।। श्रीहरिः ।।

                                      


आजकी शुभ तिथि–
  कार्तिक अमाव्या, वि.सं.-२०७८, गुरुवार
                             दीपावली

भगवत्प्राप्तिके लिये 

भविष्यकी अपेक्षा नहीं



दीपावली पर्वपर सबके लिये शुभकामना कि हमारा जीवन भगवान्‌के प्रेमसे जगमगा उठें !

हम जैसा चाहते हैं, वैसे ही भगवान्‌ हमें मिलते हैं । दो भक्त थे । एक भगवान्‌ श्रीरामका भक्त था, दूसरा भगवान्‌ श्रीकृष्णका । दोनों अपने-अपने भगवान्‌ (इष्टदेव)-को श्रेष्ठ बतलाते थे । एक बार वे जंगलमें गये । वहाँ दोनों भक्त अपने-अपने भगवान्‌को पुकारने लगे । उनका भाव यह था कि दोनोंमेंसे जो भगवान्‌ शीघ्र आ जाय, वही श्रेष्ठ है । भगवान्‌ श्रीकृष्ण शीघ्र प्रकट हो गये । इससे उनके भक्तने उन्हें श्रेष्ठ बतला दिया । थोड़ी देरमें भगवान्‌ श्रीराम प्रकट हो गये । इसपर उनके भक्तने कहा कि आपने मुझे हरा दिया; भगवान्‌ श्रीकृष्ण तो पहले आ गये, पर आप देरसे आये जिससे मेरा अपमान हो गया ! भगवान्‌ श्रीरामने अपने भक्तसे पूछा‒‘तूने मुझे किस रूपमें याद किया था ?’ भक्त बोला‒‘राजाधिराजके रूपमें ।’ तब भगवान्‌ श्रीराम बोले‒‘बिना सवारीके राजाधिराज कैसे आ जायँगे !’ कृष्ण-भक्तसे पूछा गया तो उसने कहा‒‘मैंने तो अपने भगवान्‌को गौ चरानेवालेके रूपमें याद किया था कि वे यहीं जंगलमें गाय चराते होंगे ।’ इसीलिये वे पुकारते ही तुरन्त प्रकट हो गये ।

दुःशासनके द्वारा भरी सभामें चीर खींचे जानेके कारण द्रौपदीने ‘द्वारकावासिन् कृष्ण’ कहकर भगवान्‌को पुकारा, तो भगवान्‌के आनेमें थोड़ी देर लगी । इसपर भगवान्‌ने द्रौपदीसे कहा कि तूने मुझे ‘द्वारकावासिन्’ (अर्थात्‌ द्वारकामें रहनेवाले) कहकर पुकारा, इसलिये मुझे द्वारका जाकर फिर वहाँसे आना पड़ा । यदि तू कहती कि यहींसे आ जाओ तो मैं यहींसे प्रकट हो जाता ।

भगवान्‌ सब जगह हैं । जहाँ हम हैं, वहीं भगवान्‌ भी हैं । भक्त जहाँसे भगवान्‌को बुलाता है, वहींसे भगवान्‌ आते हैं । भक्तिकी भावनाके अनुसार ही भगवान्‌ प्रकट होते हैं ।

जाके हृदयँ भगति जसि प्रीती ।

प्रभु तहँ प्रगट सदा तेहिं रीती ॥

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हरि ब्यापक सर्वत्र समाना ।

प्रेम तें प्रगट होहिं मैं जाना ॥

देस काल दिसि बिदिसिहु माहीं ।

कहहु सो  कहाँ जहाँ  प्रभु नाहीं ॥

(मानस १/१८५/२-३)

जब भगवान्‌ श्रीकृष्ण गोपियोंके बीचसे अंतर्धान हो गये तो गोपियाँ पुकारने लगीं‒

दयित दृश्यतां दिक्षु तावकास्त्वयि

धृतासवस्त्वां             विचिन्वते ॥

(श्रीमद्भागवत १०/३१/१)

‘हे प्रिय ! तुममें प्राण समर्पित कर चुकनेवाली हम सब तुम्हारी गोपियाँ तुम्हें सब ओर ढूँढ़ रही हैं, अतएव अब तुम तुरन्त दिख जाओ ।’

गोपियोंकी पुकार सुनकर भगवान्‌ उनके बीचमें ही प्रकट हो गये‒

तासामाविरभूच्छौरिः स्मयमानमुखाम्बुजः ।

पीताम्बरधरः स्रग्वी  साक्षान्मन्मथमन्मथः ॥

(श्रीमद्भागवत १० । ३२ । २)

