।। श्रीहरिः ।।

                                                         


आजकी शुभ तिथि–
   मार्गशीर्ष कृष्ण चतुर्थी, वि.सं.-२०७८, मंगलवार
          मनुष्य-जीवनकी सफलता


शरीर-निर्वाहके लिये वस्तुओंकी आवश्यकता होती है, रुपयोंकी नहीं । कारण कि वस्तुएँ स्वयं काम आती हैं, पर रुपये स्वयं काम नहीं आते । रुपये वस्तुओंके द्वारा काम आते हैं, अतः रुपयोंसे वस्तुएँ विशेष आवश्यक हैं । वस्तुओंसे भी आवश्यक शरीर है । शरीरके लिये ही वस्तुएँ होती हैं । शरीरका जो महत्व है, वह वस्तुओंका नहीं है । पशु आदिके शरीर भी बहुत कामके हैं; क्योंकि उनसे मनुष्यके निर्वाहकी कई वस्तुएँ पैदा होती हैं; जैसेगायसे दूध, भेड़से ऊन आदि । परन्तु उनसे भी बढ़कर है मनुष्यका शरीर, जिससे यह लोक और परलोक दोनों सुधर सकते हैं ।

शास्त्रोंमें मनुष्य-शरीरकी बड़ी महिमा आती है । इस शरीरमें बढ़िया चीज क्या है ? इसमें बढ़िया चीज हैविवेक । जिससे सार-असार, नित्य-अनित्य, कर्तव्य-अकर्तव्यइन बातोंका ठीक तरहसे बोध होता है, उसे ‘विवेक’ कहते हैं । यह विवेक सर्वोपरि है । इस विवेककी ही महिमा है । यह विवेक जितना अधिक होगा, उतना ही मनुष्य श्रेष्ठ होगा । व्यवहारमें भी किसी मनुष्यका अधिक आदर होता है तो उसमें विवेक ही कारण है । मनुष्यमें विवेक-शक्ति जितनी अधिक जाग्रत्‌ होगी, उतना ही अधिक वह आदरणीय हो जायगा । कारण कि विवेक-शक्तिसे वह हरेक बातका ठीक-ठीक निर्णय करेगा । इस विवेक-शक्तिकी महिमा मनुष्यसे भी बढ़कर है । कारण कि विवेक-शक्ति होनेसे ही मनुष्य-शरीरकी इतनी महिमा है । मनुष्यके इस ढाँचे (शरीर)-की आकृतिकी महिमा नहीं है ।

विवेकसे भी बढ़कर क्या है ? विवेकसे भी बढ़कर हैपरमात्मा । विवेकके द्वारा सार-असार, नित्य-अनित्यको समझकर नित्य, निर्विकार और सर्वोपरि परमात्मतत्त्वको प्राप्त कर लेनेमें ही मनुष्य-शरीरकी सफलता है । उसे प्राप्त न करके सांसारिक भोगोंमें ही समय लगा दिया तो मनुष्य-शरीर सफल नहीं हुआ । भोगका सुख तो पशु-पक्षियोंको भी मिलता है, वे भी आरामसे रहते है । मैंने ऐसे कुत्तोंको देखा है, जिनकी देखभालके लिये आदमी रहते हैं । उनके रहनेके कमरोंमें गर्मीके दिनोंमें खसखसके टाटे लगे रहते हैं, बैठनेके लिये बहुत अच्छा बिछौना होता है, ऊपर पंखे लगे रहते हैं, टहलनेके लिये जाते हैं तो आदमी साथ रहते हैं, मोटर, हवाई जहाजमें वे यात्रा करते हैं, आदि । मनुष्योंमें भी बहुत कम आदमियोंको ऐसा आराम मिलता है । अतः सांसारिक सुखभोग और आराम मिलना होगा तो कुत्ते, गधे आदिकी योनिमें भी मिल जायगा । परन्तु परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति इस मनुष्यमें ही हो सकती है । मनुष्यको छोड़कर दूसरे जितने भी पशु-पक्षी हैं, वे परमामतत्त्वको समझ भी नहीं सकते ।

