।। श्रीहरिः ।।

                                                  


आजकी शुभ तिथि–
  कार्तिक शुक्ल द्वादशी, वि.सं.-२०७८, मंगलवार
               दृढ़ निश्चयकी महिमा


परमात्माको मान लें और संसारको जान लें । परमात्माको कैसे मानें ? कि परमात्मा तो हैं; और संसारको कैसे जानें ? कि संसार नहीं है । संसारको ठीक जान लेनेपर परमात्मा प्रकट हो जाते हैं । ‘यह बात ठीक दीखती है, तो फिर जँचती क्यों नहीं ?’ इसमें कारण यह है कि संसारसे सुख लेते हो । जबतक सांसारिक सुखका लोभ रहेगा, तबतक ‘यह संसार नाशवान् है, असत्य है’‒ऐसा कहनेपर भी दीखेगा नहीं ।

काला भौंरा बाँसमें छेद करके रहता है । बाँस कितना कड़ा होता है, पर भौरेके दाँत इतने कठोर होते हैं कि उसमें भी गोल-गोल छेद कर देता है ! परन्तु वह कमलके भीतर बैठता है, तब रातमें कमलके बन्द होनेपर भी वह उसे काटकर बाहर नहीं आता । वह सोचता है कि रात चली जायेगी, प्रभात हो जायगा, सूर्यका उदय हो जायगा, तब कमल खिल जायगा और उस समय मैं उड़ जाऊँगा । वह बाँसमें छेद कर देता है, पर कमलकी पंखुड़ी उससे नहीं कटती । क्या वह इतना कमजोर है ? वह उस कमलसे सुख लेता है, इसलिये कमजोर हो जाता है ! ऐसे ही मनुष्य संसारसे सुख लेता है, इसलिये कमजोर हो जाता है । बीकानेरकी बोलीमें एक बात आती है‒‘रांडरा काचा’ अर्थात् स्त्रीके आगे बिलकुल कच्चा, स्त्रीका गुलाम । इस संसाररूपी स्त्रीके आगे यह मनुष्य कच्चा, कमजोर हो जाता है । कच्चापन क्या है ? संसारसे सुख लेता है, यही कच्चापन है । इस कच्चापनको दूर करना है ।

‘परमात्मा है’‒यह तो मान्यता है और ‘संसार नाशवान् है’‒यह प्रत्यक्ष है । संसारको ठीक जान लो तो परमात्मा प्रकट हो जायँगे, इतनी-सी बात है । थोड़ी देर बैठकर इस बातको जमा लो कि बाहर-भीतर, ऊपर-नीचे सब जगह परमात्मा ही हैं । जैसे समुद्रमें गोता लगानेपर चारों तरफ जल-ही-जल है, ऐसे ही सब जगह परमात्मा-ही-परमात्मा हैं । संसार तो बेचारा यों ही नष्ट हो रहा है !

श्रोता‒संसारका सुख लेना कैसे मिटे ?

स्वामीजी‒इसको अपनी कच्चाई समझें तो यह मिट जायगा । इसको तो आप मिटायेंगे, तभी मिटेगा । दूसरा नहीं मिटा सकता । अतः आप अपना पूरा बल लगायें । फिर भी न मिटे तो ‘हे नाथ ! हे नाथ !’ कहकर भगवान्‌को पुकारें । यह नियम है कि जब आदमी निर्बल हो जाता है, तब वह सबलका सहारा लेता ही है । एक तो सांसारिक सुखासक्तिको मिटानेकी चाहना नहीं है और एक हम उसको मिटाते नहीं हैं, ये दो बाधाएँ हैं । ये दोनों बाधाएँ हट जायँ, फिर भी सुखाक्ति न मिटे तो उस समय आप स्वतः परमात्माको पुकार उठोगे । बालककी भी मनचाही नहीं होती तो वह रो पड़ता है और रोनेसे सब काम हो जाता है । ऐसे ही सज्जनो ! उस प्रभुके आगे रो पड़ो तो सब काम हो जायगा । वे प्रभु सर्वथा सबल हैं । उनके रहते हम दुःख क्यों पायें ? भगवान्‌ हमारे हैं । बालक कहता है कि माँ मेरी है, तो माँको उसे गोदमें लेना पड़ेगा । वह तो केवल एक जन्मकी माँ है; परन्तु वे प्रभु सदाकी और सबकी माँ है ।

नारायण !     नारायण !!     नारायण !!!

