।। श्रीहरिः ।।

        


आजकी शुभ तिथि–
   आश्विन कृष्ण चतुर्दशी, वि.सं.-२०७८, मंगलवार
                             
    अवगुणोंको मिटानेका उपाय


अपना अवगुण अपनेको दीखने लग जाय, यह बहुत बढ़िया बात है । यह जितना स्पष्ट दिखेगा, उतना ही उस अवगुणके साथ सम्बन्ध-विच्छेद होगा‒यह एक बड़े तत्त्वकी बात है ।

जब साधकको अपनेमें दोष दिखायी देता है, तब वह उससे घबराता है और दुःखी होता है कि क्या करूँ, मैं साधक कहलाता हूँ और दशा क्या है मेरी ! तो यह दुःखी होना अच्छा ही है । परन्तु दोष मेरेमें हैं‒ऐसा मानना अच्छा नहीं । ध्यान दें, साधकके लिये बहुत बढ़िया बात है । जैसे आँखमें लगा हुआ अंजन आँखको नहीं दीखता, पर दूसरी सब चीजें दीखती हैं, ऐसे ही जबतक अवगुण अपने भीतर रहता है, तबतक वह स्पष्ट नहीं दीखता और जब अवगुण दीखने लगे, तब समझना चाहिये कि अब अवगुण मुझसे कुछ दूर हुआ है । अगर दूर न होता, तो दीखता कैसे ? जितना स्पष्ट, साफ दीखे, उतना ही वह अपनेसे दूर जा रहा है । अत्यन्त दूरकी वस्तु और अत्यन्त नजदीककी वस्तु‒दोनों ही आँखोंसे नहीं दिखतीं । इसलिये अवगुण दीखनेपर एक प्रसन्नता आनी चाहिये कि अब दोष मेरेमें नहीं है; अब वह निकल रहा है, मिट रहा है । भूल तभी होती है, जब साधक उसे अपनेमें मान लेता है ।

अपनेमें दोषको मान लेना बहुत बड़ी गलती है । अपनेमें माननेसे दोषको सत्ता मिलती है, जबकि दोषकी स्वतन्त्र सत्ता है नहीं । आपकी अपनी स्वतन्त्र सत्ता है । दोषको अपनेमें माननेसे वह सत्ता दोषको मिलती रहती है । इससे वह दोष जीता ही रहता है, मरता नहीं; क्योंकि उसे आपका बल मिल गया ।

दोष अपनेमें नहीं है‒इसकी एक पहचान तो यह हो गयी कि वह दीखने लग गया । दूसरी पहचान यह है कि यदि अपनेमें दोष हो, तो उसे सब समयमें दीखते रहना चाहिये । जबतक ‘मैं हूँ’ यह ज्ञान रहता है, तबतक उसके साथ-साथ दोषके रहनेका ज्ञान होता है क्या ? यह हरदम नहीं रहता । वह आता और जाता है । तो ऐसा आगन्तुक दोष अपनेमें कैसे हो सकता है ! मैं बार-बार आप लोगोंसे कहता हूँ कि अपनेमें दोषको मानना बहुत बड़ी गलती है । इतनी बड़ी गलती है कि मानो दोषको निमन्त्रण देकर बुलाते हैं कि हमारे यहाँसे कहीं चला न जाय ! इस प्रकार आप दोषको आग्रहपूर्वक निमन्त्रण देकर रखते हैं ।

मूलमें दोष अपनेमें नहीं है; क्योंकि‒

ईस्वर अंस   जीव अबिनाशी ।

चेतन अमल सहज सुखरासी ॥

(मानस ७/११७/१)

स्वयं ईश्वरका अंश, सदा रहनेवाला, चेतन, ज्ञानस्वरूप है । यह अमल है अर्थात्‌ इसमें मल नहीं है और सहज सुखराशि है । सहज-स्वाभाविक ही सुखराशि होनेपर भी जो यह दूसरेसे (संयोगजन्य) सुख चाहता है, यह गलती करता है । जब दूसरेकी तरफसे वृत्ति हटकर अपने स्वरूपमें स्थिति होगी, तब उस सहज सुखका अनुभव होगा ।

ना सुख काजी पंडिताँ ना सुख भूप भयाँ ।

सुख सहजाँ ही आवसी तृष्णा रोग गयाँ ॥

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।। श्रीहरिः ।।

       


आजकी शुभ तिथि–
   आश्विन कृष्ण त्रयोदशी, वि.सं.-२०७८, सोमवार
                             
    जीव लौटकर क्यों आता है ?