‘ठीक उसी समय उनके बीचोंबीच भगवान्‌ श्रीकृष्ण प्रकट हो गये । उनका मुखकमल मन्द-मन्द मुसकानसे खिला हुआ था, गलेमें वनमाला थी, पीताम्बर धारण किये हुए थे । उनका यह रूप क्या था, सबके मनको मथ डालनेवाले कामदेवके मनको भी मथनेवाला था ।’

इस प्रकार गोपियोंने ‘प्यारे ! दीख जाओ’ (दयित दृश्यताम्)‒ऐसा कहा तो भगवान्‌ वहीं दीख गये । यदि वे कहतीं कि कहींसे आ जाओ, तो भगवान्‌ वहींसे आते ।

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।। श्रीहरिः ।।

                                     


आजकी शुभ तिथि–
  कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी, वि.सं.-२०७८, बुधवार
                             

भगवत्प्राप्तिके लिये 

भविष्यकी अपेक्षा नहीं


स्वयं हमने ही भगवान्‌की प्राप्तिमें आड़ लगा रखी है कि वे वैरागी-त्यागी पुरुषोंको मिलते हैं, हम गृहस्थियोंको कैसे मिलेंगे ? वे जंगलमें रहनेवालोंको मिलते हैं, हम शहरमें रहनेवालोंको कैसे मिलेंगे ? कोई अच्छे गुरु नहीं मिलेंगे तो भगवान्‌ कैसे मिलेंगे ? कोई बढ़िया साधन नहीं करेंगे तो भगवान्‌ कैसे मिलेंगे ? आजकल भगवत्प्राप्तिका मार्ग बतलानेवाले कोई अच्छे महात्मा भी नहीं रहे तो हमें भगवान्‌ कैसे मिलेंगे ? हमारे भाग्यमें ही नहीं हैं तो भगवान्‌ कैसे मिलेंगे ? हम तो अधिकारी ही नहीं हैं तो भगवान्‌ कैसे मिलेंगे ? हमारे कर्म ही ऐसे नहीं हैं तो भगवान्‌ हमें कैसे मिलेंगे ?‒इस प्रकार न जाने कितनी आड़ें हमने स्वयं ही लगा रखी हैं । भगवान्‌को हमने इन आड़ोंके पहाड़ोंके ही नीचे दबा दिया है ! ऐसी स्थितिमें बेचारे भगवान्‌ क्या करें ? हमें कैसे मिलें ?

पार्वतीने ‘तप करके ही शिवजी हमें मिलेंगे’, ऐसा भाव रखकर स्वयं ही शिवजीकी प्राप्तिमें आड़ लगा दी थी; इसी कारण उन्हें तप करना पड़ा[*] । तपस्याका भाव भीतर रहनेके कारण तप करनेसे ही शिवजी मिले । इसी प्रकार भावके कारण ही ध्रुवको छः मासके तपके बाद भगवान्‌ मिले । भगवान्‌के मिलनेमें वस्तुतः कोई देर नहीं लगी । जिस समय ऐसा भाव हुआ कि अब मैं भगवान्‌के बिना रह नहीं सकता, उसी समय भगवान्‌ मिल गये ।

किसी योग्यताके बदलेमें भगवान्‌ मिलेंगे, यह बिलकुल गलत धारणा है । सिद्धान्त है कि किसी मूल्यके बदलेमें जो वस्तु प्राप्त होती है, वह वस्तुतः उस मूल्यसे कम मूल्यकी होती है । यदि दूकानदार किसी वस्तुको १०० रुपयेमें बेचता है तो निश्चय ही दूकानदारने उस वस्तुको १०० रुपयेसे कम मूल्यमें ख़रीदा होगा । इसी प्रकार यदि हम ऐसा मानते हैं कि विशेष योग्यता अथवा साधन, यज्ञ-दानादि बड़े-बड़े कर्मोंसे भगवान्‌ मिलते हैं तो भगवान्‌ उनसे कम मूल्यमें ही हुए ! परन्तु भगवान्‌ उनसे कम मूल्यके नहीं हैं[†], इसलिये वे किसी साधन-सम्पत्तिसे खरीदे नहीं जा सकते[‡] । यदि किसी मूल्यके बदलेमें भगवान्‌ मिलते हैं तो ऐसे भगवान्‌ मिलकर भी हमें क्या निहाल करेंगे ? क्योंकि उनसे बढ़िया (अधिक मूल्यकी) वस्तुएँ, योग्यता, तप-दानादि तो हमारे पास पहलेसे ही हैं !



