।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि
श्रावण शुक्ल दशमी, वि.सं.२०७२, मंगलवार
एकादशी-व्रत कल है (सबका)
प्रवचन‒५


उत्पन्न होनेवाली प्रत्येक वस्तुके मूलमें उसका कोई कारण होता है । इस दृष्टिसे सम्पूर्ण सृष्टिका कोई एक मूल कारण है । परम्परासे विचार करें तो उत्पत्तिमात्रका कारण कोई एक अनुत्पन्न तत्त्व है । सम्पूर्ण संसारका जो ज्ञान होता है, वह ज्ञान किसी प्रकाशमें होता है । जैसे नेत्रोंसे जो कुछ भी दीखता है, वह प्रकाशमें ही दीखता है, ऐसे ही सम्पूर्ण सृष्टिका कोई प्रकाशक है, जिसके प्रकाशमें सृष्टिका ज्ञान होता है । तात्पर्य यह कि जिससे संसार उत्पन्न होता है और जिसके प्रकाशसे संसार प्रकाशित होता है, वह एक अनुत्पन्न और सर्वप्रकाशक तत्त्व (परमात्मा) है । उस तत्त्वका अनुभव करना ही साधकका एकमात्र उद्देश्य है ।

उत्पन्न होनेवाले और प्रकाशित होनेवाले जड़ पदार्थोमें ममता-आसक्ति करनेसे, उनका आश्रय लेनेसे ही मनुष्य दुःख पाता है । यदि मनुष्य उत्पन्न होनेवाले पदार्थोंमें ममता-आसक्ति न करे, उनका आश्रय न ले तो अनुत्पन्न परमात्मतत्त्वमें उसकी स्वतः स्थिति हो जायगी ।

वास्तवमें अनुत्पन्न तत्त्वमें मनुष्यमात्रकी स्वतःसिद्ध स्थिति है । कार्यमात्र कारणमें रहता है । कार्यके बिना कारण रह सकता है, पर कारणके बिना कार्य नहीं रह सकता । अतएव परमात्मतत्त्व संसारके होनेपर भी रहता है और न होनेपर भी रहता है; क्योंकि उसकी स्वतन्त्र सत्ता है । परंतु उत्पन्न और नष्ट होनेवाला संसार परमात्मतत्त्वकी सत्तापर ही टिका हुआ है अर्थात् उसकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है । इस संसारसे यदि हम अपना कोई सम्बन्ध न मानें, इसमें तादाक्य-ममता-कामना न करें तो हमें परमात्म-तत्त्वमें अपनी स्वाभाविक स्थितिका अनुभव हो जायगा । अनुभव होनेपर फिर दुःख, चिन्ता, भय, शोक, सन्ताप आदि कुछ नहीं रहेंगे; क्योंकि ये (दुःख आदि) परमात्मतत्त्वमें नहीं है ।

भगवान् कहते हैं‒‘ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः ।’ (गीता १५ । ७) अर्थात् इस देहमें यह जीवात्मा मेरा ही सनातन अंश है । वस्तुतः उत्पन्न और नष्ट होनेवाले संसारको पकड़नेके कारण ही यह ‘अंश’ कहलाता है । वस्तुतः यह अंश नहीं है । जैसे पिताके पास अरबों-खरबों रुपये है और पुत्र उसमेंसे एक लाख रुपये लेकर उन्हें अपना मान ले तो वह अपनेको उन एक लाख रुपयोंका मालिक समझता है, पर वास्तवमें वह उनका गुलाम बन जाता है । यदि वह एक लाख रुपयोंको अपना न माने तो वह स्वतः-स्वाभाविक अरबों-खरबों रुपयोंका मालिक है‒पिताकी पूरी सम्पत्तिका अधिकारी है । ऐसे ही उत्पन्न होनेवाली वस्तुका छोटा-सा टुकड़ा लेकर जीव उसमें फँस जाता है और दुःख पाता है । यदि वह ऐसा न करे तो आनन्दके समुद्रमें नित्य मग्न रहे । परंतु परमात्मासे विमुख होकर वह मुफ्तमें प्यासा मरता है‒

आनँद   सिंधु   मध्य तव बासा ।
बिनु जाने कस मरसि पियासा ॥
                                   (विनय-पत्रिका १३६ । २)