वह मित्र राजगद्दीपर बैठा और उस दिन खान-पान ऐश-आराममें मगन हो गया । दूसरे दिन सैर-सपाटा आदिमें लगा रहा । रात हुई तो बोला‒‘हम तो राजमहलमें जायँगे ।’ सब बड़ी मुश्किलमें पड़ गये । रानी बड़ी पतिव्रता थी । वह मित्र तो अड़ गया कि सब कुछ मेरा है, मैं राजा हूँ तो रानी भी मेरी है । रानीने अपने कुलगुरु ब्राह्मण देवतासे पुछवाया कि अब मैं क्या करूँ ? गुरुजी महाराजने कहा‒बेटी ! तुम चिन्ता मत करो, हम सब ठीक कर देंगे । गुरुजीने उस तीन दिनके लिये राजा बने मित्रसे पूछा कि आप महलोंमें जाना चाहते हैं तो राजाकी भाँती जाना होगा । इसलिये आपका ठीक तरहसे श्रृंगार होगा । उन्होंने भृत्योंको बुलाया और आज्ञा दी‒महाराजके महलोंमें जानेकी तैयारी करो, श्रृंगार करो । नाईको बुलाया और कहा कि महाराजकी हजामत करो ठीक ढंगसे । ३-४ घण्टे हो गये, तब वह राजा बोला‒ऐसे क्या देरी लगाते हो ? तो नाई बोला‒महाराज ! राजाओंका मामला है, साधारण आदमीकी तरह हजामत कैसे होगी ? हजामतमें लम्बी कर दी अर्थात्‌ बहुत देर लगा दी । इसके बाद पोशाक पहनानेवाला आदमी आया । उसने बहुत देर पोशाक पहनानेमें लगा दी । उसके बाद इत्र-तेल-फुलेल आदि लगानेवाला आया । उसने देर लगायी । इस प्रकार श्रृंगार-श्रृंगारमें ही रात बीत गयी । अब सुबह हो गयी । अन्तिम दिन था । समय पूरा हो गया और राजगद्दी वापस राजासाहबको मिल गयी । राजा साहबने अब अपने दूसरे मित्रको बुलाया और आग्रहपूर्वक तीन दिनके लिये राज्य दे दिया और बोले कि मैं, मेरी स्त्री, मेरा घर‒ये सब तो मेरे हैं । मैं भी आपकी प्रजा हूँ । बाकी सारा राज्य आपका है । वह मित्र तीन दिनके लिये राजा बन गया ।

राज्य मिलते ही उस मित्रने पूछा कि मेरा कितना अधिकार है ? मन्त्रीने जवाब दिया‒‘महाराज ! सारी फ़ौज, पलटन, खजाना और इतनी पृथ्वीपर आपका राज्य है ।’ उसने दस-बीस अधिकारीयोंको बुलाकर कहा कि हमारे राज्यमें कहाँ-कहाँ, क्या-क्या चीजकी कमी है, किसके क्या-क्या तकलीफें हैं‒पता लगाकर मुझे बताओ । उन्होंने आकर खबर दी‒फलाँ-फलाँ गाँवमें पानीकी तकलीफ है, कुआँ नहीं है, धर्मशाला नहीं है, पाठशाला नहीं है । उस राजाने हुक्म दिया कि सब गाँवोंमें जो कमी है, तीन दिनमें पूरी हो जानी चाहिये । खजांचीको कह दिया जाय कि मकान, धर्मशाला, पाठशाला, कुँए आदि बनानेमें जो भी खर्च हो, वह तुरन्त दिया जाय । राजाका हुक्म होते ही अनेक लोग़ राजाज्ञाके पालनमें लग गये । तीन दिन पूरे होते-होते विभिन्न स्थानोंसे समाचार आने लगे कि इतना-इतना काम हो गया है और इतना काम बाकी रहा है । जल्दी पूरा करनेका आदेश देकर, उस मित्रने राज्य वापस राजाको दे दिया । राजा बड़े प्रसन्न हुए और बोले कि हम तुम्हें जाने नहीं देंगे । हमारा मन्त्री बनायेंगे । हमें राज्य मिला, लेकिन प्रजाका इतना ध्यान नहीं रखा, जितना आपने तीन दिनमें रखा है । अब राजा तो नाम-मात्रके रहे और वह मित्र सदाके लिये, उनका विश्वासपात्र मन्त्री बन गया ।