[*] पार्वतीके मनमें पहले ही यह भाव हो गया था कि शिवजीकी प्राप्ति कठिन है‒

उपजेउ सिव पद कमल सनेहू । मिलन कठिन मन भा संदेहू ॥

(मानस १/६८/३)

बादमें देवर्षि नारदने कह दिया कि तप करनेसे ही शिवजी मिल सकते हैं‒

दुराराध्य  पै  अहहिं  महेसू ।  आसुतोष  पुनि  किएँ  कलेसू ॥

जौ तपु करै कुमारि तुम्हारी । भाविउ मेटि सकहिं त्रिपुरारी ॥

(१/७०/२-३)

माता-पितासे भी पार्वतीको तप करनेकी ही प्रेरणा मिली‒

अब जौं तुम्हहि सूता पर नेहू ।    तौं  अस जाइ सिखावनु देहू ॥

करै सो तपु जेहिं मिलहिं महेसू । आन उपायँ न मिटहि कलेसू ॥

(१/७२/१)

स्वप्नमें भी पार्वतीको तप करनेकी ही शिक्षा मिली‒

करहि जाइ तपु सैलकुमारी ।   नारद  कहा  सो  सत्य  बिचारी ॥

मातु पितहि पुनि यह मत भावा । तपु सुखप्रद दुख दोष नसावा ॥

(१/७३/१)

इन्हीं सब कारणोंसे पार्वतीके मनमें यह भाव दृढ़ हो गया कि तप करनेसे ही शिवजी मिलेंगे, अन्यथा नहीं ।

[†] न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्यो लोकत्रयेऽप्यप्रतिमप्रभाव ॥

(गीता ११/४३)

‘हे अनुपम प्रभाववाले ! तीनों लोकोंमें आपके समान भी दूसरा कोई नहीं हैं फिर अधिक तो कैसे हो सकता है ?’

[‡] नाहं वेदैर्न तपसा   दानेन  न चेज्यया ।

  शक्य एवंविधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा ॥

(गीता ११/५३)

‘हे अर्जुन ! जिस प्रकार तुमने मुझको देखा है, इस प्रकार चतुर्भुजरूपवाला मैं न वेदोंसे, न तपसे, न दानसे, न यज्ञसे ही देखा जा सकता हूँ ।’

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।। श्रीहरिः ।।

                                    


आजकी शुभ तिथि–
  कार्तिक कृष्ण द्वादशी, वि.सं.-२०७८, मंगलवार
                             
   भगवत्प्राप्तिके लिये भविष्यकी  
             अपेक्षा नहीं


एक बहुत मार्मिक बात है, जिसकी तरफ साधकोंका ध्यान बहुत कम है । यदि उसपर विशेष ध्यान दिया जाय तो जल्दी-से-जल्दी बहुत बड़ा लाभ हो सकता है ।

साधकोंके भीतर एक गलत धारणा दृढ़तासे जमी हुई है कि जैसे संसारका कोई काम करते-करते होता है, तत्काल नहीं होता; वैसे ही अर्थात्‌ उसी रीतिसे भगवान्‌की प्राप्ति भी साधन करते-करते होती है, तत्काल नहीं होती । ऐसी धारणा ही भगवत्प्राप्तिमें देर कर रही है । जैसे, यदि बालक माँके पीछे पड़ जाय कि मुझे तो अभी ही लड्डू दे तो लड्डू बना हुआ नहीं होनेपर माँ उसे तत्काल कैसे बनाकर दे देगी ? यद्यपि माँका बालकपर बड़ा स्नेह, बड़ा प्यार है; क्योंकि उसके लिये अपने बालकसे बढ़कर प्यारा और कौन है ? परन्तु फिर भी लड्डू बनानेमें समय तो लगेगा ही । ऐसे ही किसी स्थानपर जाना हो, किसी वस्तुका सुधार करना हो, किसी वस्तुको बदलना हो‒इन सबमें समयकी अपेक्षा है । तात्पर्य यह है कि सांसारिक वस्तुको प्राप्त करनेमें तो समय लगता है; परन्तु भगवान्‌को प्राप्त करनेमें समय नहीं लगता‒यह एक बहुत मार्मिक बात है ।