‒ ‘वास्तविक सुख’ पुस्तकसे

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।। श्रीहरिः ।।

                                                 


आजकी शुभ तिथि–
  कार्तिक शुक्ल द्वादशी, वि.सं.-२०७८, सोमवार
               दृढ़ निश्चयकी महिमा


मैंने सन्तोंसे सुना है कि ‘परमात्मा है’‒ऐसा दृढ़ निश्चय हो जाय तो अपने-आपको जनानेकी जिम्मेदारी भगवान्‌पर आ जाती है । हम भगवान्‌को अपने उद्योगसे नहीं जान सकते, पर ‘भगवान्‌ सब जगह है’‒यह भाव दृढ़ होनेपर भगवान्‌ खुद अपने-आपको जना देते हैं ।

भगवान्‌ सब जगह हैं‒यह बात हमें जँची हुई है ही, फिर इसमें कमी क्या है ? इसमें एक बातकी कमी है कि हम जानते हैं कि यह संसार पहले ऐसा नहीं था और फिर ऐसा नहीं रहेगा तथा अभी भी हरदम बदल रहा है, फिर भी संसारको ‘है’ मान लेते हैं अर्थात्‌ अपने इस अनुभवका निरादर करते हैं । इस कारण ‘परमात्मा है’‒इस मान्यताकी दृढ़तामें कमी आ रही है । इसलिये अपने अनुभवका आदर करें ।

जैसे, जबतक नींद नहीं आती, तबतक स्वप्न नहीं आता और नींद खुलनेक बाद भी स्वप्न नहीं रहता, बीचमें (नींदमें) स्वप्न आता है । बीचमें भी आप उसको सच्चा मान लेते हो, नहीं तो वह है ही नहीं । इसी तरह संसारको मान लें कि यह संसार, शरीर पहले नहीं थे, पीछे भी नहीं रहेंगे, बीचमें भी केवल दीखते हैं, वास्तवमें हैं नहीं । अब कोई कहे कि संसार, शरीर आदि प्रत्यक्ष दीखते हैं, इनको ‘नहीं’ कैसे मानें ? तो भाई ! स्वप्न दीखनेमें कम सच्चा थोड़े ही दीखता था । जब दीखता था, तब ठीक सच्चा ही दीखता था । परन्तु जगनेपर स्वप्न नहीं दीखता । इससे सिद्ध हुआ कि वह था ही नहीं । आजसे सौ वर्ष पहले ये शरीर थे क्या ? और सौ वर्षके बाद ये शरीर रहेंगे क्या ? हरेक आदमी मान लेगा कि बिलकुल नहीं रहेंगे । ‘आदावन्ते च यन्नास्ति वर्तमानेऽपि तत्तथा’ अर्थात्‌ जो आदि और अन्तमें नहीं होता, वह वर्तमानमें भी नहीं होता । इस दृष्टिसे यह सब-का-सब निरन्तर ‘नहीं’ में भरती हो रहा है । जितनी उम्र बीत गयी, उतनी तो ‘नहीं’ में भरती हो ही गयी । अब जितनी उम्र बाकी रही, वह भी प्रतिक्षण ‘नहीं’ में भरती हो रही है । यह सब संसार प्रतिक्षण अभावमें जा रहा है । जितना सर्ग है, वह प्रतिक्षण प्रलयमें जा रहा है । जितना महासर्ग है, वह प्रतिक्षण महाप्रलयमें जा रहा है ।

