जो केवल संसारका काम-धंधा करने और पशुओंकी तरह खाने-पीने, सोने
आदिमें ही लगे रहते हैं, ऐसे सामान्य मनुष्योंको भगवान्ने ‘जन्तु’ कहा
है (५ । १५) । जिनकी न भगवान्पर श्रद्धा है,
न शास्त्रोंपर श्रद्धा है, न धर्मपर श्रद्धा है, न सकाम अनुष्ठानोंपर श्रद्धा है और न परलोकपर ही श्रद्धा है,
ऐसे मनुष्य केवल शरीर-पोषणमें ही लगे रहते हैं । वे झूठ-कपट,
चोरी-डकैती, अन्याय-अत्याचार आदि करके अपने शरीरका,
प्राणोंका पोषण करते हैं, जिसके फलस्वरूप वे चौरासी लाख योनियों एवं नरकोंमें जाते हैं
(१६ । ७‒२०) । स्वभावके भेदसे ऐसे मनुष्योंकी
तीन श्रेणियाँ होती हैं‒आसुरी, राक्षसी और मोहिनी (९ । १२) । जो केवल
स्वाद-शौकीनी, सुख-आराम, खेल-तमाशा, संग्रह करना, भोग भोगना आदिमें ही लगे
रहते हैं, वे
‘आसुरी’ श्रेणीमें आते हैं । जो अपने स्वार्थके लिये क्रोधपूर्वक
दूसरोंको दुःख देते हैं, दूसरोंको मार देते हैं, पशु-पक्षियोंको
मारकर खा जाते हैं, वे ‘राक्षसी’ श्रेणीमें
आते हैं । जो बिना कारण दूसरोंको दुःख देते हैं,
सोते हुए कुत्तेको पत्थर या लाठी मारकर राजी होते
हैं, नदी आदिमें पत्थर फेंककर राजी होते हैं, पशुओंकी तरह चिल्लाने लग जाते हैं, वे
‘मोहिनी’ श्रेणीमें आते हैं । इन तीनों श्रेणियोंमें एक-एक बातकी प्रधानता रहती है;
जैसे‒आसुरी श्रेणीमें स्वार्थकी प्रधानता रहती है, पर साथमें
क्रोध और मूढ़ता भी रहती है । राक्षसी श्रेणीमें क्रोधकी प्रधानता रहती है,
पर साथमें स्वार्थ और मूढ़ता भी रहती है । मोहिनी श्रेणीमें मूढ़ताकी
प्रधानता रहती है, पर साथमें स्वार्थ और क्रोध भी रहता है । इस प्रकार तीनों श्रेणियोंमें
तीनों बातें रहते हुए भी एक-एक बातकी प्रधानता रहती है;
जैसे‒ व्यक्तिगत स्वार्थके लिये लोभमें आकर राजकीय कर्मचारी देशका,
नौकर मालिकका, व्यक्ति समाजका बहुत नुकसान कर देता है‒यह ‘आसुरीमें राक्षसी’
है; और स्वार्थसे अन्धे होनेके कारण देश, समाज, कुटुम्ब आदिका कितना
अहित हो रहा है, इस तरफ मनुष्यका ख्याल ही नहीं जाता‒यह ‘आसुरीमें मोहिनी’
है । भोग भोगना और रुपये आदिका संग्रह करना‒यह ‘राक्षसीमें आसुरी’
है; और भोगोंमें, संग्रहमें, ऐश-आराममें मनुष्य इतना तन्मय हो जाता है कि हमारे देशकी क्या
दशा होगी, मरनेके बाद हमारी क्या दशा होगी, इस तरफ उसका ख्याल ही नहीं जाता‒यह ‘राक्षसीमें
मोहिनी’ है । ऐश-आराम, भोग, संग्रह करनेकी इच्छा रखना‒यह ‘मोहिनीमें आसुरी’
है; और क्रूरतापूर्वक दूसरोंका नुकसान कर देना‒यह ‘मोहिनीमें राक्षसी’
है ।
भगवान्ने मनुष्यको इतना अधिकार दिया है, ऐसा
विलक्षण विवेक दिया है, जिससे वह प्राणिमात्रकी सेवा कर सकता है, अपना
