।। श्रीहरिः ।।

                                           


आजकी शुभ तिथि–
  कार्तिक शुक्ल पंचमी, वि.सं.-२०७८, मंगलवार
                      

भगवत्प्राप्तिसे ही 

मानव-जीवनकी सार्थकता


जब वह परमात्माकी प्राप्तिके पुनीत लक्ष्यको लेकर आता है, तब उस लक्ष्यकी प्राप्तिके साधनोंमें ही क्यों नहीं लगता ? उस ध्येयके विरुद्ध क्रिया उसके द्वारा क्यों सम्पादित होने लगती है ?‒इन प्रश्नोंका एकमात्र उत्तर यह है कि वह अपने ध्येयको, अपने पूर्व-निर्धारित लक्ष्यको भूल बैठता है, उसे उसकी विस्मृति हो जाती है । इस विषयको अर्जुनका उदाहरण सामने रखकर समझा जा सकता है । जब भगवान्‌ श्रीकृष्णने अर्जुनसे पूछा‒‘अर्जुन ! क्या तुमने गीताका उपदेश एकाग्र होकर सुना ? क्या तुम्हारा अज्ञान-जनित मोह नष्ट हो गया ?’ तब अर्जुनने हर्ष-विस्फारित नेत्रोंसे भगवान्‌की ओर देखकर इस प्रकार उत्तर दिया‒‘भगवन्‌ ! मेरा मोह नष्ट हो गया । मुझे स्मृति प्राप्त हो गयी । यह सब आपके प्रसादसे हुआ है । अब मैं अपनी पूर्व-स्थितिमें आ गया हूँ ।’ यहाँ स्मृतिका अर्थ न तो ‘अनुभव’ है और न ‘नूतन ज्ञान’ ही । पहले कभी कोई अनुभूति हुई थी, कोई ज्ञान हुआ था; पर वह मोहके आवरणसे आच्छादित होकर विस्मृत हो गया था । भगवान्‌के ज्ञानोपदेशसे वह मोहका आवरण नष्ट हो गया और पूर्व-चेतना पुनः प्रकाशित हो उठी, भूली हुई बात याद आ गयी । वैशेषिकोंने भी ‘स्मृति’ का लक्षण ऐसा ही किया है‒‘संस्कारमात्रजन्यं ज्ञानं स्मृतिः’ (तर्कसंग्रह) । इसी प्रकार योगदर्शनके रचयिता महर्षि पतंजलिने भी ‘अनुभवविषयसम्प्रमोषः स्मृतिः’[*] लिखकर पूर्वानुभूत विषयके साथ ही स्मृतिका तादात्मय बताया है । अर्जुनका ‘स्मृतिर्लब्धा’ (गीता १८/७३)‒यह वचन भी इसी अभिप्रायका पोषक है । इससे ज्ञात होता है कि अर्जुन निश्चितरूपसे लक्ष्यको भूल गया था । उस लक्ष्यकी विस्मृतिमें प्रधान कारण था ‘मोह’, जिसके लिये ही भगवान्‌ने ‘कच्चिदज्ञानसम्मोहः प्रनष्टते धनञ्जय’ (गीता १८/७२) कहकर प्रश्न किया था । ‘मोह’ शब्दका प्रयोग तो और भी स्पष्टरूपसे उपर्युक्त भावकी पुष्टि करता है । व्याकरणके अनुसार ‘मोह’ शब्द ‘मुह वैचित्त्ये’ धातुसे बना है । ‘वैचित्त्ये’ पदपर ध्यान देनेसे यह पता चलता है कि ‘विचेतनता‒विगतचेतनता’ का नाम ही ‘वैचित्त्य’ है, अतः यह सिद्ध होता है कि पहले अर्जुनको चेत रहा है और बादमें वह मोहसे ग्रस्त होता है । मोह छूटनेका अर्थ है‒पूर्व-चेतनाकी प्राप्ति । जबतक उसकी बुद्धि मोहके कलिलसे व्यतितीर्ण नहीं हुई, तबतक वह भगवदाज्ञापालनके लिये प्रवृत्त नहीं होता । गीता अध्याय २ श्लोक ५२ में भगवान्‌ने ‘यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति’ कहकर इसी ओर अर्जुनको संकेत किया है । पूर्णतः मोह निवृत्त होनेपर ही सम्यकरूपेण चेतनाकी प्राप्ति होती है । तब वह खुलकर कहता है‒स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव ॥’ (गीता १८/७३)