   (शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒‘साधकोंके प्रति’ पुस्तकसे

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।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि
श्रावण शुक्ल नवमी, वि.सं.२०७२, सोमवार
श्रावण सोमवार-व्रत
भगवान्से सम्बन्ध


(गत ब्लॉगसे आगेका)
हाँ ! भगवान्के यहाँ सम्बन्ध हो जाता है तब तो

भगवद्गीता किञ्चिदधीता गंगाजललवकणिका पीता ।
येनाकारि  मुरारेरर्चा   तस्य  यमः  किं  कुरुते  चर्चा ॥

उनकी चर्चा यमराज छोड़ देते हैं कि ये हमारे नहीं हैं । उधरके भागके हैं, बाकी तो यमराज सबको ले जाय ।

काल भक्ष सबको करे  हरि  शरणे  डरपन्त ।
नव ग्रह चौसठ जोगिनी बावन वीर बजन्त ॥

‘कालो यमो दण्डधरः’ वह ले जायगा सबको । अब उसमें जाना तो पड़ेगा । कोई नहीं चाहता, पर वहाँ जा रहे हैं सब लोग । एक-एक श्वासमें कहाँ जा रहे हैं ? मौतके पास जा रहे हैं । यह श्वास खर्च होता है । मौतके पास जा रहे हैं । प्रति श्वास वहाँ जा रहे हैं, जहाँ जाना नहीं चाहते । नहीं चाहते हो तो भाई ! भगवान्को याद करो । बिना भगवान्के कोई रक्षा करनेवाला नहीं है । सब मरनेवाले हैं, वे रक्षा कैसे करेंगे ?

काठ की ओटसे काठ बचे नहीं आग लगे तब दोऊँ कू जारे ।
स्याल की ओटसे स्याल बचे नहीं सिंह पड़े तब दोऊँ कू फारे
आनकी ओटसे जीव बचे नहीं ‘रज्जब’ वेद पुराण पुकारे ॥

सब कहते हैं भैया ! दूसरोंकी सहायतासे बच नहीं सकोगे । क्योंकि बेचारे वे सब मायाबस कालके कलेवा हैं । उनका सहारा लो तो वह भी जा रहा है । तुम्हारेको कैसे बचायेगा ? बचता वही है ।

काल डरे अण घड़ सूं भाई ता सूं संतां सुरत लगाई ।
ता मूरत पर राम दास बार बार बलि जाय काल डरे अणघड़ सूं भाई ॥

वह परमात्मा अनघड़ है । ‘अजातु न मातु न तातु निराकारं’ वह पैदा किया हुआ नहीं है, जाति नहीं है उसके, न माँ है, न बाप हैऐसा है । वह रहेगा एक और तो सब चले जायेंगे इस वास्ते उसका आश्रय लो । उसके आश्रयका सुगम-से-सुगम उपाय ठाकुरजी अवतार लेकर कर देते हैं ।

अब तुम जो कुछ करो तो हमारे साथ करो । राग करो, चाहे द्वेष करो । वैर करो, विरोध करो, लोभ करो, चाहे चिन्ता करो । मैया यशोदाके बड़ी चिन्ता लगी कि ‘लालाके क्या हो गया ?’ दाऊ भैयाको कहती है‘तू निगाह रखा कर ।’ ‘यह खेलनेको जाता है तो चंचल बहुत है यह ।’ वह दाऊ आकर कहता है‘मैया ! क्या करूँ ?’ यह यमुनामें चला जात है । पानीमें कहीं डूब जायगा । खेलता-खेलता कहीं जाकर बिलमें हाथ दे देता है । साँप काट जाय तो ! दाऊ दादा निगाह बहुत रखते हैं फिर भी वह तो चंचल बहुत है । अब दाऊ दादा, रोहिणी और यशोदा मैया, सब मिलकर भी रक्षा नहीं कर पाते । इतना चंचल है । बालमुकुन्द है यह मन है आपके पास । यह चंचल हो तो देखोये बालमुकुन्द खेल कर रहे हैं । ‘अरे ! लाला ! क्या करता है ?’ ‘खेल करता है, बालमुकुन्द है ।’ ऐसा मान लो तो फिर मनको जावे तो जाने दो । ‘अरे लाला ! ऐसे मत करो ।’ वो तो कहे‘खेलेंगे ।’ ‘अच्छी बात है, खेलो ।’ जहाँ भगवान्को समझा, कि मनकी सब उछल-कूद मिट जायगी असली तत्त्वको समझ गये न !