पशुओंमें सबसे उत्तम गाय मानी गयी है । गोबर और गोमूत्रसे पवित्रता आती है, रोगोंका नाश होता है । गाय पृथ्वीको पुष्ट करती है और पृथ्वी गायको पुष्ट करती हैइन दोनोंकी पुष्टिसे सब मनुष्योंका पालन होता है, उनके शरीरोंका निर्वाह होता है । इतनी श्रेष्ठ गायको भी आप परमात्मतत्त्वके विषयमें नहीं समझा सकते कि परमात्मा ऐसे हैं ।

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।। श्रीहरिः ।।

                                                        


आजकी शुभ तिथि–
  मार्गशीर्ष कृष्ण तृतीया, वि.सं.-२०७८, सोमवार
            मनुष्य-जीवनका उद्देश्य


जैसे, आपने रुपयोंका एक बक्सा भर लिया और हमने रद्दी अखबारोंका एक बक्सा भर लिया । अगर काममें न लें तो रुपये और रद्दीमें क्या फर्क हुआ ? ऐसे ही एक बक्सेमें सोना रखा जाय और एक बक्सेमें पत्थर रखे जायँ । काममें लेनेपर सोना अपनी जगह है और पत्थर अपनी जगह है । परन्तु अगर काममें न लें तो सोना और पत्थरमें क्या फर्क हुआ ?

इससे सिद्ध हुआ कि ये चीजें खर्च करनेसे ही काम आती हैं, संग्रह करनेसे नहीं; नहीं तो छोड़कर मरना पड़ेगा ही । अब ज्यादा धन छोड़कर मर गये तो क्या और थोड़ा धन छोड़कर मर गये तो क्या ? अपने साथ उसका सम्बन्ध तो रहेगा नहीं । इसलिये आपके पास जो वस्तुएँ हैं उनको यथायोग्य खर्च करो । खर्च करनेसे वे अपने काम भी आयेंगी और दूसरोंके काम भी आयेंगी । रुपये आदि वस्तुओंको यों ही नष्ट करना भी मनुष्यता नहीं है और उनका केवल संग्रह करना भी मनुष्यता नहीं है । यथायोग्य जहाँ चाहिये, वहाँ खर्च करना है और न्यायपूर्वक धनका उपार्जन करना है । यह मनुष्यता है । लोभमें नहीं फँसना है । निर्वाहके लिये भोजन आदि करना है, जिससे शरीर ठीक रहे । भगवान्‌का भी भजन करें, संसारकी सेवा भी करें और घरका काम-धन्धा भी करें, इसलिये शरीरको ठीक रखना है । अगर भोगोंमें ही लग जायँगे तो भोग भोगते शरीर खराब हो जायगा, किसी कामके लायक नहीं रहेगा । पारमार्थिक उन्नति तो कर ही नहीं सकेंगे, लौकिक काम-धन्धा भी नहीं होगा । कारण कि रोगी शरीरसे कुछ भी सेवा नहीं हो सकेगी । पदार्थोंका संग्रह करना और भोग भोगना‒ये असुरोंके लक्षण हैं, मनुष्योंके लक्षण नहीं हैं । यह आसुरी सम्पत्ति है, जो बाँधनेवाली है‒‘निबन्धायासुरी मता’ (गीता १६/५)।