इस संसारको नाशवान्‌ कहते हैं । जैसे धनके कारण मनुष्य धनवान्‌ कहलाता है । अगर धन नहीं हो तो वह धनवान्‌ नहीं कहलाता, ऐसे ही संसार नाशवान्‌ कहलाता है तो इसमें नाशके सिवाय कुछ नहीं है, नाश-ही-नाश है । अगर ‘परमात्मा है’‒यह दृढ़ निश्चय हो जाय तो जो ‘नहीं’ को ‘है’ माना है, वह आड़ हट जायगी और परमात्मा प्रकट हो जायँगे ! कारण कि परमात्मा तो हैं ही, उनका कभी अभाव नहीं होता । परमात्मा सब जगह होनेसे यहाँ भी हैं, सब समयमें होनेसे अभी भी हैं, सबमें होनेसे अपनेमें भी हैं और सबके होनेसे हमारे भी हैं । उनका अभाव कभी हो नहीं सकता, कभी हुआ नहीं, जब कि संसारका भाव नहीं हो सकता‒ऐसा यथार्थ दृष्टिसे दृढ़तापूर्वक जानते ही संसारकी जगह परमात्मा दीखने लग जायँगे । अभी भी परमात्मा ही दीखते हैं; क्योंकि संसारकी तो सत्ता ही नहीं है । परमात्माकी सत्तासे ही यह संसार सत्य दीख रहा है । इसमें सत्य तो एक परमात्मा ही हैं । तो फिर यह संसार सत्य क्यों दीखता है ?

जासु सत्यता   तें जड़ माया ।

भास सत्य इव मोह सहाया ॥

(मानस १/११७/४)

मूर्खतासे ही यह संसार सत्य दीखता है । जो जानता है, पर मानता नहीं, उसे मूर्ख कहते हैं । जानता है कि यह संसार नाशवान्‌ है फिर भी इसको स्थिर मानता है‒यही मूर्खता है । हम जितना जानते हैं, उतना मान लें तो मूर्खता नहीं रहेगी और हम निहाल हो जायँगे ।

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।। श्रीहरिः ।।

                                                


आजकी शुभ तिथि–
  कार्तिक शुक्ल एकादशी, वि.सं.-२०७८, रविवार
                वैष्णव एकादशी-व्रत कल है
                      

भगवत्प्राप्तिसे ही 

मानव-जीवनकी सार्थकता


शरीर-निर्वाह-क्रियाका‒अर्थ है राग-द्वेषरहित होकर विषयोंका सेवन करना । भगवान्‌ने गीतामें बताया है‒

रागद्वेषवियुक्तैस्तु    विषयानिन्द्रियैश्चरन् ।

आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति ॥

(२/६४)

‘अपने वशमें की हुई राग-द्वेषरहित इन्द्रियाँद्वारा विषय-सेवन करनेवाला जितात्मा पुरुष प्रसाद (अन्तःकरणकी प्रसन्नता)-को प्राप्त होता है’

विषयोंका राग-द्वेषपूर्वक चिन्तन करनेसे मनुष्यका पतन होता है; क्योंकि विषयोंका ध्यान उनके प्रति मानव-हृदयमें आसक्तिका अंकुर उत्पन्न कर देता है और आसक्ति सब अनर्थोंकी जड़ है । यहाँतक कि आसक्तिसे मानवकी बुद्धि नष्ट होकर उसका पतन हो जाता है‒‘बुद्धिनाशात् प्रणश्यति’ (गीता २/६३) । किन्तु राग-द्वेषरहित होकर विषयोंका सेवन भी प्रसादकी प्राप्ति कराता है । यह विषय-सेवन राग-द्वेषके त्याग और संयमपूर्वक केवल शरीर-निर्वाहमात्रके लिये ही होना उचित है, न कि भोगबुद्धिसे । तभी वह मुक्तिका कारण होता है । अस्तु,

गृहस्थाश्रमी गृहस्थ-धर्मका पालन करके भी परमात्माकी प्राप्ति कर सकता है‒यह ऊपर बताया गया । अथवा वह वानप्रस्थ-आश्रममें प्रवेश करे और वहाँ तितिक्षा तथा संयमकी उत्कट साधनामें रत होकर परमात्माको प्राप्त करे । अथवा संन्यासकी योग्यता प्राप्त करके संन्यास-आश्रममें चला जाय । वहाँ बाहर-भीतरसे त्यागी होकर निरन्तर ब्रह्मचिन्तन करते हुए परमात्माको प्राप्त करे ।