भगवान् ही तो हैं उसके भीतर भी । ऊपरसे कहते हैं मन है, इन्द्रियाँ हैं, पदार्थ हैं, भोग हैं, विषय हैं । अरे भैया ! भीतर वह एक ही हैं । वह है, उसे मान लो । चाहे तो भगवान्का मानकर भजन कर लो । चाहे संसारमें भगवान्को मानकर भजन कर लो । आपकी मर्जी आवे सो करो । दोनोंका टोटल एक ही निकलेगा । हमारे प्रभु ही तो हैं । ‘अनेकरूपरूपाय विष्णवे प्रभविष्णवे ॥’ इस वास्ते ‘तस्मिन्नेव करणीयम् ।’ केवल आनन्द-ही-आनन्द !

नारायण !    नारायण !!     नारायण !!!

‘भगवत्प्राप्ति सहज है’ पुस्तकसे

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।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि
श्रावण शुक्ल अष्टमी, वि.सं.२०७२, रविवार
भगवान्से सम्बन्ध


(गत ब्लॉगसे आगेका)
एक भौंरा था । वह घूमते-घूमते कमलमें जा बैठा । सुगन्ध आ रही थी खूब । इधर सूर्य अस्त हो गया तो कमल बन्द हो गया । उसमें भौंरा विचार करता है कि हम बन्द हो गये अब । इसमेंसे निकलें कैसे ? कमलको कैसे काटें ? भौंरा बाँसको काट देता है । बाँसमें छेद कर देता है । उसमें छेद बनाकर बच्चे देता है और भीतर रहता है । आप विचार करो, कमलकी पंखुड़ी काटनेमें उसे जोर आता है क्या ? परन्तु उससे सुगन्ध लेता है तो अब काटे कैसे ? वह भौंरा सोचता है‘रात्रिर्गमिष्यति भविष्यति सुप्रभातम् ।’ रात चली जायगी, बड़ा सुन्दर प्रभात हो जायगा । ‘भास्वानुदेष्यति’ सूर्य भगवान् उदय होंगे और ‘हसिष्यति पंकजश्रीः’यह कमलकी शोभा खिल जायगी । फिर मर्जी आवे जहाँ बैठें, मर्जी आवे जहाँ जावें । फिर ठीक हो जायगा । ‘इत्थं विचिन्तयति कोशगते द्विरेफे’वह बेचारा विचार कर रहा है कि यह हो जायगा, यह हो जायगा । इतनेमें ही हाथी आता है । पानी पीता है, फिर सूँडसे कमलोंको ऐसे लपेटता है । उतनेमें वह तो मर जाता है । ‘हा हन्त हन्त नलिनीं गज उज्जहार’ऐसे ही मनुष्य कहता है, ऐसे करेंगे, ऐसे करेंगे । क्या करेंगे ? राम नाम सत् हैयह तो आ ही जायगा ।

सज्जनो ! हम मृत्युलोकमें बैठे हैं । यहाँ मरनेवाले रहते हैं सब । सबलोग मरने-ही-मरनेवाले रहते हैं । इसमें निश्चिन्त बैठे हैं । मरना सुनते हैं तो बुरा लगता है । मरनेकी बात बुरी लगती है । कोई कह दे तो, कहते हैं ना-ना मुँहसे थूक । ऐसा मत बोलो । अब बोलो, चाहे मत बोलो, मरोगे तो सही । न बोलनेसे क्या रक्षा हो जायगी ? खरगोश होता है न, तो जब शिकारी उसे मारने जाता है तो वह छिपकर आँखें मीच लेता है । समझता है कि अब मेरेको कोई नहीं देखता; क्योंकि खुदको दीखता नहीं । आँखोंको तूने मीची है, दुनियाने थोड़े ही मीच ली है, पर वह तो यही समझता है कि अब थोड़े ही दीखूँगा मैं । ऐसे मनुष्य विचार करता है कि हमारा कौन कुछ करता है ? आँखें तूने मीची है भाई ! काल भगवान्ने मीची नहीं है आँखें । ये सूर्य भगवान् सबको देखते हैं । देखनेका काम ये करते हैं और ले जानेका काम इनके बेटा करते हैं । यमराज इनके बेटा हैं । सूर्य भगवान् देख लेते हैं कौन कैसे-कैसे तैयार हुआ है । हाँ बेटा, उसे ले आओ । तैयार है, बस । अपने निश्चिन्त बैठे हैं, ऐसे नहीं सोचते कि वे हमारेको देख रहे हैं । छिप आप सकते नहीं । समय होनेपर छोड़ेंगे नहीं ।