मनुष्यको यह होश रखना चाहिये कि केवल संग्रह करनेके लिये नहीं कमाना है । केवल भोग भोगनेके लिये, ऐश-आराम करनेके लिये नहीं कमाना है; किन्तु अपना निर्वाहमात्र करके पारमार्थिक और लौकिक व्यवहारमें उसका सदुपयोग करना है । पारमार्थिक उन्नति करना है । दूरदृष्टि रखनी है कि मरनेके बाद हमारा कल्याण हो जाय, मुक्ति हो जाय । अगर पाप करते रहोगे तो आगे नरकोंमें जाना पड़ेगा, चौरासी लाख योनियोंमें जाना पड़ेगा, इसपर बहुत विचार करनेकी आवश्यकता है । मनुष्यका खास उद्देश्य परमात्मतत्त्वको प्राप्त करना है, अपना कल्याण करना है । कल्याण क्या है ? लाभ तो पूरा मिल जाय और नुकसान किसी तरहका न हो । सुख ऊँचा-से-ऊँचा मिल जाय और दुःखकी वहाँ पहुँच न हो । केवल आनन्द-ही-आनन्द रहे । इसीको कल्याण कहते हैं, मुक्ति कहते हैं । इसको प्राप्त करनेके लिये ही मानव-शरीर मिला है, तुच्छ भोगोंमें फँसकर महान् दुःख पानेके लिये नहीं ।

नारायण !     नारायण !!     नारायण !!!

‒ ‘वास्तविक सुख’ पुस्तकसे

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।। श्रीहरिः ।।

                                                       


आजकी शुभ तिथि–
  मार्गशीर्ष कृष्ण द्वितीया, वि.सं.-२०७८, रविवार
            मनुष्य-जीवनका उद्देश्य


साधरण मनुष्यकी बुद्धि आरम्भको देखती है, पर उसके अन्तको नहीं देखती । परन्तु विचारवान् मनुष्य उसके अन्तको देखते हैं कि इसका नतीजा क्या होगा ? नतीजा देखनेवाले तो विवेकी पुरुष होते हैं, पर जो नतीजा न देखकर आरम्भ देखते हैं, वे पशु होते हैं । जो रोगी आदमी जीभके थोड़े-से सुखके वशमें होकर कुपथ्य कर लेता है, तीन अंगुल जीभके वशमें होकर साढ़े तीन हाथके शरीरको बिगाड़ लेता है, वह विचारवान् पुरुष नहीं कहलाता । विचारवान्‌, बुद्धिमान्‌ वही कहलाता है, जो कुपथ्य न करे । विचारवान् मनुष्य ऐसा काम नहीं करेंगे, जिससे नरकोंमें जाना पड़े, चौरासी लाख योनियोंमें भटकना पड़े, बार-बार दुःख पाना पड़े । ऐसे कामके वे नजदीक ही नहीं जायेंगे । वे वही काम करेंगे, जिससे वे सदाके लिये सुखी हो जायँ ।

मनुष्यमें विवेककी प्रधानता है । उस विवेकको महत्त्व देकर ही अपना उद्धार करना है । विवेककी प्रधानता नतीजेपर सोचनेमें हैं, तात्कालिक दृष्टि तो पशुओंकी होती है कि जो सामने दीखता है, वही ठीक है, बस आगे क्या होगा, इसकी परवाह नहीं । अभी जो मिल जाय, ले लो, फिर नतीजा क्या होगा, कोई परवाह नहीं‒ऐसे मनुष्योंमें और पशुओंमें क्या फर्क है ? मनुष्य तो वह है, जो यह देखे कि अन्तमें इसका परिणाम क्या होगा ? अभी भोग भोगनेमें और धनका संग्रह करनेमें लगे रहेंगे तो मरनेपर धन आदि पदार्थ यहीं रह जायेंगे और अपने किये  हुए कर्मोंका फल आगे भोगना पड़ेगा । इसलिये यहाँ धन भी कमाना है, शरीरका निर्वाह भी करना है; परन्तु लोभमें और भोगमें नहीं फँसना है‒यह सावधानी रखनी है । गृहस्थमें रहते हुए धन कमायें, सुविधाके अनुसार रहें, पर लोभ-बुद्धिसे और भोग-बुद्धिसे नहीं । तात्पर्य है कि लोभ-बुद्धिसे धन नहीं कमाना है और भोग-बुद्धिसे संसारमें सुख नहीं भोगना है । गीतामें आया है कि राग-द्वेषरहित होकर इन्द्रियोंके द्वारा विषयोंका सेवन किया जाय तो एक प्रसन्नता होती है । उस प्रसन्नतासे दुःखोंका नाश होता है । ऐसे प्रसन्नचित्तवाले साधककी बुद्धि बहुत जल्दी परमात्मतत्त्वमें स्थित हो जाती है (२/६४-६५) । इसलिये धन कमाना है और उसके द्वारा दूसरोंका उपकार करना है; परन्तु संग्रह नहीं करना है । लोभ-बुद्धि होनेसे ही संग्रहकी बुद्धि होती है । लोभी आदमी धनको अपने लिये और दूसरोंके लिये खर्च नहीं कर सकता । खर्च करनेसे ही पैसे काम आते हैं । खर्च और पैसा‒ये दो चीजें हैं । इन दोनोंमें खर्च करना बड़ी बात है, संग्रह करना बड़ी बात नहीं है । कारण कि संग्रह करनेसे दूसरोंके सुखमें भी बाधा पहुँचेगी और खुद भी सुख नहीं भोग सकोगे । लोभी आदमी धनके संग्रहका अभिमान करके अपनेको सुखी बेशक मान ले, पर उसका धन न खुदके काम आता है और न दूसरोंके काम आता है । जो अपने तथा दूसरोंके काम नहीं आता, उसे धन मानना ही गलती है ।