और दूसरोंका कल्याण कर सकता है, सबको शान्ति प्रदान कर सकता है, सबका
पूजनीय बन सकता है और भगवान्को भी अपना दास बना सकता है ! परन्तु कामनाके वशीभूत होकर
यह जन्म-मरणके चक्करमें चला जाता है, झूठ, कपट, बेईमानी, धोखेबाजी, अन्याय
आदि करके यह पशु-पक्षी आदि नीच योनियोंमें और नरकोंमें चला जाता है‒यह कितने दुःखकी
बात है ! अतः मनुष्यशरीर पाकर परमात्मतत्त्वका अनुभव कर लेना चाहिये, भगवत्प्रेमकी
प्राप्ति, भगवद्दर्शन कर लेना चाहिये, इसीमें मनुष्यजन्मकी सफलता है । |
कर्मयोगी साधक केवल लोकसंग्रहके लिये, कर्तव्य परम्पराको सुरक्षित
रखनेके लिये निष्कामभावसे अपने कर्तव्यका तत्परतासे पालन करता है अर्थात् अपने लिये
कर्म न करके केवल दूसरोंके हितके लिये ही सब कर्म करता है (३ । ९) । सिद्ध कर्मयोगीकी अपने स्वरूपमें ही रति,
तृप्ति और सन्तुष्टि रहती है । उसको न तो कर्म करनेसे मतलब रहता
है और न कर्म न करनेसे ही मतलब रहता है । उसका किसी भी प्राणीके साथ स्वार्थका सम्बन्ध
नहीं रहता (३ । १७-१८) । उसकी सम्पूर्ण पदार्थ, प्राणी आदिमें समबुद्धि रहती है (६ । ८-९) । ध्यानयोगी साधक सम्पूर्ण इन्द्रियोंका संयम करके और एकान्तमें
रहकर सगुण-साकारका, अपने स्वरूपका अथवा निर्गुण-निराकारका ध्यान करता है (६ । १०-२८)
। सगुण-साकारके ध्यानसे सिद्ध हुआ ध्यानयोगी ‘सबमें भगवान् हैं
और सभी भगवान्में हैं’‒ऐसा अनुभव करता है । फिर वह सब काम करते हुए भी भगवान्में ही
स्थित रहता है (६ । ३०-३१) । अपने स्वरूपके ध्यानसे सिद्ध हुआ ध्यानयोगी अपने-आपको
सम्पूर्ण प्राणियोंमें और सम्पूर्ण प्राणियोंको अपने-आपमें देखता है;
अतः वह सर्वत्र समबुद्धिवाला होता है (६ । २९) । निर्गुण-निराकारके
ध्यानसे सिद्ध हुआ ध्यानयोगी अपने शरीरकी उपमासे सम्पूर्ण प्राणियोंमें तथा उनके सुख-दुःखमें
अपनेको समान देखता है (६ । ३२) । तात्पर्य है जैसे कि साधारण
मनुष्यकी अपने शरीरकी पीड़ाको दूर करके उसको सुख पहुँचानेकी स्वाभाविक चेष्टा होती है, ऐसे
ही उस ज्ञानी महापुरुषकी दूसरेका दुःख दूर करके उसको सुख पहुँचानेकी स्वाभाविक चेष्टा
होती है । ज्ञानयोगी, कर्मयोगी, ध्यानयोगी आदि साधकोंकी अन्तसमयमें किसी कारणसे अपने साधनमें
स्थिति नहीं रहे, वे अपने साधनसे विचलित हो जायँ तो वे योगभ्रष्ट हो जाते है ।
ऐसे योगभ्रष्ट दो प्रकारके होते हैं‒सांसारिक वासनारहित और सांसारिक वासनासहित । साधन
करते हुए जिसकी सांसारिक वासनाएँ नहीं रही हैं, वह साधक अन्तसमयमें किसी विशेष कारणसे अपने साधनसे विचलित हो
जाय तो वह स्वर्गादि ऊँचे लोकोंमें न जाकर सीधे ही ज्ञानवान् योगियोंके कुलमें जन्म