इस प्रकार हमें बाल्यावस्था, युवावस्था और वृद्धावस्था‒ऐसे तीन दिनके लिये भगवान्‌की तरफसे राज्य मिला है । अब जो रूपया-संग्रह और भोग भोगनेमें लगे हैं, उनकी तो हजामत हो रही है और जो दूसरे मित्रकी तरह सेवा कर रहे हैं, उनको भगवान्‌ कहते हैं‒

मैं तो हूँ भगतन को दास, भगत मेरे मुकुट मणि ॥

तो भाई हमारे पास जो भी धन, सम्पत्ति, वैभव आदि है, उसके द्वारा सबका प्रबन्ध करो, सबकी सेवा करो । यह राज्य तीन दिनके लिये मिला है । अब निर्णय अपनेको करना है कि हजामतमें समय खोना है या भगवान्‌का विश्वासपात्र बनना है । लक्ष्मीजी हमारी माँ हैं, भगवान्‌ हमारे पिता हैं । निर्वाहके लिये लक्ष्मी माँसे ले लो; लेकिन लक्ष्मीजीको भोगना चाहते हैं, स्त्री बनाना चाहते हैं‒यह पाप है । वह हमारी पूजनीया माँ है । सेवाभाव होगा तो माँ भी खुश होंगी और पिताजी भी खुश होंगे । फिर हमें संसारमें लौटनेकी आवश्यकता नहीं रहेगी । पिताजीके धाममें हमारा सदा निवास होगा । हम वहाँके रहनेवाले हैं, यहाँ क्यों आयेंगे ? हमारा यह लोक है ही नहीं; यह तो जीवलोक है । हमारा लोक तो हमारे प्रभुका धाम है । हम तो उसी लोकके हैं । कबीर साहेब कहते हैं‒

मैं पूरबियो पूरब देश रो, म्हारी बोली लखै न कोय ।

म्हारी   बोली  जो   लखै,    धर   पूरबलो   होय ॥

मैं तो पूरब देशका, मेरी भाषा यहाँ कोई नहीं समझता । यहाँ सब पश्चिम देशके लोग़ हैं । मेरी बोली वही समझ सकता है, जो ठेठ पूरब देशका रहनेवाला हो ।

मैं भगवान्‌का हूँ । केवल भगवान्‌ ही मेरे हैं । सब चीजें भगवान्‌की हैं । मेरा कुछ नहीं है । ये बातें जो ठीक-ठीक समझ लेता है, उसको मरनेके बाद यहाँ लौटकर नहीं आना पड़ता; लेकिन जो संसारमें ममता रखता है और मर जाता है, तो उसे लौटना ही पड़ता है ।

नारायण !     नारायण !!     नारायण !!!

‒‘सत्संगकी विलक्षणता’ पुस्तकसे

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।। श्रीहरिः ।।

      


आजकी शुभ तिथि–
   आश्विन कृष्ण द्वादशी, वि.सं.-२०७८, रविवार
                             
    जीव लौटकर क्यों आता है ?