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।। श्रीहरिः ।।

                                                      


आजकी शुभ तिथि–
  मार्गशीर्ष कृष्ण प्रतिपदा, वि.सं.-२०७८, शनिवार
            मनुष्य-जीवनका उद्देश्य


एक खास बात ध्यान देनेकी है कि यह मानव-शरीर केवल अपना कल्याण करनेके लिये ही मिला है । धन कमाना और भोग भोगना‒यह मनुष्य-शरीरका प्रयोजन है ही नहीं । भोग भोगना तो हरेक योनिमें होता है । देवताओंसे लेकर नरकोंमें पड़े हुए जन्तुओंतकके लिये भोग मिलते हैं । इन्द्रियाँसे होनेवाला सुख स्वर्गमें भी मिलता है और नरकोंमें भी । नरकोंमें, जहाँ बड़ी घोर यातनाएँ दी जाती हैं, उबलते हुए तेलमें डाल दिया जाता है, शरीरके टुकड़े-टुकड़े कर दिये जाते हैं, तो भी नरकोंमें रहनेवाला जीव मरता नहीं । जब उसे उबलते हुए तेलसे निकाला जाता है, उस समय उसे सुखका अनुभव होता है । शरीरके टुकड़े-टुकड़े करनेपर दुःख होता है; परन्तु शरीर मिलनेपर एक सुख होता है । इस प्रकार इन्द्रियोंसे होनेवाला सुख तो नरकोंमें भी मिलता है; कुत्ते, गधे, सूअर आदिको भी सुख मिलता है । परन्तु मनुष्य-शरीर सुख भोगनेके लिये, ऐश-आराम करनेके लिये है ही नहीं । दुःख भोगनेके लिये भी यह मनुष्य-शरीर नहीं है । सुखकी मुख्यता स्वर्गमें रहती है और दुःखकी मुख्यता नरकोंमें रहती है । मनुष्य-शरीरमें सुख और दुःख दोनों ही आते हैं । परन्तु मनुष्य-शरीर सुख और दुःख‒दोनोंसे ऊँचा उठकर अपना कल्याण करनेके लिये मिला है ।