संतदास  संसारमें    बडो   कसाई   काल ।
राजा गिणे न बादशाह बूढ़ो गिणे न बाल ॥

न वह बूढ़ेको गिनता है, न बालकको गिनता है । बादशाह, साधु सब एक समान, आ जाओ बस ! आप कितने ही अच्छे पण्डित हो गये । बड़े अच्छे पण्डित हो, चाहे मूर्ख हो, यहाँ तो एक ही भाव है ।

   (शेष आगेके ब्लॉगमें)
‘भगवत्प्राप्ति सहज है’ पुस्तकसे

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।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि
श्रावण शुक्ल सप्तमी, वि.सं.२०७२, शनिवार
गोस्वामी श्रीतुलसीदास-जयन्ती
भगवान्से सम्बन्ध


(गत ब्लॉगसे आगेका)
घरमें चूहे बहुत हो जाते हैं तो तारोंका बना हुआ पिंजरा होता है उसमें रोटीके टुकड़े डालकर अँधेरेमें रख देते हैं । चूहोंको अन्नकी सुगन्धि आती है तो वे देखते हैं कि रोटी उसमें पड़ी है, पर किस तरहसे मिले ? इधर-उधर घूमते हैं । दरवाजा मिलते ही समझते हैं, आहा ! निहाल हो गया मैं तो ! वह भीतरमें भारसे नीचे उतरा और वह पत्ती स्प्रिंगसे वापस बन्द हो जाती है । तो अब मुश्किल हो गयी । अब निकलनेका दरवाजा ढूँढता है, पर मिलता नहीं । बाहरवाले चूहे देखते हैं कि यह मौज कर रहा है अकेला ही । हमारेको भी दरवाजा मिल जाय तो हम भी ऐसी मौज करें । अब दूसरा चला गया तो बाहरके बचे हुए देखते हैं कि इनको रस आ रहा है । आपसमें एक-से-एक लूट रहे हैं तभी तो लड़ते हैं । यों करके फँस जाते हैं । ऐसे ही संसारमें देखते हैं कि धन कैसे मिल जाय, हमारा विवाह कैसे हो जाय, हमारे बच्चे कैसे हो जायँ ? धन भी हो जाय, बच्चे भी हो जायँ । जब ब्याह होनेपर बच्चे होते हैं तो वह कहता हैअब तो हम फँस गये, भाई । पर जिसका नहीं हुआ वह कहता है, मेरे ब्याह ही नहीं हुआ । अब वह यों ही रोता है ।

जिसका ब्याह हो गया, वह मकान खोजता है कलकत्ते जैसे शहरमें । अकेला तो कहीं गद्दीमें सो जाय, पर स्त्री-बच्चोंको अब कहाँ रखे ? मकानके लिये पगड़ी लाओ, मार आफत ! दूसरा देखता है मैं तो अकेला रह गया और यह मौज करता है । बाल-बच्चे हैं इसके तो । कोई ताऊ-चाचा कहते हैं और चीं-पीं करते हैं इसके सामने, तो बड़ा आनन्द आता है कि हमारे इतने बच्चे हैं । बच्चोंके बीचमें बैठा राजी होता है जब कि वह दुःख पा रहा है । अब मुश्किल हो गयी, पालें कैसे इनको ? अब ज्यों छोरा बड़ा हो गया ब्याह करो । छोरी बड़ी हो गयी, उसका ब्याह करो । अब एक नयी आफत और हो गयी ।

