारी बात दूसरा नहीं मानेगा तो उसका बुरा असर सबपर पड़ेगा ।
स्वामीजी—वे न करें तो उनको दुःख पाना पड़ेगा । परन्तु उसमें हमारेको दोष नहीं लगेगा । हम अपनी ठीक बात कह दें, वे मान लें तो खुशीकी बात, न माने तो बहुत खुशीकी बात । ये दो बातें याद कर लो । न्याययुक्त, हितकी, कल्याणकारी बात है और उसको स्त्री, पुत्र, पोता, भतीजा आदि मान लें तो अच्छी बात, न मानें तो बहुत अच्छी बात । बहुत अच्छी बात कैसे हुई ? कि हम फँसेंगे नहीं । अगर वे हमारी बात मानते रहेंगे तो हम फँस जायँगे । मैंने तो यहाँ कलकत्तेमें कई वर्षों पहले कह दिया था कि आप मेरा कहना मानते तो मैं फँस जाता । यहाँसे बाहर जा ही नहीं सकता । पर आप कहना नहीं मानते हैं तो यह आपकी कृपा है, मैं खुला रहता हूँ । जो हमारा कहना मानता है, उसके वशमें होना ही पड़ेगा, पराधीनता भोगनी ही पड़ेगी । लोग घर छोडकर साधु-संन्यासी होते हैं, आप घरमें रहते हुए ही साधु-संन्यासी हो गये; क्योंकि घरवाले आपकी बात मानते ही नहीं । फिर भी जिसमें हमारा, दूसरोंका, सबका हित हो, यह बात कहनी है, चाहे दूसरा माने या न माने ।
—‘साधन-सुधा-सिन्धु’पुस्तकसे
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।। श्रीहरिः ।।

कल्याणका सुगम उपाय
अपनी मनचाहीका त्याग-२

(गत् ब्लॉगसे आगेका)
जब जेलमें व्याख्यान देनेका काम पड़ा तो कैदीयोंको मैंने कहा कि आपने जो काम किये हैं, वे स्वतंत्रतासे,अपनी रुचिसे किये हैं, पर जेल पराधीनतासे, बिना रुचिके भोगते हैं । तो दुनियामें सब आदमी कैदी हैं । वे अपनी मरजीसे काम करते है और उसका फल पराधीन होकर भोगते हैं । नरक और चौरासी लाख योनियों—यह कैदखाना है । यह कैदखाना क्यों मिलता है ? कि अपनी मनचाही चलाना चाहते हैं । मनमानी होगी कि नहीं होगी—इसमें तो सन्देह है, पर कैद होगी, दुःख भोगना पड़ेगा—इसमें सन्देह नहीं है । इसलिये अगर आप कर सकें तो कुटुम्बियोंके मनकी बात करें । उनकी बात न्याययुक्त हो; शास्त्र, व्यवहार आदिकी दृष्टिसे अनुचित न हो और हमारी सामर्थ्यके अनुसार हो, तो उसे पूरी कर दो । इससे बहुत विशेष लाभ होगा । कल्याण हो जायगा, उद्धार हो जायगा ! परन्तु उनके अन्यायकी बात पूरी नहीं करनी है; क्योंकि ऐसा करनेमें उनका नुकसान है, फायदा नहीं है । उसका हित भी साथमें चाहिये ।

एक सुनी हुई बात है । सच्ची-झूठी तो रामजी जाने, सुनी हुई जरुर है । एक सन्त थे, चुपचाप रहते और उनसे कोई काम कराता तो वह कर देते । यहाँतक कि स्त्रियाँ गारा तैयार करके दे देतीं और कहतीं बाबाजी, आप लीप दो, तो वे लीप देते । उनका पानीका घड़ा उठवा देते, घर पहुँचा देते, झाड़ू लगा देते । जो कहतीं वह कर देते । दूसरा खिला दे तो खिला दे, नहीं तो उसकी मरजी । एक स्त्रीकी सन्तान नहीं थी । उसने बाबाजीकी बहुत सेवा की । उसने खिलाया तो अच्छी तरहसे खा लिया, कपड़ा पहनाया तो कपड़ा पहन लिया । वे आरामसे रहने लगे । कुछ दिनोंके बाद उसने अपनी शय्या बिछा दी और इच्छा प्रकट की कि मेरी सन्तान हो जाय । बाबाजीने कह दिया—‘ना’ । वह बोली कि आप तो जैसा कहें, वैसा करते हो । बाबाजी बोलते नहीं थे, पर बोल दिये—‘बस, यहाँतक ही ।’ मतलब यह कि यहाँतक ही करता हूँ, इससे आगे नहीं, व्यभिचारतक नहीं । ऐसा कहकर बाबाजी वहाँसे चल दिए । अतः वहींतक करना है, जहाँतक उचित होता है । जहाँ अनुचित होता है, वहाँ कह दिया कि नहीं, यहाँतक ही करता हूँ । जिसमें अपना सुख-भोग हो और दूसरेका अहित हो, वह काम नहीं करना है ।

गीता कहती है—‘सर्वसंकल्पसन्न्यासी योगरुस्तदोच्यते ।।’ (गीता ६/४) अर्थात् अपने सम्पूर्ण संकल्पोंका त्याग करनेवाला योगी होता है । परन्तु अपने संकल्पोंका त्याग न करनेवाला ज्ञानयोगी,भक्तियोगी, कर्मयोगी, हठयोगी, तपयोगी, राजयोगी आदि कोई-सा भी योगी नहीं होता—‘न ह्यसन्न्यस्तसंकल्पो योगी भवति कश्चन ।’ (गीता६/२) अगर दूसरोंके संकल्पको पूरा करना सीख जायँ तो अपने संकल्पोंका त्याग सुगमतासे हो जायगा । मेरे मनमें तो यही आया कि सुनानेवालोंके मनकी बात कहनी चाहिये, जिससे उनका भी कल्याण हो, मेरा भी कल्याण हो और कोई तीसरा आदमी सुने तो उसका भी कल्याण हो । अतः सबके साथ अपना दिनभरका, रात्रिभरका व्यवहार ऐसा ही हो । इससे आप सिद्ध हो जाओगे, योगारूढ़ हो जाओगे । यह बात कठीन भी नहीं है । पहले अपनी बात रखनेकी आदतके कारण यह कुछ समय कठिन मालूम देती है, फिर सुगम हो जाती है । अपने अभिमानके कारण कठिन दीखती है, वास्तवमें कठिन नहीं है । इसे सब कर सकते हैं; गृहस्थ, साधु, भाई, बहन, हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, पारसी आदि कोई क्यों न हो ।

(शेष आगेके ब्लॉगमें)
—‘साधन-सुधा-सिन्धु’पुस्तकसे
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