उपर्युक्त विवेचनसे पता चलता है कि जीवनका लक्ष्य, उद्देश्य अथवा ध्येय तो पहलेसे बना-बनाया है, उसको बनाना नहीं है । केवल उसे पहचाननेकी आवश्यकता है । पहचाननेपर उसकी प्राप्तिका साधन सरल हो जाता है । कठिनाई तो पहचान करनेतक ही है । मोहकी ऐसी प्रबल महिमा है कि मानव-जीवन प्राप्त करनेके अनन्तर सचेत रहकर मुक्तिके लिये प्रयत्न करनेवाले मनुष्यको भी कभी असावधान पाकर वह धर दबाता है ।



[*] इस सूत्रका अर्थ इस प्रकार है‒अनुभव किये हुए विषयका न छिपना अर्थात् प्रकट हो जाना ‘स्मृति’ है ।

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।। श्रीहरिः ।।

                                          


आजकी शुभ तिथि–
  कार्तिक शुक्ल चतुर्थी, वि.सं.-२०७८, सोमवार
                      

भगवत्प्राप्तिसे ही 

मानव-जीवनकी सार्थकता


मानव-शरीर परमात्माकी प्राप्तिके लिये ही मिला है । परमात्माकी प्राप्तिको ही जीवन्मुक्ति, तत्त्वज्ञान, मोक्षप्राप्ति, प्रेमप्राप्ति, पूर्णताप्राप्ति और कृत्यकृत्यता आदि नामोंसे अभिहित किया जाता है । स्थूलरूपसे मानव और मानवेतर प्राणियोंमें कोई अन्तर नहीं है । सभीके शरीर पाञ्चभौतिक हैं । उनमें शरीरधारी जीवमात्र एक परमेश्वरके ही अंश हैं, चिन्मय हैं‒‘ममैवांशो जीवलोके’ (गीता १५/७) । योनियाँ दो प्रकारकी होती है‒१.भोगयोनी, २.कर्मयोनि । मानव-योनि कर्मयोनि (साधनयोनि) है । इसी योनिको श्रीगोस्वामीजी महाराजने ‘स्वर्ग नरक अपबर्ग निसेनी’ बताया है । मानव-योनिकी यह महत्ता है कि इसी योनिमें किये गये कर्मोंके अनुसार मुक्ति अथवा देवयोनि, स्थावरयोनि, पशु-पक्षी-कीट-पतंगादि योनियाँ प्राप्त होती हैं । मनुष्ययोनिमें किये हुए कर्मोंके अनुसार ही भोगोंका विधान होता है । मानवयोनिमें कर्म करनेकी पूर्ण स्वतन्त्रता है । अन्य योनियोंमें जीव अपने पूर्वकृत शुभाशुभ कर्मोंके अनुसार प्राप्त हुए सुख-दुःखादि भोगोंको भोगता हुआ संसार-चक्रमें घूमता रहता है‒

आकर    चारि   लच्छ   चौरासी ।

जोनि भ्रमत यह जिव अबिनासी ॥

अन्य योनियोंमें जीवको कर्म करनेकी स्वतन्त्रता न होनेसे वहाँ उसकी मुक्तिके मार्ग अवरुद्ध रहते हैं । जीवमात्रपर अकारण स्नेह रखनेवाले भगवान्‌ सर्वेश्वर कभी कृपा करके जीवको सदाके लिये दुःख-परम्परासे छुटकारा पानेके हेतु प्रयत्न करनेका अवसर देनेके लिये मनुष्ययोनि प्रदान करते हैं‒

कबहुँक करि करुना नर देही । देत ईस बिनु हेतु सनेही ॥

कुछ लोगोंका कहना है कि मानवको अपने जीवनका एक ध्येय बनाना चाहिये । ध्येय बनानेसे तदनुसार चेष्टा होगी‒क्रिया होगी । उनका यह कथन ठीक ही है, परन्तु विचार करनेसे ज्ञात होता है कि भगवान्‌ने पहलेसे ही मानव-जीवनका ध्येय निश्चित कर दिया है । भगवान्‌ पहले जीवके लिये ध्येय निश्चित करते हैं, तदन्तर उक्त ध्येयकी सिद्धिके निमित्त उस जीवको मानव-शरीरकी प्राप्ति कराते हैं । अतः मानवको कोई नूतन ध्येय बनानेकी आवश्यकता नहीं है । आवश्यकता है पूर्वनिश्चित ध्येय या लक्ष्यको पहचाननेकी । भगवान्‌ने इसी उद्देश्यसे मानव-जन्म दिया है । उन्होंने यह विचार करके कि ‘यह जीव अपना कल्याण-साधन करे’ उसे मनुष्ययोनिमें भेजा है तथा उसके लिये मुक्ति या उद्धारके समस्त साधन इस योनिमें जुटा दिये हैं‒ऐसे साधन जो अत्यन्त सुलभ, सरल और सर्वथा महत्त्वपूर्ण हैं । इसीलिये गोस्वामीजी महाराजने मानव-योनिको ‘साधन-धाम’, मोक्षका द्वार’ तथा ‘भवसागरका बेड़ा’ कहा है‒