जड-चेतनकी ग्रन्थिका नाम ही जीव है; इसलिये मानवमें जड अंशको लेकर सुख-भोग तथा संग्रहकी इच्छा होती है और चेतन अंशको लेकर मुमुक्षा अर्थात्‌ भगवान्‌की प्राप्तिकी इच्छा होती है । मुक्ति और भुक्तिकी इच्छाओंमें भोगोंकी इच्छा चाहे कितनी ही प्रबल हो जाय, वह परमात्माकी प्राप्तिकी इच्छाको मिटा नहीं सकती । जडता चेतनपर कुछ कालके लिये भले ही छा जाय, पर उसका अस्तित्व मिटा नहीं सकती । बल्कि परमात्माकी प्राप्तिकी इच्छा प्रबल और उत्कट हो जानेपर भोगेच्छाका अस्तित्व मिट जाता है; क्योंकि भोग और उनकी इच्छा दोनों ही अनित्य हैं । परमात्मा और उनका प्रेम दोनों नित्य हैं । परमात्माकी प्राप्तिकी इच्छा ही भगवान्‌के प्रेमका स्वरूप बन जाती है । प्रेम और भगवान्‌ दोनों एक हैं । जबतक भोगोंकी यत्किञ्चित् इच्छा है, तभीतक साधनावस्था है । जब परमात्माकी प्राप्तिकी इच्छा, मोक्षकी इच्छा, प्रेम-पिपासा मुख्य इच्छा बन जाती है, तब भोगेच्छा मिट जाती है । उसके मिटते ही नित्यप्राप्त परमात्माकी प्राप्ति हो जाती है । इस प्रकार मानव सहज ही अपने लक्ष्यको प्राप्त कर लेता है । वह कृतकृत्य, प्राप्त-प्राप्तव्य और ज्ञात-ज्ञातव्य हो जाता है । अर्थात्‌ उसने करनेयोग्य सब कुछ कर लिया, प्राप्त करनेयोग्य सम्पूर्ण लक्ष्य प्राप्त कर लिया और जाननेयोग्य सब कुछ जान लिया । इसीमें मानव-जीवनकी सार्थकता है ।

नारायण !     नारायण !!     नारायण !!!

‒‘एकै साधे सब सधै’ पुस्तकसे

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।। श्रीहरिः ।।

                                               


आजकी शुभ तिथि–
  कार्तिक शुक्ल दशमी, वि.सं.-२०७८, शनिवार
                      

भगवत्प्राप्तिसे ही 

मानव-जीवनकी सार्थकता


सीमित भोगका अर्थ ही गृहस्थाश्रम है । असीमित भोगोंके प्रतीकरूपमें सीमित भोग गृहस्थको इसलिये प्राप्त होते हैं कि लक्ष्यको याद रखते हुए, भोगोंका तत्त्व जाननेके लिये विधि-विधानसे सीमित भोग भोगकर गृहस्थ पुरुष उनका तत्त्व जाननेके पश्चात् उन भोगोंसे उपरत हो जाय और परमात्माकी प्राप्तिके साधनमें तत्परतासे लग जाय । उन प्राप्त भोग-पदार्थोंके द्वारा निष्कामभावसे जनता-जनार्दनकी सेवामें प्रवृत्त होकर उस सेवारूप साधनसे भी गृहस्थ परमात्माको प्राप्त कर सकता है । जनता-जनार्दनकी सेवा करते समय सेवाकी सामग्री (धनादि उपकरण) तथा सेवाके साधन (अन्तःकरण, इन्द्रियाँ आदि)-को भी उन्हींका (सेव्यका ही) समझना चाहिये । यह सेवा सामग्री जिनकी है, उन्हींकी सेवामें इसे लगा रहा हूँ‒यह भाव दृढ़ हो जानेपर उन उपकरणोंसे अपना सम्बन्ध-विच्छेद हो जायगा । ‘त्वदीयं वस्तु गोविन्द तुभ्यमेव समर्पये’ के अनुसार वे सेव्यके समर्पित हो जायँगे । ऐसी भावना बननेपर ज्ञात होगा कि अपने पास जो कुछ भी भोग-सामग्री और उनका संग्रह है, वह केवल सेवाके उद्देश्यकी पूर्तिके लिये है । फिर उनके प्रति अपनी ममताका सर्वथा अभाव हो जायगा । इससे जीवकी जड़ता जड़ संसारमें मिल जायगी और उससे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद हो जानेसे चेतन-स्वरूपमें स्वतः स्थिति हो जायगी ।