लेता है और वहाँ पुनः साधनमें तत्परतासे लगकर सिद्धिको प्राप्त कर लेता है (६ । ४२-४३)
। परन्तु साधन करते हुए भी जिसकी सांसारिक भोगोंकी वासनाएँ सर्वथा नहीं मिटी है,
वह साधक अन्तकालमें किसी वासना आदिके कारणसे अपने साधनसे विचलित
हो जाय तो वह स्वर्गादि ऊँचे लोकोंमें जाता है । वहाँ बहुत वर्षोंतक रहकर फिर वह शुद्ध
श्रीमानोंके घरमें जन्म लेता है । वहाँ भोगोंकी बहुलताके कारण भोगोंके परवश होनेपर
भी पहले मनुष्यजन्ममें किया हुआ साधन उसको पारमार्थिक मार्गमें खींच लेता है और वह
लगनपूर्वक साधन करके परमगतिको प्राप्त हो जाता है (६ । ४१, ४४-४५) ।
जिनका भगवान्पर, पारमार्थिक साधनोंपर श्रद्धा-विश्वास नहीं है,
प्रत्युत शास्त्रोक्त, वेदोक्त सकाम अनुष्ठानोंपर श्रद्धा-विश्वास है,
वे देवताओंकी उपासना करते हैं और मरनेके बाद अपने-अपने शुभ-कर्मोंके
अनुसार स्वर्गादि लोकोंमें जाकर वहाँका सुख भोगते हैं । पुण्य समाप्त हो जानेपर वे
फिर मृत्युलोकमें लौटकर आते हैं (८ । २५; ९ । २०-२१) । |
स्थितिभावानुसारेण
विभिन्नाः सन्ति मानवाः । तेषु भवन्ति ते धन्याः प्राप्तिं कुर्वन्ति ये हरेः ॥ श्रीमद्भगवद्गीताका अध्ययन, मनन करनेसे यह बात देखनेमें आती है कि मनुष्योंकी जैसी स्थिति
है,
भाव है, मान्यताएँ हैं, आचरण हैं, उनके अनुसार ही मनुष्योंकी अलग-अलग श्रेणियाँ हो जाती
हैं अर्थात् मनुष्यजातिके (एक होते हुए भी) स्थिति, भाव साधन-पद्धति आदिके अनुसार अनेक भेद हो जाते है;
जैसे‒ भगवान्ने पूर्वजन्मके गुणों और कर्मोंके अनुसार ब्राह्मण, क्षत्रिय,
वैश्य और शूद्र‒इन चारों वर्णोंकी रचना करके इन चारों वर्णोंके अन्तर्गत ही सभी मनुष्योंको
माना है (४ । १३) तथा स्वभावसे उत्पन्न हुए गुणोंके अनुसार चारों वर्णोंके मनुष्योंके
नियत कर्मोंका विधान किया है (१८ । ४१-४४) । उन मनुष्योंमेंसे जो अपने कल्याणके लिये
भगवान्का आश्रय लेते हैं, उनके आचरणोंके अनुसार भगवान्ने अपनी भक्तिके सात अधिकारी बताये
हैं‒ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, स्त्रियाँ, पापयोनि और दुराचारी (९ । ३०-३३) । ये सातों अधिकारी किन-किन भावोंसे
भगवान्का भजन करते हैं, उन भावोंके चार भेद करके भगवान्ने भक्तोंकी चार श्रेणियाँ बतायी
हैं‒अर्थार्थी, आर्त, जिज्ञासु और ज्ञानी अर्थात् प्रेमी (७ । १६) । धन-सम्पत्ति, पद-अधिकार, जमीन-जायदाद
आदि सांसारिक वैभवके लिये जो भगवान्का भजन करते हैं, वे ‘अर्थाथी’ भक्त हैं । सांसारिक दुःख दूर करनेके लिये जो भगवान्को आर्तभावसे
पुकारते हैं, वे ‘आर्त’ भक्त हैं । भगवान्से ही अपने स्वरूपको, परमात्मतत्त्वको जाननेके