एक देश था, उसमें रहनेवाले चौबेजी महाराजने सुना कि किसी देशमें चौबेको छब्बे कहते हैं । तो वहाँ चलो हमारा नाम बढ जायगा । तो वे अपने गाँवसे निकले, दूसरा गाँव आया, उसमें इनको दुब्बे कहने लगे । ‘चौबे होते छब्बे होने चले जब, होय दुब्बे दूय गांठके खोये वहाँ दुब्बे हो गये । ऐसे विचार किया कि यहाँ यह सुख लेंगे, तो जो पहले सुख था, वह भी गया । स्त्री-बच्चे नहीं थे तब बड़ी आजादी थी, स्वतन्त्र थे, अब क्या करें ? फँस गये । अब निकलना मुश्किल हो गया मुश्किल, मुश्किल कुछ नहीं है, स्वयं छोड़े तो कुछ मुश्किल नहीं है । चूहेके लिये तो तारोंका पिंजरा दूजेका बनाया हुआ है, यह पिंजरा खुदका बनाया हुआ है । दूजेका बनाया हुआ तोड़ना मुश्किल है । यह तो अपना बनाया हुआ है, इस वास्ते चट तोड़ा, चट चल दिया । पर तोड़ नहीं सकते ।

   (शेष आगेके ब्लॉगमें)
‘भगवत्प्राप्ति सहज है’ पुस्तकसे

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।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि
श्रावण शुक्ल षष्ठी, वि.सं.२०७२, शुक्रवार
भगवान्से सम्बन्ध


(गत ब्लॉगसे आगेका)
आप हैं अविनाशी । अविनाशीको नाशवान् कैसे संतुष्ट करेंगे ? परन्तु वहम इतना विलक्षण पड़ा है‘राम-राम-राम ।’ कई बार भोगोंको भोगकर देख लिया फिर भी उधर ही जाते हैं । अब क्या मनमें रह गयी ? क्या बाकी रह गया ? वहम है कि अब सुख हो जायगा । आप नये हो गये कि पदार्थ नये हो गये, कि रिवाज नया हो गया ? क्या बात है ? अभीतक चेत नहीं हुआ । समझदार आदमी चेत जाता है कि रास्ता ठीक नहीं है । जो गया, वह भी इस तरहसे ही मार खाता है । जो गया, वो ही दुःख पाया । अब उस मार्गको तो छोड़ो भाई ! अपने भी कर लिया । इतने दिन हो गये, इतने वर्ष हो गये । और कौन-सा भोग नहीं भोगा ? और फिर क्या मनमें रह गयी भगवान् ही जाने !

चेत होना चाहिये । छोटे-छोटे बच्चे होते हैं, तब उनके विचार होता है कि हम यह करेंगे वह करेंगे । बड़े होकर ऐसा धन कमायेंगे । तो आप लोग बड़े कब होंगे, जिस दिन भजन करेंगे ? कब भगवान्में लगेंगे ? कुछ बड़े हो जायँ तो फिर करेंगे । अब कब बड़े होंगे ? बताओ । मूर्खता रखते-रखते ही मर जायेंगे, वही बचपन, वही मूर्खता । तो ठाकुरजीमें आप अपना मन लगा दो । सम्बन्ध जोड़ दो, किसी रीतिसे जोड़ दो । ठाकुरजीके साथ जोड़ लो । अब आप भगवान्को कुछ मान लो । कैसे ही मान लो । वैरी मान लो, चाहे भयभीत हो जाओ । सम्बन्ध तो जोड़ो प्रभुके साथ !


भगवान् इतनी निगरानी रखते हैं जीवमात्रकी । यह किसीके साथ सम्बन्ध जोड़ लेता है तो रहने नहीं देते । भगवान् तोड़ ही देंगे उसको । बालकपनके साथ रहे तो बालकपन तोड़ दिया । जवानीके साथ रहे तो जवानी तोड़ देंगे । वृद्धावस्थाका साथ किया तो वृद्धावस्था तोड़ देंगे । रोगी-नीरोगी अवस्थाके सम्बन्धको तोड़ देंगे । भगवान् कहते हैं कि मेरेको नहीं प्राप्त किया तो टिकने नहीं दूँगा तेरेको । तू चाहे कितना ही कुछ पकड़ ले, कितनी ही उछल-कूद करे तो क्या होगा ? यह सब परिस्थिति बदलती है तो यह भगवान्का आवाहन होता है कि इधर आओ, किधर जाते हो ? ये सुनते ही नहीं । थोड़ा धन और कमा लें, थोड़ी विद्या और पढ़कर विद्वान् बन जायें । वक्ता बन जायँ बढ़िया, लोग हमको वाह-वाह कहें । तो फँस जाओगे बाबा ज्यादा । क्या निकालोगे इसमें ? पर वह भ्रम पड़ा हुआ है कि मौज हो जायगी ।