इस तत्त्वको और अधिक बोधगम्य बनानेकी दृष्टिसे यहाँ यह जान लेना चाहिये कि इन्द्रियाँका उपभोग तीन प्रकारका होता है‒(१) भोगोंका तत्त्व जाननेके लिये, (२) उनके द्वारा दूसरोंकी सेवा करनेके लिये तथा (३) परमात्माकी प्राप्तिके निमित्त शरीर-निर्वाह-क्रियाके सम्पादनके लिये । अब उनका अलग-अलग विश्लेषण किया जाता है ।

भोगोंका तत्त्वज्ञान‒यहाँ तत्त्व जाननेका अर्थ यह है कि भोगोंमें सीमित सुख है । भोगोंमें सीमित सुखकी मात्रा क्या है‒इसके अनुभवके लिये भी हमें भोगके अभावके दुःखका अनुभव करना पड़ेगा; क्योंकि भोगके अभावका दुःख जितना अधिक होगा, भोग उतना ही सुख प्रदान करेगा । अतः अभावकी भी आवश्यकता पड़ेगी । अभाव नहीं होगा तो सुख भी नहीं होगा । साथ ही भोग भोगते समय भोगशक्तिका नाश होता है और भोगेच्छा उत्तरोत्तर वृद्धिको प्राप्त होती है । भोग्य पदार्थ अनित्य होनेसे नाशशील हैं, प्रतिक्षण नष्ट होते रहते हैं । भोग पदार्थके नष्ट हो जानेपर उनके भोगनेके संस्कारोंकी स्मृति कष्टकारक होती है । भोगोंके तत्त्वका यह ज्ञान भोगोंके भोगनेसे उपलब्ध हो जाता है ।

दूसरोंकी सेवाका तत्त्व‒जबतक मानवको अनुकूल और प्रतिकूल पदार्थोंका ज्ञान नहीं होगा, तबतक वह प्रतिकूल पदार्थों और क्रियाओंके त्यागपूर्वक अनुकूल पदार्थ और क्रियाओंके द्वारा दूसरोंकी सेवा नहीं कर सकता । सेवा करते समय सेवाकी वस्तुएँ जिनकी हम सेवा करते हैं उनकी समझनी चाहिये । इससे वह उनके प्रति ममता और आसक्तिके बन्धनसे मुक्त हो जायगा । जबतक ममता और आसक्ति है, तबतक अनुकूलता-प्रतिकूलताका द्वन्द्व बना रहता है ।

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।। श्रीहरिः ।।

                                              


आजकी शुभ तिथि–
  कार्तिक शुक्ल नवमी, वि.सं.-२०७८, शुक्रवार
                      

भगवत्प्राप्तिसे ही 

मानव-जीवनकी सार्थकता


भगवान्‌ने जीवके कल्याणके लिये चार पुरुषार्थ निश्चित किये हैं‒धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष । इन चारों पुरुषार्थोंके विस्तारके क्षेत्र हैं‒चारों वर्ण तथा चारों आश्रम । उन्हींके द्वारा इनका अनुष्ठान होता है । चार पुरुषार्थ ही चार इच्छाएँ हैं तथा इनकी प्राप्तिके दो साधन माने जाते हैं । काम और अर्थकी प्राप्तिमें प्रारब्धकी प्रधानता रहती है तथा धर्म और मोक्षकी प्राप्तिमें उद्योगकी । अर्थको काम-प्रवण बना दिया जाय‒कामकी पूर्तिके प्रति उन्मुख कर दिया जाय तो अर्थका नाश हो जाता है । धर्मको कामसे संयुक्त कर दिया जाय तो धर्मका नाश हो जाता है । इसके विपरीत यदि अर्थको धर्ममें लगा दिया जाय तो वह धर्मके रूपमें परिणत हो जायगा । धर्मको अर्थमें लगा देनेसे वह अर्थका रूप धारण कर लेगा । इस प्रकार धर्म और अर्थ एक-दूसरेके पूरक और उत्पादक हैं । पर उन्हींको जब क्रोधसे जोड़नेका प्रयत्न किया जायगा, तब दोनोंका विनाश हो जायगा तथा कामनाका अभाव करके किया गया धर्म और अर्थ‒दोनोंका अनुष्ठान मुक्तिमें सहायक हो जायगा । निष्कामभावसे ‘काम’ का आचरण (विषय-सेवन) भी मुक्तिका मार्ग प्रशस्त करेगा । अतः मानवको चाहिये कि वह निष्कामभावसे आसक्तिका त्याग करके धर्मपूर्वक अर्थ-कामका आचरण करे । अर्थका सद्‌व्यय करे और अनासक्तभावसे धर्मानुकूल काम-सेवनमें प्रवृत्त हो । ऐसी प्रगति ही सच्ची मानवाताकी दिशामें प्रगति है ।