घरमें काम करो । सेवा करो । सुख पहुँचाओ अभिमान मत करो । ममता मत करो । ममता आपकी चलेगी नहीं । आजसे सौ वर्ष पहले इन कुटुम्बियों और इन घरोंपर अपनी ममता थी क्या ? सौ वर्ष बाद रहेगी ? नहीं रहेगी । अभी भी निरन्तर मिट रही है । जितने दिन बीत गये, उतनी सब चीजें अलग हो गयीं । उमर पूरी हो जायगी तो राम-नाम सत्य है‒बोल जायगी । तो चीजें आपकी कैसे हुईं ? पहले आपकी नहीं, पीछे आपकी नहीं, तो बीचमें आपकी कैसे हुईं ? हर पल आपसे बिछुड़ रही है । इन वस्तुओंके द्वारा सबकी सेवा करो । आदर करो । सबको मान दो । घरमें रहते हुए निहाल हो जाओ ।

जो संसारमें अपनापन (वासना) करेगा तो वह लौटकर नहीं आयेगा, तो कहाँ जायगा‒

वासना यस्य यत्र स्यात् स तं स्वप्नेषु पश्यति ।

स्वप्नमरणे    ज्ञेयं    वासना    तू   वपुर्नृणाम् ॥

जिसकी जहाँ वासना है, स्वप्नमें भी उसको वही याद आता है । स्वप्नकी तरह, मरनेपर भी वही याद आता है; क्योंकि वासना ही उसका शरीर है । किसीमें वासना ही नहीं रही तो यह (जीव) लौटकर संसारमें क्यों आयेगा ? अगर वासना रह गयी‒थोड़ी धनमें, थोड़ी घरमें, थोड़ी पुत्रोंमें, तो यहाँ वापस आना पड़ेगा । यदि हमारा सम्बन्ध यहाँ किसीसे नहीं है, केवल भगवान्‌के साथ है । जीते रहें तो भगवान्‌के साथ और मरें तो भगवान्‌के साथ । तो हम भगवान्‌के पास ही जावेंगे । फिर यहाँ नहीं आना पड़ेगा ।

एक राजकुँवर थे । स्कूलमें पढ़नेके लिये जाते थे । वहाँ प्रजाके बालक भी पढ़ने जाते थे । उनमेंसे पाँच-सात बालक राजकुँवरके मित्र हो गये । वे मित्र बोले‒‘आप राजकुँवर हो, राजगद्दीके मालिक हो । आज आप प्रेम और स्नेह करते हो, लेकिन राजगद्दी मिलनेपर ऐसा ही प्रेम निभायेंगे, तब हम समझेंगे कि मित्रता है, नहीं तो क्या है ?’ राजकुँवर बोले कि अच्छी बात है । समय बीतता गया । सब बड़े हो गये । राजकुँवरको गद्दी मिल गयी । एक-दो वर्षमें राज्य अच्छी प्रकार जम गया । राजकुँवरने अपने मित्रोंमेंसे एकको बुलाया और कहा कि तुम्हें याद है कि तुमने कहा था‒‘राजा बननेके बाद मित्रता निबाहो, तब समझें ।’ अब तुम्हें तीन दिनके लिये राज्य दिया जाता है । आप राजगद्दीपर बैठो और राज्य करो ।’ वह बोला‒‘अन्नदाता ! वह तो बचपनकी बात थी । मैं राज्य नहीं चाहता ।’ बहुत आग्रह करनेपर उस मित्रने तीन दिनके लिये राज्य स्वीकार कर लिया ।

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।। श्रीहरिः ।।

     


आजकी शुभ तिथि–
   आश्विन कृष्ण एकादशी, वि.सं.-२०७८, शनिवार
                             
    जीव लौटकर क्यों आता है ?


कुछ लोग कहते हैं कि ममता छूटती नहीं । आपकी छोड़नेकी सच्ची नीयत हो जाय तो भगवान्‌ छुड़ा देंगे । उनको पुकारें कि हे नाथ ! मैं इन वस्तुओंको अपना मानना चाहता नहीं । तो भगवान्‌ कहेंगे कि बहुत ठीक है और ममता छूट जायगी । परन्तु हृदयसे छोड़नेकी नीयत हो तब । यदि छोड़ना चाहते ही नहीं, तो मरनेपर भी नहीं छूटेगी । भूत-प्रेत बनना पड़ेगा । वही पोशाक धारण किये उसी घरमें आता है, लोगोंको दीखता है । भूत-प्रेत बन जानेपर भी ममता छूटेगी नहीं । इसलिये आपने जो सांसारिक वस्तुओंमें ‘अपनापन’ कर लिया है, यह संसारमें लौटकर आनेका खास कारण है । यही बहुत बड़ी गलती है ।