        साधन धाम मोच्छ कर द्वारा ।          ...................... ॥

                 नर तनु भव बारिधि कहुँ बेरो । सन्मुख मरुत अनुग्रह मेरो ॥

अब यहाँ प्रश्न उठता है कि ‘जब मनुष्य एक निश्चित ध्येय लेकर उत्पन्न होता है, तब वह उक्त ध्येयको न पकड़कर अन्य दिशाओंमें क्यों भटकने लगता है ?

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।। श्रीहरिः ।।

                                         


आजकी शुभ तिथि–
  कार्तिक शुक्ल तृतीया, वि.सं.-२०७८, रविवार
                      

भगवत्प्राप्तिके लिये 

भविष्यकी अपेक्षा नहीं


बच्चा खेलना छोड़ दे और रोने लग जाय तो माँको अपना सब काम छोड़कर उसके पास आना पड़ता है और उसे गोदमें बैठाकर दुलारना पड़ता है; परन्तु यदि बच्चा खेलनेमें लगा रहे तो माँ निश्चिन्त रहती है । इसी प्रकार यदि हम भगवान्‌के लिये व्याकुल न होकर सांसारिक वस्तुओंमें ही प्रसन्न रहते हों तो भगवान्‌ निश्चिन्त रहते हैं और हमसे मिलने नहीं आते । यदि बच्चा लगातार रोने लग जाय और माँके बिना किसी भी वस्तु (खिलौने आदि)-से प्रसन्न न हो तो घरके सभी लोग बच्चेके पक्षमें हो जाते हैं और उसकी माँको कहते हैं‒‘बच्चा रो रहा है और तुम काममें लगी हो ! आग लगे तुम्हारे कामको ! शीघ्र बच्चेको गोदमें ले लो ।’ उस समय माँ कितना ही आवश्यक कार्य क्यों न कर रही हो, बच्चेके रोनेके आगे उस कार्यका कोई मूल्य नहीं रहता । इसी प्रकार हम एकमात्र भगवान्‌के लिये रोने लग जायँ तो भगवद्धामके सब सन्तजन हमारे पक्षमें हो जायँ ! वे सभी कहने लग जायँ‒ ‘महाराज ! बच्चा रो रहा है; आप मिलनेमें देर क्यों कर रहे हैं ?’ फिर भगवान्‌के आनेमें कोई देर नहीं लगती । हाँ, जब बच्चा खिलौनोंसे खेल भी रहा हो और ऊपरसे ऊँ...ऊँ...भी कर रहा हो, तब उसे माँ गोदमें नहीं लेती । इसी प्रकार हम सांसारिक खिलौनोंसे भी खेलते हों और रोनेका ढोंग भी करते हों, तब भगवान्‌ नहीं आते । वे हमारे आन्तरिक भावको देखते हैं, क्रियाको नहीं । मान-आदर, सुख-आराम, धन-सम्पत्ति, सिद्धियाँ आदि सब सांसारिक खिलौने हैं । माँकी गोद, उसका प्यार, खिलौने आदि सब कुछ बच्चेके लिये ही होते हैं । ऐसे ही भगवान्‌की गोद, उनका प्यार तथा उनके पास जो भी सामग्री है, सब भक्तके लिये ही होती है । भगवान्‌के लिये भक्तसे बढ़कर कुछ भी नहीं है । यदि हम किसी भी वस्तुमें प्रसन्न न होकर भगवान्‌को पुकारने लगें तो वे तत्काल आ जायँ । इसमें भविष्यकी क्या बात है ? माँ बच्चेकी योग्यताको देखकर उसके पास नहीं आती । वह यह नहीं देखती कि बच्चा सुन्दर है, विद्वान्‌ है या धनवान्‌ है । बच्चेमें माँको बुलानेकी यही एक योग्यता है कि वह केवल माँको चाहता है और माँके सिवा दूसरी किसी भी वस्तुसे प्रसन्न नहीं होता ।