   (शेष आगेके ब्लॉगमें)
‘भगवत्प्राप्ति सहज है’ पुस्तकसे

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।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि
श्रावण शुक्ल षष्ठी, वि.सं.२०७२, गुरुवार
भगवान्से सम्बन्ध


(गत ब्लॉगसे आगेका)
एक दुःख गया तो दूजा तैयार । दूजा गया तो तीजा तैयार । इस प्रकार दु:-पर-दुःख पनपता ही रहता है; क्योंकि दुःखालय है यह । दु:-ही-दुःख होता है । वस्त्रालय होता है, औषधालय होता है । ऐसे ‘दुःखालयमशाश्वतम्’ दु:खालयमें सुख ढूँढ़ते हैं । दु:खालयमें सुख कैसे मिलेगा भाई, दुःखालयमें तो दुख-ही-दुःख है । ‘अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम् ।’ सुख इसमें है नहीं भैया ! यह दुःखालय है । ‘इमं प्राप्य भजस्व माम्’ तू मेरा भजन कर ले, पर भजन भगवान्का न करके भजन दुःखोंका ही करते हैं कि भगवान्ने हमारा दुःख नहीं मिटाया । हमारेको बेटा नहीं दिया, हमारेको धन नहीं दिया, हमारेको नीरोगता नहीं दी, हमारेको मान-सत्कार नहीं दिया, हमारी प्रशंसा नहीं की, भगवान्ने ऐसा नहीं कियायह चाहना क्या है ? अधिक दुःखकी चाहना है । भगवान् कहते हैं, ‘तेरेको दिया उतना बहुत काफी है । अलग और क्यों पकड़ता है ?’ यह कहता है, ‘इतना नहीं और दुःख होना चाहिये । धन और हो जाय तो सुखी हो जायँ ।’ और हो जाय तो सत्संग भी नहीं करेगा । फिर उसमें ऐसा लिप्त हो जायगा कि भजन-ध्यान ही छूट जायगा । क्या करें ? काम-धन्धा ज्यादा आ गया, मील और खुल गयी, अब समय नहीं मिलता, भजन करनेके लिये । विमुख होनेके लिये यह चेष्टा कम नहीं करता है । ठाकुरजी विमुख होने नहीं देते । इसके मनकी नहीं होने देते । इसके मनकी होवे तो यह कितनी ही खुराफात (उद्दण्डता) करे । भगवान् करने नहीं देते । इसमें यह हो जाय नाराज । जैसे पतंगे आग सुलगनेपर उसके भीतर दौड़कर प्रविष्ट होते हैं । उनको अलग कर देता है कोई तो पतंगे बहुत नाराज होते हैं । अगर उनका वश चले तो मुकद्दमा करें उसपर कि हमारेको आग नहीं लेने देते । आग बन्द करनेवाला उनपर करता है दया कि ये आगमें खतम हो जायँगे, परन्तु आड़ लगना उनको अच्छा नहीं लगता । ऐसे संसारके भोगोंमें, ऐश्वर्यमें रात-दिन लगे हैं । आड़ लग जाय तो उसके साथ लड़ाई करेंगे कि मेरेको क्यों नहीं जलने दिया ? हम तो पड़ेंगे भीतर, कूदकर । ‘रहने दे भैया, कुछ दिन जी तो जा ।’ ‘ना ।’ ऐसी दशा हो रही है लोगोंकी । ऐसी दशासे बचानेके लिये भगवान्के साथ सम्बन्ध जोड़ो, पर जोड़ते हैं नाशवान् पदार्थोंके साथ ।

   (शेष आगेके ब्लॉगमें)
‘भगवत्प्राप्ति सहज है’ पुस्तकसे

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