यह सब संसार परमात्माका है और मान लिया अपना‒यह बेईमानी है, ईमानदारी नहीं है । भाइयो, बहनो, माताओ ! आप मानो तो सही । आप अपनी कही जानेवाली सब चीजोंको भगवान्‌की मानकर चलो तो वे सब भगवान्‌का प्रसाद हो जायँगी । फिर मस्त हो जाओ कि हम ठाकुरजीके प्रसाद पाते हैं । हमारे समान कौन बड़भागी है ? चीज चली जाय तो ठाकुरजीकी चीज चली गयी । अपनी मानेंगे ही नहीं । हाँ, रक्षा ठीक तरहसे करेंगे । अब बोलो मरनेमें भी मौज रहेगी कि नहीं । कबीरदासजी कहते हैं‒

सब जग डरपे मरण से, मेरे मरण आनन्द ।

कब मरिये कब भेंटिये,   पूरण परमानन्द ॥

‘मेरे मरनेमें आनन्द है, क्योंकि अपने प्यारे प्रभुसे मिलेंगे ।’ अपने घर जायँगे । भगवान्‌ हमारा घर है, देश है, परिवार है । हमारे वे हैं, हम उन्हींके अंश हैं । उन्हींकी जातिके हैं । उन्हींके सम्बन्धी हैं । आप और हम‒सब भगवान्‌के हैं । यह देश, अपना देश नहीं है‒

इण आँगणि‒ये हे सखि, हम खेलण आये ।

कई खेल्या कई खेल सी, कई खेल सिधाये ॥

यह तो खेलनेका एक रंगमंच है, स्टेज है । इसपर खेलना है, बस । खेलकी चीजोंको ‘अपना’ मान लेते हैं, यही गलती है ।

आप लोग कहते हैं कि अशान्ति है, दुःख है, सन्ताप है‒क्या करें ? भैया ! आपने भगवान्‌की वस्तुको अपना मानकर जो बेईमानी की है, उसका दुःख तो भोगना पड़ेगा ही । इन चीजोंको अपना माना है, इस वास्ते अशान्ति है । जहाँ ‘अपनापन’ छोड़ा वहीं शान्ति‒

निर्ममो निरहंकारः स शान्तिमधिगच्छति ॥

(गीता२/७१)

बहनो, माताओ ! आप घरमें रहते हुए कहो कि आजसे काम मैं करूँगी । आराम सबको दो । आपकी सास, ननद, देवरानी, जेठानी जो भी घरके सदस्य हों‒उनका काम आप करो । सासको चाहिये कि बहूसे कहे‒‘बेटा ठहरो, काम मैं करूँगी ।’ बहू कहे‒‘राम ! राम !! ऐसा कैसे होगा ? हमारे रहते, आप बूढ़े-बड़ेरे काम करेंगे ?’ तो सास बोले‒‘बेटा ! मैं जीउँ, तबतक तो मुझे करना ही चाहिये ।’ बहू कहे‒‘माजी ! आप काम करें और मैं बैठी रहूँ ? यह कैसे हो सकता है ? आप चली जायँगी तो हम किसको काम करके दिखायेंगे ? इसलिये काम तो हम करेंगी ।’ इस तरह काम करनेके लिये लड़ाई हो जाय घरोंमें । देवरानी कहे कि मैं करूँगी । जेठाणी कहे कि मैं करूँगी । सुख, आराम, प्रशंसा उनके लिये और घरका काम, परिश्रम अपने लिये । फिर संसारमें आना नहीं होगा । अपना कुछ माना नहीं और सबकी सेवा कर दी । अब क्यों आयेंगे यहाँ ?

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।। श्रीहरिः ।।

    


आजकी शुभ तिथि–
   आश्विन कृष्ण दशमी, वि.सं.-२०७८, शुक्रवार
                             
    जीव लौटकर क्यों आता है ?