इसी प्रकार चारों वर्ण अपने लिये गीतामें उपदिष्ट वर्ण-धर्मका पालन करके सच्ची मुक्ति अथवा सिद्धिको प्राप्त कर सकते हैं । जिसको आत्माके कल्याणका साधन करना है, वह इस द्वन्द्वात्मक जगत्‌के झंझावातोंसे प्रभावित न होकर अपने लिये निश्चित कर्तव्य-मार्गपर चलता रहता है तथा सिद्धिको प्राप्त करके ही दम लेता है । भगवान्‌ श्रीकृष्णने गीतामें बताया है‒

स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः ।

(१८/४५)

‘अपने-अपने कर्ममें अनासक्तभावसे लगा रहनेवाला मानव सिद्धिको प्राप्त कर लेता है ।’ ठीक ऐसे ही चारों आश्रम भी मानवके ध्येयकी पूर्तिमें पूर्ण सहायक होते हैं । आश्रमोंमें दो आश्रम मुख्य हैं‒गृहस्थाश्रम और संन्यासाश्रम । ब्रह्मचर्याश्रममें गृहस्थाश्रमकी तैयारी की जाती है और वानप्रस्थाश्रममें संन्यासाश्रमकी । ब्रह्मचर्याश्रम प्रथम आश्रम है । इसमें प्रविष्ट होकर विद्योपार्जन और धर्मानुष्ठान करके यदि यहीं अर्थ-कामकी इच्छाके प्रति निर्वेद उत्पन्न हो जाय तो सीधे नैष्ठिक ब्रह्मचर्यका व्रत लेकर मानव इसी आश्रममें अपना कल्याण-साधन कर सकता है । यदि अर्थ-कामकी इच्छाको विवेक-विचारद्वारा इस आश्रममें नहीं मिटाया जा सका तो उस उपकुर्वाण ब्रह्मचारीके लिये गृहस्थाश्रम रखा गया है । इस आश्रममें रहकर मानव भोगोंके तत्त्वका ज्ञान करनेके लिये धर्मानुकूल अर्थ-कामका आचरण करे । यह भी साध्यकी दिशामें ही प्रवर्तन है, जिससे‒धर्म ते बिरति जोग ते ग्याना । ग्यान मोच्छप्रद बेद बखाना ॥‒वाली बात सम्भव होती है, क्योंकि धर्मानुसार गृहस्थाश्रमका अनुष्ठान करनेसे वैराग्यका होना अनिवार्य है ।

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।। श्रीहरिः ।।

                                             


आजकी शुभ तिथि–
  कार्तिक शुक्ल सप्तमी, वि.सं.-२०७८, गुरुवार
                      

भगवत्प्राप्तिसे ही 

मानव-जीवनकी सार्थकता


वस्तुतः ध्यानसे देखा जाय तो ज्ञात होगा कि मनुष्यकी जितनी क्रियाशीलता इस विरोधी दिशामें है, उतनी ही विवेकपूर्ण क्रियाशीलतासे मुक्ति अथवा उद्धारका मार्ग भी प्रशस्त हो सकता है । पर हो क्या रहा है ? मानव अपने लिये कभी स्वर्गकी, कभी अर्थकी, कभी भोगकी और कभी यशकी प्राप्तिके लिये नाना प्रकारकी योजनाएँ बनानेमें मस्त है । वह समझता है कि जीवनका मूल्य इतना ही है । इस प्रकार पुनः अपने-आपको आवागमन-चक्रमें डालनेका कुचक्र वह स्वयं ही रच लेता है । भगवान्‌ने गीतामें बताया है‒

उद्धरेदात्मनाऽऽत्मानं नात्मानमवसादयेत् ।

आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥

(६/५)