भगवान्‌के साथ हमारा सम्बन्ध स्वतन्त्रतासे, स्वाभाविक है । मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ, शरीर आदि सब पदार्थ निरन्तर बहे जा रहे हैं । उनके साथ हमारा कोई सम्बन्ध नहीं है । भगवान्‌ ही हमारे हैं । बच्चेमें कोई योग्यता, विद्वत्ता, शूरवीरता आदि नहीं होती, केवल उसमें ‘माँ मेरी है’‒ऐसा माँमें मेरापन होता है । इस मेरापनमें बड़ी भारी शक्ति है, जो भगवान्‌को भी खींच सकती है । इसीके कारण प्रह्लादने पत्थरसे भी भगवान्‌को निकाल लिया‒

प्रेम बदौं प्रहलादहिको, जिन पाहनतें परमेस्वरु काढ़े ॥

(कवितावली १२७)

संसारका हमसे प्रतिक्षण वियोग हो रहा है । शरीर, कुटुम्ब, धन-सम्पत्ति आदि सब पदार्थ पहले नहीं थे और बादमें भी नहीं रहेंगे । दृश्यमात्र निरन्तर अदर्शनको प्राप्त होता चला जा रहा है । कोई पदार्थ ६० वर्षतक रहनेवाला हो तो एक वर्ष बीत जानेपर वह ५९ वर्षका ही रहेगा; क्योंकि वह निरन्तर नाशकी ओर जा रहा है । हम नहीं रहनेवाले सांसारिक पदार्थोंको अपना मानते हैं और सदा रहनेवाले परमात्माको अपना नहीं मानते, यह बड़ी भारी भूल हैं । भगवान्‌ वर्तमानमें हैं और हमारे हैं‒इस बातपर हम दृढ़तापूर्वक डट जायँ, तो भगवान्‌ वर्तमानमें ही मिल जायँगे । केवल उत्कट अभिलाषा[*] होनेकी देर है, भगवान्‌के मिलनेमें देर नहीं । अपने भावके अनुसार चाहे आज भगवान्‌को प्राप्त कर लो, चाहे भविष्यमें‒वर्षों या जन्मोंके बाद !

नारायण !     नारायण !!     नारायण !!!

‒‘जीवनोपयोगी कल्याण-मार्ग’ पुस्तकसे



[*] भगवत्प्राप्तिकी उत्कट अभिलाषा जाग्रत्‌ करनेका उपाय है‒सम्पूर्ण सांसारिक इच्छाओंका त्याग और दूसरे हमसे जो न्याययुक्त इच्छा करें, उसे यथाशक्ति पूरी कर देना ।


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।। श्रीहरिः ।।

                                        


आजकी शुभ तिथि–
  कार्तिक शुक्ल द्वितीया, वि.सं.-२०७८, शनिवार
                      

भगवत्प्राप्तिके लिये 

भविष्यकी अपेक्षा नहीं


एक राजा सायंकाल महलकी छतपर टहल रहे थे । सहसा उनकी दृष्टि नीचे बाजारमें घूमते हुए एक सन्तपर पड़ी । सन्त अपनी मस्तीमें ऐसे चल रहे थे मानो उनकी दृष्टिमें संसार है ही नहीं । राजा अच्छे संस्कारवाले पुरुष थे । उन्होंने अपने आदमियोंको उन सन्तको तत्काल ऊपर ले आनेकी आज्ञा दी । आज्ञा पाते ही राजपुरुषोंने ऊपरसे ही रस्से लटकाकर उन सन्तको (रस्सेमें फँसाकर) ऊपर खिंच लिया । इस कार्यके लिये राजाने उन सन्तसे क्षमा माँगी और कहा कि एक प्रश्नका उत्तर पानेके लिये ही मैंने आपको कष्ट दिया । प्रश्न यह है कि भगवान्‌ शीघ्र कैसे मिलें ? सन्तने कहा‒‘राजन ! इस बातको तुम जानते ही हो ।’ राजाने पूछा‒‘कैसे ?’ सन्त बोले‒‘यदि मेरे मनमें तुमसे मिलनेका विचार आता तो कई अड़चनें आतीं और बहुत देर लगती । पता नहीं मिलना सम्भव भी होता या नहीं । पर जब तुम्हारे मनमें मुझसे मिलनेका विचार आया, तब कितनी देर लगी ? राजन ! इसी प्रकार यदि भगवान्‌के मनमें हमसे मिलनेका विचार आ जाय तो फिर उनके मिलनेमें देर नहीं लगेगी ।’ राजाने पूछा‒‘भगवान्‌के मनमें मुझसे मिलनेका विचार कैसे आ जाय ?’ सन्त बोले‒‘तुम्हारे मनमें मुझसे मिलनेका विचार कैसे आया ?’ राजाने कहा‒‘जब मैंने देखा कि आप एक ही धुनमें चले जा रहे हैं और सड़क, बाजार, दूकानें, मकान, मनुष्य आदि किसीकी भी तरफ आपका ध्यान नहीं है, तब मेरे मनमें आपसे मिलनेका विचार आया ।’ सन्त बोले‒‘राजन ! ऐसे ही तुम एक ही धुनमें भगवान्‌की तरफ लग जाओ, अन्य किसीकी भी तरफ मत देखो, उनके बिना रह न सको, तो भगवान्‌के मनमें तुमसे मिलनेका विचार आ जायगा और वे तुरन्त मिल जायँगे ।’