हम सब-के-सब परमात्मरूप कल्पवृक्षकी छायामें रहते हैं । इस कल्पवृक्षकी छायामें रहते हुए यदि हम ऐसा भाव रखते हैं कि बहुत साधन करनेपर भविष्यमें कभी भगवत्प्राप्ति होगी तो अपनी धारणाके अनुसार भगवान्‌ भविष्यमें ही कभी मिलेंगे । यदि हम ऐसा भाव बना लें कि भगवान्‌ तो अभी मिलेंगे तो वे अभी ही मिल जायँगे । भगवान्‌ने स्वयं कहा भी है‒

ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् ।

(गीता ४/११)

‘जो मुझे जिस प्रकार भजते हैं, मैं भी उनको उसी प्रकार भजता हूँ ।’

अतएव भगवान्‌की प्राप्तिमें भविष्य नहीं है । हमलोगोंकी भावनामें ही भविष्य है ।

इस विषयमें एक बात विशेष महत्त्वकी है कि संसारके जितने भी काम हैं, सब-के-सब बनने और बिगड़नेवाले हैं । बननेवाले काममें देर लगती है, परन्तु बने-बनाये (विद्यमान) काममें देर कैसे लग सकती है ? परमात्मा भी विद्यमान हैं और हम भी विद्यमान हैं । उनके और हमारे बीच देश-काल आदिका कोई भी व्यवधान नहीं है; फिर परमात्माकी प्राप्तिमें देर क्यों लगनी चाहिये ?

भगवान्‌ सब समयमें, सब देश (स्थान)-में, सब वस्तुओंमें तथा सब प्राणियोंमें विद्यमान हैं । समय, देश, वस्तु, प्राणी आदि सब-के-सब बदलनेवाले हैं अर्थात्‌ निरन्तर नहीं रहते । इसके विपरीत हम (स्वयं) भी निरन्तर रहनेवाले हैं और भगवान्‌ भी । ऐसे भगवान्‌को प्राप्त करनेके लिये हमने ऐसी धारणा बना ली है कि जब संसारका कोई साधारण काम भी शीघ्र नहीं होता, तब जो सबसे महान हैं, उन भगवान्‌की प्राप्तिका कार्य शीघ्र कैसे हो जायगा ? परन्तु वास्तवमें सबसे ऊँची वस्तु सबसे सहज-सुलभ भी होती है ! भगवान्‌ सबके लिये हैं और सबको प्राप्त हो सकते हैं ।

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।। श्रीहरिः ।।

                                   


आजकी शुभ तिथि–
  कार्तिक कृष्ण एकादशी, वि.सं.-२०७८, सोमवार
                             
            सत्संग सुननेकी विद्या


यदि श्रोतामें एकमात्र परमात्मप्राप्तिका उद्देश्य नहीं है और वह केवल सीखनेके लिये, सीखकर व्याख्यान देनेके लिये सत्संग सुनता है तो वह सत्संगको बुद्धिका विषय बनाता है और सीखे हुए ज्ञानको ही अनुभव मान लेता है । ऐसे (सीखनेके उद्देश्यसे सत्संग करनेवाले) श्रोतको सत्संगमें नयापन नहीं दीखता और वह कहता है कि इन बातोंको मैं जानता हूँ, इनको बार-बार सुननेसे क्या लाभ ? सीखे हुए ज्ञानसे श्रोता पण्डित, वक्ता, लेखक तो हो सकता है, पर वह तत्त्वज्ञ, जीवन्मुक्त, भगवत्प्रेमी नहीं हो सकता । वह दूसरोंको उनके प्रश्नोंका उत्तर दे सकता है, उनको ज्ञानकी बातें सीखा सकता है, पुस्तक लिख सकता है, पर तत्त्वका अनुभव नहीं कर सकता । कारण कि वाचिक ज्ञानी बननेसे उसमें ज्ञानका अभिमान पैदा हो जाता है । जैसे बहेड़ेकी छायामें कलियुग रहता है, ऐसे ही अभिमानकी छायामें सम्पूर्ण दोष और उनके कारण विद्यमान रहते हैं । परन्तु जो सच्चे हृदयसे परमात्मप्राप्ति करना चाहता है, वह तो अनुभवके लिये ही सुनता है, सीखनेके लिये नहीं । वह सत्संगको केवल बुद्धिका विषय ही नहीं बनाता, प्रत्युत साथ-साथ उसमें तल्लीन भी होता है ।