अर्थात्‌ मनुष्य स्वयं ही अपना उद्धार करे, अपने-आपको अवनतिके गर्तमें न गिरने दे । वह स्वयं ही अपना बन्धु तथा स्वयं ही अपना शत्रु है ।

आजका मानव आत्माके उद्धाराके लिये यत्न न करके स्वयं ही अपने प्रति शत्रुता कर रहा है । कहाँतक उल्लेख किया जाय, आज जिसको भौतिक सम्मान प्राप्त है, वह और अधिक सम्मानकी खोजमें है । धनिक और अधिक धनकी तलाशमें हैं । ग्रन्थकार मृत्युके बाद अमर कीर्तिकी अभिलाषामें डूबा है । बड़े-बड़े भवनोंके निर्माता अपनी भौतिक कीर्तिको चिरस्थायी बनानेके स्वप्न देखता है और धर्मोपदेष्टा अपनी प्रसिद्धिका वातावरण बनानेमें संलग्न है‒आदि-आदि । इस प्रकार मानवका सारा प्रयत्न ध्येयकी प्राप्तिके लिये न होकर उससे उलटी दिशाकी ओर जानेके लिये हो रहा है । परिणाम यह है कि इस दिशामें जितनी ही विशेषताकी उत्कट आकांक्षा की जाती है, मानवताके वास्तविक लक्ष्यसे उतनी ही अधिक दूरी होती जा रही है; क्योंकि ये सारी बातें व्यक्तित्वको दृढ़ करनेमें सहायक हैं । होना यह चाहिये कि मनुष्य व्यक्तित्वको हटाकर वहाँ अपने स्वरूपकी प्रतिष्ठा करे । उसका सारा प्रयत्न चिन्मयताकी प्राप्तिके लिये होना उचित है ।

जैसे कोई मनुष्य तीर्थ-स्नानको जाता है, वहाँ मेलेसे दूर किसी धर्मशालामें ठहरता है और धर्मशालाके स्थानको अपने लिये उपयोगी बनाने, रसोईका सुन्दर प्रबन्ध करने तथा अन्यान्य सुखभोगके सामान जुटाने आदिमें तन्मय हो जाता है कि तीर्थ-स्नान, देव-दर्शन, तीर्थ-दर्शन, मेला-महोत्सव और साधु-समागम आदि कोई कार्य नहीं कर पाता । ऐसे मनुष्यको तो हम उपहासास्पद ही बताएँगे । इसी प्रकार मनुष्य आया तो भगवत्प्राप्तिके लिये, किन्तु लग गया संग्रह और भोग भोगने आदिमें‒

आये थे हरि भजनको, ओटन लगे कपास ।

भोगोंकी प्राप्ति हमारा लक्ष्य नहीं है, पर प्रयत्न उसीके लिये होता है । भगवान्‌की प्राप्ति ही मानव-जीवनका मुख्य लक्ष्य है, किन्तु उसके लिये कोई प्रयत्न नहीं हो रहा है । शरीर, इन्द्रिय, प्राण, मन, बुद्धि, धन, वैभव, भोग आदि पदार्थ साधनमात्र हैं, किन्तु उन्हें साध्य बना लिया गया है और जो वास्तविक साध्य है, उसकी सर्वथा उपेक्षा कर दी गयी है ।

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।। श्रीहरिः ।।

                                            