एक मार्मिक बात है । मनुष्यको जितनी सुख-सामग्री मिलती है, वह केवल दूसरोंका हित करनेके लिये मिलती है, और जितनी दुःख-सामग्री मिलती है, वह केवल सुख-बुद्धि हटानेके लिये मिलती है । ये दोनों बातें खूब सोचनेकी हैं । संसारका सुख क्या है ? जिस वस्तुकी चाहना होती है, वह वस्तु मिल जाय तो उससे सुख होता है । जैसे, धनकी लालसा हो तो धन मिलनेसे सुख होगा । जोरदार भूख लगे तो भोजन मिलनेसे सुख होगा । जोरदार प्यास लगे तो जल मिलनेसे सुख होगा । इस प्रकार कामनाकी पूर्ति होनेसे एक सुख होता है । वह सुख कामनाके आधीन है । अगर जोरदार भूख न हो और भोजन बढ़िया मिल जाय तो सुख नहीं होगा । मनमें लोभ नहीं होगा तो धनके मिलनेसे सुख नहीं होगा । तात्पर्य है कि जिस चीजके न मिलनेसे दुःख होगा, उस चीजके मिलनेसे ही सुख होगा, संसारके जितने संयोग हैं, उनमें पहले दुःख होगा, तभी उनसे सुख मिलेगा । अगर दुःख नहीं होगा तो संसारके पदार्थ सुख नहीं देंगे । अतः उस सुखका कारण दुःख हुआ और उस सुखके बादमें भी दुःख जरूर होगा । जैसे, धन मिलनेसे सुख होता है और धन चला जाता है तो दुःख होता है । अनुकूल सामग्री मिले तो सुख होता है और वह नष्ट हो जाय तो दुःख होता है । सुख आता है तो अच्छा लगता है और जाता है तो बुरा लगता है । ऐसे ही दुःख आता है तो बुरा लगता है और जाता है तो अच्छा लगता है । अच्छा लगना और बुरा लगना दोनोंमें हैं । एक तरफ सुख और एक तरफ दुःख होता है, पर दोनोंको तौलकर देखा जाय तो कोई फर्क नहीं है !

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।। श्रीहरिः ।।

                                                     


आजकी शुभ तिथि–
  कार्तिक पूर्णिमा, वि.सं.-२०७८, शुक्रवार
          तत्त्वका अनुभव कैसे हो ?


एक बहुत दामी बात बताता हूँ, जो मैंने पुस्तकोंमें पढ़ी है और सन्तोंसे सुनी है । परमात्मा हैं और वे सब समयमें हैं । कोई ऐसा समय नहीं जिसमें वे नहीं हों । समय उनके अन्तर्गत है । उनका किसी भी समयमें अभाव नहीं होता, पर उनमें समयका अभाव हो जाता है । वे परमात्मा सब समयमें हैं, तो अभी भी हैं । अगर अभी नहीं हैं तो सब समयमें कैसे हुए ? वे सब जगह हैं, तो यहाँ भी हैं । अगर यहाँ नहीं हैं तो उनको सब जगह कैसे कहा जाय ? वे सबमें हैं, तो मेरेमें भी हैं । अगर मेरेमें नहीं हैं तो उनको सबमें कैसे कहा जाय ? एक और विलक्षण बात है कि वे अपने हैं ! शरीर अपना नहीं है, बुद्धि अपनी नहीं है, इन्द्रियाँ अपनी नहीं हैं; क्योंकि ये सब-के-सब प्रकृतिके कार्य हैं, जड़ हैं, उत्पन्न और नष्ट होनेवाले हैं ।