आप, भाई-बहन कृपा करो । अभी अपनी सभी चीजोंको भगवान्‌की मान लो । हृदयसे मान लो कि हे नाथ ! यह सब कुछ आपका है । गहना, कपड़ा, भोजन, मकान आदि सब कुछ प्रभुका प्रसाद है । अब भगवान्‌की मर्जी हो वहाँ रखो । हम लौटकर क्यों आयेंगे ? हमारी कहीं ममता नहीं । कोई हमारा है ही नहीं । ऐसा कृपा करके भगवान्‌को सब कुछ दे दो । वास्तवमें सब कुछ भगवान्‌का ही है । हमने उसको अपना माना है । केवल मान्यता छोड़नी है । महाराज रघुने विश्वजित्-याग किया । संसारपर विजय कर ले और बादमें सर्वस्व दान कर दे‒यह विश्वजित्-याग होता है । सज्जनो ! आप और हम‒सब विश्वजित्-याग कर सकते हैं । हृदयसे सब वस्तुओंको भगवान्‌के अर्पण कर दें । शरीरको भी अपना न माने । कोई वस्तु हमारी है ही नहीं‒हृदयसे यदि ऐसा भाव कर लें, तो विश्वजित्-यज्ञ हो जायगा और कहीं जाना भी नहीं पड़ेगा ।

लोग कहते हैं कि भगवान्‌की मायासे हम मोहित हो गये । भगवान्‌की मायासे मोहित नहीं हुए, लेकिन भगवान्‌की मायाको अपना मान लिया, इसलिये मोहित हो गये हैं । भगवान्‌की माया किसीको मोहित करती ही नहीं । वह तो सबका काम सुचारुरूपसे चले, ऐसी सुविधा देती है, कृपा करती है । परन्तु आप मिली हुई वस्तुओंपर कब्ज़ा कर लेते हो । उन्हें अपना मान लेते हो । सज्जनो ! ये आपकी हैं ही नहीं, थीं नहीं और रहेंगी भी नहीं । अभी भी निरन्तर इनका वियोग हो रहा है । ध्यान दें, जितने दिन आप-हम इन वस्तुओंको अपना मानकर जी गये, उतना इनसे वियोग हो गया । यदि कोई चीज हमारे पास पचास वर्ष रहनेवाली है और दस वर्ष बीत गये, तो अब वह चीज पचास वर्ष हमारे पास रहेगी ? अब तो चालीस वर्ष ही रहेगी । इसलिये वियोग तो निरन्तर हो ही रहा है । जिस वस्तुको आप अपनी मानते हैं, वह आपसे प्रतिक्षण अलग हो रही है । पहले अलग थी, बादमें अलग रहेगी और अभी वर्तमानमें भी अलग हो रही है । वस्तु कभी नहीं कहती कि ‘तुम मेरे हो और मैं तुम्हारी हूँ ।’ आप कहते हैं कि यह मेरी है । अतः आपको लौटकर आना होता है । घरने आपको मेरा नहीं कहा, वस्तुओंने आपको मेरा नहीं कहा और सच्ची पूछो तो कुटुम्बीजन भी आप जबतक जीते हैं, तभीतक मेरा-मेरा कहते हैं । प्राण-निकलनेपर जलाकर भस्म कर देंगे, फूँक देंगे‒

स्वास थकां सब आस करै, स्वास गया अब काढ़ो रे काढ़ो ।

धरती को धन्न बताय दियो, अब नाख सनेती में बाँधो रे गाढ़ो ॥

अड़ोस-पड़ोस के आप खड़े सब, कोऊ न कहवत राखो रे ठाढ़ो ।

ठेट मसाण पौंचाय दियो अब, रह गयी जान चल्यो गयो लाडो ॥

फिर भी कहते हैं‒यह मेरा ! यह मेरा ! आपका क्या है ? शरीर भी यहीं पड़ा रह जायगा । भाइयो, बहनो ! कृपा करो और हृदयसे कह दो कि यह सब कुछ भगवान्‌का है ।

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