भगवान्‌ ही हमारे हैं, दूसरा कोई हमारा है ही नहीं । भगवान्‌ कहते हैं‒

सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टः (गीता १५/१५)

‘मैं सम्पूर्ण प्राणियोंके हृदयमें स्थित हूँ ।’

मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना ।  (गीता ९/४)

‘मुझ निराकार परमात्मासे यह जगत्‌ (जलसे बर्फके सदृश्य) परिपूर्ण है ।’

भगवान्‌ हृदयमें ही नहीं, अपितु दीखनेवाले समस्त संसारके कण-कणमें विद्यमान हैं । ऐसे सर्वत्र विद्यमान परमात्माको जब हम सच्चे हृदयसे देखना चाहेंगे, तभी वे दीखेंगे । यदि हम संसारको देखना चाहेंगे तो भगवान्‌ बीचमें नहीं आयेंगे, संसार ही दिखेगा । हम संसारको देखना नहीं चाहते, उससे हमें कुछ भी नहीं लेना है, न उसमें राग करना है न द्वेष, हमें तो केवल भगवान्‌से प्रयोजन है‒इस भावसे हम एक भगवान्‌से ही घनिष्ठता कर लें । भगवान्‌ हमारी बात सुनें या न सुनें, मानें या न मानें, हमें अपना लें या ठुकरा दें‒इसकी कोई परवाह न करते हुए हम भगवान्‌से अपना अटूट सम्बन्ध (जो कि नित्य है) जोड़ लें[*] जैसे माता पार्वतीने कहा था‒

जन्म कोटि लगि रगर हमारी । बरउँ संभु न ता रहउँ कुआरी ॥

तजउँ न नारद कर उपदेसू ।   आप कहहिं सत बार महेसू ॥

(मानस १/८१/३)

पार्वतीजीके मनमें यह भाव था कि शिवजीमें ऐसी शक्ति ही नहीं है कि वे मुझे स्वीकार न करें । इसी प्रकार हम सबका सम्बन्ध भगवान्‌के साथ है । हम भगवान्‌से विमुख भले ही हो जायँ, पर भगवान्‌ हमसे विमुख कभी हुए नहीं, हो सकते नहीं । हमारा त्याग करनेकी उनमें शक्ति नहीं है ।



[*] वस्तुतः यद्यपि भगवान्‌के साथ हमारा सदासे ही अटूट सम्बन्ध है, तथापि भगवान्‌से विमुख हो जानेके कारण हमें उस सम्बन्धका अनुभव नहीं होता ।


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।। श्रीहरिः ।।

                                       


आजकी शुभ तिथि–
  कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा, वि.सं.-२०७८, शुक्रवार
                      