जैसे, आप कहते हैं कि ‘मैं हूँ’, तो इसमें कोई सन्देह होता है क्या कि ‘मैं हूँ कि नहीं हूँ’ ? किसीसे पूछना पड़ता है क्या ? किसीसे गवाही लेनी पड़ती है क्या ? यह तो स्वतःसिद्ध है । इस ‘मैं हूँ’ में ‘मैं’-पन तो प्रकृतिको लेकर है और हूँ’-पन ‘है’ (परमात्मा)-को लेकर है । वह ‘है’ ही ‘हूँ’ हुआ है । प्रकृतिसे सम्बन्ध छूटते ही ‘है’ रह जाता है और ‘हूँ’-पन मिट जाता है‒यह सन्तोंका अनुभव है । इस बातको आप दृढ़तासे मान लें, तो काम ठीक हो जायगा । इसमें एक बड़ी बाधा है । वह बाधा क्या है ? यह बताता हूँ । आप विशेष ध्यान दें । साधन, भजन-ध्यान करनेपर भी इधर दृष्टि नहीं जाती । वर्षोंतक व्याख्यान देनेपर भी यह बात मेरे अक्लमें नहीं आयी । वही बात अभी आपको सीधी कह दूँ, जिसे आप अभी मान लो । यह जो संयोगजन्य सुख है, इसका हम जो रस लेते हैं, बस यही खास बाधा है । खाना-पीना, सोना-जागना, बैठना-बोलना तथा मान-बड़ाई आदि जितने हैं, इनके सम्बन्धसे एक सुख होता है । इस सुखमें जो आसक्ति तथा खिंचाव है, यही खास बाधा है । इसको मिटानेका उपाय क्या है ? यह भाव हो जाय कि दूसरोंको सुख कैसे मिले ? यह कपड़ा बढ़िया है तो दूसरोंको कैसे मिले ? मान-बड़ाई बढ़िया है तो दूसरोंको कैसे मिले ? इस प्रकार दूसरोंको देनेका भाव बन जाय । यह बड़ा सुगम उपाय है संयोगजन्य सुखसे छूटनेका ! यह काम आप घरसे ही शुरू कर दो । माता-पिता, स्त्री-पुत्र आदि सबको सुख पहुँचाना है, पर उनसे सुख नहीं लेना है । आप उनको सुख पहुँचाते हैं, पर भाव यह रहता है कि पुत्र मेरा कहना माने, माँकी मैं सेवा करूँ तो वह अपने गहने आदि मेरेको ही दे‒यहीं खतरा है । लेनेका भाव ही खास बाँधनेवाली चीज है । अतः लेनेका भाव छोड़कर केवल माँकी प्रसन्नताके लिये ही माँकी सेवा करो । माँसे कह दो कि आपके पास जो गहना, रुपया आदि है, वह चाहे मेरे भाईको दे दो, चाहे मेरी बहनको दे दो, चाहे ब्राह्मणको दे दो, जहाँ आपकी मर्जी हो, वहाँ दे दो । पर मेरेसे तो केवल सेवा ले लो, इसमें आप संकोच मत करो ।

हमारा काम केवल सेवा करना है । माता-पिताकी सेवा करनी है । स्त्रीको विवाह करके लाये तो उसको दुःख न हो‒यह हमारा कर्तव्य है, चाहे वह हमारी सेवा करे या न करे । वह हमें तंग करे, दुःख दे तो ऐसा मानो कि भगवान्‌ने हमारेपर बड़ी कृपा की है । अगर वह मनोऽनुकूल सेवा करती तो हम मोहमें फँस जाते । भगवान्‌ ही माता-पिता, स्त्री-पुत्र आदिके रूपमें मेरेसे सेवा ले रहे हैं‒ऐसा भाव हो जाय तो सुखकी आसक्ति छूट जायगी । वह छूटी और परमात्माकी प्राप्ति हुई; क्योंकि परमात्मा तो हैं ही सब जगह । सब देशमें, सब कालमें, सब वस्तुओंमें, सम्पूर्ण घटनाओंमें, सम्पूर्ण परिस्थितियोंमें वे ही तो हैं । दूसरा आये कहाँसे ? अतः परमात्मप्राप्तिका बड़ा सुगम उपाय है कि सुख दे दें, और बाधा है‒सुख ले लें ।

नारायण !     नारायण !!     नारायण !!!

‒ ‘वास्तविक सुख’ पुस्तकसे

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।। श्रीहरिः ।।

                                                    


आजकी शुभ तिथि–
  कार्तिक शुक्ल  चतुर्दशी, वि.सं.-२०७८, गुरुवार
          तत्त्वका अनुभव कैसे हो ?