लिये जो भगवान्का भजन करते हैं, वे ‘जिज्ञासु’ भक्त हैं । जो केवल भगवान्में प्रेम करना चाहते हैं,
भगवान्को सुख देना चाहते हैं,
भगवान्की सेवा करना चाहते हैं,
वे ‘ज्ञानी’ (प्रेमी) भक्त हैं । इन चारों प्रकारके
भक्तोंको भगवान्ने उदार कहा है; क्योंकि ये जो कुछ भी चाहते हैं, वह भगवान्से ही
चाहते हैं, संसारसे नहीं । ज्ञानी अर्थात् प्रेमी भक्तको तो भगवान्ने अपनी आत्मा (स्वरूप)
ही बताया है; क्योंकि उसकी भगवान्से कोई माँग नहीं है (७ । १८) । ऐसे प्रेमी भक्तको भगवान्ने
दुर्लभ बताया है‒‘स महात्मा सुदुर्लभः’ (७ ।
१९) और सर्वश्रेष्ठ बताया है‒‘स मे युक्ततमो मतः’ (६ । ४७) । ऐसा सिद्ध भक्त राग-द्वेष, हर्ष-शोक आदि विकारोंसे रहित,
अहंता-ममतासे रहित और शत्रु-मित्र,
मान-अपमान, सुख-दुःख आदिमें सम रहनेवाला होता है (१२ । १३‒१९) । ज्ञानयोगी साधक सत्-असत्के ज्ञान (विवेक)-के द्वारा अपने स्वरूपका
बोध चाहता है (२ । ११‒३०;
१३ । १९‒३४) और इसीमें अपना पुरुषार्थ मानता है ।
सिद्ध ज्ञानयोगी सत्त्व, रज और तम‒इन तीनों गुणोंकी वृत्तियोंके
आनेपर भी राग-द्वेष नहीं करता । गुण ही गुणोंमें बरत रहे हैं अर्थात् सम्पूर्ण क्रियाएँ
गुणोंमें ही हो रही हैं‒ऐसा समझकर अपने स्वरूपमें स्थित रहता है । वह सदा ही सुख-दुःखमें
सम रहता है तथा उसपर निन्दा-स्तुति, मान-अपमानका असर नहीं पड़ता (१४ । २२-२५) । |
(३) पशु-पक्षी आदिकी योनियोंसे आये प्राणी;
और (४) नरकोंसे
आये प्राणी‒पशु-पक्षी आदिकी
योनियोंमें तथा नरकोंमें गये हुए प्राणी कभी भगवान्की अहैतुकी कृपासे फिर मनुष्यलोकमें
आ जाते हैं । उनको भगवान् सम्पूर्ण जन्मोंका अन्त करनेवाला यह मनुष्यशरीर
देकर पूरी स्वतन्त्रता देते हैं कि वे चाहे जो कुछ कर सकते हैं और चाहे जहाँ जा सकते
हैं । तात्पर्य है कि वे सकामभावसे शुभकर्म करके स्वर्गादि लोकोंमें जा सकते हैं (२
। ४२-४३; ७ । २०-२२; ९ । २०) अथवा अशुभ (पाप) कर्म करके चौरासी लाख योनियों तथा नरकोंमें
जा सकते हैं (१६ । १६, १९-२०) अथवा विवेक-विचारके द्वारा जड़तासे सम्बन्ध-विच्छेद करके
मुक्त हो सकते हैं (१३ । ३४) अथवा निष्कामभावपूर्वक अपने कर्तव्य-कर्मका पालन करके
परमात्मतत्त्वको प्राप्त हो सकते हैं (२ । ५१; ५ । १२) अथवा भगवान्की शरण होकर भगवान्को
प्राप्त हो सकते हैं (१८ । ५६); इतना ही नहीं,
भगवान् स्वयं उनका संसार-सागरसे उद्धार करनेवाले बन जाते हैं
(१२ । ७)[*] । तात्पर्य यह हुआ कि मनुष्य-जन्ममें जितने भी जीव आते हैं,
वे सभी अपना उद्धार अथवा पतन करनेमें स्वतन्त्र हैं,
परतन्त्र नहीं हैं । (५) भगवत्प्राप्त महापुरुष‒जो जीव भगवान्को प्राप्त हो गये हैं,