भगवत्प्राप्तिके लिये 

भविष्यकी अपेक्षा नहीं


भगवान्‌की प्राप्ति साधनके द्वारा होती है‒यह बात भी यद्यपि सच्ची है, परन्तु इस बातको मानकर चलनेसे साधकको भगवत्प्राप्ति देरसे होती है । यदि साधकका ऐसा भाव हो जाय कि मुझे तो भगवान्‌ अभी मिलेंगे, तो उसे भगवान्‌ अभी ही मिल जायँगे । वे यह नहीं देखेंगे कि भक्त कैसा है, कैसा नहीं है ? काँटोंवाले वृक्ष हों, घास हो, खेती हो, पहाड़ हो, रेगिस्तान हो या समुद्र हो; वर्षा सबपर समानरूपसे बरसती है । वर्षा यह नहीं देखती कि कहाँ पानीकी आवश्यकता है और कहाँ नहीं ? इसी प्रकार जब भगवान्‌ कृपा करते हैं तो यह नहीं देखते कि यह पापी है या पुण्यात्मा ? अच्छा है या बुरा ? वे सब जगह बरस जाते अर्थात्‌ प्रकट हो जाते हैं[*]

पापी-से-पापी पुरुषको भी भगवान्‌ मिल सकते हैं (गीता ९/३०) । सदन कसाई और डाकुओंको भी भगवान्‌ मिल गये थे ! भगवान्‌ तो सर्वदा सर्वत्र विद्यमान हैं, केवल भावकी आवश्यकता है । अन्तःकरणके अशुद्ध होनेपर वैसा भाव नहीं बनता, यह बात ठीक होते हुए भी वस्तुतः साधकके लिये बाधक है । शास्त्रोंमें पतिव्रता स्त्रीकी बड़ी महिमा गायी गयी है कि भगवान्‌ भी उसके वशमें हो जाते हैं । यदि कोई कहें कि हममें पातिव्रत-भाव नहीं बन सकता, तो यह उसकी भूल है । पापी-से-पापी पुरुषोंकी स्त्रियाँ पतिव्रता हुई हैं और श्रेष्ठ-से-श्रेष्ठ पुरुषोंकी भी । भगवान्‌ श्रीरामकी पत्नी सीताजी भी पतिव्रता थीं और राक्षसराज रावणकी पत्नी मन्दोदरी भी । ऐसा नहीं कि श्रीरामकी पत्नी तो पतिव्रता हो सकती है, पर रावणकी पत्नी नहीं । पातिव्रत-धर्मका पालन करनेके कारण ही मन्दोदरी तो भगवान्‌ श्रीरामको तत्त्वसे जानती थी, परन्तु रावण नहीं जानता था (द्रष्टव्य‒मानस, लंका१५-१६) ।

वर्तमान युग (कलियुग)-में तो भगवान्‌ सुगमतासे मिलते हैं; क्योंकि अब उनके ग्राहक बहुत कम हैं । ग्राहक बहुत कम हों तो माल सस्ता मिलता है; क्योंकि तब बेचनेवालेको गरज होती है । इसलिये ऐसा भाव नहीं रखना चाहिये कि इस घोर कलियुगमें भगवान्‌ इतनी सुगमतासे कैसे मिलेंगे ?

अपना दृढ़ विचार कर लें कि चाहें दुःख आये या सुख, अनुकूलता आये या प्रतिकूलता, हमें तो भगवान्‌को प्राप्त करना ही है । यदि हम पहले अपने अन्तःकरणको शुद्ध करनेमें लग जायँगे तो भगवत्प्राप्तिमें बहुत देर लगेगी । हमारे उद्योग करनेकी अपेक्षा भगवान्‌की अनन्त अपार कृपाशक्ति हमें बहुत शीघ्र शुद्ध कर देगी । बच्चा कीचड़से लिपटा भी हो, यदि माँकी गोदमें चला जाय तो माँ स्वयं ही उसे साफ कर देती है ।



[*] आदि शंकराचार्यजीने कहा है‒

अयमुत्तमोऽयमधमो   जात्या  रूपेण   सम्पदा वयसा ।

श्‍लाघ्योऽश्‍लाघ्यो वेत्थं  न  वेत्ति  भगवाननुग्रहावसरे ॥

अन्तःस्वभावभोक्ता       ततोऽन्तरात्मा       महामेघः ।

खदिरश्‍चम्पक   इव   वा    प्रवर्षणं   कि   विचारयति ॥

(प्रबोधसुधाकर २५२-२५३)

‘किसीपर कृपा करते समय भगवान्‌ ऐसा विचार नहीं करते कि यह जाति, रूप, धन और आयुसे उत्तम है या अधम ? स्तुत्य है या निन्द्य ? यह अन्तरात्मा (श्रीकृष्ण)-रूपी महामेघ आन्तरिक भावोंका भोक्ता है; मेघ क्या वर्षाके समय इस बातका विचार करता है कि यह खदिर (खैर) है अथवा चम्पक (चंपा) ?’

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