यद्यपि आध्यात्मिक पुस्तकें पढ़नेसे तथा प्रवचनोंकी कैसेट सुननेसे भी लाभ होता है, तथापि अनुभवी पुरुषके द्वारा सुननेसे बहुत अधिक विचित्र लाभ होता है । जिसने पहले प्रवचन सुना है, वह यदि उस प्रवचनकी कैसेट सुने तो उसपर जितना असर पड़ता है, उतना नये आदमीपर नहीं पड़ता । कारण कि जिसने पहले सत्संग सुना है, वह उसकी कैसेट सुनेगा तो वह सब-का-सब दृश्य उसके मनके सामने आ जायगा, जिससे एक विलक्षण असर पड़ेगा । इसी तरह सत्संग सुननेसे जितना असर पड़ता है, उतना पुस्तक पढ़नेसे नहीं पड़ता । कारण कि सत्संग सुननेसे वक्ताके नेत्र, हाथ आदिकी मुद्रा, उसके भाव, उसकी दृष्टिका श्रोतापर एक विलक्षण असर पड़ता है । सुननेमें तो सुनानेवालेकी बुद्धिकी प्रधानता रहती है, पर पुस्तक पढ़नेमें तथा कैसेट सुननेमें अपनी बुद्धिकी प्रधानता रहती है । अगर श्रोता वक्ताके विवेचनको ध्यानपूर्वक सुने तो उसकी बुद्धि वक्ताकी बुद्धिमें प्रविष्ट हो जाती है । श्रोता अपनी बुद्धिसे उतना नहीं समझ सकता, जितना सुनानेवालेकी बुद्धिसे समझ सकता है । अगर सुनानेवालेकी कृपादृष्टि हो जाय तो उससे बहुत विशेष लाभ होता है । जैसे गायका बछड़ा अपनी माँके स्तनोंसे दूध पीकर ही पुष्ट होता है । अगर बछड़ेकी माँ मर जाय और उसको दूसरी गायका दूध पिलाया जाय तो वह उतना पुष्ट नहीं होता । कारण कि स्तनपान करते समय गाय अपने बछड़ेको स्नेहपूर्वक चाटती है, हुँकार करती है तो उससे बछड़ेकी जैसी पुष्टि होती है, वैसी केवल दूध पीनेसे नहीं होती । ऐसे ही सन्त-महात्मा कृपा करके विशेषतासे कहें और सुननेवाला उनके सम्मुख होकर लगनपूर्वक सुने तो तत्काल तत्त्वकी प्राप्ति होती है ।

हरेक काममें भविष्य होता है, पर परमात्मतत्वमें भविष्य नहीं होता । परमात्माकी प्राप्ति धीरे-धीरे नहीं होती, प्रत्युत तत्काल होती है । सुनानेवाला अनुभवी पुरुष भी विद्यमान हो, सुननेवाला जिज्ञासु साधक भी विद्यमान हो और परमात्मतत्त्व तो विद्यमान है ही, फिर भविष्यका क्या काम ? देरी होनेका कोई कारण ही नहीं है ! परमात्मतत्व नित्य-निरन्तर सबमें विद्यमान है । सुनानेवालेने दृष्टि करायी और सुननेवालेने उसको जान लिया‒इसमें देरी किस बातकी ? बहुत-से भाई-बहनोंने ऐसी धारणा कर रखी है कि सुनते-सुनते, साधन करते-करते, धीरे-धीरे कभी परमात्माकी प्राप्ति होगी । परन्तु वास्तवमें सांसारिक काम ही ‘कभी’ होगा, पारमार्थिक काम ‘कभी’ नहीं होगा, वह तो ‘अभी’ ही होगा ।

जो वस्तु पैदा होनेवाली होती है, उसीकी प्राप्तिमें भविष्य होता है । जो पैदा होनेवाली नहीं है, प्रत्युत नित्य-निरन्तर रहनेवाली वस्तु (परमात्मतत्त्व) है, उसकी प्राप्तिमें भविष्य कैसे होगा ? सुननेकी भूख ही नहीं है, परमात्मतत्त्वकी तीव्र जिज्ञासा ही नहीं है, उसके लिये तड़पन ही नहीं है, उसके लिये व्याकुलता ही नहीं है, इसी कारण देरी हो रही है !

नारायण !     नारायण !!     नारायण !!!

‒‘जित देखूँ तित तू’ पुस्तकसे

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