भगवद्धाममें गये हैं, वे भी भगवान्की इच्छासे अन्य जीवोंका उद्धार करनेके लिये कारकपुरुषके
रूपमें इस मनुष्यलोकमें आते हैं । उनका मनुष्यलोकमें जन्म लेना कर्मोंके परवश नहीं
होता । वे स्वयं श्रेष्ठ आचरण करके लोगोंको अच्छे कर्मोंमें लगाते हैं अथवा अपने वचनोंके
द्वारा लोगोंको सही रास्ता बताते हैं (३ । २१) । इस प्रकार अपना कार्य पूरा करके वे
फिर भगवान्के पास चले जाते हैं । (६) भगवान्के नित्य परिकर‒जब भगवान् साधु पुरुषोंकी रक्षा,
दुष्टोंका विनाश और धर्मकी स्थापना करनेके लिये मनुष्यलोकमें
आते हैं (४ । ८), तब भगवद्धाममें रहनेवाले भगवान्के नित्य परिकर (पार्षद) भी भगवान्के
साथ उनके सखा आदिके रूपमें इस मनुष्यलोकमें आते हैं । वे यहाँ भगवान्के साथ ही रहते
हैं,
खाते-पीते हैं, खेलते हैं, उनको सुख पहुँचाते हैं । जब भगवान् अपने अवतारकी लीला समाप्त
करते हैं और अन्तर्धान हो जाते हैं, तब वे पार्षद भी शरीर छोड़कर उनके साथ भगवद्धाममें चले जाते
हैं ।
[*] (क) भगवान्ने कृपा करके जीवको शुभकर्मोंका फल भुगताकर,
शुद्ध करके अपनी गोदमें लेनेके लिये स्वर्गादि लोकोंकी रचना
की,
अशुभकर्मोंका फल भुगताकर, शुद्ध करके अपनी गोदमें लेनेके लिये चौरासी लाख योनियों और नरकोंकी
रचना की,
और अनुकूलता-प्रतिकूलताके द्वारा शुभ-अशुभ कर्मोंको समाप्त करके
अपनी गोदमें लेनेके लिये मनुष्ययोनिकी रचना की । मनुष्ययोनिमें भगवान्ने जीवको अपनी
प्राप्तिकी, जन्म-मरणसे मुक्त होनेकी पूरी स्वतन्त्रता दी है मनुष्ययोनिमें यह जीव
जीते-जी भगवान्को प्राप्त कर सकता है और जीते-जी होश न आये तो अन्तसमयमें भी भगवान्को
याद करके उन्हें प्राप्त कर सकता है (८ । ५) । (ख) इस मनुष्यलोकमें जीवोंका जहाँ-कहीं,
जिस-किसी योनिमें जन्म होता है, वह प्रायः ऋणानुबन्ध (लेन-देनके
सम्बन्ध)-से ही होता है । तात्पर्य यह है कि किसीसे लेनेके लिये और किसीकी देनेके लिये
आपसके सम्बन्धको लेकर ही सम्पूर्ण जीवोंका जन्म होता है । मनुष्य केवल दूसरों हितके
लिये कर्तव्य-कर्म करके शुभ-अशुभ कर्मोंसे अर्थात् ऋणानुबन्धसे मुक्त हो सकता है
(४ । २३) अथवा सत्-असत्के विवेकद्वारा अपने स्वरूपमें स्थित होकर सम्पूर्ण पापोंसे
अर्थात् ऋणानुबन्धसे मुक्त हो सकता है (४ । ३६) अथवा भगवान्की शरण होकर सम्पूर्ण
पापोंसे अर्थात् ऋणानुबन्धसे मुक्त हो सकता है (१८ । ६६) । इस ऋणानुबन्धसे मुक्त होनेके
लिये मनुष्यके सिवाय दूसरे प्राणी असमर्थ हैं, क्योंकि उनमें इसकी योग्यता नहीं है और अधिकार भी नहीं है;
परतु मनुष्य इसमें सर्वथा स्वतन्त्र है,
सबल है । |