हम पढ़ाई करते हैं तो अध्यापक ‘क, ख, ग, घ.....’ लिखकर बता दे और हम वैसे ही मानकर याद कर लें तो हम पढ़े-लिखे हो जायँगे । ऐसे ही अंग्रेजीकी ‘A, B, C, D....’ लिखकर बता दे और हम वैसे ही मानकर सीख लें तो हमें अंग्रेजी आने लगेगी । अब इसका तो पता लगता नहीं कि ‘A’‒यह ‘ए’ कैसे हुआ ? दो लाइनें इस तरह खींच दीं तथा एक लाइन बीचमें लगा दी और कहा यह ‘A’ है, तो हमने मान लिया कि ठीक है साहब, यह ‘ए’ है । अब माननेके सिवाय दूसरा कोई उपाय नहीं है । अध्यापक जैसा कह दे, उसकी हाँ-में-हाँ मिला दे तो हम सीख जायँगे और एक दिन पंडित हो जायँगे । ऐसे ही जो सन्त-महात्मा हैं, जिनपर हमारी श्रद्धा है, वे जैसा कहें, उनकी हाँ-में-हाँ मिला दे तो फिर हमें वैसा ही अनुभव हो जायगा, इसमें किंचिन्मात्र भी सन्देह नहीं है । अक्षरोंके ज्ञानमें तो छोटा-बड़ा होता है; परन्तु तत्त्वज्ञानमें छोटा-बड़ा होता ही नहीं । आजतक सनकादिक, नारदजी, व्यासजी आदि जितने बड़े-बड़े महापुरुष हुए हैं, उनको जो बोध प्राप्त हुआ है, वही बोध आज एक साधारण आदमीको प्राप्त हो सकता है; जिससे बढ़कर कोई विद्वता नहीं है, जिससे बढ़कर कोई सुख-आनन्द नहीं है, जिससे बढ़कर कोई उन्नति नहीं है, जिससे बढ़कर कोई चीज नहीं है, उसको मनुष्यमात्र प्राप्त कर सकता है । उस तत्त्वको प्राप्त करनेके लिये ही मनुष्यका निर्माण हुआ है । खाना-पीना, सोना आदि तो कुत्तोंमें, गधोंमें भी होता है । उनमें भी बाल-बच्चे होते हैं, परिवार होता है । अब इतना ही काम मनुष्यने कर लिया तो मनुष्यजन्मकी महिमा क्या हुई ? यह तो पशुपना ही है । आकृति तो मनुष्यकी दीखती है, पर मनुष्यपना नहीं है । मनुष्यपना तो वह है, जिसके लिये भगवान्‌ने कृपा करके मनुष्य-शरीर दिया है‒

कबहुँक करि करुना नर देही ।

देत  ईस  बिनु   हेतु  सनेही ॥

(मानस ७/४४/३)

ऐसे मौकेको भोग भोगने और संग्रह करनेमें ही लगा दिया ! यह तू किस काममें लग गया ? यह क्या धंधा बीचमें ही छेड़ दिया ? कहाँ पहुँचना था तुझे और कहाँ बीचमें अटक गया ? ये भोग भी यहीं छूट जायँगे, शरीर भी यहीं छूट जायगा, रुपये भी यहीं छूट जायँगे । जो छूट जायँगे उनसे तुझे क्या मिला ? असली मिलना तो वह है, जो कभी छूटे नहीं, सदा साथ रहे । इसलिए सज्जनो ! चीज तो वह लो, जो सदा साथ रहे, कभी इधर-उधर हो ही नहीं । शरीरके टुकड़े-टुकड़े कर दिए जायँ, तो भी उस चीजको कोई हमारेसे छीन न सके ।

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।। श्रीहरिः ।।

                                                   


आजकी शुभ तिथि–
  कार्तिक शुक्ल त्रयोदशी, वि.सं.-२०७८, बुधवार
          तत्त्वका अनुभव कैसे हो ?