आजकी शुभ तिथि–
  कार्तिक शुक्ल षष्ठी, वि.सं.-२०७८, बुधवार
                      

भगवत्प्राप्तिसे ही 

मानव-जीवनकी सार्थकता


उदाहरणतः महाभारतमें हम देखते हैं कि समरकी सारी तैयारी पूर्ण करनेमें अर्जुनका पूरा हाथ रहता है । कुरुक्षेत्रकी धर्मभूमिमें कौरव और पाण्डव-सेनाएँ व्यूहाकार खड़ी होकर शंखध्वनिके तुमुल नादसे युद्धकी सूचना देती हैं, तब अर्जुन भी अपना देवदत्त शंखका नाद करता है । शस्त्रसम्पातका प्रारम्भ होनेवाला ही है । अर्जुन पूर्ण सचेत है तथा कर्तव्यपरायण क्षत्रियकी तरह भगवान्‌ श्रीकृष्णको आदेश देता है‒‘सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत’ (गीता १/२१) । ‘भगवन्‌ ! मेरे रथको दोनों सेनाओंके बीचमें खड़ा करिये । मैं देखूँ कि इस युद्धमें मुझे किन-किन लोगोंसे लोहा लेना है ?’ इन जोशभरे वीरोचित शब्दोंको सुनकर भगवान्‌ भी रथको तत्क्षण दोनों सेनाओंके बीचमें खड़ा करके अर्जुनको कुरुवंशियोंकी ओर देखनेकी आज्ञा देते हैं । अर्जुन ज्यों ही दोनों सेनाओंमें अपने कुटुम्बियों, स्नेहियों, गुरुजनों तथा स्वजनोंको ही युद्धके लिये सज्जित देखता है, त्यों ही उसके मनमें विषाद छा जाता है । युद्धका परिणाम युद्धसे भी भयंकर और दारुण प्रतीत होता है । इस कुलक्षयसे उसे सुखकी कल्पना न होकर सर्वनाशकी परम्परा खुलती दिखायी देती है । उसके लिये अपने जीवनका कोई मूल्य नहीं रह जाता और इस कुटुम्ब-ग्रासकी अपेक्षा अपने लिये मृत्युकी आकांक्षा श्रेयस्कर प्रतीत होने लगती है । उसे कर्तव्यमें अकर्तव्य, श्रेयमें अश्रेय तथा अर्थमें अनर्थके दर्शन होते हैं । ममता और आत्मीयताके कारण ऐसे युद्धसे विरत होना ही वह श्रेष्ठतम कर्तव्य समझ बैठता है । भगवान्‌ श्रीकृष्णने अर्जुनके इस दुर्धर्ष मोहकी ‘क्लैब्य’, ‘कश्मल’ आदि शब्दोंसे तथा ‘अनार्यजुष्टम्’, ‘अस्वर्ग्यम्’, ‘अकीर्तिकरम्’ आदि पदोंसे उसके भयंकर परिणामोंको दिखाकर निन्दा की । किन्तु अर्जुनपर मोहका ऐसा गहरा रंग चढा था कि उसने अपने भावोंको ही श्रेष्ठ माना और पुनः कुछ बोलकर उन्हींका पिष्टपेषण किया । पुष्ट प्रमाणोंसे अपने वचनोंपर जोर देते हुए कहा‒‘पूजाके योग्य पितामह भीष्म और आचार्य द्रोणको बाणोंसे कैसे मारा जा सकता है ? मरनेपर गुरुजन-हिंसाके जघन्य अपराधके बाद हमें उनके रक्तसे सने हुए केवल अर्थ-काममय भोग ही तो प्राप्त होंगे । धर्म अथवा मुक्ति तो मिल नहीं जायगी ? अतः मेरे विचारसे युद्धका कोई औचित्य नहीं है ।’ इस प्रकार अर्जुनपर मोहने ऐसा अधिकार जमा लिया कि वह कर्तव्यविमुख हो गया । अन्ततः भगवान्‌ने गीता-ज्ञानका महान उपदेश देकर उसके मोहको निवृत्त किया । अतः गीता प्रत्येक मोहग्रस्त मानवके मोहनिवारणका अमोघ औषध है ।

मानव जबतक अपने लिये सुनिश्चित ध्येयकी पूर्तिकी ओर अग्रसर नहीं होता, तबतक वह अन्य सामान्य जीव-योनियोंसे विशिष्ट कोटिमें नहीं पहुँचता । अतः मनुष्यको अपने उद्धार या कल्याणकी दृष्टिसे अपनी विस्मृत चेतनाकी पुनः प्राप्तिके लिये प्रयत्नरत होनेमें ही मानवताकी सार्थकता समझनी चाहिये । जिस कार्यके लिये यह दुर्लभ मनुष्यशरीर प्राप्त हुआ है, उसका साधन न करके मानव शरीर, इन्द्रिय और प्राणोंकी मुख्यता माननेके कारण कुटुम्ब एवं भोग-सामग्रियोंमें आसक्त होकर उसे भूल गया है । जनसाधारणकी ऐसी ही स्थिति प्रायः देखनेमें आती है ।

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