किसीसे अनुभवकी बात पूछना और अनुभवकी बात कहना‒ये दोनों ही बढ़िया चीज नहीं हैं । दूसरी बात, कोई भी व्याख्यानदाता अपनी दृष्टिसे बढ़िया-से-बढ़िया बात ही कहेगा; क्योंकि अपनी इज्जत सभी चाहते हैं । वह भी तो अपनी इज्जत चाहता है, इसलिये वह घटिया बात क्यों कहेगा ? वह अपना अनुभव छिपायेगा ही कैसे ?

सन्तोंकी वाणीमें आया है कि साधु-सन्तकी परीक्षा शब्दसे होती है‒‘साधु पिछानिये शबद सुनाता ।’ वह क्या बोलता है‒इससे भावोंका पता लग जाता है । किसी भी आदमीसे आप ठीक तरहसे बात करो, उसकी बातोंपर ध्यान दो तो उसके भीतरके भावोंका पता लग जायगा कि वह कैसा है ? कहाँतक पहुँचा हुआ है ?

गीताको देखनेसे पता लगता है कि भगवान्‌का क्या भाव है । गीता पढ़नेपर हमारी समझमें यह बात आयी कि  भगवान्‌ने दो बातोंपर विशेष जोर दिया है‒एक तो जीवन-पर्यन्त साधन करना और दूसरा अन्तकालमें सावधान रहना । इन दो विषयोंपर भगवान्‌ जितना बोले हैं, उतना दूसरे किसी विषयपर नहीं बोले ।

श्रोता‒उस तत्त्वका अनुभव कैसे हो महाराजजी ?

स्वामीजी‒पहले यह बात मान लो कि सब कुछ परमात्मा ही है; हमारेको दीखे, चाहे न दीखे; हमारी समझमें आये, चाहे न आये । गीताका खास सिद्धान्त है‒‘वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः’ (७/१९) । अर्थात्‌ सब कुछ परमात्मा ही है‒ऐसा अनुभव करनेवाला महात्मा बहुत दुर्लभ है । ऐसे ऊँचे दर्जेंके महात्माओंकी बातें हमने सुनी हैं, पुस्तकोंसे पढ़ी हैं कि वे किसीको कोई बात समझाते हैं या प्रश्नका उत्तर देते हैं, तो भी उनके मनमें यह बात नहीं आती कि मैं तो समझदार हूँ और ये बेसमझ हैं, अनजान हैं । इनको मैं जना दूँ; यह सीखता है तो मैं सिखा दूँ‒ऐसा भाव नहीं रहता । तो क्या भाव रहता है ? कि हमारे प्रभु ही व्यापकरूपसे होकर पूछ रहे हैं । उनकी जो धारणा है, उसके अनुसार मैं कह रहा हूँ‒इस तरह प्रभुकी मैं सेवा कर रहा हूँ । मेरे भीतर जो बोलनेकी एक आसक्ति है, कामना है, उसको पूरी करनेके लिये प्रभु अनजान बनकर पूछते हैं । केवल मेरेपर कृपा करनेके लिये ही पूछते हैं । मेरी बोलनेकी आसक्तिको मिटानेके लिये ही प्रभुने यह सब संयोग रचा है, यह उनकी ही लीला है । संसारका जो स्वरूप दिखता है, वह तो प्रभुका स्वरूप है और संसारकी जो चेष्टा है, वह सब प्रभुकी लीला है । प्रभु ही मेरेपर कृपा करनेके लिये विलक्षण रीतिसे लीला कर रहे हैं । उनका किसीसे कोई मतलब नहीं है, कोई प्रयोजन नहीं है; उनको न तो किसीसे कुछ लेना है, न कुछ सीखना है, वे तो केवल कृपा करके ऐसा कर रहे हैं । अतः उनकी कृपा-ही-कृपा है‒यह बात हमलोगोंको मान लेनी चाहिये । जो महापुरुषोंका अनुभव है, उसको हम पहले ही मान लें तो फिर वह दीखने लग जायगा ।

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